Wednesday, 30 November 2011

दक्षिण सूडान - क्षितिज पर एक नए देश का उदय

दक्षिण सूडान - क्षितिज पर एक नए देश का उदय

9 जुलाई 2011 को एक नया इतिहास बना दक्षिण सूडान के रुप में विश्व का सबसे नया, अफ्रीका का 53वां देश और विश्व का 193वां राष्ट्र के रुप में सूडान का विभाजन हो तेल बहुल दक्षिण सूडान का क्षितिज पर उदय। इस उदय के साथ ही एक नया इतिहास भी बना अभी तक हमेशा मुस्लिमों द्वारा ही किसी देश से अलग होने का विभाजन का श्रेय प्राप्त किया गया है। परंतु, इस उदय द्वारा पहली बार किसी ईसाई क्षेत्र को मुस्लिम देश से अलग करके नया देश बनाया गया है।

दक्षिण सूडान को यह स्वतंत्रता वर्षों की हिंसा और 20 लाख से अधिक लोगों के मारे जाने के पश्चात प्राप्त हुई है। इसी साल जनवरी में दक्षिण सूडान को लेकर एक जनमत संग्रह कराया गया था। लगभग 99% लोगों ने एक स्वतंत्र देश के पक्ष में मतदान किया था। उत्तरी सूडान और दक्षिणी सूडान में वर्ष 2005 में एक समझौता हुआ था जिसमें जनमत संग्रह की बात को स्वीकारा गया था। यह समझौता तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कोलिन पावेल के प्रयासों से संभव हुआ था। भारत विश्व में पहला ऐसा देश है जिसने दक्षिण सूडान को राजनयिक मान्यता दी।

इस विभाजन की पटकथा उपनिवेशवादी शासकों द्वारा लिखी गई है। 19वीं शताब्दी में सूडान पर विजय के पश्चात ब्रिटेन ने सूडान को मिस्त्र में सम्मिलित कर दिया और यहीं से ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने सूडान को अपनी 'डिवाइड एन्ड रुल" बांटों और राज करो की प्रयोगशाला में बदल डाला। अंग्रेजों ने वंशीय भेदभाव के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था की इसके कारण भूरे योरोपीयन वंश के निकट समझने जानेवाले उत्तरी सूडानियों का सत्ता पर अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने 'बंद जिलों" की एक जटिल व्यवस्था के द्वारा उत्तर एवं दक्षिण भाग के मध्य परंपरागत और व्यापारिक संबंधों को बिल्कूल ही समाप्त कर डाला। उत्तरी सूडान में इस्लाम और अरबी के प्रचार और प्रयोग की छूट दी गई। तो, दक्षिण में दोनो को ही एकदम निषिद्ध कर उसे ईसाई मिशनरियों के हवाले कर दिया गया। ईसाई मिशनरियों की मानवतावादी शिक्षा ने दक्षिण के युवाओं में 'अफ्रीका अफ्रीकियों के लिए" का भाव भरकर देश में बंटवारे की नींव डाली।

इस उपर्युक्त व्यवस्था के पीछे उद्देश्य था कि वैद्यकीय सुविधाओं के अभाव में अफ्रीका में बडे पैमाने पर फैलनेवाले मलेरिया जैसे रोग इधर से उधर न फैलें। परंतु, असली उद्देश्य था ईसाई धर्म का प्रसार करना। उत्तरी सूडान अरब बहुल मुस्लिम है इसका कारण है आटोमन साम्राज्य तले इस्लाम धर्म का प्रसार हुआ उसमें उत्तर अफ्रीका भी था। उत्तर पूर्व की ओर सऊदी अरेबिया है ही। इधर दक्षिण अफ्रीका से ईसाईधर्म के प्रसार की शुरुआत हुई। 20वीं शताब्दी के मध्य तक उत्तरी सूडान पर इजिप्त का शासन था इस कारण सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से इजिप्त का स्पष्ट प्रभाव था तो, दक्षिण सूडान ईसाई और प्रकृतिपूजक था। सूडान में आज भी 3000 ई.पू. की बस्तियां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं।

1946 में ब्रिटेन ने दक्षिण सूडान के नागरिकों के मतों का विचार न करते प्रशासकीय दृष्टि से स्वयं द्वारा विभाजित भागों को पुनः जोड दिया। इस समय पहली बार दक्षिण सूडान के लोग विचलित हुए। 1956 में सूडान ब्रिटिश आधिपत्य से स्वतंत्र हुआ। मगर 1953 में ही इस गृहकलह की पृष्ठभूमि तैयार हो गई थी। ब्रिटिश-इजिप्त स्वतंत्रता प्रदान करनेवाला है की भनक 1953 में ही लग गई थी और आनेवाली सरकार में हमें योग्य स्थान प्राप्त नहीं होगा तथा उत्तरी सूडान द्वारा दबाया जाएगा की स्वाभाविक आशंका से दक्षिणी सूडान के लोग ग्रस्त हो गए और 1955 में ही धार्मिक एवं सांस्कृतिक तथा आर्थिक संघर्ष की शुरुआत हो गई। इस गृहयुद्ध का अंत 1972 में लगभग 5 लाख लोगों की बलि लेने के बाद ही थमा। अदीसअबाब में हुए एक समझौते में उत्तर और दक्षिण का विभाजन प्रशासनिक दृष्टि से किया गया।

