Tuesday, 24 April 2012

बाल विवाह और मुस्लिम पर्सनल लॉ

बाल विवाह और मुस्लिम पर्सनल लॉ

कुछेक माह पूर्व एक मुस्लिम महिला जकिया बेगम द्वारा मुंबई उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका पर मुंबई उच्च न्यायालय यह विचार कर रहा है कि बाल विवाह विरोधी कानून कहीं संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं है।  यह याचिका इसलिए लगाई गई है क्योंकि, जब जकिया गत दिसंबर में अपनी 14 वर्षीय बेटी की शादी करने जा रही थी तभी लडकी के चचा की इस शिकायत पर कि लडकी नाबालिग है पुलिस ने विवाह रोक दिया। और लडकी को हिरासत में लेकर बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश कर बाद में रिमांड होम भेज दिया। इस मामले का महत्व इसलिए है क्योंकि, यह मामला कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ के बीच के विरोधाभास के कारण सामने आया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यह विवाह वैध है। क्योंकि, लडकी 14 वर्ष की होकर यौवनारंभ (Puberity) को प्राप्त हो चूकी है और अभिभावकों की सम्मति होने के कारण विवाह कानून सम्मत है। पुलिस द्वारा कानूनी सलाह लेने पर ज्ञात हुआ कि Child Marriage Restrain Act  जो सभी भारतीयों पर लागू होता है के तहत लडकी बालिग होने की आयु 18वर्ष होने के कारण यह विवाह कानून सम्मत नहीं। इधर बाल कल्याण समिति द्वारा भी उन्हें यह बतलाया गया कि Child Marriage Restrain Act & Juvenile Justice Act जो बच्चों के मूलभूत अधिकारों से संबंधित हैं मुस्लिम पर्सनल लॉ को अधिक्रमित Supersede करते हैं अथवा उनके ऊपर हैं। अतः मामले पर इन्हीं कानूनों के तहत विचार किया जाना चाहिए। Child Marriage Restrain Act का एक अंतर-राष्ट्रीय परिमाण भी है। भारत Child Reights Convention  इस अंतर-राष्ट्रीय परिषद में सहभागी होकर इसमें पारित किए गए बालकों के हितों एवं अधिकारों की रक्षा करने के कानूनों को जो सर्वसम्मति से पारित हैं से सहमत होने के कारण उन्हें लागू करने के लिए बाध्य है।

इस संदर्भ में 'दारुल-इस्ता-सफा" के मुफ्ती हिदायतुल्लाह शौकत कासमी ने यह फतवा जारी कर रखा है कि ''शरीअत पर श्रद्धा हमारी धर्मश्रद्धा का अविभाज्य घटक है और धर्मश्रद्धा का मूलभूत अधिकार संविधान ने दिया हुआ होने के कारण शासन इसमें हस्तक्षेप ना करे।"" यह प्रतिक्रिया कोई नई नहीं। शरीअत ईश्वरीय और अपरिवर्तनीय है क्योंकि, वह परिपूर्ण है की भूमिका सभी उलेमा, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इस्लामी धार्मिक संस्थाएं जैसेकि देवबंद आदि लेती रही हैं।

