Friday, 20 September 2013

गणतंत्र को आच्छादित करता तंत्र-मंत्र

गणतंत्र को आच्छादित करता तंत्र-मंत्र


देश में अज्ञानियों की कोई कमी नहीं है और कम से कम धर्म के मामले में तो अपने भारत में लोग अपने महाअज्ञानी होने का प्रमाण-पत्र हाथ में लिए ही घूमते रहते हैं। आज तक तंत्र-मंत्र के विरोध में न जाने कितनी पुस्तकें लिखी जा चूकी है कि तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और कुछ नहीं अंधविश्वास मात्र है। परंतु हमारे लोग हैं कि मानते नहीं और देश बुरी तरह से तंत्र-मंत्र की चपेट में है। कई लोग तो बाकायदा भारत की तंत्र और तांत्रिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं और उनका तो यहां तक कहना है कि साधक यदि प्रयास करे तो सिद्धियों को भी प्राप्त कर सकता है। इसी अंधश्रद्धा का चमत्कार है कि लाखों लोग प्रतिवर्ष कपोलकल्पित बातों पर विश्वास कर अंधश्रद्धा के अधीन हो जादू-टोने, भूत बाधा दूर करने, रोगमुक्त होने, संतान प्राप्ति, गुप्त धन प्राप्ति के चक्कर में पडकर अपनी धनसंपत्ति, प्रतिष्ठा गंवाने, शारीरिक हानि उठाने से लेकर, नरबलि देने तक के जघन्य अपराधों के शिकार हो रहे हैं। इस अंधविश्वास की बेडियों में अशिक्षित, अनपढ़, गवांर से लेकर विद्वान तक बुरी तरह से जकडे हुए हैं। इसीका फल है कि तथाकथित महाराज, बाबा, पीर-फकीर हलुआ पुडी खाने में लगे हुए हैं।



आखिर यह जादू-टोना है किस चीज का नाम! वस्तुतः जादू-टोना और कुछ नहीं केवल बुद्धि का भटकाव है। जब मनुष्य में आत्मविश्वास कम हो जाता है तब वह अपना विवेक, संयम तथा धैर्य खो बैठता है, उसकी सोचने की क्षमता कम हो जाती है। भटक कर हीन भावना के अधीन हो अंधश्रद्ध हो जाता है और इन तथाकथित महाराजों के चंगुल में फंस जाता है। बाबाओं की दुकानें चल निकलती हैं। जो समाज में भिन्न-भिन्न प्रकार के रुप धर कभी प्रवचनकार, तो कभी तांत्रिक, या सिद्ध पुरुष बन या तो ताबीज बांटते फिरते हैं, भूत उतारने की नौटंकी करते हैं, तो कभी कुछ चमत्कार दिखा अपने भक्तों को मूर्ख बनाते रहते हैं, शोषण करते रहते हैं। कुछ बाबा तो अपनी शक्ति द्वारा बांझ औरतों को गर्भवती औरत में परिवर्तित कर देने का चमत्कार भी दिखला चूके हैं और पर्दाफाश होने पर जेल की चक्की पीसने जा पहुंचते हैं। ऐसे ढ़ोंगी महाराजों के चक्कर में पडकर लोग अपना बंटाधार करवा बैठते हैं।



