Wednesday, 15 August 2012

ईमानदार मुसलमान अब तो मौन तोडें

ईमानदार मुसलमान अब तो मौन तोडें

11 अगस्त 2012 को मुंबई में रजा अकादमी, सुन्नी जमायत उल उलेमा समेत 24 संगठनों द्वारा असम में हुई हिंसा के विरोध में आजाद मैदान पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि असम और म्यांमार में मुस्लिमों के खिलाफ हुई हिंसा को मीडिया ने प्रमुखता से नहीं दिखलाया। लेकिन मुस्लिमों का यह प्रदर्शन हिंसक हो गया और देखते ही देखते पथराव, आगजनी प्रारंभ हो गई। इस हिंसक प्रदर्शन के दौरान कुछ महिला पुलिस कर्मियों का विनयभंग करने का भी प्रयत्न किया गया। इससे मुंबई पुलिस हतप्रभ रह गई। इन प्रदर्शनकारी दंगाइयों की एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को अकेला कर घेरने का प्रयत्न किया। अत्यंत आपत्तिजनक कृत्य यह था कि एक धर्मांध मुस्लिम युुवक ने हिंदुस्थान की स्वतंत्रता की लडाई की अस्मिता के 'अमर जवान" क्रांतिस्तंभ पर भारी तोडफोड की। जो इन धर्मांधों की राष्ट्रद्रोही मानसिकता को उजागर करते हैं तथा यह सब हुआ इस्लाम के पाक-पवित्र कहे जानेवाले शांति के महीने रमजान में।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ मुद्दे उभरकर सामने आते हैं जो चर्चा की मांग करते हैं। पहला यह कि असम सहित पूरा पूर्वोत्तर, मीडिया क्या, बाकी देशवासी और यहां तक कि राजनीतिज्ञों द्वारा भी उपेक्षित है। और यह पहली बार नहीं हुआ है कि वहां घटित हुए किसी घटनाक्रम विशेष को मीडिया ने पर्याप्त कवरेज ना दिया हो। इस संबंध में राष्ट्रवादी लोग भी समय-समय पर अपनी चिंता, दुख और विरोध प्रकट करते रहते हैं। इसके भी कुछ कारण हैं जो वर्षों से हैं और अपने स्थान पर आज भी कायम हैं। लेकिन इस प्रकार की हिंसक प्रतिक्रिया जैसीकि मुस्लिम संगठनों द्वारा आयोजित प्रदर्शन में हुई कभी भी राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में नहीं हुई।

दूसरा मुद्दा यह है कि म्यांमार में मुस्लिमों के विरुद्ध जो हिंसा हुई है वह निश्चय ही दुखद है उसके विरोध में मुस्लिमों द्वारा प्रदर्शन किया जाना भी अपने स्थान पर ठीक है। परंतु, म्यांमार में मुस्लिमों पर हुई हिंसा के विरोध में हिंदुस्थान में भडकाऊ भाषण देकर पुलिसकर्मियों को निशाना बनाना, मीडिया पर हमला, मारपीट, तोडफोड, सरकारी संपत्ति के साथ ही साथ निर्दोष आमजनता की संपत्ति को हानि पहुंचाना, कहां तक उचित है, यह क्या दर्शाता है? किस मानसिकता का परिचायक है? मुस्लिमों द्वारा मुस्लिमों से संबंधित किसी भी मामले में होनेवाले प्रदर्शनों में उदा. पश्चिम बंगाल में सिंगूर जमीन अधिग्रहण और तस्लीमा को भारत में शरण  से संबंधित मामले, पैगंबर का चित्र कहीं विदेश में प्रकाशित होने का मामला हो या अन्य कोई मामला भी क्यों ना हो, अभिव्यक्ति हिंसक प्रतिक्रिया के रुप में ही क्यों होती है? शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया या प्रदर्शन क्यों नहीं होते?

