Wednesday, 29 February 2012

शहीद नहीं हुतात्मा कहिए ! ! !

शहीद नहीं हुतात्मा कहिए ! ! !

जिस प्रकार से सेक्सी शब्द हाल ही में दिए गए एक बयान के कारण चर्चा में है और उसे घोर आपत्तिजनक माना जा रहा है जो सत्य ही है। किसी भी सुंदर स्त्री को सेक्सी शब्द से संबोधित करना निश्चय ही अत्यंत आपत्तिजनक है। इसी प्रकार से एक और भयानक आपत्तिजनक शब्द जो बहुतायत से प्रयोग में लाया जाता है वह है अरबी शब्द 'शहीद"।

वस्तुतः हमारी सभी भारतीय भाषाएं कम-अधिक प्रमाण में विदेशी भाषाओं से आक्रमित हैं। और खेद यह है कि, हम आप सभी इस आक्रमित भाषा को स्वीकार चूके भी हैं तथा अपने व्यवहारिक जीवन में इस अशुद्ध, भ्रष्ट भाषा का प्रयोग निःसंकोच एवं सहजता से करते भी हैं। इस बहाव में बहते हुए हम आज यहां तक आ चूके हैं कि, 'शहीद" शब्द का भी प्रयोग धडल्ले से करे जा रहे हैं।
भारतीय भाषाओं पर विदेशी भाषाओं का आक्रमण विदेशी सत्ताओं के कारण हुआ। हिंदवी स्वराज्य संस्थापक वीर शिवाजी ने इस सांस्कृतिक आक्रमण को समाप्त करने के उद्देश्य से विद्वान श्री रघुनाथपंत हणमंते को 'राज्य व्यवहार कोष" की रचना का आदेश दिया था। इधर विगत शती में वीर सावरकरजी ने हिंदूजन की अस्मिता जागरण को अभियान के रुप में भाषा शुद्धि का उपक्रम चलाया। उनके द्वारा गढ़े गए महापौर, दिनांक, संकलन आदि विशुद्ध भारतीय शब्द सांप्रति हमारे व्यवहार में हैं। दुर्भाग्य से अस्मिता जागरण का अभियान शिथिल पडा। फलतः सर्वथा अवांछित विदेशी भाषा-संस्कृति का प्रभाव पुनः बढ़ते चला गया।

इंदौर में 1938 में संपन्न हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में महात्मा गांधी, काका कालेलकर आदियों ने हिंदी की परिभाषा में उसे 'हिंदुस्तानी" बनाने की चालें चली। तथापि, हिंदी साहित्य सम्मेलन के 1940 के पुणे अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष हिंदी के ख्यात विद्वान पंडित ग. र. वैशंपायन के सामने हिंदुस्तानीवाले गांधी-काका को मुंह की खानी पडी। जुझारु स्वभाव के पं. वैशंपायन  ने 1941 में अबोहर (पंजाब) में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन परिषद में इंदौर अधिवेशन में हिंदी की परिभाषा में उलट फेर कर उसे 'हिंदुस्तानी" बनाने की जो राजनीति की गई थी उसे पटकनी देते हुए हिंदी के विशुद्ध स्वरुप की पुनर्स्थापना की। फलतः महात्मा गांधीजी, काका कालेलकर ने पलायनवाद को अपनाकर अलग से हिंदुस्तानी प्रचार सभा का गठन किया।

परंतु, आज हमें इस इतिहास का स्मरण नहीं। इसी कारण से किसी भी हौतात्म्य को 'शहादत" और हुतात्मा को 'शहीद" कहने की लत हमें पड गई है। यंत्रणाएं सहकर भी इस्लाम का स्वीकार न करते हिंदू के रुप में मृत्यु स्वीकारनेवाले धर्मवीर हकीकतराय को भी 'शहीद" कहा जाता है। इसी लत के कारण धर्मवीर संभाजी (छावा) के बलिदान को 'शहादत" कहने से भी हम दूर नहीं रह पाते। इसी प्रकार से स्वतंत्रता के लिए लडी गई लडाई में फांसी चढ़ गए हुतात्माओं को भी 'शहीद" कहा जाता है। इस घोर अज्ञान के कारण इन वीरों की अवहेलना होती है इसका तनिक सा भी भान हिंदुओं को नहीं है।

कुरान भाष्य के अनुसार ''शहीद वह है जो अल्लाह की राह में (यानी जिहाद करते हुए) मारा जाए। उसे शहीद का लकब (उपाधि) इसलिए दिया गया है कि वह इस्लाम की सत्यता की गवाही (साक्ष्य) जान (प्राण) दे कर पेश करता है। शहादत अत्यंत बुलंद दर्जा है।"" (दअ्‌वतुल कुरान भाष्य खंड 1, पृ. 219) शहादत यानी अल्लाह के एकत्व और मुहम्मद साहेब के पैगंबरत्व पर श्रद्धा की साक्ष्य देना। यह इस्लाम का पहला स्तंभ मूलभूत और अनिवार्य होकर इससे किसी भी मुस्लिम को छूट नहीं। 'लाइलाहइल्लल्लाह मुहम्मदुर्ररसूल्लाह" अर्थात्‌ अल्लाह एकमेव है और मुहम्मद उसके रसूल हैं यानी पैगंबर हैं। इस शब्दसमुच्च्य को 'शहादत" कहते हैं। इसे ही 'कलमा" भी कहते हैं।

जिहाद अल्लाह के बोल (कलिमे) को बुलंद करने के लिए किया जाता है अर्थात्‌ अल्लाह के धर्म (यानी इस्लाम) का प्रभुत्व निर्मित करने के लिए किया हुआ युद्ध। और यह युद्ध अर्थात्‌ जिहाद करते हुए जो मारा जाता है उसके विषय में कुरान कहती है ''जो लोग  अल्लाह की राह में कत्ल हुए उन्हें मुर्दा खयाल न करो बल्कि वे जिंदा हैं, अपने रब के पास रिज्क पा रहे हैं।"" (3ः169) इस आयत पर कुरान भाष्य कहता है - ''अल्लाह की राह में शहीद होना अमर एवं अनंत जीवन की जमानत है। यूं तो महसूस यही होता है कि अल्लाह की राह मेें कत्ल होनेवाले मर गए लेकिन हकीकत यह है कि मृत्य तो शरीर को आती है, रुह को नहीं। शहीद होनेवाले की रुह को स्वर्गलोक में एक विशेष प्रकार का जीवन प्राप्त होता है और यह जीवन आनन्द और उन्माद से इतना भरा होता है कि इसकी कल्पना भी इस दुनिया में नहीं की जा सकती।"" (दअ्‌वतुल कुरान खंड 1, पृ. 231) ''जबकि काफिरों (इस्लाम से इंकार करनेवाले) की रुहें दुखों और यातनाओं में पीडित रहती है।"" (67)

पैगंबर ने का कथन (हदीस) है - '"'शहीदों" की रुहें हरे परिंदों के खोल (घेरे) में होती है और उनका ठिकाना अर्श (ऊपरी आसमान) से लटकते हुए किंदीलों (दीप-पात्रों) के पास होता है। वे जन्नत में जहां चाहती हैं सैर करती हैं उसके बाद उन किंदीलों के पास वापस आ जाती हैं। उनका रब उन से पूछता है, तुम्हें किस चीज की इच्छा है? वे कहती हैं हमें किस चीज की इच्छा हो सकती है जबकि हम जन्नत की जिस तरह चाहें सैर कर सकती हैं अल्लाह उनसे तीन बार यह सवाल करता है। वे जब देखती हैं कि  उनसे बार बार सवाल किया जा रहा है तो कहती हैं, ऐ हमारे रब हम चाहते हैं कि हमारी रुह हमारे शरीर में लौटा दी जाए ताकि हम दोबारा तेरी राह में कत्ल किए जाएं। अल्लाह जब देखता है कि इनकी कोई जरुरत बाकी नहीं रही तो उन्हें उनकी हालत पर छोड देता है।"" (231) 
 