1983 तक की शांति के बाद तेल की राजनीति और सूडान को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने के कारण दक्षिण सूडान के लोग चीड गए। प्राकृतिक संसाधनों पर उत्तरी सूडान के लोगों द्वारा अपना अधिकार जताने और देश पर इस्लाम का सिक्का जमाने के प्रयत्नों को दक्षिण सूडानियों द्वारा झिडकने के कारण 1983 में फिर से गृहयुद्ध शुरु हो गया। 1989 में जनरल उमर अल बशर ने इस्लामी उग्रवादियों के समर्थन से वहां के लोकतांत्रिक शासन का तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई। उसीने बाद में आतंकी ओसाम बिन लादेन को अपने यहां पनाह दी, जहां से उसने अपना आतंक का कारोबार जमाना प्रारंभ किया। सूडान अरबलीग का सदस्य है साथ ही लंबे समय से इस्लामी आतंक के दबदबेवाला देश है। 1991 में खाडी युद्ध में सूडान द्वारा सद्दाम हुसैन के समर्थन के कारण अमेरिका भी नाराज हो गया। अंत में 20 लाख लोगों की बलि चढ़ने के बाद  2005 में गृहयुद्ध थमा और अंततः 9 जुलाई 2011 को जनमत संग्रह के द्वारा दक्षिण सूडान अस्तित्व में आया।

परंतु, इन सब कारणों के साथ ही एक और महत्वपूर्ण एवं प्रभावी कारण है और वह है इस्लामी शिक्षा एवं आज्ञाओं से तैयार हुई विश्वव्यापी मुस्लिम मानसिकता जिसकी चर्चा कहीं सुनने में नहीं आई। इस्लामी शिक्षाएं एवं आज्ञाएं हदीस और कुरान पर आधारित हैं जिनका पालन करना सच्चे मुसलमानों के लिए बंधनकारी है। क्योंकि, पैगंबर ने कहा था - 'जो मेरी आज्ञा का पालन करता है वह अल्लाह की आज्ञा का पालन करता है और जो मेरी आज्ञा का पालन नहीं करता वह अल्लाह की आज्ञा का पालन नहीं करता।" (बुखारीः 2956,7281) और पैगंबर का कहना यह है कि 'एक भूमि पर दो धर्म रहना योग्य नहीं।" (अबू दाउद ः 3026, ींहश ुीरींह ेष रश्रश्ररह-ि.51)  इस कारण जहां मुस्लिम अल्पसंख्या में हैं वहां वे अलग देश की मांग करते हैं और जहां वे बहुसंख्य हैं वहां वे हर संभव प्रयत्न कर दूसरों को समाप्त कर देना चाहते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है पाकिस्तान और बांग्लादेश जहां दिन ब दिन अल्पसंख्य हिंदू घटता जा रहा है, पलायन कर भारत आता जा रहा है।

रुमबेक के प्रतिष्ठित बिशप वयोवृद्ध सीजर मज्जोलारी के अनुसार सूडान में इस्लामी उग्रवादी वहां ईसाइयों को धर्मांतरित कर उन्हें आग से दाग देते हैं ताकि उन्हें काफिरों से भिन्न पहचाना जा सके। कुछ लोग दारफूर का उदाहरण देकर जो कि वर्तमान में एक अंतरराष्ट्रीय मुहावरा सा ही बन गया है यह कह सकते हैं कि यह तो कुछ सिरफिरे कट्टरपंथियों का काम है जो स्वयं मुस्लिमों को जो उनके ही  सहधर्मी हैं, इस्लाम के अनुयायी हैं का भी तो उत्पीडन कर रहे हैं। परंतु, यह तर्क वे ही दे सकते हैं जो या तो इस्लाम से अनजान हैं या जानकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं। इस मुस्लिम उत्पीडन पर अरब विश्व भी मौन है क्योंकि, उत्पीडक अरब मुस्लिम हैं और उत्पीडित मुस्लिम होते हुए भी भिन्न जनजातीय समुदाय के हैं। वास्तव में इन सबके पीछे विशिष्ट अरब मुस्लिम की भावना कार्यरत है जिसमें अरबी श्रेष्ठता की ग्रंथी है जो अरब मुस्लिम को अन्य मुस्लिमों से श्रेष्ठ समझती है और यह भावना खिलाफत काल से ही चली आ रही है।

सभी मुसलमान समान अधिकार प्राप्त परस्पर भाई हैं का सिद्धांत इस्लाम द्वारा उद्‌घोषित है। धर्म के रिश्ते के मुकाबले सभी नाते-रिश्ते गौण हैं। रक्त, वंश, कुल, प्रांत, देश आदि के आधार पर दो मुस्लिमों में भेदभाव करना और उनमें परस्पर संघर्ष इस्लाम को मान्य नहीं। तथापि, मुस्लिमों की दृष्टि में आदर्श कही जानेवाली खिलाफत (जिसकी स्थापना के लिए ही अंतरराष्ट्रीय जिहाद आतंकवादियों ने छेड रखा है) के उत्तरार्ध में ही यह सिद्धांत पीछे रहकर वे सभी भेद तीव्रता से उभरकर सामने आ गए। अरब मुस्लिम विरुद्ध गैर-अरब मुस्लिम, दक्षिण अरब मुस्लिम विरुद्ध उत्तर अरब मुस्लिम, मक्का के मुस्लिम विरुद्ध मदीना के मुस्लिम, मुहाजिर विरुद्ध अनसार, कुरैश मुस्लिम विरुद्ध गैर-कुरैश मुस्लिम, पहले बने मुस्लिम विरुद्ध बाद में बने मुस्लिम, निर्धन मुस्लिम विरुद्ध संपन्न मुस्लिम इस प्रकार के इस प्रकार के विविध भेद निर्मित होकर उनमें संघर्ष प्रारंभ हो गया। तीसरे खलीफा उस्मान और चौथे एवं अंतिम आदर्श खलीफा अली (पैगंबर के चचेरे भाई व दामाद तथा दत्तक पुत्र भी) का दुखद अंत भी इसीमें से हुआ।

