Wednesday, 22 February 2012

पत्ररुप - श्रीगुरुजी

पत्ररुप - श्रीगुरुजी

श्रीगुरुजी ने 1940 से 1973 तक रा.स्व.से.संघ के सरसंघचालक पद का उत्तरदायित्व निभाया। श्रीगुरुजी तो संघ के मस्तक, ह्रदय, प्राण, कार्यशक्ति थे। उनके तेजस्वी नेतृत्व और अहर्निश संघ कार्य के लिए उठाए श्रम, कार्यशक्ति का लाभ दीर्घकाल तक संघ को मिला। वर्ष में एक बार वे पूरे भारतवर्ष का प्रवास अवश्य किया करते थे इस कारण उनके विचारों को अनेकों ने सुना। उनकी गंभीरता और शुद्धता के कारण अनेकानेक लोग प्रभावित हुए। उनका ध्यान छोटी-छोटी बातों की ओर भी कितना रहता था इसके कई साक्षीदार आज भी हैं। वे जिस नगर में होते थे वह पूरा नगर मानों उनकी उपस्थिति मात्र से अभिभूत हो जाता था। कई स्वयंसेवक तो प्रतिदिन देवदर्शन के लिए जाते हैं उस प्रकार से प्रतिदिन सुबह-शाम उनके सामने जाकर बैठकर चुपचाप उन्हें निहारते रहते थे, गंभीरता से सुनते रहते थे।

कोई भी व्यक्ति श्रीगुरुजी तक सहजता से पहुंच सकता था अपना मनोगत बता संतुष्टि प्राप्त कर सकता था। किसी ने श्रीगुरुजी को पत्र लिखा और उसका उत्तर उनकी विशिष्ट शैली में प्राप्त न हुआ हो, ऐसा कहनेवाला मनुष्य ढूंढ़कर भी नहीं मिलेगा। उनका व्यवहार इतना आत्मीयपूर्ण होता था कि कई स्वयंसेवक अपने घर के मंगलकार्यों की तिथियां तक उनके प्रवास कार्यक्रम को देखकर तय किया करते थे जिससे कि श्रीगुरुजी का आशीर्वाद और स्नेह वर्षा वे पा सकें।

एक कुशल संगठक के रुप में उनकी ख्याति देश-विदेश में है। एक श्रेष्ठ चिंतक होने के नाते उनके अपने विचार थे जिन पर वे पूरा जीवन अडिग रहे और उनके विचारों के विरोधियों तक ने उनकी संगठन कुशलता और विचारों पर अडिग रहने के स्वभाव की प्रशंसा की है। समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले अनेकानेक व्यक्तियों ने उनमें संघ के स्वयंसेवक भी हैं और जो नहीं हैं उन्होंने भी मार्गदर्शन की अपेक्षा से पत्र व्यवहार किया है उनमें विदेशों में स्थित भारतीय जन भी हैं। जिन्होंने अपनी समस्याओं के हल के लिए उनसे मार्गदर्शन की विनती की थी।

हिंदू संस्कृति और अपने हिंदू राष्ट्र को सर्वस्व अपर्ण करने की सिद्धतावाले हजारों कार्यकर्ताओं का एक विशाल परिवार उनके इस व्यक्तिगत संपर्कों के कारण ही खडा हो सका। उनके पत्रों की ओजस्वी भाषा भावनाओं को उद्दीप्त करनेवाली होकर मातृभूमि के प्रति विशुद्ध भक्तिभाव को जागृत कर सर्वस्व अपर्ण कर देने की प्रवृत्ति निर्मित कर देती है। विदेशस्थ बंधुओं को लिखे पत्रों का प्रमुख सूत्र यही होता था कि जिस देश में रह रहे हो वहां के जनजीवन से शुद्ध बंंधुभाव से समरस होकर हिंदू संस्कृति के अनुसार जीवन व्यतीत करें। श्रद्धेय साधु-संतों को लिखे पत्रों में गहन अध्यात्म सुलभ शब्दों में व्यक्त किया हुआ दिखता हैं।

