Sunday, 5 May 2019

नई भूमि के निर्माता चिरंजीवी भगवान् परशुराम - शिरीष सप्रे


नई भूमि के निर्माता चिरंजीवी भगवान् परशुराम
शिरीष सप्रे


श्री परशुराम अवतार के सम्बन्ध में जनता में विलक्षण कुतूहल है | वैशाख शुक्ल तृतीया या आखातीज के दिन अदिति नक्षत्र पर परम ज्योति स्वरुप बालक ने ठीक सूर्यास्त के समय जन्म लिया | परशुराम का स्मरण होते ही कई बातों का स्मरण भी हो आता है | जैसे उनका चिरंजीवी होना – अश्वत्थामा बलिव्यार्सो हनुमांश्च विभीषण: | कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीवन: ||१||


परशुराम अवतार हुए लगभग दस लाख वर्ष से अधिक का समय बीत चूका है | परशुराम त्रेता युग का दूसरा अवतार और उनके बाद श्रीराम हुए | आगे जाकर द्वापरयुग के अंत में भगवान् श्रीकृष्ण अवतार हुआ | उस समय कौरव-पांडव हुए | उनमें से द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण आदि ने धनुर्विद्या उनसे सीखने के वर्णन महाभारत में हैं | इसी प्रकार भीष्म और परशुराम  का युद्ध हुआ था इसका वर्णन महाभारत् में है | इसी प्रकार कर्ण ने चोरी से परशुराम से धनुर्विद्या सीखी इस कारण परशुराम ने उसे शाप दिया यह कथा भी महाभारत् में है | बाद में कौरव-पांडवों के बीच मध्यस्थता के लिए परशुरामजी गए थे का वर्णन महाभारत में आता है |


सहत्रब्दियों वर्ष पूर्व सतयुग अर्थात कृतयुग के अंत में भगवान् परशुरामजी ने उत्तर और पूर्व के राजाओं का एक महासंघ बनाकर आज के गुजरात के हैहय राजाओं के विरुद्ध एक महासंग्राम को विजयी नेतृत्व प्रदान किया था | यही कारण है कि परशुराम के नेतृत्व में हैहयों के विरुद्ध सतयुग के अंत में हुए इस महायुद्ध के विजेता महानायक परशुराम सर्व लोकख्यात हो गए और स्थिति यह हो गई कि वशिष्ठों और विश्वामित्रों की वंश परंपरा की भांति ही परशुराम जिस भार्गव वंश के थे उसकी भी एक पूरी वंश परंपरा बनी जिसके सभी महापुरुष स्वाभाविक रूप से भार्गव या परशुराम कहलाए |


कश्यप ऋषि को दान की हुई भूमि पर नहीं रहना यह निश्चय करके परशुराम सह्याद्री पर आए | वहां महाबलेश्वर पर जाकर पर्वत की तलहटी से दूर क्षितिज तक विस्तृत समुद्र उनके सामने था | उन्होनें समुद्र से अपने लिए भूमि मांगी | कई बार प्रार्थना करने पर भी जब समुद्र ने अनसुनी कर दी तब क्रोधित हो परशुराम ने समुद्र को सुखा देने का निश्चय कर एक बाण निकाला | तुरंत समुद्र शरणागत हुआ | उन्होंने चौदह बाण छोड़े प्रत्येक बाण समुद्र में आगे और आगे गिरता गया समुद्र पीछे और पीछे हटता चला गया इस प्रकार दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में भृगुकच्छ (वर्तमान भडोच) तक एक नई भूमि समुद्र से ऊपर आई | इसी पश्चिमी घाट को परशुराम भूमि कहा जाता है |


“बीसवीं सदी में हालैंड के कुल क्षेत्रफल का सातवां हिस्सा समुद्र को हटाकर उससे प्राप्त भूमि का है | हालांकि ऐसा करने में दो सौ साल लगे परन्तु हालैंड में यह कहावत प्रसिद्ध हो गई कि, ‘पूरी दुनिया ईश्वर ने बनाई लेकिन हालैंड को हालैंडवासियों ने बनाया |’” इसी तरह भगवान् परशुराम ने हजारों वर्ष पूर्व समुद्र से परशुराम क्षेत्र प्राप्त किया | (भगवान् परशुराम-जयंत पोतदार)


आज का सम्पूर्ण केरल, कर्नाटक का धारवाड़ प्रदेश, तमिलनाडु का कन्याकुमारी क्षेत्र, सम्पूर्ण कोंकण, गोवा, भडोच तथा पश्चिम सह्याद्री के तीनों शिखरों तक का भाग परशुराम निर्मित भूमि है | नवनिर्मित भूमि निर्जन , उजाड़ और बंजर थी | वृक्ष-वनस्पतियों से रहित | परशुराम ने उसे योगबल से श्स्यश्यामलाम बनाया | उन्होंने उस पवित्र भूमि में बसने के लिए अगस्त्य, बोधायन, दाल्भ्य, सत्याषढ, बाषकल आदि ऋषियोंको निमंत्रित कर उनके आश्रम स्थापित किए | शंकर, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय (स्कन्द) को सदैव के लिए निवास करने के लिए उन्होंने अपने इस नवनिर्मित क्षेत्र में आमंत्रित किया | आज भी इन्ही चारों की उपासना इस पुरे प्रदेश में सर्वाधिक प्रचलित है | इस खेत्र में परशुरामजी ने कई तीर्थ स्थापित किए | गोवा या गोमान्तक में इतने यज्ञ किए कि उन यग्नों की भस्म का एक पर्वत ही बन गया | भगवान् परशुराम द्वारा स्थापित तीर्थक्षेत्र  तो अनेक हैं | उनमे प्रमुख हैं – मुंबई का वालुकेश्वर, गोवा की शांता दुर्गा तथा कन्याकुमारी स्थान | इस पूरे परशुराम प्रदेश को  सप्तकोंकण या अपरांत कहते हैं |


अनेक स्थानों से जनसमूहों को लाकर नई बस्तियां बसाई | इस भूमि को आबाद करने के लिए उन्होंने मलयाली ब्राह्मणों को लाया, देवराष्ट्र से लाए हुए ब्राह्मणों के निर्वाह की व्यवस्था की | आवश्यकतानुसार वे ही ब्राह्मण चार वर्णों में बदल गए | कावेरी नदी की किनारे से वेद विद्या पारंगत ब्राह्मण परिवारों को लाकर उन्होंने वेदों के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की | सभी वर्णों को अग्नि उपासना एवं वेदाध्ययन के लिए प्रवृत किया | उन्होंने एक हजार कोलियों (मछुहारों) को शिक्षा देकर वेदों में पारंगत बना दिया |

