Thursday, 8 November 2012

11 नवंबर 'शिक्षा दिवस" राष्ट्रवादी मुसलमानों के सर्वोच्च नेता मौलाना आजाद


11 नवंबर 'शिक्षा दिवस"
राष्ट्रवादी मुसलमानों के सर्वोच्च नेता मौलाना आजाद

मौ. आजाद नाम है आजादी की लडाई के दौरान कांग्रेस श्रेष्ठियों पर प्रभाव रखनेवाले, जिन्होंने कभी भी कांग्रेस का त्याग नहीं किया, जो सेक्यूलर-राष्ट्रवादी के रुप में जाने जाते हैं, जिन्हें गांधीजी अपना मार्गदर्शक मानते थे, ऐसे व्यक्तित्व का। उनके 'सेक्यूलर" होने और 'भारत की स्वतंत्रता के एक प्रमुख शिल्पकार" होने के फलस्वरुप (सन्‌ 2011 से) उनका जन्मदिन 'शिक्षा दिवस" के रुप में मनाया जाए का आदेश केंद्रशासन ने निकाला हुआ है। 1939 से 1946 तक का कालखंड जो देश विभाजन का निर्णायक कालखंड था के दौरान कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। वे अखंड भारतवादी थे और जब गांधी-नेहरु-पटेल इस त्रयी ने विभाजन को स्वीकार किया तो उनका खिन्न होना स्वाभाविक ही था। क्योंकि, उनका मत था कि विभाजन से मुसलमानों को अपरिमित हानी होगी। मुस्लिम दो भागों में विभाजित होकर उर्वरित भारत में अल्पसंख्य और दखलशून्य बनकर रह जाएंगे।

स्वतंत्रता पश्चात जब वे शिक्षा मंत्री थे तब 23 अक्टूबर 1947 को दिल्ली की जामा मस्जिद में दिए हुए अत्यंत भावनोत्कट  भाषण में हमने यानी मुसलमानों ने क्या गमाया यह बतलाते हुए कहा था-

''मेरे बंधुओं! .... तुम्हें याद है क्या? मैंने तुम्हारी जयजयकार की परंतु तुमने मेरी जबान छांट दी। मैंने हाथ में लेखनी ली परंतु तुमने मेरे हाथ काट दिए। मुझे आगे जाना था परंतु तुमने मेरे पैर तोड डाले। पीछे देखने का प्रयत्न किया परंतु तुमने मेरी पीठ पर वार किया ... बीते सात वर्षों में ..... हर एक बार मैंने तुम्हें धोखे का इशारा दिया .... तुमने ध्यान नहीं दिया ... आज मैं मेरी मातृभूमि में अनाथ बन गया हूं .... मेरा ह्रदय विदीर्ण हो गया है ... क्षणभर के लिए विचार करो। कौनसा मार्ग तुमने पकडा है? तुम कहां पहुंच गए हो? ... तुम्हारे कर्मों का यह फल है।
''मैंने तुम्हारे इशारा दिया था कि, द्विराष्ट्र-सिद्धांत तुम्हारे लिए मृत्यघंटा है ... तुमने वह बहरे कानों से सुना ... कुछ तो भी अच्छा तुममें से निकल गया है और उसका स्थान बुरे ने ले लिया है ... बुरे को तुम स्वर्ग का मेवा समझे ....

''भारत का विभाजन मूलभूत गलती थी ... उसके प्रलयंकारी परिणाम तुमने अपनी आंखों से देखे हैं ... भारतीय मुसलमानों की यह दुर्दशा लीग के मार्गभ्रष्ट नेतृत्व ने की हुई गंभीर गलतियों का परिणाम है।""

भारतीय मुसलमानों का इस्लामी अभिमान जागृत कर उन्हें प्रेरित करते हुए वे आगे कहते हैं कि, ''अपने सामने आई हुई यह उदासी क्षणिक है। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि, तुम्हें पराजित तुम्हारे बगैर अन्य कोई कर नहीं सकेगा ... स्वयं की बुद्धि से विचार करना सीखो ... मानस को दृढ करो....