वैसे देखा जाए तो उपर्युक्त कारण कोई उनके काल में ही निर्मित नहीं हुए थे। पूर्व के खलीफाओं के काल में भी ये भेद अस्तित्व में थे। परंतु, उस काल में बलाढ्‌य साम्राज्यों को जीतने के विजयी अभियानों की लहरों पर वे सवार होने के कारण इन भेदों के आविष्कारों को स्थान नहीं मिला था। उन्हें लढ़ने के लिए समान शत्रु मिल जाने के कारण ये सारे भेद सुप्तावस्था में थे। समान शत्रु तय करने में उनके लिए धर्म उपयोगी ठहरता था। खिलाफत के उत्तरार्ध में इस प्रकार के विजयी अभियान ठंडे पड गए और समान कार्यक्रम के अभाव में उनके सुप्तावस्था में पडे भेद प्रकट हो गए और इसी कारण वे परस्पर संघर्ष करने लगे।*1 अपन अरब हैं, कुरैश हैं, हाशिमी या उमय्यी कुलीन हैं की भावना पैगंबर के वरिष्ठ सहयोगी एवं स्वयं खलीफा भी छोडने के लिए तैयार नहीं थे।

इनमे से उस काल में सबसे गंभीर सिद्ध हुआ विवाद अरब मुस्लिम विरुद्ध गैर-अरब मुस्लिम था। विस्तृत होते साम्राज्य के साथ अरबस्थान के बाहर गैर-अरब मुस्लिमों की संख्या बडी मात्रा मे बढ़ी थी।*2 अरब स्वयं को अन्य मुस्लिमों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझते थे। गैर-अरब मुस्लिमों को वे मवाली (आश्रित) मानते थे। राज्याधिकार के सभी बडे पद अरब मुस्लिमों के पास ही थे। वे स्वयं एक राज्यकर्ता वर्ग बन गए थे। अरबों की स्वाभाविक लडाकू वृत्ति और विशिष्टता टिकाए रखने के लिए उमर ने विशेष नियम तैयार किए थे। उनके द्वारा विजित देशों में जमीनें खरीदने पर पाबंदी थी। उनके लिए विशेष सैनिकी नगर बसाए गए थे। वे गैर-अरब मुस्लिमों  में मिश्रित न हों इसका विशेष ध्यान रखा गया था। मवाली मुस्लिमों को अरब मुस्लिमों के समान अधिकार नहीं मिलते थे। मुस्लिम होकर भी उनके साथ दूसरे दर्जे का व्यवहार किया जाता था।

जब गैर-अरब मुस्लिमों की संख्या बढ़ी तब उन्होंने अपने को मिलनेवाले कनिष्ठ दर्जे के विरुद्ध आवाज उठाई और इस्लामानुसार समान अधिकारों की मांग की। उसी में से संघर्ष निर्मित हुआ। तीसरे खलीफा उस्मान के काल में उनकी सहानुभूति  खलीफा विरोधी विद्रोहियों के साथ थी। उनकी संतुष्टि के लिए ही चौथे व अंतिम आदर्श खलीफा अली को साम्राज्य की राजधानी मदीना के बजाए कुफा ले जाना पडी थी। आदर्श खिलाफत की शोकांतिका में यह भी एक महत्वपूर्ण कारण था। मुस्लिमों के एक वर्ग में युद्धलूट की प्रचंड संपत्ति आ जाने के कारण उनमें आर्थिक विषमता निर्मित हो गई। मुस्लिम समाज में अमीर और गरीब इस प्रकार के दो वर्ग निर्मित हो गए थे।

*1. इस प्रकार के संघर्षों को टालने के लिए ही पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद बने पहले आदर्श खलीफा अबूबकर ने अरबस्थान के बाहर सेना भेजी थी। इससे अरब टोलियों में परस्पर संघर्ष रुक गया। तीसरे खलीफा उस्मान के काल में मुस्लिमों में खलीफा विरोधी जो असंतोष फैला था उस पर उपाय के रुप में उसके लिए खलीफा द्वारा बुलाई गई सूबेदारों की परिषद में एक ने इस प्रकार की सूचना की थी कि विद्रोहियों का ध्यान दूसरी ओर बंटाने के लिए उन्हें विदेश में जिहाद के लिए भेज दिया जाए। समान शत्रु नहीं होगा तो वे परस्पर संघर्ष करेंगे इस पर यह उपाय बतलाया गया था।

