Saturday, 24 August 2013

शरई शासन का मशविरा मिस्त्र पर लागू हो पाएगा?

शरई शासन का मशविरा मिस्त्र पर लागू हो पाएगा?

एक वर्षपूर्व जब इजिप्त में अरब वसंत चरम पर था तभी कुछ विचारकों ने मत व्यक्त किया था कि कहीं ऐसा ना हो कि इस क्रांति पर इस्लामिक कट्टरपंथी हावी हो सत्ता में आ जाएं और हुआ भी ऐसा ही। शीघ्र ही इस्लामी कट्टरपंथी लू के थपेडों की आंच मिस्त्री अवाम को महसूस होने लगी। उन्हें अपनी स्वतंत्रता खतरे में नजर आने लगी। और अब अलकायदा प्रमुख अयमान जवाहिरी का मुस्लिम ब्रदरहुड और उसके समर्थकों को दिया हुआ यह मशविरा कि 'वे लोकतंत्र को समर्थन देना छोड शरई कानून का शासन स्थापित करने का प्रयास करें" द्वारा उनका भय सत्य भी साबित होने लगा है।

यह अलकायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी एक नेत्र विशेषज्ञ होकर मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता सय्यद कुत्ब जिसे तख्तापलट कर इस्लामिक शासन लाने के प्रयत्नों के कारण 1966 में फांसी पर चढ़ा दिया गया था का शिष्य होकर कट्टर मुस्लिम ब्रदर है। यह भी मिस्त्र के राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में तीन वर्ष जेल में रह चूका है। 1984 में अयमान सऊदी अरब गया फिर वहां से पेशावर वहीं इसकी मुलाकात ओसमा बिन लादेन से हुई। इसीने ओसामा को हिंसा की दीक्षा दी। 'अलकायदा" के  कार्यकर्ताओं को खूनखराबे की शिक्षा देने का दायित्व अयमान पर ही था। ओसमा पूरी तरह से अयमान के कहने में था। ओसामा के गुरु अब्दुल्लाह अजम से अयमान के मतभेद हो गए। अयमान का कहना था कि सऊदी अरब, इजिप्त आदि स्थानों पर की सरकारें गैरइस्लामिक होने के कारण उन्हें गिरा देना चाहिए, उनके सत्ताधारियों को मार डालना चाहिए। जबकि अजम का कहना था कि अपने मुस्लिम भाईबंदों को मारना योग्य नहीं। झगडा बढ़ गया। अजम की हत्या हो गई। कहते हैं कि उसकी हत्या में अयमान का हाथ था। 11 सितंबर को अमेरिका पर हुए हमले की कल्पना और योजना अयमान की ही थी तब से लेकर वह ओसामा के साथ ही रहा और ओसामा के बाद अब अयकालयदा प्रमुख है।

अयमान अल जवाहिरी जिस शरई यानी शरीअत पर आधारित यानी इस्लाम के पहले चार आदर्श खलिफाओं के काल जैसा इस्लामी राज्य स्थापित करने की सलाह दे रहे हैं वह शरीअत क्या होती है, उसके स्त्रोत कौनसे है, उसकी न्यायप्रणाली कैसी होगी, उसमें गैरमुस्लिमों को किस प्रकार व्यवह्रत किया जाएगा, उस इस्लामी राज्य का स्वरुप कैसा होगा के बारे में अधिकांश लोग जानते ही नहीं हैं। इसलिए संक्षेप में उसे जान लेना उचित ही होगा इससे यह भी पता चलेगा कि क्यों सेना व आम मिस्त्री जनता मुस्लिम ब्रदर के नेता मुर्सी के विरुद्ध हुई।

इस्लामी राज्य यानी खिलाफत एक अनन्य संस्था है। खिलाफत का आधार कुरान की (24ः55) आयत में है। इस विषय में मौ. अबू मुहम्मद इमामुद्दिन का कहना है ः ''आजकल जिस राज्य के राष्ट्रपति और मुख्य प्रशासक मुसलमान हैं उस राज्य को इस्लामी राज्य कहा जाने लगा है ... वस्तुतः 'इस्लामी राज्य" वही है, जिसका संविधान कुरान व हदीस पर आधारित है और जिसके राष्ट्रपति और प्रधान अधिकारी इस्लाम के सिद्धांतानुसार जीवनयापन कर रहे हैं।"" इसीलिए पैगंबर और पहले चार खलिफाओं के राज्यों को 'आदर्श इस्लामी राज्य" कहा जाता है।