जबकि पाकिस्तान (तो क्या बांग्लादेश तक) में अल्पसंख्य हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार, अपहरण-फिरौती वसूली, उनकी लडकियों को भगा ले जाकर उनका धर्मांतरण कर उन लडकियों का मुस्लिम पुरुषों से निकाह पढ़वाना, इन सबसे भयभीत होकर पाकिस्तान से उन हिंदुओं के पलायन पर प्रतिक्रिया स्वरुप हिंदू संगठनों द्वारा भी प्रदर्शन किए जाते हैं। परंतु, यह कभी भी नहीं सुना गया कि हिंदू संगठनों द्वारा इस प्रकार से हिंसा फैलाई गई हो।

तीसरा मुद्दा यह है कि तीन मुस्लिम सांसदों द्वारा असम के हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जो राहत शिविर चलाए जा रहे हैं वह मात्र मुस्लिमों के लिए ही हैं ! क्या यह योग्य है? भारत का सांसद तो भारत की जनता का प्रतिनिधि होता है। क्या असम के हिंसाग्रस्त, बेघर हो चूकी गैर-मुस्लिम जनता देश की नागरिक नहीं है, जो उन्हें इन सांसदों द्वारा चलाए जा रहे राहत शिविरों में सहायता नहीं दी जा रही है! क्या यह अमानवीय नहीं है। निश्चय ही आपत्तिजनक है। धर्म के आधार पर भेदभाव है।

इसी मुद्दे से जुडे और आज ही छपे एक समाचार के अनुसार सऊदी अरब म्यांमार के हिंसापीडित मुस्लिमों के लिए 5 करोड डालर की सहायता देगा। जो कि मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट जिसमें यह बतलाया गया है कि गत जून माह से म्यांमार में रहनेवाले मुस्लिम समुदाय को हिंसा का निशाना बनाया जा रहा है के बाद दी जा रही है। यहां तक तो ठीक है कि मानवता के नाते सहायता दी जाना चाहिए। परंतु, यह भी एक शोध का विषय है कि सऊदी अरब से लेकर अन्य सभी मुस्लिम देशों द्वारा मानवाधिकार, मानवीयता के नाते जो सहायता राशी विभिन्न देशों को दी जाती है वह किस आधार पर दी जाती है और किन देशों को दी जाती है तो आप पाएंगे कि वह अधिकांशतः या तो धर्मांतरण के लिए गैर-मुस्लिम देशों के मुस्लिमों को (इसका ज्वलंत उदाहरण है मीनाक्षीपुरम का धर्मांतरण), या केवल मुस्लिमों को ही वह भी प्रमुख रुप से इस्लामिक शिक्षा के लिए मदरसों-मस्जिदों को ही, या मुस्लिम देशों को ही दी जाती है।

चौथा मुद्दा यह है कि एक समाचार पत्र के अनुसार प्रमुख रुप से हिंसा पीडित कोकराझार की कुल आबादी दस लाख है उसमें 2.3 लाख मुसलमान हैं और उनमें भी आधे से अधिक मुस्लिमों को रत्ती भर भी आंच नहीं आई है जबकि राहत शिविरों में रह रहे पीडितों की संख्या 4.5लाख बतलाई जा रही है। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि पीडितों में तो अधिक संख्या गैर-मुस्लिमों की ही है। फिर भी इस प्रकार के दबाव बनानेवाले हिंसक आयोजन कर इस प्रकार का वातावरण क्यों बनाया जा रहा है कि अन्याय केवल मुस्लिमों पर ही हो रहा है, उनके खिलाफ हिंसा की जा रही है।

