Saturday, 19 October 2013

पहली मुस्लिम नारीवादी महिला - रुकय्या सखावत हुसैन

पहली मुस्लिम नारीवादी महिला - रुकय्या सखावत हुसैन


'सुल्तानाज ड्रीम्स" एक काल्पनिक विज्ञानकथा है रुकय्या सखावत हुसैन की। जो एक विलक्षण स्वप्नकथा के रुप में है। जिसमें रुकय्या ने कल्पना की जो उडान भरी है वह किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकती है। इस कथा को पढ़ने पर ऐसा लगता है मानो रुकय्या पूरे पुरुषसमाज से बदला सा ले रही है। इस कथा को पढ़ने के पूर्व यह रुकय्या कौन थी यह जान लें।



19वी शताब्दी के जिस काल में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले शिक्षा की अलख जगा रहे थे, बंगाल में ब्राम्हो समाज का जन्म हो चूका था, उत्तर भारत में आर्यसमाज का आंदोलन परवान चढ़ रहा था। अंग्रेजी शिक्षा का प्रारंभ हुए अधिक समय नहीं बीता था। शिक्षा उच्च वर्ग तक ही सीमित थी। महिला शिक्षा और वह भी मुस्लिम महिलाओं के संबंध में तो और भी दुर्लभ थी। ऐसे काल में 1880 में रुकय्या का जन्म तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया और वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर में एक उच्च कुलीन जमीनदार परिवार में हुआ। रुकय्या के पिता सनातनी रुढ़िप्रिय थे, जिनकी दृष्टि में लडकियों की शिक्षा यानी कुरानपठन तक ही सीमित थी। भाषा के मामले में अरबी, फारसी, उर्दू और अंगे्रजी में व्यवहार एवं बांग्ला भाषा विरोध। क्योंकि उनकी दृष्टि में बांग्ला गुलामों और गैर मुस्लिमों की भाषा इसलिए तुच्छ। परंतु इस रुकय्या ने अपने भाई इब्राहीम से बांग्ला पढ़ना लिखना सीखा और वह भी दिल से। उसका विवाह 16 वर्ष की अवस्था में 30 वर्षीय विधुर खानबहादुर सय्यद सखावत हुसैन से  1896 में हुआ। जो अंगे्रजी भाषा में उच्चविद्याविभूषित होकर बिहार में जिला मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने भी उसे बांग्ला व अंग्रेजी सीखने व लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने कई लघुकथाएं व उपन्यास लिखे। उनकी ही प्रेरणा से रुकय्या ने कोलकाता में मुस्लिम लडकियों के लिए एक स्कूल की स्थापना की जो अब शासन द्वारा संचालित किया जा रहा है। उसकी मृत्यु 1932 में हुई।



रुकय्या स्त्री पुरुष समानता एवं मुस्लिम स्त्रियों की शिक्षा के लिए किए गए कार्यो के लिए जानी जाती हैं। बांग्लादेश में 9 दिसंबर रुकय्या दिवस के रुप में मनाया जाता है। 1926 में उसने बांग्ला महिला शिक्षा सम्मेलन में कहा था ः 'महिला शिक्षा विरोधी कहते हैं महिलाएं उच्छृंखल हो जाएंगी .... यद्यपि वे स्वयं को मुस्लिम कहते हैं उसके बावजूद वे इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध जाते हैं जो स्त्रियों को समानता और शिक्षा का अधिकार देती है। यदि शिक्षित होने के बाद पुरुष राह से नहीं भटकते तो, स्त्रियां ही क्यों?



रुकय्या ने 'सुल्तानाज ड्रीम" नामकी स्वप्नकथा लिखी जिसमें नारीवाद की कल्पना थी। यह स्वप्नकथा सन्‌ 1905 में मद्रास से प्रकाशित होनेवाले 'इंडियन लेडीज जनरल" में प्रकाशित हुई। रुकय्या कल्पना करती है कि आधी रात को उसे एक सपना आता है जिसमें एक स्त्री उसके पास आती है जिसे वह अपनी बहन सारा समझती है। जो उसे चारदीवारी से निकालकर एक दूसरे देश ले जाती है जहां का कामकाज बिल्कुल ही भिन्न है। इस देश की स्त्रियां परदा नहीं करती। यहां चारों ओर स्त्रियां ही स्त्रिया हैं। पुरुष कहीं नजर नहीं आते। पूछने पर पता चलता है कि इस देश में पुरुष घर में बंदिश यानी मर्दानखाने में रहते हैं। घर का सारा कामकाज खाना बनाना, बच्चे संभालना आदि पुरुष ही करते हैं। वे पराई स्त्रियों के सामने आ नहीं सकते। उनकी दुनिया घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहती है।



जिन्हें पुरुषों का कार्यक्षेत्र माना जाता है ऐसे सभी कार्य स्त्रियां ही संपन्न करती हैं। कहीं कोई अपराध, अत्याचार, शोषण, हिंसा नहीं क्योंकि ये सारे कार्य पुरुष करते हैं वे घर की बंदिश में हैं। चकित रुकय्या पूछती है हम स्त्रियों को तो प्रकृति ने ही कमजोर बनाया है ऐसी अवस्था में स्त्रियों को इतनी स्वतंत्रता कितनी योग्य है? क्या यहां की स्त्रियों को सुरक्षा की आवश्यकता महसूस नहीं होती? इस पर उसे उत्तर मिलता है जब पुरुष घर में हैं तो स्त्रियों को भय किस बात का? पागल और हिंसक लोगों को जिस प्रकार से पागलखाने में बंद रखा जाता है उसी प्रकार से इन पुरुषों को घर में बंद करके रखना आवश्यक है। रुकय्या कहती है हमारे देश में यह संभव नहीं। इस पर उसे उत्तर मिलता है तुम्हारे देश में पुरुष स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार करता है, कर सकता है परंतु उसे खुला छोड स्त्रियों को ही घर में कैद कर रखा जाता है।