यह ठीक है कि जब तक हम इस विदेशी शब्द 'शहीद" का अर्थ कुरान भाष्यानुसार क्या निकलता है के संबंध में अनभिज्ञ थे तब तक इस शब्द को प्रयोग में लाते रहे परंतु, अब जब हम इस शब्द के वास्तविक अर्थ से अवगत हो गए हैं तो हमारे द्वारा अब 'शहीद" के स्थान पर हमारे अपने 'हुतात्मा" शब्द को ही प्रयोग में लाना उचित होगा। हुतात्मा का अर्थ होता है वह जिसने किसी अच्छे श्रेष्ठ कार्य के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया हो या अपने प्राण तक भी न्योछावर कर दिए हों। हुतात्मा शब्द वीर सावरकरजी का दिया हुआ है। 'हुतात्मा" शब्द सावरकरजी को अंदमान में रहते अपने बंधु से बातचीत करते हुए सुझा था और शहीद या ारीींूी से भी अधिक समर्पक, अत्युदार, अधिक व्यापक और अधिक पवित्रता सूचक होने के कारण वह मन को अधिक भा गया; तभी से उन्होंने उसे प्रचलित किया। इस हुतात्मा शब्द की शक्ति तो देखिए कि 26/11 का जिहादी कसाई कसाब के हाथ को पकडने वाले पुलिसमेन तुकाराम ओंबले ने मरणोपरांत भी उस कसाब का हाथ नहीं छोडा और इस कारण वह कसाब भाग भी न सका और पकडा गया। यह है हुतात्मा की पकड। लेकिन खेद है कि हम आज इस पवित्र शब्द को भूल विदेशी शब्द 'शहीद" को गले से लगाए बैठे हैं और अनभिज्ञतावश इसका प्रयोग धडल्ले से कर रहे हैं।

अंत में यही कहना है - सोच बदल लो नजारे बदल जाएंगे, शहीद नहीं हुतात्मा कहिए सारे भाव बदल जाएंगे।

Saturday, 25 February 2012

नवदृष्टि के जनक - बुद्धिवादी वीर सावरकर

नवदृष्टि के जनक - बुद्धिवादी वीर सावरकर

वीर सावरकरजी ज्ञानमार्गी होने के साथ ही हर एक विषय का स्वतंत्र एवं मूलगामी विचार करनेवाले होने के कारण उनकी विचार सृष्टि बहुरंगी है। जिसके कारण जनसाधारण मंत्रमुग्ध सा हो जाता है। बुद्धि प्रामाण्यता एवं इहवादी दृष्टिकोण होने के कारण कई बार वे चार्वाकवादी भी लगते हैं। क्योंकि, इहलोक और केवल इहलोक को माननेवाला व्यक्ति और समाज के हित देखने के लिए दंडनीति  को माननेवाले चार्वाक का विचार करें और सावरकरजी के बुद्धिवादी सामाजिक मतों को देखें तो वे चार्वाक कुल के ही लगते हैं।

सावरकरजी के सामाजिक विचारों के महत्वपूर्ण सूत्र हैं बुद्धिप्रामाण्य और प्रत्यक्षनिष्ठा और इसी विज्ञाननिष्ठ भूमिका से उन्होंने हिंदूधर्म की सामाजिक रुढ़ियों की समीक्षा की थी। उदा. 1935 में डॉ. आंबेडकरके संभावित धर्मांतरण के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था ''चाहें तो डॉ. आंबेडकर एक बुद्धिवादी संघ निकालें।"" इस पत्रक में सावरकरजी ने इस बुद्धि संघ के आधार तत्त्वों को स्पष्ट करते हुए कहा था, 'आज की परिस्थितियों में जनहित को प्रत्यक्ष साधने के नियम ही जिसका आधार, तर्कनिष्ठ और प्रत्यक्षागत तत्त्वज्ञान ही जिसके उपनिषद और विज्ञान ही जिसकी स्मृति ऐसा बुद्धिवादी संघ स्थापित करें और इसके अनुयायियों को अंधश्रद्धा के और बेकार की बातों के पिंजरे से छुडवाकर एक झटके से नवीनतम ऐसे बुद्धि स्वतंत्रता के उच्चतम और आरोग्यप्रद वातावरण में ले जाकर छोडें यही इष्ट है।"" (समग्र सावरकर खंड 3, पृ.571)

इसी पत्रक के प्रारंभ में धर्म छोडने की भूमिका बुद्धिवादी होनी चाहिए यह ध्वनित करते हुए सावरकरजी ने कहा - 'जिसमें कुछ पुराने और आज की परिस्थितियों में निरर्थक ही नहीं तो अनर्थक भी हो चूके आचार और संकेत जो होते ही हैं, उन्हें जनहित के लिए सुधारना जिन्हें अपना कर्तव्य लगता है और पारलौकिक समझी जानेवाली बातों पर जो प्रत्यक्षनिष्ठ तर्क के पार जाकर विश्वास करने के इच्छुक नहीं, ऐसे पॉजिटिव्ह अथवा रॅशनिलिस्ट आदि बुद्धिवादियों ने एकाध धर्म छोडा तो उसका कारण सहज ध्यान में आता है। इस अर्थ से यदि डॉ. आंबेडकर हिंदूइज्म को छोड रहे हों तो इसमें कोई बडी बात नहीं।" इसका मथितार्थ यह है कि बुद्धिवादी दृष्टिकोण से इसमें सावरकर को कुछ भी आक्षेपार्ह नहीं लगता।

धर्मविज्ञान की दृष्टि से कुरान और बाइबल का अध्ययन कर सावरकरजी ने डॉ. आंबेडकरजी को यह कहलवाया था कि, 'कुछ भी हो तो भी बुद्धिवादी दृष्टिकोण से विचारा जाए तो समग्र रुप से समस्त धर्मों में यदि कोई ग्राह्यतम धर्म होगा तो वह हिंदूधर्म ही है।" (जात्युच्छेदक निबंध, पृ. 222) परंतु, यह निष्कर्ष निकालते समय सावरकरजी की दृष्टि चिकित्सक और बुद्धिनिष्ठ ही थी। सावरकरजी ने स्पष्ट कहा था कि, समाज संस्था की पुनर्रचना किसी भी धर्मग्रंथ के आधार पर न हो।

यह बुद्धिवादी दृष्टिकोण उनमें बचपन से ही था। जिज्ञासा का उद्‌गम उनमें बचपन में ही किस प्रकार से जागृत हो गया था इसका वर्णन सावरकरजी ने स्वयं के आत्मचरित्र में किया है। अपने ज्ञानमार्ग का उपयोग राष्ट्रोत्थान के लिए करने का उनका निश्चय युवावस्था से ही था। सावरकरजी सिद्धांतों के पक्के और निग्रही सुधारक थे, वाचाल नहीं। उनका आचार सूत्र था 'वरं जनहितं ध्येयम्‌"। 'सुधार यानी अल्पमत और रुढ़ी मतलब बहुमत।" इस कारण अपने अल्पमत या एकाकी पडने की चिंता उन्होंने कभी नहीं की। परंतु, वास्तववादी होने के कारण भले ही वे स्वयं भगवान सत्यनारायण की पूजा नहीं करते थे, किंतु यदि किसीने की तो वे उसका उपहास भी नहीं उडाते थे प्रत्युत झुणका-भाकर (बेसन और ज्वार की रोटी), सत्यनारायण की पूजा जैसी सामाजिक सुधार घटित करवाने में उपयुक्त ठहरनेवाले आंदोलनों का वे समर्थन करते थे।

उनके सुधारवादी मानस के हठ का पता उनकी पत्नी के देहावसान के पश्चात उनका पिंडदान आदि अनावश्यक विधि न करने का निश्चय आप्तजनों के आग्रह, अनुयायियों के सत्याग्रह, प्रदर्शन करने के बाद भी उन्होंने नहीं बदला। इतने हठी होने के बावजूद सुधारवाद के लिए रत्नागिरी में अस्पृश्यता निवारण और शुद्धिकरण आंदोलन के लिए कार्यकर्ताओं का संगठन अपने वास्तववादी होेने के कारण ही खडा कर दिखाया।