इस्लामी राज्य का ध्येय, उद्देश्य और खलिफा का कर्तव्य वही है जो पैगंबर ने आदर्श के रुप में सामने रखा है। वह राज्य अल्लाह के कार्य के लिए स्थापित किया हुआ होने के कारण अल्लाह का कार्य यानी इस्लाम का प्रसार करना; वह सभी मानवों तक पहुंचाना; इस्लामी राज्य का विस्तार करना; सर्वत्र अल्लाह के कानून की प्रस्थापना करना; अल्लाह का धर्म अन्य धर्मों पर प्रभावी एवं विजयी करना; संसार में प्रेम, सत्य, न्याय, समता, बंधुता, सहिष्णुता, शांति, नैतिकता, मानवता आदि इस्लामी नीतिमूल्यों की प्रतिष्ठापना करना; राज्य की प्रजा के इहलोक और परलोक के कल्याण की चिंता करना; गुनाहगारों को दंडित करना ये सब खलिफा के कानूनसम्मत कर्तव्य ठहरते हैं। इन कर्तव्यों का निर्वाह कर आदर्श निर्मित किया इसलिए पहले चार खलिफाओं को 'आदर्श खलिफा" कहा जाता है। इन चार खलिफाओं का इस्लाम, इस्लाम के इतिहास व मुस्लिमों के जीवन में महत्वपूर्ण एवं अमूल्य स्थान है। वर्तमान में जो विश्वव्यापी जिहाद इस्लामी आतंकवादियों ने छेडा हुआ है वह इसी आदर्श खिलाफत की स्थापना के लिए है।

'शरीअत" का मूल अर्थ है 'जलाशय की ओर यानी जीवन के स्त्रोत की ओर जाने का मार्ग"। इसका गर्भितार्थ है ः जो महत्व रेगिस्तान में पानी का है वही जीवन में शरीअत का है। शरीअत का शब्दशः अर्थ 'मार्ग" अथवा 'पथ" (इस्लामी धर्मसत्ता का मार्ग। अल्लाह इस सत्ता का प्रमुख और प्रेरणास्थान है) और इसीलिए इस्लामी 'कानून" है। इस्लाम का सर्वार्थता से अनुसरण करना हो तो एकाध मुस्लिम द्वारा पालने योग्य सभी कानूनों एवं नियमों को एकत्रित रुप से 'शरीअत" कहते हैं।

इस्लाम की धारणा है कि ये नियम और कानून प्रत्यक्ष अल्लाह ने ही पैगंबर मुहम्मद द्वारा प्रकट किए हुए हैं। अन्य धर्मियों के व्यक्तिगत कानूनों के समान शरीअत में परिवार, विवाह, तलाक, दत्तकविधान, संपत्ति और उत्तराधिकार इनसे संबंधित कानूनों का समावेश होता है। सिवाय इसमें फौजदारी कानून भी आते हैं। नमाज, जकात, रोजा, हज, जिहाद इस्लाम के इन मूलभूत स्तंभों का पालन किस प्रकार किया जाए इसके भी निर्देश शरीअत में हैं। इतना ही नहीं तो व्यक्तिगत स्वच्छता, वेशभूषा, मनोरंजन, आहार,यौन व्यवहार, बच्चों की परवरिश ये अत्यंत व्यक्तिगत समझे जानेवाले विषयों के संबंध में भी आदेश हैं। वैवाहिक निमंत्रण, दात  कुरेदना जैसे विषयों के संबंध में भी पवित्र कानून हो सकता है के विषय में तो हिंदू सोच भी नहीं सकते। परंतु, यह वस्तुस्थिति है ंकि शरीअत में इनके संबंध में भी मार्गदर्शन है।

