Wednesday, 21 December 2011

इस्लाम की मान्यताएं एवं सीख

 इस्लाम की मान्यताएं एवं सीख

इस्लाम की सीख यह है कि, 'अल्लाह एकमेव ईश्वर है"; उसके अलावा या उसके साथ अन्य ईश्वर को मानना अनेकेश्वरवाद/बहुदेववाद (शिर्क) है। अनेकेश्वरवाद सबसे बडा अपराध-अन्याय है। (4ः48) (इस संबंध में हदीस1 भी हैं और कुर्आन भाष्य भी हैं2)। मूर्तिपूजा निषेधार्ह है। (22ः30) ''अल्लाह की सबसे बड़ी अवज्ञा शिर्क (अनेकेश्वरवाद) और बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) है।"" (दअव्‌तुल कुरान खंड 2 - पृ.1381) मुहम्मद साहेब अल्लाह के अंतिम पैगंबर हैं। (33ः40) और अल्लाह ने उनके साथ पवित्र कुरान(38ः29) और सत्यधर्म के रुप में इस्लाम को भेजा है। (9ः33) जो पैगंबर का पैगाम (संदेश) सुनकर अल्लाह का दीन (धर्म) (3ः19) स्वीकारेगा वही अल्लाह की कृपा का पात्र होगा और उसीको इस इहलोक में और परलोक में भी अच्छा बदला मिलेगा। (40ः51) और जो इस संदेश को नकारेगा वह दोनो ही लोकों में अल्लाह के दंड का पात्र होगा। (3ः85;127) उसे हमेशा के लिए नरकाग्नि (दोजख की आग) का दंड भोगना पडेगा। (4ः56) आरंभ में पैगंबर मुहम्मद ने यही संदेश देकर धर्मप्रचार का कार्य प्रारंभ किया था। साथ ही उनका कहना यह भी था कि इसके पूर्व भी अनेक पैगंबर यही संदेश और सीख लेकर आए थे। (40ः78; 41ः43) और जिन मानव समूहों ने मान्य नहीं किया उन्हें अल्लाह का प्रकोप झेलना पडा। (40ः5; 26ः139) ये कथाएं, अल्लाह के प्रकोप का वर्णन, कुरान के लगभग 30% भाग में वर्णित हैं। यह पृथ्वी अल्लाह की और उसके पैगंबर की होकर (उदा. 5ः120; 24ः42) मानवों को अल्लाह पर श्रद्धा रखकर ही उसकी आज्ञानुसार इस पृथ्वी पर रहना चाहिए, व्यवहार करना चाहिए (4ः59) अन्यथा अल्लाह कठोर दंड देता है। (4ः115; 9ः63) यही संदेश लोगों को सुनाकर पैगंबर मुहम्मद अल्लाह के दंड से बचने के लिए इस्लाम का स्वीकार करो का आवाहन करते थे। (88ः21-24)

