Monday, 27 May 2013

सावरकरजी के बुद्धिवाद की उपेक्षा क्यों?

सावरकरजी के बुद्धिवाद की उपेक्षा क्यों?

जिस प्रकार से सूर्य के प्रकाश में विविध रंगों की छटा समाई होती है उसी प्रकार से बहुमुखी प्रतिभा के धनी सूर्य समान सावरकरजी के तेजस्वी विचारों में भी विविध प्रकार की समाजहितकारी बुद्धिगम्य विचारों की छटा बिखरी हुई दृष्टिगोचर होती है और वह भी इतनी कि क्या ये विचार एक ही व्यक्ति के हैं का प्रश्न किसी के भी सम्मुख उपस्थित हो सकता है। उनके भक्तों एवं अनुयायियों के लिए तो वे एक श्रद्धास्थान ही हैं और वे प्रायः हिंदुत्वनिष्ठ ही हैं और वे आग्रहपूर्वक उनकी हिंदुत्वनिष्ठा को ही बताने में लगे रहते हैं व उनके बुद्धिवाद के बारे में बोलना टालते हैं जबकि सावरकरजी एक प्रखर बुद्धिवादी थे।

सावरकरजी के बुद्धिवादी विचारों का आकर्षण इन हिंदुत्ववादियों को कभी भी नहीं रहा है। क्योंकि, शुरु में ही उनके यह ध्यान में आए बगैर नहीं रहता कि बुद्धिवाद और हिंदुत्ववाद परस्पर विरोधी हैं। इसलिए उनके बुद्धिवाद पर वे मौन रहना ही पसंद करते हैं। और रही बात विरोधियों की तो उनके लिए सावरकरजी का हिंदुत्वनिष्ठ होना ही पर्याप्त होता है। इस प्रकार से सावरकरजी का बुद्धिवाद दोनो ही पक्षों द्वारा उपेक्षित है।

सावरकरजी का हिंदुराष्ट्र धर्माधिष्ठित (चातुर्वर्णाधिष्ठित हिंदूधर्म पर) ही होगा यह मानकर चलने के कारण और सावरकरजी के विज्ञाननिष्ठ निबंधों में भी हिंदूराष्ट्र शब्द आने के कारण ये विरोधी यह मानकर ही चलते हैं कि सावरकरजी इस राष्ट्र को मध्ययुग में ले जाना चाहते थे और ऐसा व्यक्ति भला बुद्धिवादी हो ही कैसे हो सकता है? इसी सोच के कारण ये विरोधी सावरकरजी का समावेश बुद्धिवादी विचारकों में करने को तैयार नहीं होते और इसका कोई खेद भी उनके भक्तों-अनुयायियों को नहीं होता यह एक विडंबना ही है।

सावरकरजी एक तत्त्वज्ञ होने के साथ ही साथ एक नेता भी थे। एक तत्त्वज्ञ अपने विचार सुसूत्रबद्ध और सुसंगत पद्धति से प्रस्तुत करता है जो उसके तत्त्वों से संलग्न होते हैं और उनको प्रस्तुत करने के स्तर की भाषा कितनी भी उंचे स्तर की हो सकती है। परंतु, एक नेता की भाषा, उसके विचारों की प्रस्तुति के स्तर को एक तत्त्वज्ञ का स्तर नहीं लगाया जा सकता नेता को उसके अनुयायियों की बोली भाषा में बोलना पडता है। यदि नेता के व्यवहारिक विचारों को तात्त्विक विचारों की कसौटी पर कसा जाने लगे तो उसे बडे ही निचले स्तर का तत्त्वज्ञ ठहराया जा सकता है और यही सावरकरजी के साथ भी हुआ है।