संक्षेप में शरीअत सभी सार्वजनिक और व्यक्तिगत व्यवहारों का नियमन एवं नियंत्रण करती है। व्यक्ति-व्यक्ति ही नहीं अपितु गुटों के बीच के संबंध भी कैसे होना चाहिए यह भी शरीअत ही तय करती है। केवल व्यक्ति  का ही नहीं बल्कि समग्र समाज का व्यवहार कैसा होना चाहिए का दिग्दर्शन भी शरीअत ही करती है। शरीअत की यह विशिष्टता इस्लाम के स्वरुप के कारण है जिसमें व्यक्तिगत और सार्वजनिक, लौकिक और पारलौकिक का कोई भेद नहीं। इस्लाम में राज्यसंस्था और धर्मसंस्था अलग-अलग होते हैं को मान्यता ही नहीं है इसी कारण से धर्मनिरपेक्ष अथवा इहवादी शासन यह कल्पना ही मूलतः इस्लाम विरोधी है।

इस्लाम को समझना हो तो शरीअत (इस्लामी कानून) और फिकह (इस्लामी न्याय शास्त्र) का अध्ययन करना पडता है। एकाध मुस्लिम देश में शरीअत तीन प्रकार से लागू हो सकती है - 1). न्यायशास्त्र में शरीअत का स्थान गौण हो, 2). न्यायशास्त्र पर शरीअत का प्रभाव हो, 3). न्यायशास्त्र शरीअत से स्वतंत्र हो- उदा. तुर्कीस्तान, ट्यूनिश, अल्जेरिया।

शरीअत के चार स्त्रोत अथवा मूलतत्त्व हैं। अरबी में उन्हें 'उसूल" कहते हैं। 1). कुरान, 2). अलहदीसः पैगंबर की उक्तियां एवं कृतियां, 3). इज्मा ः यानी सहमति, किसी एक बात पर बहुमत होना। 4). कियास ः सबसे कम महत्व का स्त्रोत है। 'साम्य देखकर निकाला हुआ निष्कर्ष"। सुन्नी इस्लाम में न्यायशास्त्र की चार प्रणालियां मान्य हैं। प्रत्येक प्रणाली को 'मदहब" कहते हैं। यह चार प्रणालियां हैं - हनाफी, शाफई (शफी), हनबाली और मालिकी। यह न्याय प्रणाली अध्ययन का एक बहुत बडा विषय है।

आदर्श खिलाफत काल में गैरमुस्लिमों के साथ करार किए गए थे और उन करारों की शर्तों के अनुसार उनके संबंध तय होते थे। किस पद्धति से उस क्षेत्र को जीता गया इस पर से वहां के लोगों के साथ किए गए करारों में फर्क पडता था। लडाई कर जीते गए क्षेत्रों पर कठोर शर्तें लादी जाती थी। लडाई न करते शरणागत होनेवाले लोगों को कुछ विशेष सुविधाएं दी जाती थी। इस प्रकार के करार की शर्तें एवं धाराएं तय करने का सर्वाधिकार विजेता इस्लामी राज्य के पास था; पराजितों को तो केवल मान्य करना था। प्रसंगानुरुप कितनी भी सुविधाएं दी जाएं तो भी गैरमुस्लिमों का दर्जा मांडलिक का ही रहनेवाला था। जिजिया मांडलिकत्व का प्रतीक था। उन्हें सेना में जाने से छूट प्राप्त होने के कारण उन्हें अनायास ही संरक्षण प्राप्त हो जाने के कारण उनसे लिया जानेवाला जिजिया संरक्षण कर था यह कहना सत्य नहीं। क्योंकि, उनका सेना में जाना प्रतिबंधित था। वे तो राज्य के दूसरे दर्जे के नागरिक थे। मुस्लिम प्रजा के लिए कानून तो गैरमुस्लिमों के लिए करार थे। खलिफा उमर की एक सनद या करार के अनुसार गैरमुस्लिम मुस्लिमों जैसा पोशाक न करें; घोडे या ऊंट पर बैठते समय जीन ना कसें; चर्च का निर्माण न करें; क्रॉस ना पहने जैसी अनेक धाराएं उसमें हैं।