सन्मान्य मंत्रियों को लिखे पत्रों में कर्तव्य का सुस्पष्ट बोध और तद्‌नरुप आचरण की अपेक्षा पर मुख्य बल रहता था। भारत का नेतृत्व करनेवालों को लिखे पत्रों में उनके विचारों और उनकी प्रतिष्ठा का आदर करते हुए अपने विचारों का तर्कपूर्ण प्रतिपादन और सहयोग का स्नेहपूर्ण आवाहन दृष्टिगोचर होता है।

अन्य धर्मियों को लिखे पत्रों में सर्वधर्म-समभाव और उसी प्रकार से हिंदू जीवन का उदार दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। माता-भगीनियों को लिखे पत्रों में मातृत्व संबंधी सहज दृष्टिगोचर होनेवाली श्रद्धा और समर्पण भाव शब्द रुप में प्रकट हुआ है। अन्य क्षेत्रों में सक्रिय कार्यकर्ताओं को लिखे पत्रों में निरपेक्षता से काम करनेवालों को अपने क्षेत्र की न्यूनताओं को किस प्रकार से दूर करें का मार्गदर्शन, विश्वसनीय दिशाबोध दिया हुआ है। श्रमिक क्षेत्र के एक कार्यकर्ता को लिखा है - ''अन्य यूनियन्स के कुशल कार्यकर्ताओं से आत्मीयता का संबंध प्रस्थापित करें।""

संघ के संबंध में सहानुभूति को रखनेवालों को लिखे पत्रों में संघकार्य में शामिल हों की विनती है। इस प्रकार से विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न विषयों पर लिखे हुए हजारों पत्रों में से वनवासी क्षेत्र से संबंधित एक पत्र नीचे उद्‌धृत है -

जनजागृति यही धर्मांतरण रोकने का मार्ग ः

श्रीकृष्णानंदजी,
श्री. मन्नार पी. के. गोपाल्‌न नायर, ऍड्‌व्होकेट, त्रिवेन्द्रम्‌                                              दि. 25-11- 1953

..... 'द मिथ ऑफ सेन्ट थॉमस एक्स्प्लोडेड" यह आपकी पुस्तक पढ़ी। आपने ऐतिहासिक प्रमाण प्रकाश में लाकर निर्विवाद रुप से दिखला दिया है कि, सेन्ट थॉमस और केरल प्रदेश में उसका कार्य यह यथार्थ आधार न रखनेवाली कपोलकल्पित कथा है। एकाध विद्वान ऐतिहासिक संशोधन को शोभा दे सके इस प्रकार का संतुलन आपने रखा है और आपके विधान में स्पृहणीय संयम का पालन है, इस संबंध में मैं आपका अभिनंदन करता हूं ईसा का नाम लेनेवाले वर्तमान के स्थानीय ईसाई धर्मप्रचारकों द्वारा चलाए हुए प्रक्षोभक प्रचार को देखते हुए आपने दिखाया हुआ संयम बहुत दुःसाध्य है।

भले ही सत्य कहा गया हो, तो भी हिंदू विरोधी गंदा प्रचार और हिंदुओं को विदेशी वैसेही राष्ट्रीयत्व के लिए घातक मत की दीक्षा देनेवाले मिशनरीयों का तीव्र अभियान कम होगा क्या, इस प्रकार की संभावना नहीं। लोगों के पास जाना, उन्हें सज्ञान करना और उनके दैनिक जीवन की दीनता-निर्धनता दूर कर वह अधिकाधिक उज्जवल बनाने के लिए उनकी सहायता करना यही एकमेव मार्ग है।
अपने बंधुओं को इस तथाकथित ईसाई अभिनिवेश से बचाने के लिए और अपने प्राचीन महान परंपरागत धर्म के संबंध में योग्य श्रद्धा उनके अंतःकरण में जागृत करने के इस भावात्मक कार्य की ओर उचित ध्यान आकर्षित करने पर आपकी समयोचित और सूचनापूर्ण पुस्तक का उपयोग अवश्य होगा ऐसा लगता है।
( पत्ररुप श्रीगुरुजी - मराठी से अनुदित, पृ. 203)

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