Friday, 31 August 2012

मुस्लिमों के कल्याण का मार्ग - विज्ञाननिष्ठा; धर्मांधता नहीं !


मुस्लिमों के कल्याण का मार्ग - विज्ञाननिष्ठा; धर्मांधता नहीं !

स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, साम्यवादी, आधुनिक समझनेवाले संगठन, दल और व्यक्तियों के साथ ही अपने को मुस्लिमों का हितकर्ता कहलवानेवाली कांग्रेस तक ने मुस्लिम समाज के प्रबोधन कार्य के क्षेत्र को उपेक्षित ही रखा इसके लिए कोई प्रयत्न ही नहीं किए। महात्मागांधी के काल में कांग्रेस ने मुसलमानों के हितों के रक्षणकर्ता की भूमिका निभाई और हितों की रक्षा का अर्थ समाज सुधार नहीं। इसके लिए मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना पडती जिसके लिए कांग्रेस न तो उस काल में तैयार थी और न ही आज भी है।

वस्तुतः इन सबने एक ही मार्ग को अपनाया और वह है जब तक तुम स्वयं होकर उसकी मांग नहीं करोगे हम तुम्हारे धर्म में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यही हाल लगभग सभी समाज सुधारकों का रहा है। सभी ने भारतीय समाज के प्रबोधन कार्य को हिंदू समाज के प्रबोधन कार्य तक ही सीमित रखा। इसके जो भी प्रमुख कारण हैं उनमें से प्रमुख तो यही नजर आते हैं कि चूंकि भारत में हिंदू समाज बहुसंख्यक है इसलिए स्वाभाविक रुप से जो भी प्रश्न उपस्थित होंगे वे प्रमुख रुप से हिंदुओं के ही होंगे। इसलिए प्रबोधन भी हिंदुओं का ही प्रमुख रुप से रहेगा। दूसरी बात जो भी समाजसुधारक हुए हैं वे प्रमुख रुप से हिंदुओ में से ही हुए हैं। इसलिए यह भी स्वाभाविक ही है कि, वे प्रबोधन भी हिंदुओं का करेंगे। अपवाद स्वरुप मुसलमानों में हमीद दलवाई जरुर हुए हैं और वह भी हाल ही में। फिर एक बात और भी है और वह यह है कि, भले ही हिंदू अपने आचारों के संबंध में कितना भी सनातन, कर्मठ, रुढ़िप्रिय क्यों न हो परंतु, दूसरों के विचारों को सुनने के मामले में उदार और सहिष्णु है। इसी कारण से हिंदू समाज का प्रबोधन किया जा सकता है तथा हिंदुओं में इसकी परंपरा भी है। इसके विपरीत मुस्लिम समाज है और वहां समाज प्रबोधन करना मतलब अपनी जान को ही खतरे में डालना है। इसलिए हर कोई अपनेआपको हिंदुओं के प्रबोधन तक ही सीमित रखता है।

किसी भी समाज का प्रबोधन करने के दौरान उस समाज की धर्मश्रद्धाओं को ठेस पहुंचती ही है और मुस्लिमों की श्रद्धाओं को ठेस पहुंचाने का अर्थ है स्वयं की मुस्लिम विरोधी छबि बनाना और अपनी धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी छबि को कोई ठेस पहुंचाना चाहता नहीं। और रही राजनीतिज्ञों की बात तो वे अपनी उपर्युक्त छबि के अलावा अपने राजनैतिक हितों से वंचित होना चाहते नहीं इसलिए  मुस्लिमों के मामले में चुप्पी साधे रहते हैं। और कम हानि होने की संभावना के चलते केवल हिंदुओं को ही उपदेश देते रहते हैं। यही परिस्थिति स्वतंत्रतापूर्वकाल में भी थी और वर्तमान में भी बनी हुई है।

यदि आप स्वतंत्रता पूर्व का 100 वर्षों का इतिहास उठाकर देखें तो आपको केवल एक ही व्यक्ति मुस्लिम समाज का प्रबोधन करते नजर आएगा और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि, वह व्यक्ति है - हिंदुत्व का दर्शन देनेवाले हिंदूराष्ट्र उद्‌गाता, बुद्धिवादी विचारक वीर सावरकर। (अपवाद सिर्फ डॉ. अंबेडकर का है और वह भी उन्होंने 1940 में अपने ग्रंथ 'पाकिस्तान" में किया है और वह भी विभाजन के संबंध में)। वैसे देखा जाए तोे सावरकरजी ने मुस्लिम समाज प्रबोधन का कार्य इसलिए भी किया क्योंकि, उनका संकल्प एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का निर्माण करना था। उनकी राष्ट्रीयत्व की धर्मनिरपेक्ष व्याख्या के अनुसार 'सच्चा राष्ट्रीयत्व वही है कि जो हिंदू-मुसलमान में भेदभाव न करते सभी को समान मानता है।" और चूंकि, हिंदू-मुसलमान दोनो ही इस राष्ट्र के घटक हैं इसलिए राष्ट्र के सुधार के लिए हिंदुओं के सुधार के साथ ही साथ मुसलमानों में भी सुधार आवश्यक है।

यह सत्य है कि, राजनीति के क्षेत्र में सावरकरजी ने स्पष्ट रुप से मुस्लिम विरोध की भूमिका स्वीकार की थी और हिंदुत्व, हिंदूराष्ट्र, हिंदू संगठन मुसलमानों तक उनके सामाजिक विचार पहुंचाने के मार्ग की सबसे बडी बाधाएं थी। परंतु, हिंदुओं के स्वयं को पुरोगामी, सेक्यूलर और मुस्लिम हितकर्ता समझनेवालों ने भी इन विचारों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। इसके लिए उन्हें विशेष ऐसा कोई दोष दिया भी नहीं जा सकता क्योंकि, वे सपने में भी सोच नहीं सकते थे कि, हिंदुत्वनिष्ठ सावरकर मुस्लिम समाज के प्रबोधन के लिए इतने मूलगामी विचार रख सकते हैं। मुस्लिम समाज भी प्रगत हो, प्रबल, संगठित और आधुनिक बने का उपदेश कर सकते हैं। रही अनुयायियों की बात तो उन्हें ऐसे अनुयायी मिले ही नहीं जो उनके इन क्रांतिकारी विचारों को आगे बढ़ाते इसलिए उनके यह विचार पुस्तक में ही रह गए।

वर्तमान में जो परिस्थितियां हैं उनको मद्देनजर रखते उनके विचारों को समाज के सामने रखने की आवश्यकता को दृष्टि में रख वे विचार संक्षेप में प्रस्तुत हैं - मुसलमानों को उपदेश करते हुए सावरकरजी कहते हैं ः ''हिंदुस्थानी राष्ट्र के आज अपरिहार्य उपांग मुस्लिम समाज को भी हमारा यही कहना है कि, तुम्हारे समाज में भी जो धर्मांधजंगली कल्पनाओं और क्रूर आचारों की भरमार है, उन उपद्रवी आचारों और क्रूर धार्मिक उन्माद से तुम जितना संभव हो सके उतना जल्दी मुक्ति पाओ इसीमें तुम्हारा हित है। हिंदुओं पर उपकार करने के लिए नहीं, हिंदू तुम्हारे उस धार्मिक उन्माद से डरते हैं इसलिए नहीं, बल्कि तुम्हारे मनुष्यता को वह कलंक है इसलिए, और विशेषतः एक पुरानी पिछडी संस्कृति को ही पक्का पकडकर समय के आडे आओगे तो विज्ञान की ऐडी तले तुम निःशंक कुचले जाओगे इसलिए"" तुम विज्ञाननिष्ठ बनो इस प्रकार का उनका उपदेश है। सावरकरजी का यह उपदेश एक सच्चे बुद्धिवादी सुधारक जैसा ही है। विज्ञाननिष्ठ बनना यानी क्या यह बतलाते हुए सावरकरजी कहते हैं, ''तुम्हें वह कुरान त्रिकालाबाधित ईश्वरोक्त अक्षर और अक्षर अनुल्लंघनीय मानने की सनातन प्रवृत्ति छोडकर, कुरान का योग्य वह सम्मान रखते हुए ही, परंतु उसमें का ..... वह वह निर्बंध त्रिकालाबाधित न मानते मनुष्य जाति के हित का जो आज उपयुक्त है वह वह बेखटके आचरण में लाने की अद्यतन प्रवृत्ति को स्वीकारो!"" कुरान को ईश्वर निर्मित ग्रंथ न मानते मनुष्यकृत मानो यह उनका पहला उपदेश था।

