Thursday, 22 March 2012

धर्मो की समानता का दुराग्रह हास्यास्पद

धर्मो की समानता का दुराग्रह हास्यास्पद

हिन्दु धर्म शास्त्र का यह मान्य सिद्धांत है:
""श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वाचैवार्व धार्यता म्‌ ।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌ ।।''

    अर्थात सम्पूर्ण धर्म का सार सुनो और सुनकर उसको भली-भांति धारण करो। वह यह कि जिस व्यवहार को तुम स्वयं अपने साथ अचित नहीं समझते, वैसा व्यवहार कभी दूसरों के साथ भी मत करो यानी कभी किसी पर अपनी मान्यता बलपूर्वक न थोपोे।

    तथापि, ईसाइयत और इस्लाम इस धारणा को किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं करते। उनकी धारणा के अनुसार उनकी जो मान्यता है वही सत्य है और जो उसका स्वीकार नहीं करेंगे उन्हें तलवार की धार से वे समाप्त कर देंगे। इसी धारणा के आधार पर बाइबल कहती है : ""तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर।''  (मत्ती 4:10) ""जो मेरे साथ नहीं वह मेरे विरोध में है ।'' (मत्ती 12:30) और उसको दंड तलवार से ही दिया जाना तय है। जो लोग ईसा को शांति-दूत समझते हैं अनकी आँखे खोलने के लिए बाइबल के ये वचन निश्चय ही पर्याप्त हैं: "" यह न समझो कि मैं मिलाप कराने को आया हुं, मै मिलाप कराने को नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूं। मैं तो  आया हूं, कि मनुष्य को उसके पिता से, और बेटी को उसकी मॉं से, और बहु को उसकी सास से अलग कर दूं। जो माता या पिता को मुझसे अधिक प्रिय जानता हैं, वह मेरे योग्य नहीं  और जो बेटा या बेटी को मुझसे अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं ।'' (मत्ती 10:34,35,37) ""क्योंकि जो कोई मेरे  स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई और बहिन और माता है।'' (मत्ती 12:50) बाइबल में आगे कहा गया है: ""स्वर्ग और प्रथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिए तुम सब जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओं और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रात्मा के नाम से बपतिस्मा दो।''  (मत्ती 28:18,19) ""जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।'' (मरकुस 16:16) ""और उन्हें आग के कुण्ड में डालेंगे, वहां रोना और दांत पीसना होगा।'' (मत्ती 13:42)
 
    इस असहिष्णुता और जोर जबरदस्ती के मामले में कुरान कहीं भी किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं। कुरान में घोषणा की गई है: ""इस दीन (इस्लाम) की मौलिक शिक्षा यह है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पूज्य, उपास्य) नहीं। इसलिए इन्सान को चाहिए कि सिर्फ उसी की इबादत (पूजा, उपासना,बंदगी, आज्ञापालन) करे और उसकी इबादत में किसी शरीक न करे जो व्यक्ति गैरूल्लाह अर्थात अल्लाह के सिवा किसी की इबादत करता है चाहे वह बुतपरस्ती की शक्ल में हो या भूमि पूजा के रूप में और चाहे वह देवी देवताओं को मदद के लिए पुकारता हो या किसी फर्जी (मनगढंत) खुदाओं के भजन गाता हो , खुला हुआ शिर्क (अनेकेश्वरवाद) है और जो धर्म भी इस शिर्क की आज्ञा देता है वह मुश्रिकाना (बहुदेववादी) धर्म है। हजरत मुहम्मद इसलिए पैगंबर बना कर भेजे गऐ थे कि इस शिर्क  की जड़ काट दे (अर्थात समाप्त कर दे)। कहने का सार यह है कि काफिरों (इस्लाम को स्वीकारने से इन्कार करने वाले) की राह अलग और ईमानवालों (मुसलमानों) की राह अलग है और दोनो के बीच ऐसी बडी खाई है कि वह कुछ दो और कुछ लो के सिद्धांत उसूल पर हरगिज मामला नहीं कर सकते।''  (अर्थात दोनो में किसी भी तरह का समझौता संभव नहीं।) (दअ्‌वतुल कुर्आन खण्ड 3 पृ.2367)

    इस विवेचना से स्पष्ट होता है कि ईसाइयत और इस्लाम जो कि दोनो एक ही सेमेटीक परम्परा के विस्तारवादी असहिष्णु धर्म हैं, दूसरे धर्मों के साथ  सहअस्तित्व से इन्कार करते हैं, उन्हें समाप्त कर देना चाहते हैं, दूसरे धर्मों के अस्तित्व के लिए बाधक हैं। इस प्रकार के आतताई धर्मों के लिए महाभारत का यह कथन सटीक है: ""जो धर्म दूसरे धर्म का बाधक होता है वह धर्म नहीं कुधर्म है। सच्चा धर्म वही है जो किसी धर्म का विरोधी न हो।''

    अंत में कहना होगा कि मात्र राजनीति के लिए सर्व धर्म समभाव की लुभावनी बातें करना एक अलग बात है तथापि, दुर्भाग्य से  धर्म एवं मजहबों में जिन्हें धर्म कहना ही ठीक प्रतीत नहीं होता समन्वय बैठाना एक टेढ़ी खीर है।

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