Wednesday, 14 August 2013

अखंड भारत

अखंड भारत 
अखंड भारत कुछ लोगों का प्राणप्रिय ध्येय है और वह पुनः अखंड करने के लिए सभी विचारों के हिंदू एक पैर पर तैयार रहते हैं। भारत विभाजन बुरा था इसी दृष्टि से देखा जाता है और यह किन कारणों से व किनके कारण हुआयह हमेशा की चर्चा का एक विवादाग्रस्त विषय रहा है। वस्तुतः विभाजन अंग्रेजों ने, कांग्रेस या लीग ने नहीं किया; उन्होंने तो उसे केवल मान्यता दी है। जिस दिन वह भाग मुस्लिम बहुसंख्यक हुआ उसी दिन वह विभाजन हो गया था, उनकी दृष्टि से दार-उल-इस्लाम हो गया था। उस भाग पर और दिल्ली पर भी उन्हीं का शासन होने की वजह से विभाजन की मांग करने की आवश्यकता ही नहीं थी। बाद में मराठों द्वारा दिल्ली पर वर्चस्व जमा लेने के बावजूद अपन पुनः एकबार भारत के सत्ताधीश बनेंगे की आशा 1857 तक उन्होंने छोडी नहीं थी। परंतु, ब्रिटिशों का राज्य और उसीके साथ पाश्चात्य पद्धति का प्रजातंत्र आ गया और उनकी यह आशा भी समाप्त हो गई। ब्रिटिशों के जाने के बाद भारत में प्रजातंत्र के माध्यम से आनेवाले 'हिंदूराज्य" से 'दार-उल-इस्लाम" को मुक्त करने के लिए विभाजन की मांग सामने आई। जो अनेक सदियों से वास्तविकता थी वह एक प्रकार से संसार के सामने कानूनसम्मत करने की मांग थी।

जिन्ना ने अनेक बार दृढ़ता से कहा था कि, उस भाग में अनेक सदियों से पाकिस्तान अस्तित्व में है। 8मार्च 1944 को अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उन्होंने कहा था ः''भारत पर मुसलमानों का राज्य स्थापित होने के पूर्व से ही यानी भारत में पहले गैरमुस्लिम ने   इस्लाम स्वीकार किया उसी क्षण से पाकिस्तान का आरंभ हो गया है...""। अनेक मुस्लिम अभ्यासकों ने भी विभाजन या पाकिस्तान का उद्गम कब व कहां से हुआ के संबंध में निष्कर्ष निकाल रखे हैं। उनमें से एक एम. आर. बेग के अनुसार ''उसने (पैगंबर मुहम्मद ने) उनमें गैरमुस्लिमों के विषय में इस प्रकार की भावना निर्मित की कि, मुस्लिम समाज विशेषाधिकार प्राप्त है ... अपन दूसरों से अलग उच्च प्रति के लोग हैं। सैंकडों वर्षों बाद इस मनोवृत्ति ने भारत के मुसलमानों को हिंदुओं से अलग किया ... उसकी परिणति अंत में पाकिस्तान के रुप में हुई।"" खलीद बि. वलीदः ''यह दृढ़तापूर्वक कहा जाना चाहिए कि, मुस्लिम अलगता की भावना कुरान का एक प्रभावशाली घटक होने के कारण (भारत में) संयुक्त राष्ट्रवाद की बढ़ौत्री हो ना सकी।""
 
अखंड भारत के संबंध में भावनिक विचार करते समय जिन प्रश्नों की अनदेखी की जाती है उन पर गौर करने के पूर्व यह समझ लें कि अखंड भारत भी दो प्रकार के हैं पहला, भावनिक जो 13 अगस्त 1947 के पूर्व था और दूसरा वास्तविक जो आज है। सरदार पटेल जिनको भारत अखंड चाहिए था ने कहा था ः ''भारत अखंड रखने के लिए ही (हमें) विभाजन करना पडा।"" पहला प्रश्न है, विभाजन के विकल्प के रुप में आनेवाले अखंड भारत का संविधान कैसा रहनेवाला था? उसमें हिंदू-मुस्लिमों के परस्पर संबंध कैसे रहनेवाले थे? यानी मुसलमानों का व उनके बहुसंख्यावाले प्रांतों का दर्जा और अधिकार क्या रहनेवाले थे? दूसरा प्रश्न है, वह योजना या संविधान विशेषतः मुस्लिम बहुसंख्यावाले प्रांतों के लोगों को मान्य ना हुई तो, उस पर क्या उपाय होगा?