मनुष्य बुद्धिनिष्ठ मनुष्य बने ऐसा उनका उपदेश है। ''बाइबल-कुरान ये सारे धर्मग्रंथ आदरणीय और अभ्यसनीय, परंतु केवल मनुष्यकृत ग्रंथ हैं यह पक्का तय कर लो""; उस ग्रंथ में जो आज के लिए उपयुक्त और विज्ञान की कसौटी पर उतरने योग्य हो उतना ही स्वीकारो; उनका उपदेश है ''जो बुद्धिशून्य है उसे साफ छोड दो""। धर्मांधता के कारण दुनिया में मुसलमानों की इतिहास में कितनी हानि हुई है इसका ज्वलंत चित्र सावरकरजी मुसलमानों के सामने खडा करते हैं। यूरोप ने बाइबल की धर्मांधता छोडी और वह विज्ञाननिष्ठ बना। इस यूरोप से मुसलमानों को संघर्ष करना पडा। इस संघर्ष में पोथीनिष्ठ मुसलमानों के क्या हाल हुए इसका वर्णन सावरकरजी ने अपने समग्र सावरकर वाड्‌मय के तीसरे खंड में किया हुआ है।

मुसलमानों को उपदेश करते हुए सावरकरजी आगे कहते हैं, ''हमारी मनःपूर्वक इच्छा है कि, हिंदी मुसलमान भी पोथीनिष्ठ प्रवृत्ति छोडकर विज्ञाननिष्ठ बनें; भोलेपन और धर्मोन्मतता के शिकंजे से उसकी बुद्धि मुक्त हो और उनका समाज भी शिक्षित, प्रगत और अभ्युन्नत हो। अगर उनके ध्यान में यह आ गया कि विज्ञानबल के आगे धर्मोन्मतता कभी भी टिक नहीं सकेगी तो वे भी तुर्कों का ही मार्ग स्वीकारेंगे और आज यूरोपीयन शक्तियों के सामने जो उनकी दुर्गति हो रही है वह रुकेगी। मुसलमान अगर विज्ञाननिष्ठ और प्रगत हुए तो उसमें हिंदुओं और मुसलमानों दोनो का ही कल्याण है।"" विज्ञाननिष्ठा के अभाव में मुस्लिम समाज आज हिंदू समाज की अपेक्षा अधिक अज्ञानी, गरीब और अवनति के चंगुल में फंसा हुआ है इसका भान करवाते हुए सावरकरजी कहते हैं ''जो प्राप्त करना है वह विज्ञानबल जिसके आगे धर्मभेद का डंक ढ़िला पडता है!"" इस विज्ञानबल का अर्थ बुद्धिनिष्ठा है। हिंदू-मुस्लिम दोनो ही समाजों का कल्याण इस बुद्धिनिष्ठा को स्वीकारने से ही होगा। इसके बगैर धर्मभेद का विषैला डंक कुचला नहीं जा सकता। हिंदू-मुस्लिम समस्या के हल के लिए यह बल उपकारक ठहरेगा। सावरकरजी की यह भूमिका आज भी कितनी मार्गदर्शक है यह अलग से बतलाने की कोई आवश्यकता नहीं।

सावरकरजी का कहना था संसार के अन्य किसी के भी अपेक्षा हिंदुओं को भारतीय मुसलमान निकट के हैं और मुसलमानों को हिंदू। 1924 के एक लेख में वे कहते हैं ः''और एक बात हम हमारे मुस्लिम देशबंधुओं को बतला देते हैं कि, मुसलमानों तुम भी रक्त और बीज से हिंदू ही होने के कारण तुम हमारे लिए सारे विश्व में निकट के हो। परंतु, तुम अगर यह समझते हो कि, तुम्हारे लिए काफिर हिंदू की अपेक्षा सारी दुनिया निकट की है, तुर्कस्थान आदि मुसलमान तुम्हें सहायता देंगे और उसके बलबूते तुम हिंदुओं को सीधा कर दोगे तो, तुम यह समझ लो कि, इस तुम्हारी दुष्ट बुद्धि से तुम्हारा ही घात होगा।"" दुनिया के मुसलमान किस प्रकार से भारतीय मुसलमानों को महत्व नहीं देते इसके उदाहरण देते हुए वे आगे कहते हैं ः ''जब तुम सिंधी मुसलमान मक्का यात्रा पर गए थे तब वहां के अरब मुसलमानों ने तुम्हें किस प्रकार लात-घूंसों से मारा था और अपमानित किया था! अब हिंदुस्थान के मुसलमान ही तुम्हारे उपयोग में आएंगे!"" यही स्थिति आज भी बरकरार है। यदि मुस्लिम जगत में तुम्हें महत्व चाहिए हो तो, तुममें दम होना चाहिए।

1941 में उन्होंने कहा था, ''खिलाफत आंदोलन के समय हिजरत का कडवा अनुभव आने के बावजूद तुम शायद यह मान रहे होंगे कि, तुम हिंदुस्थान के मुसलमानों की सहायता के लिए बाहर के स्वतंत्र राष्ट्रों के मुसलमान दौडकर आएंगे"" यह झूठ तय होगा। उनका कहना था कि, ''अपन दोनों एकदूसरे से प्रेमबद्ध हो, एक होकर देशोद्धार करें, इसीमें दोनों का हित है।"" इस प्रकार के हितोपदेश के साथ ही सावरकरजी ने मुसलमानों की धर्मांध रुढ़ियों के विरुद्ध भी कठोर टीका की है। उदाहरण के लिए उन्होंने बुरका, नमाज, सूअर का मांस, पोथीनिष्ठ रोजा, मुसलमानी धर्म की समता की डिंगें मारना, आदि को लिया है।

मुस्लिम प्रबोधन के लिए उन्होंने कथालेखन भी किया है। 'मुसलमानों का पंथोपपंथ का परिचय" उनका यह लेख मुस्लिम प्रबोधन की दृष्टि से पढ़ने जैसा है। इस लेख में सावरकरजी ने प्रमुख रुप से तीन विचार प्रस्तुत किए हैं 1). संसार के सारे धर्मग्रंथ सारे मनुष्यों की संयुक्त संपत्ति है। उसमें जो अपने हित का है उसे लेने का अधिकार हर किसीको है और प्रत्येक ने उसे कार्यान्वित करना चाहिए। मेरा ही धर्मग्रंथ सच्चा है, बाकी झूठे हैं इस धर्मांधता का दुराग्रह हरएक को छोडना चाहिए। ऐसे धर्मग्रंथों का आदर करें, सम्मान दें परंतु अंधानुकरण न करें। 2). कुरान ईश्वरीय ग्रंथ मानने के कारण मुसलमानों की प्रगति रुक गई है। वे पिछड गए हैं। अपने ही हित के लिए उन्होंने इस कुरान की बेडी को तोड देना चाहिए। 3). कुरान भले ही एक ही ग्रंथ दिखता हो तो भी वास्तव में वह एक नहीं। प्रत्येक भाष्यकारानुसार स्वतंत्र कुरान तैयार होते चला गया है। इस वस्तुस्थिति के कारण कुरान ईश्वर ने ही बतलाया हुआ है, उसकी सीख निश्चित और तयशुदा है और उसीका हम पालन कर रहे हैं, यह मुसलमानों की समझ पूरी तरह से झूठ है। कुरान के इस भाष्यभेद और अर्थभेद के कारण मुसलमानों में जो अनेक पंथ बन गए हैं, उनकी जानकारी इस लेख में सावरकरजी ने प्रस्तुत की है। उनका उद्देश्य यह था कि, यह पढ़कर कुरान मनुष्यकृत ग्रंथ है इसका विश्वास मुसलमानों को हो।

अंत में यही कहना है कि, आज साम्यवाद, समाजवाद के दिन लद चूके हैं। वैश्विक इस्लामी आतंकवाद भी अल्पकालीन ही है, स्थायी नहीं। मुसलमानों को यह समझना ही होगा, स्वीकारना ही होगा कि उनका उज्जवल भविष्य विज्ञाननिष्ठ बनने में, बुद्धिवादी मार्ग स्वीकारने में ही है। इसके लिए उन्हें पढ़ना-लिखना होगा दूसरे समाजों के साथ समरस होना पडेगा, यह बात-बेबात हिंसा करने का मार्ग त्यागना होगा तभी उनके समाज की उन्नति हो सकेगी।    

