Wednesday, 30 November 2011

दक्षिण सूडान - क्षितिज पर एक नए देश का उदय

दक्षिण सूडान - क्षितिज पर एक नए देश का उदय

9 जुलाई 2011 को एक नया इतिहास बना दक्षिण सूडान के रुप में विश्व का सबसे नया, अफ्रीका का 53वां देश और विश्व का 193वां राष्ट्र के रुप में सूडान का विभाजन हो तेल बहुल दक्षिण सूडान का क्षितिज पर उदय। इस उदय के साथ ही एक नया इतिहास भी बना अभी तक हमेशा मुस्लिमों द्वारा ही किसी देश से अलग होने का विभाजन का श्रेय प्राप्त किया गया है। परंतु, इस उदय द्वारा पहली बार किसी ईसाई क्षेत्र को मुस्लिम देश से अलग करके नया देश बनाया गया है।

दक्षिण सूडान को यह स्वतंत्रता वर्षों की हिंसा और 20 लाख से अधिक लोगों के मारे जाने के पश्चात प्राप्त हुई है। इसी साल जनवरी में दक्षिण सूडान को लेकर एक जनमत संग्रह कराया गया था। लगभग 99% लोगों ने एक स्वतंत्र देश के पक्ष में मतदान किया था। उत्तरी सूडान और दक्षिणी सूडान में वर्ष 2005 में एक समझौता हुआ था जिसमें जनमत संग्रह की बात को स्वीकारा गया था। यह समझौता तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कोलिन पावेल के प्रयासों से संभव हुआ था। भारत विश्व में पहला ऐसा देश है जिसने दक्षिण सूडान को राजनयिक मान्यता दी।

इस विभाजन की पटकथा उपनिवेशवादी शासकों द्वारा लिखी गई है। 19वीं शताब्दी में सूडान पर विजय के पश्चात ब्रिटेन ने सूडान को मिस्त्र में सम्मिलित कर दिया और यहीं से ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने सूडान को अपनी 'डिवाइड एन्ड रुल" बांटों और राज करो की प्रयोगशाला में बदल डाला। अंग्रेजों ने वंशीय भेदभाव के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था की इसके कारण भूरे योरोपीयन वंश के निकट समझने जानेवाले उत्तरी सूडानियों का सत्ता पर अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने 'बंद जिलों" की एक जटिल व्यवस्था के द्वारा उत्तर एवं दक्षिण भाग के मध्य परंपरागत और व्यापारिक संबंधों को बिल्कूल ही समाप्त कर डाला। उत्तरी सूडान में इस्लाम और अरबी के प्रचार और प्रयोग की छूट दी गई। तो, दक्षिण में दोनो को ही एकदम निषिद्ध कर उसे ईसाई मिशनरियों के हवाले कर दिया गया। ईसाई मिशनरियों की मानवतावादी शिक्षा ने दक्षिण के युवाओं में 'अफ्रीका अफ्रीकियों के लिए" का भाव भरकर देश में बंटवारे की नींव डाली।

इस उपर्युक्त व्यवस्था के पीछे उद्देश्य था कि वैद्यकीय सुविधाओं के अभाव में अफ्रीका में बडे पैमाने पर फैलनेवाले मलेरिया जैसे रोग इधर से उधर न फैलें। परंतु, असली उद्देश्य था ईसाई धर्म का प्रसार करना। उत्तरी सूडान अरब बहुल मुस्लिम है इसका कारण है आटोमन साम्राज्य तले इस्लाम धर्म का प्रसार हुआ उसमें उत्तर अफ्रीका भी था। उत्तर पूर्व की ओर सऊदी अरेबिया है ही। इधर दक्षिण अफ्रीका से ईसाईधर्म के प्रसार की शुरुआत हुई। 20वीं शताब्दी के मध्य तक उत्तरी सूडान पर इजिप्त का शासन था इस कारण सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से इजिप्त का स्पष्ट प्रभाव था तो, दक्षिण सूडान ईसाई और प्रकृतिपूजक था। सूडान में आज भी 3000 ई.पू. की बस्तियां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं।

1946 में ब्रिटेन ने दक्षिण सूडान के नागरिकों के मतों का विचार न करते प्रशासकीय दृष्टि से स्वयं द्वारा विभाजित भागों को पुनः जोड दिया। इस समय पहली बार दक्षिण सूडान के लोग विचलित हुए। 1956 में सूडान ब्रिटिश आधिपत्य से स्वतंत्र हुआ। मगर 1953 में ही इस गृहकलह की पृष्ठभूमि तैयार हो गई थी। ब्रिटिश-इजिप्त स्वतंत्रता प्रदान करनेवाला है की भनक 1953 में ही लग गई थी और आनेवाली सरकार में हमें योग्य स्थान प्राप्त नहीं होगा तथा उत्तरी सूडान द्वारा दबाया जाएगा की स्वाभाविक आशंका से दक्षिणी सूडान के लोग ग्रस्त हो गए और 1955 में ही धार्मिक एवं सांस्कृतिक तथा आर्थिक संघर्ष की शुरुआत हो गई। इस गृहयुद्ध का अंत 1972 में लगभग 5 लाख लोगों की बलि लेने के बाद ही थमा। अदीसअबाब में हुए एक समझौते में उत्तर और दक्षिण का विभाजन प्रशासनिक दृष्टि से किया गया।

1983 तक की शांति के बाद तेल की राजनीति और सूडान को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने के कारण दक्षिण सूडान के लोग चीड गए। प्राकृतिक संसाधनों पर उत्तरी सूडान के लोगों द्वारा अपना अधिकार जताने और देश पर इस्लाम का सिक्का जमाने के प्रयत्नों को दक्षिण सूडानियों द्वारा झिडकने के कारण 1983 में फिर से गृहयुद्ध शुरु हो गया। 1989 में जनरल उमर अल बशर ने इस्लामी उग्रवादियों के समर्थन से वहां के लोकतांत्रिक शासन का तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई। उसीने बाद में आतंकी ओसाम बिन लादेन को अपने यहां पनाह दी, जहां से उसने अपना आतंक का कारोबार जमाना प्रारंभ किया। सूडान अरबलीग का सदस्य है साथ ही लंबे समय से इस्लामी आतंक के दबदबेवाला देश है। 1991 में खाडी युद्ध में सूडान द्वारा सद्दाम हुसैन के समर्थन के कारण अमेरिका भी नाराज हो गया। अंत में 20 लाख लोगों की बलि चढ़ने के बाद  2005 में गृहयुद्ध थमा और अंततः 9 जुलाई 2011 को जनमत संग्रह के द्वारा दक्षिण सूडान अस्तित्व में आया।

परंतु, इन सब कारणों के साथ ही एक और महत्वपूर्ण एवं प्रभावी कारण है और वह है इस्लामी शिक्षा एवं आज्ञाओं से तैयार हुई विश्वव्यापी मुस्लिम मानसिकता जिसकी चर्चा कहीं सुनने में नहीं आई। इस्लामी शिक्षाएं एवं आज्ञाएं हदीस और कुरान पर आधारित हैं जिनका पालन करना सच्चे मुसलमानों के लिए बंधनकारी है। क्योंकि, पैगंबर ने कहा था - 'जो मेरी आज्ञा का पालन करता है वह अल्लाह की आज्ञा का पालन करता है और जो मेरी आज्ञा का पालन नहीं करता वह अल्लाह की आज्ञा का पालन नहीं करता।" (बुखारीः 2956,7281) और पैगंबर का कहना यह है कि 'एक भूमि पर दो धर्म रहना योग्य नहीं।" (अबू दाउद ः 3026, ींहश ुीरींह ेष रश्रश्ररह-ि.51)  इस कारण जहां मुस्लिम अल्पसंख्या में हैं वहां वे अलग देश की मांग करते हैं और जहां वे बहुसंख्य हैं वहां वे हर संभव प्रयत्न कर दूसरों को समाप्त कर देना चाहते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है पाकिस्तान और बांग्लादेश जहां दिन ब दिन अल्पसंख्य हिंदू घटता जा रहा है, पलायन कर भारत आता जा रहा है।

रुमबेक के प्रतिष्ठित बिशप वयोवृद्ध सीजर मज्जोलारी के अनुसार सूडान में इस्लामी उग्रवादी वहां ईसाइयों को धर्मांतरित कर उन्हें आग से दाग देते हैं ताकि उन्हें काफिरों से भिन्न पहचाना जा सके। कुछ लोग दारफूर का उदाहरण देकर जो कि वर्तमान में एक अंतरराष्ट्रीय मुहावरा सा ही बन गया है यह कह सकते हैं कि यह तो कुछ सिरफिरे कट्टरपंथियों का काम है जो स्वयं मुस्लिमों को जो उनके ही  सहधर्मी हैं, इस्लाम के अनुयायी हैं का भी तो उत्पीडन कर रहे हैं। परंतु, यह तर्क वे ही दे सकते हैं जो या तो इस्लाम से अनजान हैं या जानकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं। इस मुस्लिम उत्पीडन पर अरब विश्व भी मौन है क्योंकि, उत्पीडक अरब मुस्लिम हैं और उत्पीडित मुस्लिम होते हुए भी भिन्न जनजातीय समुदाय के हैं। वास्तव में इन सबके पीछे विशिष्ट अरब मुस्लिम की भावना कार्यरत है जिसमें अरबी श्रेष्ठता की ग्रंथी है जो अरब मुस्लिम को अन्य मुस्लिमों से श्रेष्ठ समझती है और यह भावना खिलाफत काल से ही चली आ रही है।

सभी मुसलमान समान अधिकार प्राप्त परस्पर भाई हैं का सिद्धांत इस्लाम द्वारा उद्‌घोषित है। धर्म के रिश्ते के मुकाबले सभी नाते-रिश्ते गौण हैं। रक्त, वंश, कुल, प्रांत, देश आदि के आधार पर दो मुस्लिमों में भेदभाव करना और उनमें परस्पर संघर्ष इस्लाम को मान्य नहीं। तथापि, मुस्लिमों की दृष्टि में आदर्श कही जानेवाली खिलाफत (जिसकी स्थापना के लिए ही अंतरराष्ट्रीय जिहाद आतंकवादियों ने छेड रखा है) के उत्तरार्ध में ही यह सिद्धांत पीछे रहकर वे सभी भेद तीव्रता से उभरकर सामने आ गए। अरब मुस्लिम विरुद्ध गैर-अरब मुस्लिम, दक्षिण अरब मुस्लिम विरुद्ध उत्तर अरब मुस्लिम, मक्का के मुस्लिम विरुद्ध मदीना के मुस्लिम, मुहाजिर विरुद्ध अनसार, कुरैश मुस्लिम विरुद्ध गैर-कुरैश मुस्लिम, पहले बने मुस्लिम विरुद्ध बाद में बने मुस्लिम, निर्धन मुस्लिम विरुद्ध संपन्न मुस्लिम इस प्रकार के इस प्रकार के विविध भेद निर्मित होकर उनमें संघर्ष प्रारंभ हो गया। तीसरे खलीफा उस्मान और चौथे एवं अंतिम आदर्श खलीफा अली (पैगंबर के चचेरे भाई व दामाद तथा दत्तक पुत्र भी) का दुखद अंत भी इसीमें से हुआ।

वैसे देखा जाए तो उपर्युक्त कारण कोई उनके काल में ही निर्मित नहीं हुए थे। पूर्व के खलीफाओं के काल में भी ये भेद अस्तित्व में थे। परंतु, उस काल में बलाढ्‌य साम्राज्यों को जीतने के विजयी अभियानों की लहरों पर वे सवार होने के कारण इन भेदों के आविष्कारों को स्थान नहीं मिला था। उन्हें लढ़ने के लिए समान शत्रु मिल जाने के कारण ये सारे भेद सुप्तावस्था में थे। समान शत्रु तय करने में उनके लिए धर्म उपयोगी ठहरता था। खिलाफत के उत्तरार्ध में इस प्रकार के विजयी अभियान ठंडे पड गए और समान कार्यक्रम के अभाव में उनके सुप्तावस्था में पडे भेद प्रकट हो गए और इसी कारण वे परस्पर संघर्ष करने लगे।*1 अपन अरब हैं, कुरैश हैं, हाशिमी या उमय्यी कुलीन हैं की भावना पैगंबर के वरिष्ठ सहयोगी एवं स्वयं खलीफा भी छोडने के लिए तैयार नहीं थे।

इनमे से उस काल में सबसे गंभीर सिद्ध हुआ विवाद अरब मुस्लिम विरुद्ध गैर-अरब मुस्लिम था। विस्तृत होते साम्राज्य के साथ अरबस्थान के बाहर गैर-अरब मुस्लिमों की संख्या बडी मात्रा मे बढ़ी थी।*2 अरब स्वयं को अन्य मुस्लिमों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझते थे। गैर-अरब मुस्लिमों को वे मवाली (आश्रित) मानते थे। राज्याधिकार के सभी बडे पद अरब मुस्लिमों के पास ही थे। वे स्वयं एक राज्यकर्ता वर्ग बन गए थे। अरबों की स्वाभाविक लडाकू वृत्ति और विशिष्टता टिकाए रखने के लिए उमर ने विशेष नियम तैयार किए थे। उनके द्वारा विजित देशों में जमीनें खरीदने पर पाबंदी थी। उनके लिए विशेष सैनिकी नगर बसाए गए थे। वे गैर-अरब मुस्लिमों  में मिश्रित न हों इसका विशेष ध्यान रखा गया था। मवाली मुस्लिमों को अरब मुस्लिमों के समान अधिकार नहीं मिलते थे। मुस्लिम होकर भी उनके साथ दूसरे दर्जे का व्यवहार किया जाता था।

जब गैर-अरब मुस्लिमों की संख्या बढ़ी तब उन्होंने अपने को मिलनेवाले कनिष्ठ दर्जे के विरुद्ध आवाज उठाई और इस्लामानुसार समान अधिकारों की मांग की। उसी में से संघर्ष निर्मित हुआ। तीसरे खलीफा उस्मान के काल में उनकी सहानुभूति  खलीफा विरोधी विद्रोहियों के साथ थी। उनकी संतुष्टि के लिए ही चौथे व अंतिम आदर्श खलीफा अली को साम्राज्य की राजधानी मदीना के बजाए कुफा ले जाना पडी थी। आदर्श खिलाफत की शोकांतिका में यह भी एक महत्वपूर्ण कारण था। मुस्लिमों के एक वर्ग में युद्धलूट की प्रचंड संपत्ति आ जाने के कारण उनमें आर्थिक विषमता निर्मित हो गई। मुस्लिम समाज में अमीर और गरीब इस प्रकार के दो वर्ग निर्मित हो गए थे।

*1. इस प्रकार के संघर्षों को टालने के लिए ही पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद बने पहले आदर्श खलीफा अबूबकर ने अरबस्थान के बाहर सेना भेजी थी। इससे अरब टोलियों में परस्पर संघर्ष रुक गया। तीसरे खलीफा उस्मान के काल में मुस्लिमों में खलीफा विरोधी जो असंतोष फैला था उस पर उपाय के रुप में उसके लिए खलीफा द्वारा बुलाई गई सूबेदारों की परिषद में एक ने इस प्रकार की सूचना की थी कि विद्रोहियों का ध्यान दूसरी ओर बंटाने के लिए उन्हें विदेश में जिहाद के लिए भेज दिया जाए। समान शत्रु नहीं होगा तो वे परस्पर संघर्ष करेंगे इस पर यह उपाय बतलाया गया था।

*2. अपना प्रभुत्व टिकाए रखने के लिए अरबों को अपनी संख्या बढ़ाने की आवश्यकता महसूस होने लगी। एक मुस्लिम को एक समय में चार से अधिक पत्नियां न होने की कानूनसम्मत मर्यादा होने पर भी वे उनके अलावा कितनी भी रखैलें रख सकते थे। इसका उपयोग कर अरबों ने अपनी संख्या बढ़ाने की शुरुआत की। इस संबंध में के.डी.भार्गव लिखते हैं ः ''सीरिया, इराक, पर्शिया और इजिप्त इन विजित प्रदेशों में अरबों की संख्या अत्यंत कम थी ... (वह संख्या बढ़ाने के लिए) उन्होंने इन विजित क्षेत्रों की कैदी स्त्रियों को (संख्या में कितनी भी हों) रखैलों के रुप में रखने की शुरुआत की ... (इस संबंध का नियम उनके लिए वरदान ठहरा)  इस मार्ग से उनकी संख्या में बढ़ौत्री न होती तो, उन देशों में मुस्लिम साम्राज्य अस्त ही हो गया होता। (इतिहासकार) जुर्जी जैदन ने कहा है कि, अधिकाधिक गुलाम (कैदी) लडकियों को प्राप्त करने के लिए अरबों में स्पर्धा चलती थी।""

कुरैश मुस्लिमों को जितना गर्व अपन कुरैश हैं पर था उतना ही गर्व उन्हें अपन अरब हैं इस पर भी था।*3 पैगंबर को अरबभूमि इस्लाम के आधार के रुप में संभालकर रखनी थी। दूसरे खलीफा उमर का कहना था कि 'अरब इस्लाम का कच्चा माल हैं"। इस्लाम का प्रसार करने के लिए अल्लाह ने अरबों को विशेष रुप से चुना है इस पर अरब मुस्लिमों का दृढ़ विश्वास था। अरबभूमि के बाहर आक्रमक अभियान चलाते समय इराक और सीरिया की अरबवंशीय जनता को अरब संबंधों का हवाला देकर राजसत्ता के विरुद्ध अपने को सहायता करने का आवाहन मुस्लिम सेनापति करते थे और उसे कुछ मात्रा में प्रतिसाद भी मिला था। इस्लाम ने सभी अरबों को एक किया था; उनका एक राष्ट्र निर्मित किया था; आरंभ के काल में अरब और मुस्लिम मानो समानार्थी शब्द हो गए थे। इतिहासकार के.डी. भार्गव का उमर के काल के विषय में कहना है - 