भारत में विचारकों की दो परंपराएं हैं। पहले में वे आते हैं जिन्होंने प्रखर बुद्धिवाद का समर्थन किया और समाज की रचना को आमूलाग्र रुप से बदलना चाहिए की भूमिका ली। इनमें महात्मा फुले, आगरकर, नेहरु, अंबेडकर आदि आते हैं। समाज को धर्ममुक्त करना चाहिए इस विचार का उन्होंने समर्थन किया। इस मंडली को भारत के इतिहास, धर्म, परंपराओं पर प्रखर गर्व नहीं था। ये प्रखर राष्ट्रवाद के प्रति नहीं अपितु उदारवाद की ओर झुकाव रखनेवाले लोग थे।

दूसरी परंपरा में लोकमान्य तिलक, स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविंद जैसे धार्मिक व प्रखर राष्ट्रवादी आते हैं। इस मंडली को अपने भारत के इतिहास पर बडा जबरदस्त गर्व था। राष्ट्रवाद जिस इतिहास, संस्कृति, परंपरा पर खडा होता है उसे पहली परंपरा वाले संकुचित समझते थे। उन्होंने राष्ट्र क्या है, राष्ट्र का आधार कौनसा होता है, एकात्म राष्ट्र के घटक कौनसे होते हैं आदि का कभी गंभीरतापूर्वक विचार ही नहीं किया। राष्ट्र, राष्ट्रवाद का विचार तो अपरिहार्य होने के कारण उन्हें करना पडा। उनका विश्वास तो इस पर था कि, समता, बंधुता, न्याय आदि के तत्त्वों पर सभी मानवों को एकत्रित किया जा सकता है। कुछ का तो विश्वास केवल आर्थिक समता या समाजवाद के आधार पर सभी को एकत्रित किया जा सकता है पर था। एकात्म राष्ट्र इन्हीं तत्त्वों के आधार पर खडा किया जा सकता है, ऐसा यह समझते थे। ये प्रादेशिक राष्ट्रवाद को माननेवाले हैं। धर्म, वंश, जाति संस्कृति, भाषा आदि के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव करने को अपने देश में वे बुद्धिवाद के विरोध में और संकुचित समझते थे।

परंतु, प्रखर राष्ट्रवादियों की भूमिका इनके ठीक उलट थी। ये धर्म, संस्कृति, परंपरा, इतिहास में गहरी श्रद्धा रखते थे, इस पर उन्हें गर्व था। इनकी भूमिका यह थी कि, हमारा धर्म, तत्त्वज्ञान, संस्कृति विश्व में सबसे श्रेष्ठ है। धर्मचिकित्सा इन्हें मान्य नहीं थी। उन्हें इस बात पर गर्व था कि, हमारे तत्त्वज्ञान में मानव को अध्यात्म के सर्वोच्च स्तर पर ले जाने का सामर्थ्य है।ये मामूली से सुधारों के साथ पुराने को टिकाए रखने की प्रवृत्ति रखते थे। इनके प्रखर राष्ट्रवाद का आधार धर्म, संस्कृति, इतिहास था यानी जिसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है उसका समर्थन इन्होंने किया। इनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत के अनुसार देश प्रेम यानी इस देश के इतिहास, धर्म, संस्कृति, परंपराओं से प्रेम। ये दोनो ही परंपराएं मोटे तौर पर परस्पर विरोधी हैं।

सावरकरजी इनमें से किसी भी परंपरा में नहीं आते। सावरकरजी ने पहली परंपरा के प्रखर बुद्धिवाद को स्वीकारा तो दूसरी परंपरा के हिंदुत्वनिष्ठ राष्ट्रवाद को स्वीकारा। जैसाकि हमने ऊपर देखा ये दोनो ही परंपराएं परस्पर विरोधी होने के कारण सावरकरजी के बुद्धिवाद के संबंध में अनेक भ्रांतियां निर्मित हो गई हैं। और सावरकरजी को दूसरी परंपरा में मान लेने के कारण उनके बुद्धिवाद की घोर उपेक्षा हुई है।