लेकिन कई मामलों में राजनीतिज्ञ ही इन जैसे बाबाओं को शरण देते नजर आते हैं क्योंकि सत्ता प्राप्ति हेतु वे भी तो इन तथाकथित महाराजों से यज्ञ, तंत्र-मंत्र आदि अनुष्ठान करवाते रहते हैं। तंत्र-मंत्र करनेवाले गुरुओं का इन राजनेताओं पर इतना प्रभाव है कि यदि वे कहें तो ये चुनाव लडने तक से इंकार कर देते हैं। मंत्री पद हासिल करने के लिए नेतागण इनके कहने पर तरह-तरह के अनुष्ठान करने के लिए तत्पर रहते हैं, भले ही इसके लिए इनको हास्यापस्द कृत्य भी क्यों ना करने पडें। इस मामले में उद्योगपति भी कुछ कम नहीं वे भी इनके चक्कर काटते नजर आ जाते हैं। काले धन को सफेद करना यह बाबाओं की बाबागिरी के व्यवसाय का एक हिस्सा जो है। आज इन बाबाओं की दुकानें जमकर चल रही हैं। चढ़ावे में आई रकम इनके चेले उद्योगपतियों-राजनेताओं-सत्ता के दलालों के माध्यम से बाजार में 'इनवेस्ट" की जा रही है और फिर इस इनवेस्टमेंट की रक्षा के लिए इन तथाकथित भ्रष्ट बाबाओं, तांत्रिकों, महाराजों को प्रश्रय दिया जाता है, इनके कुकर्मों को छुपाया जाता है। बांका समय आने पर इनकी रक्षा के लिए ये राजनेता-उद्योगपति ढ़ाल बनकर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए आ धमकते हैं। यह नजारा भी लोग समय-समय पर देखते ही रहते हैं।



इन तथाकथित बाबाओं का एक और गोरखधंधा है और वह है अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बलबूते कैंसर से लेकर कई असाध्य बीमारियों से पीडित लोगों को ठीक करने का दावा करना। महानगरों के धनी लोगों की अपनी मनोवैज्ञानिक व व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं जिनके कारण वे अशांत व दुखी रहते हैं। उनकी मनोदशा का लाभ उठाने के लिए इस प्रकार के महाराज सदैव तत्पर रहते हैं। ऐसे स्वयंभू महात्माओं का गरीबों से और पीडितों से कोई लेना देना नहीं रहता वे तो सदैव पांच सितारा होटलों में विराजमान रह कर संभ्रात, कुलीन वर्ग के दुख-दर्द दूर करने में व्यस्त रहते हैं।



इसके लिए इनके अपने तौर तरीके हैं जिसके तहत अखबारों-पत्रिकाओं में विज्ञापन दिए जाते हैं, दावे किए जाते हैं, फिर पहले से ही तैयार कुछ लोग बयान देेने लगते हैं कि हमें लाभ हुआ। ऐसे समय ये धनी व राजनेता काम आते हैं जो स्वयं आगे होकर अपने लाभान्वित होने का कथन करते नजर आते हैं। बस अब क्या कहने इन तथाकथित अध्यात्मिक पुरुषों के वारे-न्यारे होते समय नहीं लगता और जनता की सेवा करने का दावा करनेवाले ये महाराज विमानों में घूमते नजर आने लगते हैं। पत्र-पत्रिकाएं भी इन जैसों की सहायता करने में पीछे नहीं रहती किसी अखबार में इनके चर्चे होने की देर कि इन बाबाओं के दरबार में कतारें लग जाती हैं।



कहते हैं कि जगद्‌गुरु शंकराचार्य की मृत्यु भगंदर रोग से हुई थी और स्वामी विवेकानंद दमे से पीडित थे। अब जब इन जैसे महान अध्यात्मिक पुरुष अपनी व्याधि ठीक ना कर सके तो ये महाराज क्या चीज हैं? मेरा कहना सिर्फ यही है कि इस प्रकार के साधुओं-बाबाओं के प्रचार तंत्र के जाल में फंस अपना समय व धन व्यर्थ ना गवांए। सावधान रहें अपने महान भारत के विशाल गणतंत्र को इन तंत्र-मंत्र वालों की चपेट में ना आने दें। भूत लगना, प्रेत बाधा आदि कुछ नहीं होता, सब बकवास है। यदि आध्यात्मिक तरीकों से बीमारियां ठीक होने लगती तो आध्यात्मिक पुरुषों से भरे इस देश में कोई बीमार ही नहीं पडता, मरीज तो ढूंढ़े से भी नहीं मिलते।



