Thursday, 22 March 2012

वर्षप्रतिपदा विशेष - हिंदू विश्वविद्यालय संस्थापक - पंडित मदनमोहन मालवीयजी

हिंदुस्थान में जो अनेक देशभक्त और नेता हुए हैं उनमें अधिकांश ने अध्यापक का कार्य किया है। देश की जनता को उन्होंने आगे जाकर जो कुछ भी शिक्षा दी उसका मानो आधार ही उनके इस कार्य में था। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, गोपालकृष्ण गोखले, बाबू बिपीनचंद्र पाल आदि के समान ही पंडित मदनमोहन मालवीयजी भी इसी प्रकार से प्रारंभ में शिक्षक ही थे। इस पर से यह सहज ही कहा जा सकता है कि विद्यार्थियों का शिक्षक राष्ट्र का शिक्षक भी हो सकता है।

स्वतंत्रता पूर्वकाल में हिंदुस्थान की शिक्षा पद्धति राष्ट्रीय गुणसंवर्धन के लिए अनिष्टकारी होने के कारण उसमें आमूलाग्र बदलाव होना चाहिए, इस बारे में सभी राष्ट्रहित चिंतक एकमत थे। लोकमान्य तिलक ने सन्‌ 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा जो कि अत्युपकारी है के संबंध में विदेशी सरकार किस प्रकार से उदासीन है उसकी विवेचना की थी। उनके विचारों से उस समय के सभी राष्ट्रहितचिंतक सहमत थे उनमें पंडित मदनमोहन मालवीयजी भी एक थे। पंडितजी जो कि मूलरुप से जब वे शिक्षक थे तब भी और जब वे राजनीति में सक्रिय हुए तब भी इसी बात पर जोर देते रहे। देश के राजनैतिक पुनरुत्थान के लिए और देश की बढ़ती गरीबी को रोकने के लिए बौद्धिक शिक्षा के साथ ही साथ शास्त्रीय और यांत्रिक शिक्षा में भी बढ़ौत्री होनी चाहिए। सरकार को ही अपने इस कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। परंतु, यहां की सरकार विदेशी होने के कारण वह हिंदुस्थानियों की परवाह नहीं करती और उनकी शिक्षा के बारे में तुच्छ लापरवाही बरतती है।

इस प्रकार की जो छटपटाहट रात और दिन उनके अंतःकरण में चला करती थी उसका मीठा फल था हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना। मालवीयजी की विश्वविद्यालय की योजना सामने आते ही हिंदी हितविरोधी लोगों की ओर से उसकी आलोचना होने लगी। इस योजना का बंगाल के बंग-भंग आंदोलन से बादरायण संबंध जोडने का कुछ अँग्लोइंडियन समाचार पत्रों ने प्रयत्न भी किया। पंडितजी ने भी इस प्रकार की आलोचनाओं का तीखा उत्तर देकर उनके विचारों का खंडन किया। राष्ट्रीय शिक्षा देने के लिए एकाध इस प्रकार का विश्वविद्यालय होना चाहिए की कल्पना पंडितजी के मन में बहुत दिनों से रची-बसी हुई थी। सन्‌ 1905 में उन्होंने विश्वविद्यालय की एक रुपरेखा प्रकाशित की। आगे जाकर सन्‌ 1911 में उस योजना में कुछ सुधार करके दूसरी बार अपनी योजना पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने लोगों के सामने प्रस्तुत की। इस योजना में निम्नलिखित उद्देश्य दर्ज थे -

1. हिंदू शास्त्रों और संस्कृत भाषा के अध्ययन का समर्थन कर हिंदू संस्कृति और विचारों में जो उत्कृष्ट गुण हैं उनका प्रसार करना और जो योग्य एवं श्रेष्ठ है उनकी रक्षा करना। 2. कला और शास्त्रों का उनकी सभी शाखाओं सहित अध्ययन करना। 3. देश के उद्योग-धंधे बढ़ाने के लिए जो भी उपयुक्त एवं आवश्यक शास्त्रीय ज्ञान हो उनकी शिक्षा देना। 4. धर्म और व्यवहार को शिक्षा का प्रमुख अंग समझ युवाओं का चरित्र निर्माण करना।

