Sunday, 23 September 2012

स्वतंत्रता की लडाई के अद्‌भूत नेता- मौलाना मोहम्मद अली जौहर


स्वतंत्रता की लडाई के अद्‌भूत नेता- मौलाना मोहम्मद अली जौहर

गत सप्ताह उ.प्र. के रामपूर में मौ. मोहम्मदअली जौहर के नाम से एक विश्वविद्यालय का शुभारंभ मुख्यमंत्री श्रीअखिलेश यादव के हस्ते, श्रीमुलायमसिंह, वरिष्ठ मंत्री मोहम्मद आजमखान सहित तीन दर्जन से अधिक मंत्रियों की उपस्थिति में हुआ। यह समाचार पढ़कर मन में सहसा यह खयाल आया कि क्यों ना इस महान राष्ट्रवादी की उपाधि वाले कट्टर ब्रिटिश विरोधी, मुस्लिम लीग की स्थापना के समय जो नामी मुस्लिम नेता उपस्थित थे उनमें से एक  और 1923 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे तथा बहुत आग्रह कर बॅरिस्टर जिन्ना को 1913 मेें मुस्लिम लीग में लानेवाले नेता के महान एवं उच्च विचारों; के साथ ही साथ उनका संक्षिप्त परिचय, जनता से कराया जाए जिन्हें उन्होंने स्वतंत्रा की लडाई के दौरान समय-समय पर प्रकट किया था और जो समय के साथ विस्मृति के गर्त में चले गए हैं।

ये मौलाना मोहम्मदअली केवल मौलाना ही नहीं थे प्रत्युत पहले अलीगढ़ के और बाद में ऑक्सफोर्ड के स्नातक भी थे। उनका मुस्लिम समाज और गांधीजी पर बडा प्रभाव था। वे भी गांधीजी पर अगाध श्रद्धा रखते थे। 'जामिया मीलिया विश्वविद्यालय" जिसे ब्रिटिशों के विरुद्ध होने के कारण 'राष्ट्रीय विश्वविद्यालय" माना जाता है के संस्थापक भी वे ही थे। जिस प्रकार से मौलाना आजाद ने अपने 'अलहिलाल" समाचार पत्र के द्वारा इस्लामी प्रचार की धूम मचा रखी थी उसी काल में आजाद से स्पर्धा करते हुए उन्होंने 'कामरेड" के माध्यम से जिसे उन्होंने जनवरी 1911 में प्रारंभ किया था से प्रचार की धूम मचा दी थी। तो प्रस्तुत हैं उनके कुछ चुनिंदा विचार -

4जनवरी 1914 के 'कामरेड" में उन्होंने जाहिर किया था - ''तुर्कस्थान तुर्की लोगों के लिए जिस प्रकार से पितृभूमि है उसी प्रमाण में भारतीय मुसलमानों के लिए भी पितृभूमि ही है।""

10जनवरी 1911 के 'कामरेड" में उन्होंने स्पष्ट रुप से लिखा था कि - ''भारत एक (राष्ट्र) है इस घोषणा पर हमारा विश्वास नहीं। भारत के प्रश्न अंतरराष्ट्रीय हैं।""

जनवरी 1914 में मौ. मोहम्मदअली ने कहा थाः ''मानवजाति का विभाजन केवल धर्मश्रद्धा के आधार पर हो सकता है ... यूरोपीयनों को लगता है कि इस्लाम द्वारा पाश्चात्य शैली की आधुनिकता को स्वीकारा जाना चाहिए.... मुसलमान अपने धर्म की ओर किस प्रकार से देखते हैं इसकी यह कितनी गलत धारणा है! वे भूल जाते हैं कि 'इस्लाम केवल धर्म नहीं बल्कि सामाजिक संगठन है, संस्कृति की रचना है और राष्ट्रीयत्व भी है ..."" इसी प्रकार के विचार जिन्ना ने 1940 के बाद के काल में द्विराष्ट्रवाद के आधार के रुप में प्रस्तुत किए थे यह दिख पडेगा।

धर्मसत्ताक राज्य के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया था कि, 'इस्लाम धर्मसत्ताक पद्धति है और कुरान की भाषा में अल्लाह के राज्य के अलावा अन्य शासन नहीं होता..." इसी धर्मसत्ताक राज्य की संकल्पना पर मोहम्मदअली ने खिलाफत का सिद्धांत खडा किया।"" मोहम्मदअली भारतीय पॅन-इस्लामवाद (विश्व मुस्लिम बंधुत्व की विचारसरणी) के अग्रणी माने जाते हैं ... उन्होंने पॅन-इस्लामवाद का प्रचार खिलाफत कमेटी के समान ही कांग्रेस के व्यासपीठ पर से भी किया था ....