Wednesday, 15 August 2012

ईमानदार मुसलमान अब तो मौन तोडें

ईमानदार मुसलमान अब तो मौन तोडें

11 अगस्त 2012 को मुंबई में रजा अकादमी, सुन्नी जमायत उल उलेमा समेत 24 संगठनों द्वारा असम में हुई हिंसा के विरोध में आजाद मैदान पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि असम और म्यांमार में मुस्लिमों के खिलाफ हुई हिंसा को मीडिया ने प्रमुखता से नहीं दिखलाया। लेकिन मुस्लिमों का यह प्रदर्शन हिंसक हो गया और देखते ही देखते पथराव, आगजनी प्रारंभ हो गई। इस हिंसक प्रदर्शन के दौरान कुछ महिला पुलिस कर्मियों का विनयभंग करने का भी प्रयत्न किया गया। इससे मुंबई पुलिस हतप्रभ रह गई। इन प्रदर्शनकारी दंगाइयों की एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को अकेला कर घेरने का प्रयत्न किया। अत्यंत आपत्तिजनक कृत्य यह था कि एक धर्मांध मुस्लिम युुवक ने हिंदुस्थान की स्वतंत्रता की लडाई की अस्मिता के 'अमर जवान" क्रांतिस्तंभ पर भारी तोडफोड की। जो इन धर्मांधों की राष्ट्रद्रोही मानसिकता को उजागर करते हैं तथा यह सब हुआ इस्लाम के पाक-पवित्र कहे जानेवाले शांति के महीने रमजान में।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ मुद्दे उभरकर सामने आते हैं जो चर्चा की मांग करते हैं। पहला यह कि असम सहित पूरा पूर्वोत्तर, मीडिया क्या, बाकी देशवासी और यहां तक कि राजनीतिज्ञों द्वारा भी उपेक्षित है। और यह पहली बार नहीं हुआ है कि वहां घटित हुए किसी घटनाक्रम विशेष को मीडिया ने पर्याप्त कवरेज ना दिया हो। इस संबंध में राष्ट्रवादी लोग भी समय-समय पर अपनी चिंता, दुख और विरोध प्रकट करते रहते हैं। इसके भी कुछ कारण हैं जो वर्षों से हैं और अपने स्थान पर आज भी कायम हैं। लेकिन इस प्रकार की हिंसक प्रतिक्रिया जैसीकि मुस्लिम संगठनों द्वारा आयोजित प्रदर्शन में हुई कभी भी राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में नहीं हुई।

दूसरा मुद्दा यह है कि म्यांमार में मुस्लिमों के विरुद्ध जो हिंसा हुई है वह निश्चय ही दुखद है उसके विरोध में मुस्लिमों द्वारा प्रदर्शन किया जाना भी अपने स्थान पर ठीक है। परंतु, म्यांमार में मुस्लिमों पर हुई हिंसा के विरोध में हिंदुस्थान में भडकाऊ भाषण देकर पुलिसकर्मियों को निशाना बनाना, मीडिया पर हमला, मारपीट, तोडफोड, सरकारी संपत्ति के साथ ही साथ निर्दोष आमजनता की संपत्ति को हानि पहुंचाना, कहां तक उचित है, यह क्या दर्शाता है? किस मानसिकता का परिचायक है? मुस्लिमों द्वारा मुस्लिमों से संबंधित किसी भी मामले में होनेवाले प्रदर्शनों में उदा. पश्चिम बंगाल में सिंगूर जमीन अधिग्रहण और तस्लीमा को भारत में शरण  से संबंधित मामले, पैगंबर का चित्र कहीं विदेश में प्रकाशित होने का मामला हो या अन्य कोई मामला भी क्यों ना हो, अभिव्यक्ति हिंसक प्रतिक्रिया के रुप में ही क्यों होती है? शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया या प्रदर्शन क्यों नहीं होते?

जबकि पाकिस्तान (तो क्या बांग्लादेश तक) में अल्पसंख्य हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार, अपहरण-फिरौती वसूली, उनकी लडकियों को भगा ले जाकर उनका धर्मांतरण कर उन लडकियों का मुस्लिम पुरुषों से निकाह पढ़वाना, इन सबसे भयभीत होकर पाकिस्तान से उन हिंदुओं के पलायन पर प्रतिक्रिया स्वरुप हिंदू संगठनों द्वारा भी प्रदर्शन किए जाते हैं। परंतु, यह कभी भी नहीं सुना गया कि हिंदू संगठनों द्वारा इस प्रकार से हिंसा फैलाई गई हो।

तीसरा मुद्दा यह है कि तीन मुस्लिम सांसदों द्वारा असम के हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जो राहत शिविर चलाए जा रहे हैं वह मात्र मुस्लिमों के लिए ही हैं ! क्या यह योग्य है? भारत का सांसद तो भारत की जनता का प्रतिनिधि होता है। क्या असम के हिंसाग्रस्त, बेघर हो चूकी गैर-मुस्लिम जनता देश की नागरिक नहीं है, जो उन्हें इन सांसदों द्वारा चलाए जा रहे राहत शिविरों में सहायता नहीं दी जा रही है! क्या यह अमानवीय नहीं है। निश्चय ही आपत्तिजनक है। धर्म के आधार पर भेदभाव है।

इसी मुद्दे से जुडे और आज ही छपे एक समाचार के अनुसार सऊदी अरब म्यांमार के हिंसापीडित मुस्लिमों के लिए 5 करोड डालर की सहायता देगा। जो कि मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट जिसमें यह बतलाया गया है कि गत जून माह से म्यांमार में रहनेवाले मुस्लिम समुदाय को हिंसा का निशाना बनाया जा रहा है के बाद दी जा रही है। यहां तक तो ठीक है कि मानवता के नाते सहायता दी जाना चाहिए। परंतु, यह भी एक शोध का विषय है कि सऊदी अरब से लेकर अन्य सभी मुस्लिम देशों द्वारा मानवाधिकार, मानवीयता के नाते जो सहायता राशी विभिन्न देशों को दी जाती है वह किस आधार पर दी जाती है और किन देशों को दी जाती है तो आप पाएंगे कि वह अधिकांशतः या तो धर्मांतरण के लिए गैर-मुस्लिम देशों के मुस्लिमों को (इसका ज्वलंत उदाहरण है मीनाक्षीपुरम का धर्मांतरण), या केवल मुस्लिमों को ही वह भी प्रमुख रुप से इस्लामिक शिक्षा के लिए मदरसों-मस्जिदों को ही, या मुस्लिम देशों को ही दी जाती है।

चौथा मुद्दा यह है कि एक समाचार पत्र के अनुसार प्रमुख रुप से हिंसा पीडित कोकराझार की कुल आबादी दस लाख है उसमें 2.3 लाख मुसलमान हैं और उनमें भी आधे से अधिक मुस्लिमों को रत्ती भर भी आंच नहीं आई है जबकि राहत शिविरों में रह रहे पीडितों की संख्या 4.5लाख बतलाई जा रही है। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि पीडितों में तो अधिक संख्या गैर-मुस्लिमों की ही है। फिर भी इस प्रकार के दबाव बनानेवाले हिंसक आयोजन कर इस प्रकार का वातावरण क्यों बनाया जा रहा है कि अन्याय केवल मुस्लिमों पर ही हो रहा है, उनके खिलाफ हिंसा की जा रही है।

और अंतिम मुद्दा यह है कि जब यह सिद्ध हो चूका है कि झगडे की जड में आक्रमक घुसपैठिये बांग्लादेशी मुसलमान ही हैं जो वहां के संसाधनों, जमीनों पर कब्जे कर वहां के मूल जनजाति निवासियों को ही खदेडने पर उतारु हैं। तो विचारणीय यह है कि, ये विदेशी बांग्लादेशी मुसलमान और म्यांमार के मुस्लिम इन भारतीय मुसलमानों के क्या लग रहे हैं जो इतना शोर मचाया जा रहा है और सशस्त्र हिंसा, आगजनी, की जा रही है तथा अब तो यह भी सिद्ध हो चूका है कि मुंबई की हिंसा एक सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा थी और प्रदर्शनकारियों के कई गुट लोहे के रॉड, हॉकी स्टिक, पेट्रोल, घासलेट आदि से लैस थे। मुंबई पुलिस ने दो एस.एल.आर., एक रिवॉल्वर तथा कुछ कारतूस भी प्रदर्शनकारियों से जब्त किए हैं। मुंबई की यह सुनियोजित हिंसा मंच पर से दिए गए भडकाऊ भाषणों के बाद ही भडकी है इसके लिए सप्ताह भर से वातावरण बनाया जा रहा था, मस्जिदों में नमाज के बाद भडकानेवाले भाषण देकर मुस्लिमों को भडकाया जा रहा था, मस्जिद की दीवारों पर बडे-बडे पोस्टर चिपकाये गए थे, थोक में मुस्लिमों को एसएमेस भी भेजे गए थे तथा हिंसा मंच पर से पहले से ही दंगाग्रस्त बरेली (उ.प्र.) के एक मौलवी द्वारा दिए गए प्रक्षोभक भाषण के बाद ही भडकी थी।