यह सुधारवाद भी उनमें प्रारंभ से ही था। जिसका परिचय 1902 में रचित रचना 'बालविधवा दुःस्थिति कथन" से पता चलता है। इस कविता में हिंदू समाज की विधवाओं का दुःख वर्णित है इसके लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला था। भावना प्रधान कविताओं की रचना उन्होंने अंदमान के कारावास में की थी। जो मराठी साहित्य की अनमोल धरोहर है। समाज सुधार के विचार-भावनाएं उनमें प्रारंभ से ही थी। युवावस्था में आगरकरजी और मिल्स स्पेंसर की उपयुक्ततावादी नीति की पकड उनके मानस पर हो गई थी। उपयुक्ततावाद पर उन्होंने अपने आत्मचरित्र में कहा है -

'जिस नीतिशास्त्र के सूत्र और आचार पर अपने क्रांतिकारी आंदोलन को खडा करना चाहिए और समर्थन करना चाहिए वह यही  (यूटिलिटी) नीतिशास्त्र, यही क्रांति की मनुस्मृति ऐसा मैं कहता था, ऐसा मैं मानता था और महाभारत के कृष्ण के अनेक प्रसंगों के भाषणों पर से मैं यह सिद्ध करता था कि, भगवान कृष्ण ही उपयुक्ततावाद के प्रणेता ही नहीं, आचार्य भी थे। उन्होंने वह आचरण में लाकर दिखलाया। उनके सभी आचरणों का समर्थन उन्होंने इसी तत्त्व पर किया था।" (माझ्या आठवणी पृ. 10) भगवान श्रीकृष्ण सावरकरजी के आराध्य थे।

परंतु, समाज संस्था की पुनर्रचना किसी भी धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं होना चाहिए यह सावरकरजी ने स्पष्ट रुप से कहा था। समाज की रचना करते समय नीति का, सामाजिक उपयुक्तता की दृष्टि से ही विचार किया जाना चाहिए। सावरकरजी ने अपने सामाजिक विचारों में मुख्यतः हिंदुओं के सामाजिक दोषों की ही चिकित्सा और चर्चा की होने पर भी भारतीय राष्ट्र के एक घटक के रुप में मुसलमानों को भी अपना सामाजिक परीक्षण और अपने धार्मिक उन्माद, रुढ़ियों का उच्छेद करें, ऐसा उन्हें भी कहा है। मुसलमान अगर विज्ञाननिष्ठ और प्रगत हो गए तो उसमें हिंदुओं का तो कल्याण है ही उससे अधिक उनका स्वयं का भी बडा कल्याण है।

उनके सामाजिक तत्त्वज्ञान का आधार ही विज्ञाननिष्ठा था और नए युग का वह दीपस्तंभ है, नए युग की प्रगति का दीपस्तंभ है यह वे साधार उदाहरणों सहित कहा करते थे। वे हिंदुओं का मानसिक आधुनिकरण करना चाहते थे क्योंकि उनको विश्वास था कि विज्ञानवादी हिंदू समाज ही भारत को आधुनिक और समर्थ बनाएगा।

यंत्र से बेकारी बढ़ेगी इसका उत्तर देते हुए सावरकरजी ने कहा था यह अर्थरचना का दोष है। यहां भी विश्व में चल रही दौड में अपना राष्ट्र पीछे न रह जाए यही उद्देश्य है। सावरकरजी के दो ही ध्येय थे 1). हिंदुओं का उत्थान; 2). देश की स्वतंत्रता। उन्हें अपने ज्ञान, अपनी बुद्धिमतता, अपने बुद्धिप्रामाण्य, विज्ञाननिष्ठा को राष्ट्र के उत्थान के लिए ही उपयोग में लाना था। उनका युवावस्था से ही निश्चय था - 'तुजसाठी (तेरे लिए) मरण ते जनन, तुजविन (तेरे बिना) जनन ते मरण (मृत्यु)"

सावरकरजी ने जो यह नई दृष्टि दी थी उसकी राष्ट्र ने उपेक्षा की उसीका परिणाम आज राष्ट्र भोग रहा है। परंतु, अभी भी वह समय गया नहीं है आज भी अगर राष्ट्र ने उनकी इस नवदृष्टि का वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय वृत्ति से अध्ययन किया तो, राष्ट्रहित सधेगा मार्गदर्शन उन्होंने ग्रंथरुप में दे ही रखा है। अंत में सावरकरजी का यह विचार प्रस्तुत कर लेख समाप्त करता हूं कि, 'प्रत्येक पीढ़ी के प्रश्न अलग होते हैं भले ही वे स्वमत के आग्रही थे तो भी वे यह मानते थे कि, आज की पीढ़ी पुरानी पीढ़ी कंधे पर खडी होने के कारण उसे निश्चय ही दूर का अधिक दिखता है।"

Wednesday, 22 February 2012

पत्ररुप - श्रीगुरुजी

पत्ररुप - श्रीगुरुजी

श्रीगुरुजी ने 1940 से 1973 तक रा.स्व.से.संघ के सरसंघचालक पद का उत्तरदायित्व निभाया। श्रीगुरुजी तो संघ के मस्तक, ह्रदय, प्राण, कार्यशक्ति थे। उनके तेजस्वी नेतृत्व और अहर्निश संघ कार्य के लिए उठाए श्रम, कार्यशक्ति का लाभ दीर्घकाल तक संघ को मिला। वर्ष में एक बार वे पूरे भारतवर्ष का प्रवास अवश्य किया करते थे इस कारण उनके विचारों को अनेकों ने सुना। उनकी गंभीरता और शुद्धता के कारण अनेकानेक लोग प्रभावित हुए। उनका ध्यान छोटी-छोटी बातों की ओर भी कितना रहता था इसके कई साक्षीदार आज भी हैं। वे जिस नगर में होते थे वह पूरा नगर मानों उनकी उपस्थिति मात्र से अभिभूत हो जाता था। कई स्वयंसेवक तो प्रतिदिन देवदर्शन के लिए जाते हैं उस प्रकार से प्रतिदिन सुबह-शाम उनके सामने जाकर बैठकर चुपचाप उन्हें निहारते रहते थे, गंभीरता से सुनते रहते थे।

कोई भी व्यक्ति श्रीगुरुजी तक सहजता से पहुंच सकता था अपना मनोगत बता संतुष्टि प्राप्त कर सकता था। किसी ने श्रीगुरुजी को पत्र लिखा और उसका उत्तर उनकी विशिष्ट शैली में प्राप्त न हुआ हो, ऐसा कहनेवाला मनुष्य ढूंढ़कर भी नहीं मिलेगा। उनका व्यवहार इतना आत्मीयपूर्ण होता था कि कई स्वयंसेवक अपने घर के मंगलकार्यों की तिथियां तक उनके प्रवास कार्यक्रम को देखकर तय किया करते थे जिससे कि श्रीगुरुजी का आशीर्वाद और स्नेह वर्षा वे पा सकें।

एक कुशल संगठक के रुप में उनकी ख्याति देश-विदेश में है। एक श्रेष्ठ चिंतक होने के नाते उनके अपने विचार थे जिन पर वे पूरा जीवन अडिग रहे और उनके विचारों के विरोधियों तक ने उनकी संगठन कुशलता और विचारों पर अडिग रहने के स्वभाव की प्रशंसा की है। समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले अनेकानेक व्यक्तियों ने उनमें संघ के स्वयंसेवक भी हैं और जो नहीं हैं उन्होंने भी मार्गदर्शन की अपेक्षा से पत्र व्यवहार किया है उनमें विदेशों में स्थित भारतीय जन भी हैं। जिन्होंने अपनी समस्याओं के हल के लिए उनसे मार्गदर्शन की विनती की थी।

हिंदू संस्कृति और अपने हिंदू राष्ट्र को सर्वस्व अपर्ण करने की सिद्धतावाले हजारों कार्यकर्ताओं का एक विशाल परिवार उनके इस व्यक्तिगत संपर्कों के कारण ही खडा हो सका। उनके पत्रों की ओजस्वी भाषा भावनाओं को उद्दीप्त करनेवाली होकर मातृभूमि के प्रति विशुद्ध भक्तिभाव को जागृत कर सर्वस्व अपर्ण कर देने की प्रवृत्ति निर्मित कर देती है। विदेशस्थ बंधुओं को लिखे पत्रों का प्रमुख सूत्र यही होता था कि जिस देश में रह रहे हो वहां के जनजीवन से शुद्ध बंंधुभाव से समरस होकर हिंदू संस्कृति के अनुसार जीवन व्यतीत करें। श्रद्धेय साधु-संतों को लिखे पत्रों में गहन अध्यात्म सुलभ शब्दों में व्यक्त किया हुआ दिखता हैं।