इस्लाम के अनुसार अल्लाह एकमेव होने के कारण सभी मानवों के लिए चुना हुआ धर्म एक ही है और वह है 'इस्लाम"। (3ः83) इस इस्लाम की स्थापना पैगंबर मुहम्मद ने की हुई न होकर अल्लाह ने की है। पैगंबर केवल संदेश देनेवाले हैं। (16ः82) इस्लाम के पहले पैगंबर आदम (3ः59) तो अंतिम पैगंबर मुहम्मद हैं। (33ः40) यही एकमेव ईश्वरीय, सत्य, परिपूर्ण और अंतिम धर्म है। (5ः3) संसार के बाकी के धर्म भी मूलतः सत्य ही थे (अर्थात्‌ पूर्व में वे इस्लाम के जैसे ही थे)। परंतु, अब वे वैसे नहीं रहे क्योंकि, पूर्व के पैगंबरों द्वारा दी गई शिक्षा, धर्म, धर्मग्रंथों को अनुयायियों ने भ्रष्ट कर डाला। (3ः78; 2ः79) (इस संबंध में हदीस भी हैं। बुखारी ः 7362,7363) इसी कारण अल्लाह ने प्रत्येक मानव समूह के पास वही धर्म और शिक्षा देकर बार बार पैगंबर भेजे। दअव्‌तुल कुरान भाष्य भी कहता है ः ''अल्लाह ने इस्लाम की हिदायत (सीख, आदेश) और रहनुमाई (पथ प्रदर्शन) के लिए जो दीन (धर्म) फरमाया वह इस्लाम है। यही दीन अल्लाह का दीन है और तमाम नबियों पर वह इसी दीन को नाजिल (अवतरित) फरमाता रहा। उसने कभी किसी देश में और युग में किसी भी नबी या रसूल पर इस्लाम के सिवा कोई और दीन नाजिल नहीं फरमाया। लेकिन पैगंबरों की उम्मतों (समुदायों) ने उस असल और वास्तविक दीन में बिगाड और मतभेद उत्पन्न करके अलग - अलग धर्म इजाद कर लिए।"" (द.कु. खंड1-पृ.173) अब पैगंबर मुहम्मद को मूल शिक्षाओं वाला धर्मग्रंथ और धर्म देकर भेजा गया है। जो कुरान में ग्रंथबद्ध है। (3ः3) संसार के पूर्व के सभी धर्म और धर्मग्रंथ विशुद्ध स्वरुप में अब केवल कुरान में - इस्लाम में अंतर्भूत हैं। इसलिए अब सभी को अपने पूर्वजों के मूल धर्म के रुप मेंं इस्लाम को स्वीकारना चाहिए। यह कुरान की सीख है। इसी कारण से सत्यधर्म लानेवाले सभी पूर्व पैगंबरों का मुस्लिमों द्वारा समान रुप से आदर किया जाना चाहिए। (2ः285; 4ः152) यह अल्लाह की इच्छा और आज्ञा है। अल्लाह की इस इच्छा, आज्ञा को पूर्ण करने का कार्य अल्लाह ने पैगंबर मुहम्मद को सौंपा था और अब उनके बाद इस कार्य की जिम्मेदारी उनके उत्तराधिकारियों (खलीफाओं) पर और सारे मुस्लिम समाज पर डाली गई है। (22ः78, 3ः110) द.कु. भाष्य भी कहता है ः ''यह हुक्म मुस्लिम उम्मत (समुदाय)  पर यह दायित्व डालता है कि वह दुनिया के सामने इस्लाम की दावत (निमंत्रण) पेश करे और इसके लिए अपने सारे संभावित संसाधनों को प्रयोग में लाए इस्लाम का प्रचार एवं प्रसार तथा दीन (इस्लाम धर्म) को फैलाना वह महत्वपूर्ण अनिवार्य कर्तव्य है जिसे अंजाम देने के लिए यह उम्मत खडी की गई है।"" (द.कु.खंड 2-पृ.1150)  इसी कारण से अन्य लोगों के भले के लिए इस्लाम की दावत (निमंत्रण) देना मुसलमान अपना अधिकार समझते हैं। द.कु. भाष्य के अनुसार ः ''पैगंबर मुहम्मद और आपकी लाई हुई किताब (कुरान) हिदायत और रहनुमाई के लिए मौजूद है तथा आपकी उम्मत (उम्मते मुस्लिमा) को बरपा किया गया है ताकि वे दुनिया के कोने - कोने में सत्य संदेश पहुंचाए और लोगों को सत्यधर्म की ओर बुलाएं।"" (द.कु. ख.3 -1541) इसके अलावा अल्लाह अपना यह धर्म अन्य सभी धर्मों पर विजयी बनाए बगैर नहीं रहेगा इस प्रकार का संदेश भी कुरान में आया हुआ है। (9ः33; 48ः28; 61ः9)

