Thursday, 19 January 2012

'वंदेमातरम्‌" - तो भारतमाता का अभिवादन है मियॉं !

'वंदेमातरम्‌" - तो भारतमाता का अभिवादन है मियॉं !

3 नवंबर से 6 नवंबर 2009 तक देवबंद में चले देश के मुस्लिमों के एक बडे सम्मेलन में देश के गृहमंत्री चिदंबरम और प्रसिद्ध योगगुरु बाबा रामदेव को भी अतिथियों के रुप में आमंत्रित किया गया था। जहां बाबा रामदेव ने अपनी योगक्रियाओं का भी प्रदर्शन किया। इस सम्मेलन में 3 नवंबर को जो पच्चीस प्रस्ताव पारित किए गए उनमें एक प्रस्ताव वंदेमातरम्‌ को गैर-इस्लामिक करार देने का भी था। इस समय जब देश में वंदेमातरम्‌ का कोई मुद्दा ही नहीं था तब देवबंद में 10,000 से अधिक मौलवियों के समर्थन से इस तरह का फतवा जारी करना और फिर सम्मेलन के चौथे दिन आमंत्रित अतिथि बाबा रामदेव के बारे में यह जानते हुए भी कि उनके शिविरों में वंदेमातरम्‌ गाया जाता है, उनको अपमानित करनेवाला यह आदेश जारी करना कि बाबा रामदेव के शिविरों में भाग न लें क्योंकि, वहां वंदेमातरम्‌ गाया जाता है। यह साफ-साफ दर्शाता है कि यह सब जानबूझकर किया गया कृत्य है और इससे राजनीति की बू आती है। अन्यथा क्यों नहीं वे उन मुस्लिम लोगों-नेताओं को इस्लाम से खारिज करते जिन्होंने फतवे का विरोध किया, कर रहे हैं या वंदेमातरम्‌ गाते हैं। उदा. प्रसिद्ध गायक-संगीतकार ए. आर. रहमान जिन्होंने तो एक अल्बम ही वंदेमातरम्‌ पर निकाला था जिसकी रिकार्ड तोड बिक्री भी हुई थी। इस परिप्रेक्ष्य में बाबा रामदेव की यह घोषणा निश्चय ही स्वागत योग्य है कि 'मेरे जो कार्यक्रम होते हैं उनमें तिरंगा फहराया जाता है परंतु वंदेमातरम्‌ प्रतिदिन नहीं गाया जाता था। परंतु, अब वंदेमातरम्‌ का गान प्रतिदिन होगा, नियमित रुप से होगा।" इसके लिए वे निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं।

देश में वंदेमातरम्‌ पर विवाद सबसे पहले तब शुरु हुआ जब दिसंबर 1923 में काकीनाडा में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में गांधी-नेहरु और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की उपस्थिति में अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली ने महान शास्त्रीय कलाकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्करजी को वंदेमातरम्‌ गाने से रोक दिया और कहा था कि 'यह गीत इस्लाम विरोधी है इसलिए कोई भी मुसलमान इसे नहीं गाएगा"। पंडितजी बोले थे 'मौलाना याद रखो कि मैं राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में वंदेमातरम्‌ गा रहा हूं, अन्य किसी मंच से नहीं और यह किसी मजहब या समुदाय का दल नहीं है। इसलिए यह राष्ट्रगीत गाने से मुझे रोकने का अधिकार आपको किसने दिया?" हजारों की संख्या में उपस्थित श्रोताओं ने पंडितजी की तेजस्वी निर्भीकता का तालियां ंबजाकर स्वागत किया। यदि इस अति गंभीर मुद्दे को उस समय यूं ही न टाल दिया गया होता, समुचित उपचार किया गया होता तो आज यह परिस्थिति उत्पन्न न हुई होती और जो दुष्परिणाम विगत में देश विभाजन के रुप में भोगने पडे थे भोगने न पडते।