अब अंत में सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यूं? तो इसका एक ही उत्तर है इन सबके पीछे है इस्लामिक आज्ञाएं जिनका पालन करना हर सच्चे मुसलमान का फर्ज है और उससे भी अहम है 'उम्मा" की भावना। 'उम्मा" याने मुस्लिम भाईचारा, मुस्लिम बंधुत्व, पॅनइस्लामिज्म (विश्व मुस्लिम बंधुत्व) जिसका आधार है कुरान की यह आयत''ईमानवाले (श्रद्धावान यानी मुसलमान) (सब) आपस में भाई हैं।"" (49ः10) इस आयत की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यहां ईमानवाले (मुसलमान) कहा गया है 'मनुष्य" नहीं। ''तुम खैर-उम्मत  (बेहतरीन गिरोह) हो।""(3ः110) इस आयत पर कुरान भाष्य कहता है - ''खैर-उम्मत इस आधार पर कि यही उम्मत (समुदाय) सत्य धर्म पर चल रही है।"" (द.कु.खंड 1 पृ.211) अर्थात्‌ गैर-मुस्लिम असत्य मार्ग पर चल रहे हैं। क्योंकि वे अनेकेश्वरवादी हैं और इस्लाम के अनुसार ''शिर्क (अनेकेश्वरवाद) सबसे बडा जुल्म है।"" (बुखारी, द.कु.भाष्य खंड1 पृ.443)''और अल्लाह जालिमों को खूब जानता है।""(6ः58) ''यहां जालिम से मुराद बहुदेववादी (शिर्क करनेवाले) हैं।"" (द.कु.भाष्य, खंड1,पृ.435) और'अल्लाह शिर्क को कभी क्षमा नहीं करेगा।"" (4ः47) ''अल्लाह काफिरों (इस्लाम को न माननेवालों) का दुश्मन है।"" (2ः98), ''काफिर तो हैं ही तुम्हारे खुले दुश्मन।"" (4ः101)

 पैगंबर का कथन है - 'सारे मुसलमान समान हैं। वे परस्पर एकजीव हो गए हैं।" (दाऊदः 4515) 'तुम्हारे (मुस्लिम) बंधु को सहायता करते जाओ, फिर वह अत्याचारी हो या कि अत्याचार पीडित हो। अगर वह अत्याचारी हो तो उसे अत्याचार करने से रोकने के लिए सहायता करो और अगर वह अत्याचार पीडित हो तो उस अत्याचार के विरुद्ध उसकी सहायता करो।" (बुखारीः6952, मुस्लिमः6254) कुरान भाष्य कहता है - ''दीनी (धर्म के) रिश्ते के हिसाब से मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। रंग और वंश, जाति और देश का अंतर इस विश्वव्यापी भाईचारों में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। वे जहां कहीं भी होंगे एकदूसरे से जुडे रहेंगे और एक के दर्द की चोट दूसरा अपने अंदर महसूस करेगा चाहे उनके बीच हजारों मील का फासला हो। इस भाईचारे के रिश्ते को मजबूत करने की ताकीद हदीस में भी की गई है। आपने फरमाया- 'मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर जुल्म करे, और न उसे जालिम (अनेकेश्वरवादी/मूर्तिपूजक) के हवाले करे जो व्यक्ति अपने भाई की हाजत (इच्छा) पूरी करने में लगा रहता है और जो व्यक्ति किसी मुसलमान की तकलीफ दूर करेगा और जो किसी मुसलमान की पर्दापोशी (दोष और अपराध पर दृष्टि न डालना, उन्हें छिपाना) करेगा अल्लाह कियामत के दिन उसकी परदापोशी (क्षमा करना) करेगा।"(मुस्लिम)(द.कु.खंड.3, पृ.1848)

सभी मुसलमानों में एकता, भाईचारा, दोस्ती इस संबंध में कुरान में वचन आए हुए हैं कि :''श्रद्धावान मर्द और श्रद्धावान औरतें आपस में एक दूसरे के सहायक हैं ।''(9:71) यही वचन पूर्व में (8:72) और (49:10) में भी आए हुए हैं। इस आयत के संबंध में मौ. मौदूदी कहते हैं :''सच्चे श्रद्धावान पुरूष और स्त्री मिलकर एक विशिष्ट स्वतंत्र समाज (distinctive community) तैयार होता है, क्योंकि उनमें अनेक गुणविशेष समान होते हैं। वे स्वभाव से ही सदाचारी बने होते हैं; वे दुराचार को निषिद्ध मानते हैं; और एकमात्र अल्लाह का स्मरण यह उनके जीवन की सांस ही होती है... इस समान गुण धर्म के कारण उनमें सामूहिक एकता की भावना निर्मित होती है।'' अर्थात्‌ जिहाद के लिए यह एकता, भाईचारा और दोस्ती बहुत काम आती है। इसे ही वैश्विक मुस्लिम भाईचारा कहते हैंं। इसीलिए संपूर्ण विश्व के मुस्लिमों का जिहाद के लिए आवाहन किया जा सकता है, किया जाता है।

इन्हीं कारणों से सऊदी अरब म्यांमार के हिंसा पीडित मुस्लिमों को 5 करोड डॉलर की सहायता प्रदान कर रहा है तो मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी, असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता बद्रुद्दीन अजमल कांग्रेस के सामने क्रोध प्रकट कर रहे हैं। और आजकल समाचार पत्रों में असम से पलायन कर संदिग्ध बांग्लादेशी मुसलमान देश के विभिन्न शहरों में आ रहे हैं के जो समाचार छप रहे हैं वे घुसपैठिए बांग्लादेशी मुसलमान विभिन्न शहरों का रुख इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि 'उम्मा" की इसी प्रबल भावना और इस्लामिक आदेशों के कारण उन्हें पूरे भारत में आश्रय मिल ही जाएगा। इसके पूर्व भी देश के विभिन्न शहरों में जो बांग्लादेशी मुसलमान घुस आए हैं उन्हें भी इन्हीं कारणों से आश्रय मिला है।

आखिर में यह कहना है कि, मैंने यह लेख किसी धर्म या मजहब के संदर्भ में नहीं लिखा है। परंतु, देश का एक संविधान है जो हिंदू-मुसलमान सभी के लिए एक ही है और इस देश में अमन-शांति चाहनेवालों का यह फर्ज बनता है कि धर्म-मजहब के नाम पर अशांति न फैले यह लोगों को समझाएं। कहा जाता है कि, मुसलमानों में भी अमनपसंद लोग हैं जो अपने समाज की तरक्की चाहते हैं। देश के साथ ईमानदारी बनाए रखने के लिए उनका फर्ज बनता है कि वे अपने समाज को समझाएं, गलत रास्ते पर बढ़ने ना दें। इसी में हिंदू और मुस्लिम दोनो का भला है।  

Wednesday, 8 August 2012

बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ - इस्लामी रणनीति

बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ - इस्लामी रणनीति

इतिहास अपने आपको दोहराता है और जो इतिहास और भूगोल को विस्मृत करते हैं, उसकी उपेक्षा करते हैं उन्हें कालांतर में इसके परिणाम भी भुगतना पडते हैं। उपर्युक्त पंक्तियां लिखने का कारण असम में हो रही बांग्लादेशी मुस्लिमों की सुनियोजित भारी घुसपैठ जो वर्षों से जारी है और जिसके परिणाम भयंकर दंगों के रुप में सामने भी आ रहे हैं और ये घुसपैठ केवल असम तक ही सीमित नहीं है समाचारों के अनुसार ये घुसपैठिये जिनकी तादाद 3 से 4 करोड तक है पूरे भारत में फैले हुए हैं। और जहां भी हैं वहां के स्थानीय लोगों का हक मार रहे हैं, असामाजिक-अपराधिक गतिविधियों में भी संलग्न हैं, इसके भी पर्याप्त सबूत हैं। फिर भी उचित कारवाई के अभाव में भारी घुसपैठ जारी है। इस घुसपैठ के जो भयावह परिणाम होंगे उसके चित्र भी कई विचारक समय-समय पर सामने लाते भी रहते हैं। यह घुसपैठ किस प्रकार हमारे लिए घातक हो सकती है इसके लिए यदि हम इस्लाम का स्वर्णिम काल कहे जानेवाले आदर्श खिलाफतकाल जिसकी स्थापना के लिए ही मुस्लिम आतंकवादियों ने विश्वयापी जिहाद छेड रखा है के पन्नों में झांके तो वह भयावह मंजर स्पष्ट रुप से दिख भी पडेगा।

पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद (इस्लाम) धर्मत्याग का जो दावानल भडका था उसे कुचलने के बाद अरबभूमि में अब एकमेव इस्लाम का झंडा फहरा रहा था और खलीफा अबूबकर के नेतृत्व में सारे भूमिपुत्र यानी कि इस्लामधर्मबंधु (उम्मा) एकसंघ हो गए थे। परंतु, यही स्थिति आगे भी जारी रहेगी इसका कोई विश्वास नहीं था इसलिए अबूबकर ने अरबभूमि के बाहर रोमन और पर्शियन साम्राज्यों पर आक्रमण का निर्णय लिया। अब सवाल यह उठता है कि नगण्य सामर्थ्यवाला यह इस्लामी राष्ट्र अपनी तुलना में बलवान साम्राज्यों से कैसे लड सकता है तो इसके पीछे थी अबूबकर की दृढ़ श्रद्धा (जो कि सभी इस्लमाधर्मियों की रहती है) कि, अल्लाह अपने इस्लाम धर्म की सहायता करेगा और (बाहर की) भूमि और लोगों पर (मुस्लिमों को) विजय प्राप्त करना सुलभ करेगा।

ये दोनो ही साम्राज्य अत्यंत समृद्ध और वैभव के शिखर पर विराजमान थे। वहां की अधिकांश भूमि उपजाऊ थी, वर्षभर नदियां बहती रहती थी, फलों और बागबगीचों की अधिकता थी। इसी कारण से रेगिस्थान के भोजन-पानी के लिए भटकने वाले अरबों के लिए इन साम्राज्यों की भूमि नंदनवन ही थी। यही स्थिति आज निर्धन बांग्लादेशियों की है, रोजीरोटी और जनसंख्या विस्फोट के कारण भूमि की कमी से जूझ रहे बांग्लादेशियों को असम नंदनवन ही लग रहा है और वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए असम-बंगाल में घुसपैठ के साथ-साथ पूरे भारत में ही अवैध रुप से घुसे चले आ रहे हैं।

बहुत पूर्व से ही अरबभूमि से इन साम्राज्यों की ओर अरब स्थानांतरित होते रहे थे इस कारण अरबों की यहां पर्याप्त जनसंख्या थी। यहां स्पष्ट कर देना उचित होगा कि 'अरब" यह संज्ञा अनेक अर्थों में उपयोग में लाई जाती है। अरब यानी अरब वंश का, अरबी भाषा बोलनेवाला, अरब राष्ट्र वाला, रेगिस्थान में भटकनेवाला इतना ही नहीं तो आगे चलकर अरब यानी मुसलमान ऐसा अर्थ लिया जाने लगा संदर्भानुसार योग्य अर्थ चुनना पडता है।

ये यायावर लोग अपने यहां न घुसें इसकी उपाय योजना ये दोनो ही राज्य करते रहते थे। यह स्थानानंतरण कभी शांति से तो कभी वहां के लोगों पर टोली हमलों के रुप में आक्रमक ढ़ंग से होता रहता था और दोनो साम्राज्यों के लोग इन उपद्रवों से त्रस्त थे। फिर भी स्थानीय लोगों को पराजित कर वहां अरब स्थायी हो गए थे। यही स्थिति आज बांग्लादेश से लगे असम के जिलों की है। इस प्रकार से लंबे समय तक चली प्रक्रिया से इन दोनो ही साम्राज्यों में अरबभूमि से लगा अरबों का एक राष्ट्र ही तैयार हो गया था। उनमें से एक बायजंटाईन का मांडलिक राज्य घसान था तो दूसरा था पर्शिया का मांडलिक राज्य हिरा (लखमी लोगों का)। ये दोनो ही राज्यों के बहुसंख्य लोग वंश से 'अरब" तो धर्म से ईसाई थे। जबकि हमारे यहां बांग्लादेश से आ रहे लडाकू घुसपैठिये धर्म से मुस्लिम और राष्ट्र की दृष्टि से इस्लामिक राष्ट्र के नागरिक हैं। यहां यह उल्लेख करना उचित ही होगा कि धर्म का प्रभाव मनुष्य पर बहुत गहराई तक होता है इससे मनुष्य में बहुत भारी मात्रा में बदलाव भी आता है इस बात से महात्मा गांधी भी सहमत थे। वीर सावरकरजी का तो कथन ही है कि 'धर्मांतरण से राष्ट्रांतरण होता है" साथ ही यह भी कि, बांग्लादेश अपनी बेतहाशा बढ़ती आबादी, निर्धनता, भूमि की कमी से त्रस्त है और वहां के कई बुद्धिजीवी इन समस्याओं काहल असम बांग्लादेश का हिस्सा बन जाए के रुप में देखते हैं। इस दृष्टि से भी घुसपैठ की जा रही है जिसे मौन समर्थन भी प्राप्त है। 

इतिहासकारों ने अरबभूमि का जो विभाजन तीन भागों में किया है उसमें से दो भाग इन्हीं मांडलिक राज्यों के हैं और तीसरा भाग वह है जिसे पैगंबर और अबूबकर ने इस्लाममय बनाया था। और महत्वपूर्ण बात यह है कि अरब मुस्लिम इन दोनो ही राज्यों को अरबभूमि का ही भाग समझते थे, वहां के अरब लोगों के प्रति वे वांशिक निकटता का अनुभव करते थे तथा उन्हें लगता था कि उनकी सहायता से उनके मालिकों से युद्ध कर अरबभूमि का विस्तार कर इस्लामी राज्य का आधार विस्तृत कर सकते हैं। अबूबकर का अरबभूमि के बाहर आक्रमण का एक उद्देश्य यह उपर्युक्त भी था।

अबूबकर ने 'अल्लाह की तलवार" उपाधि प्राप्त मुस्लिम सेनापति खलिद के नेतृत्व में हिरा की ओर सेना भेजी। वहां का गवर्नर सेना सहित पर्शिया की राजधानी चला गया। अब शहर की रक्षा करनेवाले ईसाई अरब बचे थे। जिन्होंने शरणागति स्वीकारने से मना कर दिया। वैसे वे पर्शियन सेनापति द्वारा उन्हें बिल्कुल ही असहाय छोडकर चले जाने से नाराज थे। इन ईसाई अरबों के शिष्टमंडल के नेता अदी और खलिद के बीच हुआ संवाद बहुत प्रसिद्ध है -

खलिद ः ''तुम (रक्त से) कौन हो? ः अरब या पर्शियन?""
अदी ः ''हम शुद्ध अरब रक्त के हैं।""
खलिद ः ''अगर तुम कहते हो यह सच है तो तुमने हमें विरोध ही नहीं किया होता या हमारे कार्य से नफरत भी न की होती।""
अदी ः ''शुद्ध अरब रक्त का मनुष्य हमेशा सच ही बोलता है (इसलिए मैं जो बोल रहा हूं सच ही है)
खलिद ः ''हां, तुम सच ही बोल रहे हो। अतः अब तीन में से एक विकल्प चुनोः 1). इस्लाम का स्वीकार करो फिर तुम्हारे और हमारे अधिकार और कर्तव्य समान ही रहेंगे; 2). जजिया दो; अथवा 3). लडने के लिए तैयार रहो। सचमुच मैं तुम्हारे पास ऐसे लोगों को लेकर आया हूं कि जो, तुम जिस प्रकार अपने जीवन से प्रेम करते हो, मृत्यु पर अधिक प्रेम करते हैं।""
अदी ः ''नहीं। हम जजिया देना पसंद करेंगे। हमें हमारे अरब रक्त का गर्व है परंतु, हमारा ईसाईधर्म ही हमें प्रिय है। हम हमारा धर्म छोडकर तुम्हारा धर्म स्वीकार नहीं करेंगे।""  
खलिद ः ''तुम दुर्भाग्यशाली हो! श्रद्धाहीनता का मार्ग रेगिस्थान है। वह विनाश का मार्ग है। वह अरब मूर्ख है जो (सत्य) मार्ग दिखाने आए हुए अरब को छोडकर परायों का मार्गदर्शन स्वीकारता है।""