वर्ण व्यवस्था का गुणकर्म के अनुसार वैदिक आदर्श स्थापित किया | आज भी यह परशुराम क्षेत्र शिक्षा-दीक्षा, विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान रखता है और भगवान् परशुराम के प्रति असाधारण पूज्य भाव इस प्रदेश के जन-जन में है | उन्हें आज भी इस पूरे प्रदेश का स्वामी माना जाता है |                       

Friday, 26 April 2019

श्रेष्ठ आदर्श भारतीय ईसाई महिला – कार्नेलिया सोराबजी शिरीष सप्रे


श्रेष्ठ आदर्श भारतीय ईसाई महिला – कार्नेलिया सोराबजी
शिरीष सप्रे

कार्नेलिया सोराबजी १९वी शताब्दी के उत्तरार्ध में महाराष्ट्र से शिक्षा ग्रहण करने के लिए समुद्र पार गई प्रसिद्ध पंडिता रमाबाई, डा. आनंदीबाई जोशी, जो पहली भारतीय डाक्टर थी जिनकी स्मृति में २६ फरवरी महिला आरोग्य दिवस मनाया जाता है, डा. रखमाबाई, अना उर्फ़ अनसूया तर्खड इनकी समकालीन थी | पंडिता रमाबाई, डा. आनंदीबाई जोशी इनकी जीवन यात्रा सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टीसे कठिनाई भरी थी उसमे डा रखमाबाई की तो सामाजिक दृष्टी से अपूर्व | रखमाबाई के सम्बन्ध में तो उसने आगे जाकर लिखा था “कितनी शांत महिला, दुनिया ने उसके विरुद्ध कितना शोर मचाया परन्तु कितनी शांति से वह अपने व्यवसाय में लीन रही | उसने विवाह नहीं किया परन्तु स्त्री स्वातंत्र्य का ढोल भी नहीं पीटा |” परन्तु अना तर्खड और कार्नेलिया दोनों ही सम्पन्न घरानों से ताल्लुकात रखनेवाली | अना आंग्ल संस्कृति से प्रभावित परिवार से थी | कार्नेलिया के पिता रेव्हरंड खुर्सेदजी सोराबजी नाशिक के एक खानदानी अमीर पारसी परिवार के होकर युवावस्था में धर्मान्तरित होकर ईसाई बने थे | उसकी मां नाशिक के निकट देवलालीके आर्मी कमांडर लार्ड फोर्ड और लेडी फोर्ड की दत्तक कन्या फ्रांसिस्का थी |

कार्नेलिया का जन्म १८६६ में हुआ था ६ भाई-बहनों में उसका क्रम छठा था | उसकी मां पुणे की विक्टोरिया स्कूल की संस्थापक होकर सतत मिशनरी कार्य में मग्न रहती थी | आज भले ही हमारे बच्चों को अंग्रेजी सीखाने के नाम पर हम कॉन्व्हेंट में भेजते हों उस ज़माने में मिशनरी भारतीय भाषा सीखा करते थे | कार्नेलिया के घर की आचार-पद्धति भारतीय थी | अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ पारसी और गुजराती सीखाने शिक्षक घर पर आया करते थे | पुणे के उदारमतवादी सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्ध रखनेवाला यह परिवार स्वयं को पूरी तरह भारतीय समझता था |


उनकी मां नारी शिक्षा की प्रबल पक्षधर थी | कार्नेलिया को बैरिस्टर बनाने में उनके पिता ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |  उनकी मां ने पुणे में लड़कियों और महिलाओं को सशक्त और शिक्षित करने के लिए अंग्रेजी के साथ-साथ मराठी और हिंदी स्कूल भी शुरू किए थे | पंडिता रमाबाई रानडे को विदेश भेजने में जो अग्रसर थी वे शिक्षिका हरफ़र्ड इन्हीं के स्कूल की थी |

 परन्तु ऐसे परिवार की होने के बावजूद उनका स्त्री होना उनके आड़े आया | कारण एक ही था उनका स्त्री होने के बावजूद परिधि के बाहर कदम रखना | परन्तु १८८३ में डेक्कन कॉलेज से सभी लड़कों को पीछे छोड़ पदवी परीक्षा में कार्नेलिया सर्वप्रथम आई | उस समय उसकी आयु थी केवल सत्रह | उस समय सर्वप्रथम आनेवाले छात्र को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लेंड जाने के लिए छात्रवृती  मिलती थी | परन्तु स्त्री होने के कारण उसे नकार दिया गया | उसका आन्गल-पारसी परिवार से होना या ईसाई मजहब का होना कुछ काम न आया | केवल उसका स्त्री होना ही महत्वपूर्ण तय हुआ |

फिर भी अठरह वर्ष की आयु में उनकी नियुक्ति व्याख्याता के रूप में गुजरात कॉलेज में सभी पुरुष विद्यार्थियों की कक्षा पर हो गई | वह वहां किसी भी द्रष्टि से कमतर साबित नहीं हुई परन्तु, यह नियुक्ति तात्कालिक स्वरुप की होने के कारण यह न मालूम हो सका कि यह व्यवस्था दीर्घकालीन होती तो पुरुषप्रधान समाज इसे कितना हजम कर पाता |

यह नौकरी समाप्त होने के पश्चात् कार्नेलिया स्वयं के खर्च से आक्सफोर्ड गई | इंडिया आफिस ने संभालकर रखी हुई उसकी डायरी में यह दर्ज है कि किस प्रकार उसने यात्रा की, आक्सफोर्ड में किए हुए प्रयास, संपर्क में आए हुए मित्रों के साथ की हुई समाज विषयक उसकी चर्चा | कार्नेलिया आधी अंग्रेज थी, अमीर थी, ईसाई थी फिर भी आक्सफोर्ड जैसी विश्व - प्रसिद्ध संस्था पवित्र थी, वहां स्त्रियों को प्रवेश नहीं था | कार्नेलिया ने इन दरवाजों को खटखटाना शुरू किया |

अपने प्रयासों, परिचितों, मिशनरी लोगों की सहायता से उसने समरविल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त कर ही लिया | पाश्चात्य संस्कृति की विशिष्टता यह की वहां मिशनरी लोगों का प्रभाव था और इधर बायबल पाठ के लिए तो सार्वत्रिक शिक्षा की आवश्यकता निर्मित हो गई थी | कार्नेलिया के प्रवेश के बाद तो समाज जाग गया, यह अपकृत्य कैसे घटित हो गया, किसने किया इस सम्बन्ध में सवाल खड़े किए गए | पार्लियामेंट के लार्ड्स की सभा में इसका मिला हुआ उत्तर बड़ा ही मार्मिक है – कार्नेलिया सोराबजी को दिया हुआ प्रवेश एक योग्य व्यक्ति को दिया हुआ प्रवेश है | यहां स्त्री शब्द के प्रयोग को टाला गया है मानो यह किया गया तो उस रास्ते से स्त्रीयों के झुंड के झुंड प्रवेश कर जाएंगे !