*2. अपना प्रभुत्व टिकाए रखने के लिए अरबों को अपनी संख्या बढ़ाने की आवश्यकता महसूस होने लगी। एक मुस्लिम को एक समय में चार से अधिक पत्नियां न होने की कानूनसम्मत मर्यादा होने पर भी वे उनके अलावा कितनी भी रखैलें रख सकते थे। इसका उपयोग कर अरबों ने अपनी संख्या बढ़ाने की शुरुआत की। इस संबंध में के.डी.भार्गव लिखते हैं ः ''सीरिया, इराक, पर्शिया और इजिप्त इन विजित प्रदेशों में अरबों की संख्या अत्यंत कम थी ... (वह संख्या बढ़ाने के लिए) उन्होंने इन विजित क्षेत्रों की कैदी स्त्रियों को (संख्या में कितनी भी हों) रखैलों के रुप में रखने की शुरुआत की ... (इस संबंध का नियम उनके लिए वरदान ठहरा)  इस मार्ग से उनकी संख्या में बढ़ौत्री न होती तो, उन देशों में मुस्लिम साम्राज्य अस्त ही हो गया होता। (इतिहासकार) जुर्जी जैदन ने कहा है कि, अधिकाधिक गुलाम (कैदी) लडकियों को प्राप्त करने के लिए अरबों में स्पर्धा चलती थी।""

कुरैश मुस्लिमों को जितना गर्व अपन कुरैश हैं पर था उतना ही गर्व उन्हें अपन अरब हैं इस पर भी था।*3 पैगंबर को अरबभूमि इस्लाम के आधार के रुप में संभालकर रखनी थी। दूसरे खलीफा उमर का कहना था कि 'अरब इस्लाम का कच्चा माल हैं"। इस्लाम का प्रसार करने के लिए अल्लाह ने अरबों को विशेष रुप से चुना है इस पर अरब मुस्लिमों का दृढ़ विश्वास था। अरबभूमि के बाहर आक्रमक अभियान चलाते समय इराक और सीरिया की अरबवंशीय जनता को अरब संबंधों का हवाला देकर राजसत्ता के विरुद्ध अपने को सहायता करने का आवाहन मुस्लिम सेनापति करते थे और उसे कुछ मात्रा में प्रतिसाद भी मिला था। इस्लाम ने सभी अरबों को एक किया था; उनका एक राष्ट्र निर्मित किया था; आरंभ के काल में अरब और मुस्लिम मानो समानार्थी शब्द हो गए थे। इतिहासकार के.डी. भार्गव का उमर के काल के विषय में कहना है - 

''इस्लाम ने अरबों को एकजुट किया। उस काल में इस्लाम की एकजुटता और अरबों की एकजुटता पर्यायवाची संज्ञाएं थी। अनगिनत टोलियों और कुलों में विभाजित अरबों को एकजुट किया गया था और वंश के स्थान पर धर्म का गर्व प्रस्थापित किया गया था। अरब और इस्लाम इनका भविष्य एकरुप हो गया था। परंतु, तीसरे खलीफा उस्मान के काल में यह स्थिति नहीं रही। अरबभूमि के अरबों में ही दक्षिण के और उत्तर के अरब ऐसे दो गुट निर्मित हो गए थे।

*3. पैगंबर ने कहा था- (अ). 'सभी लोग कुरैशों के आज्ञाकारक हैं; उनमें के (यानी सभी लोगों में के) मुस्लिम उनमें के (यानी कुरैशों में के) मुस्लिमों के आज्ञाकारक हैं; (सभी) लोगों में के श्रद्धाहीन (इस्लाम पर श्रद्धा न रखनेवाले) कुरैशों में के श्रद्धाहीनों के आज्ञाधारक हैं।"(मुस्लिमः4473,74) (इसका अर्थ वंश के रुप में कुरैश मानवों के सभी वंशों में श्रेष्ठ हैं तो, धर्म के रुप में मुस्लिम सभी धर्मियों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं तो, वंश और धर्म में (इस्लाम) धर्म सर्वश्रेष्ठ है)

(ब). पैगंबर ने कहा था- (सभी) लोग कुरैशों का अनुसरण करनेवाले हैं, फिर वे अच्छे हों कि बुरे हों। (यानी इस्लाम की बातों में हो कि इस्लाम पूर्व की बातों में हों) (कोष्ठक मूल के ही)(मुस्लिमः4475)

(स). पैगंबर ने कहा था- 'खिलाफत (राज्यसत्ता) हमेशा ही कुरैशों के अधिकार में रहेगी भले ही उनके दो मनुष्य भी (पृथ्वी पर) जीवित रहें तो भी (वह रहेगी)।" (मुस्लिमः4476,बुखारीः7140)

पैगंबर की मृत्यु के बाद खिलाफत के संबंध में मक्का (मुहाजिर, शरणार्थी) और मदीना (अनसार, सहायक) के लोगों में उभरे मतभेद पर पहले खलीफा अबू बकर ने उपर्युक्त हदीस का संदर्भ देकर कहा था 'हम अमीर (राजा) हैं और तुम वजीर (प्रधान) रहनेवाले हो। अतः खलीफा पद हमारे पास और प्रधान पद तुम्हारे पास रहने दो। हम आश्वासन देते हैं कि तुम्हारी सलाह के सिवाय  (राज्य करते समय) हम कोई सा भी निर्णय नहीं लेंगे।" मदीनावासियों द्वारा ऐतराज उठाने पर अबू बकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था 'नहीं। हम अमीर रहेंगे और तुम वजीर। सभी अरबों में वंश में हम श्रेष्ठ हैं।" उमर ने भी कहा था 'हम पैगंबर के कुल (यानी कुरैश) से हैं और इसलिए हमारी अपेक्षा खलीफा पद के लिए अधिक हकदार और कौन हो सकता है।" 
 
