Tuesday, 7 May 2013

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों


एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों

नित सामने आते रिश्वतखोरी से कमाए धन के प्रकरण, उजागर हो रहे राजनेताओं द्वारा किए गए आर्थिक घोटाले-भ्रष्टाचार के अंतहीन मामलों से देश की जनता आहत, त्रस्त हो रही है, अपने आप को असहाय एवं ठगा हुआ सा महसूस कर रही है। इस कारण जहां भी जाओ लोग इसके लिए राजनेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए नजर आ रहे हैं। जो बहुत कुछ अंशों में सत्य भी है। लेकिन यही वह समय भी है जो आत्मपरिक्षण भी मांगता है कि क्यों हमारे द्वारा चुने हुए ये राजनेता इस प्रकार से बेगुमान हो गए हैं? क्यों ये इतने लापरवाह एवं बेखौफ हो गए हैं?

भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि तो देश की स्वतंत्रता के समय से ही और इसके भी पूर्व से मौजूद रही है। परंतु, यह समस्या आज जिस विकराल रुप में नजर आ रही है इसके पूर्व न थी। जितना कालाधन पिछले बीस वर्षों में देश में पैदा हुआ और देश के बाहर गया उतना देश की आजादी के 40 वर्षों बाद भी नहीं हुआ था।

यदि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो यही नजर आएगा कि जीवन के जो विभिन्न कार्यक्षेत्र हैं उनमें जो व्यक्ति कुछ ना कर सका वही राजनीति में सक्रिय एवं सफल नजर आ रहा है। इसके लिए वह अवांछनीय हथकंडे उपयोग में ला रहा है क्योंकि, बाकी जगहों पर तो वह कुछ कर ना सका था इसलिए वह यहां सफल होने के लिए सभी तरह के हथकंडे फिर वह चाहे अनैतिक, समाज के लिए हानिकारक भी क्यों ना हो उपयोग में ला रहा है। अधिकांशतः ऐसे ही व्यक्तियों ने राजनीति को दूषित कर पैसा बनाने का माध्यम बना रखा है।

इस प्रकार के राजनेताओं के साथ भ्रष्ट नौकरशाहों-कारपोरेट क्षेत्र ने हाथ मिला रखे हैं और यही गठजोड देश को लूट रहा है,  विकास की नई परिभाषा गढ़ रहा है तथा चंद लोगों की आर्थिक संपन्नता जो चमचमाते मॉल्स, होटल्स, मल्टीप्लेक्स, चौडी सडकों पर दौडती महंगी गाडियों के रुप में नजर आ रही है को देश की आर्थिक प्रगति बता रहा है। जनता भी भ्रमित हो आर्थिक संपन्नता को ही सच्चा विकास मान इस संकुचित दृष्टिकोण को सामने रख संपन्नता की लालसा, अधिकाधिक धन प्राप्ति को ही ध्येय बना, आर्थिक संपन्नता को ही यश-अपयश का पैमाना बना बैठी है। 

वस्तुतः यह विकास नहीं विनाश है और इसके परिणाम भी हम भुगत रहे हैं। समाज दिशाहीन हो गया है। केवल कुछ लोगों की मौज मजे के लिए की गई विदेश यात्रा, पानी जैसा पैसा जहां समारोहों में बहाया जाए यह जिन्हें हासिल है ऐसे गिनेचुने लोगों द्वारा यह समझना कि हम आर्थिक महासत्ता बनने जा रहे हैं यह उच्च पदस्थों का स्वार्थीपना, ढ़ोंग वस्तुतः घृणास्पद है।

परंतु, हम समझने को तैयार नहीं। क्योंकि, जो सुशिक्षित मध्यम वर्ग हमेशा देश को सुविचार देता है, सबसे ज्यादा नैतिकता का झंडाबरदार बनता है, देश या समाज के लिए कुछ करने की चाह रख आगे आता है, आदर्श सामने रखता आया है वही आज इस मामले में सबसे पीछे है क्योंकि, यही वर्ग तो इस उपर्युक्त अनैतिक गठजोड से सबसे अधिक लाभान्वित हो रहा है इसलिए अपनी आंखे मूंदे अधिकाधिक धन प्राप्त करने की होड में सबसे अधिक शामिल है।