सामरविल कॉलेज से पहली डिग्री मिलने के बाद कार्नेलिया को अब कानून की उपाधि प्राप्त करनी थी | इसके पीछे एक विचार दिल की गहराइयों में कहीं सुप्त अवस्था में पड़ा था | जब वह छोटी थी तब उसकी मां के पास एक औरत रोते आई और अपनी दुखभरी कहानी सुनाने लगी | उसने अपनी मां से उस सम्बन्ध में पूछताछ की तब उसकी मां ने कहा कि वह जो सहायता चाहती है वह उसके लिए नामुमकिन है; हां जब वह बड़ी हो जाएगी तब यदि वह ऐसी महिलाओं को कानूनी सलाह देकर उनके दुःख दूर कर सके तो बड़ा भला होगा | वास्तव में वह महिलाओं के लिए किसी देवदूत से कम साबित नहीं हुई |

परन्तु अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था ने उसके मार्ग में बाधा खड़ी कर दी | कार्नेलिया ने समझोता करना स्वीकार कर “उपाधि ना तो ना सही परन्तु कम से कम उसे पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति तो भी प्रदान की जाए |” यह उसका चंचु प्रवेश था | आय. सी. एस के विद्यार्थियों के साथ वह कक्षा में बैठने लगी | अभ्यासक्रम पूरा होने पर एक कदम आगे की ओर अब कार्नेलिया ने परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी | बड़ी मुश्किल से मिली वह भी सशर्त ! स्त्री के रूप में मेट्रन की देखरेख में अलग कक्षा बैठना | ऊपर से मल्लिनाथी यह की ‘इस पर तो तुम्हे कोई एतराज नहीं होगा’? क्यों नहीं होना चाहिए? वह यूनिवर्सिटी की परीक्षा लगेगी ही नहीं और बाद में जब कभी लडकियों को इस परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलेगी तब मेरी यह उपाधि कम दर्जे की अवश्य कहलाएगी | 
कितनी यह दूरदृष्टि? यह आत्मनिष्ठा से पैदा हुई थी | 

एक बार फिर से गव्हर्निंग बोर्ड की बैठक हुई और उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति प्रदान की गई | उसे शानदार सफलता मिली और १८८५ में प्रतिष्ठित शिष्यवृत्तियां भी मिली | १८८८ में अंग्रेजी भाषा में वह सर्वप्रथम आई छः  विद्यार्थियों में वह एकमेव स्त्री थी |

अब उपाधि तो मिल गई पर सनद नहीं मिली | बड़े प्रयासों के बाद ली एंड पेबर्टन में काम तो मिल गया पर इस सर्टिफिकेट के लिए उसे फीस भरना पड़ी | काम करते करते एक टायटल डीड में हुई गलती उसने मेनेजर की नज़रों में ला दी | इससे कंपनी को बहुत लाभ हुआ, कंपनी के पैसे बचे | उन्होंने उदार होकर सर्टिफिकेट के लिए लगनेवाली फीस माफ़ कर दी | कितना यह औदार्य ! सर्टिफिकेट मिला वह भी केवल काम का | सनद का तो प्रश्न ही नहीं उठता |

लंदन में उसका उठना-बैठना बड़े लोगों में था जो उसके ऊंचे बौदधिक स्तर के कारण था | उनमें लार्ड मैक्समुलर, लेडी कार्लाइल, बर्नाडशा जैसे अनेक नाम थे | रानी विक्टोरिया की गार्डन पार्टी का आमंत्रण आया तो उसने भारतीय पोशाक का आग्रह किया और नौकरशाही से विवाद कर कर अंत में गुलाबी रंग की साडी पहनी जिसकी रानी ने भी बड़ी प्रशंसा की |

१८९४ में भारत लौटी तो उसे पहली नौकरी दी बड़ोदा महाराज ने | बडोदा में उसी समय सख्ती से सार्वत्रिक शिक्षा आरंभ हुई थी | उस प्रयोग की सफलता आजमाने के लिए कार्नेलिया की नियुक्ति हुई थी | महाराज को कार्नेलिया से बोटिंग सीखना था साथ ही उससे अंग्रेजी आचार पद्धति भी जानना थी | कार्नेलिया ने रिपोर्ट देते समय जरा कुछ अधिक साफगोई अपनाते हुए यह लिखा की किसान चिढ़े हुए हैं, उनके बच्चों को कपास निकालने के लिए समय नहीं मिलता | उनका कहना है कि व्यापारियों के बच्चों को शिक्षा दो हमें क्यों ? कार्नेलिया की नौकरी समाप्त हो गई |

उसे स्त्रियों के उत्तराधिकार, भूमि मालिकाना अधिकारों के मामलों में काम करना था | सिविल मुकदमों के काम करना हो तो सनद चाहिए | कार्नेलिया भारत में फिर से एल. एल. बी. की परीक्षा में बैठी और पास हुई फिर भी उसे सनद प्रदान नहीं की गई |

ब्रिटिश सरकार ने उसकी पर्दानशीन स्त्रियों की समस्याओं के लिए नियुक्ति की यह उसका पसंदीदा काम था | स्त्रियों के लिए काम कर उनके अधिकार उन्हें दिलवाना | परदानशीन औरते खुलकर पुरुष वकीलों से बात नहीं कर सकती इस कारण उनके अधिकारों का हनन होता है यह बात वह जानती थी | मालमत्ता, जीविका, उत्तराधिकार, स्त्रीधन इन विषयों में अपने ज्ञान का लाभ वह इन स्त्रियों को दे सकी | उसने ६०० से अधिक महिलाओं और अनाथ बच्चों को कानूनी लड़ाई लड़ने में सहायता की | इन विषयों पर उसने अनेक पुस्तकें लिखी |

बाद में वह कोलकाता में काम करने लगीं | १९०४ में कोर्ट ऑफ़ वर्ड्स के रूप में उसकी नियुक्ति कोलकाता में हुई | दायभाग पद्धति के कारण बंगाल में उत्तराधिकार प्रश्नों का बहुत महत्व था | १९०७ में बंग-भंग आंदोलन के बाद उनकी कोलकाता की नियुक्ति रद्द हो गई |

कार्नेलिया का भाई परदेश से सनद लेकर लौटा और अहमदाबाद में वकालत करने लगा | कार्नेलिया को भी सनद मिले इसके लिए वह प्रयत्न करने लगा | हाईकोर्ट ने फिर से विचार किया और अंत में उत्तर दिया “जब तक इंगलैंड में स्त्री वकील नहीं तब तक भारत में वैसी प्रथा शुरू करना इंगलैंड का अपमान करने जैसा होगा |”