इस संदर्भ में प्रथमतः यह ध्यान में लें कि, आज भारत का है वैसे संविधान की कल्पना सपने में भी उस काल में किसीने की ना थी। इसकी मूलभूत व सारपूर्ण दो बातें केंद्र को कितना अधिकार होगा और मुसलमानों को केंद्रिय सत्ता में कितना हिस्सा होना चाहिए यह था।

मुस्लिम लीग की मांग थी कि, केंद्र के पास केवल तीन रक्षा, संचार-परिवहन और विदेश व्यवहार के अधिकार रहेंगे और बाकी बचे सभी विषय और अधिकार प्रांतों को रहेंगे। केंद्रिय सत्ता में मुस्लिमों और गैरमुस्लिमों (हिंदुओं सहित अन्य सभी) के बीच समान (यानी 50प्रतिशत) हिस्सा रहेगा। (1946 में केबिनेट मिशन के समक्ष लीग के मांग प्रस्ताव के अनुसार) कांग्रेस को प्रांतों की स्वायत्ता मंजूर थी परंतु, उसे केंद्र के उक्त तीन के अलावा करेंसी, मूलभूत अधिकार, कस्टम, नियोजन, खर्च के लिए राजस्व इकट्ठा करने का अधिकार और आपातकाल के लिए विशेषाधिकार। परंतु, केबिनेट मिशन ने कांग्रेस का तीन विषयों तक का सीमित अधिकार मान्य किया था। इस अनुसार केंद्र दुर्बल रहकर नामधारी रहता और बहुसंख्य मुस्लिम प्रांतों को संपूर्ण स्वायत्ता मिलनेवाली थी। आज कश्मीर के संबंध में भी हम ऐसा कर नहीं सकते। 1947 के विलयनामे के अनुसार कश्मीर के संबंध में केंद्र के पास केवल तीन विषयों का ही अधिकार था। बाद में आगे चलकर कई विषयों का अधिकार केंद्र ने स्वयं की ओर लिया। आज कश्मीर की मांग स्वायत्ता की ही है वे यह सब रद्द कर मूल स्थिति लाई जाए कि मांग कर रहे हैं।

इसी प्रकार से अखंड भारत के सभी प्रांतों एवं छःसौ संस्थानों को भी इसीप्रकार की स्वायत्ता देनी पडती। इस प्रकार का अखंड भारत कितने समय तक टिकता? इसीलिए केबिनेट मिशन ने प्रत्येक घटक को दस वर्ष पश्चात फूटकर निकलने का अधिकार मान्य किया था। निश्चय ही इस प्रकार का यह अखंड भारत हिंदुओं के लिए घातक सिद्ध होता।

कांग्रेस ने मुसलमानों को 1916 के लखनऊ समझौते में केंद्र में 33 प्रतिशत हिस्सा देना मंजूर किया था और वह अमल में भी आया गया था। अब वह मुसलमानों व सवर्ण हिंदुओं को 40-40 एवं अन्यों को 20 प्रतिशत हिस्सा देने के लिए तैयार थी। इसी सूत्र के अनुसार 1945 व 1946 में अंतरिम शासन स्थापित करने के प्रयास हुए थे तब 24प्रतिशत मुसलमानों को 40प्रतिशत हिस्सा देने के लिए कांग्रेस ही तैयार हो गई थी। अर्थात् मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या के प्रमाण में वह हिस्सा बढ़ते ही जानेवाला था। 50 प्रतिशत की मांग और उसका विरोध तो सर सय्यद (1884) के जमाने से ही चला आ रहा था। 1896 में उनके पुत्र सय्यद महमूद ने एक योजना तैयार की थी उसमें केंद्रिय व प्रांतिक विधिमंडलों में मुसलमानों को हिंदुओं के बराबरी से समान प्रतिनिधित्व की मांग की गई थी। वे तो जिला व शहर स्तर पर भी 50 प्रतिशत की मांग कर रहे थे। आगरकर ने (1893) दमदारी से कहा था- हिंदुस्थान में 24 करोड हिंदू और 6 करोड मुसलमान होते उनकी मंत्रीमंडल में 'समान संख्या होना योग्य नहीं"।