इस्लाम के अनुसार इस्लाम पूर्व का काल 'अज्ञान काल"3 days of ignorance है। कुरान (5ः50; 48ः26) में भी यही विशेषण उपयोग में लाया गया है। (यह अज्ञान काल तय करते समय इस्लाम की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद के काल से हुई है ऐसा मानना चाहिए है)।

इस्लाम मतलब पांच बातें जिन्हें इस्लाम के आधार स्तंभ भी कहा जाता है। वे हैं - श्रद्धा (ईमान), नमाज, जकात (धर्मकर अनिवार्य धर्मदान), रोजा (रमजान महीने के उपवास) और हजयात्रा (जीवन में एक बार तो भी मक्का (हज) की यात्रा करना)। ये पांचों ही बातें प्रत्येक मुसलमान के अनिवार्य हैं। परंतु, उनमें से पहली बात 'श्रद्धा" अत्यंत अनिवार्य है। बची हुई चार में से एक या अनेक विशिष्ट प्रतिकूल परिस्थितियों में न भी की गई तो भी धक सकता है;4  परंतु, 'श्रद्धा" न रखने पर वह मुसलमान नहीं रह सकता। यह श्रद्धा भी पांच बातों पर रखना अनिवार्य है ः एकमेव ईश्वर (अल्लाह), (अल्लाह की ओर से संदेश लेकर आनेवाले) देवदूत (फिरिश्ते), अंतिम पैगंबर मुहम्मद, (जिसमें वह संदेश है वह अल्लाह की किताब) कुरान, और अंतिम निर्णय दिन। (2ः177) (उपर्युक्त स्तंभों एवं श्रद्धा के संबंध में हदीस भी हैं। मुस्लिम ः18-21; मजह ः63;41) परंतु, इस्लाम में जिन चीजों को मानने और उन पर ईमान लाने की शिक्षा दी गई है उनमें तीन चीजें मौलिक एवं महत्वपूर्ण हैं ः 1. अल्लाह है और वह एक है और वही सबका मालिक है। 2. मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए उसने अपने नबी और रसूल भेजे। मुहम्मद अल्लाह के अंतिम रसूल और नबी हैं और आप सारे संसार के मार्गदर्शन के लिए भेजे गए हैं। 3. आखिरत सत्य है। (पथ-रेखाएं - सैयद कुत्ब शहीद अन. मुहम्मद फारुकखां -पृ.190) संसार का अंत होने पर सभी को फैसले के लिए अल्लाह के पास जाना पडेगा। उस दिन (न्याय दिवस) अल्लाह श्रद्धावानों को हमेशा के लिए स्वर्ग और श्रद्धाहीनों को हमेशा के लिए नरकाग्नि का फैसला देगा। इस न्याय दिवस को ही अंतिम निर्णय दिन, आखिरत या कयामत कहते हैं। इन पांचों श्रद्धाओं को एकत्रित रुप से मिलाकर रखना श्रद्धा रखना कहा जाता है और ये पांचों ही श्रद्धाएं अविभाज्य हैं। अगर इनमें से एक भी 'श्रद्धा" नहीं रखी तो श्रद्धा की श्रंखला टूटकर बची हुई चारों श्रद्धाएं भी निरर्थक हो जाती हैं अर्थात्‌ वह श्रद्धाहीन हो जाता है। (2ः85) व्यवहार में इन पांचों श्रद्धाओं को संक्षेप में 'अल्लाह पर श्रद्धा", ऐसा कहा जाता है। उपरोक्त पांचों श्रद्धाएं एक ही कलमें 'लाइलाह इल्ललाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" 5  अल्लाह एकमेव ईश्वर है और मुहम्मद उसके पैगंबर हैं, इसीको 'कलमा - ए- शहादत" या 'कलमा तैयबा" कहते हैं, में आ जाती हैं।6 जो इस प्रकार की श्रद्धा रखता है वह श्रद्धावान (ईमानवाला) अर्थात्‌ मुसलमान और जो श्रद्धा नहीं रखता वह गैर - मुस्लिम। इसे ही अरबी भाषा में 'काफिर" कहते हैं। काफिर मतलब जो 'कुफ्र" करता है। 'कुफ्र" मतलब 'नकार देना"। जो श्रद्धा को नकारता है वह 'काफिर", ऐसा सीधासादा अर्थ है। 'डिक्शनरी ऑफ इस्लाम" में काफिर का अर्थ दिया गया है ः 'काफिर वह है जो कुरान और मुहम्मद की सीख पर श्रद्धा नहीं रखता।" कुछ इसी प्रकार का भाष्य दअ्‌वतुल कुरान का भी है ''काफिर से मुराद (अभिप्रेत) वह व्यक्ति है जो हजरत मुहम्मद के लाए हुए दीन7को कुबूल करने से इंकार कर दे।"" (द. कु. खंड 3-पृ. 2367)  हदीस सौरभ की सामान्य पारिभाषिक शब्दावली के अनुसार ''कुफ्र- 1. अधर्म, 2. इन्कार, 3. कृतघ्नता। 'कुफ्र" का मूल अर्थ होता है ः ढ़ांकना, छिपाना। इस्लाम के इन्कार करनेवाले को कुफ्र का 'अपराधी" या 'काफिर" कहा जाता है।"" (हदीस सौरभ - मुहम्मद फारुकखां -पृ. 564) स्पष्ट कहें तो नास्तिक अथवा अनेकेश्वरवादी अथवा मूर्तिपूजक अथवा कुरान पर श्रद्धा न रखनेवाला। इनमें से प्रत्येक श्रद्धाहीन (काफिर) ही होता है।