ये मोहम्मदअली अली बंधुओं में से एक हैं जिनके नेतृत्व में 'खिलाफत आंदोलन" चला था। जिसे गांधीजी ने एक वैचारिक आधार प्रदान कर कांग्रेस को भी अपने पीछे चलने के लिए विवश कर इस आंदोलन में पूरी शक्ति से भाग लिया था। गांधीजी द्वारा खिलाफत के प्रश्नको भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाने से उलेमाओं को प्रतिष्ठा मिली और विशाल मुस्लिम समाज की मजहबी कट्टरता संगठित होकर आंदोलन के रास्ते पर बढ़ी। खिलाफत की रक्षा का अर्थ इस्लाम के वर्चस्व की वापसी यह सोच मुस्लिम समाज में विकसित हुई और परिणामस्वरुप खिलाफत आंदोलन प्रारंभ होने के कुछ महीनों के भीतर ही अगस्त 1921 में मलाबार में मोपला मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर आक्रमण के रुप में सामने आई। ''भारत सेवक मंडल की जांच समिति के प्रतिवेदन के अनुसार इस कांड में 1500 हिंदू मार दिए गए, 20000 हिंदू बलात्‌ मुसलमान बना दिए गए और कोई 3 करोड रुपये की संपत्ति लूटी गई। हिंदू महिलाओं के साथ दुर्व्यव्हार और उनके अपहरण का तो कोई ठिकाना ही नहीं रहा। डॉ. एनी बेसैंट ने कहा है ः'उन्होंने जी भरकर हत्या की, लूटपाट की और उन सभी हिंदुओं को मार डाला अथवा खदेड दिया जिन्होंने अपना धर्म नहीं त्यागा। कोई एक लाख लोगों को उनके घरों से खदेड दिया गया। उस समय उनके तन पर केवल उनके कपडे ही थे, शेष सब छीन लिया गया।" उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि इन सब भीषण अत्याचारों के लिए खिलाफत का सांप्रदायिक प्रचार ही उत्तरदायी था।"" इस भयंकर कांड ने गांधीजी को यह स्वीकारने के लिए बाध्य कर दिया कि 'बलात्‌ धर्मांतरण और लूटपाट के मोपला आचरण पर शर्मिंदगी और ग्लानि किसी मुस्लिम नेता ने व्यक्त नहीं की।" (यंग इंडिया 20 अक्टूबर 1921)

एक ओर तो मजहबी उन्माद जो सडकों पर उतर आया था, दूसरी ओर देश विभाजन और मुस्लिम बहुसंख्यावाले क्षेत्रों की बात भी खुलकर शुरु हो गई। दिसंबर 1921 में अहमदाबाद में कांग्रेस, खिलाफत कांफ्रेंस और मुस्लिम लीग के अधिवेशन अल्प समय पर साथ-साथ हुए थे। कांग्रेस और खिलाफत कांफ्रेंस की अध्यक्षता हकीम अजमल खां ने की तो, मुस्लिम लीग की अध्यक्षता मौ. हसरत मोहानी ने। मौ. ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आमतौर पर मुसलमान हिंदुओं की बहुसंख्यक स्थिति से भयभीत है क्योंकि, पूरे भारत में मुसलमान अल्पसंख्या में हैं। किंतु कश्मीर, पंजाब, सिंध, बंगाल और असम जैसे प्रांतों में वे अल्पसंख्या में नहीं है। और इन प्रांतों में हमारी बहुसंख्या मद्रास, मुंबई और संयुक्त प्रांत आदि प्रांतों के हिंदू बहुमत को मुसलमानों पर जोरजबरदस्ती करने से रोकने का काम करेगी। यद्यपि मौ. ने सीधे-सीधे देश विभाजन की बात तो नहीं की तथापि, उन्होंने पहली बार मुस्लिम लीग के मंच से भारत के मानचित्र को हिंदू-मुस्लिम जनसंख्या के आधार पर विभाजित कर देखा, दोनो समाजों के बीच अविश्वास की गहरी खाई देखी और सांप्रदायिक हितों की रक्षा के लिए 'बंधक सिद्धांत" का प्रतिपादन किया। एक प्रकार से यह चिंतन-कथन देश विभाजन की ओर ही इंगित कर रहा था।