इस संबंध में राष्ट्रवादी मुसलमानों का क्या कहना था? जो मुस्लिम लीग का कहना था वही इनका भी था। तीन विषयों के अलावा करेंसी का विषय भी वे केंद्र को देने के लिए तैयार नहीं थे। स्वयं मौ. आजाद जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे का कहना था ''करेंसी अथवा वित्त विषय केंद्र के पास होने की आवश्यकता नहीं।"" इन राष्ट्रवादी मुसलमानों का मुस्लिम लीग के साथ 50प्रतिशत हिस्से के संबंध में मतभेद केवल इतना ही था कि, वह हिस्सा केवल लीग द्वारा न भरा जाकर कांग्रेस को भी मुसलमानों को हिस्सा देने का अधिकार होना चाहिए। अन्य मुस्लिम विचारकों द्वारा प्रस्तुत अखंड भारत की योजनाएं भी इससे अलग नहीं थी।

तत्कालीन पक्षों एवं तटस्थ राजनैतिक विचारकों का क्या कहना था तो, उदारमतवादी, प्रजातांत्रिक और निष्पक्ष के रुप में पहचाने जानेवाली सप्रू समिति ने 1945 में नए संविधान की रुपरेखा प्रकाशित की थी। जिसमें विविध पक्षों से चर्चा कर तैयार किए हुए संविधान प्रस्तावानुसार प्रांतों को स्वायत्ता और केंद्र के पास तीन के अलावा कांग्रेस द्वारा सुझाए हुए 5-6 विषय रहनेवाले थे। सवर्ण हिंदू और मुसलमानों का संविधान समिति, लोकसभा और केंद्रिय समिति में समसमान हिस्सा रहनेवाला था। मुस्लिम सदस्यों में से न्यूनतम 25 प्रतिशत का यानी कुल सभागृह का 75 प्रतिशत का समर्थन मिले बगैर संविधान में कोई भी व्यवस्था की जा नहीं सकती थी। जिन्ना द्वारा नकारी हुई यह योजना इसलिए उल्लेखनीय है कि, पक्षरहित, प्रसिद्ध, धर्मनिरपेक्ष और निष्पक्ष विचारक भी अखंड भारत की कौनसी योजना प्रस्तुत कर रहे थे और विभाजन टालने के विकल्प हिंदुओं के लिए कितने घातक रहनेवाले थे, यह इस पर से समझा जा सकता है। सरदार पटेल ने कहा था यदि विभाजन नहीं होता तो सारा हिंदुस्थान पाकिस्तान के मार्ग पर चला गया होता ... हिंदुस्थान के कई टुकडे हो गए होते। यह देश ध्वस्त हो गया होता।

हिंदुत्वनिष्ठ अखंड भारतवादियों की अखंड भारत की योजना कौनसी थी- वीर सावरकर के हिंदूमहासभा के अध्यक्षीय भाषणों एवं वक्तव्यों में इस योजना के कुछ तत्त्व बारंबार आए हुए दिखते हैं ः 1. प्रतिव्यक्ति एक मत और धर्मनिरपेक्षतापूर्वक सभी नागरिकों को समान अधिकार एवं अधिकार रहनेवाला एक संयुक्त हिंदी राज्य रहेगा। 2. अल्पसंख्यकों के धर्म, भाषा व संस्कृति को संविधानात्मक संरक्षण दिया जाएगा। 3. उन्हें जनसंख्या के अनुपात में आरक्षित प्रतिनिधित्व मिलेगा। 4. शासकीय सेवा निपुणतानुसार मिलेगी। केंद्र शासन मजबूत होना चाहिए। राष्ट्रसंघ (लीग ऑफ नेशन्स) द्वारा मान्य किए हुए अल्पसंख्यकों के अधिकार देने के लिए वे हमेशा तैयार थे। हिंदू-मुस्लिम प्रश्न निर्णय के लिए राष्ट्रसंघ को सौंपा जाए ऐसी हिंदूसभा की मांग थी। इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का निर्णय बंधनकारक माना जाए इस प्रकार का प्रस्ताव 1942 में पारित किया था। सावरकर जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने के लिए तो तैयार थे परंतु 22 व 75 प्रतिशतवालों को समान 50 प्रतिशत हिस्सा देना उन्हें अराष्ट्रीय, प्रजातंत्र के विरुद्ध एवं अन्यायकारक लगता था। इसी दृष्टिकोण से वे कहा करते थे कि हमारी भूमिका ही सच्ची राष्ट्रीय, धर्मनिरपेक्ष एवं प्रजातांत्रिक है।

