Friday, 23 December 2011

धर्म का प्रमाणपत्र कौन देगा?

धर्म के आधार पर सेवाओं में या निर्वाचित पदों के लिए आरक्षण देने की चर्चा सतत चलती रहती है। हाल ही में केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने मुसलमानों को आरक्षित स्थान देने का विचार प्रस्तुत किया है। इसके पूर्व सच्चर आयोग ने इस प्रकार के आरक्षण की अनुशंसा की हुई ही है। कुछ परिमाण में उसका निष्पादन भी शुरु हो गया है। 'मौलाना आजाद अल्पसंख्यक आर्थिक विकास महामंडल" धार्मिक आधार पर आर्थिक सहायता करने के लिए ही है। धार्मिक अल्पसंख्यक के रुप में आज भी शैक्षणिक छात्रवृत्तियां मिलती हैं, उद्योग के लिए कम ब्याज से कर्ज मिलता है। आंध्र, केरल आदि राज्यों में धार्मिक आधार पर नागर सेवाओं में आरक्षण दिया जाता है। महाराष्ट्र में भी धार्मिक आधार पर (अर्थात्‌ अल्पसंख्यक के रुप में) पुलिस विभाग में जिला स्तर पर भर्ती की जाती है। इस संदर्भ में हमारे मन में निर्मित होनेवाला प्रश्न है, धर्म के आधार पर आरक्षण देने की गुणवत्ता या योग्यायोग्यता का न होकर, ऐसे समय अपना धर्म कहने के लिए इच्छुक व्यक्ति कौनसा सबूत या प्रमाणपज्ञ प्रस्तुत कर रहे होंगे यह है।
वर्तमान में चल रही पद्धति इस प्रकार की है कि, उस व्यक्ति द्वारा मेरा धर्म अमुक है, इस प्रकार का स्वघोषित प्रतिज्ञापत्र नोटरी के सामने साक्षांकित कर प्रार्थनापत्र के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उसमें उसके द्वारा प्रतिज्ञापित किया हुआ धर्म सच्चा है, ऐसा मानकर आगे की आरक्षण की सारी प्रक्रिया पूरी की जाती है।
इस पद्धति से आजतक कोई सी भी कानूनी या व्यवहारिक समस्या पैदा हुई हो ऐसा दिखाई नहीं दिया है। प्रतिज्ञापत्र के धर्म को आव्हान देनेवाला या आक्षेप उठानेवाला एकाध प्रकरण न्यायालय में दाखिल हुआ हो यह भी सुनने में आया नहीं है। इसका महत्वपूर्ण कारण यानी किसीने भी अपने प्रतिज्ञापत्र में झूठा धर्म दर्ज किया नहीं हो; परंतु धर्म के आधार पर जब व्यापक स्वरुप में आरक्षण दिया जाएगा, नौकरियां मिलने लगेंगी, विधायकी, सांसद के पद मिलने लगेंगे तब यह स्थिति नहीं रहेगी। आज जाति के आरक्षण की जो स्थिति है वैसी होगी। जो अपना धर्म नहीं है उस धर्म का आरक्षण के लाभ के लिए प्रतिज्ञापत्र में लिखना बेधडक शुरु हो जाएगा। जाति के झूठे प्रमाणपत्र जांचने के लिए जिस प्रकार से जाति जांचने की मशीनरी (शासन तंत्र) खडी की गई है वैसी धर्म जांचने के लिए मशीनरी खडी करना पडेगी। भारतीय संविधान के धर्म का अर्थ और धर्मांतरण के मूलभूत अधिकार को ध्यान में लें तो यह धर्म जांच केवल असंभव ही नहीं बल्कि हास्यापस्द हुए बगैर रहेगी नहीं।
 संविधान की 25वी धारा के अनुसार 'रिलीजन" इस अर्थ से धर्म एक पारलौकिक और आध्यात्मिक श्रद्धा है। कानून-व्यवस्था, आरोग्य, नीतिमत्ता और दूसरों का मूलभूत अधिकार इनके विरोध में यह धर्मपालन न होने का बंधन डाला गया है। वैसेही राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और अन्य इहलौकिक (सेक्यूलर) विषयों के संबंध में धर्म का विचार न करते, कानून बनाने का राज्य को सार्वभौम अधिकार प्रदान किया गया है। संक्षेप में धर्म का मनुष्य के इहलौकिक जीवन पर का (प्रतिकूल) प्रभाव परिणाम शून्य किया गया है। मनुष्य की आत्मिक और मानसिक संतुष्टि के लिए धर्मश्रद्धा पालने की स्वतंत्रता संविधान ने दी हुई है। यह श्रद्धा किस बात पर, किस पर, किस प्रकार से और कितने समय तक रखें इस पर संविधान का बंधन नहीं। धर्मश्रद्धा रखी ही जाए, ऐसा भी बंधन नहीं। एक बार रखी हुई श्रद्धा पुन्हः कभी भी बदली जा सकती है। धर्मांतरण