Thursday, 8 August 2013

क्या भारत इजराईल से कुछ सीखेगा !!

क्या भारत इजराईल से कुछ सीखेगा !!

भारत और इजराईल में साधर्म्य है। भारत की स्वतंत्रता के ठीक तीन महिने पश्चात 29 नवंबर 1947 को इजराईल की स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित हुआ और 15 मई 1948 को उसका जन्म हुआ। स्वातंत्र्योत्सव मना रहे इजराईल पर दूसरे सप्ताह में ही अरबलीग के सातों राज्यों (सीरिया, लेबनान, जार्डन, मिस्त्र, सऊदी अरब, इराक और यमन) ने आक्रमण कर दिया। 5000 यहूदियों की बलि चढ़ाकर इजराईल ने विजय प्राप्त की। इस आश्चर्यजनक सफलता का आधार था उसका अपना आत्मविश्वास, धर्म और प्रखर राष्ट्रवाद। भारत पर भी स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ महिनों पश्चात पाकिस्तान ने कश्मीरी टोलियों के रुप में आक्रमण किया उस समय  सेना द्वारा शत्रुओं का पूरा नाश संभव होते हुए भी भारतीय राज्यकर्ता आक्रमण का प्रश्न यूनो में ले गए और उसका फल यह मिला कि, आधा कश्मीर स्वाहा होने के पश्चात आज भी पाकिस्तान आक्रोश व्यक्त कर रहा है कि 'हमारा आधा भाग तुमने दबा रखा है"। और हमें सतत युद्धमान स्थिति में खडा रहना पड रहा है। यह बात अलग है कि हम चाहे जो हो जाए जैसे कि पिछले 6 माह में 57 बार युद्धविराम का उल्लंघन, 3 साल में 270 आतंकी नियंत्रण रेखा पारकर घुसे, सन् 2010-12 के बीच 1000 आंतकी घुसपैठ की कोशिशें हुई हमारे जवानों को हौतात्म्य स्वीकारना पड रहा है और हम असहाय व किंकर्तव्यविमूढ़ आत्मसम्मानविहीन अवस्था में खडे-खडे देख रहे हैं।

उधर इजराईल के आत्मसम्मान की बानगी देखिए कि वह अपने देश की रक्षा के लिए किस सीमा तक कटिबद्ध है, यह इजराईल के वायुसेना के अधिकारी येरुकम अमिताई से सुुनिए -''यदि कभी इजराईल अपनी या अपनों की रक्षा करने में असमर्थ पाया जाए तो उसके अस्तित्व का कोई तात्पर्य ही नहीं रहता। हम आक्रमणकारी रक्षात्मक उपायों का प्रयोग करने के लिए बाध्य किए गए हैं और दांव दिन ब दिन ऊंचा होता जा रहा है। वह समय भी आ सकता है कि जब अपने यहूदी परिवार के एक सदस्य की रक्षा के लिए ऐसा कदम उठाना पड जाए जिससे मनुष्य जाति ही नष्ट हो जाए। इसके बिना जीवित रहना, जीवित रहना कहा ही नहीं जा सकता और हम सबकी कीमत, चाहे हम किसी भी देश में क्यों ना हों, कौडी के बराबर भी न होगी, यदि हम अपने आत्म- सम्मान को बेचकर अपने जीवन की कीमत अदा करें।""

सचमुच इजराईल ने अपने जन्म से लेकर अब तक इस भीष्म-प्रतिज्ञा का अक्षरशः पालन किया है। विकट परिस्थितियों को देखते हुए उसके कार्यकलापों ने संसार को आश्चर्य में डाल दिया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के जर्मनों के विषाक्त गैस-चैम्बर जहां यहूदियों को सामूहिक रुप से मौत के घाट उतारा जाता था के सबसे बदनाम शिविर (आश्विटज नगर) के संचालक आइकमैन  को अर्जेन्टीना के एक नगर से कई वर्षों बाद पकडकर इजराईल ला मृत्युदंड दिया। यूरोप के ओलंपिक में गए हुए इजराईल के खिलाडियों की उनके होटलों में फिलिस्तीनी छापामारों द्वारा हत्या के बारह आरोपियों में से ग्यारह को ढूंढ़कर मार डाला। युगांडा जाकर कसाई ईदीअमीन के घर में घुसकर फिलिस्तीनी मुक्ति मोर्चे के लोगों द्वारा अपह्रत विमान को मय यात्रियों के मात्र 90मिनिट में छुडा लाया। 1981में इराक के बगदाद के निकट स्थित परमाणु रिएक्टर 'ओसिराक" को अचानक हवाई हमला कर नष्ट कर डाला। 1 अक्टूबर 1985 को पी.एल.ओ. के अध्यक्ष यासर अराफात के निजी रक्षकों के संगठन फोर्स-17 को कुचलने के लिए जिन्होंने तीन इजराईली नागरिकों को मार डाला था पर ट्यूनीसिया स्थित फिलीस्तीनी मुक्ति मोर्चे के मुख्यालय पर लडाकू विमानों से हमला कर दिया था। यह मुख्यालय इजराईली सेना के धुआंधार हमलों के कारण ही बेरुत से हटाकर पांच हजार कि.मी. दूर ट्यूनीसिया की राजधानी ट्यूनीस स्थानांतरित किया गया था।