इसी प्रकार से रोमन साम्राज्य पर आक्रमण के दौरान मुस्लिम सेनापति खलिद और रोमन सेनापति महन के बीच हुई चर्चा भी सबक सीखने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है ः- चर्चा प्रारंभ करते हुए महन ने शिकायत की -

''हे अरब लोगों! हमने तुम्हारे साथ हमेशा ही (पहले से ही) मित्रता का व्यवहार किया है। तुम्हारे देशवासी हमारे देश में स्थानानंतरण करते रहे हैं और इस देश के वे रहवासी बन गए (हमने आपत्ति नहीं ली)। हमें लगा था कि, इस बारे में तुम हमारे कृतज्ञ रहोगे, परंतु अब तुम इस देश पर हमले कर रहे हो और हमें ही यहां से निकाल बाहर करने के लिए प्रयत्नशील हो ... तुमने यहां के लोगों के धर्मस्थलों पर हमले किए हैं; उनकी संपत्ति लूट ली है; उनकी स्त्रियों को भगा ले जाकर गुलाम बना लिया है .... तुम इस पृथ्वी पर सबसे अधिक अज्ञानी और जंगली लोग हो .... अगर तुम शांति से वापिस जानेवाले हो तो, हम तुम्हारे सेनापति को दस हजार, सभी अधिकारियों को हर एक को एक हजार और प्रत्येक सैनिक को सौ दीनार देंगे।""

इस पर खलिद ने उत्तर दिया ः ''तुमने हम पडौसी अरबों के साथ पहले जो उदारता का व्यवहार किया है उसका हमें भान है। परंतु, उसमें उपकार मानने जैसा कुछ भी नहीं है। क्योंकि, अपने धर्म का प्रसार करने के लिए तुम्हारे द्वारा योजित वह नीति थी और इसीके फल के रुप में (तुम्हारे देश में आकर) वे ईसाई हो गए और वे ही आज तुम्हारी ओर से हमारे विरुद्ध लडने खडे हो गए हैं .... तुम पर हमारे हमले का कारण तुम्हीं हो। अल्लाह एकमेव है और मुहम्मद उसके (अंतिम) पैगंबर हैं यह मान्य न करने का तुम्हारा दुराग्रह इसका कारण है ... (हम इधर इसलिए आए हैं कि) अल्लाह ने हमें उसका धर्म सारे संसार को प्रदान करने की आज्ञा दी है। जो यह धर्म स्वीकारता है वह हमारे बंधुसंघ (उम्मा) का भागीदार बनता है। जो इसे नकार देता है उसके द्वारा जजिया दिए जाने पर हम उसको संरक्षण प्रदान करते हैं। इन दोनो ही बातों को नकार देनेवाले के लिए विकल्प यह तलवार है!""

यदि उक्त घटनाक्रम को आज भारत के संदर्भ में देखें तो बदलाव इतना भर होगा कि, खलिद कहेगा हमारे लोगों को तुमने आश्रय दिया, मुस्लिम भी रहने दिया होगा परंतु उसमें तुम्हारे उपकार मानने जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि, यह तुमने उन्हें सत्य मार्ग यानी इस्लाम के मार्ग से विचलित करने के लिए किया है। और हमारे आक्रमण का कारण भी तुम्हीं हो क्योंकि, तुम एकमेव अल्लाह को मानने की बजाए शिर्क (अनेकेश्वरवाद) में मुब्तिला हो, शिर्क के अपराधी हो और इस्लामी मान्यता के अनुसार शिर्क सबसे बडा अपराध है।

यह ठीक है कि आज परिस्थितियां बदल गई हैं और उपर्युक्त प्रकार का आक्रमण संभव नहीं और बांग्लादेश द्वारा भारत पर आक्रमण असंभव सा ही है। परंतु, सारे विश्व को इस्लाममय बनाने की इसके लिए अल्लाह की सहायता प्राप्त होगी, इस्लाम सारी दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाकर रहेगा ही के अल्लाह द्वारा दिए हुए आश्वासन और इसके लिए 'अपने आसपास के काफिरों से लडे जाओ" की आज्ञा तो यथास्थान ही है ना। जिसे मुस्लिम सत्य भी मानते हैं। और इसके लिए रणनीति के रुप में अब संख्याबल का सहारा लिया जा रहा है। घुसपैठ कर किसी क्षेत्र विशेष में अपनी आबादी बढ़ाकर, दूसरों को दंगे कर, आतंकित कर खदेड दो की रणनीति अपनाई जा रही है। लेकिन खेद है कि हमारे नेतृत्वकर्ताओं तथाकथित उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, मानवतावादीयों और वोट बैंक की बढ़ौत्री चाहनेवालों को यह धोखा नजर ही आ नहीं रहा है।

Friday, 3 August 2012

धर्म मजहब रुपी फूले

धर्म मजहब रुपी फूले

वीर सावरकरांनी हिंदूधर्माला 'धर्मसमुच्चय" म्हटले आहे. सावरकरांच्या म्हणण्यानुसार हिंदूधर्म हे नाव कांही कोणा एका विशिष्ट धर्माचे अथवा पंथाचे विशेष आणि अनन्य नाव नसून ज्या अनेक धर्मांची आणि पंथांची ही भारतभूमि पितृभूमि आणि पुण्यभूमि आहे त्या सगळ्यांचा समावेश करणाऱ्या धर्मसंघाचे हिंदूधर्म हे सामुदायिक अभिधान आहे.

वीर सावरकरांच्या 'हिंदू"च्या व्याख्येप्रमाणे 'आसिंधू-सिंधू पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः। सावरकरांची 'हिंदू" शब्दाची ही व्याख्या अतिव्याप्ति आणि अव्याप्ति ह्या दोन्ही प्रकारच्या दोषांपासून मुक्त आहे. ह्या व्याख्येप्रमाणे वैदिक धर्मानुयायी, शीख व भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राम्होसमाजी, गिरीजन, वनवासी इत्यादींचा समावेश 'हिंदू"त होतो. चीनी बौद्धांचा समावेश हिंदूत होत नाही. कां की हिंदुस्थान जरी त्यांची पुण्भू असली तरी पितृभूमि नाही. मुसलमान, ख्रिस्ती, पारशी, ज्यू यांचा समावेश अर्थात्‌च हिंदूत होऊ शकत नाही.

सावरकरांच्या या धर्मसमुच्चयाचे प्रतीक आहे झेंडूचे फूल जे धार्मिक आणि सामाजिक कार्यात विपुलतेने उपयोगात आणले जाते. झेंडूच्या फूलाचा पुष्पकाळ येतो भाद्रपद महिन्यात आणि दसरा-दिवाळी मध्य सारे धार्मिक विधि झंडूमय होऊन जातात. तरी देखील झंडूचे फूल संपूर्ण भारतात वर्षभर उपलब्ध असते.

वनस्पतीशास्त्रानुसार झंडूचे फूल एस्टेरेसी वनस्पतीचे फूल असून त्याची विशेषता ही आहे की त्यांस तोडून त्याच्या पाकळ्यांना पण आपण देवास अर्पण करु शकतो. याच्या उलट धोत्रा, मोगरा, कण्हेर बरोबर आपण असे करु शकत नाही. याचे कारण हे आहे की सर्वसाधारणांस जरी हे एक फूल भासत असले तरी ते एक फूल नसून त्यांत अनेक फूले एक समूहात जोडलेले असतात. या फूलांच्या गुच्छ्‌यास इंफ्लोरेसेंस म्हणजे पुष्पक्रम म्हटले जाते. हे पुष्पक्रम या प्रकारे जोडलेले असतात की आमच्या दृष्टिस ते एक फूलच वाटते.

