Sunday, 27 May 2012

धर्म मजहब रुपी फूल

धर्म मजहब रुपी फूल

वीर सावरकरजी ने हिंदूधर्म को 'धर्मसमुच्चय" कहा है। सावरकरजी के अनुसार 'हिंदूधर्म" यह नाम किसी एक विशिष्ट धर्म का अथवा पंथ का विशेष और अनन्य नाम न होकर जिन अनेक धर्मों की और पंथों की यह भारतभूमि ही पितृभूमि और पुण्यभूमि है उन सभी का समावेश करनेवाले धर्मसंघ का हिंदूधर्म यह सामुदायिक अभिधान है।

वीर सावरकरजी की हिंदू की व्याख्या के अनुसार 'आसिंधु-सिंधु-पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः।। जो अतिव्याप्ति और अव्याप्ति इन दोनो ही प्रकार के दोषों से मुक्त है। इस व्याख्या के अनुसार वैदिक धर्मानुयायी, सिक्ख और भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राह्मो समाजी, गिरिजन, वनवासी आदि का समावेश 'हिंदू" में होता है। चीनी बौद्धों का समावेश हिंदुओं में नहीं होता। क्योंकि, हिंदुस्थान उनकी पुण्यभूमि होने पर भी पितृभूमि नहीं। मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी इनका समावेश अर्थात्‌ ही हिंदुओं में हो नहीं सकता। उनके इस धर्म समुच्चय का प्रतीक है धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों में बहुतायत से उपयोग में लाया जानेवाला 'गेंदा" फूल। गेंदे का पुष्पकाल भाद्रपद महीने में आता है और दशहरा-दीवाली मध्य सारे धार्मिक विधि गेंदामय हो जाते हैं तो भी यह वर्षभर भारत में सर्वत्र पाया जाता है।

वनस्पति शास्त्रानुसार गेंदे का फूल एस्टेरेसी वनस्पति का पुष्प होकर इसकी विशेषता यह है कि, इसे आप तोडकर इसकी पंखुडियों को भी भगवान पर चढ़ा सकते हैं जबकि ऐसा धतूरा, मोगरा, कनेर के साथ नहीं कर सकते। इसका कारण यह है कि हम सामान्यजनों को भले ही यह एक फूल लगता हो लेकिन यह एक फूल न होकर उसमें अनेक फूल एक समूह में जुडे हुए होते हैं। इन फूलों के गुच्छे को इंफ्लोरेसेंस यानी पुष्पक्रम कहा जाता है। यह पुष्पक्रम इस प्रकार से जुडे हुए होते हैं कि, हमारी दृष्टि को वह एक फूल ही लगते हैं।

यह हिंदूधर्म समुच्चय रुपी भगवा-केसरिया-पीले रंग का गेंदा फूल प्राकृतिक रुप से ही हाथों में हाथ डालकर एक ही माता के उदर से प्रसव हुए यानी सहोदर जैसा पुष्पक्रम भले ही हो परंतु, व्यवहारिक जीवन में लालकटसरैया (अबोली) सा कोमल न होकर एक टिकने के भाव या गुणवाला, सहज ही न मुरझानेवाला यानी सरलता से न कुचले जा सकनेवाला फूल है। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से हमारा हिंदूधर्म जो अनेकानेक परचक्रों को झेलने के बाद भी समाप्त नहीं हुआ, टिका हुआ है। अनादि है, अनंत है, सनातन है। इसी प्रकार से गेंदे का फूल भी सबसे पहले कहां खिला? कब तक खिलते रहेगा ! इस प्रकार के प्रश्न निरर्थक होकर वह भी अनादि है, अनंत है।

गेंदा फूल जो फूलों का समुच्चय है के सबसे बाहर हरी पत्तीनुमा रचना से बनी कपनुमा रचना होती है, जो इन्वाल्यूकर कहलाती है। यह रचना इन फूलों को एकजुट रखने का कार्य करती है। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से कि, हिंदुत्व जो हिंदूधर्म समुच्चय के धर्मों को एक रचना में बनाए रखता है, जोडकर रखता है और जिस प्रकार से इन्वाल्यूकर को यदि तोड दिया जाए या इन फूलों को इन्वाल्यूकर से अलग कर दिया जाए तो यह पुष्प समूह धीरे-धीरे बिखर जाएगा उसी प्रकार से यदि इस हिंदुत्व को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाए या हमने उसे छोड दिया, हमें उससे अलग कर दिया गया तो, ये सारे भारतोद्‌भव धर्म जो इस धर्मसमुच्चय का भाग हैं बिखरकर रह जाएंगे और परिणाम !......