परंतु, इस शरीअत की व्याख्या शिया-सुन्नी जैसे अलग-अलग पंथ तथा सुन्नियों के चार इमामों की विचारधारा और आधुनिक चिंतक भी अलग-अलग करते हैं, उनमें भी मतभिन्नता, विरोधाभास है। इसकी अनिवार्यता को तो सबसे पहले ठेस ब्रिटिशों ने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कई बदलाव करके पहुंचाई। ब्रिटिशों ने शरीअत का कुछ भाग निरस्त कर भारतीय दंड विधान के कानून लागू किए। इसी के साथ शरीअत का साक्ष्य संबंधी कानून, कॉन्ट्रॅक्ट एक्ट जैसे अनेक कानून रद्द कर उनके स्थान पर आधुनिक कानून लागू किए। इसके कारण लगभग शरीअत का लगभग 80% भाग निरस्त हो गया। आज जिसे मुस्लिम पर्सनल लॉ कहा जाता है वह विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और उत्तराधिकार इन चार बातों तक ही मर्यादित है। यह कानून शरीअत के तत्त्वों पर आधारित होने पर भी इस संबंध में उठनेवाले विवाद न्यायालयों में ही दाखिल करना पडते हैं। वैसे भी आज भारत में शरीअत कोर्ट का कोई अस्तित्व नहीं। गोआ में तो समान नागरिक संहिता पुर्तगाल काल से लागू है। इजिप्त में भी फौजदारी और दीवानी कानून 19वीं शताब्दी के फ्रेंच कानूनों के आधार पर हैं। जबकि यह इस्लामी राष्ट्र यह मानता है कि शरीअत कानून बनाने का प्रमुख स्त्रोत है और हुदूद के कानून के अनुसार कोडे मारने और मौत की सजा है लेकिन आज के इजिप्त में इसका उपयोग नहीं किया जाता। गुलामी जो इस्लामी कानून में वैध है को पूरे विश्व में सऊदी अरब सहित कहीं भी मान्यता नहीं। अफ्रीकी देश नाइजीरिया के दक्षिणी राज्यों में सन्‌ 2000 में कठोर इस्लामी कानून लागू जरुर किए गए परंतु, अमल में लाए नहीं गए। इसलिए कि कहने और सुनने में यह सजाएं अच्छी लगती हैं लेकिन व्यवहारिक नहीं हैं। इजिप्त की एक अदालत ने तो ऐसे 12 मुसलमानों को इस्लाम छोडने की आज्ञा प्रदान कर दी जिन्होंने ईसाइयत छोडकर इस्लाम को स्वीकार लिया था। जबकि, शरीअत कानून के अनुसार न तो कोई मुसलमान अपना धर्म बदल सकता है और न ही कोई गैर-मुस्लिम एक बार मुसलमान हो जाने के बाद अपने मूल धर्म में पुनः जा सकता है। इसी प्रकार से ब्याज के मामले में शरीअत के कानून को भी न के बराबर ही माना जाता है। इस्लाम के अनुसार तो कुरान अल्लाह द्वारा मुहम्मद साहेब को दिए हुए शब्द और हदीस मुहम्मद साहेब के विचार हैं जो उन्होंने अपनी उक्तियों एवं कृतियों द्वारा समय-समय पर व्यक्त किए थे, मूलाधार हैं। जबकि शरीअत तो हर देश में अलग-अलग हैं, इसकी व्याख्या भी अलग-अलग की जाती है। क्योंकि, कानून संबंधी स्वतंत्र भाग कुरान में आया हुआ नहीं है। प्रसंगानुसार मुहम्मद साहेब ने जो निर्णय दिए वे कुरान में विभिन्न स्थानों पर बिखरे हुए हैं। वे एकत्रित कर कुरान का कानून संबंधी भाग तैयार होता है। जो बहुत ही कम है। इस पर और हदीस पर आधारित शरीअत (कानून शास्त्र) को विभिन्न मुस्लिम विद्वानों ने विकसित किया है। इसलिए यह एक न होकर उन-उनकानून के ज्ञाताओं के अन्वयार्थोनुसार भिन्न-भिन्न है। इनमें हनाफी, शफी, हनबाली और मलिकी सुप्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार से  हर देश में लडकियों की रजोवृत्ति की आयु भिन्न-भिन्न है, हमारे देश में यह आयु 12, 13 वर्ष है, इसलिए इस संबंध में शरीअती आदेश भी विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न होंगे। ऐसे में शरीअत में हस्तक्षेप मत करो, शरीअत अपरिवर्तनीय है का दावा आखिर किस आधार पर किया जा रहा है?