गैरमुस्लिमों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी, परंतु वह स्वतंत्रता पारलौकिक अर्थ के धर्म के लिए थी, धर्म एक जीवन पद्धति है ऐसा मानकर उस अनुसार सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि इहलौकिक क्षेत्र में अपने धर्मानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता नहीं थी, जैसीकि मुस्लिमों की थी। पारलौकिक अर्थ के धर्मपालन के संबंध में भी कुछ निर्बंध थे। एक विशेष बात और, जिजिया लेकर उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान करने के लिए इस्लामी राज्य स्थापित नहीं किया था। कुरान के अनुसार (9ः29) जिजिया की सहूलियत केवल ग्रंथधारकों के लिए है, बहुदेववादियों या मूर्तिपूजकों के लिए नहीं। तथापि, यह आयत अवतरित होने के पूर्व पैगंबर की एक हदीस का आधार लेकर खलिफा उमर ने अग्निपूजक पारसियों को जिजिया की सुविधा लागू की थी। अनेकेश्वरवाद इस्लामानुसार सबसे बडा अपराध और अन्याय है। जिजिया लेकर उसके बदले में ऐसा अपराध करने की सुविधा देना यह स्पष्ट रुप से विशिष्ट परिस्थिति का व्यवहारिक समझौता था। अल्पावधि में सभीको श्रद्धावान (इस्लाम पर श्रद्धा रखनेवाला) बनाना संभव ना होने के कारण इसके लिए एक समझौता था। अपने ध्येयमार्ग का एक चरण था।


अब अंत में मिस्त्र की जनता के विरोध पर विचार करेंगे जिन पर की यह शरीअत का कानून लागू किया जाने के प्रयास करने का अयमान मशविरा दे रहे है। इजिप्शियन समाज में तीन गुट हैं, इस्लामिक विचार करनेवाले, कोई विशेष ऐसा विचार न करनेवाले और तीसरा गुट है सुधारवादियों का। सुधारवादी विचार करनेवाले लोगों को इंडोनेशिया, मलेशिया, तुर्की जैसे स्थानों का उदारवादी इस्लाम मंजूर है। यह टीव्ही, समाचारपत्रों से आनेवाली सूचनाओं का प्रभाव है। तुर्कस्तान, मलेशिया उदारमतवादी होकर प्रगति कर रहे हैं यह लोगों को पता चल गया है इस कारण यहां के लोगों का मतपरिवर्तन हो रहा है। आर्थिक विचारधारा प्रभावी तय हो रही है। कामकाजी स्त्रियों का प्रमाण बढ़ रहा है। परिवार नियोजन अपनाया जा रहा है भले ही मुल्ला विरोध करें। स्त्रियां नियोजन कर रही हैं। लडका ही चाहिए, लडकी नहीं इस प्रकार का विचार अब लोग नहीं करते। लडके-लडकियां हाथों में हाथ डाले, कमर में हाथ डाले घूमते नजर आते हैं। बिकनी पहनकर बीच पर लडकियां नजर आ जाती हैं। कई लडकियां हिजाब वापरती हैं परंतु अंदर से बदल गई हैं। बाहरी दबाववश केवल दिखावे के लिए वे िहजाब वापरती हैं। काहिरा में नाईट लाइफ भी है उनमें विदेशी पर्यटक ही अधिक हैं, परंतु इजिप्शियन भी हैं। अच्छा व्यवहार करना चाहिए, शांति से रहना चाहिए, जरुरतमंदों की सहायता करना चाहिए यही धर्म है। उसका पालन करें यही बहुत है का विचार जोर पकड रहा है। अल अजहर विश्वविद्यालय के शेख तंतावी के अनुसार जिहाद यानी शस्त्र लेकर लडना नहीं। जिहाद यानी शब्दों से, कल्पनाओं द्वारा किया हुआ संघर्ष। लोगों को अपने विचारों से सहमत करना जिहाद है। बल प्रयोग न करते प्रेम से सहमत करवाना जिहाद है। अब इस प्रकार की विचारधारा जहां विकसित हो चूकी हो वहां पर शरई कानून का शासन स्थापित करना निश्चय ही आसान नहीं यह बात जरुर पक्की है।

No comments:

Post a Comment