गेंदा फूल के बाहरी घेरे में किरण पुष्पक होते हैं, जो सूर्य की किरणों का आभास देते हैं, दिखावटी होते हैं। इसके न होने से गेंदा अपनी सारी सुंदरता खो देता है। उपर्युक्त की तुलना हिंदूधर्म से इस प्रकार की जा सकती है कि, जो किरण पुष्पक हैं वे हमारे धर्मसमुच्चय के धर्म विचारों के प्रतीक हैं जो पूरे विश्व को सूर्य के समान आलोकित कर रहे हैं, प्रेरणा दे रहे हैं, मार्गदर्शन दे रहे हैं। इसी सूर्य प्रकाश को फैलाने के लिए प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज ऋषि, मुनि, धर्मप्रचारक बाहर निकले और अपने ज्ञान से पूरे विश्व को आलोकित कर दिया।
गेंदे के केंद्र में डिस्क पुष्पक लगे होते हैं। इनमें पंखुडियां और अंखुडियां होती हैं और नर-मादा जननांग भी। ये पूर्ण पुष्प होते हैं और वंश को आगे बढ़ाते हैं। इस गेंदे के समान हमारे धर्म समुच्चय के केंद्र में है हमारी परधर्म सहिष्णुता, सभी धर्मों की धार्मिक स्वतंत्रता की मान्यता। जिसके अनुसार सभी को अपने-अपने धर्मों के पालन की स्वतंत्रता जिसके केंद्र में है हमारी यह मान्यता -

1). 'आकाशात्‌ पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्‌। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति।। अर्थात्‌ जिस प्रकार से आकाश से गिरा (वर्षा का) पानी समुद्र की ओर जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को किया हुआ नमस्कार उसी केशव (यानी परमेश्वर) को जाता है।" सारे धर्म-पंथ ईश्वर की ओर जाते हैं। 'ममैव वर्त्म अनुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ, सर्वशः। (श्रीमद्‌भगवद्‌गीता, अ.4-श्लोक 11) 2). 'न देवो विद्यते काष्ठे, न पाषाणे, न मृण्मये। भावे हि विद्यते देवः, तस्माद्‌ भावो हि कारणम्‌।।' अर्थात्‌ ईश्वर लकडी में, पत्थर में अथवा मिट्टी (यानी उससे बनाई हुई मूर्ति) में नहीं होता। ईश्वर का वास तो भक्तिभाव में ही होता है। 3). श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैव अवधार्यताम्‌। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचेरत्‌। अर्थात्‌ धर्म का सार सुनो और सुनकर ध्यान में रखो - 'अपने लिए जो प्रतिकूल है यानी दुखदायी है वह आचरण अन्य लोगों के साथ भी न करें, लोगों द्वारा अपने साथ जो नहीं किया जाना चाहिए ऐसा अपने को लगता है वैसा अपन भी दूसरों के साथ न करें। जैसे अपन वैसे अन्य, यह आत्मौपम्य दृष्टि, यही धर्म का सार है।

इसी कारण से हमारे यहां एक ही परिवार में शैवोंके शिव तो, वैष्णवों के भगवान विष्णु के अन्य अवतारों की एक साथ पूजा-आराधना की जाती है। एक ही परिवार के सदस्य विभिन्न धर्मों का पालन स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं। कहीं किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं की जाती। हिंदूधर्म में हुए विभिन्न धर्मप्रवर्तकों, ऋषियों, मुनियों, अवतारों, धर्मवीरों, हुतात्माओं ने इन्हीं उदात्त परंपराओं को आगे बढ़ाया, क्षरण से रोका, रक्षा की, धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र से संबंधित विभिन्न विचारों को आगे बढ़ाया, दृढ़ता प्रदान की, उनमें सुधारकर बढ़ौत्री की, गरिमा प्रदान की।
 
इसी कारण से हमारे यहां अपने देश से त्रस्त और पीडित होने के कारण पलायन कर आए यहूदी और पारसी धर्मों को भी हमारे यहां आसरा मिला, फलने-फूलने का अवसर प्राप्त हुआ। यही विशेषता गेंदा फूल की भी है। गेंदा फूल पर जब कोई बाहरी सदस्य जैसे तितली या मधुमक्खी एक बार आती है तो मकरंद के रुप में थोडा-थोडा प्यार सभी फूलों से पाती है और खूब फलने-फुलने का आशीर्वाद भी। गेंदे के फूल की पंखुडियां छोटी-बडी, नौकदार, फैली हुई होती हैं उसी प्रकार से छोटे-बडे, तीखे चुभनेवाले आदि सभी प्रकार के धर्मविचारों, उनके प्रवर्तकों को हमारे यहां स्थान प्राप्त है और जिस प्रकार से गेंदे का पौधा सभी फूलधारी पौधों में सबसे बडा और विकसित कुल है उसी प्रकार से सभी धर्मों में हिंदूधर्म सबसे प्राचीन, सनातन, उदात्त और विकसित है।