और अंतिम मुद्दा यह है कि जब यह सिद्ध हो चूका है कि झगडे की जड में आक्रमक घुसपैठिये बांग्लादेशी मुसलमान ही हैं जो वहां के संसाधनों, जमीनों पर कब्जे कर वहां के मूल जनजाति निवासियों को ही खदेडने पर उतारु हैं। तो विचारणीय यह है कि, ये विदेशी बांग्लादेशी मुसलमान और म्यांमार के मुस्लिम इन भारतीय मुसलमानों के क्या लग रहे हैं जो इतना शोर मचाया जा रहा है और सशस्त्र हिंसा, आगजनी, की जा रही है तथा अब तो यह भी सिद्ध हो चूका है कि मुंबई की हिंसा एक सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा थी और प्रदर्शनकारियों के कई गुट लोहे के रॉड, हॉकी स्टिक, पेट्रोल, घासलेट आदि से लैस थे। मुंबई पुलिस ने दो एस.एल.आर., एक रिवॉल्वर तथा कुछ कारतूस भी प्रदर्शनकारियों से जब्त किए हैं। मुंबई की यह सुनियोजित हिंसा मंच पर से दिए गए भडकाऊ भाषणों के बाद ही भडकी है इसके लिए सप्ताह भर से वातावरण बनाया जा रहा था, मस्जिदों में नमाज के बाद भडकानेवाले भाषण देकर मुस्लिमों को भडकाया जा रहा था, मस्जिद की दीवारों पर बडे-बडे पोस्टर चिपकाये गए थे, थोक में मुस्लिमों को एसएमेस भी भेजे गए थे तथा हिंसा मंच पर से पहले से ही दंगाग्रस्त बरेली (उ.प्र.) के एक मौलवी द्वारा दिए गए प्रक्षोभक भाषण के बाद ही भडकी थी।

अब अंत में सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यूं? तो इसका एक ही उत्तर है इन सबके पीछे है इस्लामिक आज्ञाएं जिनका पालन करना हर सच्चे मुसलमान का फर्ज है और उससे भी अहम है 'उम्मा" की भावना। 'उम्मा" याने मुस्लिम भाईचारा, मुस्लिम बंधुत्व, पॅनइस्लामिज्म (विश्व मुस्लिम बंधुत्व) जिसका आधार है कुरान की यह आयत''ईमानवाले (श्रद्धावान यानी मुसलमान) (सब) आपस में भाई हैं।"" (49ः10) इस आयत की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यहां ईमानवाले (मुसलमान) कहा गया है 'मनुष्य" नहीं। ''तुम खैर-उम्मत  (बेहतरीन गिरोह) हो।""(3ः110) इस आयत पर कुरान भाष्य कहता है - ''खैर-उम्मत इस आधार पर कि यही उम्मत (समुदाय) सत्य धर्म पर चल रही है।"" (द.कु.खंड 1 पृ.211) अर्थात्‌ गैर-मुस्लिम असत्य मार्ग पर चल रहे हैं। क्योंकि वे अनेकेश्वरवादी हैं और इस्लाम के अनुसार ''शिर्क (अनेकेश्वरवाद) सबसे बडा जुल्म है।"" (बुखारी, द.कु.भाष्य खंड1 पृ.443)''और अल्लाह जालिमों को खूब जानता है।""(6ः58) ''यहां जालिम से मुराद बहुदेववादी (शिर्क करनेवाले) हैं।"" (द.कु.भाष्य, खंड1,पृ.435) और'अल्लाह शिर्क को कभी क्षमा नहीं करेगा।"" (4ः47) ''अल्लाह काफिरों (इस्लाम को न माननेवालों) का दुश्मन है।"" (2ः98), ''काफिर तो हैं ही तुम्हारे खुले दुश्मन।"" (4ः101)