''इस्लाम ने अरबों को एकजुट किया। उस काल में इस्लाम की एकजुटता और अरबों की एकजुटता पर्यायवाची संज्ञाएं थी। अनगिनत टोलियों और कुलों में विभाजित अरबों को एकजुट किया गया था और वंश के स्थान पर धर्म का गर्व प्रस्थापित किया गया था। अरब और इस्लाम इनका भविष्य एकरुप हो गया था। परंतु, तीसरे खलीफा उस्मान के काल में यह स्थिति नहीं रही। अरबभूमि के अरबों में ही दक्षिण के और उत्तर के अरब ऐसे दो गुट निर्मित हो गए थे।

*3. पैगंबर ने कहा था- (अ). 'सभी लोग कुरैशों के आज्ञाकारक हैं; उनमें के (यानी सभी लोगों में के) मुस्लिम उनमें के (यानी कुरैशों में के) मुस्लिमों के आज्ञाकारक हैं; (सभी) लोगों में के श्रद्धाहीन (इस्लाम पर श्रद्धा न रखनेवाले) कुरैशों में के श्रद्धाहीनों के आज्ञाधारक हैं।"(मुस्लिमः4473,74) (इसका अर्थ वंश के रुप में कुरैश मानवों के सभी वंशों में श्रेष्ठ हैं तो, धर्म के रुप में मुस्लिम सभी धर्मियों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं तो, वंश और धर्म में (इस्लाम) धर्म सर्वश्रेष्ठ है)

(ब). पैगंबर ने कहा था- (सभी) लोग कुरैशों का अनुसरण करनेवाले हैं, फिर वे अच्छे हों कि बुरे हों। (यानी इस्लाम की बातों में हो कि इस्लाम पूर्व की बातों में हों) (कोष्ठक मूल के ही)(मुस्लिमः4475)

(स). पैगंबर ने कहा था- 'खिलाफत (राज्यसत्ता) हमेशा ही कुरैशों के अधिकार में रहेगी भले ही उनके दो मनुष्य भी (पृथ्वी पर) जीवित रहें तो भी (वह रहेगी)।" (मुस्लिमः4476,बुखारीः7140)

पैगंबर की मृत्यु के बाद खिलाफत के संबंध में मक्का (मुहाजिर, शरणार्थी) और मदीना (अनसार, सहायक) के लोगों में उभरे मतभेद पर पहले खलीफा अबू बकर ने उपर्युक्त हदीस का संदर्भ देकर कहा था 'हम अमीर (राजा) हैं और तुम वजीर (प्रधान) रहनेवाले हो। अतः खलीफा पद हमारे पास और प्रधान पद तुम्हारे पास रहने दो। हम आश्वासन देते हैं कि तुम्हारी सलाह के सिवाय  (राज्य करते समय) हम कोई सा भी निर्णय नहीं लेंगे।" मदीनावासियों द्वारा ऐतराज उठाने पर अबू बकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था 'नहीं। हम अमीर रहेंगे और तुम वजीर। सभी अरबों में वंश में हम श्रेष्ठ हैं।" उमर ने भी कहा था 'हम पैगंबर के कुल (यानी कुरैश) से हैं और इसलिए हमारी अपेक्षा खलीफा पद के लिए अधिक हकदार और कौन हो सकता है।" 
 
इन उपर्युक्त के संबंध में दो मान्यवर एवं प्रसिद्ध धार्मिक विद्वानों के मत उल्लेखनीय हैं। इब्ने खल्दून ने कहा है - ''कुरैश मूलतः उत्कृष्ट और श्रेष्ठ दर्जे के अरब नेता थे .... सभी अरबों ने यह वस्तुस्थिति मान्य की थी और उनके श्रेष्ठत्व के सामने अपनी गर्दन झुकाई थी। अगर अन्य किसी के पास यह राजनेतृत्व जाता तो वह राज्य कभी का नष्ट हो जाता .... उनका कोई विरोध करेगा इसका उन्हें भय नहीं था, समाज विघटन का भय नहीं था .... इस प्रकार का उत्तरदायित्व वे ही ले सकते थे। इसीलिए खलीफा कुरैश वंश का रहने की शर्त डाली गई थी।"" शाह वलीउल्लाह ने भी इसी प्रकार का समर्थन करते हुए कहा है- ''कुरैश टोली अन्य किसी भी टोली की अपेक्षा (इस्लाम के) दैवी संदेश के निकट की थी और इस इस्लाम धर्म सेवा और रक्षा करनेवाले पहले वे ही थे।"" 

दक्षिण और उत्तर-मध्य अरबभूमि के अरबों में वांशिक, आर्थिक, सामाजिक और कुल मिलाकर सांस्कृतिक दृष्टि से अंतर था। उत्तर के अरब टोली जीवन जीनेवाले और व्यापार-व्यवसाय करनेवाले तो, दक्षिण के खेतीबाडी करनेवाले और स्थायी जीवन जीनेवाले थे। परिणाम स्वरुप दक्षिण के अरब उत्तर की अपेक्षा अधिक प्रगत थे।

जीविकानुसार उनकी स्वभाव प्रवृतियों में भी भिन्नता और कुछ मात्रा में परस्पर विरोध भी आ गया था। वे एक दूसरे का द्वेष भी करते थे। मदीना भौगोलिक दृष्टि से उत्तर अरबभूमि में होने पर भी वहां के लोग मूलतः दक्षिण अरबभूमि से आए हुए होेने के कारण  उनकी स्वभाव प्रवृत्ति दक्षिण जैसी ही थी तो, मक्का के अरब उत्तरभूमि का टोलीस्वरुप जीवन जीनेवाले थे। भिन्न वंश के मक्का और मदीना के लोगों में परंपरागत बैरभाव और स्पर्धा चली आ रही थी। उस्मान के काल में मदीना के अनासर और मक्का के मुहाजिरों में निर्मित हुई स्पर्धा और विरोध एक प्रकार से इस परंपरागत विरोध का पुनरुज्जीवन था। उस्मान की खिलाफत की शोकांतिका का एक कारण यह भी था।

ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि दक्षिण क्षेत्र के अरब वंश परंपरागत स्थिर राजपरिवारों की राजवंश परंपरा को माननेवाले थे; हजारों वर्षों से वहां यह परंपरा रुढ़ हो गई थी। इसके विपरीत उत्तर क्षेत्र के अरब टोली-प्रजातंत्र को माननेवाले थे। टोली का नेता वे जिस पद्धति से वे चुनते थे उस पद्धति से ही वे राजप्रमुख चुनते थे। इस कारण इस विषय में वंशपरंपरा उन्हें मान्य नहीं थी। अबू बकर, उमर, उस्मान का चुनाव इसी पद्धति से हुआ था भर यह पद्धति दक्षिण की परंपरा माननेवाले मदीना के अनसारों को मान्य नहीं थी। पैगंबर का उत्तराधिकारवाले उनके ही परिवार के अली खलीफा के रुप में मान्य होने योग्य थे। स्वाभाविक रुप से उनका अली के पक्ष को समर्थन था। उनके द्वारा उस्मान का पक्ष लेकर उनकी रक्षा करने में अग्रणी ने होने का यह एक कारण था।

उपर्युक्त सभी कारण अरब मुस्लिमों के अंतर्गत विविध गुटों के कलह, परस्पर विरोधी अस्मिता और स्पर्धा से निर्मित हुए थे। ऐसा होने पर भी अरब स्वयं को अन्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ और जो अरब नहीं उन्हें कनिष्ठ मानते थे। अरबभूमि में सभी अरब होने के कारण वहां यह प्रश्न निर्मित नहीं हुआ। परंतु, बाहर के मुस्लिम साम्राज्य में यह प्रश्न उपस्थित हुआ था और उस्मान के काल में तीव्र हो गया था। सभी मुसलमान समान और परस्पर बंधु हैं का इस्लामी सिद्धांत पवित्र ग्रंथ में ही रह गया था और व्यवहार में अरब मुस्लिम गैर-अरब मुस्लिमों को अपने समान नहीं समझते थे।

पूर्ण पर्शिया (ईरान) और रोमन साम्राज्य का बहुत बडा क्षेत्र मुस्लिम साम्राज्यांतर्गत आने पर जिस गैर-अरब प्रजा ने इस्लाम का स्वीकार किया उन्हें अरब मुस्लिमों के बराबर का स्थान मिलता नहीं था। अरबभूमि से स्थानांतरण कर आए अरब उन्हें दूसरे दर्जे का समझते, उन्हें अपने से कम अधिकार देते थे। अरब मुस्लिम विशेषाधिकारवाले वर्ग के रुप में निर्मित हो गया था। इस कारण वहां  अरब मुस्लिम विरुद्ध गैर-अरब मुस्लिम ऐसा विवाद और संघर्ष निर्मित हो गया। इन गैर-अरब मुस्लिमों को 'मवाली" कहा जाता था।*4 मुस्लिम होने के लिए उन्हें किसी ना किसी अरब का आश्रित बनना पडता था। इसके सिवाय कोई भी मुस्लिम हो नहीं सकता था। इन गैर-अरब मुस्लिमों की सहानुभूति खलीफा विरोधी विद्रोहियों के साथ थी। उनमें से कुछ खुले रुप में विद्रोहियों की सहायता करते थे। इस्लामी समता के सिद्धांतानुसार अपने साथ भी समानता का व्यवहार किया जाए की उनकी मांग थी।*5
*4. इस संबंध में कुछ इतिहासकारों के अभिप्राय इस प्रकार से हैं - सर विल्यम मूरः ''अरबभूमि से विजय प्राप्त करते हुए निकले अरब अमीर-उमराव बन गए। अपनी संस्कृति उच्च दर्जे की होने के बावजूद जब उन पराजित देशों के लोगों ने इस्लाम का स्वीकार किया तब उन्हें कनिष्ठ वर्ग मिला। अरब ही प्रभावशाली और वर्चस्ववाली जाति बन गई..... विजित प्रांतो के नव मुस्लिम उनके आश्रित (मवाली)(लश्रळशपींी, वशशिपवशपींी) बन गए।"" वैसेही ''(उमर के काल में) अरब विजित प्रदेशों की संपन्नता पर जीनवाले बन गए तो, पराजित लोग उनकी सेवा करते थे।" 'अरब रक्त के मुस्लिमों की ही केवल विशेषाधिकार मिलते थे। सिद्धांततः सभी मुस्लिमों के अधिकार वंशनिरपेक्षता से समान थे .... परंतु, यथार्थ में यह समानता अरबों तक ही सीमित थी अन्य वंश के मुस्लिमों को समान अधिकार केवल उपजीविका तक के सीमित शासकीय अनुदान मिलने तक के ही मर्यादित थे.... अरब मुस्लिम जिस-जिस स्थान पर गए वहां एक स्वतंत्र और वर्चस्वशाली वर्ग बनकर रहे। राज्यकर्ता और सूबेदार वे ही बने। मुस्लिम बनी (गैर-अरब) जनता एक कनिष्ठ वर्ग बन गया। किसी ना किसी अरब टोली का आश्रित बनकर उनका पालकत्व और संरक्षण मिलने से अधिक उन्हें कुछ नहीं मिलता था। इस प्रकार से अरब इस्लाम प्रसार के पवित्र कार्य के एक स्वतंत्र लडाकू राष्ट्र बन गए।""

जोएल कारमाएकेलः ''अरबभूमि के बाहर पडते ही अरब इस्लाम को शुद्ध अरब संस्था मानने लगे थे। गैर-अरबों को मुस्लिम बनाना एक विचित्र बात थी इसलिए उन्हें मुस्लिम बनाने की कोई पद्धति अस्तित्व में नहीं आई थी... इस्लाम स्वीकारने के पहले उन्हें अरब होना पडता था और इसके लिए पहले उन्हें किसी ना किसी अरबटोली से संलग्न होना पडता था ... (उसे आश्रित (मवाली) कहते) .... इस प्रकार से वह मुस्लिम समाज का सदस्य बनकर सिद्धांततः उनके ही समान होने पर भी उसके संबंध में (मूल) अरब मुस्लिमों के श्रेष्ठत्व का अन्याय भर कम नहीं होता था। अरब मुस्लिम अन्य मुस्लिमों को तिरस्कारपूर्वक कनिष्ठ समझते थे।"" ''इस्लाम अरबों का अन्यों पर प्रभुत्व प्रस्थापित करनेवाली एक संस्था बन गई थी।""

फॉन क्रेमरः ''उमर ने सूत्र प्रस्थापित किया था कि 'अरब गुलाम हो नहीं सकता" उसकी यह घोषणा उसके द्वारा उद्‌घोषित राजनैतिक सिद्धांतों से सुसंगत थी। उमर का यह मत कि अरब मूलतः ही स्वतंत्र है केवल अन्य लोग ही गुलाम हो सकते हैं और किए जाना चाहिए। उसकी दृष्टि में अरब विश्व पर राज्य करने के लिए चुने हुए लोग थे।""

के.डी. भार्गवः ''इस्लाम में के अपने विशिष्ट दर्जे के विषय में अरब अत्यंत जागरुक थे .... उनके इस अभिमान और अन्याय के कारण अन्य प्रदेशों के मुस्लिमों में उनके प्रति द्वेष निर्मित हो गया। उनके साथ अरब मुस्लिम अत्यंत तिरस्कारपूर्वक व्यवहार करते थे ... मवाली (आश्रित) के पीछे खडे रहकर नमाज पढ़ना उन्हें पसंद नहीं था। अगर कभी ऐसा हुआ तो, उसे वे स्वयं का अपमान समझते थे .... कोई सा भी मवाली शोभायात्रा में अरब मुस्लिमों से आगे या जोडी से चल नहीं सकता था। अरब मुस्लिम स्वयं को पृथ्वी पर के सभी लोगों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानते थे। राज्य करना मुस्लिमों का विशेषाधिकार तो उनकी आज्ञा का पालन करना अन्य सभी का कर्तव्य है, ऐसा माना जाता था ... नव-मुस्लिमों के लिए अरबों ने समानता नकारी थी।""

जे. वेलहॉसनः ''मुस्लिम साम्राज्य में दो वर्ग थे ... अरब मुस्लिम योद्धा और विजेता के रुप में स्वामी थे। मुहम्मद का समाज (उम्मा) अब सैन्य वर्ग में रुपांतरित हो गया था ... सेना के लोगों को ही नागरिकत्व के संपूर्ण अधिकार मिलते थे।"" ''जीते हुए प्रदेशों में भी अरबों ने अपनी प्राचीन कुलव्यवस्था कायम रखी थी।"" ''गैर-अरब लोगों ने बडी मात्रा में इस्लाम का स्वीकार किया था। विशेष रुप से इसमें कुफा और बसरा की प्रचंड संख्या के युद्ध कैदियों का समावेश था। इस्लाम स्वीकारने के कारण उनकी युद्ध कैद से मुक्तता हो गई। परंतु, उन्हें अन्य अरब मुस्लिमों के समान नागरी, सैनिकी अधिकार या अन्य लाभ नहीं दिए गए। वे किसी ना किसी अरब परिवार के आश्रित सदस्य बन गए। उन्हें मवाली कहते थे .... इस्लामी धर्मसत्ताक राज्य यानी विजित लोगों पर अरबों की साम्राज्यशाही था .... अरब-मुस्लिम गैर-अरब मुस्लिम जनता पर राज्य करते थे।""

फीलिप हिट्टीः ''उमर की नीति का दूसरा प्रमुख सिद्धांत सभी अरबों का, जो अब सभी मुस्लिम हो गए हैं, धार्मिक-सैनिकी संघराज्य स्थापित करना था। उसमें अरब विशुद्ध और अलग रहनेवाले थे। वह एक प्रकार की सैनिकी अधिकारशाही (ाळश्रश्रळींरीू रीळीींीेलीरलू) रहनेवाली थी और उसमें सभी गैर-अरबों को नागरिकत्व के अधिकार नकारे जानेवाले थे।""    

*5. इस विषय में कुछ इतिहासकारों के अभिप्राय - अ). डॉमिनीक सॉर्डेल ः''(कुछ समय में ही) नव-मुस्लिमों की संख्या कई गुना बढ़ गई और उन्होंने अधिकारों और (अन्य) लाभों में (अन्य मुस्लिमों के समान ही) समान हिस्से की मांग की।"" ''मुस्लिम साम्राज्य के लोगों के स्पष्ट रुप से तीन वर्ग बन गए थे विजेता अरब मुस्लिम, गैर-अरब नव-मुस्लिम और गैर-अरब गैर-मुस्लिम ... इन गुटों के उत्तरदायित्व और अधिकार समान नहीं थे।"" ब). के.डी. भार्गव ः'पर्शिया और इराक के गैर-अरब मुस्लिम अरबों के वर्चस्व और अलगत्व के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने अरबों के श्रेष्ठत्व के दावे को नकारा था और सभी क्षेत्रों में समान अधिकारों की  मांग की थी।"