की यह स्वतंत्रता संविधान ने ही दी हुई है। यह धर्मश्रद्धा निश्चित और सिद्ध करने की कोई सी भी पद्धति संविधान में नहीं। वह एक आंतरिक श्रद्धा होने के कारण वह पालनेवाला ही उसे समझ सकता है। वह कहता है इसलिए वह सच होना चाहिए इतना ही दूसरा जान सकता है। वह श्रद्धा दूसरों के सामने सिद्ध कर देने की कोई सी भी वस्तुनिष्ठ पद्धति उपलब्ध नहीं। किसका धर्म कौनसा है यह सिद्ध करनेवाला कोई सा भी कानूनी निर्णयाधिकारी अस्तित्व में नहीं। श्रद्धा और भावनाओं पर आधारित होने के कारण धर्म एक व्यक्तिनिष्ठ बात है। वस्तुनिष्ठ नहीं!  इसलिए तेरे प्रतिज्ञापत्र में लिखा हुआ धर्म ही तेरा धर्म है यह सिद्ध करके दिखा। ऐसा कहने का अथवा वह तेरा धर्म ही नहीं ऐसी आपत्ति उठाने का अन्यों को अधिकार नहीं। इन अन्यों में उस व्यक्ति के माता-पिता, संबंधित धर्मप्रमुुख, शासकीय अधिकारी और न्यायालय भी आते हैं। संक्षेप में, संविधान के अर्थानुसार 'मेरा धर्म अमुक है" यह उद्‌घोषणा ही उसकी वस्तुस्थिति का और सत्यता का एकमेव और अंतिम सबूत ठहरता है। वही उसका धर्म प्रमाणपत्र ठहरता है!
कुछ धर्मों में धर्म स्वीकृति के लिए कुछ विधि किए जाते हैं। उसके बाद वह व्यक्ति अपने धर्म में आ गई ऐसा माना जाता है। उदा. ईसाई धर्म में 'बपतिस्मा" का समाज मान्यता के लिए उपयोग होता है परंतु, उसका संवैधानिक एवं कानूनी दृष्टि से कोई मूल्य नहीं। आज बपतिस्मा लेने के बाद कल उसने अपने हिंदू हो जाने की घोषणा की तो बपतिस्मा अपनेआप ही शून्यवत हो जाता है और हिंदू होने के लिए कोई सी भी विधि की व्यवस्था न होने के कारण वह घोषणा करते ही हिंदू हो जाता है। इस्लाम का भी स्वीकार करने के लिए कोई सी भी विधि अनिवार्य नहीं। ईसाइयों के समान इस्लाम में कोई धर्मपीठ नहीं। इस्लाम का स्वीकार करने के लिए केवल इस 'कलिमा" पर श्रद्धा होने की घोषणा करना पडती है 'अल्लाह एकमेव ईश्वर है और मुहम्मद उसके रसूल (पैगंबर) है"। यह घोषणा किसके सामने की जाए इसका भी बंधन नहीं। इसका जोर से उच्चारण करना भी अनिवार्य नहीं। अकेले में या मन ही मन में उपर्युक्त 'कलिमा" पर श्रद्धा रखी तो भी चलता है। ऐसी श्रद्धा रखते ही वह मुसलमान हो जाता है। इसके लिए नमाज, रोजा, खतना, नामांतरण किसी की भी आवश्यकता नहीं। ये सारी बाद में की जानेवाली बातें हैं। न की गई तो भी 'कलिमा" पर श्रद्धा होने तक उसका मुसलमानत्व अबाधित रहता है। जिस क्षण और जब-जब उसकी श्रद्धा नहीं रहती तब-तब वह मुसलमान (यानी श्रद्धावान) नहीं रहता। अतः उपर्युक्त कलिमा पर मेरी श्रद्धा है, ऐसा कहना यही वह मुसलमान होने का एकमेव सबूत है। यही उसका धर्म प्रमाणपत्र है!
अतः मेरा धर्म अमुक है, ऐसा उद्‌घोषित करनेवाला प्रतिज्ञपत्र और प्रतिज्ञापन ही संविधानानुसार रहनेवाला धर्मप्रमाणपत्र मानना अचूक सिद्ध होता है। वर्तमान में इसीका निष्पादन हो रहा है। जनगणना में, स्कूल-कॅालेजेस में प्रवेश प्रार्थना पत्र में या शासन को दिए जानेवाले अन्य आवेदन या जानकारी पत्रों में धर्म का जो उल्लेख किया जाता है वह सत्य माना जाता है। इसके लिए कोई सा भी सबूत मांगा नहीं जाता। अब प्रश्न यह खडा होता है कि धर्म के आधार पर नौकरियों में या अन्यत्र व्यापक प्रमाण में आरक्षण दिए जाने पर इसके लिए धर्म के सबूत के रुप में कौनसा प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जाए? स्वयं का ही प्रमाण पत्र उपयोग में लाए जाने पर आरक्षण का लाभ लेने के लिए जो धर्म अपना नहीं है उसके प्रमाण लाए जाने लगे तो उसकी जांच कैसे करें? वे प्रतिज्ञापत्र या प्रमाण पत्र शून्यवत, अवैध या दंड के पात्र कैसे ठहराएं?