कार्नेलिया अब ऊब चुकी थी | जो उसे पसंद था, आता था, करना चाहती थी जिसके लिए अनथक प्रयास किए वह कर नहीं पा रही थी | अब बदलते ज़माने के साथ मिशनरी काम की ओर देखने की जनता की वृत्ति भी बदल गई थी | उसके माता-पिता भी नहीं रहे | खाली बैठी कार्नेलिया अपना मन दुनिया घुमने में लगाने लगी साथ ही लेखन द्वारा उसने अपने अनुभव लोगों के सामने रखे इसके द्वारा उसने अपने माता–पिता और अपनी बहन के कार्यों की प्रशंसा की | तत्कालीन सामाजिक जीवन से वे एकरूप हो गए थे | विषेशतः न्यायमूर्ती रानडे, रमाबाई रानडे, पंडिता रमाबाई इनके साथ उनका बहुत सम्बन्ध आया | उनकी अंग्रेजी पाठशाला में राजघरानो के बच्चे पढने आते थे | वहां अंग्रेजी संस्कृति, इतिहास आचार-विचार इस पर जोर रहता था | परन्तु इसी के साथ बराबरी से चल रहे गरीब हिन्दू और मुस्लिम लडके-लडकियों की स्कूलों में  भारतीय भाषाओँ में शिक्षा दी जाती थी | स्वच्छता, आरोग्य और आसपास के क्षेत्र का इतिहास-भूगोल वहां प्रमुखता से सीखाया जाता था |  
    
कार्नेलिया ने डा. रखमाबाई का अनुसरण किया उसने सारे दरवाजे खटखटाए परन्तु उसे न्याय नहीं मिला तो नहीं मिला ! उसने भी पुरुषों की पर्वाह नहीं की परन्तु, कटुता भी नहीं रखी | उसे जो यश मिला था उसका अहंकार न रख आनंदीबाई, रखमाबाई, काशीबाई कानिटकर, पंडिता रमाबाई की तरह शांत बनी रही |

स्त्रियों के बारे में लिखे गए कार्नेलिया के लेखों का बहुत महत्त्व है | परदे के पीछे रहनेवाली इन स्त्रियों के दुःख उसने समाज के सामने लाए | वे स्त्रियां हैं इसलिए परिवार, समाज और राज्यकर्ताओं ने उन पर हमेशा अन्याय ही किए थे | स्त्रियों के बारे में लिखे गए उसके लेखों का बड़ा महत्त्व है | परदे के पीछे रहनेवाली इन स्त्रियों के दुःख वह समाज के सामने लाई | इस सम्बन्ध में उसकी भूमिका किसी समाज सुधारक से कम नहीं रही | स्त्रियों के रूप में परिवार ने, समाज ने और राज्यकर्ताओं ने उन पर हमेशा जुल्म ही ढाए |
 जनाना डवेल्लर्स, बिटवीन द ट्वीलाइटस, इंडिया कालिंग इन तीन पुस्तकों में उसने इन अन्यायों की दास्ताँ बयां की है | अंग्रेजों ने उसके इन कार्यों की हमेशा प्रशंसा की है | भारतीय और आंग्ल दोनों ही संस्कृतियों द्वारा पुरुषी वर्चस्ववाले क्षेत्रों में स्त्रियों को प्रवेश नहीं करने देने की प्रवृतियों के विरुद्ध उसने सतत संघर्ष किया आवाज उठाती रही | अंत में यह जुनूनी भारत की पहली महिला वकील लन्दन में बस गई और ६ जुलाई १९५४ को उनका निधन हो गया |



Friday, 25 January 2019

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान - शिरीष सप्रे

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान
शिरीष सप्रे

भारत में स्वाधीनता की लड़ाई हिंसक और अहिंसक दोनों ही तरीकों से लड़ी गई और इतिहास साक्षी है कि, अवसर मिलने पर भारत की महिलाऐं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रही हैं और स्वाधीनता आन्दोलन कोई अपवाद नहीं | भारत के स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं ने पुरुषों के साथ महत्वपूर्ण भाग लिया है |

सन १७५७ में प्लासी की हार के बाद १७५७ से १८५७ तक पूरी एक शताब्दी का इतिहास इन विद्रोहों से भरा पड़ा है | इन सभी विद्रोहों में स्त्रियों की भी न केवल व्यापक भागीदारी रही, बल्कि कई बड़े विद्रोहों में उनका कुशल नेतृत्व रहा है | जैसे सन्यासी विद्रोहों का संचालन देवी चौधरानी ने, चुआड विद्रोह का रानी शिरोमणि ने, कित्तूर विद्रोह का रानी चेन्नमा ने किया |

१८५७ के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई तथा बेगम हजरत महल का नाम विशेष उल्लेखनीय है | यों रानी रामगढ, रानी तुलसीपुर, रानी तेज बाई, बेगम जमानी आदि अन्य कई रानियों, बेगमों ने अपने जौहर कम नहीं दिखाए थे | महारानी तपस्विनी का भूमिगत क्रांति संगठन तो गजब का था |


इन सभी विद्रोही, क्रांतियों के दौरान हजारों हजार स्त्रियां फांसी, गोली का शिकार हुई | कई घर बर्बाद हुए पर क्रूर दमन के बावजूद, विद्रोह दबे नहीं, यहां - वहां फूटते रहे, जिनमें निचले तबकों की गरीब स्त्रियों की भागीदारी भी कम नहीं रही | कुका आंदोलन प्रसिद्ध है इस आंदोलन में हुकमी और इंदकौर नामक औरतों ने सक्रिय भाग लिया | महारानी तपस्विनी को कुछ समय के लिए जेल में बंद रखा गया था, वह महारानी लक्ष्मीबाई की भतीजी लगती थी | लक्ष्मीबाई की दो दासियों मुंदरा और काशीबाई ने भी अंत तक युद्ध में साथ दिया और वीरगति प्राप्त की |

पर अभी तक के इन विद्रोहों का स्वरुप व महत्त्व प्रायः क्षेत्रीय या स्थानीय था | इसलिए आगे चलकर राष्ट्रिय मुक्ति संघर्ष के रूप में देश व देश के बाहर जो क्रांतिकारी संगठन बने तरुण भारत सभा, भारत मेला, अभिनव भारत समिति, मित्र मेला, युगांतर दल, अनुशीलन समिति, दीपाली संघ, श्री संघ, ग़दर पार्टी, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी, भारत नौजवान सभा, आदि | उनकी गुप्त कार्यवाहियों में बिखराव के बावजूद, उनका उददेश्य समान था और स्वरुप राष्ट्रिय |