जैसाकि पूर्व में ही कहा जा चूका है उत्तरी सूडान इजिप्त प्रभाववाला अरब बहुल मुस्लिम है और इजिप्त को अरब बहुल स्थानीय लडकियों-स्त्रियों से विवाह कर उनसे संतति पैदा कर बनाया गया है। इसलिए उनमें अरबी श्रेष्ठता की ग्रंथी का आना स्वाभाविक ही है। इसके अतिरिक्त प्रभाव के अन्य कारणों में उनके द्वारा स्वयं को पैगंबर का वंशज, निकटस्थ संबंधी समझना भी है। क्योंकि, मुस्लिम स्वयं को जिस पैगंबर इस्माईल (पैगंबर इब्राहीम के पुत्र) का वंशज मानते हैं उनकी मां इजिप्त की ही थी। इस दृष्टि से मुस्लिमों के लिए इजिप्त ननिहाल है साथ ही इजिप्त मुस्लिमों को मान्य अनेक पूर्व पैगंबरों की भी भूमि है। जिनमें मोजेस (मूसा), जोसेफ, इब्राहीम आदि का इतिहास इसी भूमि से जुडा हुआ है। इजिप्त का अन्यायी राजा फिरौन मोजेस के काल में ही हुआ था और मोजेस को उससे संघर्ष करना पडा था। अंत में अल्लाह ने फिरौन और उसकी सेना को इसी भूमि में नष्ट कर डाला था। इजिप्त और वहां के पैगंबरों और स्थानों के संबंध में कई आयतें कुरान में आई हुई हैं। फिरौन को नष्ट करने के बाद श्रद्धावानों (इस्लाम पर श्रद्धा रखनेवाले यानी मुस्लिम) को उद्देशित कर अल्लाह ने कहा है ः (44ः25-28) इस प्रकार से यह भूमि पॅलेस्टाइन के समान ही मुस्लिम साम्राज्यांतर्गत कर लेना मुस्लिमों का धार्मिक कर्तव्य था और इसीलिए उमर के काल में इसको जीता गया था। आर्थिक एवं संरक्षणात्मक कारण अपने स्थान पर थे ही।  
इसके पूर्व के इतिहास के अनुसार- पैगंबर को जब ऐसा विश्वास हो गया कि अपनी मातृभूमि अरबस्थान में अपने पांव जम गए हैं और अब अंतिम विजय निश्चित है तो उन्होंने अपना ध्यान अरबस्थान के बाहर केंद्रित करते हुए पडौस के पर्शिया, रोम, इजिप्त, ऍबीसीनिया आदि देशों के प्रमुखों को इस्लाम स्वीकारने का आवाहन करने की शुरुआत की। उनके द्वारा विभिन्न सम्राटों को निमंत्रण-पत्र भेजे गए। पैगंबर द्वारा मिस्त्र और स्कंदरिया के सम्राट मकोकिस के नाम सन 627ई. में निमंत्रण पत्र भेजा गया था। इस पत्र की मूल प्रति 1850ई. में फ्रांस के प्रसिद्ध प्राच्यविद्‌ बारतिल्मी को ईसाई खानकाह (मठ) में मिली। आजकल यह पत्र इस्तंबूल (तुर्की) के 'तोब काबी सराई" के म्यूजियम में सुरक्षित है। इस पत्र का अनुवाद यह है-

''अल्लाह कृपाशील, दयावान के नाम से। अल्लाह के बंदे और उसके रसूल मुहम्मद की ओर से किब्त के सम्राट मकोकिस की तरफ। सलाम उस पर जिसने मार्गदर्शन का अनुसरण किया। तत्पश्चात मैं तुम्हें इस्लाम के आमंत्रण की ओर आमंत्रित करता हूं। इस्लाम स्वीकार कर लो सलामती पाओगे। इस्लाम स्वीकार करो अल्लाह तुम्हे दोहरा बदला देगा। फिर यदि तुमने मुंह फेरा तो सारे किब्त (जाति) का गुनाह तुम पर होगा। 'हे किताब वालों! आओ एक सीधी बात की ओर जो हमारे और तुम्हारे बीच की है, यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करें और किसी के साथ साझी न ठहराएं और न हममें कोई परस्पर एक-दूसरे को अल्लाह को छोडकर 'रब" (प्रभु) बनाएं-फिर यदि वे मुंह मोडें तो कह दो ः गवाह रहो हम मुस्लिम हैं।""

सम्राट मकोकिस ईसाई था उसने धर्मांतरण से इंकार कर दिया। परंतु, आए हुए दूत का आदरातिथ्य किया और सौजन्यता का व्यवहार किया। सम्राट ने पैगंबर के लिए भरपूर भेंट देकर दूत को रवाना किया। उस भेंट में दो युवतियां, एक घोडा, खच्चर, गधा, पोशाक... इनका समावेश था। पैगंबर ने भेंट स्वीकारते हुए उनमें से एक युवती मेरी को अपनी पत्नी होने का बहुमान प्रदान किया। उससे उन्हें एक लडका भी हुआ। उसका नाम 'इब्राहीम" रखा गया। परंतु, वह पंद्रह महीने की अवस्था में ही चल बसा।

एक और कारण मिस्त्र पर फातेमी वंश (909-1160ई.) का शासन होना। जो स्वयं को पैगंबर के दामाद और चचेरे भाई अली और उनकी पत्नी फातेमा की संतान बतलाते थे। इन्हीं के सेनापति जौहर ने काहिरा नामका नया नगर बसाया जो 973ई. से फातेमियों की राजधानी बना। 972ई. में उसीने विश्व प्रसिद्ध इस्लामी केंद्र अल-अजहर मस्जिद का निर्माण कराया। इनके बाद हुए ममलूक वंश ने अपने राज्य को धार्मिक लोगों की दृष्टि में अधिक पवित्र बनाने के लिए अब्बासी खलीफा अल जाहिर के पुत्र को दमिश्क से बुलाकर अल मुस्तनसिर के नाम से खलीफा बना दिया। खलीफा मुख्य रुप से प्रबंध किया करते थे और ममलूक सुल्तानों की इच्छानुसार बनाए बिगाडे जाते थे। ये अब्बासी पैगंबर मुहम्मद के चाचा अब्बास इब्ने अब्दुल मुतल्लिब इब्ने हाशिम की संतान थे। इस इजिप्त को दूसरे खलीफा उमर के सेनापति अमर बि. अल आस ने जीता था। मुस्लिमों की आदर्श खिलाफत के चौथे खलीफा अली का मुविया के साथ चली खिलाफत की लडाई में इजिप्त समर्थक प्रांत था।

इस प्रकार के इतिहासवाले अरब बहुल उत्तरी सूडान के साथ ईसाई बहुल दक्षिणी सूडान का निभाव बडा ही मुश्किल था और इसलिए इस प्रकार का विभाजन अपरिहार्य ही था जो आज नहीं तो कल होना ही था। और यह अरबी श्रेष्ठता की ग्रंथी ही वह कारण है जिसके कारण दारफूर में लाखों जनजातिय मुस्लिमों के कत्लेआम के बाद भी खून-खराबा है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा।


Wednesday, 23 November 2011

कम करें बेजा महत्व राजनेताओं का

कम करें बेजा महत्व राजनेताओं का

स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय पश्चात ही राजनेताओं के चाल-चलन, आचरण पर ऊँगलियॉं उठने लगी थी। प्रारंभ में भ्रष्टाचार के कुछ मामले में भी सामने आए। परंतु, फिर भी सर्वसाधारण जनता के मन में राजनेताओं के प्रति विश्वास था, आदरभाव था।  परंतु, धीरे-धीरे हालात बदलने लगे, राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगना आम होता चला गया और सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच के लिए जांच आयोग गठित किए जाने लगे। किंतु, जांच के निष्कर्ष कभी जनता के सामने ढ़ंग से आए नहीं और आए भी तो कोई उल्लेखनीय कार्यवाही की गई ऐसा कुछ नजर आया नहीं। अंत में जांच आयोग आरोप लगानेवालों के मुंह बंद करने के हथियार के रुप में प्रयुक्त किए जाने लगे, या यूं कहें कि कुछ लोगों के पुनर्रोजगार का माध्यम बन गए। अंततः राजनेताओं द्वारा किए गए कांडों एवं भ्रष्ट आचरणों, कमाई गई अकूत संपत्ति ने नए-नए कीर्तिमान स्थापित करना प्रारंभ कर दिया।

फिर नया दौर चला राजनेताओं द्वारा चुनाव के समय अपनी चल-अचल संपत्ति घोषित करने का। सवाल उठानेवाले फिर भी सवाल उठाते रहे कि चुनाव में संपत्ति की घोषणा के साथ नेताओं को इसका स्त्रोत भी बताना चाहिए। सवाल खडा करने के पीछे तर्क यह था कि वर्तमान में देखते ही देखते एक मामूली पार्षद और सरपंच भी बडी संपत्ति का मालिक आखिर कैसे हो जाता है?

राजनेताओं के बारे में इस प्रकार की चर्चा करना, सवाल खडे करना तो आम बात है। परंतु, चौंकने की बारी तब आई जब समाचार पत्रों में छपा कि 'जार्ज के जीते जी विरासत पर बखेडा"  जो उनके वारिसों के बीच करोडों की संपत्ति को लेकर शुरु हो गया है। इन्होंने जो भी संपत्ति बनाई है वह वैध तरीकों से ही बनाई है। हमारे चौंकने का कारण है इन राजनेता की पृष्ठभूमि, ये कोई टाटा-बिडला के वंशज तो हैं नहीं! श्री जार्ज जो हैं वे तो समाजवादी, जुझारु मजदूर नेता के रुप में जाने जाते रहे हैं।

हमारा कहना तो यह है कि जब वैध तरीके से इतनी संपत्ति कमाई जा सकती है तो, जो राजनेता पैसा बनाने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने को तैयार रहते हैं वे कितना माल घोषित-अघोषित तरीके से बना रहे होंगे इसकी तो केवल कल्पना मात्र ही की जा सकती है। यही कारण है कि जब उच्च नेतृत्व (श्रेष्ठी) हार के सदमे में आकर किसी तरह की चिंतन बैठक का आयोजन करना चाहता है तो ये हारे-हरल्ले नेता अपनी हार की थकान मिटाने विदेश चले जाते हैं बजाए चिंतन बैठक में भाग लेने के।

इतना पैसा भला किस धंदे में इतनी तेज गति से बनाया जा सकता है? इसीलिए तो बिरलों को छोडकर सभी चुनावी दौड में शामिल होकर पार्षद से लेकर विधायक-सांसद-मंत्री ये न सही तो कम से कम किसी निगम-बोर्ड का अध्यक्ष-उपाध्यक्ष यह भी नहीं तो सदस्य ही सही बन जाएं इसलिए दौड लगा रहे हैं। और इसका जीवंत नजारा गत दिनों हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में नेताओं ने जनता को चुनावी जंग जीतने के लिए आसमान सिर पर उठाकर, आकाश-पाताल एक कर दिखला भी दिया। और यह आसान रास्ता जान नेता-पुत्र-रिश्तेदार भी नेता का बेटा नेता ही बनेगा अर्थात्‌ वंशवाद की राह पर चल पडे हैं। इस वैध-अवैध तरीके से मिलनेवाले धन और इसके लिए अपनाए जानेवाले हथकंडों के कारण ही ये राजनेता हद दर्जे के बेईमान, बेहया, असंवेदनशील, निष्ठुर-निरंकुश हो गए हैं तथा इन सद्‌गुणों का प्रदर्शन भी इन्होंने 26/11 को कर दिखाया। इन्हीं सद्‌गुणों के कारण संसद पर हमले के समय जिन रक्षाकर्मियों ने बलिदान दिया उनके बलिदान की उन्हें रत्ती भर भी परवाह नहीं। वे तो अफजल गुरु को बचाने में लगे हैं, सडक पर मरते पुलिस कर्मी की सुध लेने की उन्हें फुर्सत नहीं, सेना के जवानों को भी अच्छा वेतनमान-सुविधाएं मिलना चाहिए की परवाह नहीं।

उन्हें परवाह है तो केवल इतनी कि उन्हें वेतन वृद्धि मिले, अधिकाधिक सुविधाएं वह भी हर क्षेत्र में केवल स्वयं को ही नहीं अपितु, अपने रिश्तेदारों और समर्थकों को भी मिले इसकी। और इस संबंधी प्रस्ताव भी संसद से लेकर विधानसभा, नगर-निकायों तक हाथों-हाथ स्वीकृत हो जाते हैं, पारित हो जाते हैं और जब बारी आती है जनता की तो जो आसमान छूती महंगाई से पीडित है  के सवाल पर बहस के समय संसद खाली नजर आती है। और आएगी भी क्यों नहीं? और इनको पीडा भी क्यों हों? इनको तो कितने सस्ते में खान-पान की सुुविधा उपलब्ध है वह समाचार पत्रों में आ ही चूका है। 

इस प्रकार से इन नेताओं ने प्रजातंत्र की अनिवार्य बीमारी का रुप धारण कर लिया है। परंतु, ये नेता इतने चालाक हैं कि अपने में व्याप्त इस बीमारी का कारण भी जनता पर ही थोप रहे हैं। यह कहकर कि जब समाज ही भ्रष्ट होगा तो उसे नेतृत्व भी भ्रष्ट ही मिलेगा। क्योंकि, नेता भी तो उन्हीं में से निकलकर आता है। असल में इन नेताओं के इस पाखंडी अहंकार का कारण है इन्हें मिलनेवाला आवश्यकता से अधिक बेजा महत्व जो इन्हें बेलगाम किए दे रहा है। कोई सा भी समाचार पत्र उठाकर देखिए हर कार्यक्रम में फिर भले ही वह किसी भी क्षेत्र का हो मुख्य अतिथि के रुप में राजनेता ही विराजमान नजर आएंगे, चाहे उन्हें उस क्षेत्र का कौडी भर का भी ज्ञान क्यों न हो!

वस्तुतः होना यह चाहिए कि कोई सा भी कार्यक्रम-आयोजन हो उसमें उस क्षेत्र में जिससे संबंधित कार्यक्रम है के विशेषज्ञता प्राप्त लोगों या अन्य आदरणीय लोगों को जो समाज हित कोई कार्य कर रहे हों को ही मुख्य अतिथि के रुप में बुलाएं ताकि वे अपने ज्ञान से, आशीर्वचनों से आयोजकों को, समाज को लाभान्वित तो कर सकेंगे। सबसे पहली आवश्यकता तो यही है कि इन नेताओं का बेजा सामाजिक महत्व कम किया जाए। पहले तो उन्हें अतिथि के रुप में बुलाना फिर उनके जाने के बाद उनकी आलोचना करना निरा पाखंड है इसे शीघ्रताशीघ्र बंद किया जाना चाहिए। यदि हम यह नहीं कर सकते इसका अर्थ है कि कहीं ना कहीं हम भी इन नेताओं से किसी ना किसी तरह की स्वार्थ सिद्धि चाहते हैं। यदि यह सच है तो फिर हमें राजनेताओं की आलोचना करने का भी कोई अधिकार नहीं।

अंत में हमें यह कहना है कि हमारे कथन पर से यह न समझें कि हम राजनेता विरोधी हैं। हम तो यह कहना चाहते हैं कि हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं और राजनेता को चुनना हमारे ही हाथों में है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था चलाने के लिए राजनेता लगते ही हैं। उनका अपना महत्व है। उनका हम त्याग नहीं कर सकते। परंतु, हमें चाहिए कि हम केवल योग्य व्यक्तियों को ही चूनें, अच्छे चरित्रवान नेताओं को ही महत्व दें, अच्छे लोगों को राजनीति में जाने के लिए प्रोत्साहित करें। और उन्हें ही भर महत्व दें। तभी प्रजातंत्र सार्थक सिद्ध हो सकेगा। यदि हमने यह किया होता तो आज यह लेख लिखने की या उपर्युक्त कथन करने की आवश्यकता ही नहीं पडती।

Sunday, 20 November 2011

ये कैसे हो गए हैं हम?

ये कैसे हो गए हैं हम?

वर्तमान में सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार, सत्ता-संघर्ष-स्वार्थ की आपाधापी, हिंसाचार, कदाचार, संस्कारहीनता, नैतिकता, सेवाभाव की कमी आदि के प्रदर्शन को देख कई लोग देश की स्वतंत्रता प्राप्ति यानी 1947 के आसपास के काल से आज की तुलना कर उस जमाने में कितनी देशभक्ति थी, ध्येय निष्ठा थी, उच्च आदर्श थे और आज ये क्या हो रहा है? हम कहां से कहां आ गए हैं, हम कहां जा रहे हैं, हमारा भविष्य क्या होगा, ये हम कैसे हो गए हैं? कहकर चिंता प्रकट करते नजर आते हैं। ऐसा सोचना, चिंता प्रकट करना भले ही कितना भी सद्‌भाव भरा हो। परंतु, मात्र भावुकता से भरा है, वस्तुनिष्ठ नहीं है।

उपर्युक्त कथन स्पष्ट हो सके इसलिए हम कुछ उदाहरण लेंगे। जैसकि कहां उस जमाने में चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंग, सुभाषचंद्र बोस आदि जैसों का त्याग, बलिदान-देशभक्ति और आज देखो तो चारों ओर लूट मची है, भ्रष्टाचार के बगैर कुछ लिए-दिए बगैर कोई काम ही नहीं होता। फौज में देखो तो होनहार युवा अधिकारियों की कमी खल रही है और युवा आर्थिक चकाचौंध देख आर्थिक लाभ के लिए दौड लगा रहे हैं। उस जमाने की फिल्में जैसकि 'दो आँखें बारह हाथ", 'जागृति", 'दोस्ती", बंदिनी आदि कुछ ना कुछ संदेश जो सामाजिक, नैतिक आदर्शों आदि से जुडा रहता था दिया करती थी, वास्तविकता के धरातल से जुडी हुआ करती थी। और आज की फिल्में समाज को स्वप्नलोक में ले जाने पर उतारु हैं, अश्लीलता-अनैतिकता फैला रही हैं। इनके प्रभावस्वरुप जहां कुछ वर्षों पूर्व तक की एड (विज्ञापन) फिल्में, उनके स्लोगन कितने साफ-सुथरे, मनभावन हुआ करते थे उदाहरणार्थ 'हमारा बजाज", 'सर्फ की खरीदारी में ही समझदारी है - ललिताजी", 'जब मैं छोटा बच्चा था - फिलिप्स", आदि। और आज 'ये तो बडा टोइंग है", 'निकालिए ना" आदि जैसे अंतर्वस्त्रों के विज्ञापन और तो और जो समाचार पत्र अपने उच्च नैतिकता के स्तर के लिए जाने जाते हैं उनमें भी ऐसे चित्र एवं विज्ञापन छपते हैं जो अश्लीलता की हदों को पार करते नजर आते हैं और जो कभी पीली किताबों में और उनके मुखपृष्ठों पर ही जगह पाते थे। कहां तो गांधी-नेहरु-सावरकर जैसे समाज को, देश को दिशा-दर्शन देनेवाले त्यागी नेता थे जिनके आदर्शों को सामने रख कई युवा चले, देश के लिए लडे, त्याग भी किया, आदर्श उपस्थित किया और आज के नेता स्वार्थलिप्सा में रत हैं। भ्रष्टाचार और अनैतिकता के नित नए रिकार्ड कायम कर रहे हैं। संक्षेप में समाज पतन के गर्त में जा रहा है यह इन समाज के प्रति सद्‌भाव रखनेवाले भावुकों का कहना है, निष्कर्ष है।