सन्मान्य मंत्रियों को लिखे पत्रों में कर्तव्य का सुस्पष्ट बोध और तद्‌नरुप आचरण की अपेक्षा पर मुख्य बल रहता था। भारत का नेतृत्व करनेवालों को लिखे पत्रों में उनके विचारों और उनकी प्रतिष्ठा का आदर करते हुए अपने विचारों का तर्कपूर्ण प्रतिपादन और सहयोग का स्नेहपूर्ण आवाहन दृष्टिगोचर होता है।

अन्य धर्मियों को लिखे पत्रों में सर्वधर्म-समभाव और उसी प्रकार से हिंदू जीवन का उदार दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। माता-भगीनियों को लिखे पत्रों में मातृत्व संबंधी सहज दृष्टिगोचर होनेवाली श्रद्धा और समर्पण भाव शब्द रुप में प्रकट हुआ है। अन्य क्षेत्रों में सक्रिय कार्यकर्ताओं को लिखे पत्रों में निरपेक्षता से काम करनेवालों को अपने क्षेत्र की न्यूनताओं को किस प्रकार से दूर करें का मार्गदर्शन, विश्वसनीय दिशाबोध दिया हुआ है। श्रमिक क्षेत्र के एक कार्यकर्ता को लिखा है - ''अन्य यूनियन्स के कुशल कार्यकर्ताओं से आत्मीयता का संबंध प्रस्थापित करें।""

संघ के संबंध में सहानुभूति को रखनेवालों को लिखे पत्रों में संघकार्य में शामिल हों की विनती है। इस प्रकार से विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न विषयों पर लिखे हुए हजारों पत्रों में से वनवासी क्षेत्र से संबंधित एक पत्र नीचे उद्‌धृत है -

जनजागृति यही धर्मांतरण रोकने का मार्ग ः

श्रीकृष्णानंदजी,
श्री. मन्नार पी. के. गोपाल्‌न नायर, ऍड्‌व्होकेट, त्रिवेन्द्रम्‌                                              दि. 25-11- 1953

..... 'द मिथ ऑफ सेन्ट थॉमस एक्स्प्लोडेड" यह आपकी पुस्तक पढ़ी। आपने ऐतिहासिक प्रमाण प्रकाश में लाकर निर्विवाद रुप से दिखला दिया है कि, सेन्ट थॉमस और केरल प्रदेश में उसका कार्य यह यथार्थ आधार न रखनेवाली कपोलकल्पित कथा है। एकाध विद्वान ऐतिहासिक संशोधन को शोभा दे सके इस प्रकार का संतुलन आपने रखा है और आपके विधान में स्पृहणीय संयम का पालन है, इस संबंध में मैं आपका अभिनंदन करता हूं ईसा का नाम लेनेवाले वर्तमान के स्थानीय ईसाई धर्मप्रचारकों द्वारा चलाए हुए प्रक्षोभक प्रचार को देखते हुए आपने दिखाया हुआ संयम बहुत दुःसाध्य है।

भले ही सत्य कहा गया हो, तो भी हिंदू विरोधी गंदा प्रचार और हिंदुओं को विदेशी वैसेही राष्ट्रीयत्व के लिए घातक मत की दीक्षा देनेवाले मिशनरीयों का तीव्र अभियान कम होगा क्या, इस प्रकार की संभावना नहीं। लोगों के पास जाना, उन्हें सज्ञान करना और उनके दैनिक जीवन की दीनता-निर्धनता दूर कर वह अधिकाधिक उज्जवल बनाने के लिए उनकी सहायता करना यही एकमेव मार्ग है।
अपने बंधुओं को इस तथाकथित ईसाई अभिनिवेश से बचाने के लिए और अपने प्राचीन महान परंपरागत धर्म के संबंध में योग्य श्रद्धा उनके अंतःकरण में जागृत करने के इस भावात्मक कार्य की ओर उचित ध्यान आकर्षित करने पर आपकी समयोचित और सूचनापूर्ण पुस्तक का उपयोग अवश्य होगा ऐसा लगता है।
( पत्ररुप श्रीगुरुजी - मराठी से अनुदित, पृ. 203)

Thursday, 16 February 2012

दो समाजों की कट्टरता

दो समाजों की कट्टरता

गत दिनों प्रकाशित मेरे एक लेख 'समझें मुस्लिम मानस को" में हिंदुओं की धार्मिक कट्टरता का उल्लेख आया था। इस पर मेरे कुछ मित्रों द्वारा सनातन धर्म को मैं कट्टर कह रहा हूं इस पर क्षोभ प्रकट किया गया था। उस संदर्भ में कहना चाहता हूं कि, मैं ने जिस कट्टरता का उल्लेख किया था वह धर्म पालन के संदर्भ में था। उदा. मस्तक पर तिलक कैसे लगाएं तो हिंदूधर्म में कई तरह की तिलक लगाने की पद्धतियां प्रचलित हैं। जो विभिन्न संप्रदायों की विविध प्रकार की और विशिष्ट होती हैं। हर संप्रदाय का तिलक लगानेवाला अपने तिलक के संदर्भ में वह खडा है कि आडा आदि के संदर्भ में अत्यंत आग्रही होता है और वह चाहे जो हो जाए उसी प्रकार से लगाता रहता है जिस प्रकार से कि वह संप्रदायानुसार पूर्व से लगाता चला आ रहा है। इस प्रकार के और भी अनेकानेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। यह कट्टरता हमारी अपनी अंतर्गत है परंतु, उस प्रकार की हिंसक और घातक नहीं जिस प्रकार की इस्लाम में है। क्योंकि, न तो हमारे यहां काफिर की संकल्पना है ना ही उनसे कयामत तक लडते रहने की आज्ञा जैसीकि कुरान भाष्य में दी हुई है ः हदीस में आता है ः''मेरी उम्मत (मुस्लिमसमुदाय) का एक समूह सत्य (यानी इस्लाम) पर रहकर कियामत तक लडता रहेगा और गालिब होगा।""(दअ्‌वतुल कुरान खंड2 पृ.1149) और न ही दूसरे धर्मों के आराध्यों को हमेशा के लिए नरकगामी बताने की संकल्पना जैसीकि कुरान भाष्य में इस प्रकार से हैं ः ''बहुदेववादियों तुम और तुम्हारे ये बुत जिनकी तुम पूजा करते हो जहन्नम का ईंधन बननेवाले हैं .. अर्थात्‌ बुत भी और उनको पूजनेवाले भी सदा जहन्नम रहेंगे। यहां यह पहलू विचारणीय है कि कुरान मूर्तिपूजा का वह अंजाम जो आखिरत (कयामत) में होनेवाला है मूर्तिपूजकों के सामने दोटूक अंदाज में बयान करना है।""(द.कु.ख.2पृ.1110)

हमारे यहां भी एकेश्वरवाद है, वेदों में मूर्तिपूजा नहीं है, स्वामी दयानंदजी सरस्वती ने भी मूर्तिपूजा का विरोध किया परंतु, कभी अपने अनुयायियों को यह नहीं कहा कि जाओ मूर्तिपूजकों के मंदिरों को ढ़हा दो, मूर्तियों को तोड दो। हमारे यहां तो अपने-अपने धर्मपालन के संदर्भ में कोई कितना भी कट्टर क्यों ना हो तो भी जितनी अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता हिंदूधर्मांतर्गत है उतनी किसी भी धर्म में नहीं। तभी तो हमारे यहां सिखधर्म के संस्थापक गुरुनानकदेवजी जो निराकार के पूजक हैं के पुत्र श्रीचंद साकार के पूजक होकर प्रसिद्ध उदासीन आश्रम के संस्थापक हैं। अद्वैत का दर्शन देनेेवाले आद्यशंकराचार्य मूर्तिपूजकों के लिए मंत्रों और श्लोकों की रचना करते हैं और मूर्तिपूजक उनका पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव से उच्चारण करते हैं, उनके मंत्रों का जाप फल प्राप्ति हेतु पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं। चार्वाक महांकाल की पेढ़ी पर बैठकर 'यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृणं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः" का उद्‌घोष करते हैं और उन्हें भी हम मान्यता देते हैं, उनका उल्लेख एक ऋषि के रुप में करते हैं।

