Saturday, 11 January 2014

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जनचेतना व मानवधर्म के व्याख्याकार - स्वामी विवेकानंद

जिन दिनों स्वामी विवेकानंद अमरीका के प्रवास पर थे उन दिनों एक अमरीकी पत्रिका 'अपील एग्लांश" ने स्वामीजी की प्रशंसा में लिखा- 'इस समय के सबसे बडे संसार के प्रसिद्ध विचारक विद्वान हैं (वे)।" इस पत्रिका ने जनता से आग्रह किया 'आप लोग स्वामीजी को अवश्य देखने-सुनने जाएं, कारण उनमें पूर्व (भारत) की आत्मिक-मानसिक, आध्यात्मिक संस्कृति का आलोक और तेज संप्राप्त होता है। वस्तुतः स्वामी विवेकानंद, बीच में जो लंबा अंतराल था, उसके पूरक हैं? 

अपनी व्याख्यानमाला में विवेकानंद उस दुखी भारत को कभी नहीं भूले जो अन्नाभाव से पीडित, पराधीन था और भूलावे में लाकर विदेशी पादरियों द्वारा ईसाई बनाया जा रहा था। भारत की इस क्षत-विक्षत स्थिति पर जब वे बोलते थे तो आवेश में आ जाते थे और अंग्रेज जो अन्याय भारत की जनता से प्रतिदिन कर रहे थे उसका मर्मांतक चित्रण प्रस्तुत करने से कभी भी नहीं चूकते थे। वे बडी निर्भयता से बोलते थे कि 'अंग्रेज पादरी आज जो बाइबल की पोथियां बांटकर उन्हें जो धर्मशिक्षा देने का प्रयत्न कर रहे हैं, वास्तव में भारत को इस समय उसकी कतई आवश्यकता नहीं है। भारतवासियों को आज चाहिए रोटी और कपडा। इसलिए इंग्लैंड भारत को अपने पादरी भेजने की बजाए राशन भेजे। भारत कृतघ्न नहीं है वह इंग्लैंड को उसके बदले में अपना जीवन दर्शन, योगविद्या, अध्यात्मिक ज्ञान देकर उसे लाभान्वित करेगा।" और स्वामीजी अमरीका को भारत के इस ज्ञान-सम्मुज्वल रुप से परिचित कराने में यशस्वी भी रहे।

उनका दर्शन था ''परोपदेशे पांडित्य कभी नहीं होने दो। हम जग के गुरु नहीं, शिष्य तथा सेवक हैं।"" यह थी उस त्यागनिष्ठ संत की लोकभावना जो मानवधर्म का पक्ष निरंतर प्रकट करती है। 1902 में जब वे बेलूर मठ में ही रहा करा करते थे तथा मठ के घरेलू कार्यों की देखरेख करते हुए कभी-कभी कोई कार्य स्वयं के हाथों से करते हुए समय बीताते थे तब वहां मठ की भूमि की स्वच्छता तथा मिट्टी खोदने प्रतिवर्ष ही कुछ संथाल कुली आया करते थे। उन संथालों में एक व्यक्ति का नाम था केष्टा जो स्वामीजी को बडा प्रिय था। एक दिन स्वामीजी ने केष्टा से कहा ''अरे तुम लोग हमारे यहां खाना खाओगे?"" केष्टा बोला, ''हम अब और तुम लोगों का छुआ नहीं खाते हैं, अब ब्याह जो हो गया है। तुम्हारा छुआ नमक खाने से जात जाएगी रे बाप।"" स्वामीजी बोले, ''नमक क्यों खाएगा रे? बिना नमक डाले तरकारी पका देंगे, तब तो खाएगा ना?"" केष्टा उस बात पर राजी हो गया। इसके बाद स्वामीजी के आदेश पर सब संथालों के लिए पूरी, तरकारी, मिठाई, दही आदि का प्रबंध किया गया और वे उन्हें बिठाकर खिलाने लगे। खाते-खाते केष्टा बोला, ''हां रे स्वामी बाप, तुमने ऐसी चीजें कहां से पाई हैं-हम लोगों ने कभी ऐसा नहीं खाया।"" स्वामीजी ने उन्हें संतोषपूर्वक भोजन कराकर कहा, ''तुम तो नारायण हो-आज मैंने नारायण को भोग दिया।"" 