सावरकर के इस अखंड भारत की योजना में मुसलमानों को जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा में प्रतिनिधित्व मिलनेवाला था यदि इस बात पर गौर करें तो यह ध्यान में आएगा कि, यदि आज वह अखंड भारत अस्तित्व में होता तो उस अनुसार लोकसभा में लगभग 38 प्रतिशत मुसलमान सांसद होते स्पष्ट है कि सावरकर का अखंड भारत भी हिंदुओं के लिए अघातक न होता साथ ही यह भी पता चलता है कि आज के जैसे संविधान के आने की कल्पना उस जमाने में हिंदुत्वनिष्ठ कर ना सके थे। आज के संविधान में मुसलमानों के लिए कोई भी आरक्षित स्थान नहीं।

अब भी यह प्रश्न बचा ही रहता है कि अपने को योग्य लगनेवाली अखंड भारत की योजना या संविधान मुस्लिम बहुसंख्यावाले राज्यों के मुसलमानों को मान्य ना हुआ तो इस पर क्या उपाय है? हम उन पर यह संविधान किस पर से लादनेवाले थे? कइयों ने अब्राहम लिंकन की ओर इशारा कर कहा है कि गृहयुद्ध लडकर भारत को अखंड रखना था परंतु, कांग्रेस डर गई।

गृहयुद्ध के संबंध में भावनाओं की ऊंचाई से वास्तविकता के धरातल पर उतरकर विचार करें तो क्या नजर आएगा? गृहयुद्ध होता मुसलमानों और हिंदुओं के बीच। अगर-मगर को छोडकर क्षणभर को मान लें कि गृहयुद्ध हो ही गया होता तो इसका विभाजन पर क्या असर पडनेवाला था। बहुसंख्यक हिंदू भाग के मुसलमान और मुस्लिम बहुसंख्यक भाग के हिंदू समाप्त हो जाते यानी इन दोनो ही भागों का विभाजन और भी मजबूत हो जाता, टल नहीं जाता। और अब वह टालने के लिए जिस प्रकार से मराठे अटक पार गए थे उसी प्रकार हिंदुस्थान के सारे हिंदुओं को जो मिले वह हथियार लेकर कराची, पेशावर आदि पर चढ़ दौडना पडता। वह सारा भाग जीतकर वहीं रहना था, मराठों की तरह लौटकर आने से विभाजन टलनेवाला नहीं था। जीतने के बाद भी अनेक सदियों से पाकिस्तान रहता आया वह भाग वैसा ही रहने के कारण वे विभाजन के लिए पुनः विद्रोह कर ही सकते थे। आज यदि भारतीय सेना भेजकर पाकिस्तान को जीत भी लिया जाए तो भी पाकिस्तान नष्ट होनेवाला नहीं विभाजन मिटनेवाला नहीं।

और गृहयुद्ध छिड ही जाता तो पुलिस और सेना हाथ जोडकर बैठनेवाले नहीं थे। वे किस की ओर होते? अनेक अध्ययनकर्ताओं  और तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों ने स्पष्ट रुप से दर्ज कर रखा है कि, जनता के समान ही पुलिस और सैन्यदलों में सांप्रदायिकता प्रभावी हो गई थी। हिंदू बहुसंख्यांक उत्तरप्रदेश में भी पुलिस दल में 50 से 60 प्रतिशत मुस्लिम और 50 प्रतिशत उपजिलाधिकारी मुस्लिम ही थे। दिल्ली में 75 प्रतिशत पुुलिसवाले मुस्लिम थे। प्रमुख सेनापति ने1945 में शासन को रिपोर्ट भेजी थी कि, मुसलमान स्वयं को पहले मुसलमान फिर हिंदी मानने लगे हैं। केंद्रिय मंत्री काकासाहेब गाडगील ने कहा कि, ''मुस्लिम प्रशासकीय अधिकारी मुस्लिम लीग के नेताओं से मिलकर गुप्त सूचनाएं देते हैं।"" सांप्रदायिक आधार पर सेना में फूट पड सकती है का भय व्हायसराय ने दिसंबर 1946 में व्यक्त किया था। विभाजनकाल के दंगों में पुलिस ने अपने धर्मियों की ओर से सहभाग लिया था। पुलिस अपने धर्मियों के विरुद्ध जाने के लिए तैयार नहीं थे। विभाजन पश्चात पंजाब में पहले तीन सप्ताहों के हत्याकांडों में 70 प्रतिशत हत्याएं सेना या पुलिस ने की थी।

