Saturday, 27 April 2013

प्रतापभानु पेशवा बाजीराव (प्रथम)


प्रतापभानु पेशवा बाजीराव (प्रथम)

लाखों-करोडों की जनसंख्यावाले किसीभी देश या समाज में कुछ चंद लोग ही ऐसे होते हैं जो उस समाज या देश को दिशा देने की क्षमता रखते हैं, दिशा देते हैं। ऐसे ही लोग इतिहास निर्माता होते हैं जिनकी पुण्यतिथि या जयंती पर उनका स्मरण कर वह समाज उऋण हो सकता है, होता है। 28 अप्रैल ऐसे ही एक इतिहास निर्माता की पुण्यतिथि है जो भारतीय इतिहास के गगन पर एक प्रखर नक्षत्र के रुप में चमका और पेशवा बाजीराव बालाजी के नाम से विख्यात हुआ।

बाजीराव की पेशवा पद पर नियुक्ति उनके पिता बालाजी विश्वनाथ के देहावसान के पश्चात छत्रपति शाहू महाराज ने सारी राजनैतिक गुटबाजियों, अटकालबाजियों, अफवाहों को नकारकर अनुवांशिकता के आधार तत्व पर नहीं अपितु बाजीराव के व्यक्तित्व से प्रभावित और विश्वस्त होकर की थी इसको इतिहासविदों ने भी स्वीकारा है। छत्रपति शिवाजी ने जिस हिंदवी स्वराज्य की नींव रखी उसको परवान बाजीराव पेशवा ने चढ़ाया। जिन दिनों दिल्ली की ओर आंख उठाकर देखनेवाला कोई नहीं था उन दिनों बाजीराव का रणघोष गूंज रहा था 'चलो दिल्ली - चलो दिल्ली"। इसी में उनका अनोखापन और गर्व और गौरव की बात है।

सातवीं शताब्दी में अरबस्तान में इस्लाम मजहब का जन्म हुआ और शीघ्र ही इस्लामी फौजें पश्चिम और यूरोप पर चढ़ दौडी। इस्लामी अरबों ने तीन-साढ़ेतीन सौ वर्षों तक स्पेन और पुर्तगाल पर हुकूमत की तथा भीषण अत्याचार और धर्मांतरण किए। स्वतंत्रता पश्चात भोगे हुए अत्याचारों से उपजे तीव्र रोष और प्रतिशोध की भावना से इन्क्वीजिशन के बीज पडे और बढ़े। स्पष्ट है कि इस इन्क्वीजिशन का हिंदुओं या हिंदुस्थान से कोई संबंध नहीं। फिर भी गोवा विजय के पश्चात पुर्तगालियों ने जिस इन्क्वीजिशन की स्थापना इस्लामियों से प्रतिशोध के लिए की थी उस कुख्यात इन्क्वीजिशन की शुरुआत हिंदुओं के विरुद्ध सन्1560 में की। पुर्तगालियों के धार्मिक अत्याचारों के खिलाफ शिवाजी ने योजनाबद्ध अभियान आरंभ किया जिसे आगे पेशवा बाजीराव और उनके अनुज चिमाजी अप्पा ने आगे बढ़ाया और अंततः पुर्तगालियों को परास्त कर ही दम लिया।

अट्ठराहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जब ईरान में पडे भयंकर अकाल से निपटने के लिए धन की आवश्यकता थी उस समय नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिल्ली को 57 दिनों तक लूटा था। उस आक्रमण का सामना करने के लिए मुगल बादशाह ने तमाम मुगल सूबेदारों, राजपूत राजाओं से सहायता मांगी थी तथापि इस प्रकार की कोई सहायता मराठों से मांगी न गई थी। फिर भी एक अखिल भारतीय व्यापक दूरदृष्टि के कारण ही पेशवा बाजीराव (प्रथम) नादिरशाह से निपटने के लिए पुणे से उत्तर हिंदुस्थान के लिए चल पडे थे। जबकि उस समय उधर साष्टी-वसई में पुर्तगालियों के साथ चल रहा युद्ध प्रतिष्ठा का प्रश्न था फिर भी अब उस युद्ध का दायित्व अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा को सौंप 7 फरवरी 1739 को पेशवा बाजीराव उत्तर हिंदुस्थान की ओर चल पडे। उन्हें किसी भी परिस्थिति में नादिरशाह से चंबल के उत्तर में ही निपटना था, इधर दक्षिण मेंं वे उसे आने नहीं देना चाहते थे। परंतु, नादिरशाह के वापिस ईरान लौट जाने के कारण उन दोनो में निर्णायक युद्ध हो न सका और एक नया इतिहास बन ना सका। हां इतना जरुर हो गया कि नादिरशाही धक्का खाने के बाद पेशवा बाजीराव की किसी भी मांग का विरोध करने का साहस मुगल बादशाह के लिए असंभव सा हो गया।

