Wednesday, 23 November 2011

कम करें बेजा महत्व राजनेताओं का

कम करें बेजा महत्व राजनेताओं का

स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय पश्चात ही राजनेताओं के चाल-चलन, आचरण पर ऊँगलियॉं उठने लगी थी। प्रारंभ में भ्रष्टाचार के कुछ मामले में भी सामने आए। परंतु, फिर भी सर्वसाधारण जनता के मन में राजनेताओं के प्रति विश्वास था, आदरभाव था।  परंतु, धीरे-धीरे हालात बदलने लगे, राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगना आम होता चला गया और सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच के लिए जांच आयोग गठित किए जाने लगे। किंतु, जांच के निष्कर्ष कभी जनता के सामने ढ़ंग से आए नहीं और आए भी तो कोई उल्लेखनीय कार्यवाही की गई ऐसा कुछ नजर आया नहीं। अंत में जांच आयोग आरोप लगानेवालों के मुंह बंद करने के हथियार के रुप में प्रयुक्त किए जाने लगे, या यूं कहें कि कुछ लोगों के पुनर्रोजगार का माध्यम बन गए। अंततः राजनेताओं द्वारा किए गए कांडों एवं भ्रष्ट आचरणों, कमाई गई अकूत संपत्ति ने नए-नए कीर्तिमान स्थापित करना प्रारंभ कर दिया।

फिर नया दौर चला राजनेताओं द्वारा चुनाव के समय अपनी चल-अचल संपत्ति घोषित करने का। सवाल उठानेवाले फिर भी सवाल उठाते रहे कि चुनाव में संपत्ति की घोषणा के साथ नेताओं को इसका स्त्रोत भी बताना चाहिए। सवाल खडा करने के पीछे तर्क यह था कि वर्तमान में देखते ही देखते एक मामूली पार्षद और सरपंच भी बडी संपत्ति का मालिक आखिर कैसे हो जाता है?

राजनेताओं के बारे में इस प्रकार की चर्चा करना, सवाल खडे करना तो आम बात है। परंतु, चौंकने की बारी तब आई जब समाचार पत्रों में छपा कि 'जार्ज के जीते जी विरासत पर बखेडा"  जो उनके वारिसों के बीच करोडों की संपत्ति को लेकर शुरु हो गया है। इन्होंने जो भी संपत्ति बनाई है वह वैध तरीकों से ही बनाई है। हमारे चौंकने का कारण है इन राजनेता की पृष्ठभूमि, ये कोई टाटा-बिडला के वंशज तो हैं नहीं! श्री जार्ज जो हैं वे तो समाजवादी, जुझारु मजदूर नेता के रुप में जाने जाते रहे हैं।

हमारा कहना तो यह है कि जब वैध तरीके से इतनी संपत्ति कमाई जा सकती है तो, जो राजनेता पैसा बनाने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने को तैयार रहते हैं वे कितना माल घोषित-अघोषित तरीके से बना रहे होंगे इसकी तो केवल कल्पना मात्र ही की जा सकती है। यही कारण है कि जब उच्च नेतृत्व (श्रेष्ठी) हार के सदमे में आकर किसी तरह की चिंतन बैठक का आयोजन करना चाहता है तो ये हारे-हरल्ले नेता अपनी हार की थकान मिटाने विदेश चले जाते हैं बजाए चिंतन बैठक में भाग लेने के।

इतना पैसा भला किस धंदे में इतनी तेज गति से बनाया जा सकता है? इसीलिए तो बिरलों को छोडकर सभी चुनावी दौड में शामिल होकर पार्षद से लेकर विधायक-सांसद-मंत्री ये न सही तो कम से कम किसी निगम-बोर्ड का अध्यक्ष-उपाध्यक्ष यह भी नहीं तो सदस्य ही सही बन जाएं इसलिए दौड लगा रहे हैं। और इसका जीवंत नजारा गत दिनों हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में नेताओं ने जनता को चुनावी जंग जीतने के लिए आसमान सिर पर उठाकर, आकाश-पाताल एक कर दिखला भी दिया। और यह आसान रास्ता जान नेता-पुत्र-रिश्तेदार भी नेता का बेटा नेता ही बनेगा अर्थात्‌ वंशवाद की राह पर चल पडे हैं। इस वैध-अवैध तरीके से मिलनेवाले धन और इसके लिए अपनाए जानेवाले हथकंडों के कारण ही ये राजनेता हद दर्जे के बेईमान, बेहया, असंवेदनशील, निष्ठुर-निरंकुश हो गए हैं तथा इन सद्‌गुणों का प्रदर्शन भी इन्होंने 26/11 को कर दिखाया। इन्हीं सद्‌गुणों के कारण संसद पर हमले के समय जिन रक्षाकर्मियों ने बलिदान दिया उनके बलिदान की उन्हें रत्ती भर भी परवाह नहीं। वे तो अफजल गुरु को बचाने में लगे हैं, सडक पर मरते पुलिस कर्मी की सुध लेने की उन्हें फुर्सत नहीं, सेना के जवानों को भी अच्छा वेतनमान-सुविधाएं मिलना चाहिए की परवाह नहीं।

