Thursday, 12 January 2012

रीयल आयडॉल्स

रीयल आयडॉल्स

श्री अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन में एक बडा जनसमूह उमड पडा था तो मुझे कोई बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। क्योंकि, जनता महंगाई और भ्रष्टाचार की अति से तंग आ चूकी है इसलिए जब उन्हें लगा कि एक साफ-सुथरा, ईमानदार व्यक्ति हमारी लडाई लडने के लिए आगे आया है तो, वे उसके साथ हो लिए। इस आक्रोशित जनसमूह में एक बडी संख्या युवाओं की भी थी। यह देखकर भी कोई आश्चर्य नहीं हुआ। क्योंकि तरुणाई तो हमेशा से ही जोश और उत्साह से भरी हुई होती है जो कुछ कर गुजरने की चाह रखती है, कुछ कर गुजरने का माद्दा रखती है और इसीलिए किसी भी क्रांति या बदलाव में वे ही सबसे अधिक अग्रिम मोर्चे पर नजर आते हैं। यहां तक तो ठीक है परंतु, जब मैं यह देखता हूं कि सेना में युवा अधिकारियों की कमी खल रही है। हजारों की संख्या में कमिशन्ड अधिकारियों के पद रिक्त पडे हुए हैं। यही हाल समाज सेवा का क्षेत्र हो, राजनीति का हो, किसी शोध एवं अनुसंधान कार्य का हो, गणित या विज्ञान का क्षेत्र हो, तो इन क्षेत्रों में यह युवाओं की भीड नदारद नजर आती है। तो, मैं सोच में पड जाता हूं कि, ऐसा क्यों?

तो, विचारोपरांत मैं पाता हूं कि, इन युवाओं की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। युवाओं का एक बहुत बडा तबका फास्ट मनी के पीछे हैं, कंपनियों के ग्लैमर, पैकेज संस्कृति के पीछे है। जिससे कि वे अधिकाधिक धन, भौतिक सुख-सुविधाएं जुटा सकें। इनके आयडॉल्स बदल गए हैं और उनकी इस प्रवृति को बढ़ावा दे रहे हैं टी.वी. शोज जैसेकि, कौन बनेगा करोडपति, गाने-बजाने के रीयल आयडॉल्स की प्रतिस्पर्धा वाले कार्यक्रम जिनमें युवा दंपत्ति अपने छोट-छोटे मासूम बच्चों को प्रतिभागी बना बिना सोचे-समझे  कि इसका परिणाम भविष्य में उस मासूम पर क्या होगा डटे हुए हैं।

इसीलिए यह युवा सेना जैसे देशभक्ति के रोमांचक, आव्हानात्मक केरियर वाले क्षेत्र की उपेक्षा कर इन नकली चकाचौंध वाले  क्षेत्रों की ओर दौड रहा है। शोध कार्य, समाजसेवा जैसे लोकहितकारी क्षेत्रों को नीरस, ऊबाऊ समझता है तो, राजनीति को चोरों का क्षेत्र। जबकि राजनीति जीवन के हर पहलू का स्पर्श करती है, अपना प्रभाव डालती है, इसके प्रभाव से कोई अछूता नहीं। यह सही है कि राजनीति के क्षेत्र में चोरों, गुंडों की भरमार हो गई है लेकिन यह हुई ही इसलिए है कि अच्छे लोग गए नहीं।

यदि हम ध्यान से देखें तो राजनीति में दो ही वर्ग के लोग ज्यादा हैं। पहला वर्ग वह है जो सडक पर खडा है या तो स्वयं ही बाहुबलि है, गुंडा है या गुंडा प्रवृति का होकर धन, सत्ता, के लिए कुछ भी कर सकता है और कुछ भी नहीं जमा, कहीं भी सफलता हासिल नहीं कर पाया इसलिए राजनीति के क्षेत्र में चला आया है। दूसरा वर्ग वह है जिसका पेट भरा हुआ है, साधन-संपन्न है वह उच्चवर्ग का होकर उसने राजनीति को जो कुछ उसके पास है उसको सुरक्षित रखने का और अधिकाधिक जुटाने का माध्यम बना लिया है, ऐसे लोग भला हमारी चिंता क्यों पालने लगे !
वास्तव में हर क्रांति, हर बदलाव के पीछे होता है पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग। क्योंकि, सबसे ज्यादा सोचता भी वही है तथा समाज सेवा, समाज सुधार, जनप्रबोधन, जनजागरण के कार्य में सबसे आगे भी यही वर्ग रहता है और समय आने पर कुशल नेतृत्व भी वही प्रदान कर सकता है, करता है और इतिहास इसका गवाह है। परंतु, असली समस्या यह है कि इस वर्ग ने अब अपनी प्राथमिकताएं बदल ली हैं, यही वर्ग पहले सबसे अधिक समाज सेवा के क्षेत्र में जाता था, समाज सुधार में अग्रणी था। राजनीति में भी जाकर सबसे अधिक साफ-सुथरा रहने का प्रयत्न करता था। परंतु, इस वर्ग के आयडॉल्स अब समाज सेवा के अग्रणी जैसेकि, बाबा आमटे, उनके पुत्र डॉ. प्रकाश आमटे आदि जैसे समर्पित या किसी शोध कार्य में खप जाने वाले संदीप वासलेकर आदि या कोई समाज सुधारक नहीं रहे। और यही वर्ग आज सबसे अधिक फास्टमनी, कार्पोरेट सेक्टर के ग्लैमर, पैकेज के पीछे है।
वैसे इसके भी कारण हैं। मेरी दृष्टि में जो प्रमुख कारण हैं वह यह कि इस वर्ग में यह भावना पैदा हो गई है कि दूसरे ही क्यों करोडपति बनें हम क्यों नहीं? और वर्तमान की उदारीकरण, वैश्विकरण की नीतियों से उपजे इस नए परिवेश में जब हमें मौका मिल रहा है तो हम क्यों पीछे रहें? और वास्तविकता भी यही है कि यही वर्ग सबसे अधिक भ्रष्टाचार, राजनीति गंदी है, सारे राजनीतिज्ञ चोर हैं का शोर भी मचा रहा है।

यह वर्ग जो सबसे अधिक अपने सामाजिक दायित्व को निभाता था एकदम निष्क्रिय सा इसलिए भी हो गया है क्योंकि, इनके पूर्ववर्तियों ने जो सेवा आदि उपर्युक्त क्षेत्रों में गए उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि मनुष्य को विचारों के साथ-साथ पेट भी होता है बस वे तो अपनी धुन में बिना घर-परिवार की चिंता किए, उन्हें उपेक्षित छोड अपने कार्य में लगे रहे। उसका जो दुष्परिणाम सामने आना ही था वही अब प्रखरता से सामने आ रहा है। अतः यदि वर्तमान परिस्थितियों को बदलना है तो इस वर्ग को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। क्योंकि, जिस रौं में वे बहे जा रहे हैं उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं।
 ब्लॉगर - कणाद shirish-sapre.blogspot.com

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