परंतु, हमारा जो कथन है कि यह वस्तुनिष्ठ नहीं वह इस आधार पर कि 1947 के आसपास का काल संकटकाल था, दुःखोपभोग का काल था। ऐसे समय में समाज एकजुट हो ही जाता है। क्योंकि, सबकी पीडा-दुःख एक जैसे ही होते हैं और दुःखों के लिए छीनाछपटी नहीं होती। उसे तो आपस में मिलकर बांटना होता है, बांटा जाता है। पर अब जबकि संकटकाल नहीं प्रत्युत  सुखोपभोग के लिए प्रतिस्पर्धा का काल है, सुखों के लिए छीनाछिपटी होती है। वह पीढ़ी लडी दुःखों को दूर करने के लिए, आनेवाली पीढ़ियां सुखोपभोग करें इसलिए। और हम लड रहे हैं हमें तो सुखोपभोग मिले ही साथ ही हमारी आनेवाली पीढ़ियों को भी मिले इसलिए। यही मुख्य फर्क है उस समय में और आज के समय में। इसी सुखोपभोग की लालसा के कारण से ही भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अनाचार-दुराचार पनपते हैं। और यह सब टालने के लिए प्रयत्न किए जाने पडते हैं, किए जाने चाहिएं। इसके लिए उचित वातावरण का निर्माण करना पडता है, आदर्श प्रस्तुत करना पडते हैं, जो उच्च नैतिक आचरण से ही संभव होते हैं। कोरी चिंता प्रकट करते रहने से कुछ नहीं होता। सिवाय मनःस्ताप के।

परंतु, हो यह रहा है कि आज जिन के कंधों पर समाज के प्रबोधन की जिम्मेदारी है वे लोग यह कार्य करने की बजाए कहते फिर रहे हैं कि अपना तो समाज ही पाखंडी है, हममें सामाजिक संस्कार ही नहीं हैं। हमें हमारा विधायक भ्रष्ट, स्वार्थी और पदलोलुप जान पडता है। यह हमारे विधायक का दोष नहीं है। क्योंकि, वह तो प्रतिनिधि है, प्रतिबिंब है, उस समाज का, जो स्वयं भ्रष्ट और स्वार्थी है। अस्तु विकृति नेतृत्व में नहीं बल्कि उस समाज में है जो उसे चुनता है। कई लोगों का राजनीति में प्रवेश को लेकर विरोध होता  है यह कहकर कि राजनीति भ्रष्ट है यहां अच्छे लोगों के लिए स्थान नहीं। भ्रष्टाचार कहां नहीं है ! स्वास्थ्य क्षेत्र में भी तो गजब का भ्रष्टाचार है, मेडिकल सिंडीकेट ने लूट मचा रखी है तो, क्या अच्छे लोगों ने इस क्षेत्र में जाना छोड देना चाहिए? सैन्य क्षेत्र के कुछ उच्च अधिकारियों पर भी भ्रष्ट आचरण के आरोप लग रहे हैं तो क्या अच्छे, योग्य देश के लिए कुछ कर गुजरने का माद्दा रखने की इच्छा वाले उम्मीदवारों को सेना में जाना छोड देना चाहिए? समाज सेवा के क्षेत्र में पाखंडी और भ्रष्ट लोगों की भरमार हो गई है। इसलिए क्या सेवाभाव से दान देना छोड देना चाहिए। क्या ऐसे लोगों को नहीं ढूंढ़ा जाना चाहिए जो वास्तव में सेवा कर रहे हों और उनकी सहायता करना चाहिए, जुडना चाहिए या समाज सेवा के क्षेत्र को उपेक्षित छोड देना चाहिए। ऐसी सोच से तो कोई भी अच्छा व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकेगा और सभी ओर चोर, भ्रष्ट लोगों का ही कब्जा हो जाएगा। वास्तव में अच्छे, योग्य कुछ कर गुजरने की इच्छा रखनेवालों को जीवन के इन कठिन क्षेत्रों की ओर जाना ही चाहिए तभी कुछ सुधार संभव है केवल आलोचना करते रहने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। शिक्षा क्षेत्र में भी तो आज से नहीं बल्कि बरसों से विविध रुपों में भ्रष्टाचार, आपाधापी मची है। इसलिए क्या विद्या दान जैसे अच्छे क्षेत्र में योग्य लोगों को नहीं जाना चाहिए? यदि नहीं गए तो अच्छे नागरिक कौन तैयार करेगा !   

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कुछ करना ही नहीं चाहते वह यह कहकर विरोध करते हैं कि प्रजातंत्र में 'यथा प्रजा तथा राजा" होता है। अपन कर ही क्या सकते हैं? यह कथन कुछ गलत भी नहीं है। परंतु, क्या यहीं पूर्णविराम लगा दिया जाए! क्या समाज अकर्मण्य अवस्था में है इसलिए अकर्मण्य नेताओं को ही राज करने दिया जाए! नहीं! इसके लिए समाज के ऐसे विचारकों-समाजसुधारकों को आगे आना होगा जो सत्ता की राजनीति से दूर रहकर समाज के प्रबोधन का कार्य करें समाज में जिम्मेदारी का, सेवा का भाव अपने आचरण से जगाएं। अच्छे लोगों को राजनीति में जाने के लिए प्रेरित करें। हमारे समाज में आज भी देशभक्ति, उच्च नैतिकता, भ्रष्टाचार को न चाहने की भावनाएं मौजूद हैं। लेकिन इनका प्रदर्शन समाज केवल तभी करता है जब संकटकाल हो, जैसे कारगिल युद्ध या 1971, 1962 के पाकिस्तान-चीन से हुए युद्ध। और फिर से अपने पुराने ढ़र्रे पर लौट आता है। यह भी सच है कि समाज का चाहे जितना प्रबोधन किया जाए तो, भी समाज में अवांछित तत्त्व तो रहेंगे ही। जो हर काल में रहते ही हैं कभी कम तो कभी ज्यादा। समाज तो बेलन जैसा होता है जिसके दो छोरों में से एक छोर होता है उच्च नैतिक आचरण-आदर्श के हामी नेतृत्व का और दूसरा इसके विपरीत होता है। जो छोर-पक्ष प्रबल होता है वो बेलन के मोटे भाग को यानी समाज को उसी दिशा में ले जाता है। हम भगवान राम को इसीलिए आदर्श राजा मानते हैं क्योंकि, उन्होंने उच्च आदर्शों-मर्यादाओं का प्रदर्शन किया और समाज को भी वैसा ही बनाया तभी तो उनके राज्य में एक कुत्ता भी न्याय मांगने आ सकता था। शिवाजी पडौस के घर में पैदा हो वह कुछ करे फिर हम जयजयकार करने पहुंच जाएंगे, हमारे घर में तो कार्पोरेट सेक्टर में जाकर पैकेज संस्कृति वाला ही पैदा होना चाहिए की सोच मे बदलाव लाने की आवश्यकता है।

Thursday, 17 November 2011

सावरकर - सूर्य नमस्कार 2 !

सावरकर - सूर्य नमस्कार ! 

सावरकर नाम है एक बहुआयामी व्यक्तित्ववाले आज के युग के मानवतावादी महर्षि का! एक ऐसे प्रखर सूर्य का जिसके प्रखर हिंदुत्व दर्शन के कारण अच्छे-अच्छों की आँखें चौधिया गई थी। परंतु, इसी कारण से उनके अन्य समाजोद्धारक विचार व आचार उपेक्षित ही रह गए। विशेष रुप से मूलतः भक्तिभावी स्वभाव के हम लोगों को आचरण पसंद नहीं। इसीलिए तो सावरकर का समाज-सुधार जो एक जमाने में गाया जाता था वह आज सुनने को भी नहीं मिलता।

वीर सावरकर का हिंदू-राष्ट्र कोई एकांगी, फुसफुसा अथवा अस्थायी आधार पर खडा किया हुआ नहीं है। हिंदू-राष्ट्र के प्रबल व प्रभावी निर्माण के लिए राज्यक्रांति के समान ही समाजक्रांति भी की जाना आवश्यक है। एक क्रांति के बिना दूसरी क्रांति घटित होना ही कठिन; घटित हुई भी तो टिकना तनिक भी संभव नहीं। हिंदू संगठन के आंदोलन की तत्त्वात्मक और कार्यात्मक योजना वीर सावरकर अंडमान से रिहा होने के पूर्व से ही आंक रहे थे। सन्‌ 1924 में वे कैद से छूटकर रत्नागिरी में स्थलबद्ध हुए। उस दिन से उन्होंने इस योजना की उसके इस दोहरे स्वरुप की कार्यवाही को करना प्रारंभ किया। तभी से वे प्रचार करने लगे और उनके कार्यक्रम स्थलबद्धता की चौखट में बैठ सकें ऐसे प्रत्यक्ष प्रयोग भी उन्होंने चालू किए। उन्होंने उनके अंगोपांगो का विशदीकरण करनेवाले अनेक स्वतंत्र ग्रंथ और श्रद्धानंद, केसरी, किर्लोस्कर आदि सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में स्फुट लेख भी लिखे थे।

1924 में सशर्त रिहा होने के बाद पहले तीन साल यानी 1926 के अंत तक सावरकरजी ने अस्पृश्यता निवारण, स्वदेशी प्रचार और बलसंवर्धन के लिए व्यायामशालाओं का प्रसार इन तीन बातों पर मुख्यतः बल दिया। आगे पूरे महाराष्ट्र में उनके जिस भाषाशुद्धि के आंदोलन नेे खलबली मचा दी उस भाषाशुद्धि का कार्य भी इसी काल में शुरु हुआ था। इसके उदाहरण हैं ः 'हवामान"  को 'ऋतुमान", रत्नागिरी के 'नेटिव्ह जनरल लायब्ररी" का रुपांतर 'नगरवाचनालय" या 'नगर ग्रंथालय" में हुआ। इसी प्रकार से पाठशालाओं में 'हाजिर" के स्थान पर 'उपस्थित" की पुकार करना, आदि। किसी भी नई बात के आरंभकाल में जैसी हेठी, निंदा होती है उसी प्रकार की भाषाशुद्धि के मामले में भी घटित होने लगी। इसी काल में सावरकरजी ने विद्यार्थियों के लिए हिंदी की कक्षाएं चलाई। सावरकरजी को हिंदी ही राष्ट्रभाषा के रुप में अभिप्रेत थी। मगर वह हिंदी संस्कृतनिष्ठ होना चाहिए, ऐसा उनका आग्रह था। उन्होंने लिपिशुद्धि और भाषाशुद्धि मंडलों की स्थापना की, जातिभेदोच्छेदक संस्थानों को जन्म दिया। पहले भारतीय वायुवीर रत्नागिरी के कॅप्टन दत्रातय लक्षमण पटवर्धन तथा 'डी लॅकमन" की देखरेख में 'रायफल क्लब" की स्थापना की। सावरकरजी ने  समाजक्रांति को पूरक ऐसा एक 'अखिल हिंदू उपहार गृह" शुरु किया। उस उपहार गृह के संचालक श्री गजाननराव दामले थे। वहां चाय-चिवडा महार के हाथ से मिलता था। वहीं सावरकरजी अतिथियों से मिलते थे।

अस्पृश्योद्धार के साथ ही सावरकरजी का शुद्धिकरण का कार्य भी शुरु था। उनके द्वारा किया गया महत्वपूर्ण शुद्धिकरण था धाक्रस परिवार का। दस पंद्रह वर्ष पूर्व ईसाई बन चूके इस परिवारा को सावरकरजी ने शुद्धि समारोह कर फिर से हिंदू धर्म में लिया था। समाज में समरस किया इतना ही नहीं तो उनकी दो उपवर कन्याओं के विवाह योग्य ऐसे वरों से करा दिए। और एक लडकी के विवाह में तो श्री धाक्रस के आग्रह पर कन्यादान भी किया। सावरकरजी द्वारा प्रचारित बातों से अब समाज अभ्यस्त होने लगा था। परंतु, इस पर संतुष्ट न रहते गतिमान रहना सावरकरजी के किसी भी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण भाग होता था। इसलिए देवालय की 'सीढ़ी के बाद सभा मंडप आंदोलन" सावरकरजी ने शुरु किया। स्पृश्यास्पृश्यों के समिश्र मेले सभा मंडप में जाने पर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं इस प्रकार का प्रचार शुरु किया। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अस्पृश्य माने गए बंधुओं को साथ लेकर वे मंदिर जाने लगे। इस आंदोलन को लेकर अनेक लोग उन्हें छोडकर जाने लगे। बस सुधारक ही बचे रह गए। सामान्य लोगों को अस्पृश्यों का देवालय प्रवेश उस काल में भयंकर भ्रष्टाचार लगा इसमें कोई आश्चर्य नही। सावरकरजी अपने किसी भी नए आंदोलन का उपक्रम सार्वजनिक गणेशोत्सव और रत्नागिरी के पुरातन श्री विट्ठल मंदिर से करते थे। गणेशोत्सव समिति सावरकरजी का व्यासपीठ था। अस्पृश्यता धर्मसम्मत होने के कारण उसका पालन किया जाना चाहिए ऐसा कहे जानेवालों के व्याख्यानों का आयोजन जानबूझकर सनातनी करते थे। तो, अस्पृश्यता निषेध के सुधारक। इस प्रकार की यह खींचतान लगभग दो साल चली।  इस कारण समाज ऊपर से नीचे तक हिल उठा।  अस्पृश्यता बाबद अनुकूल या प्रतिकूल चर्चाओं के बिना रत्नागिरी में अन्य विषय ही नहीं बचा था।

1928 में दशहरे के शुभ दिन, परधर्मियों को हम अपने घरों में जहां तक प्रवेश देते हैं वहां तक तो भी अस्पृश्यों को प्रवेश देने के लिए तैयार हिंदू नागरिकों के घरों में, अपने सवा सौ अनुयायियों और 8-10 अस्पृश्यों सहित सावरकरजी ने समारोहपूर्वक प्रवेश किया और उन सभी के नाम प्रकाशित किए गए। पाठशालाओं में भी अस्पृश्य समझे जानेवाले बच्चों को मिश्रित रुप से बैठाया जाए, उन्हें पाठशालाओं के बरामदों अथवा कक्षा में एक ओर न बैठाया जाए। यह बात सावरकरजी हिंदू संघटन की दृष्टि से अत्यंत ठोस और मूलगामी समझते थे। परंतु, सावरकरजी के इस आंदोलन को भी तीव्र विरोध का सामना करना पडा। कई पाठशालाओं में शिक्षकों की हडतालें हुई तो, कई गांवों में गांववासियों ने विरोध किया। कुछ स्थानों पर स्पृश्यों द्वारा दिए गए स्थान वापिस ले लिए गए। तो कुछ स्थानों पर अस्पृश्यों ने यदि अपने बच्चों को पाठशालाओं में भेजा तो बहिष्कार किया जाएगा की धमकियां दी गई। 

देवालय प्रवेश के साथ ही सावरकरजी को समाज के पतन का कारण बनी 'बंदियों" को तोड डालना था और इसलिए पुराने देवालयों में अस्पृश्यों के प्रवेश आंदोलन के साथ ही जिस देवालय में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के समान प्रवेश और अन्य अधिकार होंगे ऐसा अखिल हिंदुओं के लिए श्री पतित पावन मंदिर का निर्माण सेठ श्री भागोजी कीर की सहायता से किया। 10 मार्च 1929 को मंदिर का शिलान्यास श्रीमत्‌ शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी के करकमलों द्वारा हुआ। उपस्थित स्पृश्यास्पृश्यों के प्रचंड जनसमुदाय के सामने सावरकरजी ने इस देवालय के उद्देश्यों की रुपरेखा निम्नानुसार कथन की -

1). इस देवालय में शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी भगवान श्रीविष्णू की देवी लक्ष्मी सहित स्थापना की जाएगी। 2). उस मूर्ति की पूजा करने का अधिकार जातिनिर्विशेष ढ़ंग से सभी हिंदुओं को समान रुप से रहेगा। 3). मगर, ऐसी पूजा करनेवाले को सर्वप्रथम देवालय के प्रांगण में स्नान कर व शुद्ध वस्त्र धारण करने के बाद में ही पूजा के लिए मंदिर के गर्भगृह में जाने का अधिकार होगा। 4). देवालय का पुजारी 'स्वधर्मक्षम" होना चाहिए, फिर वह किसी भी जाति का हो। इस प्रकार सभी हिंदुओं के लिए खुला रहनेवाला देवालय अखिल महाराष्ट्र तो क्या परंतु, अखिल भारत में भी दुर्लभ होने के कारण इस मंदिर को एक विशिष्टता प्राप्त हुई। इस समय  सावरकरजी ने अपने भाषण में कहा था ''अस्पृश्यों को प्रेम से स्पृश कर उनका अंगीकार करनेवाले दो ही शंकराचार्य हुए हैं। पहले, पीठ स्थापक आद्य शंकराचार्य काशी में स्नान कर वापिस आते समय मार्ग में अद्वैत तत्त्वज्ञानी अस्पृश्य को आलिंगन देनेवाले और दूसरे यह शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी जो अखिल हिंदुओं के प्रतिनिधि के रुप में आए हुए पांडु विठु महार को हार और हाथ अपने गले में डालने देकर उस पांडोबा के साथ ही स्वयं भी कृतार्थ हुए। यह श्री पतित पावन मंदिर स्मृति है सनातनियों के विरोध की परवाह न करते अस्पृश्यता के कलंक को धो डालने के वीर सावरकर के क्रांतिकारी कार्य की।