जुलाई 1921 में कराची में अ.भा. खिलाफत कमेटी के अधिवेशन में उनकी अध्यक्षता में यह प्रस्ताव पारित हुआ था - ''वर्तमान परिस्थितियों में पवित्र शरीअत के अनुसार किसी भी मुसलमान को ब्रिटिश सेना में रहने, भर्ती होने या भर्ती होने में सहायता करना निषिद्ध है। यह धर्माज्ञा ब्रिटिश सेना के प्रत्येक सैनिक तक पहुंचाना सभी मुसलमानों पर और विशेष रुप से सभी उलेमाओं पर बंधनकारक है। इस पर बाद में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला। न्यायालय में मैंने राजद्रोह नहीं किया के समर्थन में उनके द्वारा दिया गया बयान मुस्लिम मानस को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसका मूलभूत भाग इस प्रकार से है ''... इस्लाम को केवल एक ही सार्वभौमिकता मान्य है- वह यानी अल्लाह का, कुरान की आज्ञानुसार मुसलमान की निष्ठा- फिर वह सैनिक हो या कि (साधारण) नागरिक, मुस्लिम राज्य का हो या कि गैर-मुस्लिम राज्य का हो- केवल अल्लाह, उसका पैगंबर और उसके खलीफा के साथ रह सकती है, मुसलमान सेक्यूलर राज्यकर्ता के केवल उन्हीं कानून और आदेशों का पालन कर सकता है कि जो अल्लाह (कुरान) की आज्ञाओं के विरोध में ना हो, ... कुरान ही सर्वाधिकारी राज्यकर्ता है, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि, जिस स्थान पर कुरान और भारतीय दंड विधान में विरोध आएगा वहां कुरान ही श्रेष्ठ रहेगा।

1923 के कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में मोहम्मदअली ने जिस पाश्चात्य राष्ट्रवाद की संकल्पना को कांग्रेस मानती है पर जोरदार हमला किया। भारत के विभिन्न प्रांत मिलकर एक संघराज्य कहने की बजाए 'धर्मों का संघराज्य" कहा जाए इस प्रकार से सूचित किया। भारत धर्मराज्य हो ऐसी उनकी इच्छा थी। उन्होंने ऐसी योजना प्रस्तुत की-भारत का विविध सुरक्षित गुटों में विभाजन किया जाए। प्रत्येक गुट एक-एक धर्म के सुपुर्द किया जाए। अपने गुट की जनता का धर्मांतरण कर लेने का उस गुट का एकाधिकार रहेगा। उन्होंने हिंदुओं से पूछा कि, दलित वर्ग को या तो तुम तत्काल अपने धर्म में समाहित कर लो अथवा उन्हें इस्लाम में लेने का मुसलमानों को अवसर दो।

अक्टूबर 1926 में राष्ट्रवाद पर प्रहार करते हुए लिखा था- ''यह कहना बिल्कूल सच है कि, अल्लाह ने मनुष्य को निर्मित किया है तो शैतान ने राष्ट्र को निर्मित किया है।""

1928 में उन्होंने जाहिर किया थाः ''हमारा ध्येय केवल मुस्लिम भूमि से पाश्चात्य साम्राज्यवाद को गाडना न होकर सारे संसार में इस्लाम का प्रसार करना है।""

गोलमेज परिषद में मोहम्मदअली ने कहा था- ''जहां अल्लाह की आज्ञा होती है वहां मैं पहले मुस्लिम, बाद में मुस्लिम और अंत में भी मुस्लिम ही होता हूं। मुस्लिम के सिवाय कुछ भी नहीं होता।""

मौ. मोहम्मदअली ने कलकत्ता की खिलाफत परिषद में जाहिर किया था कि, ''हिंदुस्थान के मुसलमान जब पूर्ण स्वतंत्रता को अपना ध्येय मानते हैं तब वे 1310 वर्ष पूर्व उनकी कुरान ने जो विश्व को इस्लाममय करने के लिए कहा था वही करते हैं।""

