Saturday, 6 April 2013

अमीना के बहाने - मुस्लिम स्त्री स्वतंत्रता पर एक दृष्टि


अमीना के बहाने - मुस्लिम स्त्री स्वतंत्रता पर एक दृष्टि

ट्यूनिश की 19 वर्षीय लडकी अमीना टेलर ने अपने अर्धनग्न चित्र फेसबुक जैसी सोशल साईट पर लोड कर महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाकर अपने को मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर ला दिया। उसके पक्ष में दुनिया भर की महिलाएं जिनमें यूरोप, अमेरिका से लेकर अरब देश की महिलाएं तक शामिल हैं में कठमुल्लापन के खिलाफ विरोध की लहर चल पडी है। पेरिस की ग्रॉंड मस्जिद के सामने ट्यूनिश की महिलाओं ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया और टॉपलेस जिहाद का आगाज हो गया। अरब मीडिया में इस पर बहस प्रारंभ हो गई है कि मुहिम सही है या गलत। परंतु, एक बात जरुर है कि इस मुहिम के कारण कट्टरपंथियों के होश जरुर उड गए हैं। और इस अर्धनग्न होने की होड में स्त्रियों के साथ-साथ कई पुरुष भी शामिल हो गए हैं। इसके पूर्व सऊदी अरब में एक महिला पत्रकार नदीन बेदार ने अपने एक आलेख, जो इजिप्त के प्रसिद्ध अखबार 'अल मिस्त्री अलयोम" में 'माय फोर हसबेंड्स एंड आय", के जरिए चार निकाह करके चार शौहर रखने का अधिकार मांग कर इस्लामी जगत में हलचल मचा दी थी।

'उसका कहना है कि इस्लाम में यदि पुरुष चार निकाह कर सकता है तो, यह अधिकार महिला को क्यों नही? यदि पुरुष सुंदरता और कामुकता के आधार पर भिन्न-भिन्न महिलाओं का चयन करता है तो एक महिला को भी अधिकार हो कि वह भी रंग-रुप और चाहत के आधार पर अपने अलग-अलग शौहर (पति) चूने। नदीन बेदार के विरुद्ध कुछ राजनीतिज्ञ भी अब मैदान में आ गए हैं। नदीन के समर्थक भी बाहर निकल आए हैं, उनका कहना है कि आज की वर्तमान परिस्थिति में इन कुप्रथाओं पर विचार होना चाहिए। अल अजहर विश्वविद्यालय के बाहर कुछ लोगों ने नारे लगाए और कहा या तो महिला को चार शौहर रखने की छूट दें या फिर पुरुषों के लिए भी अनिवार्य करो कि वह केवल एक ही बीवी रखे। कई महिलाएं भी बिना परदा किए वहां खडी थी और नारे लगानेवालों का साथ दे रही थी। इजिप्त में कुछ दिन पूर्व शेख अल अजहर शेख अल तावावी ने भी परदे के संबंध में अपना वक्तव्य देकर वातावरण को गर्मा दिया था। उनका कहना था कि परदे के विषय में इस्लाम ने कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं किया है इसलिए महिलाओं पर परदा करने की बात अनिवार्य रुप से लादी नहीं जा सकती है।"

इधर भले ही स्त्री अधिकारों के लिए इस प्रकार के विद्रोह हो रहे हों उधर अकादमिक स्तर पर देखें तो इस्लाम में स्त्रियों को उच्च अधिकार प्राप्त थे यह सिद्ध करने के लिए बडे जतन से रखे गए उदाहरण पेश किए जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण किताब अल् अघानी में दिए हुए हैं। उदाहरणार्थः तैय जमात की औस नामक लडकी की कथा है। जिसने अपने होनेवाले पति द्वारा विवाह द्वारा प्राप्त होनेवाले अधिकारों का जब अशिष्टतापूर्वक आग्रह धरा तो विवाह से इंकार कर दिया। उसने पूछा ''क्या मेरे साथ तुम गुलाम लडकी के समान अथवा युद्धबंदी के समान व्यवहार करनेवाले हो।"" अंत में उसने उसके साथ विवाह की संमति दी परंतु, केवल नाम की पत्नी नहीं अपितु विवाह की संमति देते समय उसने उस पर दीर्घकाल से एकदूसरे के साथ भयानक शत्रुता रखनेवाले आबस् और धुबयान् कबीलों में शांति घटित करवाने की कठिन जिम्मेदारी लाद दी।