बाल विवाह तो हिंदुओं में भी होते रहे हैं और आज भी बाल विवाह विरोधी कानून लागू हो जाने के बावजूद कभी-कभी कुछ अभिभावकों द्वारा इस प्रकार के विवाह संपन्न कराने के प्रयास किए जाते हैं। परंतु, जब शासन हस्तक्षेप करता है तो विरोध स्वरुप न तो किसी प्रकार के धर्मादेश (फतवे) जारी किए जाते हैं न ही शासन को, संविधान को चुनौति दी जाती है। शासन के हस्तक्षेप से भले ही थोडी सी नाराजगी प्रकट हो लेकिन न नुच के बाद स्वीकार लिया जाता है। क्योंकि, सबसे ऊपर देश का कानून है। जबकि हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार तो बाल विवाह वैध है। 'मनु (9/94) के मत से 12 एवं 8 वर्ष की कन्याएं विवाह योग्य मानी गई हैं। महाभारत (अनुशासन पर्व 44/14) के अनुसार कन्या की विवाह अवस्था 10 तथा 7 है। शास्त्रों के अनुसार 'नग्निका" अर्थात्‌ जिसका मासिक धर्म बिल्कूल सन्निकट हो विवाह योग्य है। वसिष्ठ धर्मसूत्र (17/70) के मत से नग्निका शब्द अयुवा का द्योतक है। वैखानस (6/12) के मत से नग्निका 8 वर्ष से ऊपर या 10 वर्ष के नीचे होती है। गौतम (18/20-23) के अनुसार युवती होने के पूर्व ही कन्या का विवाह कर देना चाहिए। पराशर (7/6-9) के मत से यदि कोई 12 वर्ष के उपरान्त अपनी कन्या न ब्याहे तो उसके पूर्वज प्रति मास उस कन्या का ऋतु-प्रवाह पीते हैं। माता-पिता तथा ज्येष्ठ भाई रजस्वला कन्या को देखने से नरक के भागी होते हैं। मरीचि के मतानुसार 5 वर्ष की कन्या का विवाह सर्वश्रेष्ठ है।"

परंतु, मुसलमानों के मामले में जब-जब भी इस प्रकार से संविधान और मुस्लिम पर्सनल लॉ में विरोधाभास सामने आता है तब-तब मुस्लिम समाज का नेतृत्व संविधान के 25वें अनुच्छेद में मिले धार्मिक स्वतंत्रता का आधार लेकर विरोध प्रकट करता है। शरीअत हमारी धर्मश्रद्धा का अविभाज्य भाग होने के कारण उसमें परिवर्तन करने के कारण हमारे मूलभूत अधिकारों को बाधा पहुंचती है का युक्तिवाद प्रस्तुत करता है। इससे यह सवाल उठना लाजिम है कि आखिर अधिक महत्व किसका है, सबसेऊपर कौन है, देश का कानून या कि मुस्लिम पर्सनल लॉ? अब मुंबई उच्च न्यायालय जिस संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर विचार करने जा रहा है वह संविधान के 25वें अनुच्छेद में इस प्रकार से वर्णित है -

1. ''लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रुप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।
2. इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विद्यमान विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या राज्य को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो -
(क). धार्मिक आचरण से सम्बद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलापों का विनियमन या निर्बंधन करती है;
(ख). सामाजिक कल्याण और सुधार का उपबन्ध करती है या सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों और विभागों के लिए खोलती है।""

Sunday, 8 April 2012

गांधीजी का आदर्शवाद और व्यवहारवाद

हम पर सावरकरजी के विचारों का प्रभाव अधिक होने के कारण स्वाभाविक रुप से गांधीजी के विषय में हमारे विचार प्रतिकूल थे। आत्यंतिक अहिंसा, सत्य का और साधनशुचिता का अत्याग्रह समाज सुधार के विषय में सनातनी विचार, विज्ञान विरोध, हिंदू-मुस्लिम प्रश्न आदि के संबंध में हमारे विचार उनके विचारों से सहमत नहीं होते थे। हमें आदर्शवाद की अपेक्षा व्यवहारवाद अधिक पसंद है। परंतु, इधर कुछ समय से जैसे-जैसे हम गहराई में जाकर गांधीजी के विषय में विचार करने लगे, वैसे-वैसे ध्यान में आने लगा कि, गांधीजी जैसे ऊपर-ऊपर से आदर्शवादी दिखते हैं वैसे अंतर्यामी हैं नहीं। यह उनकी पोशाक के बारे में जितना सच है उतना ही वे बोलते रहे शब्दों के बारे में भी है। ऊपर से वे कितने भी आदर्शवादी लगें तो भी वस्तुतः पक्के व्यवहारवादी थे। उन्हें भगवान बुद्ध भी चाहिए था और आर्य चाणक्य भी चाहिए था। उनकी अपार लोकप्रियता का और घोर पराजय का एक कारण यह भी था। (उनके विचार आज कोई भी नहीं मानता, यह उनकी घोर पराजय है।)
गांधीजी को ठीक से समझ लेना हो तो उनके द्वारा निकाले गए उद्‌गारों को न देखते उनके मन में क्या था यह जान लेना पडता है। कई बार शब्दों से जो दिख पडता है उसके ठीक विरुद्ध जो उनके मन में था वह दिख पडता है। उनके शब्दों के पीछे जाने पर अपने धोखा खाने की संभावना अधिक रहती है। सिवाय शब्द कहें तो वे एकही विषय के संबंध में भिन्न और कुछ प्रसंगों में परस्पर विरुद्ध कहे हुए दिख पडते हैं। उनके मन में क्या था यह बहुधा संबंधित घटना घटित हो जाने के बाद पता चला है। गांधीजी के काल में उन्हें समझ लेना कठिन था। उन्हें समझ लेने के लिए आज का काल सर्वोत्तम है। ऊपर हमने जो कहा है, वह जल्द ही सभी वाचकों के ध्यान में आने की संभावना नही। कुछ उदाहरणों पर से यह ध्यान में आ जाएगा।