उन्होंने कहा था- खिलाफत आंदोलन के कारण अपन भारत के बाहर निष्ठा नहीं रखते इस आंदोलन के कारण अपन अपनी श्रद्धा, निश्चय और कृति के सामर्थ्य को जांच रहे हैं। अगर तुम अपने देश में विजयी नहीं हो रहे होंगे तो अन्य स्थानों पर तुम्हें सफलता नहीं मिलेगी। खिलाफत आंदोलन का पहला लक्ष्य भारत है।

इस प्रकार के विचारों वाले मौ. मोहम्मदअली से जब पूछा गया कि, हिंदू खिलाफत के मामले में सहयोग क्यों करते हैं तो उन्होंने इस संबंध में कहा- ''अनेक सदियों तक हिंदुस्थान पर मुसलमानों की सत्ता थी इसके कारण बदलती राजनैतिक परिस्थितियों से तालमेल बैठा लेना हिंदुओं का स्थायी भाव बन गया है... इतिहास से स्फूर्ति लेने जैसा हिंदुओं के पास कुछ भी नहीं है। इसके लिए निर्विवादित रुप से मुसलमान ही कारणीभूत हैं। क्योंकि, उन्होंने ही भारत पर आक्रमण करके उनकी राजनैतिक अस्मिता को नष्ट कर डाला था।

1924 में जब कमालपाशा ने तुर्कस्थान की खिलाफत को ही पूर्ण रुप से रद्द कर डाला तो खिलाफत के लिए हिंदुओं की सहायता की आवश्यकता या एकता की मुसलमानों को गरज नहीं रही तो, जिन मोहम्मदअली ने गांधीजी की तुलना अप्रत्यक्ष रुप से ईसा मसीह के साथ की थी उन्होंने ही अजमेर में घोषणा की थी ''गांधीजी का व्यक्तित्व कितना भी शुद्ध क्यों ना हो तो भी (मेरे) धर्म की दृष्टि से वह मुझे किसी भी मुसलमान की अपेक्षा, फिर वह बिल्कूल चरित्रहीन ही क्यों ना हो, कम दर्जे का लगता है।"" इस स्पष्टीकरण पर समाचार पत्रों में चर्चा और आलोचना शुरु हो गई तब लखनऊ में मौलाना ने पुनः साफ-साफ कहा कि, ''हां, मेरे धर्म और पंथानुसार व्यभिचारी और अधःपतित मुसलमान को भी मैं गांधीजी से अच्छा समझता हूं।""

इस पर गांधीजी की प्रतिक्रिया थी- मौ. मोहम्मदअली के बयान में मुझे ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता जिस पर मुझे आपत्ति हो... यदि मौलाना ऐसे धर्म में विश्वास रखते हैं जो उनकी राय में सब धर्मों से अच्छा है, तो क्या वे ईमानदारी से यह नहीं कह सकते हैं कि वे तथाकथित रुप से विश्व के महानतम व्यक्ति से श्रेष्ठतर हैं? मैं समझता हूं कि, मौलाना ने जो फर्क बतलाया है वह जायज है। शायद मौलाना के इस प्रकार के विचारों से प्रसन्न होकर गांधीजी ने उनके बारे में कहा था ''अली बंधू कट्टर भारत प्रेमी हैं... अली बंधुओं ने भारत में इस्लाम का दर्जा बढ़ाने के लिए जितनी मेहनत की है उतनी अन्य किंही दो मुसलमानों ने नहीं की होगी। वे सच्चे राष्ट्रीय हैं यह उन्होंने सिद्ध किया है। यह थी गांधीजी की हिंदू-मुस्लिम एकता को साधने की पराकाष्ठा।

शायद उपर्युक्त विचारों से अभिभूत हो, प्रभावित हो उ.प्र. के वरिष्ठ मंत्री महोदय श्रीमोहम्मद आजमखान ने मौ. मोहम्मदअली  जौहर के नाम से एक विश्वविद्यालय स्थापित करने का सपना पाला और वर्षों के अथक प्रयासों तथा अनेक विरोधों का सामना कर अंततः अपने सपने को साकार कर दिखाकर अपने राष्ट्रीय होने का प्रमाण दिया है।

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