जबकि इस्लामी कट्टरता में किसी भी प्रकार की न तो अंतर्गत ना ही बाह्य स्वतंत्रता है। वह कट्टरता तो अपने अलावा किसी अन्य को जीने ही नहीं देना चाहती। जिस पर अब हम गौर करेंगे। इस्लाम का ध्येय तो अल्लाह ने ही कुरान में इस प्रकार से घोषित कर रखा है ः''और यहां तक उनसे (श्रद्धाहीनों/काफिरों से) लडो कि फसाद (की जड)(यानी श्रद्धाहीनता) बाकी न रहे और एक अल्लाह ही का दीन (इस्लामधर्म) हो जाए।"" (2ः193) मुहम्मद साहेब के ही वचन (हदीस) हैं ः 'मुझे लोगों के विरुद्ध तब तक युद्ध करने के लिए कहा गया है जब तक कि, वे यह कहेंगे नहीं 'अल्लाह केवल एक ही है।" (मुस्लिमः29से33; बुखारीः7284,85;दाउदः2484; इब्नमजहः71,2) पैगंबर ने कहा ः 'एक भूमि पर दो धर्म रहना योग्य नहीं।"(दाउदः3026;मुवत्ता मलिक1588)

यह एकमेव अल्लाह कुरान की सर्वाधिक महत्वपूर्ण, मौलिक, मध्यवर्ती और आधारभूत संकल्पना है। (दिव्य कुरान (मराठी भाषांतर) पृ.26) कुरान के अनुसार 'मेरी (श्रद्धावान यानी मुसलमान की) नमाज और मेरी कुर्बानी, और मेरा जीना और मेरा मरना, अल्लाह के लिए है।(6:162) अल्लाह के लिए कुरान में अन्य 99 संज्ञाएं या विशेषण आए हैं। उनके लिए रहमान, रहीम और मालिक  ये तीन विेशेषण कुरान में बार-बार उपयोग में लाए गए हैं । कुरान में अल्लाह 2800 बार तो ये अन्य तीन शब्द कुल 790 बार आए हैं । (Religion of islam - 159 से 61) अल्लाह का मूल रूप 'अल-इलाह" है। इसमें 'इलाह " का अर्थ ईश्वर होता है। 'अल" अरबी भाषा का (अंग्रेजी के 'द " जैसा) एक उपपद है। यह उपपद सामान्य नाम के पूर्व लगाया कि, वे दोनों मिलकर एक विशेष नाम तैयार होता है । अर्थात्‌ मूलत: 'अल्लाह" यह एक देवता का विशेष नाम है। (The Tarjuman Al-Quaran- Maulana Azad - पृ.14) सामान्य नाम का विशेष नाम करने का यह अरबी तरीका है। उदा. जब किताब कहें तो, सामान्य पुस्तक हुई परंतु उसके पूर्व 'अल" विशेषण लगाने पर, 'अल-किताब" यह विशेष नाम बनता है और उसका अर्थ 'कुरान" यह विशिष्ट ग्रंथ ऐसा होता है। उसी प्रकार 'अल" यह उपपद 'इलाह" के पूर्व में (अर्थात्‌ देवता के पूर्व) लगाया कि, 'अल्लाह" यह विशिष्ट देवता का विेशेष नाम तैयार होता है। 'अल्लाह" नामका एक विशिष्ट देवता ऐसा इसका अर्थ होता है। इसीलिए मुहम्मद पिकथॉल ने उनके कुरान अनुवाद में 'इलाह" के लिए 'गॉड" तो 'अल्लाह" के लिए भर अल्लाह ऐसा अनुवाद किया हुआ है । (The meaning of the Glorious Quaran pickthall - पृ.31)

'अल्लाह" पैगंबर के पूर्व से ही (मुहम्मद साहब की) कुरैश जाती के देवता का नाम था। अरब लोग भी सर्वोच्च देवता के रूप में 'अल्लाह" को मानते थे। (A History of Muslim Philosophy m.m.sharif - पृ.127) अल-उज्जा, लात, मनात ये देवियां उस 'अल्लाह" की कन्याएं हैं ऐसी भी उनकी श्रद्धा थी। अल्लाह के साथ ही इन देवियों को भी और उसके साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं को भी अरब लोग मानते थे। इसे ही 'अनेकेश्वरवाद" कहते हैं। अरबी भाषा में इसे 'शिर्क" कहते हैं।(127) इस 'शिर्क" को समाप्त करके विशुद्ध एकेश्वरवाद की प्रस्थापना करना ही कुरान की भूमिका है। पूर्व से ही अरबस्थान में माने जाने वाले अल्लाह को ही कुरान में एकमात्र ईश्वर का स्थान प्राप्त हुआ है।

इस अल्लाह की विशिष्टता यह है कि इस अल्लाह की कृपा, दया, प्रेम, मार्गदर्शन, क्षमा, बदला, सहायता, लडाई में विजय यह सब श्रद्धावान (मुसलमान) को ही मिलता है। श्रद्धाहीन (यानी गैर-मुस्लिम अर्थात्‌ ही काफिर) के लिए ठीक इसके विपरीत रहता है। इस्लाम के अनुसार 'श्रद्धा" यह सद्‌गुणों, नीतिमूल्यों, सदाचार, न्याय का मूल स्त्रोत है, तो श्रद्धाहीनता (कुफ्र) दुर्गुणों, दुराचार, अनीति, अन्याय का मूल स्त्रोत है। श्रद्धा रखने पर मनुष्य सदाचारी, सत्यवचनी, सद्‌गुणी, सह्रदयी, संयमी, न्यायी, क्षमाशील, शांतिप्रिय, समतावादी, परोपकारी, नीतिमान, मानवतावादी बन सकता है, तो श्रद्धाहीनता के कारण इसके विपरीत घटित होता है। इसीलिए सदाचारी (सत्कर्मी) वगैराह बनने के लिए पहले श्रद्धावान बनना आवश्यक है, ऐसी इस्लाम की भूमिका है।

कलमा 'लाइलाह इल्ललाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" अल्लाह एकमेव ईश्वर है और मुहम्मद उसके पैगंबर हैं, को 'कलमा - ए- शहादत" या 'कलमा तैयबा" कहते हैं। जो इस प्रकार की श्रद्धा रखता है वह श्रद्धावान (ईमानवाला) अर्थात्‌ मुसलमान और जो श्रद्धा नहीं रखता वह गैर-मुस्लिम। इसे ही अरबी भाषा में 'काफिर" कहते हैं। काफिर मतलब जो 'कुफ्र" करता है। 'कुफ्र" मतलब 'नकार देना"। जो श्रद्धा को नकारता है वह 'काफिर", ऐसा सीधासादा अर्थ है। 'डिक्शनरी ऑफ इस्लाम" में काफिर का अर्थ दिया गया है ः 'काफिर वह है जो कुरान और मुहम्मद की सीख पर श्रद्धा नहीं रखता।" कुछ इसी प्रकार का भाष्य दअ्‌वतुल कुर्आन का भी है ''काफिर से मुराद (अभिप्रेत) वह व्यक्ति है जो हजरत मुहम्मद के लाए हुए दीन को कुबूल करने से इंकार कर दे।""(खंड3-2367) हदीस सौरभ की सामान्य पारिभाषिक शब्दावली के अनुसार ''कुफ्र- 1. अधर्म, 2. इन्कार, 3. कृतघ्नता। 'कुफ्र" का मूल अर्थ होता हैः ढ़ांकना, छिपाना। इस्लाम के इन्कार करनेवाले को कुफ्र का 'अपराधी" या 'काफिर" कहा जाता है।""(पृ.564) स्पष्ट कहें तो नास्तिक अथवा अनेकेश्वरवादी अथवा मूर्तिपूजक अथवा कुरान पर श्रद्धा न रखनेवाला। इनमें से प्रत्येक श्रद्धाहीन (काफिर) ही होता है।