तुर्की में सत्ता परिवर्तन के साथ ही खिलाफत आंदोलन का जोश ठंडा पडने लगा परंतु जाग्रत मुस्लिम उन्माद कहर बनकर हिंदुओं पर टूट पडा जिसे ब्रिटिश सरकार ने हिंदू-मुस्लिम दंगों का नाम दिया। ''1923 के मार्च और अप्रैल में अमृतसर, मुलतान और पंजाब के अन्य भागों में गंभीरस्वरुप के दंगे हुए। मई में अमृतसर में फिर से दंगे हुए और सिंध में भी। जून-जुलाई में मुरादाबाद और मेरठ उसी प्रकार से इलाहबाद जिले में सांप्रदायिक उद्रेक हुए  और अजमेर में गंभीर दंगा भडका अगस्त सितंबर में अमृतसर, पानीपत, जबलपूर, गोंडा, आग्रा और रायबरेली में अशांत कर देनेवाले दंगे भडके। इन सब में सबसे अधिक गंभीरस्वरुप का दंगा सहारनपूर में मोहरम पर हुआ। बाद में दिल्ली, नागपूर, लाहौर, लखनऊ, भागलपूर, गुलबर्गा, शहाजहानपूर और काकीनाडा भी इन सबसे बच न सके। सितंबर 1924 में कोहट में बहुत बडा दंगा हुआ, लगभग 155 लोग मारे गए अथवा जख्मी हुए, लगभग 9 लाख रुपये कीमत के मकान और संपत्ति नष्ट हुई और बडे पैमाने पर संपत्ति की लूटपाट हुई। सारी हिंदू जनता कोहट छोडकर चली गई। डॉ. पट्टाभिसीतारमय्या ने 'हिंदी राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास" में दर्ज किए अनुसार 9 और 10 सितंबर की गोलाबारी और कत्लेआम के बाद 4000 हिंदुओं को विशेष गाडियों से स्थानांतरित किया गया। उनमें से 2600 लोग रावलपिंडी में तो 1400 अन्य स्थानों पर लोगों के औदार्य पर दो महीने रहे थे।""

हिंदू-मुस्लिम एकता जिसके समर्थन मेंे गांधीजी ने अपनी अहिंसा के सिद्धांत को पराकाष्ठा की कसौटी पर लगा दिया था को खिलाफत आंदोलन अंग्रेजों से मुसलमानों को अलग कर कांग्रेस के साथ जोडने का एक सुनहरा अवसर लगा था। जबकि लोकमान्य तिलक, एनी बेसैन्ट, महामना मालवीयजी जैसे राष्ट्रीय आंदोलन के पुराने अनुभवी नेताओं ने गांधीजी को खिलाफत आंदोलन न अपनाने की सलाह दी। पर गांधीजी को लगा कि राष्ट्रीय एकता के हित में एक बार यह प्रयोग करना आवश्यक है। परंतु, इस खिलाफत के फलस्वरुप जो तनाव और हिंसा पूरे देश में फैली जिसका चरम कोहाट में प्रकट हुआ था ने गांधीजी को हिलाकर रख दिया। प्रायश्चित स्वरुप उन्होंने 17 सितंबर 1924 को 21 दिन का उपवास आरंभ कर दिया और इसके लिए स्थान चुना मौ. मोहम्मद अली का दिल्ली स्थित निवास स्थान। हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के लिए उन्होंने स्वयं को दोषी माना। उनके सचिव और घनिष्ठ सहयोगी  महादेव देसाई द्वारा यह पूछने पर कि उनसे ऐसा कौनसा अपराध हो गया जो आप प्रायश्चित कर रहे हैं? गांधीजी के उत्तर को महादेव देसाई ने अपनी डायरी में इस प्रकार से लिपिबद्ध किया है ः'मेरी भूल क्यों नहीं? मुझ पर हिंदुओं के साथ विश्वासघात का आरोप लग सकता है। मैंने ही उन्हें मुसलमानों से दोस्ती करने का आग्रह किया। मैंने ही मुसलमानों के मजहबी स्थलों की रक्षा के लिए अपने प्राणों और संपत्ति को दांव पर लगाने का आवाहन किया। आज भी उन्हें अहिंसा का उपदेश दे रहा हूं, कह रहा हूं कि अपने झगडों का निपटारा मारकर नहीं स्वयं मर कर करें। और इस सब का क्या परिणाम मैं देख रहा हूं? .. हिंदू महिलाएं मुसलमान गुंडों के डर से थर-थर कांप रही हैं, कई स्थानों पर वे अकेले बाहर निकलने से डरती हैं। मुझे अमुक का पत्र मिला है। उसके नन्हें बच्चों को जिस तरह सताया गया उसे मैं कैसे सहन करुं?"