श्री पतित पावन मंदिर के कारण सावरकरजी को बिना किसी अवरोध के सामाजिक क्रांति का कार्य करने के लिए स्वतंत्र व्यासपीठ प्राप्त हुआ। जब सनातनियों ने अस्पृश्यों को गणेशोत्सव के लिए विट्ठल मंदिर के सभामंडप में प्रवेश को नकारा तो, सावरकरजी ने सभासदत्व से त्यागपत्र देकर अखिल हिंदू गणेशोत्सव में भाग ले सकें ऐसा अखिल गणेशोत्सव श्री पतित पावन मंदिर में शुरु किया। इसी उत्सव में डेढ़ हजार स्त्रियों द्वारा भाग लिया हुआ हल्दी-कुंकु कार्यक्रम भी संपन्न हुआ। विशेष रुप से दर्ज करने लायक बात है पांच अस्पृश्य लडकियों द्वारा गायत्री मंत्र पठन की स्पर्धा में भाग लेना। शिवू भंगीने शास्त्रशुद्ध स्वरों में सैंकडों लोगों के सामने तीन बार गायत्री मंत्र का उच्चारण कर पुरस्कार जीता। सबसे महत्वपूर्ण बात थी सावरकरजी द्वारा 'हिंदुओं के जातिभेद" इस विषय पर हुए व्याख्यान। हिंदूजाति की वर्तमान दुर्बल, अव्यवस्थित स्थिति के लिए महत्वपूर्ण कारण है 'हिंदुओं के बीच का जातिभेद"। हिंदुओं की  शक्ति को बांझ कर डालनेवाली अधिकांश सभी दुष्ट रुढ़ियों का मूल इस जातिभेद में ही है, ऐसी उनकी दृढ़ धारणा थी। और इसीलिए जातिभेद के उच्छेदन का आंदोलन उन्होंने हाथ में लेना तय किया।

उन्होंने केसरी में 'जातिभेद के इष्टनिष्टत्व" इस शीर्षक तले लेखमाला लिखी और इस प्रश्न को महाराष्ट्र में गति दी। प्रचलित जातिभेद की अनिष्टता युवाओं के मानस पर अंकित होना चाहिए इसलिए उन्होंने रत्नागिरी में युवाओं का 'हिंदू मंडल" स्थापित कर उसमें जातिभेद के अनिष्टत्व को सिद्ध करने के लिए चर्चा करते थे। उनका कहना था जातिभेद सप्तपाद प्राणी है। वे पांव हैं - वेदोक्तबंदी, सिंधुबंदी, शुुद्धिबंदी, स्पर्शबंदी, रोटीबंदी व बेटीबंदी। इनमें से मुख्यतः तीन पांव स्पर्शबंदी, रोटीबंदी और बेटीबंदी तोडी कि जातिभेद समाप्त हुआ ही समझ लीजिए। इसके लिए 'जातिभेदोच्छेदनार्थ अखिल हिंदू सहभोजन करिष्ये" इस प्रकार का संकल्प कर सहभोजन होना चाहिए। 16 सितंबर 1930 को पहला सहभोजन रत्नागिरी में हुआ। इस समारोह के कारण रत्नागिरी ही नहीं तो पूरे महाराष्ट्र में खलबली मच गई। रत्नागिरी में पहले से ही चल रहे सावरकरजी के भाषाशुद्धि, लिपिशुद्धि, अस्पृश्यता निवारण, शुद्धिकरण, पाठशालाओं में अस्पृश्य बच्चों को मिश्रित ढ़ंग से बैठाना, 'अखिल हिंदू उपहारगृह की स्थापना", अस्पृश्यों का देवालय प्रवेश, अस्पृश्यों के साथ हिंदू नागरिकों के घरों में प्रवेश आदि अभियानों के बाद अब जातिभेदोच्छेदनार्थ सहभोजन ने आग में घी डालने का काम किया। पहले से ही उन्हें रुढ़ीप्रिय समाज पाखण्डी, 'सबगोलंकारी" अर्थात्‌ छूत-छात न माननेवाला कहता था। पहले कुछ अनुयायी मंदिरों में अस्पृश्यों के साथ प्रवेश प्रकरण के कारण छोड गए थे अब उसमें और बढ़ोत्री हुई। तथापि, 'वरंजनहितं ध्येयं न केवला न जनस्तुती" इस ध्येय वाक्य से प्रेरित सावरकरजी ने चिंता न की।

जात्युच्छेदक सहभोजनों और सहभोजकों का सनातनियों द्वारा बहिष्कार की धूम मची हुई थी कि जिस देवालय में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के समान ही प्रवेश और अन्य सभी प्रकार के अधिकार हों ऐसे 'अखिल हिंदुओं के लिए श्रीपतितपावन मंदिर" जो सेठ भागोजी कीर की सहायता से निर्मित किया गया था के उद्‌घाटन के समय श्री भागोजी कीर जाति से भंडारी होने के कारण वेदोक्त पद्धति से हम धार्मिक विधि नहीं करेंगे, ऐसा शास्त्री-पंडितों ने कहा, तब सावरकरजी एक ओर तथा शास्त्री-पंडित दूसरी ओर इस पद्धति से दो दिन तक शास्त्रार्थ चला। सावरकरजी का धर्मग्रंथों का अध्ययन कितना प्रबल है इसका प्रत्यय सबको इस समय हुआ। शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी ने भागोजी कीर के कर कमलों द्वारा वेदोक्त विधि से धार्मिक विधि होने में कोई आपत्ति नहीं ऐसा निर्णय दिया। फिर भी शास्त्री-पंडितों को वह मान्य नहीं हुआ। श्रद्धालु प्रकृति के सेठजी ने कहा पुराणोक्त तो पुराणोक्त परंतु, मूर्ति की प्रतिष्ठा समय पर हो। सावरकरजी तत्काल बोले प्रत्येक हिंदू को वेदोक्त अधिकार है। इस सिद्धांत का त्याग करना हो तो, सबसे पहले मेरा त्याग करो। परंतु, यदि सिद्धांत का त्याग नहीं करनेवाले हो तो पूर्वास्पृश्यों का जो हजारों का समुदाय आज आया हुआ है उन हजारों हिंदुओं के हाथों से देवमूर्ति उठाकर जयजयकार कर हम उस मूर्ति की स्थापना करेंगे। यही हमारी विधि होगी। 'हिंदू धर्म की जय"  का हजारों कंठों से निकलनेवाला जयघोष ही हमारा वेदघोष होगा और 'भावेहि विद्यते देवो" हमारा शास्त्राधार।

अंत में मसूरकर महाराज के आश्रम के वे.शा.सं. विष्णू शास्त्री मोडक द्वारा महाराज की आज्ञानुसार कीर सेठजी के कर कमलों द्वारा वेदोक्त विधि से देवप्रतिष्ठादिक सारे धर्म विधि भलीभांति पूर्ण किए गए। और दिनांक 22 फरवरी 1931 को श्री पतितपावन की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा श्री शंकराचार्य के कर कमलों द्वारा 'हिंदू धर्म की जय" गगनभेदी नारों के साथ की गई। इस समारोह में पूणे के श्री राजभोग द्वारा शंकराचार्यजी की पाद्यपूजा की गई। दूसरे दिन दि. 23 को अन्नसंतर्पण के कार्यक्रम में 'सावरकरजी का पाखंडी सहभोजन नहीं होना चाहिए" का आग्रह अनेक सनातनियों के साथ ही श्री मसूरकर महाराज, संत पाचलेगांवकर महाराज और स्वयं डॉ. कूर्तकोटी ने भी किया। सहभोजन, जातिउच्छेदन इस प्रकार के आंदोलन आततायी और पांखडी हैं। सावरकरजी के इन आंदोलनो को हमारी बिल्कूल भी सहमति नहीं है, ऐसा वे जाहिर रुप से कहने लगे।

परंतु, इस अन्नसंतर्पण का जात्युच्छेदक सहभोजन कार्यक्रम सावरकरजी द्वारा स्थगित किया जाना संभव ही नहीं था। इस समारोह में दूर-दूर से आए हुए लोगों को रत्नागिरी में की गई सामाजिक क्रांति का प्रदर्शन दिखाने का अवसर गंवाना सावरकरजी जैसे आग्रही प्रचारक को मान्य होनेवाला नहीं था। उन्होंने कीर सेठजी के पास न्याय्य मांग की ''अन्न संतर्पण के भोजन की इच्छा रखनेवालों की स्वतंत्र पंगत रखने की व्यवस्था करें, जो उस पंगत में बैठना चाहें बैंठे। सनातनियों की जातिगत पंगत का हम सहभोजक विरोध नहीं करेंगे। वे भी हमारी पंगत का विरोध ना करें। उनकी प्रामाणिकता को हम मान्य करते हैं। वे हमारी प्रामाणिकता को मान्य करें।"" सावरकरजी के जातिभेदोच्छेदक सहभोजन की परंपरा आगे चलकर हमारे इंदौर में भी चटनी-रोटी सहभोजन के रुप में पहुंची।

22 फरवरी को ही मंदिर के सभामंडप में दोपहर को मुंबई के अस्पृश्यता निवारक परिषद का छठा अधिवेशन हुआ। अध्यक्ष के रुप में सावरकरजी को चुना गया। सुभेदार घाटगे (पुणे) ने तो 'हमारे सच्चे शंकराचार्य" की उपाधि सावरकरजी को प्रदान की। स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा अधिक कर्मठ रुढ़ीग्रस्त होती हैं। इस कारण जात्युच्छेदन के आंदोलन ने स्त्रियों में जड पकडी तो वह अधिक शाश्वत स्वरुप का होने का संभावना थी। इसके लिए उनमें भी खुल्लमखुल्ला रोटीबंदी तोडने की प्रवृत्ति शुरु करना आवश्यक था। परंतु, यह काम सरल नहीं था। इसके लिए बहुत मेहनत करना पडी। वर्ष-दो वर्ष के प्रयत्नों के बाद तीस-पैतीस सुविद्य स्त्रियां और बीस-पच्चीस अस्पृश्य स्त्रियों का पहला सहभोजन 21 सितंबर को हुआ। इसी मंदिर में सावरकरजी अस्पृश्यों को यज्ञोपवित भी बांटते थे।

1933 में शिवरात्री पर रत्नागिरी में जन्मजात अस्पृश्यता का मृत्युदिवस मनाना रत्नागिरी की हिंदूसभा ने तय किया। उस 'दिन" के लिए पूणे के डिप्रेस्ड क्लास मिशन के कर्मवीर शिंदे और दलित वर्ग के नेता पा. ना. राजभोग आए थे। समारोह के अध्यक्षीय भाषण में कर्मवीर शिंदे, जिन्होंने अस्पृश्यता निवारण के कार्य में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया था, ने कहा ''रत्नागिरी के सामाजिक परिवर्तनों को मैंने सूक्ष्मता से देखा है। इस पर से मैं निःशंक रुप से कह सकता हूं कि, यहां घटित हो रही सामाजिक क्रांति अभूतपूर्व है, सामाजिक सुधार का कार्य मैंने जीवन भर किया है। वह इतना कठिन और क्लिष्ट है कि, मैं भी बीच-बीच में निरुत्साहित हो जाता हूं। परंतु, यह क्लिष्ट काम मात्र सात वर्षों में रत्नागिरी जैसे सनातनी नगर में सावरकरजी ने कर दिखाया। यह रत्नागिरी केवल अस्पृश्यता का उच्चाटन कर ही रुकी नहीं अपितु जन्मजात जातिभेद के उच्चाटन करने के लिए कटिबद्ध हुई। आप लोगों को अस्पृश्यों के साथ सहभोजन, सहपूजन आदि सारे सामाजिक व्यवहार प्रकटरुप से करते हुए मैंने देखा है। इससे मैं इतनी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं कि, यह दिन देखने के लिए मैं जीवित रहा बडा अच्छा रहा।  
 
वीर सावरकर की यह क्रांति आगे खंडित हो गई। परिणामस्वरुप 1927 में महाड में डॉ. आंबेडकर द्वारा की गई घोषणा 1956 के दशहरे पर अमल में लाई गई। परंतु, उसके पूर्व ''1938 में पूना ओ.टी.सी में एक दिन डॉ. आंबेडकर पधारे। उन्होंने डॉक्टरजी से पूछा, 'इन स्वयंसेवकों में कोई महार जाति के हैं क्या?" डाक्टरजी ने कहा, 'होंगे लेकिन हम उनकी जाति-वार याददाश्त नहीं रखते, इच्छा हो तो कमरे में चलकर जानकारी ले सकते हैं।" वे बोले, 'हॉं, मैं जानकारी लेना चाहता हूँ।" इस पर दोनो कमरे में गए और स्वयंसेवकों से पूछा, 'यहां कोई महार जाति के कोई हैं क्या?" कुल करीब 200 स्वयंसेवकों में से 8 या 9 स्वयंसेवक महार जाति के निकले। उनसे आंबेडकरजी ने पूछा, 'क्या आप अन्य स्वयंसेवकों के साथ ही खाना खाते हैं?" उत्तर मिला, 'जी हॉं," और सबने मिलकर बतलाया कि वहॉं वे कोई भेदभाव महसूस नहीं करते।"

आंबेडकर आश्चर्य-चकित हो गए और बोले, 'मैंने ऐसा दृश्य अपने जीवन भर कहीं नहीं देखा। परंतु डॉक्टर! आपके इस मार्ग से पूरी महार जाति का उद्धार करने में सैंकडों साल लग जाएंगे। मुझे उतना 'धैर्य" नहीं है। इनका उद्धार तुरंत हो, ऐसी मेरी इच्छा है।" डाक्टरजी हॅंसकर बोले, 'आपकी इच्छा ठीक है, पर मैं कहूँगा, 'हेस्ट मेक्स वेस्ट" और इतना कहकर डॉक्टरजी आंबेडकरजी को अपने साथ अपने निवास-स्थान पर ले चले गए।""(राष्ट्रधर्म मार्च 1989पृ.102 युगान्तर विशेषांक) 24 मई 1956 बुद्धजयंती पर नरे पार्क में डॉ. आंबेडकर ने निर्वाण की घोषणा की कि 14 अक्टूबर 1956 विजयादशमी को अनुयायियों सहित मैं बौद्धधर्म ग्रहण करुंगा। डॉ. आंबेडकर को इस विचार से परावृत्त करनेवाली एक भी हिंदू शक्ति नहीं थी ऐसा ही कहना पडेगा।

''डॉक्टर साहब के धर्मांतर करने के निश्चय का जब श्री गुरुजी को पता चला तब उन्होंने अविलम्ब ठेंगडीजी को डॉक्टर साहब के पास चर्चा करने हेतु भेज दिया। 'डॉक्टर साहब, सुना है कि आप हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले हैं?" 'हॉं,मैंने पक्का निर्णय किया है।" 'परंतु आप जो विचार बताते हैं वही सब हममें से कुछ युवक प्रत्यक्ष आचरण में अनेक वर्षों से ला रहे हैं।" 'आप युवक याने आर.एस.एस. ही है?"  'जी हॉं, हममें कुछ सवर्ण भी हैं, कुछ दलित वर्ग के भी हैं। जो सवर्ण हममें हैं वे ऐसा विचार करते हैं कि भूतकाल में हमसे जो कुछ पाप हुआ सो हो गया है उसका प्रायश्चित करने को हम तैयार हैं। हमको सब हिंदू मात्र का संगठन करना है।" 'बहुत ही अच्छा है परंतु इस पर मैंने कुछ सोचा ही नहीं ऐसी तुम्हारी धारण है क्या?" 'आपने इस पर सोचा नहीं होगा यह कैसे हो सकता है डॉक्टर साहब!" ठेंगडीजी ने कहा।

'तो फिर मेरे प्रश्न का उत्तर दो।" 'पूछिए आपका प्रश्न डॉक्टर साहब!" 'तुम्हारे आर.एस.एस. का कार्य कब प्रारंभ हुआ।" 'सन 1925 में।" 'याने कार्य प्रारंभ हुए कितने वर्ष हो गए?" 'साधारणतः 27-28 वर्ष।" 'देशभर में आर.एस.एस. वालों की कुल  कितनी संख्या है?" 'मुझे तो इसकी कल्पना नहीं है।" 'अच्छा! तो मेरे अनुमान से देशभर में 26-27 लाख स्वयंसेवक होंगे।" 'हो सकते हैं।" 'तो तुम ही बताओ कि 26-27 लाख सवर्ण और दलित लोगों को आपकी संस्था में लाने में अगर आपको 27-28 वर्ष लगे हैं तो पूरे दलित वर्ग को संघ में लाने के लिए कितने वर्ष लगेंगे?" 'परंतु... .. डॉक्टर साहब... 'बीच में मत बोलो। तुम क्या कहने वाले हो वह सब मुझे पता है। तुम जो geometricl progression बतानेवाले हो उसकी भी कुछ मर्यादा है। बकरी कितनी भी बडी हो जाए तो भी बैल नहीं बन सकती। मुझे अपने ही जीवन में इस समस्या का हल करना है। इसको निश्चित दिशा देनी है।""  ठेंगडी मौन रह गए।" (स्वदेश दीपावली विशेषांक 1973 पृ.25) और प्रत्यक्ष नागपूर में ही दशहरे के विजयदिवस पर तथाकथित अस्पृश्यों का बडा भाग हिंदूधर्म समाज से अलग हो गया।

Friday, 11 November 2011

समझें मुस्लिम मानस को

समझें मुस्लिम मानस को
प्राचीनकाल से ही भारत बहुधर्मीय देश रहा है और प्रारंभ से ही विभिन्न जनसमूहों को अपने-अपने धर्म, आचार-विचारों के पालन की, प्रचार की स्वतंत्रता रही है और विभिन्नताओं के बावजूद अनेकता में एकता यहां के समाज का मूलपिंड रहा है। समय-समय पर विभिन्न जनसमूह इस देश में आते रहे और यहां के जनसमूहों में विलीन होते चले गए। भले ही वे विभिन्न रंग, वंश, धर्म, विचारों-परंपराओं के थे। कहीं कुछ अलगत्व-विशेषता रही तो कहीं कुछ मात्रा में समानता भी आई और कालांतर में इस देश के रहवासियों को हिंदू नाम प्राप्त हुआ। इनमें कई संघर्ष भी हुए पर वे तात्कालिक ही सिद्ध हुए। इस प्रकार से विभिन्न जनसमूहों की विभिन्न श्रद्धाओं, आचार-विचारों का परस्पर आदर रखते हुए ऐतिहासिक प्रक्रिया से बने इस हिंदू समाज का एक सर्वसमावेशक मानस तैयार हुआ। जिसकी मुख्य मान्यता सभी धर्म सत्य हैं केवल मार्ग अलग-अलग हैं। यह समाज जितना संकुचित है उतना ही उदार भी है, ऐसा यह हजारों साल के संस्कारों से तैयार हुआ हिंदू समाज है, मानस है।