मुहम्मद साहब के पश्चात उनके उत्तराधिकारी के रुप में अबूबकर इस्लाम के राजसिंहासन पर विराजमान हुए, उनके पश्चात उमर, उस्मान और अली राजप्रमुख बने। इन्हें मुहम्मद साहब के प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी के रुप में खलीफा कहा जाता है और इनके शासन को 'इस्लामी राज्यशासन" या 'खिलाफत" कहा जाता है। इन्हें इस्लाम के आदर्श खलीफा और इनके शासनकाल को इस्लाम का स्वर्णयुग माना जाता है, जिसका कालखांड मात्र तीस वर्ष है (सन्‌ 632से61)। आदर्श खिलाफत का भले ही कभी का अंत हो गया हो परंतु यह खिलाफत संस्था सन्‌ 1924 में तुर्कस्थान के कमाल अता तुर्क द्वारा समाप्त किए जाने तक चलती रही और वर्तमान में जो अंतरराष्ट्रीय जिहाद आतंकवादियों ने छेड रखा है वह इसी आदर्श खिलाफत की स्थापना हेतु चल रहा है।

इस आदर्श खिलाफत में हुए भीषण रक्तपात के संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार फिलिप हिट्टी का निष्कर्ष इस प्रकार है ः ''इस्लाम में खिलाफत के प्रश्न पर जितना रक्तपात हुआ है उतना किसी अन्य पर से नहीं।""(History of Arabs, Macmillan 1951-p. 39 उद्‌.)

पहले तीन खलीफाओं के काल में अरबस्थान के बाहर कितनी लडाइयां हुई इसकी गिनती किसीने रखी नहीं और रखना संभव भी नहीं था। अकेले उमर के काल में ही उल्लेखनीय 36 हजार गांव और शहर जीते गए थे। इतिहासकारों ने केवल चुनिंदा लडाइयों को ही दर्ज किया है। प्रत्येक लडाई में उभय पक्षों की सैन्यसंख्या और मृत्युसंख्या उपलब्ध नहीं। उमर के काल तक किसी भी लडाई में मुस्लिमों की सैन्यसंख्या 40 हजार से अधिक नहीं। उनकी मृत्युसंख्या नगण्य होने से अधिकांश स्थानों पर वह इतिहासकारों ने ही दी नहीं है। पहले दो खलीफाओं के काल में हुई लडाइयों में से 17 लडाइयों की शत्रुओं की मृत्युसंख्या उपलब्ध है। उस अनुसार 11 वर्ष में (एक वर्ष पहले खलीफा का और 10 वर्ष दूसरे खलीफा के) 9लाख 17हजार शत्रुओं के सैनिक मारे जाना दर्ज है। इस काल की बची हुई अनेक लडाइयों की शत्रुओं की निश्चित मृत्युसंख्या न देते 'हजारों मारे गए", 'भीषण कत्लेआम" इस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। यह सब अतर्क्य और अविश्वसनीय लगे इस प्रकार की यह अद्‌भूत वास्तविकता है।

इतिहासकारों का निष्कर्ष है कि, यदि अबूबकर नहीं होते तो पैगंबर की मृत्यु के बाद ही इस्लाम का अंत हो गया होता। मुहम्मद हायकल का कहना है कि, ''पैगंबर की मृत्यु के बाद ऐसी स्थिति आ गई थी कि, यदि अल्लाह ने अबूबकर के माध्यम से सहायता न की होती तो, अपन (मुस्लिम) निश्चित रुप से नष्ट हो गए होते।"" (the history of islam & muslims, vol.2 dr. shekh muhammad p. 74) पैगंबर की मृत्य के बाद लगभग सभी अरबी टोलियों ने इस्लाम के विरुद्ध विद्रोह का झंडा फहरा दिया था। इस्लाम के तत्त्वों से सहमत होने के कारण नहीं बल्कि भौतिक लाभों के लिए, डर या विवशता के कारण वहां के टोलियों ने इस्लाम का स्वीकार किया था इस कारण यह घटित हुआ था। नए नकली पैगंबर पैदा हो गए थे। इस संकट से इस्लाम और इस्लामी राज्य को अबूबकर ने बचाया। इस्लाम को त्यागनेवाले विद्रोहियों और नकली पैगंबरों को व्यापक सैनिकी अभियान चलाकर तेरह महीने में समाप्त कर फिर से अरबस्थान को इस्लाममय कर दिया। इस्लाम का त्याग या नए पैगंबर की घोषणा करना मृत्युदंड योग्य गुनाह मुहम्मद साहब के वचन होने के कारण घोषित कर उसके लिए उन्होंने अनेक लडाइयां लडी। उनमें से केवल दो लडाइयों में ही 27000 विद्रोही मारे गए। इस कार्य में अबूबकर ने जो धर्मनिष्ठा, धैर्य और कठोरता दिखाई उसीके कारण इस्लाम जीवित रह सका।

कुछ इसी प्रकार की विद्रोह की स्थिति दूसरे खलीफा उमर की मृत्यु के बाद अरबस्थान के बाहर निर्मित हो गई थी। उमर के सामर्थ्य, प्रशासन और मजबूत व्यक्तित्व और भय के कारण वे प्रांत भले ही अधीनस्थता स्वीकार चूके थे परंतु, वस्तुतः उन्हें अपना धर्म, अपना राज्य प्रिय था उन्होंने कोई स्वेच्छा से मुस्लिमों का मांडलिकत्व स्वीकारा नहीं था। उमर की मृत्य होते ही उन्होंने विद्रोह कर दिया। तीसरे खलीफा उस्मान ने ये सारे विद्रोह समाप्त कर दिए अब इसमें रक्तपात होना तो अटल ही था। उदा. इस्तखार का विद्रोह समाप्त करने के लिए 40,000 विद्रोही मारे गए थे।

चौथे खलीफा अली जो मुहम्मद साहब के चचेरे भाई और दामाद भी थे ने अपने जीवनकाल में 100 से अधिक लोगों को द्वंद युद्ध में मार डाला था और कुल मिलाकर छोटी-मोटी 95 लडाइयों में भाग लिया था। (Ali : the superman p. 320) उन्होंने लडाइयों में स्वयं के हाथों से 10,000 शत्रुओं को मार डाला था।

इस अली के कार्यकाल में ही इस्लाम में खारिजी नामका आद्य पंथ निर्मित हुआ था और उन्होंने खिलाफत का जो तात्त्विक प्रस्तुतीकरण किया उस कारण इस पंथ का बहुत महत्व है। उन्होंने इस्लाम का पहला मूलतत्त्ववादी माना जाता है। (why i am not a muslim-ibn warraq, p.244) वे विशुद्ध इस्लाम के समर्थक थे। शिया पंथ राजनैतिक आधार पर निर्मित हुआ है तो, यह पंथ धार्मिक आधार पर निर्मित हुआ है। इन्होंने खलीफा अली के विरुद्ध जिहाद की घोषणा कर दी। कुछ लोगों के मतानुसार इनकी संख्या 12,000 तो कुछ के अनुसार 25,000 थी। इन्होंने अली समर्थकों पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। इन्होंने मुहम्मद साहब के वरिष्ठ सहयोगी अब्दुल्ला बि. खबाब को क्रूरतापूर्वक मार डाला। उसके साथ उसकी गर्भवती पत्नी, बच्चे और अन्य सभी सहकारियों को भी मार डाला। (the history of islam vol.1akbarshah p 489) अली ने समझौते की दृष्टि से पश्चाताप व्यक्त करनेवालों को सार्वत्रिक क्षमा की घोषणा की परिणामस्वरुप कई मैदान छोड चले गए। अंत में केवल 4000 कट्टर धर्मनिष्ठ सैनिक बचे। (muhammad & his successors,vol.2- irving 347) परंतु, अली की प्रचंड सेना के सामने उनका टिकना असंभव था। उस रोंगटे खडे कर देनेवाली लडाई में लगभग सभी खारिजी मारे गए। 4000 में से बमुश्किल 9 लोग बचे। (347)

