Saturday, 18 May 2013

स्वच्छतागृहों की कमी से जुझते नागरिक


स्वच्छतागृहों की कमी से जुझते नागरिक

गांधीजी का वचन है -स्वच्छता आजादी से महत्वपूर्ण है। वस्तुतः स्वच्छ, सुरक्षित स्वच्छतागृह नागरिकों का मूलभूत अधिकार है और किसी भी नगर का सांस्कृतिक निर्देशांक वहां के स्वच्छतागृहों की दशा पर से ही तय होता है। परंतु, इस महत्वपूर्ण मूलभूत आवश्यकता की इतनी उपेक्षा है कि इस पर कोई सार्वजनिक रुप से चर्चा तक नहीं करता जैसे यह कोई मुद्दा ही नहीं है।

जबकि वास्तविकता यह है कि किसी भी शहर में जाओ स्वच्छतागृह (शौचालय, मूत्रालय) ढूंढ़ना पडते हैं। पहले तो वे मिलते नहीं और जब मिलते भी हैं तो वहां की अस्वच्छता देख उनमें घुसने की हिम्मत जुटानी पडती है और उपयोग में लाने के लिए अपनी जुगुप्सा को दबाना पडता है। इसकी कमी की पीडा एवं कष्ट सबसे अधिक महिलाएं ही भुगतती हैं परंतु, किसी भी नगरपालिका-निगम की महिला पार्षद इस संबंध में मुखर होकर आगे नहीं आती। जबकि महिला सशक्तिकरण के तहत उन्हें 30% आरक्षण उपलब्ध है। परंतु, शायद लज्जावश बजट आवंटन के समय इस संबंध में अपनी आवाज उठा नहीं पाती।

वैसे तो हर शहर की यह एक ज्वलंत समस्या है परंतु, विशेषतः महिलाओं के संबंध में यह समस्या बहुत ही विकराल है। अधिकांश सार्वजनिक स्वच्छतागृहों के दरवाजे या तो टूटे हुए या जर्जर हो चूके हैं और वहां भयंकर दुर्गंध का साम्राज्य व्याप्त रहता है, नलों की टोटियां या तो होती ही नहीं है या उनमें पानी नहीं होता। कहीं-कहीं शौचलयों के बाहर पानी की कोठियां भरी हुई होती हैं परंतु, अंदर या तो डिब्बे नहीं होते या होते भी हैं तो फूटे हुए होते हैं।

कई महिला शौचालयों का उपयोग तो पुरुष ही करते नजर आते हैं, सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं। कई स्थानों पर महिला स्वच्छतागृह किसी कोने-काने में स्थित होते हैं और वे भी ठेलों-गुमटियों के अतिक्रमण से घिरे जहां शोहदे आती-जाती महिलाओं को घूरते खडे रहते हैं इस कारण कोई अकेली महिला तो वहां जाने से ही कतराती है। ऐसा लगता है असुरक्षा, अस्वच्छता और अव्यवस्था सार्वजनिक स्वच्छतागृहों के पर्यायवाची नाम हैं, विशेषकर महिलाओं के।

कई रेल्वे स्थानकों पर तो स्वच्छतागृह ढूंढ़ना पडते हैं, जो स्थानक के किसी कोने में स्थित होते हैं जहां रात में अंधेरा छाया रहता है। बस स्टैंडों का हाल तो उससे भी बदतर होता है। गंदगी इतनी कि लोग विशेषकर महिलाएं उनका उपयोग करने की बजाए थोडा समय वैसे ही निकाल लेने में अपना भला समझती हैं अन्यथा उपयोग में तभी लाती हैं जब कोई विकल्प ना बचा हो।

वर्तमान में मधुमेह के रोगी भी बहुतायत से हैं और वे बहुमूत्रता की समस्या से पीडित होते हैं, कई बार कुछ विशिष्ट शस्त्र क्रियाओं के कारण भी बार-बार शौचालय में जाने की आवश्यकता पडती है, ऐसे में शौचालयों की कमी अखरती है। भले ही वे स्वच्छ ना हों अस्वच्छ ही सही परंतु पर्याप्त तो हों।

हाल ही में प्राप्त एक चौंका देनेवाली रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फरमान के बावजूद स्कूलों में शतप्रतिशत शौचालय बन नहीं सके हैं और जो बने हैं उनकी जानकारी के्रंद के पास नहीं है। म.प्र. के शासकीय स्कूलों में जब शौचालयों की गिनती हुई तो प्रदेश में 53365 शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि कागजों पर 43477 शौचालयों को पूर्ण करने की बात कही गई है, जबकि 10471 शौचालयों का निर्माण हुआ ही नहीं है। वहीं 36543 शौचालयों को कार्य पूर्णता का प्रमाण-पत्र भी दे दिया गया है। उल्लेखनीय है कि पिछले शिक्षण सत्र के दौरान नवंबर दिसंबर में यह लक्ष्य पूर्ण करने के निर्देश दिए गए थे।

परंतु, हमारे जनप्रतिनिधि वास्तविकता के धरातल पर चल शौचालयों जैसी मूलभूत समस्या की ओर ध्यान न देते नित नई लोकलुभावन घोषणाएं करते रहते हैं, नई-नई योजनाएं प्रारंभ करते रहते हैं। उदाहरण के लिए हमारे शहर के बाजारों में ही मूत्रालयों की कितनी कमी है और जो हैं वे संख्या में कितने कम और भयंकर अस्वच्छ हैं। परंतु, हमारे जनप्रतिनिधियों को तो शहर के नागरिकों को 24 घंटे नलों में पानी देने की पडी है। जबकि उनका ध्यान इस वास्तविकता की ओर है ही नहीं कि पानी कितनी दूर से लाना पड रहा है और कितना महंगा है तथा उसका कितना भयंकर दुरुपयोग इस समय हो रहा है और वह भी तब जबकि वह नियंत्रित मात्रा में, निश्चित समयावधि में ही दिया जा रहा है और जब 24 घंटे पानी की उपलब्धता होगी तो उसका कितना दुरुपयोग होगा।

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