याद रखें संतों की श्रेष्ठता उनके चमत्कारों में ना होकर उनके परउपकारी और महान चरित्र में निहित होती है। महान साधक कभी सिद्धियों के चक्कर में नहीं पडते। भगवान बुद्ध ने तो इस प्रकार के चमत्कारों के प्रदर्शन से दूर ही रहने को कहा था। उनका कहना था यदि कल्याण चाहते हो तो इन चमत्कारों से बचकर केवल सदाचार का अभ्यास करो। महात्मा बुद्ध की यह शिक्षा सर्वोत्तम है।     

Sunday, 15 September 2013

हिंदी दिवस 14 सितंबर

हिंदी दिवस 14 सितंबर


 अंग्रेजी की अंतरराष्ट्रीयता का मिथक



कई लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि अंग्रेजी विश्वभाषा है, उसे सीखे बगैर प्रगति कर नहीं सकते। यह पूरी तरह सत्य नहीं है। यह बात वे लोग करते हैं जो अंग्रेजी के सिवाय कुछ नहीं पढ़ते, जिन्हें दूसरी भाषाओं का रत्तीभर ज्ञान नहीं। अंग्रेजी अच्छी तरह से जाननेवाले आखिर इस देश में हैं ही कितने? किंतु इन लोगों ने राजकाज पर अपना वर्चस्व बना रखा है और इन्हीं लोगों ने अंग्रेजी की अंतरराष्ट्रीयता के मिथक का हौआ खडा कर रखा है।

यदि संपूर्ण विश्व परिदृश्य का इस संबंध में निरीक्षण किया जाए तो दिख यह पडेगा कि दर्शन हो या साहित्य, राजनीति का क्षेत्र हो या कला का यहां तक कि विज्ञान का भी तो अंग्रेजी का कहीं भी एकाधिकार नहीं है। विश्व के महान दार्शनिकों में गिने जानेवाले सुकरात, अरस्तू, अफलातून, हीगल, मार्क्स, गौतमबुद्ध, कणाद, कपिल आदि में से ना तो कोई अंग्रेज है ना ही अंग्रेजीभाषी। धर्म के क्षेत्र पर विचार करें तो जितने भी विश्वव्यापी धर्म हैं उनके धर्मग्रंथ मूलरुप से अंग्रेजी में नहीं लिखे गए हैं। अंग्रेजी तो बडी कठिनाई से आधा दर्जन देशों में राजकाज या घर-बाजार की भाषा है। इसका होहल्ला क्या केवल इसलिए है कि कभी विश्व में अंग्रेजों के राज में सूरज डूबता नहीं था!


यदि अकेली अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा होती तो संयुक्तराष्ट्र में अंग्रेजी के व्यतिरिक्त चीनी, फ्रेंच, स्पेनिश, रुसी यहां तक कि अरबी  भाषा को मान्यता ना होती। अमेरिका में भी अंग्रेजी का एकाधिकार नहीं है। कहीं स्पेनिश तो, कहीं फ्रेंच, डच भाषा का वर्चस्व है। यहां तक कि कई क्षेत्रों में अरबी, उर्दू, हिंदी, पंजाबी बहुतायत से बोली जाती है। अंतरराष्ट्रीय डाक भाषा भी अंगे्रजी ना होकर फ्रेंच है। विश्व में बहुतायत से बोली जानेवाली भाषा स्पेनिश है। एक समय था जब ब्रिटेन में अंग्रेजी को हीन समझा जाता था और प्रभुत्व फे्रंच का था। जितने भी कानून बनते थे वे फे्रंच में बनते थे और ऊँची शिक्षा की भाषा लैटिन थी। जो तर्क आज अंग्रेजी के लिए दिए जाते हैं वही तर्क किसी समय फ्रेंच और लैटिन को बनाएं रखने के लिए दिए जाते थे। अंग्रेजी को लाने के लिए संघर्ष करना पडा, अंग्रेजों का स्वाभिमान अंततः रंग लाया और इंग्लैंड में अंग्रेजी राजकाज की भाषा बनी।