इस विकास की अंधी दौड में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है जो पर्यावरण के संतुलन को बिगाड रहा है। चंद लोगों का आर्थिक विकास सच्चा विकास नहीं है। विकास सर्वसमावेशक होना चाहिए। विकास वह है जिससे मनुष्य को आनंद की प्राप्ति हो। जरा खुद ही कुछ सोचिए इस तथाकथित विकास से प्राप्त क्या हो रहा है- आनंद, संतुष्टि, मानसिक शांति या केवल तनाव, हताशा और साथ ही साथ नई-नई समस्याओं का अंबार जिन्हें हल करने जाओ तो फिर एक नई समस्या। सच्चा विकास तो वह है जिसमें सभी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं मिले, जीवन सीमा बढ़े, पर्याप्त आमदनी हो, रोजगार उपलब्ध हों। बिजली, पानी, सडक के साथ सभीको शौचालयों की सुविधा उपलब्ध हो।

जीडीपी की दौड में शामिल हो उसके आंकडे बताने में गर्व महसूस करनेवाले, व्यस्त रहनेवाले खुद ही बता रहे हैं कि, शौचालयों की समस्या कितनी गंभीर है। देश के 60% लोगों को शौचालयों की सुविधा उपलब्ध नहीं है फिर भी विकास, विकास की रट लगाए जा रहे हैं। सच्चा विकास तो वह है जिसमें प्रकृति का अवांछित दोहन ना हो, धार्मिक विवादों से उत्पन्न अशांति ना हो, विवाद ना हों, सामाजिक एकता हो, कला साधना भी हो रही हो। इसके लिए गांधीजी और वीर सावरकर को बलराम-श्रीकृष्ण समझ सावरकरजी की विज्ञाननिष्ठा (बुद्धिवाद) और गांधीजी की ग्राम विकास की अवधारणा (अंत्योदय) का समन्वय जरुरी है।

यदि सच्चा विकास चाहिए हो तो भ्रष्टाचार का प्रखर विरोध हो। इसके लिए सबसे जरुरी है कि, महाभ्रष्ट, असामाजिक तत्व जो राजनीति में घुस आए हैं सबसे पहले उन्हें ही राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाया जाए। चुनें उसे जो ना कहना जानता हो, नकारना जानता हो सिफारिशों को, प्रलोभनों को। लेकिन हो रहा है उल्टा, हम चुन रहे हैं उन्हीं नेताओं को जो अनुचित सिफारिशें सुनता हो  और उन्हीं के अनुसार निर्णय लेता हो। प्रलोभनों की बलि चढ़ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता हो तथा उसका एक हिस्सा हम पर खर्च कर स्वयं कृतार्थ होता हो और हमें भी कृतार्थ करता हो हम उसीकी विकास पुरुष के रुप में जयजयकार करते हैं।

राजनेता का काम है समाज का निर्माण इसके लिए जो उचित हों वह कानून बनाता है, जनता को सुयोग्य नेतृत्व प्रदान करता है और इसके लिए जनता को अपने पीछे चलने के लिए बाध्य करता है। जब देश अनाज के संकट से ग्रस्त था तब लालबहादुर शास्त्री के आवाहन का देश की जनता ने साथ दिया था कि नहीं! आज भी यदि कुछ राजनेता समाज निर्माण का व्रत ले आगे आएं तो आज भले ही वे गिने-चुने हों कल अपनी अडिग ध्येय निष्ठा के बलबूते निश्चय ही अपने जैसे लोग एकत्रित कर ही लेंगे और कौन कहता है कि, ऐसा हो नहीं सकता।