इस खलीफा अली की इस्लाम के पवित्र महीने रमजान के 17वे दिन शुक्रवार (यानी बद्र युद्ध दिवस। इस दिवस को इस्लाम के इतिहास में बहुत मान्यता है। जब भी मुसलमानों का किसी गैर-मुस्लिम से संघर्ष या लडाई होती है उस समय वे बद्र युद्ध का स्मरण प्रतिस्पर्धी करवा देते हैं। 1973 के इजिप्त-इजराईल युद्ध में मुस्लिम इजिप्त ने इस युद्ध का सांकेतिक नाम 'ऑपरेशन बद्र" रखा था। आज काश्मीर में कार्यरत एक पाकिस्तानी संगठन का नाम 'अलबद्र" हैं।) को इन्हीं खारिजियों ने मस्जिद में नमाज पढ़ते समय हत्या कर दी। इसी प्रकार सेे  तीसरे खलीफा उस्मान भी अंतर्गत संघर्ष में मारे गए थे। दूसरे खलीफा उमर की भी मस्जिद में नमाज का नेतृत्व करते समय एक गुलाम ने हत्या कर दी थी।

अली की हत्या इस्लाम के इतिहास की बहुत बडी क्रांतिकारी घटना सिद्ध हुई। ऐसा माना जाता है कि उनकी हत्या के बाद आदर्श खिलाफत का अंत हो गया। दो इस्लामिक खिलाफतें अस्तित्व में आ गई। मुस्लिम समाज दो परस्पर विरोधी गुटों में विभाजित हो गया। उनके शिया और सुन्नी दो पंथ निर्मित हो गए। अली को माननेवाले शिया और न माननेवाले सुन्नी। मुहम्मद साहब ने कहा था कि, मेरे मृत्यु के बाद मेरे समाज में 73 पंथ निर्मित होंगे। उनमें से पहला बडा पंथ अली की हत्या के बाद अस्तित्व में आया। सारे मुसलमान परस्पर भाई हैं (49ः10) और एक दूसरे का खून बहाना हराम है इस इस्लामी सीख को भूलकर विविध कारणों पर से आपस में संघर्ष करने लगे। विशेष रुप से खिलाफत के लिए खूनखराबे का रास्ता तैयार हो गया।

इन खलीफाओं ने जितनी भी लडाइयां अन्य देशों के विरुद्ध लडी और भीषण रक्तपात किया वह मात्र राज्य प्राप्ति के लिए नहीं थी। वह किसलिए थी इसका उत्तर उदारवादी, सुधारवादी कहे जानेवाले मौ. वहीदुद्दीनखान की पुस्तक islam as it is में मिलता है- 'इस्लाम यही (एकमात्र) वैश्विक धर्म है' ऐसा कहकर उन्होंने जिस 'वैश्विक दर्शन' पर यह धर्म खड़ा किया गया है वह दर्शन भी बहुत अच्छी तरह प्रतिपादित किया है। 'यह दर्शन सर्वोत्कृष्ट रूप से अभिव्यक्त करने वाला' कहकर उन्होंने आगे एक ऐतिहासिक घटना और संवाद उद्‌धृत किया है। ( islam as it is पृ.112) : ''मुस्लिमों ने (पैगंबर के) बाद के काल में ईरान पर आक्रमण किया, तब एक बार ईरान के सेनापति रूस्तम ने मुस्लिम सेनापति से पूछा: 'मेरे देश पर तुमने आक्रमण क्यों किया है?' सेनापति की ओर से उत्तर दिया गया : 'हमें अल्लाह ने भेजा है। उसने हमें इधर इसलिए भेजा है की हम लोगों को वस्तु की (प्रकृति की) पूजा करने से परावृत करके एकमात्र अल्लाह की उपासना की ओर मोडें; और उन्हें इहलोक के संकुचित विचारों से दूर करके उनकी दृष्टि उदार और सरल मार्ग की ओर लगाएं,  और इस प्रकार उन्हें (अनेक) धर्मों के अत्याचार से मुक्त करें और इस्लाम के न्याय की ओर मोड़ें।'' इस पर मौलाना का अभिप्राय इस प्रकार है कि :''जिस सर्वव्यापी वैश्विक दर्शन पर इस्लाम की निर्मिती की गई है वह दर्शन इस उत्तर में सार रूप में आया हुआ है।'' (113) स्पष्टतया संसार के सभी लोगों को एकेश्वरवादी और श्रद्धावान (यानी मुसलमान) बनाना और इस्लाम की न्याय व्यवस्था में लाना, यह वह वैश्विक दर्शन होकर उसके लिए जिहाद का अल्लाह द्वारा बताया हुआ मार्ग है, ऐसा  इसका अर्थ है। संसार को इस्लाम प्रदान करने के इस सार्वत्रिक दर्शन के लिए ही अल्लाह द्वारा ईरान की ओर सेना भिजवाई गई थी।

इसके विपरीत पूरा इतिहास खंगालकर देख लिया जाए तो ढूंढ़े से भी एक भी उदाहरण नहीं मिल सकता कि जो यह कहे कि इस प्रकार रक्तपात के मार्ग से कहीं भी हिंदूधर्म का विस्तार किया गया हो। हमारे पूर्वज जो प्राचीनकाल में विश्वभर में गए थे वे 'कृण्वतोविश्वमार्यम्‌" की ध्वजा हाथों में लेकर गए थे एक हाथ में तलवार और एक हाथ में धर्मग्रंथ लेकर नहीं। और इस श्रेष्ठ कार्य के लिए उन्हें संतति की आवश्यकता थी और इसीलिए उस काल में स्त्रियों को 'अष्टपुत्रा सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद देने की प्रथा थी।

Saturday, 4 February 2012

विशुद्ध धार्मिकता और धर्मांतरण

ईसा मसीह ने अत्यंत सरल शब्दों द्वारा प्रेम, बंधुत्व, सेवा, क्षमा और परोपकार की शिक्षाओं का आदर्श विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनकी सेवा के आदर्शों को सामने रख ईसाई बंधुओं ने सेवा कार्य के कीर्तिमान स्थापित कर मानव इतिहास में जो अविस्मरणीय योगदान दिया उससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता। परंतु, आज इक्कीसवीं शताब्दी में अन्य धर्मियों को ईसाई बनाने का अट्टहास धर्म के रुप में उन्हें क्यों आवश्यक लगता है? क्या इसे ही वे ईसा की सेवा समझते हैं? इससे तो सामाजिक अशांति ही निर्मित होती है। वस्तुतः ईसा की सेवा होगी उदार दृष्टि अपनाने से जैसेकि 'दा विंची कोड" और 'इंक्वीजीशन" के काले दाग धोने के विषय में वैश्विक ईसाई समुदाय ने अपनाई।
वैसे भी जब ईसा को क्रूस पर चढ़ाया गया तब सात वचन बोले गए जो संपूर्ण विश्व में 'सात वाणियों" के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनमें पहली वाणी में उन्होंने प्रार्थना की थी कि जिन्होंने उन्हें क्रूस पर चढ़ाया है उन्हें हे पिता क्षमा कर। तो, अंतिम सातवें वचन में तीन घंटे क्रूस पर यातना सहने के पश्चात यीशु ने अपने पिता को आत्मा समर्पित कर यह सबक दिया कि माता-पिता की आज्ञा से बढ़कर और कोई सेवा नहीं। तो, फिर यह सेवा को माध्यम बना धर्मांतरण का अट्टहास क्यों?