इन उपर्युक्त के संबंध में दो मान्यवर एवं प्रसिद्ध धार्मिक विद्वानों के मत उल्लेखनीय हैं। इब्ने खल्दून ने कहा है - ''कुरैश मूलतः उत्कृष्ट और श्रेष्ठ दर्जे के अरब नेता थे .... सभी अरबों ने यह वस्तुस्थिति मान्य की थी और उनके श्रेष्ठत्व के सामने अपनी गर्दन झुकाई थी। अगर अन्य किसी के पास यह राजनेतृत्व जाता तो वह राज्य कभी का नष्ट हो जाता .... उनका कोई विरोध करेगा इसका उन्हें भय नहीं था, समाज विघटन का भय नहीं था .... इस प्रकार का उत्तरदायित्व वे ही ले सकते थे। इसीलिए खलीफा कुरैश वंश का रहने की शर्त डाली गई थी।"" शाह वलीउल्लाह ने भी इसी प्रकार का समर्थन करते हुए कहा है- ''कुरैश टोली अन्य किसी भी टोली की अपेक्षा (इस्लाम के) दैवी संदेश के निकट की थी और इस इस्लाम धर्म सेवा और रक्षा करनेवाले पहले वे ही थे।"" 

दक्षिण और उत्तर-मध्य अरबभूमि के अरबों में वांशिक, आर्थिक, सामाजिक और कुल मिलाकर सांस्कृतिक दृष्टि से अंतर था। उत्तर के अरब टोली जीवन जीनेवाले और व्यापार-व्यवसाय करनेवाले तो, दक्षिण के खेतीबाडी करनेवाले और स्थायी जीवन जीनेवाले थे। परिणाम स्वरुप दक्षिण के अरब उत्तर की अपेक्षा अधिक प्रगत थे।

जीविकानुसार उनकी स्वभाव प्रवृतियों में भी भिन्नता और कुछ मात्रा में परस्पर विरोध भी आ गया था। वे एक दूसरे का द्वेष भी करते थे। मदीना भौगोलिक दृष्टि से उत्तर अरबभूमि में होने पर भी वहां के लोग मूलतः दक्षिण अरबभूमि से आए हुए होेने के कारण  उनकी स्वभाव प्रवृत्ति दक्षिण जैसी ही थी तो, मक्का के अरब उत्तरभूमि का टोलीस्वरुप जीवन जीनेवाले थे। भिन्न वंश के मक्का और मदीना के लोगों में परंपरागत बैरभाव और स्पर्धा चली आ रही थी। उस्मान के काल में मदीना के अनासर और मक्का के मुहाजिरों में निर्मित हुई स्पर्धा और विरोध एक प्रकार से इस परंपरागत विरोध का पुनरुज्जीवन था। उस्मान की खिलाफत की शोकांतिका का एक कारण यह भी था।

ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि दक्षिण क्षेत्र के अरब वंश परंपरागत स्थिर राजपरिवारों की राजवंश परंपरा को माननेवाले थे; हजारों वर्षों से वहां यह परंपरा रुढ़ हो गई थी। इसके विपरीत उत्तर क्षेत्र के अरब टोली-प्रजातंत्र को माननेवाले थे। टोली का नेता वे जिस पद्धति से वे चुनते थे उस पद्धति से ही वे राजप्रमुख चुनते थे। इस कारण इस विषय में वंशपरंपरा उन्हें मान्य नहीं थी। अबू बकर, उमर, उस्मान का चुनाव इसी पद्धति से हुआ था भर यह पद्धति दक्षिण की परंपरा माननेवाले मदीना के अनसारों को मान्य नहीं थी। पैगंबर का उत्तराधिकारवाले उनके ही परिवार के अली खलीफा के रुप में मान्य होने योग्य थे। स्वाभाविक रुप से उनका अली के पक्ष को समर्थन था। उनके द्वारा उस्मान का पक्ष लेकर उनकी रक्षा करने में अग्रणी ने होने का यह एक कारण था।

उपर्युक्त सभी कारण अरब मुस्लिमों के अंतर्गत विविध गुटों के कलह, परस्पर विरोधी अस्मिता और स्पर्धा से निर्मित हुए थे। ऐसा होने पर भी अरब स्वयं को अन्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ और जो अरब नहीं उन्हें कनिष्ठ मानते थे। अरबभूमि में सभी अरब होने के कारण वहां यह प्रश्न निर्मित नहीं हुआ। परंतु, बाहर के मुस्लिम साम्राज्य में यह प्रश्न उपस्थित हुआ था और उस्मान के काल में तीव्र हो गया था। सभी मुसलमान समान और परस्पर बंधु हैं का इस्लामी सिद्धांत पवित्र ग्रंथ में ही रह गया था और व्यवहार में अरब मुस्लिम गैर-अरब मुस्लिमों को अपने समान नहीं समझते थे।