जिस जमाने में इसी देश के लोग अंग्रेजों की गुलामी में ही खुशी महसूस कर रहे थे उनके राज्य को ईश्वर का वरदान मानते थे उसी जमाने में वीर सावरकर ने क्रांति का दर्शन दिया था। वासुदेव बलवंत फडके जिन्हें क्रांति का जनक कहा जाता है ने दलितों और अतिपिछडों को एकत्रित कर अंग्रेजों को नाकों चने चबवाए थे कि नहीं और अदन में विदेशी भूमि पर अंतिम सांस ले हौतात्म्य स्वीकारा था। गांधीजी को तो चलती ट्रेन से उठाकर बाहर फैंक दिया गया था परंतु, उस निहत्थे गांधी ने देश से अंग्रेजों को भगाकर देश को स्वतंत्रता दिलवाई कि नहीं? जनता भी इन्ही गांधीजी के पीछे गई थी। यही दृष्टिकोण सामने रख चंद अच्छे नेता भी यदि आगे आएं तो बदलाव क्यों नहीं हो सकता। अच्छे लोग ऐसे राजनेता से जुडना निश्चय ही पसंद भी करेंगे क्योंकि, वे जानते हैं कि राजनीति ही एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिससे जुडकर निश्चय ही समाजोपयोगी कोई सा भी कार्य अधिक आसानी से करने में सहायता मिल सकती है।

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है तो एक अच्छे नेता को देखकर दूसरा नेता क्या थोडा बहुत भी नहीं बदलेगा। बस यही प्रक्रिया सतत चलती रहे तो बदलाव जरुर आकर रहेगा। परंतु, समाज को भी यह समझना जरुरी है कि ऐसे नेताओं का साथ दे। यहीं पर एक बात का स्पष्टीकरण किसी तरह की गलतफहमी ना रह जाए इसलिए कर देना बेहतर होगा कि क्रांति मतलब हर समय सशस्त्र विद्रोह नहीं होता यहां क्रांति का अर्थ समाज में रुढ़ हो चूकी समाज विरोधी मान्यताओं के विरुद्ध खम ठोंक के खडे होना। क्योंकि, यह भी कोई आसान काम नहीं, अकेले पड जाने का डर बना रहता है। 

आज राजनेता बहाना बना रहे हैं कि, यदि जनता की बेजा सिफारिशों को पूरी ना करुं तो हार जाऊंगा, अलोकप्रिय हो जाऊंगा, इसलिए गलत कामों की तरफ से आंखें मूंद लेता हूं, प्रश्रय देने के लिए बाध्य हो जाता हूं। नेता का कहना भी ठीक है, उसने क्रांतिकारी बनने का ठेका थोडे ही ना ले रखा है, जो अच्छा और ईमानदार सुशासन दे और ऐसा कर वह अपनी बलि चढ़ाए। हम भी तो छोटे-छोटे कामों के लिए नेता का मुंह ताकते हैं, जो काम हम थोडा सा कष्ट उठाकर या लाइन में लगकर स्वयं कर सकते हैं, उसके लिए थोडा इंतजार भी तो कर सकते हैं को छोडकर झट नेता से सिफारिशी चिट्ठी लिखवाने या फोन करवाने जा धमकते हैं। पहले अवैध कार्य करते हैं फिर उसे नियमित करवाने के लिए नेता पर दबाव बनाते हैं। यदि नेता नहीं करता तो उसे बदनाम करने पर उतारु हो जाते हैं। भ्रष्ट राजनेता हमारी इसी मानसिकता का लाभ उठा रहे हैं और कहते भी हैं राजतंत्र में यथा राजा तथा प्रजा परंतु, अब प्रजातंत्र है और प्रजातंत्र में यथा प्रजा तथा राजा का मुहावरा फिट बैठता है। जैसी प्रजा होगी वैसा ही उसे नेतृत्व मिलेगा। यह निरा पाखंड है। जनता गांधी, सावरकर जैसे नेताओं के पीछे गई थी कि और वे तो धारा के विरुद्ध ही तैर रहे थे।

यदि सुधार चाहते हैं तो यह सब छोडना पडेगा पहले हम भी तो अपने कर्तव्यों का पालन करना सीखें। परिचित नेता के पद पाते ही हम अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगते हैं, बेजा लाभ पाने के उद्योग में रम जाते हैं। यातायात के नियमों का पालन नहीं करते, जुर्माने से बचने के लिए नेताओं से बात करवाते हैं, कई बार अनावश्यक ऐसी ट्रांसफर-पोस्टींग के लिए नेता पर दबाव बनाते हैं बस यहीं से भ्रष्टाचार भी शुरु हो जाता है।