''तुम कहां जा रहे हो? और क्यों? जरा उधर ऊपर देखो। इस जामा मस्जिद की मीनारें तुम्हें प्रश्न पूछ रही हैं। तुम्हारे वैभवसंपन्न इतिहास के पन्ने तुम गुमा बैठे हो? बिल्कूल कल-परसों तक तुम्हारे काफिले इस यमुना तट पर वुजू करते नहीं थे क्या? ... ध्यान में रखो! दिल्ली तुम्हारे खून से सींचकर तुमने खडी की है .... सच्चा मुसलमान डर या लालच में नहीं फंसता ... 1300 वर्ष पूर्व निरक्षर पैगंबर मुहम्मद द्वारा अल्लाह ने घोषित किया है कि, 'जो अल्लाह पर श्रद्धा रखते हैं और उस श्रद्धा पर अटल रहते हैं, उन्हें  डर नहीं लगता, पीडा नहीं होती।" (तो) तेज हवा बहने दो, तुफान आने दो। वे अल्पजीवी होंगे ....

''इतिहास से संकेत लो .... ये सारे आसपास के तेजस्वी निशान तुम्हारे पूर्वजों ने (तुम्हारे लिए) छोड रखे हैं। उन्हें भूलो मत। उन्हें छोडना मत। उनके पात्र उत्तराधिकारी बनो ... यह देश तुम्हारा है ... तुम्हारे भविष्य से संबंधितका कोई सा भी मूलभूत निर्णय  तुम्हारी मान्यता के सिवाय अपूर्ण रहेगा।

''आज तुम्हें भूकंप का डर लगता है; परंतु एक जमाने में तुम स्वयं ही भूकंप थे। आज तुम्हें अंधेरे से डर लगता है; परंतु एक जमाने तुम स्वयं ही तेजोस्त्रोत थे ... तुम्हारे पूर्वजों ने समुद्र में न केवल गोते मारे थे, बल्कि पर्वतों को कुचल दिया था। बिजली की कडकडाहट से वे घबराए नहीं; उन्होंने तूफानों को लौटा दिया। जिन्होंने एक जमाने में बडे-बडे सम्राटों के कॉलर पकडे, वे आज घबराकर एक दूसरे के गले पकड रहे हैं। यह (इस्लाम पर) श्रद्धा नष्ट होने के लक्षण हैं ....

''बंधुओं! तुम्हारे लिए मेरे पास कोई सा भी नया उपाय नहीं .... मेरे पास वही पहले का उपाय है, ... जो कुरान में बतलाया हुआ है ः डरो मत, दुख मत करो। अगर तुम्हारे पास सच्ची श्रद्धा होगी तो विजय तुम्हारी ही होगी ... अल्लाह की तुम पर कृपा रहे।""

मौलाना आजाद इस प्रकार के भावुक भाषण द्वारा अनेक सदियों तक मुगल साम्राज्य का राजवाडा रहे लालकिले के परिसर में स्थित जामामस्जिद में उपस्थित मुस्लिम श्रोताओं के सामने कौनसा चित्र उपस्थित करना चाह रहे थे तो, वह था अपना (यानी मुस्लिम) साम्राज्य, वह कीर्ति, वह वैभव, वह दर्जा, वह धाक, वह सेना, वे काफिले, अपने पांवों में लौट रहा हिंदुस्थान। लेकिन हाय जिन्ना ने विभाजन की मांग कर और कांग्रेस ने उसे मान्य कर उस हसीन सपने को चूरचूर कर दिया!

जब सारा हिंदुस्थान समता और बंधुत्व के आधार पर एक समन्वित राष्ट्र के निर्माण के लिए कृतसंकल्पित हो रहा था तब ये राष्ट्रवादी मुसलमान मौ. आजाद अपने मुसलमान बंधुओं को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह उपदेश नहीं दे रहे हैं कि प्रजातंत्र को मान्यता दो, मानवनिर्मित संविधान के सार्वभौमत्व को मान्य करो, अब समय आ गया है कि,सेक्यूलर राज को स्वीकारें बल्कि वे तो इस्लामी प्रेरणाओं को प्रज्वलित कर रहे हैं। शीघ्र ही तैयार होने जा रहे भारतीय संविधान पर अपनी निष्ठा रखो का उपदेश देने की बजाए वे उन्हें चलो कुरान की ओर का संदेश दे रहे हैं। विभाजन हो गया तो क्या अपनी इस्लामी श्रद्धाओं को मत छोडो, अंतिम विजय तुम्हारी ही है की प्रेरणा दे रहे हैं।