वस्तुतः धार्मिक स्वतंत्रता के महत्व को कोई भी नकार नहीं सकता। सांसारिक झंझटों से त्रस्त हो मनुष्य मन, बुद्धि से जब अंतर्विश्व की ओर मुडने लगता है तभी सच्चे धार्मिक जीवन की शुरुआत होती है। इस दृष्टि से विचार करें तो धर्म आंतरिक तृष्णा, अशांति से उपजी एक शोध यात्रा है। इसे किसी विशिष्ट धर्म का नाम चस्पॉं करना बेइमानी है। स्पष्ट है इसमें धर्मांतरण इस शब्द को कोई स्थान प्राप्त हो ही नहीं सकता। हां, संकुचित मानसिकता के लोग ही धर्म के नाम पर संगठित हो अपना संख्याबल बढ़ाने के नाम पर इस तरह की अनुचित गतिविधियों को प्रश्रय देने लगते हैं।
ईसा मसीह के प्रति गांधीजी के मन में बसनेवाला आदरभाव, श्रद्धा स्पष्ट एवं पारदर्शक था। ईसा के 'सर्मन ऑन द माउंट" से उन्हें प्रेरणा मिली थी। उनके कमरे की दीवार पर ईसा का सुंदर चित्र भी जब वे दक्षिण अफ्रीका में रहा करते थे तब टंगा रहता था। वहां हेनरी पोलक और उसकी पत्नी मीली पोलक उनके निकटवर्ती थे। उनसे जब मीली ने पूछा कि वे 'ईसाईधर्म क्यों नहीं स्वीकारते?" गांधीजी ने बडा ही सुंदर उत्तर दिया 'ईसाईधर्म के वचनों का मैंने अध्ययन किया है और मैं उनसे बडा प्रभावित भी हुआ हूं। तो, भी हिंदू रहकर भी मैं उन अच्छे वचनों को आत्मसात कर आदर्श, विवेकी ईसाई हो सकता हूं। ईसा की आदर्श शिक्षा, विचारों को आत्मसात करनेे के लिए धर्मांतरण करने (यानी ईसाईधर्म स्वीकारने) की मुझे आवश्यकता नहीं।

गांधीजी के मन में ईसाईधर्म के प्रति किसी भी तरह की दुर्भावना नहीं थी। यह कोई भी मान्य करेगा। वे ईसाईधर्म का आदर ही करते थे। फिर भी उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार चिंतन योग्य हैं -

'आज भारत में और विश्व में अन्यत्र जिस पद्धति से धर्मांतरण और तत्सम बातें चल रही हैं उस पार्श्वभूमि पर धर्मांतरण की कल्पना मुझे मान्य ही नहीं है। वैश्विक शांति, प्रगति की प्रक्रिया में बाधा खडी करनेवाली ये बातें हैं। एकाध हिंदू हिंदूधर्म छोडकर ईसाईधर्म स्वीकारे ऐसा एकाध ईसाईधर्मीय को क्यों लगता है? इस प्रकार की अपेक्षा और आग्रह क्यों होना चाहिए? वह हिंदू और किसी देवता का भक्त रहने की कसक क्यों?" (हरिजन ः 30जनवरी 1937)

'मानव सेवा के पडदे की आड में धर्मांतरण जैसी बातें घटित करवाने का काम निश्चित ही निषिद्ध और अनुचित है, ऐसा मुझेें लगता है। यहां के लोगों में इस प्रकार के मामलों में पराकाष्ठा का रोष और विरोध है। धर्म का विषय पूरी तरह व्यक्तिगत स्वरुप का है, ह्रदय, अंतःकरण को छूनेवाला है। एकाध ईसाई डॉक्टर द्वारा किए गए उपचार से मैं व्याधी मुक्त हुआ इसलिए मैं मेरा धर्म छोडकर तत्काल ईसाईधर्म क्यों स्वीकारुं? और उस डॉक्टर द्वारा भी इस प्रकार (यानी धर्मांतरण) की अपेक्षा क्यों की जाना चाहिए?" (यंग इंडिया 23अप्रैल 1931)

'हिंदूधर्म असत्य, झूठा है ऐसा आज भले ही ईसाई बंधु खुलकर न कहते हों तो भी हिंदूधर्म झूठा, मिथ्या है, ईसाईधर्म एकमेव सत्य धर्म है इस प्रकार की भावना उनके मन में, अंतःकरण में निश्चित रुप से है ऐसा मुझे लगता है। आज के उनके प्रयत्न हिंदूधर्म को जड से उखाड फेंकने के होकर दूसरा धर्म दृढ़ करने की दृष्टि से चल रहे होने का ध्यान में आता है।" (हरिजन 13मार्च 1937)

'मेरे हाथ में अधिकार, सत्ता, शासन आने पर मैं धर्मांतरण के सभी प्रकार बंद कर दूंगा।" (हरिजन 5 नवंबर 1935)

मिशनरियों के घर में आगमन के कारण हिंदुओं का पारिवारिक जीवन भंग हो जाता है, ऐसा भी उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा था। एक व्यक्ति को धर्मांतरित करने का खर्च कितना आता है का आंकडा बतलाकर आगे की फसल का बजट प्रस्तुत करने का उल्लेख उन्होंने किया था। प्रा. क्रेजेन्स्की को उन्होंने कहा था कि, धर्मांतरण सत्य के फव्वारे को सोखनेवाला सबसे बडा प्राणघातक विष है।  उन्होंने मिशनरियों को आश्वासन दिया था कि स्वतंत्र हिंदुस्थान में ईसाइयों का तिरस्कार होकर उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा का भय निराधार है।

उनका मत था कि, भय, जबरदस्ती, भूखमरी, ऐहिक लाभ के कारण हुए धर्मांतरण सच्चे न होने के कारण इस प्रकार के पश्चाताप दग्ध हिंदुओं को निःसंकोच शुद्धिविधि के बिना भी स्वधर्म में लिया जाना चाहिए। उनका यह मत मनुस्मृति (1ः230,232) से सुसंगत है। सभी धर्म एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं। उनकी यह भी मान्यता थी कि एक डाली से दूसरी डाली पर जाने के कारण कोई अशुद्ध नहीं होता। तथापि, स्वधर्म में लौटे हिंदू का अभिनंदन करने में अनुचित कुछ भी नहीं।

1931 में उन्होंने कहा था कि शुद्ध सेवा की भावना से काम करने के स्थान पर धर्मांतरण के उद्देश्य से विदेशी मिशनरी काम करनेवाले हों तो वे देश छोडकर चले जाएं, यह मुझे अधिक अच्छा लगेगा। अर्थात्‌ धर्मांतरण के स्थान पर केवल परोपकार करें यह गांधीजी का मिशनरियों को कहना था। 
एक अंग्रेज जो भगवद्‌गीता से प्रभावित हो हिंदू बनना चाहते थे को उन्होंने भगवद्‌गीता और अधिक अच्छी तरह से समझने के लिए  बाइबल का पुनः अध्ययन करे कहा था और हिंदू बनने की कोई आवश्यकता नहीं यह भी कहा था। विनोबाजी ने घोषणा की थी कि संगठित धर्मों के दिन समाप्त होकर अब प्रामाणिकता से सृष्टि की एकता का प्रतिपादन करनेवाले अध्यात्म के दिन आ गए हैं। स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति का अंतर्विश्व और इसलिए उसकी आध्यात्मिक आवश्यकता इतनी अनन्य, विलक्षण है कि वह दिन मानव इतिहास में सुदिन होगा जिस दिन हर एक व्यक्ति का एक पृथक धर्म होगा। यह सर्वश्रुत है कि श्रीरामकृष्ण ने सभी धर्मों की साधना की थी। बिदरशाही के एक मुसलमान अधिकारी को संत माणिक प्रभु के विचार बहुत भाते थे। 'परंतु, आप मुसलमान क्यों नहीं बनते?" उसके इस प्रश्न का उत्तर माणिक प्रभु ने इस प्रकार से दिया था - 'हां! मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है। परंतु, क्या करुं? कुरान में अल्लाह को 'रब-अल्‌-आलमिन" (विश्वाधिपति, सारे विश्व का ईश्वर) कहा गया है। 'रब-अल्‌-मुसलमीन" नहीं!
इन उपर्युक्त विचारों को दृष्टि में रखते कम से कम अब इस 21वीं शताब्दी में तो भी यह धार्मिक वृत्ति सभी को मान्य होना चाहिए, यदि यह मान्य हो जाए तो फिर धर्मांतरण और उससे उपजने वाली कलह का जीवन में स्थान ही नहीं बचेगा और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक अवैध धर्मांतरण को निषिद्ध, अनुचित माना जाना चाहिए और उसके लिए एक आचार संहतिा निर्मित की जाना चाहिए।