गांधीजी और विभाजन

अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे के रुप में हम विभाजन को विचारार्थ लेंगे। गांधीजी का विभाजन के लिए कट्टर विरोध था, ऐसा सर्वत्र माना जाता है। 'देश के टुकडे होने के पूर्व मेरी देह के टुकडे करना होंगे", इस प्रकार के भावपूर्ण निकाले हुए उद्‌गार अनेकों के कानों में आज भी घूम रहे होंगे। परंतु, सचमुच उनके मन में क्या था?
भारत अखंड रहे यह लोकप्रिय भाषा भावनिक दृष्टि से उनके द्वारा व्यक्त किए जाने के बावजूद व्यवहारिक दृष्ट्या उन्हें अखंड भारत की अव्यवहार्यता ध्यान में आ गई थी। अखंड भारत की अपेक्षा दो खंडित देशों में हिंदू-मुसलमान अधिक सुख से रह सकेंगे इससे वे मन ही मन सहमत हो गए थे। विशेषतः अखंड भारत हिंदुओं के लिए अधिक उपद्रवकारक ठहरता, यह उन्होंने जान लिया था। वे ऊपरी तौर पर मुसलमानों की ओर से बोलते थे तो भी मन से उन्हें हिंदुओं के हितों की अधिक चिंता थी। परिणामतः वे जाहिररुप से अखंड भारत के विषय में भावपूर्ण उद्‌गार निकालते थे तो भी प्रत्यक्ष विभाजन की दृष्टि से उनके प्रयत्न चालू थे। डॉ. आंबेडकर सभी के और विशेष रुप से हिंदुओं के भले के लिए विभाजन करो कह रहे थे, ग्रंथ लिख रहे थे। गांधीजी के प्रयत्न भी उसी कारण से उसी दिशा में चल रहे थे; परंतु भाषा भर अखंड भारत की थी!

1931 से गांधीजी के विचार उद्‌धृत कर दिखाया जा सकता है कि, उन्होंने विभाजन के तत्त्व और संभाव्याता को मान्य कर लिया था। इन 17 वर्षों के काल में कांग्रेस के अनेक प्रस्ताव दिखाए जा सकते हैं कि, जिनमें कांग्रेस ने मुसलमानों के स्वयंनिर्णय का हक्क मान्य किया था; उनकी संपूर्ण संतुष्टि के सिवाय उन पर कोईसा भी संविधान कांग्रेस लादेगी नहीं इस प्रकार का अभिवचन दिया था। 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने अधिकृतरुप से विभाजन की मांग का पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया और उसके 15 दिन बाद यानी 6 अप्रैल को गांधीजी ने 'हरिजन" में लिखा था कि, 8 करोड मुसलमानों को पाकिस्तान चाहिए हो तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें इससे रोक नहीं सकती; सैन्य शक्ति के बल पर उन्हें रोकना मुझे मान्य नहीं। उसके बाद 1947 तक उन्होंने अनेक बार इसका पुनरुच्चार किया है। 1942 के 'भारत छोडो" प्रस्ताव के बाद के भाषण में उन्होंने जिन्ना को कहा था कि, उन्हें गर पाकिस्तान चाहिए हो तो वह कल ही मिल जाएगा, वह तो उनके जेब में ही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उनके विश्वसनीय सहयोगी भूलाभाई देसाई और बाद में राजाजी ने गांधीजी द्वारा गुप्त रुप से दी सूचनानुसार विभाजन का स्पष्ट समर्थन किया था। लोगों की प्रतिक्रिया जान लेने के लिए गांधीजी ने यह खेल खेला था। इसके विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी, परंतु वह देसाई राजाजी के विरुद्ध थी। गांधीजी भर अखंड भारत का लोकप्रिय पक्ष प्रस्तुत कर रहे थे।