इन संगठनों के संपर्क सूत्र न केवल पूरे भारत में फैले थे अपितु देश के बाहर ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान, इटली तक प्रवासी भारतीय क्रांतिकारी इनसे जुड़े थे | बहुत से लोग तो अहिंसक लड़ाई लड़नेवाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहकर भी कांग्रेस के भीतर गरम दल की गरम जोश गतिविधियों और कांग्रेस से बाहर गुप्त क्रांति गतिविधियों से एक साथ जुड़े थे |

महिलाएं भी इन गतिविधियों में न केवल शामिल थी कई जगह नेतृत्व भी संभाल रही थी | गरम दल की एक अग्रणी कार्यकर्ती डा. ऐनी बेसंट ने होम रूल लीग का गठन कर होम रूल आंदोलन का नेतृत्व किया | प्रवासी भारतीयों में भीकाजी कामा ने क्रांति का शंख फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई | सरफरोश प्रीतिलता ने एक्शन ग्रुप का नेतृत्व कर स्वयं आगे बठकर शहादत को गले लगाया | गवर्नर के बंगले में चालाकी से प्रवेश कर दो छोटी लडकियों शांती और सुनीति ने गवर्नर पर गोली चलाकर सारे देश में तहलका मचा दिया | पूरा क्रांति इतिहास अनेक किशोरियों और युवतियों के इस प्रकार के साहसी कारनामों से भरा पड़ा है | यहां तक कि क्रांतिकारियों को गुप्त सहायता करने के आरोप में भी पकड़ी जाकर उन्हें दो से आठ साल तक की लम्बी सजाएं हुई हैं |

रानी मां के रूप में जानी जाने वाली रानी गेडीनिल्यु ने १९२० और १९३० के दशक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और औपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष किया | उन्हें अक्टूबर १९३२ में गिरफ्तार किया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई | वे १४ साल जेल में रही | उनके भाई जदोनांग को १९३१ में फांसी पर लटका दिया  गया | रानी मां कट्टर गांधीवादी थी और उन्होंने कहा था
- ‘महात्मा गांधी एक बार गुवाहाटी आए थे | तब उन्हें माला पहनाने का सम्मान मुझे मिला था | तब से मैं अहिंसा और महात्मा गांधी के सभी संदेशों की अनुयायी बन गई |’ गेडीनिल्यु को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने १९३७ में उस समय रानी की उपाधि दी थी, जब उन्हें पूर्वोत्तर क्षेत्र के दौरे के समय इस साहसी महिला के बारे में पता चला था | 
                                     

सन 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में देश की महिलाओं ने घुंघट और बुरका उतारकर आजादी की लड़ाई में बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया | १९४२ के भारत छोडो आंदोलन में भी महिलाओं ने बढ-चढ़ कर भाग लिया | इसी तरह स्वतंत्रता-आंदोलन में दक्षिण भारतीय महिलाओं की न तो भूमिका कम रही ना ही बलिदान |  

Saturday, 19 January 2019

धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर - शिरीष सप्रे


धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर
शिरीष सप्रे

 रामायण-महाभारत में इन्हें धन के देवता के रूप में वर्णित किया गया है | इस पृथ्वी पर जितना भी धन है उसका अधिपति इन्ही को बतलाया गया है | भूगर्भ में जितना भी धन है उसका स्वामी भी इन्हीं को बतलाया गया है | यह सारी संपती इन्हें ब्रह्माजी द्वारा प्राप्त हुई है | इनकी उत्पत्ति महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा और महर्षि भरद्वाज की पुत्री इलाविला के विवाह से हुई | कठोर तपश्चर्या से इन्होंने लोकपाल का पद प्राप्त किया |

श्वेत वर्ण, तुंदिल शरीर अष्ट दन्त गदाधारी कुबेर अपनी सत्तर योजन में फैली विस्तृत नगरी वैश्रवणी में विराजते हैं | इनके पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा नारदजी के शाप से मुक्त होने के पश्चात इन्हीं के समीप रहते हैं और अनुचर सदैव इनकी सेवा में रहते हैं | भगवान् कुबेर मनुष्य के अधिकार के अनुरूप कोष का प्रादुर्भाव या विरोभाव करते हैं | भगवान् शंकर ने कुबेर को अपना नित्य सखा माना है | प्रत्येक यज्ञ के अंत में इन वैश्रवण राजाधिराज को पुष्पांजलि दी जाती है | जो इस प्रकार है –
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने | नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ||

इस धन देवता कुबेर की नगरी का नाम अलकापुरी है | इनकी कृपा से ही भूगर्भ निधि प्राप्त होती है | निधि विद्या में निधि सजीव मानी गई है, जो स्वतः स्थानान्तरित होती है | योग्य और पुण्यात्मा शासक के समय में मणि - रत्नादी स्वतः प्रगट होते हैं | वर्तमान में जो स्वतः प्रगट रत्न विश्व में नहीं है इसका कारण अधिकांश मणि, रत्न लुप्त हो गए हैं क्योंकि, आज का मानव इन्हें उपभोग्य मानता है | यज्ञ दान के अवशेष का उपभोग हो यह वृति लुप्त हो गई है |

 एक बार देवी भगवती उमा पर इनकी कुदृष्टि गई तो इनका एक नेत्र जाता रहा और दूसरा पीला हो गया | अतः कुबेर एकाक्ष; एक आंखवाले पिंगली कहलाते हैं | इनका शरीर कुबडा होकर; अस्त्र गदा होकर वाहन पालकी है | कुबेर अपने पिता ऋषि विश्रवा को छोड़कर पितामह ब्रह्मा के पास चला गया और उनकी सेवा करने लगा | इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया साथ ही धन का स्वामी बनाकर लंका का अधिपति भी बना दिया और पुष्पक विमान प्रदान किया | इनकी पत्नी दानव मुरका की बेटी थी |

रावण इनका सौतेला भाई था उसने तपश्चर्या से ब्रह्मा को प्रसन्न कर मनचाहे रूप धारण करने एवं सिर कटने पर पुन्ह सिर उग आने का वरदान प्राप्त किया | वर पाकर वह लंका आया और कुबेर को लंका से निकाल बाहर किया | कुबेर निष्काषित होकर गंधमादन पर्वत पर आ गए |बौद्ध ग्रन्थ दीर्घ निकाय के अनुसार कुबेर पूर्व जन्म में ब्राह्मण होकर ईख के खेत के स्वामी थे और एक कोल्हू की आय दान कर देते थे | इस प्रकार २० हजार वर्षों तक वह दान करते रहे इसके फलस्वरूप इनका जन्म देवों के वंश में हुआ |

सतपथ ब्राह्मण में कुबेर को राक्षस बतलाया गया है और दुष्टों तथा चोरों का एवं यक्षों का नेता |  जैन, ब्राह्मण और वैदिक साहित्य में इनका उल्लेख कुबेर नाम से ही है | कुबेर उत्तर दिशा के दिगपाल हैं और इन्हें सोना निकालने की कला का जानकार भी बतलाया जाता है |