अल्लाह की कृपा, दया, प्रेम, मार्गदर्शन, क्षमा, बदला, सहायता, लडाई में विजय यह सब श्रद्धावान को ही मिलता है। श्रद्धाहीन के लिए ठीक इसके विपरीत रहता है। इस्लाम के अनुसार 'श्रद्धा" सद्‌गुणों, नीतिमूल्यों, सदाचार, न्याय का मूल स्त्रोत है, तो श्रद्धाहीनता (कुफ्र) दुर्गुणों, दुराचार, अनीति, अन्याय का मूल स्त्रोत है। श्रद्धा रखने पर मनुष्य सदाचारी, सत्यवचनी, सद्‌गुणी, सह्रदयी, संयमी, न्यायी, क्षमाशील, शांतिप्रिय, समतावादी, परोपकारी, नीतिमान, मानवतावादी बन सकता है, तो श्रद्धाहीनता के कारण इसके विपरीत घटित होता है। इसीलिए सदाचारी (सत्कर्मी) वगैराह बनने के लिए पहले श्रद्धावान बनना आवश्यक है, ऐसी इस्लाम की भूमिका है।

टिप्पणी ः-
-1. मुस्लिमों में कुरान के अनंतर हदीस का महत्व है। हदीस को  "सुन्नाह' भी  कहते हैं। सुन्नाह का अर्थ मार्ग, नियम, कार्यपद्धति अथवा जीवन पद्धति होता है। कुरान की शिक्षाओं का योग्य स्पष्टीकरण और उसके अन्वयार्थों के विवाद मिटाने का एकमेव साधन हदीस ही है। अर्थात्‌ कुरान और हदीस मिलकर "दीन' (धर्म) की शिक्षा को पूर्णत्व तक पहुंचाते हैं। संक्षेप में हदीस मतलब पैगंबर मुहम्मद की कृतियां, उक्तियां एवं यादें, जो उनके निकटस्थ एवं विश्वसनीय अनुयायियों द्वारा आस्थापूर्वक संभालकर रखी थी, जिन्हें बाद में संग्रहीत कर संशोधकों ने ग्रंथ का रूप दिया।आगे के छह हदीस -संग्रह महत्वपूर्ण माने जाते हैं : (1) 'सहीह बुखारी' (सन्‌ 810-892); (2) 'सहीह मुस्लिम' (817-874) (3) 'अबू दाऊद का सुन्नाह' (817-888) ( 4) 'तिरमिजी का सुन्नाह' (821-892) (5) 'नसाई का सुन्नाह' (830-916) (6) 'मजह का सुन्नाह'(824-886)  (कोष्ठक के आंकड़े उस संग्राहक के जीवन काल के हैं।) इन छ: संग्रहों को मान्यता प्राप्त (approved)अधिकृत (authentic) अथवा विश्वसनीय (genuine/reliable) हदीस माना जाता है। (64-xxviii) (60-v) उन  छ: में से पहले दो हदीस संग्रहों कोअधिक सम्माननीय स्थान प्राप्त है। उन्हें 'सहीह' यानी 'अतिविश्वसनीय' (sound) ऐसा नाम प्राप्त