पूर्ण पर्शिया (ईरान) और रोमन साम्राज्य का बहुत बडा क्षेत्र मुस्लिम साम्राज्यांतर्गत आने पर जिस गैर-अरब प्रजा ने इस्लाम का स्वीकार किया उन्हें अरब मुस्लिमों के बराबर का स्थान मिलता नहीं था। अरबभूमि से स्थानांतरण कर आए अरब उन्हें दूसरे दर्जे का समझते, उन्हें अपने से कम अधिकार देते थे। अरब मुस्लिम विशेषाधिकारवाले वर्ग के रुप में निर्मित हो गया था। इस कारण वहां  अरब मुस्लिम विरुद्ध गैर-अरब मुस्लिम ऐसा विवाद और संघर्ष निर्मित हो गया। इन गैर-अरब मुस्लिमों को 'मवाली" कहा जाता था।*4 मुस्लिम होने के लिए उन्हें किसी ना किसी अरब का आश्रित बनना पडता था। इसके सिवाय कोई भी मुस्लिम हो नहीं सकता था। इन गैर-अरब मुस्लिमों की सहानुभूति खलीफा विरोधी विद्रोहियों के साथ थी। उनमें से कुछ खुले रुप में विद्रोहियों की सहायता करते थे। इस्लामी समता के सिद्धांतानुसार अपने साथ भी समानता का व्यवहार किया जाए की उनकी मांग थी।*5
*4. इस संबंध में कुछ इतिहासकारों के अभिप्राय इस प्रकार से हैं - सर विल्यम मूरः ''अरबभूमि से विजय प्राप्त करते हुए निकले अरब अमीर-उमराव बन गए। अपनी संस्कृति उच्च दर्जे की होने के बावजूद जब उन पराजित देशों के लोगों ने इस्लाम का स्वीकार किया तब उन्हें कनिष्ठ वर्ग मिला। अरब ही प्रभावशाली और वर्चस्ववाली जाति बन गई..... विजित प्रांतो के नव मुस्लिम उनके आश्रित (मवाली)(लश्रळशपींी, वशशिपवशपींी) बन गए।"" वैसेही ''(उमर के काल में) अरब विजित प्रदेशों की संपन्नता पर जीनवाले बन गए तो, पराजित लोग उनकी सेवा करते थे।" 'अरब रक्त के मुस्लिमों की ही केवल विशेषाधिकार मिलते थे। सिद्धांततः सभी मुस्लिमों के अधिकार वंशनिरपेक्षता से समान थे .... परंतु, यथार्थ में यह समानता अरबों तक ही सीमित थी अन्य वंश के मुस्लिमों को समान अधिकार केवल उपजीविका तक के सीमित शासकीय अनुदान मिलने तक के ही मर्यादित थे.... अरब मुस्लिम जिस-जिस स्थान पर गए वहां एक स्वतंत्र और वर्चस्वशाली वर्ग बनकर रहे। राज्यकर्ता और सूबेदार वे ही बने। मुस्लिम बनी (गैर-अरब) जनता एक कनिष्ठ वर्ग बन गया। किसी ना किसी अरब टोली का आश्रित बनकर उनका पालकत्व और संरक्षण मिलने से अधिक उन्हें कुछ नहीं मिलता था। इस प्रकार से अरब इस्लाम प्रसार के पवित्र कार्य के एक स्वतंत्र लडाकू राष्ट्र बन गए।""

जोएल कारमाएकेलः ''अरबभूमि के बाहर पडते ही अरब इस्लाम को शुद्ध अरब संस्था मानने लगे थे। गैर-अरबों को मुस्लिम बनाना एक विचित्र बात थी इसलिए उन्हें मुस्लिम बनाने की कोई पद्धति अस्तित्व में नहीं आई थी... इस्लाम स्वीकारने के पहले उन्हें अरब होना पडता था और इसके लिए पहले उन्हें किसी ना किसी अरबटोली से संलग्न होना पडता था ... (उसे आश्रित (मवाली) कहते) .... इस प्रकार से वह मुस्लिम समाज का सदस्य बनकर सिद्धांततः उनके ही समान होने पर भी उसके संबंध में (मूल) अरब मुस्लिमों के श्रेष्ठत्व का अन्याय भर कम नहीं होता था। अरब मुस्लिम अन्य मुस्लिमों को तिरस्कारपूर्वक कनिष्ठ समझते थे।"" ''इस्लाम अरबों का अन्यों पर प्रभुत्व प्रस्थापित करनेवाली एक संस्था बन गई थी।""

फॉन क्रेमरः ''उमर ने सूत्र प्रस्थापित किया था कि 'अरब गुलाम हो नहीं सकता" उसकी यह घोषणा उसके द्वारा उद्‌घोषित राजनैतिक सिद्धांतों से सुसंगत थी। उमर का यह मत कि अरब मूलतः ही स्वतंत्र है केवल अन्य लोग ही गुलाम हो सकते हैं और किए जाना चाहिए। उसकी दृष्टि में अरब विश्व पर राज्य करने के लिए चुने हुए लोग थे।""

के.डी. भार्गवः ''इस्लाम में के अपने विशिष्ट दर्जे के विषय में अरब अत्यंत जागरुक थे .... उनके इस अभिमान और अन्याय के कारण अन्य प्रदेशों के मुस्लिमों में उनके प्रति द्वेष निर्मित हो गया। उनके साथ अरब मुस्लिम अत्यंत तिरस्कारपूर्वक व्यवहार करते थे ... मवाली (आश्रित) के पीछे खडे रहकर नमाज पढ़ना उन्हें पसंद नहीं था। अगर कभी ऐसा हुआ तो, उसे वे स्वयं का अपमान समझते थे .... कोई सा भी मवाली शोभायात्रा में अरब मुस्लिमों से आगे या जोडी से चल नहीं सकता था। अरब मुस्लिम स्वयं को पृथ्वी पर के सभी लोगों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानते थे। राज्य करना मुस्लिमों का विशेषाधिकार तो उनकी आज्ञा का पालन करना अन्य सभी का कर्तव्य है, ऐसा माना जाता था ... नव-मुस्लिमों के लिए अरबों ने समानता नकारी थी।""