हे हिंदूधर्मसमुच्चय रुपी भगवा-केशरी-पिवळ्या रंगाचे झेंडू नैसर्गिक रुपातच हातात टाकून एकाच मातेच्या उदरातून प्रसवलेल्या म्हणजे सख्ख्या भाऊंन सारखे पुष्पक्रम असेना कां परंतु, व्यवहारिक जीवनात अबोली सारखे नाजुक नसून एक टिकून राहणाऱ्या गुणाचे, सहजच न कोमजणारे म्हणजे सरळतेने न चेंचणें जाणारे फूल आहे. ठीक त्याचप्रमाणे जसे आमचा हिंदूधर्म जो कित्येक परचक्रांना झेलून देखील समाप्त झाला नाही, टिकलेला आहे, अनादि आहे, अनंत आहे, सनातन आहे. याच प्रकारे झेंडूचे फूल पण सगळ्यात आधी कोठे उमळले? कोठ पर्यंत उमळत राहणार आहे! अशा प्रकारचे प्रश्न निरर्थक असून ते पण अनादि आहे, अनंत आहे.

झेंडूचे फूल जे फूलांचा समुच्चय आहे च्या सगळ्यात बाहेर हिरव्या पाना सदृश्य रचनेनी बनलेली कपा सारखी रचना असते, जिस इन्वाल्यूकर म्हणतात. ही रचना या फूलांना एकजुट ठेवण्याचे काम करते. अचूक त्याच प्रमाणे ज्या प्रमाणे की, हिंदुत्व. जो हिंदूधर्मसमुच्चयाच्या धर्मांना एक रचनेत ठेवतो, जोडून ठेवतो आणि जसे इन्वाल्यूकरला जर का तोडून दिले गेले किंवा या फूलांना इन्वाल्यूकर पासून वेगेळे करुन दिले गेले तर हा पुष्पसमूह हळू-हळू विखरुन जाईल. तसेच जर कां या हिंदुत्वास नष्ट-भ्रष्ट करुन दिले गेले किंवा आम्हीं त्यांस सोडून दिले, आम्हांस त्यापासून वेगळे करुन दिले गेले तर, हे सारे भारतोद्‌भव धर्म जे या धर्मसमुच्चयाचा भाग आहे विखरुन जातील आणि परिणाम ....

झेंडूच्या बाहेरील परिघात जे किरण पुष्पक असतात, त्यांत सूर्य किरणांचा भास होतो, वरपांगी असतात. जर कां ते नसते तर झेंडूने आपली सर्व सुंदरता गमावली असती. उपर्युक्तांची तुलना हिंदूधर्माशी या प्रकारे केली जाऊ शकते की, जे किरण पुष्पक आहेत ते आमच्या धर्मसमुच्चयाचे धर्म विचारांचे प्रतीक आहेत जे पूर्ण विश्वाला सूर्या सारखे आलोकित करित आहेत, प्रेरणा देत आहेत, मार्गदर्शन करित आहेत. या सूर्यप्रकाशाला पसरविण्या करिता प्राचीनकाळात आमचे पूर्वज ऋषि, मुनि, धर्मप्रचारक बाहेर पडले आणि आपल्या ज्ञानानी संपूर्ण विश्वाला आलोकित केले.

झेंडूच्या केंद्रात डिस्क पुष्पक असतात. यांत पाकळ्या आणि अंकुर असतात या बरोबरच नर-मादा जननांग देखील. हे पूर्ण पुष्प असतात आणि वंशवृद्धि करतात. या झेंडू सारखेच आमच्या धर्मसमुच्चयाच्या केंद्रात आहे आमची परधर्म सहिष्णुता, सगळ्या धर्मांच्या धार्मिक स्वतंत्रतेची मान्यता. ज्यानुसार सगळ्यांना आप-आपल्या धर्मपालनाची स्वतंत्रता त्याच्या केंद्रात आहे आमची ही मान्यता -

1). 'आकाशात्‌ पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्‌। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति।। अर्थात्‌ आकाशातून पडलेले (पावसाचे) पाणी (नद्यांद्वारे) समुद्रात जाऊन मिळते, त्याप्रमाणे कोणत्याही देवाला केलेला नमस्कार केशवास जाऊन पोचतो. 2). न देवो विद्यते काष्ठे, न पाषाणे, न मृण्मये। भावे हि विद्यते देवः, तस्माद्‌ भावो हि कारणम्‌।। अर्थात्‌ देव हा लाकडात, दगडात किंवा मातीत (म्हणजे त्यांनी बनविलेल्या मूर्तीत) नसतो. देव हा भक्तिभावातच असतो. 'देव भावाचा भुकेला", 'भाव तोचि भगवंत।" म्हणून भक्तिभाव हेच उपासनेचे कारण होय. 3). श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैव अवधार्यताम्‌। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचेरत्‌।। अर्थात्‌ धर्मात जे काय आहे ते सारे ऐका आणि ऐकून लक्ष्यात ठेवा - 'आपल्याला ज्या गोष्टी प्रतिकूल म्हणजे दुःख देणाऱ्या असतील त्या इतरांच्या बाबतीत आचरु नयेत, लोकांनी आपणास जे करु नये असे आपल्याला वाटते, तसे आपण दुसऱ्याला करु नये. जसे आपण तसे इतर, ही आत्मौपम्य दृष्टी, हे धर्माचे सार होय.  

ह्या शिकवणीमुळेच आमच्या येथे एकाच कुटुंबात शैवांच्या शिवाची तर वैष्णवांचा देव विष्णुच्या अन्य अवतारांची पूजा-उपासना एकाच वेळेस एकमेकांबरोबर केली जाऊ शकते, केली जाते. एकाच कुटुंबातील सभासद वेग-वेगळ्या धर्माचे पालन करु शकतात. कोठे ही कशाही प्रकारची कोणतीही बाधा आणली जात नाही. हिंदूधर्मात झालेले अनेकविध धर्मप्रवर्तक, ऋषि, मुनि, अवतार, धर्मवीर, हुतात्म्यांनी याच उदात्त परंपरांना पुढ़े वाढ़विले, क्षरणापासून रोखले, रक्षा केली, धार्मिक-सामाजिक क्षेत्रांशी संबंधित वेगवेगळ्या विचारांना पुढ़े पसरविले, दृढ़ता दिली, त्यांत सुधार करुन वृद्धि केली, गौरव दिला.

ह्या मुळेच स्वतःच्या देशात त्रस्त आणि पीडल्या गेल्या मुळे पलायन करुन आलेल्या ज्यू आणि पारशी धर्मांना पण आमच्या येथे आश्रय मिळाला. फळफळण्याची संधि मिळाली. हेच वैशिष्टय झेंडूच्या फूलाचे पण आहे. झेंडूच्या फूलावर जेव्हा कोणी फूलपाखरु किंवा मधमाशी सारखे बाहेरील सभासद येतात तेव्हा त्यांना मकरंदाच्या रुपात थोडे-थोडे प्रेम सगळ्या फूलांकडून मिळते व खूप फळफळण्याचा आशीर्वाद देखील. झेंडूच्या फूलाच्या पाकळ्या छोट्या-मोठ्या, टोकदार, पसरट असतात तसेच लहान-मोठ्या, तीक्षण टोचणाऱ्या इत्यादी सगळ्या प्रकारच्या धर्मविचारांना, त्यांच्या प्रवर्तकांना आमच्या येथे स्थान मिळालेले आहे आणि ज्या प्रकारे झेंडूच्या फूलाचे रोपटे सगळ्या फूलवाल्या रौपट्यांमध्ये सगळ्यात मोठे व विकसित कुळ आहे त्याच प्रकारे सगळ्या धर्मात हिंदूधर्म सगळ्यात प्राचीन, सनातन, उदात्त आणि विकसित आहे.

याच श्रंखलेत एक फळ संत्रे पण येते. ज्याचे वरील कडक, लवचिक, आकर्षक चमकदार साल हिंदुत्वा सारखेच आहे ज्याकडे सगळेच आकर्षित होतात. तसेच जेव्हा वीर सावरकरांचे हिंदुत्व दर्शन सगळ्यांसमोर आले तेव्हा त्याच्या प्रकाशाने सगळ्यांचे डोळे दिपले. स्वामी श्रद्धानंद, महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, संघसंस्थापक डॉ. हेडगेवार सारखी लोक आकर्षित आणि प्रभावित झाली होती.

संत्र्याच्या आतील रसदार गर जो फोडींच्या रुपात असतो त्या फोडी हिंदूधर्मसमुच्चयात सामील विभिन्न धर्मां सारख्या आहेत तथा त्या फोडींमध्ये भरलेला रुचकर रस हिंदुधर्मसमुच्चयाचे तत्त्वपूर्ण धर्मविचार आहेत. रसदार गरा मध्ये उपस्थित कडक बिंया हिंदुधर्मसमुच्चयाचे विभिन्न धर्मांचे धर्मप्रवर्तक, विचारक, समाजसुधारक महापुरुष आहेत ज्यांनी त्या धर्माला श्रेष्ठता कष्ट सहन करुन अडचणींचा सामना करुन दिली. समाजाच्या हिता करिता त्यांच्या विचारांचा हार न मानता प्रचार-प्रसार केला.