इतना ही नहीं तो जुलाई 1947 में कांग्रेस कार्यकारिणी में 3 जून को जब विभाजन का प्रस्ताव मंजूर नहीं हो रहा था, तब गांधीजी ने अपना सारा दबाव और पुण्याई खर्च कर वह प्रस्ताव स्वीकृत करवा लिया। यह प्रस्ताव कांग्रेस ने मान्य नहीं किया तो हम सब वरिष्ठ लोग कांग्रेस छोड देंगे ऐसी निर्णायक धमकी भी उन्होंने दी थी। इस प्रकार गांधीजी ने दो बातें एक साथ साध्य कर लीं। एक, वे अखंड भारत के पक्ष में हैं इस प्रकार की प्रतिमा निर्मित कर लोकप्रियता प्राप्त की; और दूसरा, प्रत्यक्ष विभाजन कार्यक्रम दबाव डालकर अंमल में लाकर देश का विशेषतः हिंदुओं का हित किया। गांधीजी मूलतः और अंतर्यामी हिंदुओं के हितकर्ता थे, परंतु बोलने की भाषा मुस्लिम समर्थक थी। गांधीजी की यह भूमिका ध्यान में न आने के कारण उनकी हत्या करने की मूर्खता और अधमता गोडसे ने की। विभाजन देश की दृष्टि से बीसवीं शताब्दी की सबसे भाग्यशाली घटना थी यह जिन्हें नहीं समझता, उन्हें गांधीजी समझना मुश्किल ही है।

गांधीजी हिंदू विरोधी थे, यह आक्षेप सतत लिया जाता है। अर्थात्‌ वे हमेशा ही मुस्लिमों के पक्ष में और हिंदुओं के विरोध में बोलते थे यह दिखला दिया जाता है। हिंदुओं को अथवा उनमें से कुछ को ऐसा लगता है कि, मुसलमान संगठित होने के कारण और उस जोर पर नाजायज मांगे कर वे हिंदुओं पर अन्याय करते हैं। इसलिए गांधीजी को हिंदुओं का पक्ष लेना चाहिए था, उन्हें संगठित करना था, मुस्लिमों का प्रतिकार करना चाहिए था। गांधीजी को यह समझता नहीं था ऐसा नहीं। "हिंदू डरपोक हैं तो मुसलमान अडियल हैं", इस आशय के उनके विधान इसके गवाह हैं। तथापि उन्होंने इस नीति का समर्थन न करते बल्ले थपथपाने वाले छोटे भाई के पक्ष में होने की नीति स्वीकार की। इसमें गांधीजी की गलती कितनी है?