दूसरी ओर इस भारत का एक और अविभाज्य घटक है, मुसलमान। यह भी एक विशिष्ट समाज है। ये दोनो ही समाज एक हजार से भी अधिक वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं। परंतु, फिर भी हिंदू समाज मुस्लिम मानस से पूरी तरह परिचित नहीं। मुस्लिम मानस-समाज की पहली विशिष्टता जो एकदम ध्यान में आती है वह है उनकी धार्मिक कट्टरता। यही विशेषता हिंदु समाज की भी है। परंतु, एकदम से नजर नहीं आती। इसका कारण है उसके विरोध करने का तरीका। जो आक्रमक नहीं वरन्‌ उपेक्षा से मारता है और अपने धर्म-विचारों का पालन पूर्ववत ही करते रहता है। दूसरी ओर मुसलमान अपने धर्मविरोध का प्रतिकार बडी आक्रमकता से संघटित रुप में करते हैं। इसी के साथ वे अपने धर्म के प्रति बडे आग्रही भी होते हैं और इसका प्रदर्शन भी विविध रुपों में करते रहते हैंे इस कारण उनका विरोध कट्टरता तो तत्काल ध्यान में आ जाती है। परंतु, हिंदुओं की  नहीं आती।

मुस्लिम समाज की दूसरी विशेषता है स्वयं का अलगत्व-विशेषतत्व हमारा धर्म पूर्णत्व को प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ है की भावना के साथ टिकाए रखने के प्रति सतत प्रयत्नशील रहना। इसलिए अपने धर्म के आचार-विचारों में दूसरे धर्म के आचार-विचार न आ जाएं, अपना धर्म विशिष्ट और विशुद्ध बना रहे इस पर उनका ध्यान विशेषरुप से रहता है और इसीलिए वे अन्य धर्म-समाज की किसी भी  नई बात को स्वीकारने को तैयार नहीं होते। वस्तुतः सैकडों वर्षों से हिंदुओं के साथ रहने के कारण उन पर अनजाने में ही हिंदुओं के आचारों-विचारों, प्रथाओं-परंपराओं का प्रभाव पड चूका है। परंतु, ये सब बातें गैर-इस्लामी हैं कहकर उनके उलेमा उन्हें सतत चेताते रहते हैं। अनेक उलेमा तो उन्हें यह भी बताते रहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र, भौगोलिक राष्ट्रवाद, संविधान का सार्वभौमत्व  गैर-इस्लामी है। यह भी अपने धर्म को विशिष्ट-विशुद्ध रखने का ही भाग है। इस गुण विशेषता के कारण ही जिस प्रकार से प्राचीनकाल से ही इस देश में आते रहे कई अन्य जनसमूह यहां की मूलधारा में अपने अलगत्व-विशिष्टत्व को गंवाकर विलीन हो गए  ऐसा मुसलमानों के साथ हो न सका है। उल्टे भारत ही नहीं तो सारे संसार के लोगों द्वारा इस्लाम का स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि, वही सत्यधर्म है (12ः40) और कभी ना कभी ऐसा होकर रहेगा। सर्वत्र अल्लाह का दीन इस्लाम (3ः19) प्रस्थापित होकर रहेगा ही ऐसा उन्हें प्रामाणिकता से लगता रहता है। क्योंकि, ये अल्लाह के वचन हैं, आश्वासन है।(9ः33)

मुस्लिम समाज की तीसरी विशिष्टता अपना धर्म ईश्वरीय, एकमेव सत्य संपूर्ण जीवन का मार्गदर्शन करनेवाला, परिपूर्ण, आदर्श, शाश्वत, अंतिम व अपरिवर्तनीय है। (5ः3) इस कारण इसमें किसी भी तरह का सुधार-बदलाव हो ही नहीं सकता। इसलिए हर नई बात स्वीकारने के पूर्व वे उसका आधार अपने धर्म में ढूंढ़ते हैं, देते हैं, उसे अपने धर्म की चौखट में बैठाते हैं उसके बाद ही स्वीकारते हैं। साथ ही कुरान वचनों (3ः110, 2ः47, 58ः11) के कारण वे स्वयं को अल्लाह के पसंदीदा होने के कारण अन्यों से श्रेष्ठ-उच्च दर्जे के हमेशा विजयी होनेवाले और राज्य करने का अधिकार तो हमे ही है (21ः105, 24ः55) की भावना वाला समुदाय है। और यह भावनाएं कहीं कम ना हो जाएं इस ओर मुस्लिम विद्वान बडे सचेत रहकर अपने समाज में हमेशा यह उपर्युक्त भावनाएं भरने में लगे रहते हैं। 

चौथी विशिष्टता, जो बात इस्लामधर्म में नहीं है या इस्लाम विरोधी है वह हमें स्वीकार्य नहीं, ऐसा वे लाख कहें तो भी अनेक सुधार  उन्होंने भी अनजाने में ही अथवा धर्म के सील-सिक्के लगाकर स्वीकार लिए हैं। वैसे भी धर्म की सभी बातों का पालन अचूक रुप से असंभव सा ही है। ऐसे समय में मुस्लिम समाज अपने पैगंबर के जीवन चरित्र का आधार लेकर तालमेल बैठा लेते हैं। इसके लिए वे अपने पैगंबर के मक्काकालीन जीवन चरित्र का आधार लेते हैं। जहां बहुसंख्य अनेकेश्वरवादियों/मूर्तिपूजकों से उन्होंने तालमेल बैठाया था। उसके लिए पैगंबर ने 'सब्र करो" का उपदेश दिया था, प्रतिकार का नहीं। 'सब्र" का वर्णन कुरान में सत्तर से अधिक बार हुआ है। इससे उसकी आवश्यकता और महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।" यह परिस्थितिनुसार तालमेल बैठा लेने की नीति का भाग है। जिसके लिए कुरान में भी आया हुआ है ''अल्लाह किसी शख्स पर उसकी शक्ति से जियादः बोझ नहीं डालता।""(2ः286) इस प्रकार से मुस्लिम समाज पैगंबर के आदर्श जीवन चरित्र और कुरान का आधार लेकर आग्रही धर्मश्रद्ध रहते हुए किन परिस्थितियों में कैसे रहना का मार्गदर्शन करनेवाले इस्लाम का व्यवहारिक समाज है। और यह बडी ही महत्वपूर्ण विशिष्टता है जो ध्यान में रखने योग्य है।

इस्लाम में सुधार

इस्लाम में सुधार
मक्का में मुहम्मद साहेब ने पहले-पहल अपने दीन-ए-इस्लाम का प्रचार करने के लिए शांति का मार्ग अपनाया। इसके तहत मन और बुद्धि से सहमत हो और अच्छा लगे तो इस्लाम की ओर आओ और न आने पर परलोग के अजाब (दंड) का डर बतलाने का मार्ग अपनाया। परंतु, यह शांति का मार्ग कुछ काम न आया उल्टे उन्हीं के प्राण संकट में पड गए। (वैसे भी इस मार्ग से अल्लाह का उद्देश्य सर्वत्र 'दीन अल्लाह ही का हो जाए" पूर्ण होनेवाला भी नहीं था) और उन्हें हिजरत (देशत्याग) कर मदीना जाना पडा। और वहां जाकर उन्होंने अरबस्थान का वही परंपरागत तलवार का मार्ग अपनाया तथा वे सफल भी हुए। और देखते ही देखते संपूर्ण अरबस्थान को इस्लाम के रंग में रंग दिया। परंतु, अपने जीते जी ही उनके ध्यान में यह बात अच्छी तरह से आ गई थी कि अधिकांश टोलियों का इस्लाम स्वीकार दिखावटी है और इसकी प्रतीती कुरान (49ः14) में भी व्यक्त हुई है तथा यह सत्य भी सिद्ध हुई। लेकिन मुहम्मद साहेब कोई साधारण धर्म प्रचारक तो थे नहीं। धर्म प्रचारक होने के साथ-साथ ही वे चतुर-सुजान राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ होने के अलावा दूरदृष्टा भी थे। तभी तो इन दिखावटी इस्लाम स्वीकारने वालों का (इन्हें कुरान में मुनाफिक कहा गया है) बंदोबस्त इस प्रकार की हदीसों द्वारा कर दिया गया। हदीस कथन है ः 'अल्लाह ने तेरे लिए जो निर्णय लिया हुआ है वह तू टाल नहीं सकता। और अगर तू इस्लाम से दूर जाएगा तो अल्लाह तेरा निश्चय ही नाश करेगा।"(बुखारी 3620, 7461)  पैगंबर ने कहा ः'जो इस्लाम धर्म का त्याग करता है, उसे मार डालो।"(बुखारी 3017,6922,7362) साथ ही दूसरे धर्मानुयायियों की संगत में रहकर कहीं दीन-ए-इस्लाम की शुद्धता कम ना हो जाए या कोई बदलाव ना आ जाए या इस तरह के कर्मों गतिविधियों को यानी इस्लाम-त्याग को प्रोत्साहन ना मिलने पाए इस दृष्टि से भी प्रबंध करते हुए पैगंबर ने कह दिया 'मैं अरब भूमि में मुस्लिमों के सिवाय अन्य किसीको भी रहने न दूंगा।"(दाउद 3024) अल्लाह ने भी फरमा दिया ''जो कोई इस्लाम के सिवा किसी और दीन को अपनाएगा तो वह उससे हरगिज कुबूल नहीं किया जाएगा और आखिरत में वह नामुराद होगा।""(3ः85)

भले ही मुहम्मद साहेब और उनके अल्लाह ने इस्लाम का त्याग न होने पाए इसके लिए इतने सारे पुख्ता प्रबंध कर दिए थे फिर भी उनकी मृत्यु होते ही इतने बडे स्तर पर इस्लाम का त्याग हुआ कि इन धर्मत्यागियों के विरुद्ध छेडे गए जिहाद को इतिहासकारों द्वारा 'धर्मत्याग के दावानल" की संज्ञा दी गई। पैगंबर की मृत्यु (632ई.) होते ही कुछ ने पुनः मूर्तिपूजा प्रारंभ कर दी तो कइयों ने 'जकात"  देने से इंकार कर इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक को ठुकरा कर एक प्रकार से इस्लाम का त्याग ही कर दिया, तो कुछ ने स्वयं को ही पैगंबर घोषित कर अनुयायी इकट्ठे कर लिए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि, उन्होंने इस्लाम को दिल से कुबूल नहीं किया था। वैसे भी पुरानी श्रद्धाएं इतनी आसानी से मिटती नहीं और न ही मानसिकता रातो-रात बदली जा सकती है। ये तो मुहम्मद साहेब की तलवार का ही आतंक था कि जिससे डरकर अरब टोलियों ने इस्लाम का स्वीकार किया था। उनके आतंक का पता इस हदीस कथन में मिलता है ''मेरी ऐसे रोब (आतंक) के द्वारा मदद की गई है कि अगर दुश्मन एक माह के अंतराल पर भी हो तो उस पर रोब तारी होगा।""(दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 1 पृ.223) इसके अलावा युद्धलूट के 4/5 भाग के रुप में धन-संपत्ति और सुंदर औरतें तथा मरने के बाद हमेशा के लिए स्वर्ग तथा वहां उपभोग के लिए हमेशा जवान बनी रहने वाली हूरें, मेवे तथा शराब मिलने के धार्मिक आश्वासन के कारण भी अरब टोलियां इस्लाम के नियंत्रण में रही और मौका मिलते ही इस्लाम को छोडकर भाग खडी हुई।

असगर अली इंजीनिअर ने अपनी पुस्तक Islamic State में पृ.37 पर लिख रखा है 'अधिकांश अरब टोलियों ने  इस्लाम का स्वीकार उस पर गहरी श्रद्धा के कारण नहीं वरन्‌ उस क्षेत्र की वह बढ़ती हुई शक्ति के होने के कारण किया था। इस्लाम के अध्ययनकर्ता स्प्रेंगलर के मतानुसार पैगंबर की मृत्यु के समय सच्चे अर्थों में इस्लाम स्वीकारने वालों की संख्या एक हजार से अधिक नहीं थी।"(Why I am not a Muslim-Ibn Warraq P.242)

पैगंबर की मृत्यु के बाद 'खलीफातुल रसूल" पदनाम धारण कर पहले खलीफा बने अबू बकर (632 से 634ई.) ने अब धर्म परिपूर्ण हो गया है उसमें किसी भी तरह की तोड-फोड बर्दाश्त नहीं की जाएगी कहकर इन विद्रोही तत्त्वों के विरुद्ध किसी भी तरह का समझौता न करते जिहाद छेड दिया और विद्रोह को कुचलकर रख दिया और अरबभूमि को एक बार फिर से इस्लाममय कर दिया। अरब टोलियों के मूल स्वतंत्रता प्रिय और विद्रोही प्रवृत्तियों को काबू में रखकर ही उन्हें इस्लाम के झंडे तले रखा जा सकता था। इस बात को चतुर मुहम्मद साहेब अच्छी तरह से जानते थे। इसीलिए तो उन्होंने अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व ही पडोसी सीरिया के विरुद्ध मुहिम आयोजित की थी। जिससे कि आपसी लडाइयों पर रोक लगे और सारे मुसलमान 4/5 भाग युद्ध लूट और स्वर्ग प्राप्ति की अदम्य लालसा से दीन-ए-इस्लाम के प्रसार में लगे रहें और ऐसा तो हो नहीं सकता कि उनके इस उद्देश्य से अबू बकर अनजान हों। इसीलिए तो विद्रोह को कुचल देने के तत्काल बाद दोबारा विद्रोह न हो इसके लिए उन्होंने पैगंबर की ही नीति अपनाई और इन नव-मुस्लिमों को अरबभूमि के बाहर आक्रमणों के अभियानों में लगा दिया। जिससे कि इन अभियानों के द्वारा परायों के विरुद्ध स्वजनों की एकता भी बनी रहे और बढ़े, रोजी-रोटी की समस्या भी युद्ध लूट के कारण हल होने के साथ ही शासन का खजाना भी भरे और जिहाद का पुनीत कर्तव्य भी पूरा हो। इससे इस्लाम का प्रसार तलवार के बल पर दिन दूनी और रात चौगुनी  गति से होने लगा एवं यही सिलसिला आगे जाकर दूसरे खलीफा उमर के समय अप्रतिहत गति से चलता रहा। और तीसरे खलीफा उस्मान द्वारा भी तब अपनाया गया 'जब अरब क्रियाशून्य और आलसी बन गए थे। इस कारण वे आपस में संघर्ष करने लगे थे। उन्हें काम में (इस्लाम के प्रसार के काम में) लगाए रखने के लिए खलीफा ने आक्रमण की व साम्राज्य विस्तार की योजना बनाई। उसमें (पुराने बर्बर) अफ्रीका, ट्‌यूनिस, अल्जेरिया, मोरक्को का भी समावेश था।"(चार आदर्श खलीफा-शेषराव मोरे, प्रकाशक राजहंस पुणे, पृ.368)

इस प्रकार बिना सहमत हुए लोग इस्लाम का स्वीकार करते चले गए। इसी कारण मगरिब (मोरक्को, उत्तर-पश्चिम अफ्रीका) के बरबर कबीलों ने इस्लाम तो स्वीकारा परंतु बारह बार मुर्तद (इस्लाम स्वीकार के बाद पुनः त्यागना) हुए। धर्म कोई खेल तो नहीं जो इस प्रकार बार-बार छोडा जाए-अपनाया जाए। परंतु, ऐसा हुआ क्योंकि, यदि इस्लाम लोगों की धर्मजनित आध्यात्मिक भूख को मिटा सकता या उनको तर्कसंगती से अध्यात्मिक उन्नति प्रदान कर सकता होता तो ऐसा कदापि न होता। तभी तो, मुहम्मद साहेब के जमाने में ही उनके एक सहयोगी अबू दर्दा ने यह कहा था कि 'यदि मैं निष्पर्ण यानी बिना पत्तों और डंठलों विहीन वृक्ष के समान होता तो कितना अच्छा होता।" तो, दूसरे सहयोगी उस्मान बिन माजून ने मुहम्मद साहेब से यह कहा था 'ऐ पैगंबर! मुझे सतत यह लगता रहता है कि भक्त बनकर पहाडों में चला जाऊं, तपस्वी का जीवन बिताऊं, समस्त संपत्ति का त्याग कर दूं, मेरी बीवी को छोड दूं, मांस भक्षण न करुं और सुंगधित परिमल का त्याग भी कर दूं।"(सूफी सम्प्रदाय- सेतुमाधवराव पगडी पृ.2) यह तो सन्यास हुआ जबकि इस्लाम सन्यास की अनुमति-मान्यता नहीं देता। सन्‌ 858 से 922 में हुए मंसूर नामक सूफी को 'अनलहक-अहं ब्रह्मास्मि" का प्रचार करने के कारण फांसी चढ़ना पडा था। यदि इस्लाम परिपूर्ण धर्म होता जैसाकि उसका दावा है तो इस तरह की आवाजें उठती ही नहीं और न ही इस प्रकार की आवाजों को दबाने के लिए कट्टरपंथियों को पैगंबर की इस हदीस का सहारा लेना  न पडता कि 'जो इस्लाम धर्म का त्याग करता है उसे मार डालो।"(बुखारीः 3017,7461)

इस्लाम के प्रारंभिक दिनों में ही खारजी नामका एक कट्टरपंथी धार्मिक पंथ निर्मित हुआ जो विशुद्ध इस्लाम के समर्थक थे। (चार आदर्श खलीफा- शेषराव मोरे पृ.572 राजहंस प्रकाशन, पुणे) खारिजी शब्द कुरान की 4ः100 आयत से संबंधित है। (573) अल्लाह के लिए प्राण देना वे अपना जीवन कर्तव्य मानते थे। कुरान की 9ः111 आयत के आधार पर उन्हें 'स्वर्ग (जन्नत) के लिए प्राण बेचनेवाले" कहा जाता था। वे जब लडने के लिए निकलते थे तब 'चलो जन्नत की ओर" की गर्जना किया करते थे। कुछ लोगों के अनुसार वे कट्टर धर्मनिष्ठ, और मुहम्मद सा. के सच्चे अनुयायी थे।" इन्होंने ही तीसरे खलीफा उस्मान की हत्या कर उन्हें अपमानित करने के लिए उनके शव को यहूदियों के कब्रस्तान में दफना दिया था। और इनकी अंत्ययात्रा पर पत्थर भी फेंके गए थे। (443) उनके अनुसार उस्मान की हत्या का कारण वे इस्लाम के मार्ग से भ्रष्ट हो गए थे। (574) चौथे खलीफा अली की हत्या भी इन्होंने ही की थी। तर्क वही था जो उस्मान के संबंध में था। इसके लिए उन्होंने दिन चुना था रमजान महिने का 17वां दिवस। (बद्र युद्ध दिवस) (603)