अपन एक उदाहरण लें। शिवाजी नामके व्यक्ति ने अपने मुसलमान होने का प्रतिज्ञापत्र प्रस्तुत किया और वह स्वीकारा या नकारा इस पर से वह विवाद उच्च न्यायालय में गया तो क्या होगा? शिवाजी कहेगा कि, 'मेरा प्रतिज्ञापत्र सौ प्रतिशत सत्य है। जिस समय मैंने इस प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किए थे तब मुझे श्रद्धापूर्वक ऐसा लगा था कि, 'अल्लाह एकमेव ईश्वर है और मुहम्मद उसके रसूल हैं। मैंने स्वयं इस्लाम का अध्ययन किया है। साथ में कुरान, हदीस और मौ. आजाद का कुरान भाष्य ये ग्रंथ लेकर आया हूं। अनेक  उलेमाओं ने मुझे बतलाया है कि, मुसलमान होने के लिए इतना ही पर्याप्त है। अतः प्रतिज्ञपत्र बिल्कूल भी झूठा नहीं।" इस पर 'तेरी श्रद्धा वैसी थी यह हमें सिद्ध करके दिखा? तेरा नाम शिवाजी होते हुए तू मुसलमान कैसे? तू कभी मस्जिद गया है क्या? तुझे नमाज पढ़ना आता है क्या? तेरे कपाल पर टीका कैसे? कुरान की कोई सी भी दो आयतें बोलकर दिखा? तुझे मुहम्मद पैगंबर का पूरा नाम मालूम है क्या? ..." इस प्रकार से कुछ भी न पूछते न्यायालय उसके पक्ष में फैसला दे डालेगा। धर्म एक श्रद्धा होकर, अंतःकरण की श्रद्धा को जांचने वाला यंत्र अद्याप नहीं निकला है का अभिप्राय दर्ज करेगा। तब उसके प्रमाणपत्र की जांच उसके स्वयं के सिवाय अन्य कोई भी कर नहीं सकेगा, वैसे ही उसके धर्म का प्रमाणपत्र उसके स्वयं के सिवाय अन्य कोई भी शासकीय अधिकारी दे नहीं सकेगा।
अब आगे के प्रश्न। आरक्षण का लाभ लेने के लिए उस व्यक्ति द्वारा कितने समय तक उस धर्म में ही रहना चाहिए? यानी आरक्षण के आधार पर नौकरी पर हाजिर होते ही उसने नया अथवा पूर्व का ही धर्म स्वीकार लिया तो उसकी नौकरी जाएगी? सेवानिवृत्ति तक उसने उसी धर्म में रहना चाहिए, ऐसा कहा तो वह संविधान की धारा 25 के धर्मांतरण के अधिकार का उल्लंघन तय होगा! मानलो उसने खुल्लमखुल्ला धर्मांतरण न करते वह धर्म मानना और पालन करना ही बंद कर दिया और उलटे उस धर्म की  आलोचना करने लगा - यानी वह बुद्धिवादी बन गया तो भी उसकी नौकरी जाएगी? संक्षेप में आरक्षण का लाभ लेने पर धर्म पर कायम श्रद्धा रखने का और पालने का बंधन उस संपूर्ण लाभ काल में उस पर रहेगा क्या? जिस प्रकार से जाति बदली नहीं जा सकती है उसी प्रकार से धर्म भी बदला नहीं जा सकेगा, इस प्रकार का कानून बनाया जाएगा क्या? और उस धर्म का प्रत्यक्ष में पालन हो रहा है कि नहीं इसके लिए एकाध 'धर्म दक्षता पथक" (रीलिजन व्हिजिलन्स टीम) स्थापित की जाएगी क्या?
और यदि यह संभव न हो तो फिर धर्म पर आधारित आरक्षण यानी प्रत्येक को स्वयं के मन मुताबिक और इच्छानुसार स्वघोषित  प्रमाणपत्रानुसार इसका लाभ लेने का मनमाना अधिकार देना नहीं है क्या?
लेखक - शेषराव मोरे, लोकसत्ता - मुंबई बुधवार, 21 दिसंबर 2011
अनुवाद - शिरीष सप्रे

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