दूसरा उदाहरण पैगंबर के पोते हुसैन की लडकी सुकायना का दिया जाता है। उसने एक के बाद एक चार विवाह किए थे और उनका चुनाव भी उसने स्वयं ही किया था। यहां यह स्पष्ट ही है कि सुकायना उच्च कुल की होने के कारण उसे यह करना संभव हो सका। परंतु, जैद की लडकी आतिका का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया जाता है। उसने इस प्रकार से तीन विवाह किए थे।

जिन विवाहित स्त्रियों ने अपने पतियों ने विवाह संबंधी कानून के विरुद्ध गुनाह किया इसलिए उनका त्याग किया और इस कारण उन्हें किसी भी प्रकार का नुक्सान ना सहना पडा ऐसी कुछ स्त्रियों के नाम इस संदर्भ में उदाहरणस्वरुप दिए जाते हैं। उम्म सलाम  इसी प्रकार की स्त्रियों में से एक थी। अपने पति के एक गुलाम स्त्री से संबंध हैं यह ध्यान में आते ही उसने उसका त्याग किया। पैगंबर की पत्नी आयशा की भांजी आयशा बिन तल्हा ने अपने प्रेमी मुसाब को बहुत समय तक इंतजार करवाने के बाद उससे विवाह की संमति दी थी इतना ही नहीं तो, यदि वह चाहेगी तो परदा करेगी अन्यथा नहीं ऐसा भी दृढ़तापूर्वक कहा था।

हिजरी की तीसरी शताब्दी तक और उसके बाद भी मस्जिद में जाकर पुरुषों के साथ नमाज पढ़ने का अधिकार स्त्रियों को था। उमर द्वारा सार्वजनिक नमाज के साथ स्त्रियों को कुरान पढ़कर दिखलाने के लिए एक विशेष व्यक्ति की नियुक्ति की गई थी। उस समय स्त्रियों द्वारा बुरका ना भी पहना हो तो चलता था। परंतु, सार्वजनिक नमाज के समय स्त्रियों द्वारा पहनी जानेेवाली पोशाक के विषय में कानून में सूचनाएं हैं। छाती पर चोली और माथेके ऊपर की ओर बुरका और शरीर पर अंगरखा होना चाहिए। चेहरा, हाथ और पांवों के निकट के ऊपरी भाग आच्छादित करने की जरुरत नहीं। इनमें से पांवों के ऊपर का भाग ढ़ंका जाए कि नहीं इस पर मतभेद हैं। डच यात्री हरग्रोंज जब मक्का गया था तब उसने स्त्रियों को भी नमाज के लिए मस्जिदों में जाते देखा था। हरग्रोंज ने कहा है कि, मस्जिद में स्त्री-पुरुष के मध्य केवल एक कटघरा रहता था। स्त्रियों के चेहरे क्वचित अनाच्छित दिख पडते थे, तो भी बालों की एक भी बट बाहर नहीं दिखेगी इस प्रकार से वे अपने बालों को भर कडी रुढ़िनिष्ठा के भय से ध्यानपूर्वक आच्छादित कर लेती थी।

प्रारंभिक काल की एक पुरानी परंपरा के अनुसार स्त्रियों को अपने साथ प्रार्थना करने देने का विरोध स्वयं पैगंबर को नहीं था। पति की सहमति हो तो स्त्रियों को नियमित रुप से मस्जिद में जाने में अपने को कोई एतराज नहीं ऐसा भी उन्होंने कहा था। इस परंपरा को एक दूसरी परंपरा द्वारा पुष्टि मिलती है। 'परमेश्वर की जिन दासियों को" मस्जिद में जाकर प्रार्थना करने की इच्छा हो उनके मार्ग में किसी भी तरह की बाधा लाना पैगंबर को नापसंद था, ऐसा इसमें कहा गया है। परंतु, बाद में शीघ्र ही मस्जिद में जाना पुरुषों का विशेषाधिकार हो गया। वैसे इसके बहुत से अपवाद मिलते हैं।