इस प्रकार के हिंदू विश्वविद्यालय की योजना प्रस्तुत होते ही सभी ओर से उसका स्वागत किया जाने लगा और अब की बार जिन लोगों ने संशय प्रकट कर अवास्तव आलोचना की थी उन्होंने ही योजना का सुस्वागत किया। इस प्रकार से सभीके द्वारा योजना का सत्कार होने पर विश्वविद्यालय के लिए निधि एकत्रित करने के लिए शिष्टमंडलियां निकली और अल्पावधि में ही सामान्यजन से लेकर राजे-रजवाडों तक ने योजना का समर्थन कर सहायता प्रदान की। सन्‌ 1915 में विधायिका ने हिंदू युनिव्हर्सिटी बिल भी पास कर दिया। उस समय भाषण करते हुए पंडितजी ने कहा था - 'धर्म के चैतन्ययुक्त सामर्थ्य पर मेरा पूर्ण विश्वास है। आज की शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा की बडी उपेक्षा नजर आती है। हिंदुओं के अत्यंत पवित्र और विद्या की देवी के निवासवाले स्थान पर इस प्रकार की संस्था प्रारंभ करने के लिए सरकार ने मान्यता दी इसके लिए मैं उसका आभारी हूं मुझे विश्वास है कि अन्य संस्थाओं को भी कभी ना कभी तो भी शीघ्र ही धर्मशिक्षा की आवश्यकता की अनुभूति होगी।" विश्वविद्यालय का काम हाथ में लेते ही पंडितजी ने अपने अच्छे चलते वकालत के व्यवसाय को त्यागकर अपना सारा जीवन विश्वविद्यालय की सेवा में खर्च करने का संकल्प लिया और इसके लिए संपूर्ण देश में घूमकर सैंकडों व्याख्यान देकर, अपनी योजना लोगों को समझाकर, जनता की सहानुभूति प्राप्त कर अल्पावधि में ही करोडों रुपये एकत्रित किए।

इस विश्वविद्यालय को सरकार की विधिवत अनुमति 1915 के 16वीं धारा के तहत दी गई। इस कानून के द्वारा देश के अन्य विश्विद्यालयों के समान ही इस विश्वविद्यालय का दर्जा भी सरकार ने मान्य किया। जब वरिष्ठ विधायिका में हिंदू युनिव्हर्सिटी का बिल आया उस समय शिक्षा मंत्री सर हारकोर्ट बटलर ने कहा था, 'आज की यह घटना कोई सामान्य नहीं। आज हम एक नए और अच्छे विश्वविद्यालय को जन्म दे रहे हैं। इस विश्वविद्यालय की विशेषता यह है कि यह विश्वविद्यालय शैक्षणिक एवं आवासीय दोनो ही है। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थापित हो रहा है वहां से निकट के भागीरथी के तट के घाटों को शान से देखनेवाले विश्वविद्यालय के मंदिर दृष्टिगोचर होंगे, यह कल्पना मन में आते ही मैं हिंदू होता तो कितना अच्छा होता यह विचार मन में आए बगैर नहीं रहता। तथापि, प्राचीन एवं वंदनीय हिंदू संस्कृति का एवं अर्वाचीन पाश्चात्य संस्कृति का संयोग घटित करवाने में सहायता करनेवाला सरकार का एक नौकर होने का मुझे गर्व है।" आगे जाकर सन 1916 में लॉर्ड हार्डिज ने विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया और अनेक उत्साही कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग काम बांटकर शीघ्र ही श्रीक्षेत्र काशी में विश्वविद्यालय के निर्माण को खडा किया।

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