एक हम हैं कि हरसमय हुतात्मा हो रहे हमारे जवानों के हौतात्म्य का बदला लेना छोड पाकिस्तान से चर्चा में ही रत हैं उस पर कोई कारवाई किए जाने के स्थान पर आपस में ही उलझते फिर रहे हैं। हमारी सेना में भी अत्यंत विकट परिस्थितियों में शत्रु से सामना करने की क्षमता है जो कि वह कारगिल-सियाचीन के मोर्चों पर दे भी चूकी है। मुंबई के हमले 9/11 के समय हमारे कमांडों अपनी वीरता, सक्षमता का परिचय दे चूके हैं। परंतु, हमारे नाकारा नेतृत्व उस सफलता को भी असफलता में बदल देते हैं। हम यही सोचकर प्रसन्न होते रहते हैं कि कसाब के बहाने हम पाकिस्तान के सत्य को विश्व के सामने ले आए। यदि इस सत्य को विश्व जनमत के सामने लाने से कोई लाभ होता तो कुछ समझ में भी आता, परंतु पाकिस्तान तो अपनी कारगुजारियों में आज भी उसी तरह से लगा हुआ है। आज भी पाकअधिकृत कश्मीर में आंतकवादियों के प्रशिक्षण स्थल चल रहे हैं। आतंकी दाऊद इब्राहीम पाकिस्तान में मजे से रह रहा है और वहां बैठे यहां आतंकी कार्यवाहियों को अंजाम दे रहा है। यदि अमेरिका पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार सकता है, इजराईल दूसरे देशों में घुसकर अपने देश के शत्रुओं का नाश कर सकता है, तो महाशक्ति का सपना संझोनेवाले हम क्यों नहीं कर सकते? वास्तव में सत्य तो यह है कि हमारे नेतृत्व में दम नहीं शायद इसीलिए हम डी - डे जैसी पिक्चर बनाकर ही खुश हो जाते हैं। वरना हमारी सेना तो पूरी तरह से सक्षम है। जो अपनी सक्षमता कई बार कई विभिन्न मोर्चों पर सिद्ध भी कर चूकी है।

पहले अरब-इजराईल युद्ध के बाद ठंडे पड चूके अरबों ने मिस्त्री राष्ट्रपति नासिर के नेतृत्व में 1954 में खुरापातें आरंभ की आज जिस प्रकार से पाकिस्तान कर रहा है उसी प्रकार की हरकते सीमा पर की, सुवेज नहर तक इजराईल के लिए बंद कर दी। नतीजा इजराईल ने मिस्त्र के सिनाई रेगिस्तान पर कब्जा जमा लिया और युद्ध के सारे उद्देश्य पूर्ण होने पर 6नवंबर 1956 को युद्धबंदी की। जनवरी 1967 में सीरिया की सीमा पर टैंकयुद्ध शुरु होकर इजराईल की बडी हानि हुई। परंतु, तत्काल इजराईल ने पलटवार कर इजिप्त के 300, सीरिया के 60, जॉर्डन के 35 और इराक के 15 हवाईजहाजों को विमानतलों पर ही नष्ट कर दिया। उडने तक का मौका ना दिया। फिलीस्तीनियों की गाजापट्टी, जॉर्डन का पश्चिमी तटप्रदेश, सीरिया की गोलान पहाडियों और मिस्त्र के सिनाई रेगिस्तान पर कब्जा जमा लिया। अरब-इजराईल के बीच चार बडे तो 25-30 छोटी-मोटी लडाइयां हो चूकी हैं। परंतु, हरबार दीन-दीन करनेवाले अरबों की शक्ति क्षीण ही हुई।

इस दमदारी का नतीजा सबसे पहले मिस्त्र ने इजराईल से समझौते का मार्ग अपनाया, जॉर्डन ने भी यही मार्ग अपनाया, लेबनान को तो जबरदस्त मुंह की खानी पडी और तो और फिलीस्तीन को भी इजराईल को मान्यता देनी पडी। यह इजराईल की शक्ति का ही चमत्कार है कि मिस्त्र जो इजराईल को समुद्र में डूबो देने की बात करता था जो अरब अनंतकाल तक लडने का दम भरते थे नमस्कार की मुद्रा में आ गए। आखिर शक्ति की ही भक्ति होती है इसीलिए पाकिस्तान के जनरल जिया जो इस्लामिक परमाणुबम बनाने का दावा करते थे ने अरबी समाचार पत्र 'अखबार अल खलीज" को एक साक्षात्कार में कहा 'इजराईल से लडाई हमेशा के लिए जारी नहीं रखी जा सकती", 'अरब देश इजराईल को मान्यता दे दें।"


वास्तव में हम जिस दिन पाकिस्तान को ईंट का जवाब पत्थर से देंगे उसी दिन वह सीधा होगा, उसकी कमर तोडना ही होगी वरना तब तक तो बस यही चलता रहेगा जो वर्षों से जारी है पाकिस्तान हरकतें रहेगा हम विरोध प्रकट करते रहेंगे, आपस में बहस करते रहेंगे नतीजा ढ़ाक के तीन पात की कहावत सिद्ध होती रहेगी। हम अपमानित होते रहेंगे, हमारे जवान सीमा पर हुतात्मा होते रहेंगे। विश्व में सबसे बडे हथियारों के खरीददार होने के बावजूद भी हम क्या हमेशा मिमियाते ही रहेंगे? यदि यह करना है तो इतने हथियारों को खरीदने की आवश्यकता ही क्या है?     

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