हुआ। (99-xi) इन दोनों संग्रहों की प्रत्येक हदीस पूर्णतया सत्य हैं ऐसा माना जाता है। कुछ लोग इनमें भी थोड़ा अंतर करके 'सहीह-बुखारी' इस संग्रह को पहला क्रम देते हैं। इसके बाद अबू दाऊद की सुन्नाह का क्रम लगता है। बचे हुए तीन संग्रह महत्वपूर्ण माने जाते हैं और उनकी हदीस का आधार लिया जाता है फिर भी उनमें से प्रत्येक हदीस की सत्यता के बारे में निश्चित रूप से कहा नहीं जाता। इन छह के अलावा कुछ और हदीस प्रचलित हैं। (1) इमाम मलिक की मुवत्ता (2) इमाम हनबल की मुस्नद (3) अबू अब्द की मुस्नद, वैसे ही आगे के विद्वानों के नामों से भी सुन्नाह संग्रह हैं : (4) दरिमी, मझा, दरकुंटी, बाह्याकी, मंसूर वगैराह। हदीस को उद्‌धृत करते समय संबंधित संग्रह का नाम और उसका हदीस क्रमांक इतना उल्लेख करना पर्याप्त होता है। उदा. (बु. : 256, मु : 6200, दा : 2651) (बु : = सहीह बुखारी, मु : सहीह मुस्लिम और दा : अबू  दाऊद का सुन्नाह, मज: = , इब्न मजह का सुन्नाह, मलि : मुवत्ता इमाम मलिक) हमने हदीस उद्‌धृत करते समय यही पद्धति उपयोग में लाई है ।

-2. ''शिर्क यह है कि अल्लाह की जात (व्यक्तित्व, अस्तित्व) और उसकी सिफात (प्रशंसा, तुल्य) में किसी को साझीदार ठहराया जाए चाहे वह सूरज हो या तारे, नाग हो या आग, बुत (मूर्ति) हो या इन्सान, फरिश्ते हों या जिन्न, वली (महात्मा, ऋषि) हों या पैगंबर, भौतिक चीजें हों या अध्यात्मिक, काल्पनिक देवी हो या देवता।"" (द.कु.ख.1-279) 'शिर्क मतलब 'कलमा-ए-खबीस" और उसके साथ कोई अमल (कार्य, कृत्य) कुबूल नहीं होता।"(फजाइले आमाल-520) खबीस का अर्थ होता है ''बहुत बडा पापी""। (उर्दूःहिंदू शब्दकोश-146) ''जो इस कलमे को मानेंगे अल्लाह इनकी सारी कोशिशों को भटका देगा। वह कभी सीधा काम न कर करेंगे जिससे दुनिया या आखिरत (परलोक) में कोई अच्छा फल पैदा हो।"" (खुतबात, मौदूदी-42) ''इस कलिमे का अर्थ गंदी, बुरी और अपवित्र बात के है। मुराद बातिल (असत्य) का कलिमा है, चाहे वह शिर्क (बहुदेववाद) हो, अनीश्वरवाद हो या कुफ्र।"" (द.कु.ख.2-843)