उन्हें परवाह है तो केवल इतनी कि उन्हें वेतन वृद्धि मिले, अधिकाधिक सुविधाएं वह भी हर क्षेत्र में केवल स्वयं को ही नहीं अपितु, अपने रिश्तेदारों और समर्थकों को भी मिले इसकी। और इस संबंधी प्रस्ताव भी संसद से लेकर विधानसभा, नगर-निकायों तक हाथों-हाथ स्वीकृत हो जाते हैं, पारित हो जाते हैं और जब बारी आती है जनता की तो जो आसमान छूती महंगाई से पीडित है  के सवाल पर बहस के समय संसद खाली नजर आती है। और आएगी भी क्यों नहीं? और इनको पीडा भी क्यों हों? इनको तो कितने सस्ते में खान-पान की सुुविधा उपलब्ध है वह समाचार पत्रों में आ ही चूका है। 

इस प्रकार से इन नेताओं ने प्रजातंत्र की अनिवार्य बीमारी का रुप धारण कर लिया है। परंतु, ये नेता इतने चालाक हैं कि अपने में व्याप्त इस बीमारी का कारण भी जनता पर ही थोप रहे हैं। यह कहकर कि जब समाज ही भ्रष्ट होगा तो उसे नेतृत्व भी भ्रष्ट ही मिलेगा। क्योंकि, नेता भी तो उन्हीं में से निकलकर आता है। असल में इन नेताओं के इस पाखंडी अहंकार का कारण है इन्हें मिलनेवाला आवश्यकता से अधिक बेजा महत्व जो इन्हें बेलगाम किए दे रहा है। कोई सा भी समाचार पत्र उठाकर देखिए हर कार्यक्रम में फिर भले ही वह किसी भी क्षेत्र का हो मुख्य अतिथि के रुप में राजनेता ही विराजमान नजर आएंगे, चाहे उन्हें उस क्षेत्र का कौडी भर का भी ज्ञान क्यों न हो!

वस्तुतः होना यह चाहिए कि कोई सा भी कार्यक्रम-आयोजन हो उसमें उस क्षेत्र में जिससे संबंधित कार्यक्रम है के विशेषज्ञता प्राप्त लोगों या अन्य आदरणीय लोगों को जो समाज हित कोई कार्य कर रहे हों को ही मुख्य अतिथि के रुप में बुलाएं ताकि वे अपने ज्ञान से, आशीर्वचनों से आयोजकों को, समाज को लाभान्वित तो कर सकेंगे। सबसे पहली आवश्यकता तो यही है कि इन नेताओं का बेजा सामाजिक महत्व कम किया जाए। पहले तो उन्हें अतिथि के रुप में बुलाना फिर उनके जाने के बाद उनकी आलोचना करना निरा पाखंड है इसे शीघ्रताशीघ्र बंद किया जाना चाहिए। यदि हम यह नहीं कर सकते इसका अर्थ है कि कहीं ना कहीं हम भी इन नेताओं से किसी ना किसी तरह की स्वार्थ सिद्धि चाहते हैं। यदि यह सच है तो फिर हमें राजनेताओं की आलोचना करने का भी कोई अधिकार नहीं।

अंत में हमें यह कहना है कि हमारे कथन पर से यह न समझें कि हम राजनेता विरोधी हैं। हम तो यह कहना चाहते हैं कि हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं और राजनेता को चुनना हमारे ही हाथों में है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था चलाने के लिए राजनेता लगते ही हैं। उनका अपना महत्व है। उनका हम त्याग नहीं कर सकते। परंतु, हमें चाहिए कि हम केवल योग्य व्यक्तियों को ही चूनें, अच्छे चरित्रवान नेताओं को ही महत्व दें, अच्छे लोगों को राजनीति में जाने के लिए प्रोत्साहित करें। और उन्हें ही भर महत्व दें। तभी प्रजातंत्र सार्थक सिद्ध हो सकेगा। यदि हमने यह किया होता तो आज यह लेख लिखने की या उपर्युक्त कथन करने की आवश्यकता ही नहीं पडती।

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