आज समाज को बुद्धिवाद की ओर ले जाने की नितांत आवश्यकता है। इस दृष्टि से सावरकरजी ने बुद्धिवाद का जो मार्ग अपनाया था उसका अध्ययन कर उसे समाज के सामने लाने की जिम्मेदारी निश्चय ही उनके हिंदुत्त्वनिष्ठ अनुयायियों की बनती है और जब अब पूरा सावरकर साहित्य हिंदी में भी उपलब्ध है तो भ्रांत धारणाएं दूर करने के लिए अनुयायी उनके साहित्य के प्रचार-प्रसार के कार्य को हाथ में ले तो अधिक उचित होगा। क्योंकि, सावरकरजी का बुद्धिवाद समझना हो तो, जो उनके सारे साहित्य और जीवनकार्य में बिखरा हुआ है, का अध्ययन करना होगा।

लोगों में सबसे अधिक भ्रांत धारणा यह व्याप्त है कि, हिंदू राष्ट्र धर्माधिष्ठित होगा यह सर्वथा असत्य है यह समझने के लिए उनकी पुस्तक 'हिंदुत्व" जिससे स्वामी श्रद्धानंद, पंडित मदनमोहन मालवीयजी तक प्रभावित हुए थे का अध्ययन करें तो समझ सकेंगे कि सावरकरजी का हिंदू राष्ट्र धर्माधिष्ठित नहीं था।

उनके हिंदूराष्ट्र का व्यापक अर्थ यह है कि, हिंदुओं के न्याय्य अधिकार सुरक्षित रखनेवाला राष्ट्र। उनकी दृष्टि में हिंदू राष्ट्र एक भावनिक संकल्पना है। यदि मुसलमान यह मानते हैं कि, वे एक राष्ट्र हैं तो हिंदू भी यह क्यों नहीं मान सकते कि वे भी एक राष्ट्र हैं वैसे भी हिंदू राष्ट्र पुरातन है। हिंदुओं की राष्ट्रीय भावना मुस्लिम भावना की प्रतिक्रिया नहीं। जब तक मुसलमान उनकी स्वतंत्र राष्ट्रीयत्व की भावना का त्याग नहीं करते तब तक हिंदू भी अपनी हिंदू राष्ट्र की भावना को रखने के लिए बाध्य हैं। सावरकरजी का यह दृष्टिकोण क्या व्यवहारिक नहीं और यहीं सावरकरजी दूसरे बुद्धिवादियों से अलग पड जाते हैं। सावरकरजी मानते हैं कि एक शासन तले दो राष्ट्र रह सकते हैं इसके लिए हर एक को एक मत, धर्मनिरपेक्षतापूर्वक सभी को समान अधिकार तथा अल्पसंख्यकों के धर्म और संस्कृति को संरक्षण का विश्वास।

हिंदूराष्ट्र का दूसरा अर्थ बहुसंख्यकों का राष्ट्र और इसी आधार पर 'बहुसंख्यकत्व ही राष्ट्रीयत्व है" का सिद्धांत वे प्रतिपादित करते हैं। हिंदू बहुसंख्य होने के कारण 'हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है" का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। परंतु, इसका अर्थ यह नहीं कि अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीयत्व नहीं होता यह सिद्धांत केवल वस्तुस्थिति को दर्शाता है कि अहिंदू अल्पसंख्य हैं। और बहुसंख्य को अल्पसंख्य बनाना अराष्ट्रीय है। इन अर्थों से भी हिंदुत्व का हिंदूधर्म से कोई संबंध नहीं आता। उपर्युक्त अर्थों से कोई भी बुद्धिवादी इंकार नहीं कर सकता, हिंदू एक राष्ट्र है, बहुसंख्यकों का राष्ट्रीय जीवन पर प्रभाव पडता ही है लेकिन यही बातें ये सेक्यूलर विद्वान हिंदू के स्थान पर भारतीय कहकर प्रस्तुत करते हैं।


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