-3. ''मुस्लिम इस्लाम के अभ्युदय के पूर्व के समग्र काल को 'जाहिलिया युग" कहते हैं। उनका विश्वास है कि इस्लाम के पूर्व अरब अज्ञानी थे क्योंकि उनके जीवन यापन के लिए कोई ईश्वरीय विधान नहीं था। शब्द जाहिलिया का प्रयोग मुहम्मद साहब ने भी कुरान शरीफ में चार स्थलों पर किया है। प्राचीन अरबों को अज्ञानी नहीं कहा जा सकता है। वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। वे अनेक मानवीय गुणों से भी विभूषित थे। वे अत्यंत विनम्र, दयालु और शिष्ट थे। अपने अतिथियों का बडा आदर सत्कार करते थे। परंतु चूंकि वे इस्लाम के नियमों से आबद्ध नहीं थे इसलिए इस युग को मुस्लिम 'दौर-जाहिलिया" की संज्ञा देते हैं।"" (अरबी साहित्य ....पृ.18)

-4.''अल्लाह की ही इबादत करे, नमाज कायम करे और जकात दे यही सही पायदार दीन है''  (अल्लाह पर श्रद्धा रखें, नमाज अदा करें और जकात दें) इस स्वरूप की अनेक आयतें (उदा. 2:277, 98:5) कुरान में आई हुई हैं। इन आरंभ की आयतों में रोजा या हज का उल्लेख नहीं।

-5. ''जब किसी मुस्लिम घराने में बच्चा पैदा होता है तो उसके कान में सबसे पहले अरबी भाषा के यह शब्द फूँके जाते हैं 'लाइलाहइल्ललाह मुहम्मदुर्रसूलल्लाह" और यही कलमा मरते समय आमतौर पर मुस्लिमों की जबानों पर होता है।"" (अरबी साहित्य - डॉ. नरेंद्र बहादुर, संपादक शाह अब्दस्सलाम, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार ....पृ. 9)

-6.इस कलमे का पहला भाग 'लाइलाह इल्ललाह" (37ः35) में आया है तो, दूसरा भाग 'मुहर्म्मदसूलुल्लाह" (48ः29) में आया है। 'पचासी आयतें हैं, जिनमें कलमा-ए-तैयबा या इसका मज्मून आया हुआ है। इनके अलावा और भी आयतें हैं जिनमें इनके अर्थ आए हुए हैं।" (फजाइले आमाल-541) 'इस कलमे पर जो लोग ईमान (श्रद्धा) लाएंगे अल्लाह उनको ... दुनिया और आखिरत दोनो में सबात (चिरस्थायित्व) बख्शेगा।" (खुतबात, मौदूदी-42) ''इस कलमे का अर्थ अच्छी और पाकीजा (पवित्र) बात के है। इससे अभिप्रेत तौहीद (एकेश्वरवाद) का कलिमा है जो इस्लामी अकीदे (शिक्षा) की बुनियाद और ईमान (इस्लाम पर श्रद्धा) की आधारशिला है। (द.कु. ख. 2-843)

-7. ''दीन जो वास्तव में अल्लाह की हिदायत का नाम है, सिर्फ इस्लाम है। लिहाजा जो व्यक्ति भी इस्लाम के सिवा कोई दूसरा दीन अपनाएगा वह अल्लाह के यहां कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा और ऐसे लोग आखिरत में तबाह होंगे।"" (द.कु.ख. 1 -165)

2 comments:

  1. Here is a real example of what the Muslim head "stoner" says to begin the ghastly "festivities:
    "We have all gathered here to implement divine punishments. Oh, Almighty, we plead with you to give victory to Islam and Muslims."
    Here is what Jesus said:According to the Gospel of John, the Jewish Priests (THAT TIME MULLA ) (Pharisees), in an attempt to discredit Jesus, brought a woman charged with adultery before him.
    The Pharisees reminded Jesus that adultery was punishable by stoning under Law of Moses and challenged Jesus to judge the woman so that they might then accuse him of disobeying the law.
    Jesus thought for a moment and then replied, “He that is without sin among you, let him cast the first stone at her.”
    The people crowded around him were so touched by their own consciences that they departed. When Jesus found himself alone with the woman, he asked her who were her accusers. She replied, “No man, lord.” Jesus then said,
    “Neither do I condemn thee: go and sin no more.”
    Muhammad said..".. take not life, which Allah hath made sacred, except by way of justice and law: thus does He command you, that you may learn wisdom." (Quran 6:151)
    Yet by his own example he was a plunderer and murderer, and promotes murder and Jihad for those who don't agree with him.. Jesus, the Son of God, said to love your enemies, and pray for those who persecute you............When Muhammad started preaching his new religion in Mecca he was conciliatory and appeasing to Christians. He told them: "We believe in What has been sent down to us and sent down to you, our God is the same as your God." Surah 29:46. Compare this with what happened later, in Medina,

    after Muhammad gained strength and Christians refused to follow Muhammad's Allah. Allah then tells him to
    "Fight those who believe not in God nor the last day...Nor acknowledge the religion of truth (Islam), (even if they are) of the people of the Book, until they pay Jizya (tribute tax) with willing submission, and feel themselves subdued". Surah 9:29
    The Koran was written 500 years after the Christian Bible was completed
    Muhammad is one of those false prophets who would deceive many (hundreds of millions) that Jesus warned us about.
    According to many interpretations of the Qur'an (aka: Koran), conversion to a faith other than Islam is punishable by death, in the Koran he says his god is the same of Jews, yet then changes and says anyone who doesn't worship in Islam is punishable by death. Threat of force to worship? Who's your god Muhammad?
    The Most High God gives man Free Will.....................

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  2. FORETOLD BY : YESHU MASHEEHA "

    Jhn 10:1 ¶ Verily, verily, I say unto you, He that entereth not by the door into the sheepfold, but climbeth up some other way, the same is a thief and a robber.
    Jhn 10:2 But he that entereth in by the door is the shepherd of the sheep.
    Jhn 10:3 To him the porter openeth; and the sheep hear his voice: and he calleth his own sheep by name, and leadeth them out.
    Jhn 10:4 And when he putteth forth his own sheep, he goeth before them, and the sheep follow him: for they know his voice.
    Jhn 10:5 And a stranger will they not follow, but will flee from him: for they know not the voice of strangers.
    Jhn 10:6 This parable spake Jesus unto them: but they understood not what things they were which he spake unto them.
    Jhn 10:7 ¶ Then said Jesus unto them again, Verily, verily, I say unto you, I am the door of the sheep.
    Jhn 10:8 All that ever came before me are thieves and robbers: but the sheep did not hear them.
    Jhn 10:9 I am the door: by me if any man enter in, he shall be saved, and shall go in and out, and find pasture.
    Jhn 10:10 The thief cometh not, but for to steal, and to kill, and to destroy: I am come that they might have life, and that they might have [it] more abundantly.
    Jhn 10:11 I am the good shepherd: the good shepherd giveth his life for the sheep.
    Jhn 10:12 But he that is an hireling, and not the shepherd, whose own the sheep are not, seeth the wolf coming, and leaveth the sheep, and fleeth: and the wolf catcheth them, and scattereth the sheep.
    Jhn 10:13The hireling fleeth, because he is an hireling, and careth not for the sheep.
    Jhn 10:14 I am the good shepherd, and know my [sheep], and am known of mine.
    Jhn 10:15 As the Father knoweth me, even so know I the Father: and I lay down my life for the sheep.

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