जे. वेलहॉसनः ''मुस्लिम साम्राज्य में दो वर्ग थे ... अरब मुस्लिम योद्धा और विजेता के रुप में स्वामी थे। मुहम्मद का समाज (उम्मा) अब सैन्य वर्ग में रुपांतरित हो गया था ... सेना के लोगों को ही नागरिकत्व के संपूर्ण अधिकार मिलते थे।"" ''जीते हुए प्रदेशों में भी अरबों ने अपनी प्राचीन कुलव्यवस्था कायम रखी थी।"" ''गैर-अरब लोगों ने बडी मात्रा में इस्लाम का स्वीकार किया था। विशेष रुप से इसमें कुफा और बसरा की प्रचंड संख्या के युद्ध कैदियों का समावेश था। इस्लाम स्वीकारने के कारण उनकी युद्ध कैद से मुक्तता हो गई। परंतु, उन्हें अन्य अरब मुस्लिमों के समान नागरी, सैनिकी अधिकार या अन्य लाभ नहीं दिए गए। वे किसी ना किसी अरब परिवार के आश्रित सदस्य बन गए। उन्हें मवाली कहते थे .... इस्लामी धर्मसत्ताक राज्य यानी विजित लोगों पर अरबों की साम्राज्यशाही था .... अरब-मुस्लिम गैर-अरब मुस्लिम जनता पर राज्य करते थे।""

फीलिप हिट्टीः ''उमर की नीति का दूसरा प्रमुख सिद्धांत सभी अरबों का, जो अब सभी मुस्लिम हो गए हैं, धार्मिक-सैनिकी संघराज्य स्थापित करना था। उसमें अरब विशुद्ध और अलग रहनेवाले थे। वह एक प्रकार की सैनिकी अधिकारशाही (ाळश्रश्रळींरीू रीळीींीेलीरलू) रहनेवाली थी और उसमें सभी गैर-अरबों को नागरिकत्व के अधिकार नकारे जानेवाले थे।""    

*5. इस विषय में कुछ इतिहासकारों के अभिप्राय - अ). डॉमिनीक सॉर्डेल ः''(कुछ समय में ही) नव-मुस्लिमों की संख्या कई गुना बढ़ गई और उन्होंने अधिकारों और (अन्य) लाभों में (अन्य मुस्लिमों के समान ही) समान हिस्से की मांग की।"" ''मुस्लिम साम्राज्य के लोगों के स्पष्ट रुप से तीन वर्ग बन गए थे विजेता अरब मुस्लिम, गैर-अरब नव-मुस्लिम और गैर-अरब गैर-मुस्लिम ... इन गुटों के उत्तरदायित्व और अधिकार समान नहीं थे।"" ब). के.डी. भार्गव ः'पर्शिया और इराक के गैर-अरब मुस्लिम अरबों के वर्चस्व और अलगत्व के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने अरबों के श्रेष्ठत्व के दावे को नकारा था और सभी क्षेत्रों में समान अधिकारों की  मांग की थी।"

जैसाकि पूर्व में ही कहा जा चूका है उत्तरी सूडान इजिप्त प्रभाववाला अरब बहुल मुस्लिम है और इजिप्त को अरब बहुल स्थानीय लडकियों-स्त्रियों से विवाह कर उनसे संतति पैदा कर बनाया गया है। इसलिए उनमें अरबी श्रेष्ठता की ग्रंथी का आना स्वाभाविक ही है। इसके अतिरिक्त प्रभाव के अन्य कारणों में उनके द्वारा स्वयं को पैगंबर का वंशज, निकटस्थ संबंधी समझना भी है। क्योंकि, मुस्लिम स्वयं को जिस पैगंबर इस्माईल (पैगंबर इब्राहीम के पुत्र) का वंशज मानते हैं उनकी मां इजिप्त की ही थी। इस दृष्टि से मुस्लिमों के लिए इजिप्त ननिहाल है साथ ही इजिप्त मुस्लिमों को मान्य अनेक पूर्व पैगंबरों की भी भूमि है। जिनमें मोजेस (मूसा), जोसेफ, इब्राहीम आदि का इतिहास इसी भूमि से जुडा हुआ है। इजिप्त का अन्यायी राजा फिरौन मोजेस के काल में ही हुआ था और मोजेस को उससे संघर्ष करना पडा था। अंत में अल्लाह ने फिरौन और उसकी सेना को इसी भूमि में नष्ट कर डाला था। इजिप्त और वहां के पैगंबरों और स्थानों के संबंध में कई आयतें कुरान में आई हुई हैं। फिरौन को नष्ट करने के बाद श्रद्धावानों (इस्लाम पर श्रद्धा रखनेवाले यानी मुस्लिम) को उद्देशित कर अल्लाह ने कहा है ः (44ः25-28) इस प्रकार से यह भूमि पॅलेस्टाइन के समान ही मुस्लिम साम्राज्यांतर्गत कर लेना मुस्लिमों का धार्मिक कर्तव्य था और इसीलिए उमर के काल में इसको जीता गया था। आर्थिक एवं संरक्षणात्मक कारण अपने स्थान पर थे ही।  
इसके पूर्व के इतिहास के अनुसार- पैगंबर को जब ऐसा विश्वास हो गया कि अपनी मातृभूमि अरबस्थान में अपने पांव जम गए हैं और अब अंतिम विजय निश्चित है तो उन्होंने अपना ध्यान अरबस्थान के बाहर केंद्रित करते हुए पडौस के पर्शिया, रोम, इजिप्त, ऍबीसीनिया आदि देशों के प्रमुखों को इस्लाम स्वीकारने का आवाहन करने की शुरुआत की। उनके द्वारा विभिन्न सम्राटों को निमंत्रण-पत्र भेजे गए। पैगंबर द्वारा मिस्त्र और स्कंदरिया के सम्राट मकोकिस के नाम सन 627ई. में निमंत्रण पत्र भेजा गया था। इस पत्र की मूल प्रति 1850ई. में फ्रांस के प्रसिद्ध प्राच्यविद्‌ बारतिल्मी को ईसाई खानकाह (मठ) में मिली। आजकल यह पत्र इस्तंबूल (तुर्की) के 'तोब काबी सराई" के म्यूजियम में सुरक्षित है। इस पत्र का अनुवाद यह है-