कोहाट में जो कुछ घटा उससे अधिक पीडा तो गांधीजी को अली बंधुओं की सोच और व्यवहार से हुई। अली बंधुओं ने कोहाट के दंगों के लिए हिंदुओं को ही दोषी ठहराते हुए कहा कि हिंदुओं ने पैगंबर मुहम्मद के प्रति एक अपमानजनक पत्रक वितरीत कर मुसलमानों की मजहबी भावनाओं पर आघात किया  और एक हिंदू ने पहले गोली चलाकर मुसलमानों को आक्रमण के लिए उत्तेजित किया। अली बंधुओं में से एक मोहम्मद अली जो दिसंबर 1923 के कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन के अध्यक्ष थे ने अपने अध्यक्षीय भाषण में हिंदू-मुस्लिम समस्या को हल करने के लिए लज्जाजनक सुझाव दिया था कि अछूत कहे जानेवाले हिंदुओं का बंटवारा कर लिया जाए। इन्हीं मोहम्मद अली ने दिसंबर 1924 में बंबई में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पारित करने के लिए भेजे गए अपने प्रस्ताव में उक्त आरोप को दोहराया था। गांधीजी को इस प्रस्ताव से बहुत पीडा हुई और उन्होंने इसका मोहम्मद अली को पत्र लिखकर तीव्र प्रतिवाद किया।

दूसरे अली बंधू ने तो और भी अधिक पीडा पहुंचाई। कोहाट दंगों की जांच के लिए कांग्रेस ने गांधीजी और शौकतअली की कमेटी बनाई थी जो अंग्रेजों द्वारा कोहाट जाने देने की अनुमति न मिलने कारण जांच के लिए रावलपिंडी के शरणार्थी शिविर में पहुंची। वहां शौकतअली मोहम्मदअली की लाइन पर ही जांच को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे। जबकि गांधीजी ने जड तक पहुंचने के लिए अनेक लोगों से जिरह की और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कोहाट में लंबे समय से हिंदुओं का भय और प्रलोभन से धर्मांतरण-मतांतरण का कार्य चल रहा था। एक मुस्लिम साथी पीर कमाल ने स्वीकार किया कि प्रत्येक शुक्रवार को मस्जिद में मतांतरण किया जाता था। कई बार विवाहित स्त्रियों को भी मुस्लिम बनाया जाता था। मतांतरण के बाद झगडा होता था कि वह किसकी बीबी बने। जिन घटनाओं को दंगे का कारण बताया जा रहा है वह मतांतरण की प्रतिक्रिया मात्र थी, कारण नहीं। इसी दौरान शौकतअली के अंतर्मन को टटोलने पर उन्होंने पाया कि वे इस्लाम में मतांतरण को उचित व जायज समझते हैं। गांधीजी द्वारा बहुत प्रयास करने पर भी दोनो एकमत न हो सके और अंत में दोनो ने ही अपनी-अपनी अलग-अलग जांच रपट व कारण मीमांसा प्रस्तुत की।

इस अनुभव ने गांधीजी को बहुत विचलित कर दिया। रावलपिंडी से लौटकर गांधीजी ने वल्लभभाई पटेल से कहा 'मन करता है कि सब काम छोडकर खुद को आश्रम में बंद कर लूं। इस गंदे राजनीतिक वातावरण में कोई कितनी देर जी सकता है? लगता है राजनीति मेरे जैसे आदमी के लिए नहीं है।" आश्रम लौटकर उन्होंने लोगों से कहा कि 'कोहाट के दंगों का मूल कारण धर्मांतरण है। तेज रफ्तार से हो रहे धर्मांतरण के बारे में जब हिंदू चौकन्ने हुए तो मुसलमानों को यह पसंद नहीं आया और वे बदला लेने के लिए कोई मौका ढूंढ़ने लगे। उस आपत्तिजनक पत्रक को उन्होंने बदला लेने का बहाना बनाया। गांधीजी ने आगे कहा 'अगर सबके सब हिंदू मुस्लिम धर्म के ग्रंथों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर अपने निजी बौद्धिक विश्वास के आधार पर इस्लाम कबूल कर लें तब मैं पृथ्वी पर अकेला ही हिंदू होने का संतोष कर लूंगा। तब मैं अपनी जीवनशैली से हिंदू धर्म का उजाला फैला सकूंगा। किंतु भय या प्रलोभन से मुसलमान बनाना मुझे बर्दाश्त नहीं है। वहां ऐसा ही हुआ। आप लोगों से मैं यह सब इसलिए कह रहा हूं कि आप अपने धर्म के प्रति निष्ठा में अडिग रहें। मेरा एकमात्र उद्देश्य इस पवित्र उषाकाल में आपको जगाना और चौकस करना है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हो सकता है किसी दिन आपको भी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड जाए। यदि आश्रम से किसी बच्चे, लडके या लडकी का अपहरण हो तो, मेरी अहिंसा का गलत अर्थ निकाल कर मूकदर्शक मत बने रहना।"