गांधीजी यानी हिंदू मानस

ऊपर व्यक्त की गई अपेक्षा योग्य है, परंतु उसकी फलश्रुती असंभव थी। हिंदुओं की अपेक्षा ऐसी थी कि गांधीजी ने वीर सावरकर के समान ही हिंदू हित का और हिंदू संगठन का समर्थन करना चाहिए था। अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो गांधीजी का सावरकर हो जाता। वे संकुचित और साम्प्रदायिक घोषित हो जाते। वे महात्मा, देश के एकमेव और लोकप्रिय नेता न बनते। इसलिए प्रश्न केवल गांधीजी को क्या लगता था इसका नहीं था अपितु हिंदू किस बात से सहमत होंगे यह था। वह हिंदुओं को पसंद आएगा क्या? वे अपनी सुनेंगे क्या? वे संगठित होंगे क्या? उनके हिंदू स्वभाव से वह मेल खाएगा क्या? उन्हें सफलता मिलेगी क्या? यह प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। गांधीजी को हिंदूमानस पूरी तरह से मालूम था। इस प्रकार से समझाते बैठने से हिंदू सहमत होंगे नहीं; हिंदुओं में बदलाव आएगा नहीं; उलटे इसके कारण लोग अपने को सांप्रदायिक और संकुचित कहेंगे। परिणामतः मुसलमान भी दूर जाएंगे और हिंदू भी दूर जाएंगे यह उन्हें समझ में आ गया था। सावरकरजी का पराजित होनेवाला मार्ग स्वीकारने की बजाए उन्होंने हिंदुओं के स्वभाव से मेल खानेवाला मार्ग स्वीकारा। इसलिए वे देश के एकमात्र नेता बने, महात्मा बने, राष्ट्रपिता बने! इस में गांधीजी की कहां गलती हुई?

इस देश में यहां की जनता की नाडी जिन्होंने अचूक पकडी ऐसे एकमेव नेता 'गांधीजी" थे! उनके कहने में, लेखन में यह बातें नहीं मिलती। इसकी तात्त्विक या तार्किक चर्चा भी उन्होंने कभी नहीं की। परंतु, उन्होंने स्वीकारी हुई नीति और निर्णयों पर से यह बात अभ्यासकों के ध्यान आती है। जनता की नाडी पकडने के कारण वे जनता की भाषा में बोल सके; उनके मानस में; ह्रदय में प्रवेश कर सके। अपने दिल की बात ही गांधीजी बोलते हैं, ऐसा लोगों को लगने लगा। अर्थात्‌ यह जनता हिंदू थी। मुसलमानों को गांधीजी का कुछ भी जंचना संभव नहीं था। कांगे्रस विरोधी मुस्लिम लीग तो गांधीजी को 'हिंदू नेता" के रुप में ही संबोधित करती  थी; परंतु कांग्रेस के नेता और मोहम्मद अली भी कहते थे कि किसी भी बुरे (यानी चोर, व्यभिचारी आदि) मुसलमान की अपेक्षा  गांधीजी अधिक बुरे हैं। गांधीजी कहते थे कि मैं यानी हिंदू मानस; हिंदू मानस को जो लगता है वही मुझे लगता है।

संक्षेप में, गांधीजी का मन, भावना, विचार, नीति, कार्य आचार यानी दूसरा तीसरा कुछ न होकर 'हिंदू मानस का ही आविष्कार" था। गांधीजी के जो गुण थे, वे हिंदुओं के गुण थे; जो दोष थे, वे हिंदुओं के दोष थे। उनसे जो गलतियां हुई, वे हिंदुओं की गलतियां थी। गांधीजी हिंदू न होते तो इस प्रकार का व्यवहार करते ही नहीं, व्यवहार कर पाते ही नहीं। गांधीजी की आलोचना करने के पूर्व  हिंदू मानस समझ लेने की आवश्यकता है। सावरकरजी जिंदगी भर हिंदुओं के पक्ष में बोलते रहे; हिंदुओं को उनके मानस के विरुद्ध व्यवहार करने का उपदेश दिया। वे हिंदुत्ववादी होने पर भी उनके विचार और व्यवहार हिंदू मानस के विरुद्ध थे। उन्होंने हिंदुओं के मानस को ही बदलने का प्रयत्न किया। मानस कुछ बदला नहीं। सावरकरजी हिंदुओं से दूर फिंका गए। हिंदू हित की बात कहकर, उन्हें संगठित होने का उपदेश कर, उनमें कट्टरता की भावना निर्मित करने का प्रयत्न कर गांधीजी को सावरकरजी के समान पराजित होना चाहिए था, यह अपेक्षा गलत और अन्यायकारी ठहरती है।