फिर भी सुधार या बदलाव की प्रक्रिया जारी रही। ''बाद के वर्षों में ईसाई तथा यहूदी धर्म के संपर्क में आने के कारण मुसलमानों में एक बुद्धिजीवी वर्ग उभरकर आया। इस वर्ग ने प्रचार किया कि मानव इच्छा स्वतंत्र है और मानव अच्छे-बुरे कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं है। कुरान में ऐसी आयतें भी हैं, जो इस विचार की पुष्टि भी करती हैं और इसका प्रतिवाद भी करती हैं। माबाद बिन अब्दुल्लाह बिन अलीम अलजुहानी पहला व्यक्ति था, जिसने कर्म की स्वतंत्रता का प्रचार किया। यह वर्ग अलकदार कहलाया। माबाद के मतानुसार मनुष्य के सारे कर्म ईश्वर द्वारा निर्धारित होते हैं, उसके विचार धर्मनिंदक समझे गए। उसकी निर्मम हत्या हज्जाज द्वारा कर दी गई। उसी काल में एक दूसरे वर्ग का उदय हुआ, 'मुरजिया" कहलाया। मुरजियाओं के अपने धार्मिक विचार थे, किंतु उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया। यहां तक कि उनके मरने के बाद जनाजे में शिरकत करना और उनके जनाजे की नमाज पढ़ाने पर पाबंदी लगा दी गई। ""(अनूप संदेश 1 जनवरी 1995, आफताब अहमद के लेख- 'तर्क और विज्ञान को नकारता इस्लामी कट्टरवाद" से उद्‌., देहरादून)     

 हमें विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ 'इब्ने खलदून का मुकद्दमा" से पता चलती है। इब्ने खलदून लिखते हैं ''उमय्या काल (सन्‌661 से 750ई.) से ही अनेक धर्मों पर आधारित दार्शनिक आंदोलन प्रारंभ हो गए थे। मोतेजला दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ, ... उमय्या राज्यकाल में ही इस्लाम के बहुत से कट्टर नियमों की या तो खुल्लमखुल्ला अवहेलना होने लगी और या उनके लिए इस्लामी धर्मशास्त्रों से ढूंढ़-ढूंढ़कर कोई न कोई बहाने तराशे जाने लगे, सभ्यता एवं संस्कृति की आवश्यकताओं को इस्लाम के सारे नियमों पर प्राथमिकता प्राप्त हो गई। अब्बासी राज्यकाल (750 से 902ई.) में तो यह उन्नति की चरम सीमा पर पहुंच गई।""(प्रकाशन शाखा, सूचना विभाग, उत्तरप्रदेश पृ.19,20) इब्ने खलदून आगे लिखते हैं ''धर्म के क्षेेत्र में नए विचारों का प्रचार हुआ और बहुत से नए धार्मिक आंदोलन एवं विचारधाराएं प्रचलित हो गई। मोतेजला आंदोलन 'अब्बासी खलीफा (शासक) मामून" के समय बडी उन्नति कर गया। खलीफा की दर्शनशास्त्रीय रुचि ने इस आंदोलन को राज्य के धर्म का रुप दे दिया। मामून ने 827 ई. में कुरान के 'खल्क" होने के विषय में घोषणा करा दी वास्तव में यह बडा ही साहसपूर्ण कदम था। कट्टर धर्मनिष्ठ लोग कुरान को ईश्वर की वाणी कहते हैं और उनका विचार है कि जिन शब्दों में ईश्वर का आदेश हुआ, वे मूलरुप में कुरान में सुरक्षित हैं। मोतेजला इसका खंडन करते हैं। 'खल्क" का सिद्धांत यह है कि 'शब्द मनुष्य के बनाए हुए हैं।" मामून ने अपने समस्त अधिकारियों को इसी सिद्धांत को मानने पर विवश किया। अहमद इब्ने हम्बल (इस्लाम के धर्मविधान के चार प्रसिद्ध निर्माताओं में से एक शाफाई के शिष्य थे) को प्राचीन कट्टर विचारों से न हटने के कारण मृत्युदंड भोगना पडा। मामून के दो उत्तराधिकारियों के राज्यकाल में मोेतेजला के सिद्धांतों का ही जोर रहा, किंतु 848 में मुतवक्किल ने इस नई विचारधारा का दमन कर दिया। मोतेजला विचारधारा का विरोध करनेवालों में प्रमुख बगदाद का अबुल हसन अल अशअरी था ... अशअरी के सिद्धांतों का अधिक प्रचार अबू हामिद अल गज्जाली (जन्म 1058, मृत्यु 1111ई.) द्वारा हुआ। उन्होंने इस्लाम के शुद्ध नियमों के पालन पर विशेष जोर दिया। बाद में उन पर सूफी मत का अधिक प्रभाव पडा और वे इस्लाम के कट्टर अनुयायियों के एक प्रकार के नेता हो गए।""(30) ''गज्जाली ने इस्लाम के भीतर, हर किस्म के स्वतंत्र और तर्कसंगत अन्वेषण, खासकर स्वयं इस्लाम संबंधी अन्वेषण का गला घोंटकर रख दिया था।""(फतवे उलेमा और उनकी दुनिया-अरुण शौरी, पृ.483) 

और तभी से कट्टरता का जो जोर चला आ रहा है वह आज तक जारी है तथा इस कट्टरता की धारा के प्रवाह से जो निकलना चाहता है या सुधार करने की कोशिश करता है, उदारता दिखलाता है या इसके विरुद्ध भाष्य करता है उसे काफिर करार दिया जाता है और उसके विरुद्ध फतवों का दौर सा चल पडता है। 'बारहवीं सदी में सूफी संत हल्लाज को अब्बासी अंधविश्वासियों ने मरवा दिया और उसकी लाश को जला दिया गया, क्योंकि वह कहा करता था कि 'जब तू मुझे देखता है, तो तू उसको देखता है।" एक दूसरे सूफी सरमद की भी हत्या कर दी गई, क्योंकि वह नग्न रहता था और पूरे कलमे का पाठ नहीं करता था। दाराशिकोह को इसलिए प्राणदंड दिया गया क्योंकि उसका रुझान हिंदू धर्म की ओर था। दाराशिकोह ने 150 उपनिषदों का अनुवाद फारसी भाषा में किया था। यह आश्चर्य की बात है कि आज भी मुसलमानों में धार्मिक उन्माद और कट्टरवाद चला आ रहा है, जबकि 20वीं सदी को तर्क और और विज्ञान का युग समझा जाता है, किंतु मुस्लिम बुद्धिजीवी अभी भी गैलिलियो युग में ही जी रहे हैं, जो बुद्धिहीन, कट्टरपंथी मुस्लिम मुल्लाओं में सारे विश्व में परिलक्षित हो रहा है। जिसका नेतृत्व उन मुल्लाओं के हाथों में है, जो आधुनिक विचारों वालों के विरुद्ध फतवा देते फिरते हैं और यह सब केवल मुल्लाओं द्वारा ही नहीं, बल्कि शिक्षित मुसलमानों द्वारा भी हो रहा है। दो वर्ष पूर्व कट्टरपंथियों ने मिश्र के बुद्धिजीवी फिराक फौदा को गोली का निशाना बनाया। उसका अपराध केवल यह था कि वह धर्म को राजनीति से अलग करना चाहता था, यहां तक कि टर्की में जिसका पूरा पश्चिमीकरण हो चूका है, पुनः कट्टरवाद ने सिर उठाना आरंभ कर दिया है। टर्की के वामपंथी नेता अजीज नसीन ने रश्दी की 'सैटेनिक वर्सिस" से कुछ उद्धरण छाप दिए थे। कट्टरपंथियों के एक गिरोह ने उनके निवास स्थान पर आक्रमण कर दिया, वह तो बच निकला, किंतु उसके 27 साथियों को जान से हाथ धोना पडा।" मिश्र के नोबल पुरस्कार विजेता उपन्यासकार नगीब महफूज पर नास्तिकता का आरोप लगाकर उन पर चाकू से आक्रमण करने के दो आरोपियों को 10 जनवरी 1995 को मौत की सजा सुनाई गई। 'अल्जीरिया के सांसद 65 वर्षीय फलाह नौर की हत्या कट्टरपंथी इस्लामी गुट इस्लामिक सॉल्वेशन फ्रंट ने कर दी। वे नेशनल कौंसिल ऑफ ट्रांजिशन के सदस्य थे, जिसका गठन निर्वाचित संसद के स्थान पर किया गया था।"(नईदुनिया 17-1-95)
 'भारत में कट्टरवाद मुसलमान के जहन में गहराई तक बैठा हुआ है। दो वर्ष पूर्व प्रो. मुशीर उल हसन ने कहा कि रश्दी की किताब पर से पाबंदी हटा ली जाए। उस बेचारे पर जामिया के छात्रों ने कहर बरपा दिया। डॉ. आबिद रजा बेदार का भी पटना में वही हाल हुआ। उन्होंने केवल इतना कहा था कि 'हिंदुओं के लिए काफिर शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए।" अहमदिया पंथ के मौ. मिर्जा अहमद बेग और उनके अनुयायियों को अनेक देशों में काफिर करार दिया गया है। मिर्जा स्वयं को पैगंबर मानते थे यह तो कारण था ही इसके अलावा उनके द्वारा यह कहा जाना भी था कि, 'तलवार से जिहाद प्रतिबंधित कर दिया गया है।"

कट्टरता और उदारता का संघर्ष तो हर धर्म, हर समाज में हमेशा से ही होता रहा है, होता रहेगा और उदारता को अंततः सफलता मिलती रही है। परंतु, इस्लाम में जो कट्टरता हावी है उसके तो दूर होने के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते। ऐसा क्यों है यह हमें इस उद्‌. से पता चलता है 'Muslims are the first victims of Islam. Many times I have observed in my travels in the Orient, that fanaticism comes from a small number of dangerous men who maintain the others in the practice of religion by terror.' - E. Renan हम तो केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं कि इस्लाम में भी उदारता आए, वह सहिष्णु, आधुनिक और सुधारवादी बने। परंतु, इसके लिए एक नहीं तो अनेक कमालपाशाओं की जरुरत है।

इस्लाम में सुधार निषिद्ध क्यों?

इस्लाम सुधार को कतई पसंद नहीं करता। क्योंकि, उसकी यह दृढ़ मान्यता है कि अल्लाह से पैगंबर मुहम्मद को वह्य (अल्लाह की ओर से पैगंबर को आया हुआ आदेश) के रुप में जो संदेश प्राप्त हुए वे अंतिम हैं और इसीलिए इस्लाम में किसी भी तरह का सुधार या किसी इस्लामी संकल्पना में रत्ती भर भी फर्क हो नहीं सकता। और जो बात इस्लाम में पैगंबर के समय थी ही नहीं वह बात इस्लाम में शामिल करना (यानी कोई सुधार प्रचलन में लाना) बिदअत है। दअ्‌वतुल कुर्आन का अधिकृत भाष्य इस पर कहता है ''किसी भी मनगढ़ंत बात को दीन (इस्लाम धर्म) में शामिल करना उसे अल्लाह से जोडने के समानार्थ है।"" (यानी शिर्क (अनेकेश्वरवाद, बहुदेववाद) है जो सबसे बडा गुनाह है (31ः13) जिसे अल्लाह कभी माफ नहीं करता।) (खंड 1, पृ.329) 'दीन" क्या है यह बतलाते हुए भाष्य कहता है ''दीन का मतलब है इबादत (उपासना) और इताअत (आज्ञापालन) की वह व्यवस्था जिसे अल्लाह ने उतारा हो। उसमें अपनी तरफ से किसी भी चीज को दाखिल करना गोया इस बात का दावा करना है कि ये बात अल्लाह की तरफ से है जबकि यह सत्य नहीं है।""(329) कुर्आन भाष्य के अनुसार ः इसलिए दीन की बुनियादी बातों के सिलसिले में गलत स्पष्टीकरण एवं गलत व्याख्याओं में उलझकर जो दीन में नई-नई बातें एवं खुराफात पैदा करके उसकी जड पर कुल्हाडा चलाते हैं वे शिर्क में मुब्तिला (अनेकेश्वरवाद में फंसा हुआ) हैं, शैतान के मित्र हैं और उसके लिए तबाही है।" (310,311) इस्लाम के अनुसार संसार का सारा ज्ञान कुरान और हदीस (पैगंबर की उक्तियां एवं कृतियां) में है।

सुधार को इतना आपत्तिजनक मानने का कारण इस्लाम की दीनी या मजहबी संकल्पना में छुपा हुआ है। जिसके अनुसार ''अल्लाह ने इंसान की हिदायत और रहनुमाई के लिए जो दीन नाजिल फरमाया (धर्म उतारा) वह इस्लाम है। यही दीन अल्लाह का दीन है और तमाम नबियों (पैगंबरों, ईशदूतों) पर वह इसी दीन को नाजिल फरमाता रहा। उसने कभी किसी देश और युग में किसी भी नबी या रसूल पर इस्लाम के सिवा कोई और दीन नाजिल नहीं फरमाया लेकिन पैगंबरों की उम्मतों (समुदायों) ने उस असल और वास्तविक दीन में बिगाड और मतभेद उत्पन्न करके अलग-अलग धर्म ईजाद कर लिए।""(173) ''किंतु वास्तव में इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जो अल्लाह का दीन कहलाने का योग्य अधिकारी है।... इस्लाम किसी एक नस्ल या एक गिरोह का दीन नहीं बल्कि वास्तव में वह पूरे जगत और सारी कायनात (ब्रह्मांड) का दीन है।""(199) ''मतलब यह कि जीवन भर इस्लाम पर दृढ़ रहो और जब इस दुनिया से कूच करो तो मुसलमान की हैसियत से कूच करो।""(206)

कुरान (5ः3) में कहा गया है ''मैंने (अल्लाह ने) तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को मुकम्मल (परिपूर्ण) कर दिया और तुम्हारे इस्लाम को दीन की हैसियत से पसंद कर लिया।"" कुर्आन भाष्य कहता है ''अब इस दीन को इसी रुप में कयामत तक बाकी रहना है और संपूर्ण जगत की सारी कौमों (जातियों) के लिए यही हिदायत (शिक्षा) का स्तंभ है।""(339) इसी कारण ''अल्लाह के दीन में न कोई संशोधन किया जाए और न कांट-छांट। वैध-अवैध, हलाल, हराम, पारिवारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं में अल्लाह ही के आदेशों की ओर रुजू करें।"" (दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3, पृ.1719) 

इस्लाम में सुधार लाने के प्रयत्नों पर पैगंबर का कथन है 'जो इस्लाम में नए सुधार करने का प्रयत्न करता है, उसे जो सम्मान देता है, वह इस्लाम नष्ट करने के कार्य में सहयोगी होता है।" (इब्न मजहः 14,42,5)
उपर्युक्त भाष्य से स्पष्ट होता है कि इस्लाम में सुधार करने का प्रयत्न करने का अर्थ गुमराही, असत्य कर्म, शिर्क (अनेकेश्वरवाद/बहुदेववाद) है और ये तो श्रद्धाहीनों (काफिरों) के कर्म होते हैं अर्थात्‌ यह तो इस्लाम से दूर जाना हुआ, इस्लाम का त्याग हुआ। ऐसे लोगों के बारे में हदीस कथन है 'अल्लाह ने तेरे लिए जो निर्णय लिया हुआ है वह तू टाल नहीं सकता। और अगर तू इस्लाम से दूर जाएगा तो अल्लाह तेरा निश्चय ही नाश करेगा।"(बुखारी 3620,7461) इस्लाम में धर्मत्याग एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकल्पना है। वह केवल इस्लाम छोडकर जाने तक कि सीमित न होकर उसकी अपेक्षा व्यापक है। पाकिस्तान की विधि शिक्षण संस्था के लिए वहां के सर्वोच्च न्यायालय के वकील डॉ. गिलानी ने लिखे हुए क्रमिक ग्रंथ में इसकी व्यापकता बतलाते हुए कहा है 'धर्मत्याग के सिद्धांत के कारण इस्लामिक विचारों की शुद्धता टिकी रहती है। धर्म के संबंध में परिवर्तन जोर-जबरदस्ती या नकार मतलब धर्मत्याग।"(The Reconstruction of Legal Thoughts in Islam- Dr. Riazul Hasam Gilani P.152) इसी ग्रंथ में शाह वलीउल्लाह द्वारा प्रस्तुत अर्थ इस प्रकार का है 'जो इस्लाम में मूलभूत सिद्धांतों के संबंध में, पैगंबर के सहयोगियों, उत्तराधिकारियों और उम्मा (मुस्लिम समाज) के सर्वसम्मत मत के विरुद्ध अर्थ निकालता है या स्पष्टीकरण देता है वह धर्मत्यागी(Apostate)।"(154) कुछ विद्वानों के मत से कुरान में धर्मत्याग के लिए मृत्युदंड बतलाया गया है। इसके लिए वे इन आयतों का आधार लेते हैं 2ः217, 4ः89, 5ः54, 16ः106,7। परंतु, अनेक विद्वानों के मत से कुरान में इसके लिए मृत्युदंड की सजा न होकर नरकाग्नि का दंड बतलाया गया है। अर्थात्‌ ही वह दंड देने का अधिकार अल्लाह का है। लेकिन कुरान में स्पष्ट रुप से मृत्युदंड का आदेश आया हुआ नहीं है तो भी वैसे स्पष्ट आदेश वाले पैगंबर के वचन हदीस में आए हुए हैं। पैगंबर ने कहा है 'जो इस्लाम धर्म का त्याग करता है, उसे मार डालो।"(बुखारी 3017,6922,7362) इसके अलावा आगे की हदीस का भी आधार है जिसके अनुसार पैगंबर ने कहा था 'जो एकमात्र अल्लाह पर और उसके पैगंबर पर श्रद्धा रखता है उस मुस्लिम के प्राण लेने की अनुज्ञा किसी को भी नहीं है, परंतु, आगे के तीन प्रकरणों में कानूनन उनके प्राण लिए जा सकते हैं ः विवाहित रहते व्यभिचार करनेवाला या करनेवाली, (दूसरे श्रद्धावान यानी मुसलमान) का खून करनेवाला और इस्लाम का त्याग करनेवाला।"(सहीह बुखारी हदीस क्र. 6878, मुस्लिम 4152 से 4, दाउद 4338 से 40, इब्न मजह 2533,4) हमारे मतानुसार अनेकेश्वरवादी श्रद्धाहीन (काफिर) के लिए जो दंड है वही धर्मत्याग करनेवाले के लिए है। दूसरे खलीफा उमर द्वारा उद्‌धृत हदीस के अनुसार    एकमात्र अल्लाह और पैगंबर मुहम्मद को न मानने वालों के विरुद्ध जिहाद करने का आदेश अल्लाह ने पैगंबर को दिया था। अर्थात्‌ यह न मानने वाले श्रद्धाहीन (काफिर) ही थे। यही नियम धर्मत्याग करनेवालों के लिए भी लागू होता है।