''अल्लाह कृपाशील, दयावान के नाम से। अल्लाह के बंदे और उसके रसूल मुहम्मद की ओर से किब्त के सम्राट मकोकिस की तरफ। सलाम उस पर जिसने मार्गदर्शन का अनुसरण किया। तत्पश्चात मैं तुम्हें इस्लाम के आमंत्रण की ओर आमंत्रित करता हूं। इस्लाम स्वीकार कर लो सलामती पाओगे। इस्लाम स्वीकार करो अल्लाह तुम्हे दोहरा बदला देगा। फिर यदि तुमने मुंह फेरा तो सारे किब्त (जाति) का गुनाह तुम पर होगा। 'हे किताब वालों! आओ एक सीधी बात की ओर जो हमारे और तुम्हारे बीच की है, यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करें और किसी के साथ साझी न ठहराएं और न हममें कोई परस्पर एक-दूसरे को अल्लाह को छोडकर 'रब" (प्रभु) बनाएं-फिर यदि वे मुंह मोडें तो कह दो ः गवाह रहो हम मुस्लिम हैं।""

सम्राट मकोकिस ईसाई था उसने धर्मांतरण से इंकार कर दिया। परंतु, आए हुए दूत का आदरातिथ्य किया और सौजन्यता का व्यवहार किया। सम्राट ने पैगंबर के लिए भरपूर भेंट देकर दूत को रवाना किया। उस भेंट में दो युवतियां, एक घोडा, खच्चर, गधा, पोशाक... इनका समावेश था। पैगंबर ने भेंट स्वीकारते हुए उनमें से एक युवती मेरी को अपनी पत्नी होने का बहुमान प्रदान किया। उससे उन्हें एक लडका भी हुआ। उसका नाम 'इब्राहीम" रखा गया। परंतु, वह पंद्रह महीने की अवस्था में ही चल बसा।

एक और कारण मिस्त्र पर फातेमी वंश (909-1160ई.) का शासन होना। जो स्वयं को पैगंबर के दामाद और चचेरे भाई अली और उनकी पत्नी फातेमा की संतान बतलाते थे। इन्हीं के सेनापति जौहर ने काहिरा नामका नया नगर बसाया जो 973ई. से फातेमियों की राजधानी बना। 972ई. में उसीने विश्व प्रसिद्ध इस्लामी केंद्र अल-अजहर मस्जिद का निर्माण कराया। इनके बाद हुए ममलूक वंश ने अपने राज्य को धार्मिक लोगों की दृष्टि में अधिक पवित्र बनाने के लिए अब्बासी खलीफा अल जाहिर के पुत्र को दमिश्क से बुलाकर अल मुस्तनसिर के नाम से खलीफा बना दिया। खलीफा मुख्य रुप से प्रबंध किया करते थे और ममलूक सुल्तानों की इच्छानुसार बनाए बिगाडे जाते थे। ये अब्बासी पैगंबर मुहम्मद के चाचा अब्बास इब्ने अब्दुल मुतल्लिब इब्ने हाशिम की संतान थे। इस इजिप्त को दूसरे खलीफा उमर के सेनापति अमर बि. अल आस ने जीता था। मुस्लिमों की आदर्श खिलाफत के चौथे खलीफा अली का मुविया के साथ चली खिलाफत की लडाई में इजिप्त समर्थक प्रांत था।

इस प्रकार के इतिहासवाले अरब बहुल उत्तरी सूडान के साथ ईसाई बहुल दक्षिणी सूडान का निभाव बडा ही मुश्किल था और इसलिए इस प्रकार का विभाजन अपरिहार्य ही था जो आज नहीं तो कल होना ही था। और यह अरबी श्रेष्ठता की ग्रंथी ही वह कारण है जिसके कारण दारफूर में लाखों जनजातिय मुस्लिमों के कत्लेआम के बाद भी खून-खराबा है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा।


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