अंग्रेजों ने आयरलैंड की भाषा गेलिक को एक शताब्दी में समाप्त कर अंग्रेजी को थोप दिया था। 1929 में आयरलैंड में गेलिक भाषा के लिए विद्रोह हो गया और अंत में समझौता होकर आयरिश गेलिक भाषा को आयरलैंड में राजकीय भाषा बनने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसी प्रकार का विरोध मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन, सिंगापुर आदि में भी हो चूका है और अंगे्रजी के वर्चवस्व को वहां नकार दिया गया है। मध्य पूर्व के अरब देशों ने भी अपने निशाने पर अंग्रेजी को ही लिया था। चीन, कोरिया, जापान, वियतनाम ने अपनी भाषा को इतना उन्नत कर रखा है कि सारी प्रौद्योगिकी, आर्थिक, रक्षा, विज्ञान और राजनय के क्षेत्र में सारा काम उनकी अपनी भाषा में ही होता है। उनके यहां एक मोर्चा सतत अंगे्रजी के विरोध में डटा रहता है। वे अपनी प्रौद्यिगिकी भी अपनी भाषा में ही उपलब्ध कराते हैं, आपको उनकी भाषा आती हो या नहीं।



अब यदि हम हमारे देश के संबंध में विचार करें तो क्या देखते हैं कि हिंदी दिवस ने एक प्राणहीन, नीरस परंपरा का रुप धर लिया है। अंग्रेजी स्कूल कुकुरमुत्तों के रुप में उगते चले जा रहे हैं जहां अंग्रेजी के नाम पर अधकचरी पीढ़ी जिन्हें न तो ढ़ंग से हिंदी आती है और ना ही अंगे्रजी समझने-बोलने योग्य हो पाते हैं, तैयार की जा रही है। जबकि हिंदी इतनी प्रभावी है कि वोट मांगना हो तो हिंदी में ही मांगना पडता है, विज्ञापन हिंदी के ही लोकप्रिय हो पाते हैं, हिंदी बिना उनका काम चल नहीं सकता। इन बहुराष्ट्रीय व्यापारिक संस्थाओं को अपना सामान जो बेचना है। हां, इससे एक भय यह अवश्य पैदा हो गया है कि जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनना चाहिए कहीं वह बाजार की भाषा ना बनकर रह जाए! वैसे यह होना असंभव सा ही है, बस आवश्यकता है तो इच्छाशक्ति की जिसके आधार पर ही हम हिंदी को उसका स्थान दिला सकते हैं।



ऊपर वर्णित आंदोलन, उनकी सफलता, उनके स्वाभिमान से हमें प्रेरणा, मार्गदर्शन लेना होगा। वैश्वीकरण से उपजी प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थिति का लाभ उठाकर हम हिंदी को और अधिक प्रभावी कर सकते हैं। जब कमाल अतातुर्क ने तुर्की को आधुनिक रुप देना प्रारंभ किया था तब उसने अपने अधिकारियों से पूछा- 'क्या देश का सारा कारोबार तुर्की भाषा में चलाना संभव है?" तब तक सारा कारोबार अंग्रेजी में ही चलता था। अधिकारियों ने कहा, 'सर ! इसके लिए कम से कम छः महीने आवश्यक हैं।" इस पर कमाल ने उत्तर दिया, 'समझो कि वे छः महीने आज रात को ही समाप्त हो रहे हैं और कल सुबह से पूरी तरह तुर्की भाषा में कारोबार करना शुरु करो।" बस तब से आजतक तुर्की का सारा कामकाज तुर्की भाषा में चला आ रहा है। और आज हम जिस विकास-विकास की रट लगाए रहते हैं उस दौड में वह हमसे कहीं आगे है एवं तुर्की भी हमारी तरह एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक देश है। वैश्विक राजनीति में वह कहीं से भी कमतर नहीं है।



वास्तव में आज हमें एक ऐसे क्रांतिकारी नेतृत्व को तलाशना होगा जो वर्तमान में व्याप्त निराशा के वातावरण से देश को उभारने के साथ ही साथ सत्ता में आने के पूर्व भी और आने के बाद भी हिंदी के मुद्दे को ना भूले इसके लिए वातावरण बनाना पडेगा तभी हिंदी दिवस मनाना सार्थक सिद्ध होगा।