इनकी नगरी अलकापुरी कैलाश पर्वत पर होकर वहां उद्यान, झीलें एवं सुन्दर महल हैं | यहां से अलकनंदा निकली है | कौटिल्य ने लिखा है कुबेर की मूर्ती खजाने में स्थापित की जाना चाहिए | कुबेर का निवास वटवृक्ष कहा गया है | वराह पुराण के अनुसार कुबेर की पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को की जाती है, लेकिन आजकल दीपावली पर धन की पूजा की जाती है | इनको प्रसन्न करने के लिए महामृत्युन्जय के जप की कम से कम दस हजार आवृतियां जरुरी हैं | वैदिक साहित्य में इनका स्थान बहुत ऊँचा है | 

    
   


Monday, 14 January 2019

मकर संक्रांति उत्सव - शिरीष सप्रे


मकर संक्रांति उत्सव
शिरीष सप्रे

जब एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं | इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं | मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं | वैदिक साहित्य में उत्तरायण के लिए उद्गयन, देवयान आदि शब्द देखने को मिलते हैं | उत्तरायण के काल को शुभ समझा जाता था | पितामह भीष्म तब तक शर शय्या पर लेटे रहे, जब तक उत्तरायण का आरम्भ नहीं हुआ |

 इस संक्रांति का विशेष महत्त्व है | इसे मोक्षकारक भी माना जाता है | कर्क राशि से सूर्य दक्षिणायन होते हैं | इस तरह मकर से मिथुन तक सूर्य उत्तरायण व कर्क से धनु राशि तक दक्षिणायन रहते हैं | प्रत्येक राशि का ग्रहों को प्रभारी बनाकर अधिपति बनाया है | सूर्य को सिंह, चन्द्रमा को कर्क, मंगल को मेष व वृश्चिक, बुध को कन्या व मिथुन गुरू को धनु व मीन, शुक्र को वृषभ व तुला तथा शनि को मकर व कुम्भ राशि का अधिपति बनाया है |
       
वस्तुतः पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है, पर हमें यही आभास होता है की आकाश मार्ग में सूर्य ही स्थिर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है | सूर्य के इस दिखाऊ आकाश मार्ग को क्रांतिवृत्त का नाम दिया गया है | इस क्रांतिवृत्त को १२ समान भागों में विभक्त करके इन्हें मेष, वृषभ, मिथुन, धनु, मकर, कुम्भ, आदि राशिनाम दिए गए हैं | सालभर में इन बारह राशियों में से सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं यानी बारह संक्रांतियां होती हैं | 

सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है | सूर्य का उत्तरायण प्रवेश अत्यंत शुभ माना जाता है | उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले की उर्ध्वगति होती है उसे गोलोक वास की प्राप्ति होती है | भारतीय संस्कृति में इस पर्व का विशेष महत्त्व है | संक्रांति काल को पुण्य काल माना जाता है | उस दिन समुद्र या प्रयाग  गंगासागर जैसे तीर्थों में स्नान किया जाता है और उस दिन इन स्थानों पर बड़े मेले लगते हैं | संक्रांति में तिल का काफी प्रयोग होता है, विशेषकर दक्षिण भारत में |

महाराष्ट्र में तिल-गुड बांटा जाता है और कहा जाता है – ‘तिल-गुड लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए’ | बंगाल में तिल मिलाकर ‘तिलुआ’ नामक एक पदार्थ बनाया जाता है, इसलिए मकर संक्रांति को तिलुआ-संक्रांति भी कहते हैं | उत्तर भारत में दाल और भात की खिचड़ी पकाते हैं और दान देते हैं, इसलिए संक्रांति को खिचड़ी- संक्रांति भी कहते हैं |

कालिका पुराण के अनुसार उत्तरायण में सदैव तिल्ली का हवन करना श्रेष्ठ बताया है | जिस व्यक्ति का जन्म उत्तरायण में हुआ हो उसे भगवान् के मंदिर में और ब्राह्मण को स्वर्ण सहित तिल्ली दान करने पर कभी दुःख और शोक नहीं होगा | तिल्ली को ग्रंथों में पापनाशक बताया है | इसी दिन पवित्र नदियों में स्नान की भी परंपरा है | संक्रांति से ही सूर्योपासना प्रारम्भ करना शुभ फलदायक है |

इसी समय दक्षिण भारत में तीन दिवस चलनेवाला ‘पोंगल’ नामक महोत्सव मनाया जाता है | दूसरे दिन का उत्सव ‘सूर्य पोंगल’ कहलाता है | इस दिन दूध और चावल की खीर पकाई जाती है | पोंगल शब्द का अर्थ ही है पकाना | अर्थात् पोंगल एक प्रकार का पाकोत्सव है |

आज मकर संक्रांति एक सामाजिक उत्सव में रूपांतरित हो गई है और इसके साथ कुछ धार्मिक अंधविश्वास भी जुड़ गए हैं | वैसे तो वैदिक कृषक समाज ने इस उत्सव को जन्म दिया था और प्राचीनकाल से एक आनन्दोत्सव के रूप में इसको मनाया जाता रहा है | 
         

Thursday, 10 January 2019

स्वामी विवेकानंद – जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय - शिरीष सप्रे


स्वामी विवेकानंद –
 जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय
शिरीष सप्रे

स्वामी विवेकानंद भारतीय परंपरा की ऊर्जावान धारा के सर्वाधिक प्रगतिशील संत, विचारक और पुरोधा रहे हैं | कबीर के बाद धर्मान्धों, कर्मकांडवादियों, जातिवाद, शोषण, अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय रचनात्मक अभियान चलानेवाले रहे हैं | भारत के नवनिर्माण के लिए स्वामीजी को देश के युवाओं से बड़ी अपेक्षाएं थी | वे भारतीय चिंतन, भारतीयता, हिन्दू धर्म पर जोर देते थे तो उसका अर्थ समूची मानव जाति के जीवन मूल्यों का अर्थ था | उन्होंने लिखा भी था कि ‘तुम हिन्दू कहलाने के अधिकारी हो, जब इस नाम को सुनते ही तुम्हारी रगों में शक्ति की विद्युत तरंग दौड़ जाए | लेकिन हिन्दू कहलाने के अधिकारी तब ही हो जब व्यक्ति का दुःख-दर्द तुम्हारे ह्रदय को इतना व्याकुल कर दे, मानो तुम्हारा अपना पुत्र संकट में हो |’