खिलाफत आंदोलन के कटु-अनिष्टकारी परिणामों के कारण '1921-22 में शुरु हुए दंगे सालों तक संयुक्त-प्रांत, मुंबई, बंगाल, मध्य-प्रांत, बिहार, उडिसा, पंजाब, वायव्य सीमा-प्रांत और दिल्ली में चलते रहे।" क्या आज देवबंद, जिसको मुस्लिम जगत में वही मान्यता प्राप्त है जो 1000 साल पुराने इजिप्त के अल-अजहर विश्वविद्यालय को प्राप्त है और इसी मदरसे से निकले आलिमों (विद्वान) ने पूरे भारत नें मदरसों का जाल बिछाया है, के मौलाना फिर से यह सब दोहराना चाहते हैं, क्या वे इन दंगों को फिर से शुरु करना चाहते हैं, क्या वे एक और विभाजन चाहते हैं, जो इस प्रकार के फतवे एकमत होकर दे रहे हैं।

यह है वह पृष्ठभूमि जो वंदेमातरम्‌ को गैर-इस्लामिक करार देने से जुडी हुई है। जबकि वंदेमातरम्‌ में इबादत है, वंदन है। जिस प्रकार से हिंदी में प्रणाम, मुस्लिमों में सलाम या आदाब है वैसे ही यह वंदन है। जिसके प्रति श्रद्धा हो उसे ही वंदन किया जाता है। परंतु, जिनकी दीनी सीख में ही अपनापन, श्रद्धा की भावना केवल हिजाज (मक्का-मदीना का भूभाग) के प्रति ही हो जो मक्का की भूमि को ही इतना पावन मानते हों कि हज करने के तरीके में यह भी बयान किया जाता है कि ''अगर मुमकिन हो तो हरम (मक्का के आस-पास का क्षेत्र, काबा) की जमीन में पैदल चलें और बहुत आजिजी (विनम्रता) से कदम उठाएं। इस तरह चलें कि जैसे कोई आजिज (विनम्र) और मिस्कीन (सीधा-सादा, सरल) आदमी बादशहा के दरबार में हाजिर होता है।""(बहिश्ती जेवर-दीन की बातें, पृ.205, रचयिता-मौ. अशरफ अली थानवी, दीनी बुक डिपो, उर्दू बाजार, दिल्ली) मक्का की मिट्टी को इतना पवित्र माना जाता है कि जब किसी मुर्दें को दफन किया जाता है तो उसकी छाती पर ''मक्का की मिट्टी से धार्मिक वचन (अर्थात्‌ कुरान की आयतें) लिखे जाते हैं।""(इस्लामची जीवनपद्धती पृ.59, जफर शरीफ लिखित 'कानून-इ-इस्लाम" या ग्रंथाचा अनुवाद अनुवादक प्रा. अ.प.सूर्यवंशी- प्रकाशक, सचिव, महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृती मंडळ, सचिवालय, मुंबई) और जो कफन ओढ़ाया जाता है उसका ''कपडा जमजम के पानी में डूबाया हुआ होता है।""(पृ.60) और ''मुँह पश्चिम की ओर यानी मक्का, यानी किबला (नमाज पढ़ने की दिशा अर्थात्‌ ही मक्का का काबागृह) की ओर होता है।""(61) इस्लामी मान्यता के अनुसार अल्लाह की सबसे बडी नियामत (अलभ्य अथवा दुर्लभ वस्तु, पक्वान, धन-दौलत) आबे जमजम अर्थात्‌ जमजम का पानी है। इसीलिए हजयात्रा कर लौटते समय हजयात्री जमजम का पानी साथ लेकर आते हैं। ''रमजान का उपवास (रोजा) छोडते समय इसका थोडासा पानी पिते हैं अथवा सभी के उपयोग के लिए रखे पानी में इसकी कुछ बूंदे डालते हैं। ऐसा करने के पीछे सभी पापों का नाश हो यह उद्देश्य रहता है। कुछ दृष्टि सुधार के लिए इसका पानी आँखों को लगाते हैं। यह पानी यात्री अपनी शान दिखाने के लिए भी अन्य समय पर पिते हैं। वैसेही मरणोन्मुख व्यक्ति को यह पानी शुद्धरुप में अथवा शरबत में मिलाकर पिलाते हैं। एकाध व्यक्ति को अरबी भाषा का उच्चारण न आता हो तो उसे यह पानी घूंटभर पिलाने से उसे उच्चारण तत्काल आ जाता है ऐसी मान्यता है।"" (74) इसीलिए तो जब शिया नेता कल्बे सादिक ने हरिद्वार में आयोजित होनेवाले आगामी कुंभ में शामिल होकर गंगा-स्नान करने की इच्छा प्रकट की तो कुछ ने व्यंगात्मक ढ़ंग से आलोचना की तो कुछ ने विरोध दर्शाया।