इसी कडी में एक फल संतरा भी आता है। जिसका ऊपरी हल्का कडा, लचीला आकर्षक चमकीला छिलका हिंदुत्त्व सा है जिसकी ओर लोग उसी प्रकार से आकर्षित हो जाते हैं जिस प्रकार से कि जब वीर सावरकरजी का हिंदुत्व दर्शन सबके सामने आया था तब उसकी चमक से सभीकी आंखे चौंधिया गई थी, स्वामी श्रद्धानंदजी, महामना मदनमोहन मालवीयजी, संघसंस्थापक डॉ. हेडगेवारजी जैसे लोग आकर्षित हो गए थे, प्रभावित हो गए थे। संतरे के अंदर का रसीला गूदा जो फांकों के रुप में होता है वह फांके हिंदूधर्म समुच्चय के अंतर्गत आनेवाले विभिन्न धर्मों के समान हैं और उन फांकों में भरा स्वादिष्ट रस हिंदूधर्म समुच्चय के सारगर्भित धर्म विचार हैं। रसीले गूदे के बीच उपस्थित कडे बीज हिंदूधर्म समुच्चय के विभिन्न धर्मों के धर्मप्रवर्तक, विचारक, समाज सुधारक महापुरुष हैं जिन्होंने उस धर्म को ऊंचाइया कष्ट सहकर, कठिनाइयों का सामना करने के पश्चात प्रदान की, समाज हित में उनके विचारों का अनथक प्रचार-प्रसार किया।

संतरे की फांकों के ऊपर का झिना आवरण रुपी छिलका हर भारतोद्‌भव धर्म को दूसरे भारतोद्‌भव धर्म से अलग करने का झिना सा आवरण मात्र है और मुख्य आवरण तथा इस झिने आवरण के बीच के, ऊपर के रेशे उन सभी विभिन्न धर्म रुपी फांकों को आपस में भी और मुख्य आवरण हिंदुत्व से जोडे रखने में सहायक सिद्ध होनेवाले सामान्य वार-त्योहार, रीति - रिवाज, परंपराएं हैं। जो सबकी समान मान्यताओं को एकता को दर्शाने के साथ ही यह भी दर्शाते हैं कि, वे एक ही बीज से उत्पन्न हुए विशाल हिंदुत्त्व रुपी वृक्ष की शाखाएं हैं।
अब हम उस हिंदुत्व पर आते हैं जिसका बखान हम इतनी देर से कर रहे हैं जो सभी भारतोद्‌भव धर्मों को जोडे हुए है। हिंदूराष्ट्र के उद्‌गाता वीर सावरकरजी जिन्होंने हिंदुत्त्व का दर्शन दिया है के अनुसार - हिंदू शब्द से अंग्रेजी का 'हिंदुइजम" (हिंदूधर्म) शब्द बना है। इसका अर्थ हिंदू लोग जिन धर्ममतों का या मार्गों का अनुसरण करते हैं वे धर्ममत या मार्ग। जबकि हिंदुत्व हिंदूधर्म की अपेक्षा  अधिक संग्राहक शब्द है। हिंदूधर्म इस शब्द के अनुसार हिंदुओं के केवल धार्मिक अंगों का उसमें समावेश न होकर उसमें हिंदुओं के सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक और राजनैतिक अंगों का भी समावेश होता है। यहीं पर यह बता देना उचित होगा कि, मुहम्मद साहेब के जन्म के पूर्व ही नहीं बल्कि अरब एक 'लोग" के रुप में जाने के पूर्व से ही यह प्राचीन राष्ट्र अपनों की ओर से और अन्यों की ओर से भी सिंधू या हिंदू इस स्वाभिमानी नाम से जाना जाता था, पहचाना जाता था। अरबों ने सिंधू नदी की खोज की यह कहना जितना सत्य है उतना ही अरबों द्वारा इस शब्द की खोज की गई यह कहना है।