सेना में मुसलमानों की संख्या कितनी थी? जिन्ना ने तो 13 सितंबर 1942 को अपने घर पर ली पत्रकार वार्ता में 1942 में भारत छोडो आंदोलन के संदर्भ में स्पष्ट रुप से कहा था ''....(ब्रिटिश शासन ध्यान में रखे) वर्तमान में (इस आंदोलन में कांग्रेस द्वारा)  निर्मित किए जानेवाले उपद्रव की अपेक्षा कम से कम 500 गुना अधिक उपद्रव लीग निर्मित कर सकती है ... मुसलमानों के पास 500 गुना बंदूकें हैं। मुझे लगता है कि सेना में 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं।...."" वी.पी. मेनन ने यह संख्या 60%। सावरकर ने महायुद्ध पूर्व सेना में यह संख्या 60 से 62% बतलाई है। (इसीलिए वे सेना में प्रवेश करो का प्रचार करते थे) ध्यान में रखने लायक एक बात और है ये अधिकांश मुस्लिम सैनिक 'पाकिस्तानी" क्षेत्र से ही आए थे। लीग के विचारों का प्रभाव उन पर पड चूका था। सेनापति लाकहर्त ने अधिकृत रुप से कहा था कि, 1941 में यह अनुमान 37 तो 1942 में 35% था। इनमें से कोई सी भी संख्या मान लें तो भी गृहयुद्ध हिंदुओं को महंगा ही पडता इसमें कोई शक नहीं।

1946 में कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने लिख रखा है ः ''(दिल्ली में) मुसलमानों के घरों पर जब छापा मारा गया तो वहां बम, शस्त्रास्त्र, बारुद, स्टेनगन्स, ब्रेनगन्स, छोटी तोफें, बेतार संदेशवाहक यंत्रों का ढ़ेर मिला। यह यंत्र तैयार करने के गुप्त कारखाने मिले। अनेक स्थानों पर यह शस्त्र उन्होंने पूर्व नियोजित हमलों के लिए उपयोग में लाए भी थे।"" अतः जिन्ना की धमकियों में अर्थ था और वह टालने का विचार हिंदुओं द्वारा करने में कोई मतलब नहीं निकलता। विभाजन टालने के लिए तो बिल्कूल भी नहीं। इस प्रकार से अखंड भारत की कोई सी भी योजना का हिंदूघातक स्वरुप और विभाजन की अटलता ध्यान में आने के बाद अनेक लोग पूछने लगते हैं कि, 'फिर संपूर्ण जनसंख्या की अदलाबदली क्यों नहीं की गई? सारे मुसलमानों को यहां से पाकिस्तान भेज देना था झंझट ही खत्म हो जाता। अब यहां दो ही विकल्प नजर आते हैं एक तो पाकिस्तानी भाग सहित (उस समय24 और अब 38% मुस्लिम संख्यावाला) अखंड भारत, नहीं तो मुस्लिम विहीन हिंदुस्थान। यह योजना दिखने में तो अच्छी लगती है परंतु, व्यवहार्य है क्या? डॉ. आंबेडकर ने सख्ती से जनसंख्या स्थानांतरण का उपाय सुझाया था यह सच नहीं। इस संबंध में उन्होंने ऍडम स्मिथ का यह मत उद. किया था-''सब सामानों में यातायात के लिए (अनिच्छुक) मनुष्य ही सर्वाधिक कठिन बोझा है।"" उनका मत था ''जनसंख्या स्थानांतरण स्वेच्छा से होना चाहिए।""