स्वामी विवेकानंद के पूरे जीवन दर्शन का प्रमुख वैचारिक बिंदु था कि, ‘भारतीय जीवन का मुख्य आधार धर्म है | हमारे देश का धर्म हिन्दू धर्म है | धर्म केवल वह धुरी मात्र नहीं है जिसके माध्यम से भारत में पुनर्जागरण हुआ है, बल्कि भारतीय ऋषियों ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया है वह वही परम लक्ष्य है, जिसे पुनर्जाग्रत भारत को प्राप्त करना है | यह वह अमूल्य मणि है जिसके प्रकाश से हमें विश्व को प्रकाशित करना है |’

नवयुवकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था – ‘ए वीर साहस का अवलंबन करो, गर्व से कहो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, तुम चिल्लाकर कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी सब मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियां मेरे ईश्वर हैं, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है |’  

स्वामी विवेकानंद ने १८९७ ई. कहा था – ‘’सुदीर्घ रजनी अब समाप्त हुई जान पड़ती है | महादुख का प्राय: अंत ही प्रतीत होता है | महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहा है | इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनान्धकार को भेद करने में अनुश्रुतियां भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है | ज्ञान, भक्ति और कर्म के अनंत हिमालय स्वरुप  हमारी मातृभूमि भारत की हर एक चोटी पर प्रतिध्विनित होकर यह आवाज मृदु, दृढ़ परन्तु अभ्रांत स्वर में हमारे पास तक आ रही है | जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और स्पष्ट तथा गंभीर होती जाती है और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है | जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है | जो अंधे हैं, वे देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं, वे ही समज नहीं सकते कि हमारी हमारी मातृभूमि अपनी निद्रा से जाग रही है | अब उसे कोई रोक नहीं सकता | अब यह फिर सो भी नहीं सकती | कोई बाह्यशक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती, क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है |’’

हे युवकों, सारे विश्व की दृष्टी आज भारत में लगी हुई है | तृतीय सहस्त्राताब्दी   में भारत को अपनी भूमिका निभानी है, विश्व को शांति, और अमृत्व के पथ पर नेतृत्व देना है | भारतीय संस्कृति और परम्पराओं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति की आज आवश्यकता है और वह भारत ही दे सकता है, क्योंकि आध्यात्मिकता भारत का मेरुदंड है, उसे तो जीने के लिए भी आध्यात्मिक होना ही पड़ेगा और ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ समस्त पृथ्वी के मानव को पथ दिखा कर अपना कर्तव्य निभाना होगा |

स्वामीजी कहते थे – ‘’अपने स्नायु बलवान बनाओ, आज हमें जिसकी आवश्यकता है, वह है, लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु | हम लोग बहुत दिन रो चुके | अब और रोने की आवश्यकता नहीं | अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और ‘मर्द’ बनो | हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें | हमें ऐसे सिद्धांतों की जरुरत है, जिससे हम मनुष्य हो सकें | हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके और यह रही सत्य की कसौटी, जो भी तुमको शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टी से दुर्बल बनाए उसे विष की तरह त्याग दो, उसमें जीवन शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता | सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रता है, वह ज्ञानस्वरूप है | सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो ह्रदय के अन्धकार को दूर कर दे, ह्रदय में स्फूर्ति भर दे | अपनेआप पर विश्वास रखो कि प्रत्येक की आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है | तभी तुम सारे भारतवर्ष को पुनर्जीवित कर सकोगे | फिर तो हम दुनिया के सभी देशों में खुले आम जाएंगे और आगामी १० वर्षों में हमारे भाव उन सब विभिन्न शक्तियों के एक अंशस्वरुप हो जाएंगे, जिनके द्वारा संसार का प्रत्येक राष्ट्र संगठित हो रहा है |”

स्वामी विवेकानंद ने हमें सीखाया है कि भारत का नवनिर्माण हम भारत के प्रति अगाध प्रेम रखकर ही कर सकते हैं | जिस किसीने स्वामीजी के अग्नि वचनों को सुना उसीमें राष्ट्रीयता की लहर आई है | भारत को यदि पुनर्जीवित करना है तो हमें अवश्य ही उसके लिए काम करना होगा |अनाथ, दरिद्र, निरक्षर और कृषक व श्रमिक ही हमारें लक्ष्य हैं, पहले उनके लिए काम करने के बाद अगर समय रहा तो कुलीन की बारी आएगी | विवेकानंद ने समाज की नब्ज पर हाथ रखा था | उनका तमाम चिंतन दरिद्र के झोपड़े से गुजरता था | शोषण के खात्मे से होकर अध्यात्म में जाता था |




Friday, 28 December 2018

मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी - शिरीष सप्रे


 मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी  
शिरीष सप्रे

संसार में आज अनेक प्रकार के कैलेंडर्स प्रचलित हैं | उनमें रोमन, भारतीय, यहूदी और इस्लामी कैलेंडर प्रमुख हैं | इनमें ३६५ दिन का रोमन कैलेंडर ही विश्व में अधिकाधिक उपयोग में लाया जाता है | कैलेंडर दो प्रकार के होते हैं - चान्द्र वर्ष और सौर वर्ष आधारित | भारत का हर परंपरागत किसान सौर वर्ष चन्द्र मास दोनों को जानता है |

सौर वर्ष ३६५ दिन से एक चौथाई अधिक का होता है | चन्द्र वर्ष ३५४ दिन का होता है | इसीलिए चन्द्र वर्ष गणना में तीन वर्षों में एक अधिक मास की व्यवस्था है | मुसमानों में वह नहीं है, तो इससे चन्द्र तिथि की उनकी गिनती तो ठीक ही रहती है | बस, धार्मिक पर्व भिन्न-भिन्न ऋतुओं एवं महीनों में पड़ते रहते हैं | जिसमें उन्हें कोई हर्ज नहीं दिखता | रमजान या मुहर्रम कभी गर्मी में होगा, कभी वर्षा, कभी शरद, कभी हेमंत, कभी शिशिर में |

ईसाइयों में चन्द्रमा से जुडा एक ही विशेष पर्व है – ईस्टर, जो कि २१ मार्च की पूर्णिमा या कि उसके बाद जब भी पहली पूर्णिमा पड़े, उसके बाद आने वाले पहले रविवार को पड़ता है और यह ईस्टर का त्यौहार सन १५८२ ईस्वी के पहले, जब जूलियन कैलेंडर बहुत दोषपूर्ण था तब तो भिन्न-भिन्न तारीखों में पड़ता ही था अब भी वह २२ मार्च से २५ अप्रैल के बीच भिन्न-भिन्न तारीखों में पड चूका है सुधारे हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर के बावजूद | भारत में तो अधिक मास की व्यवस्था ऋग्वेद काल से भी पहले से है | इसलिए यहां चान्द्र और सौर वर्ष में सामंजस्य रखा जाता रहा है |
 