'हिंदू" शब्द मूलतः देशवाचक, राष्ट्रवाचक है। इसका मुख्य अधिष्ठान 'आसिंधुसिंधु" इस भारत भूमि में अत्यंत प्राचीनकाल से जिनके पूर्वज परंपरा से निवास करते आए हैं, जिस राष्ट्र में प्रचलित रही सांघिक संस्कृति, घटित हुआ इतिहास, बोली हुई भाषाएं, अनुसरण में लाए गए धर्म; जिनकी संस्कृति, इतिहास, भाषा, धर्म हैं वे सारे हिंदू हैं। उस हिंदूराष्ट्र के घटक हैं। वैदिक काल से कम से कम पांच हजार वर्ष तो भी अपने पूर्वज अपने लोगों का धार्मिक, वांशिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक दृष्टि से एकात्म ऐसा गुट बनाते चले आ रहे थे। उस क्रिया का स्वाभाविक विकास होते-होते जो फल आया वह यानी ही वैदिक काल से ही उस सिंधू के ही यानी आज हिंदुस्थान भर में फैले हुए और हिंदुस्थान को ही अपनी एकमेव पितृभू और पुण्यभू मानते चले आ रहे हैं ऐसा हिंदूराष्ट्र।

सावरकरजी के इस हिंदूराष्ट्र का और हिंदूधर्म का तनिक भी संबंध नहीं। उनके बुद्धिवादी दृष्टिकोण के अनुसार वे 'हिंदू लोगों के न्याय्य अधिकार सुरक्षित रखनेवाला राष्ट्र इस प्रकार का व्यापक अर्थ लेते हैं।" उनके हिंदूराष्ट्र का दूसरा अर्थ बहुसंख्यक लोगों का राष्ट्र। इस अर्थ से 'बहुसंख्यकत्व ही राष्ट्रीयत्व है" इस प्रकार का प्रजातांत्रिक सिद्धांत वे प्रस्तुत करते हैं। हिंदू बहुसंख्यक होने के कारण हिंदुत्व ही बहुसंख्यकत्व है, ऐसा वे कहते हैं। इसी अर्थ से 'हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है" इस प्रकार का सिद्धांत वे प्रस्तुत करते हैं।  इस सिद्धांत का अर्थ अहिंदुओं को राष्ट्रीयत्व नहीं होता ऐसा नहीं। अहिंदू अल्पसंख्य है इतनी ही वस्तुस्थिति दिखला देना इस सिद्धांत का काम है। बहुसंख्यकों को अल्पसंख्य बनाना राष्ट्रीयत्व के विरोध में है, यह प्रखरतापूर्वक दिखला देने के लिए इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया है। पुनश्च इस हिंदुत्व का हिंदूधर्म से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं।

दूसरी ओर मध्यपूर्व में जो मजहब खिले, विकसित हुए वे वनस्पति शास्त्र के घुंघरु मोतिया (जास्मिन सॅमबॅक) फूल जैसे थे। मोगरे का फूल ओलेसिया कुल का माना जाता है। घुंघरु मोतिया फूल की रचना एक में एक रखे हुए कटोरे जैसी होती है। गड्डी से एक कटोरा निकाला कि जिस प्रकार से स्वतंत्र कटोरा होता है उसी प्रकार से मूल यहूदी (ज्यू) धर्म से निकला ईसाई रिलीजन पृथक्‌ यानी स्वतंत्र होता है। इसी प्रकार से उसी गड्डी से निकला इस्लाम भी उसी प्रकार से न केवल पृथक्‌ और स्वतंत्र ही नहीं होता   प्रत्युत पूर्व के धर्म से मानो घोर शत्रुता का नाता रखता है। इसलिए कहना पड रहा है कि, अंतिम पैगंबर के इस्लाम मजहब की यह सर्जना आज भर उसी मूल मोगरा (जास्मिन) पुष्प से सारे संबंध तोडकर पूरी तरह कुल बदलकर कनेर का गुणधर्म ले बैठी है। संस्कृत भाषा का कर्णिकार, अंग्रेजी का ओलिएंडर और वनस्पति शास्त्रानुसार थेविशिया-नेरीफोलिया के रुप में पहचानी जानेवाली यह वनस्पति यानी केवल कनेर पुष्प ही नहीं अपितु उसके सारे अंग विषैले हैं। यहां तक कि, कहते हैं उसके आस-पास सांप तक नहीं फटकते। वनस्पति शास्त्रानुसार यह विषैले पदार्थ ग्लाइकोसाइड के रुप में होते हैं। कुल मिलाकर पौधे के अंग-अंग से निकलनेवाला दूध जैसा रस (मिल्की लेटेक्स), पौधे की जड, बीज सब कुछ विषैला, इतना ही नहीं बल्कि इसके फूल को अधिक समय तक सूंघना भी घातक तो पौधे को जलाने पर निकलनेवाला धुंआ तक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने वाला माना जाता है। तो फिर कालाय तस्मै नमः कहकर शांत बैठे कि .....