एक बात मगर ध्यान में रखने योग्य है और वह है जब धर्मपंडितों का विरोध नहीं था उस काल में अनेक बाधाएं होने के बावजूद मुस्लिम स्त्रियों में साधुसंत हुए हैं। ''बारहखडी के प्रत्येक अक्षरानुसार पवित्र स्त्रियां पंजीबद्ध नहीं ऐसे बहुत कम ही चरित्रकोश मिलेंगे। इन स्त्री साधुसंतों ने किए हुए चमत्कार, उनके चरित्रकोश में पडौस में ही जिनको पंजीबद्ध किया गया है ऐसे पुरुष साधुसंतों के चमत्कारों की अपेक्षा किसी भी दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं।"" इस्लाम में संगठित ऐसा धर्मोपदेशक वर्ग अथवा जमात नहीं। इसी कारण से कदाचित्‌ स्त्री साधुसंतों को आगे आना सुलभ हो सका हो। परंतु, इन स्त्री संतों में बहुतायत से जो संत हुए हैं वे सूफी अथवा अन्य गूढ़ पंथों से थे यह दिख पडता है। क्योंकि, इन पंथों में बाह्य भेदों का कोई बहुत महत्व नहीं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध महिला संत हुई है राबिया।

प्रत्येक स्त्री-पुरुष द्वारा धार्मिक शिक्षा ग्रहण की ही जाना चाहिए इस प्रकार के हदीस कथन में उस प्रारंभिक काल में असुविधा नहीं हुई थी। उस काल में निश्चित ही अनेक स्त्री साधुसंत हुए। उस काल में अनेक विद्वान मुस्लिम स्त्रियां हुई हैं। उदा. प्रख्यात 'लेखिका" और 'स्त्री जाति का गौरव" के रुप में जानी जानेवाली शुहदा बिन अल्‌ इबारी ने अपनी विद्वता से बहुत ख्याती प्राप्त की थी। हिजरी की दसवीं शताब्दी तक इस प्रकार की स्त्रियां बीच-बीच में हुई हैं। अब्बासी खिलाफत काल में राजघराने की कई स्त्रियों का राजसिंहासन पर प्रभाव था इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। उदा. हारुन अल्‌ रशीद की पत्नी सीट्टा जुबैद ने बगदाद में इतनी ख्याती प्राप्त की थी कि अद्याप उसकी कबर को बडा आदर का स्थान प्राप्त है। उसके एक शताब्दी बाद हुई खलीफा मुक्तदीन की मां तो इस्लामी साम्राज्य की सत्ताधीश बन गई थी। क्योंकि, स्वयं खलीफ दुर्बल था।

 तथापि मुस्लिम इतिहास में इस प्रकार की विख्यात स्त्रियां कम ही हुई हैं और जो हुई हैं उन्हें भी आलोचना सहना पडी है। वैसे तो इतिहास में सर्वत्र ही यह घटित हुआ है परंतु फिर भी इस्लामी जगत की स्त्रियों के मुकाबले बाहरी जगत की स्त्रियों को कम आलोचना का सामना करना पडा है, कम बाधाओं का सामना करना पडा है। और आज भी परिस्थितियां में कोई खास बदलाव आया नहीं है। और जब तक इस्लामी धार्मिक विद्वान अपना कट्टर दृष्टिकोण त्याग नहीं देते; उनका सर्वसाधारण पर का प्रभाव कम होता नहीं है तब तक यह भयंकर बाधाएं बरकरार रहेंगी यह निश्चित है। हिंदुस्थान तो एक उदारवादी देश है जहां कई मुस्लिम सुधारवादियों के साथ-साथ अन्य कई सुधारवादी महिला पुरुष भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों कार्यरत हैं उन्हें भी तो चाहिए कि वे आगे आएं और दकियानूसी विचारों और कट्टरपंथ के खिलाफ महिला सुधार के क्षेत्र में आवाज बुलंद करें, कट्टरपंथ को निष्प्रभावी करने की ओर अग्रसर हो जिसका आगाज पिछले कुछ दिनों से वैश्विक स्तर पर हो रहा है।

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