Thursday, 30 January 2014

तनाव

तनाव


आज की इस भागभागभरी जिदंगी में तनाव यानी टेंशन ने सर्वत्र एक बडी गंभीर समस्या का रुप धारण कर लिया है। जिससे सभी को दो - चार होना पड रहा है। यह शब्द इतना अधिक सामान्य हो गया है कि साधारण से लेकर असाधारण, साक्षर-उच्चशिक्षित से लेकर निरक्षर-अशिक्षित तक सभी इस शब्द को एक जुमले के रुप में उपयोग में लाने लगे हैं। छोटे से लेकर बडे तक शालेय विद्यार्थी से लेकर वृद्धजनों तक सभी इस तनाव की समस्या से पीडित हैं। हर कोई अपनी - अपनी समस्याओं के कारण तनावग्रस्त है जैसेकि किसीको अत्याधिक काम का तनाव है, तो किसी को पढ़ाई का, किसीको बच्चों का, किसीको बीमारी का आदि। तनाव की समस्या के कारण कई लोग अवसाद के शिकार होकर रोगी हो रहे हैं तो, कुछ लोग आत्महत्या तक के प्रयास कर लेते हैं। कभी कुछ इसमें सफल भी हो जाते हैं।



तनाव कई समस्याओं एवं रोगों उदा. मधुमेह, रक्तदाब आदि की जड है। तनाव का एक सबसे बडा कारण तेज रफ्तार जिंदगी है। इसके अलावा आर्थिक व सामाजिक कारक भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। बढ़ती कीमतें घटती सीमित आय। आम तकलीफों के रुप में वायु एवं ध्वनि प्रदूषण, विकराल रुप धारण करता यातायात और यातायात नियमों का उल्लंघन भी तथा समय - समय पर जगह - जगह पर होनेवाली चक्काजाम की स्थितियां भी जो व्यक्ति पर पडनेवाले विपरीत प्रभावों के कारण तनाव में बढ़ौत्री करती हैं। ऐसे इस घातक प्रभावों वाले तनाव से मुक्त होने या कुछ हद तक उसे नियंत्रण में लाने के लिए निम्न कुछ उपायों को कुछ हद तक सिद्धांतों के रुप में आजमाकर जीवन का अंग बनाकर इस कठीन समस्या का निदान कुछ सीमा तक तो निश्चय ही किया जा सकता है।


1). जीवन में घटित होनेवाली प्रत्येक घटना हमारे लाभ के लिए ही घटित हो रही है यह मानकर हर घटना को निरपेक्ष भाव से लें।


2). अपने जीवन की तुलना दूसरे के साथ करके चिंता में न पडें। क्योंकि, संसार एक रंगमंच है और हम एक पात्र मात्र हैं। हमारे हिस्से में आए हुए पात्र का हमें अभिनय करना है। यह न भूलें कि हर व्यक्ति की एक विशिष्टता होती है। हर व्यक्ति हर काम में तज्ञ नहीं हो सकता। हर काम हर कोई कर भी नहीं सकता। इसलिए हर किसी मामले में दूसरे की बराबरी करना और तनावग्रस्त होना व्यर्थ है।


3). तनाव मुक्त होने का अर्थ जिम्मेदारी से मुंह मोडना या कर्तव्य विमुख होना नहीं अपितु सामान्य रहकर आत्मविश्वासपूर्वक मुकाबला करना होता है।


4). व्यवहारिकता के धरातल पर जीएं, इसके लिए ध्यान में रखें कि निंदा करनेवाला मित्र ही सच्चा हितेषी है। जो आपको वास्तविकता का भान करता रहता है जैसाकि रहीम ने कहा है 'निंदक नियरे राखिए"।


5). यदि कभी एक साथ कई समस्याओं का सामना करना पडे तो बारी - बारी शांति से स्वयं पर नियंत्रण रखकर एक - एक समस्या को हल करने की कोशिश करें। विश्वास रखें समस्याएं जरुर हल होंगी।


6). दूसरों के साथ सहयोग की भावना रखें स्वयं की समस्याओं को भूलने में व हल करने में सहायता मिलेगी, सामाजिक बनें।


7). जीवन की समस्याओं की ओर सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें मनःस्थिति बदलने में आसानी होगी। जिन परिस्थितियों को हम बदल नहीं सकते उन पर विचार करके दुःखी होना व्यर्थ है। ध्यान में रखें समय सबसे अच्छा मरहम है, अच्छे समय की प्रतीक्षा करें।


8). बदले की भावना से काम न लें, स्वयं को ही बदलने की कोशिश करें, जीवन में प्रगति होगी।


9). ईर्ष्या न करेें, ईश चिंतन करें। ईर्ष्या से मन जलता है (स्वास्थ्य की हानि होती है), ईश चिंतन से शांति मिलती है (मनोबल बढ़ता है), ईर्ष्या से दुःख उत्पन्न होता है, ईश चिंतन से प्रसन्नता मिलती है। हमेशा याद रखें दुःख का कारण यह है कि 'हम अपने दुःखों से इतना दुःखी नहीं हैं जितना कि दूसरों के सुखों से"। हमेशा प्रसन्न रहने का और स्वयं को व्यस्त रखने का प्रयत्न करें।


10). जब भी समस्याग्रस्त हों तो ऐसा विचार करें कि भूतकाल की गलतियों का हिसाब चुकता हो रहा है।


11). अहंकार का त्याग करें। अहंकार से मानसिक संतुलन बिगडता है।


12). भगवान की कृपा में विश्वास रखें निश्चय ही तनाव की समस्या से निजात पाएंगे।


13). किसी बात या घटना पर अधिक विचार न करें। अधिक विचार चिंता का जनक है। चिंता तनाव का सबसे बडा कारण है। चिंता से बचें, चिंता को दूर रखें। चिंता शरीर को खोखला करती है।


14). प्रतिदिन थोडा सा तो भी समय ईश्वर की आराधना में बिताएं व योगासन करें । इस कारण शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होकर तनाव दूर होगा व स्वास्थ्य लाभ होगा।


15). सात्विक जीवन बिताएं, सादा, कम एवं सात्विक आहार लें। आवश्यकताएं सीमित रखें, फिजूलखर्ची से बचें। समय का सदुपयोग करें। व्यसन से बचें। अच्छी रुची विकसित करें जैसेकि पुस्तकें पढ़ना।

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