 पैगंबर का कथन है - 'सारे मुसलमान समान हैं। वे परस्पर एकजीव हो गए हैं।" (दाऊदः 4515) 'तुम्हारे (मुस्लिम) बंधु को सहायता करते जाओ, फिर वह अत्याचारी हो या कि अत्याचार पीडित हो। अगर वह अत्याचारी हो तो उसे अत्याचार करने से रोकने के लिए सहायता करो और अगर वह अत्याचार पीडित हो तो उस अत्याचार के विरुद्ध उसकी सहायता करो।" (बुखारीः6952, मुस्लिमः6254) कुरान भाष्य कहता है - ''दीनी (धर्म के) रिश्ते के हिसाब से मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। रंग और वंश, जाति और देश का अंतर इस विश्वव्यापी भाईचारों में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। वे जहां कहीं भी होंगे एकदूसरे से जुडे रहेंगे और एक के दर्द की चोट दूसरा अपने अंदर महसूस करेगा चाहे उनके बीच हजारों मील का फासला हो। इस भाईचारे के रिश्ते को मजबूत करने की ताकीद हदीस में भी की गई है। आपने फरमाया- 'मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर जुल्म करे, और न उसे जालिम (अनेकेश्वरवादी/मूर्तिपूजक) के हवाले करे जो व्यक्ति अपने भाई की हाजत (इच्छा) पूरी करने में लगा रहता है और जो व्यक्ति किसी मुसलमान की तकलीफ दूर करेगा और जो किसी मुसलमान की पर्दापोशी (दोष और अपराध पर दृष्टि न डालना, उन्हें छिपाना) करेगा अल्लाह कियामत के दिन उसकी परदापोशी (क्षमा करना) करेगा।"(मुस्लिम)(द.कु.खंड.3, पृ.1848)

सभी मुसलमानों में एकता, भाईचारा, दोस्ती इस संबंध में कुरान में वचन आए हुए हैं कि :''श्रद्धावान मर्द और श्रद्धावान औरतें आपस में एक दूसरे के सहायक हैं ।''(9:71) यही वचन पूर्व में (8:72) और (49:10) में भी आए हुए हैं। इस आयत के संबंध में मौ. मौदूदी कहते हैं :''सच्चे श्रद्धावान पुरूष और स्त्री मिलकर एक विशिष्ट स्वतंत्र समाज (distinctive community) तैयार होता है, क्योंकि उनमें अनेक गुणविशेष समान होते हैं। वे स्वभाव से ही सदाचारी बने होते हैं; वे दुराचार को निषिद्ध मानते हैं; और एकमात्र अल्लाह का स्मरण यह उनके जीवन की सांस ही होती है... इस समान गुण धर्म के कारण उनमें सामूहिक एकता की भावना निर्मित होती है।'' अर्थात्‌ जिहाद के लिए यह एकता, भाईचारा और दोस्ती बहुत काम आती है। इसे ही वैश्विक मुस्लिम भाईचारा कहते हैंं। इसीलिए संपूर्ण विश्व के मुस्लिमों का जिहाद के लिए आवाहन किया जा सकता है, किया जाता है।

इन्हीं कारणों से सऊदी अरब म्यांमार के हिंसा पीडित मुस्लिमों को 5 करोड डॉलर की सहायता प्रदान कर रहा है तो मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी, असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता बद्रुद्दीन अजमल कांग्रेस के सामने क्रोध प्रकट कर रहे हैं। और आजकल समाचार पत्रों में असम से पलायन कर संदिग्ध बांग्लादेशी मुसलमान देश के विभिन्न शहरों में आ रहे हैं के जो समाचार छप रहे हैं वे घुसपैठिए बांग्लादेशी मुसलमान विभिन्न शहरों का रुख इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि 'उम्मा" की इसी प्रबल भावना और इस्लामिक आदेशों के कारण उन्हें पूरे भारत में आश्रय मिल ही जाएगा। इसके पूर्व भी देश के विभिन्न शहरों में जो बांग्लादेशी मुसलमान घुस आए हैं उन्हें भी इन्हीं कारणों से आश्रय मिला है।

आखिर में यह कहना है कि, मैंने यह लेख किसी धर्म या मजहब के संदर्भ में नहीं लिखा है। परंतु, देश का एक संविधान है जो हिंदू-मुसलमान सभी के लिए एक ही है और इस देश में अमन-शांति चाहनेवालों का यह फर्ज बनता है कि धर्म-मजहब के नाम पर अशांति न फैले यह लोगों को समझाएं। कहा जाता है कि, मुसलमानों में भी अमनपसंद लोग हैं जो अपने समाज की तरक्की चाहते हैं। देश के साथ ईमानदारी बनाए रखने के लिए उनका फर्ज बनता है कि वे अपने समाज को समझाएं, गलत रास्ते पर बढ़ने ना दें। इसी में हिंदू और मुस्लिम दोनो का भला है।  

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