नादिरशाह के सामने मुगल बादशाह द्वारा घुटने टेके देने पर पेशवा बाजीराव के मस्तिष्क में हिंदूपदपादशाही की योजनाएं साकार होने लगी। उदयपुर का राजसिंहासन महाराणा प्रताप की परंपरा का सिंहासन था जिन्होंने अपने बहनों-बेटियों को कभी भी मुगल जनानखाने में नहीं भेजा था। बाजीराव को इसीलिए उदयपुर के महाराणाओं पर बहुत गर्व था। पेशवा बाजीराव ने उदयपुर महाराज को संस्कृत में पत्र लिखकर अपनी योजना से अवगत कराया था। पेशवा ने लिखा था कि आपकी सवा लाख सेना के साथ मराठों की सेना  जुडकर दो लाख की सेना हो जाएगी। शत्रु को परास्त करने के उपरांत इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर उदयपुर महाराणा को प्रतिष्ठित करेंगे। परंतु, नियती का खेल देखिए राजपूतों ने पेशवा की योजना को सराहने का साहस नहीं दिखाया वरना आज इतिहास कुछ और ही होता।

पेशवा बाजीराव की अपने सनातन हिंदूधर्म पर नितांत श्रद्धा थी। आज से तीन सौ से अधिक वर्ष पूर्व का यह पेशवा बाजीराव धर्मश्रद्ध होते हुए भी जातीय भेदभाव और ऊंच-नीचता से सर्वथा कैसे मुक्त था यह एक पहेली ही है। उच्च पद पर होने पर भी अधीनस्थ पर अवस्था से वरिष्ठ यथा पिलाजी जाधव, मल्हारराव होलकर जैसों से वह बडे अदब से पेश आते थे। परिवार में वह मातुश्री राधाबाई का समुचित आदर-सम्मान करते तो उधर अनुज चिमाजी अप्पा की व्याधिजनित दुर्बल देह के उपरांत भी विलक्षण वीरता और साहस पर उन्हें गर्व था। पत्नी काशीबाई और मस्तानी दोनों में उन्होंने कभी कोई भेदभाव नहीं किया। बाजीराव के स्वभाव की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि वे दिए हुए आदेशों के पालन में हीलहवाल-ढ़ीलढ़ाल को कतई पसंद नहीं करते थे। ऐसे प्रकरणों एवं आदेशों की अवहेलना पर वे क्षुब्ध हो उठते थे और उनका चित्तक्षोभ इतना भयंकर होता था कि वे अपराधी के हाथ-पैर या गर्दन तक उडाने का दंड दे दिया करते थे। इसके फलस्वरुप उनका प्रशासन बडा ही चुस्त-दुरुस्त बना रहता था।