स्वामीजी जो दरिद्रनारायण की सेवा की बात कहा करते थे, उसे उन्होंने इसप्रकार से स्वयं करके दिखाया है । वे विदेश में धर्मप्रचारार्थ गए ही इसलिए थे कि, इस देश के लिए अन्न का प्रबंध कर सकें।

मद्रास प्रांत में जो हजारों पेरिया ईसाई बने जा रहे थे उनके संबंध में उनका कहना था कि ऐसा न समझना कि वे केवल पेट के लिए ईसाई बनते हैं। वास्तव में हमारी सहानुभूति न पाने के कारण वे ईसाई बनते हैं। हम दिन-रात उन्हें यही कहते रहे हैं कि, ''छुओ मत छुओ मत।" देश में अब क्या दया-धर्म है भाई? केवल छुआछूतपंथियों का दल रह गया है। ऐसे आधार के मुख पर मार झाडू, मार लात। इच्छा होती है तेरे छुआछूत पंथ की सीमा को तोडकर अभी चला जाऊं-जहां कहीं भी पतित-गरीब, दीन-दरिद्र हों, आ जाओ, यह कहकर उन सभी को श्रीरामकृष्ण के नाम पर बुला लाऊं। इन लोगों के बिना उठे मां नहीं जागेगी। हम यदि इनके लिए अन्न-वस्त्र की सुविधा न कर सके तो फिर हमने क्या किया? हाय! ये लोग दुनियादारी कुछ भी नहीं जानते हैं। इसलिए तो दिनरात परिश्रम कर के भी अन्न-वस्त्र का प्रबंध नहीं कर पाते। आओ हम सब मिलकर इनकी आंखे खोल दें- मैं दिव्य दृष्टि से देख रहा हूं, इनके और मेरे भीतर एक ही ब्रह्म-एक ही शक्ति विद्यमान है, केवल विकास की न्यूनाधिकता है। सभी अंगों में रक्त का संचार हुए बिना किसी भी देश को कभी उठते देखा है? एक अंग के दुर्बल हो जाने पर दूसरे अंग के सबल होने से भी उस देह से कोई बडा काम फिर नहीं होता इस बात को निश्चित जान लेना।"" 

एक प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा था- ''भाइयों! कहो कि नंगा भारतीय, अशिक्षित भारतीय, हरिजन भारतीय मेरा भाई है। बहनों! अपनी आवाज और ऊंची उठाकर कहो कि भारत में सिर्फ मानव ही आराध्य है। भारत के लिए मानव संस्कृति का विकास बहुत जरुरी है। और दिनरात प्रार्थना करो कि हे गौरीपति! हे महाशक्ति! मेरी निर्बलता को दूर करो और मुझमें संघर्ष करते रहने की निरंतर शक्ति दो।"" इन पंक्तियों मे स्वामीजी की मानवधर्म की सच्ची व्याख्या स्पष्ट है। और इसमें से यह भी दृष्टिगोचर होता है कि, स्वामीजी के मन में सामान्यजनों के लिए कितना अनुराग, समादर था।

एक बार उनसे पूछा गया आपका राष्ट्रीय उद्देश्य क्या है? मुक्ति की व्यापक परिभाषा आप किसे कहते हैं? स्वामीजी का उत्तर था- मुक्ति वही है जिसने अपना सब कुछ दूसरों के लिए त्याग दिया। अंतःकरण की निर्मलता ही सबसे बडी शुद्धि है। सबसे पहले उस विराट पुरुष की पूजा करो, जो हमारे चारों ओर विराजमान है। ये सब मनुष्य और पशु ही हमारे देवता हैं। इनमें भी सबसे पहले पूजा करो, अपने देशवासियों की और यही हमारा सच्चा राष्ट्रीय उद्देश्य है।

स्वामीजी के उक्त विचारों को दृष्टि में रख यदि वर्तमान पर नजर डालें तो परिस्थितियां आज भी कुछ विशेष बदली नहीं हैं। हम अंतर्बाह्य अंतर्द्वंद से ग्रस्त हैं, स्वामीजी के बताए लक्ष्यप्राप्ति से कोसो दूर होकर कुंठित हुए जा रहे हैं और समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं ऐसी परिस्थिति में हमें स्वामीजी के यह वचन मार्गदर्शन कर सकते हैं- ''मैंने जो कुछ कहा है उन बातों को मन में गूंथकर रखना। कहीं भूल न जाना।""

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