थोडा विचार करें बचे हुए पूरे विशाल भारत के कोने-कोने में फैले हुए मुसलमानों को किस प्रकार से सुरक्षित पाकिस्तान पहुंचाया जाता। यदि स्वेच्छा से भी जाना चाहते यात्रा कैसे करते? उस जमाने में वाहन ही कितने अल्प थे, फिर गांव-गांव में फैले हुए मुसलमान, 50-60कि.मी. तक रास्ते ही नहीं थे। औरतें-बच्चे, बीमार, अपंग, बूढ़े जाते कैसे? रास्ते में चोर-लूटेरे-डाकूओं से रक्षा कौन करता? रास्ते में वे खाते क्या? फिर स्वेच्छा से कोई निर्वासन कुबूल करता है क्या? यदि वे तो जंगलों में जा छिपते तो, उन्हें पकडकर कैसे ले जाते, इतनी पुलिस कहां से लाते? उसमें से भी आधे तो मुसलमान ही थे। सबसे बडी बात तो हिंदुओं की मानसिकता समझने की है क्या वे इसके लिए तैयार हो जाते। हैदराबाद पुलिस एक्शन में मुसलमानों को बचानेवाले 'कत्लेआम" में से बचे हिंदू ही थे। यह इतिहास कोई पुराना नहीं उसी जमाने का है। जनसंख्या का इतना बडा स्थानांतरण शांति से संभव भी नहीं था यह कानून से नहीं जनता द्वारा निर्मित मृत्यु के भय से ही संभव था। स्पष्ट है कि यह इच्छा व्यवहारिक ना होकर पाकिस्तान बनने से उत्पन्न रोष की स्वाभाविक हिंदू अभिव्यक्ति है। विभाजन के बाद दस लाख लोगों का हत्याकांड हुआ यह एक भयंकर शोकांतिका थी परंतु, यह भी उसी प्रकार से अटल थी जिस प्रकार से की विभाजन। केवल विभाजन आगे ढ़केलना संभव था, परंतु वह होने के लिए या होने तक, विभाजन के पूर्व होनेवाला हिंसाचार होता ही रहता और पुनः विभाजन और शोकांतिका अटल ही थी।

विभाजन हिंदू-मुस्लिम समस्या के कारण हुआ था वह समस्या पूरी तरह से हल हो इसलिए न तो मांगा गया था ना ही मान्य किया गया था। इसका प्रयोजन मुस्लिम बहुसंख्यक भाग को हिंदुओं से मुक्ति और मुस्लिम इच्छानुसार राज्य करने की और शेष भारत में एकसंघ और प्रबल केंद्र स्थापित कर हिंदू स्वयं की 'हिंदू" सेक्यूलर विचारानुसार राज्य कर सकें इसके लिए था। भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह विभाजन नजर आता हो परंतु वस्तुतः यह मुस्लिम समाज का विभाजन था। और यह विभाजन मुस्लिमों के लिए किस प्रकार आघातक ठहरा इसकी बानगी देखिए - प्रा. मुशिरुल हसन ः ''भारत में रह गए मुसलमानों के लिए विभाजन दुःस्वप्न ठहरा ... वे 'विभाजित" हो गए, 'दुर्बल" और दाहिने हिंदुओं के भीषण हमलों के बलि ठहरे।"" ''... उलेमाओं को लगा कि, विभाजन के कारण उपखंड के इस्लामी समाज का विभाजन होकर वह दुर्बल हो गया और शाह वलीउल्लाह से लेकर मौ. मौदूदी तक के विचारकों ने रखे हुए ध्येय का सपना चकनाचूर हो गया। उनकी एकजुटता, आत्मबल और चैतन्य खो गया है ... इस्लाम के इतिहास में इस जैसी दूसरी कोई 'भयंकर भूल" नहीं हुई उन्होंने कहा ... '(मुस्लिम) समाज का नाश और विनाश किया इसलिए लीग नेतृत्व के विरुद्ध इतिहास निर्णय देगा" (ऐसा भी घोषित किया)"" ''समाज पीट गया, उसे गुप्त मार पडी और वह (तीन) टुकडों में विभाजित हो गया।""


विभाजन के कारण समस्या पूरी तरह हल होनेवाली नहीं थी बल्कि वह सौम्य और नगण्य बननेवाली थी। पहले के साढ़े 9 करोड के मुकाबले साढ़े 3 करोड मुसलमान रह जाने थे और मुख्य बात यह कि वे कहीं भी बहुसंख्यक रहनेवाले नहीं थे। सबक यह है कि अब यह वास्तविक अखंड भारत अखंड बना रहे फिर से विभाजन की परिस्थितियां निर्मित ना हों इसलिए जो गलतियां पहले हो चूकी वे दोहराई ना जाएं इस बाबत सावधान रहें।

1 comment:

  1. baba bahut achha likha hai. keep writing :O). whenever you write any new articles, please send me the link to my email id.

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