समाज सुधारक गांधीजी

समाज सुधार के बारे में भी गांधीजी सनातन विचारों के थे, ऐसा आक्षेप लिया जाता है। यह सच है कि, वे स्वयं को सनातनी हिंदू समझते; धर्मप्रामाण्य मानते; चातुर्वण्य पर श्रद्धा रखते थे; व्यवसाय जातिनुसार होना चाहिए ऐसा कहते थे; मंदिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह करने का विरोध करते थे। समाज सुधार में केवल अस्पृश्यता उन्हें मान्य नहीं थी। अस्पृश्यता निवारण को उन्होंने अपने कार्य भाग बनाया था। यहां भी हिंदू समाज को क्या पसंद है वह करने की उनकी नीति थी। अर्थात्‌ अपवाद अस्पृश्यता का। हिंदू धर्मभावना को ठेस पहुंचाने की उनकी इच्छा नहीं थी। चातुर्वण्य और जातिभेद पर कठोर प्रहार करके उन्हें हिंदू भावनाओं को आघात नहीं पहुंचाना था। हिंदू मानस जिससे सहमत होता है, जो उसे हजम होता है वही वे बोलते रहे। उन्हें समाजक्रांतिकारक अथवा समाज सुधारक नहीं बनना था। वह अलोकप्रियता का मार्ग था। उन्हें सारे देश का अनिभिषिक्त नेता बनना था। लोगों के ह्रदयों पर राज करना था। इस रीति से उन्होंने सनातनी हिंदू मानस को जीता था। रा. स्व. से. संघ को सावरकरजी की बजाए गांधीजी निकटस्थ क्यों लगते हैं इसका.एक कारण यही है।

अब प्रश्न यह खडा होता है कि, सचमुच गांधीजी को दिल से धर्म प्रामाण्य, चातुर्वण्य, जन्मजात जाति संस्था, जातिनुसार व्यवसाय मान्य थे क्या? अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश पर उनका विरोध था क्या? इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि, उन्हें दिल से यह कुछ भी मान्य नहीं था। इस मामले में विचारों से वे बिल्कुल आधुनिक थे। उन्हें अंतरजातिय विवाह भी मान्य थे। अंतरजातिय विवाह हो तो ही वे उस विवाह समारोह में जाते थे। प्रत्यक्ष तौर पर धर्मग्रंथ की एक भी बात उन्होंने व्यवहार में प्रमाण मानी नहीं थी।  वे व्यवहार में पूर्णतः 'आधुनिक और पुरोगामी" थे, परंतु शब्दों और भाषा में 'सनातनी" थे। उन्हें सुधार चाहिए था और लोकमत का आदर भी करना था। उनकी लोकप्रियता का यही रहस्य है। गांधीजी की प्रत्येक बात की ओर इस दृष्टि से देखा जा सकता है। शब्दों में आशीर्वाद, परंतु आचरण में व्यवहारवाद इस प्रकार का उनका मार्गक्रमण था। उनके आदर्शवाद ने लोगों को मोह लिया; उनकी सादगी कारण वे लोगों को संत लगे। सामान्यों के सामान्य दुख की भी आवाज उठाने कारण सामान्यों को वे देवदूत लगे। हिमालय जितनी बडी गलती हो जाने पर भी उसे जाहिर रुप से मान्य कर लेने के कारण लोगों को वे निस्पृह, निर्मल ह्रदय के और सच्चे लगते थे। हिंदुओं ने अनेक महापुरुष इतिहास काल में देखे थे। परंतु, यह सारे धर्मपुरुष थे। धर्म की परिधि में ही वे उपदेश करते थे। राजनीति, सामाजिक नीति, अर्थ नीति आदि जीवन के सभी क्षेत्रों में उपदेश करनेवाला ऐसा महापुरुष हिंदुओं ने कभी देखा नहीं था। व्यव्हार में उन्होंने बडे-बडे व्यक्तियों को अपना अनुयायी बनाया था। स्वयं को सहमत न होते हुए भी अंत तक उन्हें टिकाए रखा था। व्यवहारवादी अनुयायियों ने गांधीजी का आदर्शवाद शब्दों में रहने दिया और उससे देश को हानि न होने दी। व्यवहारवाद का दामन थामा और उसके फल भी गांधीजी की ही झोली में डाले। इस प्रकार से गांधीजी को दोहरा लाभ हुआ - वे महात्मा बने, राष्ट्रपिता बने!

( शेषराव मोरे, नांदेड 'विचार कलह" से साभार अनुदित)