इस प्रकार की मान्यताओं-श्रद्धाओं के कारण जब यह प्रश्न पूछा जाता है मजहब बडा कि देश तो संतोषपूर्ण जवाब मुसलमानों की ओर से नहीं मिलता। कवि रविंद्रनाथ ठाकूर ने 1924 में एक बंगाली वृत्तपत्र के प्रतिनिधि के सामने यह उद्‌गार निकाले थे ''मैंने अनेक मुसलमानों को यह प्रश्न अत्यंत स्पष्टरुप से पूछा था कि अगर एकाध मुस्लिम देश ने हिंदुस्थान पर हमला किया तो ऐसे समय में मुसलमान अपनी सभी लोगों की मातृभूमि की रक्षा के लिए हिंदुओं के कंधे से कंधा मिलाकर खडे रहेंगे क्या? और इसका मुझे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। आगे उन्होंने ऐसा भी कहा कि, मैं निश्चितरुप से यह कह सकता हूं कि, मोहम्मदअली जैसे लोगों ने जाहिर रुप से कहा था कि मुसलमान, फिर वह किसी भी देश का हो उसे दूसरे मुसलमान के विरुद्ध खडे रहने की अनुमति नहीं।""

जब इस प्रकार की मान्यताएं-श्रद्धाएं हैं तो उनकी उपज 'वंदेमातरम्‌ नहीं गाएंगे" के रुप में ही सामने आएंगी तो उद्धव ठाकरे, विनय कटियार जैसे लोग कहेंगे ही कि 'जो लोग वंदेमातरम्‌ नहीं बोल सकते उन्हें देश में रहने का अधिकार नहीं। वे पाकिस्तान चले जाएं।" और कोई किस मुँह से इन्हें ऐसा कहने से रोक सकता है, गलत कह सकता है। वस्तुतः सत्य को तो डॉ. अम्बेडकर और वीर सावरकर ने पहचाना था और विभाजन के समय विभाजन शांतिपूर्वक निपट जाए खूनखराबा न हो इसके लिए आबादी की अदला-बदली का हल प्रस्तुत किया था। यदि उक्त हल अमल में लाया जाता तो लाखों लोग बेघर नहीं होते, लाखों लोगों की हत्याएं न होती, हजारों स्त्रियों की अस्मत लूटी न जाती, करोडों की संपत्ति नष्ट न होती। परंतु, अब जब जागे तभी सबेरा की तर्ज पर इस फतवे को गंभीरता से लेना होगा क्योंकि, मुद्दे जस के तस हैं मतलब एक और विभाजन की तैयारी। दरअसल जिन नेताओं ने विभाजन के समय इन जैसों को पाकिस्तान जाने से रोका था उन्होंने उसी समय इन जैसों के नेतृत्व से यह वचन क्यों नहीं ले लिया था कि 'गर इस देश में रहना है तो वंदेमातरम्‌ गाना होगा"। क्योंकि देशभक्त बनने के लिए आवश्यक है मातृभूमि से प्यार।

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