बाजीराव संस्कृत के अच्छे ज्ञाता होकर जब वीरकर्म के लिए प्रस्थित होते तब उनके साथ शस्त्रों के अतिरिक्त अन्य दो वस्तुएं अवश्य होती थी - एक, पत्र लिखने का साहित्य; दूसरी, श्रीमद्भगवद् गीता। गीता के कर्मयोग को तो बाजीराव ने अपने जीवन में ही उतार लिया था। गीता के मर्म को उन्होंने आत्मसात् कर लिया था इसलिए कम से कम रक्त बहाकर युद्ध में सफलता प्राप्त करना उनकी विशिष्ट दृष्टि थी। गीता रहस्य हमें बतलाता है कि, अर्जुन को अपने अपराजेय होेने का अहंकार था तथापि बाजीराव को  अपराजेय होने का अहंकार छूकर भी नहीं गया था। उन्होंने अपने शत्रु को कभी भी कमतर करके नहीं आंका ना ही परास्त करने के बाद कभी उसके साथ दुर्व्यहार किया या अपमानित किया। उनकी युद्धशास्त्र नीति यह थी कि कभी भी हडबडी या उतावलेपन से युद्धारंभ मत करो व्यवस्थित रणनीति बनाकर, समयानुकूल उसमें परिवर्तन करते हुए अनुकूल परिस्थिति हो तभी युद्धारंभ करो। उनकी सफलता का राज भी यही था।

पेशवा बाजीराव के जीवन और व्यवहार पर दृष्टि डालें तो प्रखरता से यही दिख पडेगा कि उनके मानस में यही भाव सदैव जागृत रहा कि, किसी भी संघर्ष या युद्ध में सफलता सेनापति मात्र की न होकर संपूर्ण समूह की होती है। पेशवा बाजीराव के इसी असाधारण नेतृत्व गुण के कारण उनके सरदारों-वीरों में उनके प्रति विलक्षण श्रद्धा थी। उनके वीर सरदार भी स्मरणीय ही हैं। उनके वीर सरदारों में थे उनके दाहिने हाथ पिलाजी जाधव जिनसे उन्होंने युद्धकला सीखी थी, दूसरे थे मल्हारराव होलकर जो एक कुशल सैनिक थे। बाजीराव ने ही उन्हें सरदार बनाया और मालवा के एक भाग की जागीर दी जिसने कालांतर में होलकर रियासत का रुप ग्रहण किया। राणोजी शिंदे (सिंधिया) पेशवा बालाजी विश्वनाथ की सेवा में एक खिदमतगार के रुप में थे। बाजीराव ने उनकी क्षमताओं को परखकर उन्हें सरदार बनाया और आगे चलकर उज्जैन-ग्वालियर की जागीर दी जिसने ग्वालियर रियासत का रुप धारण किया। बाजीराव ने उदाजी पंवार जो मूलतः मालवा के परमार वंश से थे को मालवा-गुजरात को प्राप्त करने की योजना में जुटाया। उदाजी और उनके अनुज आनंदराव पंवार को धार जागीर दी जो आगे चलकर धार रियासत बनी। इतिहास प्रसिद्ध पालखेड युद्ध में तुकोजीराव पंवार वीरतापूर्वक लडे तो, जीवाजीराव पंवार मालवा में। इन दोनों को देवास की जागीर दी जो आगे चलकर क्रमशः देवास बडी पाती और छोटी पाती में दो रियासतों में बदल गई। उनके अन्य विश्वसनीय सहयोगी थे, बाजी रेठरेकर, अंबाजी पंत पुरंदरे उनके पुत्र और भतीजे। गोविंदपंत खेर रत्नागिरी (कोंकण) के थे जिन्हें बुंदेलखंड की जागीर मिली और यही पंत  इतिहास में गोविंदपंत बुंदेले के नाम से विख्यात हुए।

इनके अतिरिक्त उत्तर भारत में पेशवा के वकील हिंगणे, दावलजी सोमवंशी, कदमबांडे, आवजी कावडे, पेशवा बाजीराव का साला व्यंकटराव घोरपडे आदि जैसे अनेक नाम हैं जिन्होंने अपनी पूरी क्षमता और निष्ठा से बाजीराव द्वारा दिया हुआ दायित्व निभाया और अट्ठारहवी शताब्दी को एक क्रांतिकारी मोड देनेवाले पेशवा बाजीराव (प्रथम) की अपराजेयता की यशोगाथा के अंग बने। धन्य पेशवा बाजीराव और उनके वीर सहयोगी जिन्होंने देश की पीढ़ियों के सम्मुख साहस और समर्पण का आदर्श रखा। 

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