Sunday, 3 June 2012

दो संस्कृतियां - दो परंपराएं

दो संस्कृतियां - दो परंपराएं

इस देश में वैसे तो अनेक सम्राट हुए हैं, कई इतिहास में अजर - अमर हो गए तो कई समय के प्रवाह के साथ विस्मृति के गर्त में समा गए। परंतु, दो सम्राट इस देश में ऐसे भी हुए हैं जो अपने पुत्रों के कारण इतिहास में हमेशा याद किए जाते रहेंगे। इन दोनो के ही चार पुत्र थे। ये दोनो ही अपने बडे पुत्रों को राजगद्दी सौंपना चाहते थे। परंतु, सौंप न सके। एक सम्राट के पुत्रों ने अपने अनुकरणीय आचरण के जो कीर्तिमान स्थापित किए उसके कारण वे विश्व के लिए ज्योति-स्तंभ समान हैं जो पूरे विश्व को आलोकित कर रहे हैं और जब तक यह दुनिया रहेगी तब तक उनकी यशोगाथा गाई जाती रहेगी।

यह सम्राट थे महाराजा दशरथ जो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का राजतिलक करना चाहते थे, परंतु अपने दिए हुए वचनों में बंधकर  रह गए और उन्हें अपने इस ज्येष्ठ पुत्र को चौदह वर्ष के वनवास की आज्ञा देनी पडी जिसे श्रीराम ने स्वीकारा और अपने माता-पिता सहित रानी मांओं के चरण स्पर्श कर राजमहल का ऐश्वर्य त्यागकर वनगमन के लिए सिद्ध हो गए। उनके साथ उनकी नवविवाहिता पत्नी देवी सीता भी अपने आभूषणों, राजसी वस्त्रों को त्यागकर अपने आराध्य पति के साथ वन को प्रस्थित हो गई साथ ही श्रीराम के लघु भ्राता लक्ष्मण भी अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्रति आदर-भक्ति और अतिस्नेहवश उनके साथ वन के लिए निकल पडे। और महाराजा दशरथ ने अत्यधिक शोक से विकल होकर प्राण त्याग दिए।

इधर रानी कैकयी जिसने अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी मांगी थी उस भरत ने जो उस समय अपने ननिहाल में थे आने पर संपूर्ण परिस्थिति को जान अत्यंत दुखी हो अपने भाइयों और वंदनीय भाभी को लौटाने हेतु उनकी खोज में निकल पडे। जिससे कि वे श्रीराम का वरद्‌हस्त अपने सिर पर रखवा सकें, राजसिंहासन पर सत्तारुढ़ हों इसके लिए मना सकें।

परंतु, श्रीराम ने भरत की विनती को यह कहकर ठुकरा दिया कि, पिता दिवंगत हो गए तो क्या आज्ञा तो विद्यमान है। लघु भ्राता भरत भी कुछ कम न थे उन्होंने कह दिया कि, पिता के पश्चात आप ही तो हैं जो मुझे दिशा-निर्देश दे सकते हैं अतः अब आप ही की आज्ञा मुझे शिरोधार्य है मैं राजसिंहासन पर कदापि न बैठूंगा। आप अपनी पादुकाएं मुझे दीजिए मैं उन्हें ही सिंहासन पर रख राज्य-शासन का संचालन करुंगा और आपने वन से पुनरागमन की अपलक प्रतीक्षा करता रहूंगा और ऐसा ही हुआ भी  और जब श्रीराम वापिस लौटे तो भरत ने उन्हें राजसिंहासन समर्पित कर दिया, समस्त प्रजाजनों ने दीप जला उनका स्वागत किया।

दूसरे राजा हुए शाहजहां। इनके भी चार पुत्र थे। बडे बेटे दाराशिकोह को शाहजहां अपना तख्त (राजसिंहासन) सौंपना चाहते थे पर सौंप न सके। वह औरंगजेब के हाथों मारा गया, दूसरा भाई मुराद जिसे जैसेही पता चला कि बादशाह शाहजहां बीमार है उसने खुद को बादशाह घोषित कर दिया। अपने नाम का खुत्बा और सिक्का भी जारी कर दिया। और सेना एकत्रित कर दिल्ली की ओर राजसिंहासन पर कब्जा जमाने के लिए चल पडा। लेकिन औरंगजेब ने चालाकी से उसकी हत्या कर दी। तीसरा भाई शुजा भाग गया और औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को कैद में डाल इतना कष्ट दिया कि, शाहजहां को लिखना पडा -

ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी, पिदरे जिन्दा जि आव तरसानी। आफरी हिन्दुआनि वहरा याब। मुरदगां श दिहन्द दायम आब। (ऐ बेटे तू अजब मुसलमान है कि जीवित पिता को पानी के बिना तरसा रहा है ! धन्य है वे हिन्दू जो अपने दिवंगतों (बाप-दादों) को भी जलांजलियां देते रहते हैं !)

एक ओर रघुकुल की आदर्श संस्कृति, परंपरा 'रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई" जिसका बखान पूरा विश्व करता है और इधर यह औरंगजेबी धोखाधडी, चालाकी से भरी क्रूर परंपरा। यह संस्कृति-परंपरा जिसका प्रदर्शन औरंगजेब ने किया कहां से आई ? तो, यह आपस में मारकाट, धोखाधडी, छल-कपट की संस्कृति, परंपरा तो उसे विरासत में ही मिली थी। इसी शाहजहां ने राजगद्दी पाने के लिए अपने पिता से विद्रोह किया था, अपने भाई खुर्रम को विष देकर मरवा दिया था जब वह दक्षिण अभियान पर शाहजहां के साथ गया था। अपनी दादीमां नूरजहां को हथकडियों, बेडियों से जकडवा दिया था। अपने राज्याभिषेक के समय दानियाल के पुत्र तथा खुसरों के पुत्र दावरबख्श और करशासब का वध करवा दिया था। बनारस और मथुरा के मंदिर तुडवा दिए थे। ये दोनो बाप-बेटे जिस इस्लाम के अनुयायी हैं उस इस्लाम के खिलाफत का इतिहास उठाकर देखें तो वह इसी प्रकार के खूनखराबे का ही इतिहास है।

इस शाहजहां में चंगेजखान और तैमूरलंग जैसे खूंखार आतंकवादियों का खून दौड रहा था। इसने हिंदुओं द्वारा मुस्लिम दास रखने पर पाबंदी लगा दी थी। कोई हिंदू तभी अपना पिता की संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त कर सकता था जब वह इस्लाम स्वीकार ले। उसने हिंदुओं के धर्मांतरण के लिए पृथक विभाग खोल रखा था। और इसी इतिहास को ही तो औरंगजेब ने और भी बढ़ चढ़कर दोहराया था। इस प्रकार का यह अंतर है दो संस्कृतियों-दो परंपराओं का। जो कभी मिटेगा इस बारे में शंका ही है।  
  

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