संत्र्याच्या फोडींच्या वरील पातळ आवरणरुपी साल प्रत्येक भारतोद्‌भव धर्माला दुसऱ्या भारतोद्‌भव धर्मापासून वेगळे करण्याचे विरळ से आवरण मात्र आहे आणि मुख्य आवरण तथा या झिरझिरीत आवरणाच्या मधील वरील तंतु त्या सगळ्या विभिन्न धर्मरुपी फोडीं आपसात आणि मुख्य आवरण हिंदुत्वाशी पण जोडून ठेवण्यात सहायक सिद्ध होणारे सर्वसाधारण सण-वार, रीति, परंपरा आहेत. ज्या सगळ्यांच्या सर्वसाधारण मान्यतांच्या एकतेला दर्शविण्या बरोबरच हे पण दर्शवितात की, ते एकाच बीजापासून उत्पन्न झालेल्या हिंदुत्वरुपी वृक्षाच्या शाखा आहेत.

आता आम्ही त्या हिंदुत्वावर येतो ज्याचे यशगान इतक्या वेळापासून आम्ही गात आहोत जे सगळ्या भारतोद्‌भव धर्मांना जोडून आहे. हिंदुत्वाचे दर्शन देणारे हिंदूराष्ट्राचे उद्‌गाते वीर सावरकरांप्रमाणे - हिंदू या शब्दापासून इंग्रजी मध्ये 'हिंदुइझम" (हिंदूधर्म) हा शब्द बनविला आहे. त्याचा अर्थ हिंदू लोक ज्या धर्ममतांना वा मार्गांना अनुसरतात ती धर्ममते वा मार्ग. जेव्हाकि हिंदुत्व हा हिंदूधर्मापेक्षा अधिक संग्राहक शब्द आहे. हिंदूधर्म या शब्दाप्रमाणे हिंदूंच्या केवळ धार्मिक अंगाचाच त्यात समावेश होत नसून त्यात हिंदूंच्या सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक व राजकीय अंगाचाही समावेश होतो. येथेच हे सांगणे ही योग्य ठरेल की, पैगंबर महंमदाच्या जन्मापूर्वी नव्हे तर अरब हे एक 'लोक" म्हणून ओळखले गेल्यापूर्वी हे प्राचीन राष्ट्र आपणाकडून व इतरांकडून सिंधू वा हिंदू ह्या स्वाभिमानी नावाने ओळखले जात होते. अरबांनी सिंधू नदीचा शोध लावला हे म्हणणे जितके खरे तितके अरबांनी ह्या शब्दाचा शोध लावला हे म्हणणे आहे.

हिंदू शब्द मूलतः देशवाचक, राष्ट्रवाचक आहे. याचे मुख्य अधिष्ठान आसिंधु-सिंधू अशी ही भारतभूमिका आहे. 'आसिंधूसिंधू"  अशा त्या भारतभूमिकेत अत्यंत प्राचीनकाळापासून ज्यांचे पूर्वज परंपरेने निवसत आले, ज्या राष्ट्रात प्रचलित असलेली सांघिक संस्कृति, घडलेला इतिहास, बोललेल्या भाषा, अनुसरलेले धर्म; ज्यांची संस्कृति, इतिहास, भाषा, धर्म आहेत ते सारे हिंदू होत. त्या हिंदूराष्ट्राचे घटक होत. वैदिककाळापासून निदान पाच सहस्त्र वर्षे तरी आपले पूर्वज आपल्या लोकांचा धार्मिक, वांशिक, सांस्कृतिक नि राजकीय दृष्ट्या एकात्म असा गट घडवून आणित होते त्या क्रियेला स्वाभाविकपणे विकास पावता-पावता जे फळ आले ते म्हणजे वैदिककाळातील त्या सिंधूचेच आज संबंध हिंदुस्थानभर पसरलेले आणि हिंदुस्थानालाच आपली एकमेव पितृभू व पुण्यभू मानीत असलेले असे हिंदूराष्ट्र होय.

सावरकरांच्या या हिंदूराष्ट्राचा व हिंदूधर्माचा जरा देखील संबंध नाही. त्यांच्या बुद्धिवादी दृष्टिकोणानुसार ते 'हिंदू लोकांचे न्याय्य अधिकार सुरक्षित ठेवणारा राष्ट्र याप्रकारचा व्यापक अर्थ घेतात." त्यांच्या हिंदूराष्ट्राचा दुसरा अर्थ बहुसंख्य लोकांचे राष्ट्र. या अर्थानी  'बहुसंख्यकत्वच राष्ट्रीयत्व आहे," याप्रकारचा लोकतांत्रिक सिद्धांत ते प्रस्तुत करतात. हिंदू बहुसंख्यक असल्यामुळेच हिंदुत्वच बहुसंख्यकत्व आहे, असे त्यांचे म्हणणे आहे. याच अर्थाने 'हिंदुत्व हेच राष्ट्रीयत्व आहे," अशा प्रकारचा सिद्धांत ते प्रस्तुत करतात.  या सिद्धांताचा अर्थ अहिंदुंना राष्ट्रीयत्व नाही असा होत नाही. अहिंदू अल्पसंख्य आहेत इतकीच वस्तुस्थिति दाखवून देणे या सिद्धांताचे काम आहे. बहुसंख्यकांना अल्पसंख्य बनविणे राष्ट्रीयत्वाच्या विरोधात आहे, हे प्रखरपणे दाखवून देण्याकरिता या सिद्धांताला प्रस्तुत केले गेले आहे. पुनश्च या हिंदुत्वाचा हिंदूधर्माशी कोणत्याही प्रकारच संबंध नाही।

दुसरीकडे मध्यपूर्वात जे मजहब उमळले, विकसित झाले ते वनस्पतीशास्त्राच्या घुंगुर मोगरा (जास्मिन सॅमबॅक) फूला सारखे होते. मोगऱ्याचे फूल ओलेसिया कुळाचे मानले जाते. घुंगुर मोगरा फूलाची रचना एकात एक ठेवलेल्या पेल्या सारखी असते. चळतीतून एक पेला काढ़ला की जसे स्वतंत्र पेला असतो तसेच मूळ ज्यू धर्मातून निघालेला ख्रीस्ती रिलीजन वेगळा म्हणजे स्वतंत्र असतो. याप्रकारेच त्याच चळतीतून निघालेला इस्लाम सुद्धा त्याप्रकारेच न केवळ वेगळा आणि स्वतंत्रच होत नाही तर पूर्वीच्या धर्मांशी जणू भयंकर शत्रुतेचेच नाते ठेवतो. म्हणूनच म्हणावे लागत आहे की शेवटच्या प्रेषितांच्या इस्लाम मजहबची ही उत्पत्ति आज मात्र त्याच मूळ मोगरा (जास्मिन सॅमबॅक) फूलाशी सारे संबंध तोडून पूर्णपणे कुळ बदलून कण्हेरीचे गुणधर्म घेऊन बसली आहे. संस्कृत भाषेचा कर्णिकार, इंग्रजीचा ओलिएंडर आणि वनस्पतीशास्त्रानुसार थेवेशिया नेरीफोलियाच्या रुपात ओळखली जाणारी ही वनस्पती म्हणजे केवळ कण्हेर पुष्पच नाही तर त्याची सारी अंगेच विषारी आहेत. इथपर्यंत की, असे म्हटले जाते की त्याच्या जवळपास साप देखील फटकत नाही. वनस्पतीशास्त्रानुसार हा विषारी पदार्थ ग्लाइकोसाईडच्या रुपात असतो. एकूण रोपाच्या अंग-अंगातून निघणारा दुधा सारखा रस (मिल्की लेटेक्स), रोपाचे मूळ, बीं सगळे काही विषारी, इतकच नव्हे तर त्याच्या फूलाला जास्त वेळ हुंगणे देखील घातक तर रोपाला जाळल्यावर निघणारा धूर सुद्धा आरोग्यावर प्रतिकूल प्रभाव टाकणारा मानला जातो. तर आता कालाय तस्मै नमः म्हणून शांत बसायचे की .........