सभी प्राचीन संस्कृतियों में ‘काल गणना’ प्रमुखता से चन्द्र भ्रमण पर आधारित थी | क्योंकि,  पूर्ण चन्द्र से पूर्ण चन्द्र यह काल निरीक्षण की दृष्टी से बहुत सुविधाजनक था | बेबोलियन संस्कृति में भी चन्द्र वर्ष से सम्बंधित कैलेंडर अस्तित्व में थे, इतना ही नहीं तो उस काल में चन्द्र वर्ष का सौर वर्ष से सम्बन्ध लगाने के लिए अधिक महिना रखने की परिपाटी थी इस प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं |

इजिप्शियन संस्कृति में भर व्याध तारे को केंद्रीभूत मानकर कैलेंडर बनाए जाते थे | क्योंकि पूर्व दिशा में सूर्योदय के पूर्व व्याध तारे के दर्शन होने लगने के बाद कुछ समय में ही नाईल नदी में बाढ़ आ जाती थी | इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि व्याध का उदय और नाईल नदी में बाढ़ इसको कैलेंडर की दृष्टी से महत्त्व प्राप्त हो गया | ‘व्याध का पूर्व दिशा में उदय’ से पुनः व्याध का पूर्व में उदय यह काल लगभग ३६५ दिन का था, इस कारण ईजिप्शियन कैलेंडर ३६५ दिन का था | वर्ष में ३६५ दिन यह ईजिप्शियन संस्कृति की एक देन ही है |

प्राचीनकाल में यहूदी खगोल शास्त्रीय अध्ययन में अधिक रूचि नहीं लेते थे | कहा जाता है कि उन्होंने अपने पड़ोसी देश बेबीलोनिया का कैलेंडर ही अपनाया | सप्ताह सर्वप्रथम यहूदियों द्वारा ही समय की ईकाई के रूप में चलन में आया | यूनान के निवासियों ने भी चान्द्र वर्ष पर आधारित कैलेंडर बनाया था | इस कैलेंडर में भी बाद में कई सुधार किए गए |

चीनी कैलेंडर का साल आमतौर पर बारह चन्द्र-मासों का होता था | सौर वर्ष से सामंजस्य बिठाने के लिए जिस वर्ष तेरहंवा महीना जोड़ा जाता, उसे पूर्ण वर्ष कहा जाता था |  
           
आज जिस कैलेंडर से हम तारीख और महीने का हिसाब लगाते हैं उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं | क्योंकि, पोप ग्रेगोरी तेरहवें ने इस कैलेंडर में कई क्रांतिकारी सुधार किए थे | अंग्रेजी ‘कैलेंडर’ यह शब्द कैलेंडर्स इस रोमन शब्द पर से आया है | इसका अर्थ होता है महीने का प्रथम दिन | वैसे कैलेंडरों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और रोचक इतिहास रोमन रिपब्लिकन कैलेंडर का है | जो एक अलग लेख का विषय है | इनका ‘कैलेंडर’ चान्द्र कैलेंडर है |

लैटिन भाषा के शब्द ‘कलेंडे’ से कैलेंडर शब्द आया है | हिन्दी में कैलेंडर का अर्थ पंचांग-पत्रा या तिथि-पत्रक होता है | किसी भी कैलेंडर को देखने से हमें यह पता चलता है कि साल के किस महीने में कौन सा दिन किस तारीख या तिथि को पड़ता है या कौन सी तिथि या तारीख किस दिन पड़ती है | अधिकतर कैलेंडरों से त्यौहारों, पर्वों, ऐतिहासिक महत्त्व के दिनों का भी पता चलता है |

वैसे यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ‘कैलेंडर’ शब्द भी पूर्णतः भारतीय है | वास्तव में कैलेंडर शब्द ‘कालांतर’ शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है | विश्व  की किसी भी अन्य भाषा में समय को काल या कैलेंडर से मिलते-जुलते नाम से संबोधित नहीं किया जाता है | कैलेंडर शब्द की रोमन उत्त्पत्ति की कथा अविश्वसनीय और अजीब है | रोम में साहूकार लोग ब्याज का हिसाब लगाने की जिस पद्धति का उपयोग करते थे, उसे कैलेंडियम कहा जाता था | जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता था, उस दिन पूरे नगर में ढोलक पीटकर, आवाजें लगाकर यह बताया जाता था कि नया वर्ष शुरू हो गया है |  
     
भारत में सृष्टि संवत्, विक्रम संवत्, कृत संवत्, मालव संवत्, शक संवत्, वर्धमान संवत्, बुद्ध निर्वाण संवत्, सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत्, परशुराम संवत्’, आदि कैलेंडर्स प्रचलित हैं | ई. स. पूर्व ५४५ वर्ष पहले बौद्ध धर्म का आरम्भ वैशाख पूर्णिमा को हुआ था | विक्रम संवत् का उपयोग विशेष कर उत्तर भारत, राजस्थान और गुजरात में किया जाता है |

विक्रम संवत् को सानंद विक्रम संवत्, संवत् विक्रम, श्रीनृप विक्रम संवत् और मालव संवत् के नाम से भी जाना जाता है | इस संवत् का प्रारम्भ ई. पू . ५७ व ५८ के मध्य राजा विक्रमादित्य के द्वारा किया गया | यह संवत् धार्मिक महत्त्व का है तथा भारतीय वर्ष की शुरुआत ‘गुढीपाडवा’ से मानते हैं |

भले ही विक्रम संवत् सारे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो भी वह सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार वर्ष के दिनों में हमेशा कम या अधिक होते रहने के कारण दिन और महीनों की ठीक से गिनती करना सर्वसाधारण लोगों के लिए संभव हो नहीं पाता | इसी कारण से सारे देश में एकरूपता लाने के लिए भारत सरकार ने शक, संवत् में योग्य प्रकार से संशोधन कर ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ (पंचांग) ई.स. १९५७ में २२ मार्च से शुरू किया | (उस दिन भी संवत् १८२७ की चैत्र शुद्ध प्रतिपदा ही थी)

शक संवत् शक राजाओं के काल में शुरू हुआ था | दक्षिण की ओर के ब्राहमण ज्योतिष की गणना करने के लिए अथवा जन्म पत्रिका बनाने के लिए इसको उपयोग में लाते हैं | ई.स. की अपेक्षा शक संवत् ७८ वर्षों से पीछे (कम) है |

आजकल प्रायः सभी देशों में व्यवहारिक रूप से ही सही ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है | धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम और कुछ अन्य धर्मावलम्बी धार्मिक पारिवारिक कार्यों के लिए अपने-अपने पंचांग या तिथि पत्रक उपयोग में लाते हैं | इसी तरह वित्त वर्ष पहली अप्रैल से ३१ मार्च तक बहुत से स्थानों पर माना जाता है |