लव जिहाद

आकर्षण; स्त्री-पुरुष, युवा लडका-लडकी के मध्य का आकर्षण, इनका एक-दूसरे के प्यार में पडना, प्यार परवान चढ़ना, इसमें कुछ भी नया नहीं है, की कथाएं-प्रसंग प्राचीनकाल से ही विद्यमान है और कई प्रेम कथाओं-प्रसंगों ने तो जनमानस में अपना एक अलग स्थान ही बना लिया है। यह विपरीत लिंग के प्रति का आकर्षण है जो प्रकृत्ति प्रदत्त है। इसमें कुछ भी अस्वभाविक नहीं है और जब तक स्त्री-पुरुष हैं तब तक इस प्रकार के प्रेम-प्रसंग घटित होते ही रहेंगे केवल पात्र बदलते रहेंगे और कोई इन्हें रोक नहीं सकता। आज आधुनिकीकरण-उदारीकरण के दौर में जब शिक्षा, नौकरी-व्यवसाय, जीवन के हर क्षेत्र में स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं, उनमें निकटता के अवसर भी बडी तेजी से बढ़ रहे हैं ऐसे माहौल में अनेकानेक प्रेमकथाएं-प्रसंग जन्म लेंगे ही, सामने आएंगे ही। परंतु ये प्रेम-प्रसंग तब गंभीर रुप धारण कर लेते हैं जब स्त्री-पुरुष या लडका-लडकी भिन्न धर्मीय होते हैं। हमारा हिन्दू समाज इस दृष्टि से मुस्लिम समाज की बनिस्बत अधिक सहिष्णु-उदार विचारों वाला हैं। जितनी व्यक्तिगत-सामाजिक, वैचारिक स्वतंत्रता, जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर हम अपनी लडकियों को देते हैं उतनी मुस्लिम समाज अपनी लडकियों को नहीं देता। उनकी लडकियों को दी जानेवाली सीख, परिवेश, परवरिश निश्चय ही हमारी बनिस्बत अनुदार है, संकुचित है।

उदाहरणार्थ यदि कोई मुस्लिम लडकी हिंदू लडके से प्रेम विवाह कर ले तो लडके का परिवार उसके आयशा नामके रहने को बडी सहजता से स्वीकार लेगा और बडे गर्व से कहेगा कि हमें उसके मुस्लिम धर्म के पालन पर कोई एतराज नहीं क्योंकि, हमारी मान्यता ही यह है कि सभी धर्म सत्य की ओर ले जाते हैं। हम उसे पांच वक्त की नमाज पढ़ने की की अनुमति भी देते हैं। यह बात अलग है कि वह नमाज हमारे-अपने घर में ही पढ़ती है क्योंकि उसे मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति मिल नहीं सकती। उसकी होनेवाली संतति का मुस्लिम नाम यदि वह रखे तो वह भी हिंदू सहर्ष स्वीकार लेता है और इसके भी उदाहरण दिए जा सकते हैं, मौजूद हैं। इसके विपरीत, अगर कोई हिंदू लडकी किसी मुस्लिम लडके से विवाह कर ले तो उसे कलमा पढ़ना ही पढ़ेगा, इस्लाम का स्वीकार करना ही पडेगा अन्यथा वह विवाह इस्लाम की दृष्टि से जायज नहीं होगा और ऐसी मॉंओं से होनेवाली संतानों के नाम भी अमान-अयाज ही रखे जाते हैं। इसी कारण से तो अभी दो-ढ़ाई सौ वर्षों पूर्व अफगानिस्तान की हिंदू स्त्रियों-लडकियों की जो संतानें हुई उन्हें उनके हिंदू रक्त के होने का कोई गुमान तक नहीं। क्योंकि, उनकी हिंदू मॉंएं अफगानिस्तान की गिरी कंदराओं, पहाडी दर्रों में निकाह के बाद कहां गायब होती चली गई इसका कुछ अता-पता भी नहीं मिलता।

और इस प्रकार के जो अंतर-धर्मीय हिंदू-मुस्लिम विवाह हो रहे हैं उनमें भी लडकियों का जो पलायन हो रहा है वह भी एकतर्फा ही है। जिस गति से हिंदू लडकियों का पलायन मुस्लिम लडकों से प्रेम पश्चात निकाह द्वारा हो रहा है उसका एक अल्प सा प्रतिशत भी दूसरी ओर से हो रहा है ऐसा दूर-दूर तक नजर नहीं आता यही सबसे बडी चिंता का विषय है। क्योंकि, इससे सामाजिक संतुलन बिगडता है, सामाजिक समस्याएं पैदा होती हैं; असंतोष पनपता है, खीज उठती है जो कभी-कभी कानून-व्यवस्था का रुप धारण कर लेती है। यदि पलायन की हुई लडकी मुस्लिम हुई और लडका हिंदू हुआ तो मुस्लिम समुदाय अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया कर उठता है और लडकी या लडका या दोनो को ही अधिकांश मामलों में जान से मार डालता है। जबकि ऐसी अत्यंत तीव्र हिंसक प्रतिक्रिया जिसमें लडका या लडकी की हत्या कर दी जाए हिंदू समाज द्वारा बहुत कम ही व्यक्त की जाती है। इसीलिए इस समस्या पर बोलना, लिखना, प्रतिक्रिया व्यक्त करना आवश्यक हो जाता है।

यह एक बडी गंभीर-विचारणीय सामाजिक समस्या है जो दिनो-दिन बढ़ती ही जा रही है। इसकी गंभीरता इसलिए भी अधिक है क्योंकि, मुस्लिम समुदाय ने इस धर्मांतरण-मतातंरण का जरिया बना रखा है और इसके पीछे उनकी धार्मिक शिक्षा-सीख ही जिम्मेदार है। कुरान की 60वीं सूरह की 10वीं आयत में आज्ञा है ''ऐ ईमानवालों! जब तुम्हारे पास ईमानवाली औरतें हिजरत (पलायन) कर आवें तो वह औरतें काफिरों (गैरमुस्लिमों) को हलाल नहीं और न काफिर उन्हें जायज हैं और तुम पर पाप नहीं कि उन औरतों से निकाह (ब्याह) करो।"" अर्थात्‌ हाथ आई हुई औरत कोई भी हो उसे वापिस मत करो, जाने मत दो। और इसका उल्टा जब कोई मुस्लिम लडकी हाथ से निकल जाए अर्थात्‌ प्रेमविवाह कर किसी गैरमुस्लिम के साथ चली जाए तो कुरान की 60वीं सूरह की 11वीं आयत में आज्ञा है ''और अगर तुम्हारी औरतों में से कोई तुम्हारे हाथ से निकल कर काफिरों के साथ चली जावे फिर तुम उन (काफिरों) से जंग करो।""

मुस्लिमों द्वारा प्रेमविवाह के द्वारा धर्मांतरण की गंभीर-विचारणीय समस्या यह कोई भारत या केवल हिंदुओं तक की सीमित समस्या नहीं है इसने अंतर-राष्ट्रीय रुप ले रखा है। हमारे अलावा यूरोप और अमेरिका तक के लोग-ईसाईधर्मीय भी इसके शिकार हैं। इस संबंध में समाचार-लेख भी छप चूके हैं। बेल्जियम मूल के ईसाई पादरी कॉनरॉड एल्स्ट ने 3 वर्ष पूर्व मुंबई से प्रकाशित होनेवाले साप्ताहिक विवेक के 12-11-06 के अपने एक लेख 'मुस्लिम संख्या वृद्धि के लिए काफिर युवतियों का उपयोग" में लिखा हैं ''गैर-मुस्लिम युवतियों को बरगलाकर उनका उपयोग अपनी संख्यावृद्धि के अभियान के लिए खुल्लमखुल्ला करना और यह करते समय दुर्भागी काफिरों की खिल्ली उडाना यह संख्या वृद्धि के मुस्लिम युद्धतंत्र का अत्यंत वेदनादायी पहलू है। बांग्लादेश और भारत के मुस्लिम बहुल प्रदेशों में बेधडक युवतियों को भगाकर यह योजना अमल में लाई जाती है अथवा उनके परिजनों को धमकाकर ऐसी युवतियों का मुस्लिम युवकों के साथ निकाह कराया जाता है। पश्चिमी देशों में और पश्चिमी रुजहानवाले भारतीय समाज में सर्वसाधारणतया यह प्रेम से घटित करवाने के प्रयत्न चलते हैं। परंतु, अगर मुस्लिम युवती ने गैर-मुस्लिम युवक के साथ मित्रता की तो फिर उसके परिवार पर दबाव लाकर अथवा उस युवक को दहशत दिखाकर, आतंकित कर  तो कभी-कभी दोनो ही प्रकार से उन्हें परावृत्त करने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी जाती। इसके विपरीत यानी गैर-मुस्लिम युवती ने मुस्लिम युवक के साथ  संबंध बढ़ाए तो दूसरे पक्ष की ओर से ऐसा कुछ घटित होने की संभावना कम होने के कारण समग्र परिणाम गैर-मुस्लिम युवतियों का सतत प्रवाह मुस्लिम परिवारों की ओर बहता रहता है।""

परंतु, अब इस गंभीर-विचारणीय समस्या ने जो नया अत्यंत विकृत-घातक रुप इख्तियार कर लिया है। जिसका केरल-कर्नाटक के हाईकोर्ट तक संज्ञान ले चूके हैं और सरकारों को जांच के आदेश दे चूके हैं और कर्नाटक सरकार ने तो इसकी गंभीरता को जान सी.आई.डी. जांच के आदेश भी जारी कर दिए हैं। वह है 'लव-जिहाद", 'रोमिओ-जिहाद"। वैसे कुछ समय पूर्व उत्तर-भारत में इस संबंध में कुछ समाचार छपे थे। परंतु, उस समय किसीने उसे गंभीरता से नहीं लिया और बात आई-गई हो गई। जैसाकि हमेशा से ही होता है उसी प्रकार से प्रारंभ में सरकारें सुस्त और समाज सोया पडा रहता है और संबंधित प्रतिनिधि संस्थाएं भी निष्क्रिय सी ही बनी रहती है वैसा ही कुछ इस 'लव जिहाद" के मामले में भी हुआ। परंतु, अब जब यह 'लव जिहाद" अपने भयंकर-विकृत रुप में दक्षिण भारत में सामने आया तो सरकारों ने चौकन्ना होकर जांच आरंभ कर दी है और 14-10-09 के 'टाइम्स ऑफ इंडिया" के अनुसार प्रभावित हिंदू-ईसाई समाज की प्रतिनिधि संस्थाओं के रुप में 'विहिप" और 'चर्च" भी मुकाबले के लिए एकजुट हो रहे हैं।

पांचजन्य में छपे मुजफ्फर हुसैन के लेख 25-10-09 के अनुसार संक्षेप में 'लव जिहाद द्वारा जिहादी मुस्लिम युवक कॉलेज के प्रथमवर्ष में शिक्षा लेनेवाली  लडकियों को बहला-फुसलाकर अपनी और आकर्षित कर, प्रेमजाल में फंसाकर पहले तो उनसे निकाह पढ़ते हैं। कभी-कभी बजाए निकाह पढ़ने के उन्हें सीधे आतंकवादियों के हवाले कर दिया जाता है। तो, कभी केरल के तट पर तैयार खडी नौकाओं में उन्हें बिठलाकर जहाजों पर ले जाकर मध्यपूर्व के देशों में भेज दिया जाता है। कहने की बात नहीं कि इसके लिए धन का उपयोग किया जाता है, लडकियों को आकर्षित करने के लिए महंगे उपहार मोबाईल, वाहन, कपडों के रुप में तो, मुस्लिम युवकों को प्रति लडकी एक लाख रुपये। अब जांच का विषय यह है कि उक्त षड़यंत्र कौन संचालित कर रहा है? और इसके लिए धन कहां से आता है? केरल में पिछले छः माह में करीब 4000 युवतियों को इस तरह से फंसाने, उन्हें मतांतरित करने और फिर आतंकवादी संगठनों को सौंप देने के उदाहरण मिले हैं।"

'इसके लिए इंटरनेट को भी माध्यम बनाया जाता है। मुस्लिम युवक सबसे पहले इंटरनेट के जरिए सुंदर और इज्जतदार लडकियों की जानकारी लेकर उनसे चेटिंग करते हैं फिर लडकी के आकर्षित होने पर इस्लाम कितना अच्छा है, आधुनिक मजहब है आदि बातें उसके दिमाग में भरकर प्रभाव में लेते हैं। इस प्रकार से इस्लाम और युवक दोनो से ही आकर्षित होकर जब युवती रोमियो से मेलजोल बढ़ाती है और अंत में ज्यों ही लडकी निकाह के लिए उतावली हो जाती है बस तभी उसे किसी आतंकवादी सरगना को सौंपकर मतांतरित कर मुसलमान बना दिया जाता है। कई बार उनका निकाह भी कर दिया जाता है। परंतु, अंततः उसका ठिकाना आतंकवादियों का अड्डा ही है। जहां उसे आतंकवादी बनाकर किसी आत्मघाती बम के रुप में उसका इस्तेमाल  कर लिया जाता है। आतंकवादियों का कहना है कि उनका जाल पूरे भारत में बिछा है। भारत में अनेक विदेशी आतंकवादी संगठन अपना आधार बनाने के लिए वर्षों से काम कर रहे हैं। स्थानीय लोग मिल जाते हैं तो उन पर खर्च कम करना पडता है और स्थानीय भाषा-संस्कृति से परिचित होने के कारण उनका काम भी आसान हो जाता है।"

अब सवाल यह उठता है कि चर्चित 'लव जिहाद" में 'लव" और 'जिहाद" में कैसा संबंध? क्योंकि, जिहाद मतलब तो जंग-युद्ध और मरने-मारने का प्यार-मोहब्बत से क्या-कैसा संबंध हो सकता है। लेकिन जिहाद की जो व्याख्या मुस्लिम विद्वान करते हैं उसके अनुसार जिहाद मतलब ''किसी ध्येय की सिद्धी के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति लगा देने और जान-तोड कोशिश करने को अरबी में 'जिहाद" कहते हैं। जिहाद केवल युद्ध करने का नाम नहीं है। जिहाद का अर्थ इससे अधिक विस्तृत और व्यापक है। जिहाद में सारी दौड-धूप और चेष्टाएं केवल अल्लाह की प्रसन्नता और उसके उतारे हुए दीन (इस्लाम) के समर्थन और स्थापना के लिए होगी।""(हदीस सौरभ-पृ. 568 वैसे ही कुरआन मजीद पृ.1231) और 'लव जिहाद" में ध्येय है किसी भी तरीके से प्यार के नाम पर गैर-मुस्लिम लडकी को पटाकर, प्रेम का नाटक रचकर इस्लाम में मतांतरित करना।क्योंकि अल्लाह की प्रसन्नता, इच्छापूर्ति के लिए आवश्यक है कि इस्लाम वृद्धिंगत हो, सर्वत्र इस्लाम की स्थापना हो। अल्लाह की इच्छा कुरान की सूर 'बकर" की आयत 193 में इस प्रकार से आई हुई है ''एक अल्लाह ही का दीन (इस्लाम) हो जाए""। और इसके लिए संपूर्ण शक्ति लगा देना, दौडधूप करना, धन खर्च करना अपनी वाणी, लेखनी आदि से प्रयत्नशील रहना हर मुस्लिम का आज्ञापित कर्तव्य है और जिहाद इसी के लिए है। और इसीको मद्देनजर रखकर 'लव जिहाद" की मुहिम चलाई जा रही है। क्योंकि, इस्लाम की फितरत (प्रकृति, स्वभाव) गलबा (प्रभुत्व) है। जिसको हासिल करने के एक मार्ग के रुप में 'लव जिहाद" को आतंकवादी संगठनों ने अपनाया है। क्योंकि, इस एक माध्यम से ही वे कई लाभ एक साथ उठा रहे हैं। एक, गैर-मुस्लिम लडकी को धर्मांतरित कर फिर उससे तीन-चार बच्चे पैदा करवाकर अपना यानी मुसलमानों का, इस्लाम का संख्या बल बढ़ाने के साथ मतांतरण का सवाब (पुण्य) कमाना, दूसरा, इन्हीं लडकियों के माध्यम से अन्य लडकियों को इसी जाल में फंसाने के काम में लाना, इसके भी उदाहरण मौजूद हैं। तीसरा, इन लडकियों को वे अपनी कामतृप्ति के लिए भी उपयोग में ले लेते हैं। और अंत में कभी-कभी आत्मघाती मानव बम बनने के लिए भी बाध्य कर देते हैं।