करें यह कि यदि लगभग पूरी तरह भ्रष्ट हो चूकी व्यवस्था से निजात पाना चाहते हैं तो, राजनेताओं द्वारा की जानेवाली घोषणाओं, कार्यों का विवरण मांगें, उनसे स्पष्टीकरण मांगना सीखें। इसके लिए चाहें तो ई-मेल करें यदि हजारों मेल जाएं तो नेता सोचने के लिए बाध्य होगा। विभिन्न समाचार पत्रों में संपादक के नाम पत्र लिखकर भी अपनी समस्याएं उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। चाहें तो इसके लिए कुछ संगठन बनाकर संगोष्ठियां आयोजित कर नेताओं का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। भ्रष्ट राजनेताओं को सम्मानित करना उन्हें सामाजिक आयोजनों में अतिथि के रुप में बुलाना बंद कर उनका बहिष्कार करें।

आज जब सोशल मीडिया का जोर है तो उस पर अपनी आवाज उठा सकते हैं। विभिन्न समस्याओं पर लेख लिख सकते हैं, टिप्पणीयां दे सकते हैं। सोशल मीडिया का शोर राजनेताओं के कानों तक जाता ही है। कुछ नेताओं ने तो फेसबुक जैसे लोकप्रिय सोशल साइट्‌स पर अपने पेजेस बना रखें हैं उन तक आपकी आवाज अवश्य जाएगी। अपनी समाजोपयोगी मांगे, विचार राजनेताओं तक पहुंचाएं शायद ही कोई नेता होगा जो ना सुने वो आपको इतनी आसानी से टाल नहीं सकता। यह सब करें देखिए दबाव बनना शुरु हो जाएगा। यदि कोई नेता किसी तरह का अच्छा कार्य करता है तो जितना संभव हो उसे समर्थन प्रदान करें, अपनी ओर से जितना संभव हो सहयोग दें। इंटरनेट एक अत्यंत ही प्रभावी माध्यम है अपनी जायज बात रखने का किसी घोटाले को सामने लाने का। इसका सदुपयोग करें।

सबसे अधिक योग्य मार्ग है चुनाव पद्धति में सुधार। जिसके लिए वास्तव में एक बहुत बडे आंदोलन की जरुरत है जो कोई भी नहीं कर रहा है। जब तक यही चुनाव पद्धति रहेगी पैसा-बाहुबल प्रभावी रहेगा ही। अपनी वर्तमान चुनाव पद्धति बदली जाना चाहिए यह सब जानते हैं परंतु प्रयत्न कोई नहीं कर रहा, इसके लिए आंदोलन कोई नहीं चला रहा जबकि इसके लिए विशेष अधिक कुछ करना नहीं है पूर्व में ही कई विशेषज्ञों की रिपोर्टे उपलब्ध हैं, समितियां, आयोग इस संबंध में बन चुके हैं जिनके द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को मात्र लागू ही तो करना है बस उसके लिए एक बडे आंदोलन को चलाने की आवश्यकता है, धनबल और चुनाव के बीच के गठजोड को तोडे बगैर कुछ होनेवाला नहीं है। जब सब इस मामले में एकमत हो प्रयत्न करेंगे तभी कुछ होगा।

हमें अपनी मानसिकता बदलना होगी नेताओं के बेजा महत्व को भी कम करना होगा जैसाकि पूर्व के एक लेख में मैं लिख भी चूका हूं कि, 'कम करें महत्व राजनेताओं का" यह भी एक उपाय है जिससे इन नेताओं का अहंकार थोडा कम होगा। हमारे लिए क्या इष्ट है क्या अनिष्ट है यह समझना नितांत आवश्यक है जिसकी ओर हम में से अधिकांश आंखें मूंदे हुए हैं। भ्रष्टाचार के समाचारों को पढ़कर केवल नेताओं के खिलाफ जबानी खर्च करने से कुछ नहीं होगा। प्रयत्न किए जाएं तो क्या नहीं हो सकता। इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं।

कौन कहता है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों।
  

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