वैसे तो स्वतंत्रता पूर्वकाल में ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को भी इन राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं (इनमें मौ. आजाद भी शामिल हैं) पर शंका होने लगी थी कि ये वास्तव में राष्ट्रवादी हैं भी कि नहीं? सरदार पटेल ने तो 19 जुलाई 1946 को नेहरुजी को लिखा भी था कि, ''(राष्ट्रवादी मुसलमानों में के) सर्वोत्कृष्ट पर भी विश्वास रखना कठिन है।""

डॉ. आंबेडकरजी ने राष्ट्रवादी मुसलमानों के संबंध में 1945 में कहा था, ''मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक मुसलमान और (अन्य) राष्ट्रवादी मुसलमान इनमें कुछ सच्चा फर्क दिखना कठिन है ....सचमुच अनेक कांग्रेसी इस प्रकार से मानते हैं। ऐसा कहा जाता है, उनमें (लीगवादी और राष्ट्रवादी मुसलमानों में) कुछ भी फर्क नहीं और कांग्रेस के राष्ट्रवादी मुसलमान सांप्रदायिक मुसलमानों के केवल पहरेदार हैं।""

गांधीजी भी इस वास्तविकता से अवगत थे। 29 अप्रैल 1946 को मौ. आजाद को लिखे पत्र मेें उनके द्वारा आजाद को आदेशनुमा यह सूचना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है ः ''1940 से आप (मौ. आजाद) कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। ज्ञात हुआ है कि, आपकी इच्छा है कि आगे भी आप इस पद पर बने रहें। आप कांग्रेस के अध्यक्ष के रुप में नहीं रहना चाहते यह आप कृपया जाहिर करें और इस पद पर पंडित नेहरु का नाम सूचित करें। इस विवक्षित समय पर कांग्रेस का अध्यक्ष मुसलमान ही हो, ऐसा कुछ लोगों को लगता है, परंतु मुझे ऐसा नहीं लगता।"" और गांधीजी ने उन्हें अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर नेहरुजी का नाम जाहिर करने के लिए बाध्य किया था। इसके बावजूद जब मौ. आजाद ने पुनः उम्मीदवारी का निवेदन किया तो गांधीजी ने उन्हें फिर से 31 अगस्त को कठोर भाषा में पत्र लिखकर ताकीद दी थी कि, '' ... मंत्री पद की अपेक्षा कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी बहुत बडी है। (वह आपसे निभेगी नहीं) इसके सिवा अन्य कारण भी हैं। परंतु (फिलहाल) इतना कारण ही पर्याप्त है।""

उस काल में मौ. आजाद को सर्वाधिक दुख इसी बात का हो रहा होगा कि, आजीवन कांग्रेस में और अंतिम सात वर्ष उसके अध्यक्ष रहकर भी और राष्ट्रवादी होने का इतना बडा त्याग करने के बावजूद भी अपन कांग्रेस को अखंड भारत स्वीकारने के लिए बाध्य न कर सके। इसके लिए की हुई सारी पराकाष्ठा को कांग्रेस ने तितर-बितर कर दिया। और इसी दुख को उन्होंने अपने उपर्युक्त भाषण में प्रकट किया होगा।

वैसे सर्वोच्च राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता होने के कारण उनके बतलाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने वाले आज भी मौजूद हैं। महाराष्ट्र शासन के 'मौ. आजाद अल्पसंख्यक आर्थिक विकास महामंडल" की ओर से मौलाना के छायाचित्र सहित दिनांक 11-11-2009 को समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन में कहा गया है ः 'भारतीयों के प्रेरणास्त्रोत ..... मौ. आजाद द्वारा दिखलाए हुए मार्ग पर से हमारी सच्ची यात्रा चालू है....."" (महाराष्ट्र टाईम्स, दिनांक 11-11-2009)


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