यहां रुकय्या द्वारा यह कहने पर की हम भारतीय स्त्रियां क्या करें? पुरुष तो बहुत शक्तिशाली होता है। इस पर वह स्त्री उसे अद्वितीय उत्तर देती है ः शेर मनुष्य से शक्तिशाली होता है क्या इसलिए वह मनुष्य पर वर्चस्व स्थापित करने का, उसे गुलाम बनाने का प्रयत्न करता है ? तुम भारतीय स्त्रियों को यह मालूम ही नहीं है कि स्वयं का कल्याण किसमें है, ऐसी अवस्था में मैं भला क्या कर सकती हूं? तुमने स्वयं होकर अपने प्राकृतिक अधिकार खोए हैं।



इस विलक्षण स्वप्नकथा में सौर उर्जा की कल्पना का भी रोमांचित कर देनेवाला वर्णन है, स्वतंत्र महिला विश्वविद्यालय की कल्पना भी की गई है। वर्षा पर पूर्ण नियंत्रण का वर्णन है। लडकियों को निशुल्क शिक्षा मिलती है। कानूनन 21 वर्ष की आयु से कम की लडकी का विवाह हो नहीं सकता। धर्म के संबंध में भी इस देश की जो संकल्पना है वह यदि साकार हो जाए तो वास्तव में सारे झगडे ही मिट जाएं यहां का धर्म है 'प्रेम और सत्य"। यहां प्रत्येक का धार्मिक कर्तव्य है कि परस्पर प्रेम का व्यवहार करें और सच बोलें। यहां तक कि इस देश का कामकाज एक महिला ही देखती है और सभी शोधकार्य स्त्रियों द्वारा ही किए जाते हैं।



इस प्रकार की एक से बढ़कर एक विचित्र कल्पनाओं से यह स्वप्न कथा भरी हुई है जो स्त्री स्वतंत्रता, उस पर होनेवाले अन्याय, अत्याचार, उसे घर में कैद रखने, शिक्षा से वंचित रखने आदि की पुरुष मानसिकता के प्रति आक्रोश सा प्रकट करती महसूस होती है। इस कथा के माध्यम से रुकय्या का आत्मविश्वास, उसकी बुद्धिमानी, प्रतिभा के हमें दर्शन होते हैं। यह कथा इसलिए भी महत्वपूर्ण नजर आती है क्योंकि जिन कल्पनाओं को आज हम कुछ अंशों में साकार होते देख रहे हैं वे कल्पनाएं रुकय्या ने आज से 100 से अधिक वर्ष पूर्व ही कर ली थी। एक बात और एक उच्चकुलीन महिला होते हुए भी उसकी कल्पना की उडान आम महिलाओं की भावनाओं से जुडी नजर आती हैं। एक रुढ़िग्रस्त धर्मांध मुस्लिम समाज के स्त्रीविषयक दृष्टिकोण के विरुद्ध खडी हो स्त्री मुक्ति का उद्‌घोष करनेवाली वे पहली नारीवादी पुरोगामी लेखिका हैं। उसकी इस स्वप्नकथा का जब बांग्ला अनुवाद प्रकाशित हुआ तब भी कट्टरपंथी लोग उसे कोई विशेष कष्ट ना दे सके क्योंकि उसका पति ब्रिटिशों का एक बडा अधिकारी मजिस्ट्रेट, मायका भी सक्षम व शासन अंग्रेजों का था। परंतु, फिर भी उसकी इस स्वप्नकथा को धर्मविरोधी, राष्ट्रद्रोही जरुर घोषित किया गया।



 रुकय्या के पूर्व महाराष्ट्र की ताराबाई शिंदे जो एक जमीनदार परिवार की होकर उसे हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और संस्कृत भाषा का भी ज्ञान था। उस जमाने में घोडे पर बैठकर अपने खेतों पर जाती थी। उसने भी स्त्री-पुरुष संबंधों पर एक लेख 'स्त्री पुरुष तुलना" पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध सन्‌ 1882 में लिखा था परंतु उसे वह चर्चा व प्रसिद्धि ना मिल सकी जो रुकय्या को मिली। एक विशेषता और सन्‌ 1950-60 तक यूरोप, अमेरिका तक में नारीवाद की संकल्पना रुढ़ ना हो सकी थी उससे पूर्व ही ताराबाई शिंदे और रुकय्या जैसी महिलाओं ने स्त्री मुक्तिवादी भूमिका ली थी। आज की नारीवादी महिलाओं के लिए ये महिलाएं निश्चय ही आदर्श सिद्ध हो सकती हैं। क्योंकि नारी समान अधिकारवाद की संकल्पना किसी भी विशिष्ट देश या धर्म के लिए अवतरित हुई ना होकर यह आत्मविश्वास संपन्न स्वतंत्रता की चाह रखनेवाली संवेदनशील स्त्री का एक सुंदर स्वप्न है।

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