Tuesday, 13 February 2018

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य - शिरीष सप्रे

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य
शिरीष सप्रे
शिवजी की उपासना पूरे भारत में अनादिकाल से चली आ रही है। भगवान शिव शंकर की हर बात निराली और रहस्यमय है। उनका सारा क्रियाकलाप विरोधाभासों से भरा हुआ है। शिव की नगरी काशी में तो शिव का प्रतीक शव को मानकर लोग सिर पर हाथ रखकर प्रणाम करते हैं। शिवजी की उपासना दो प्रकार से करते हैं। शिवलिंग और शिवमूर्ति के रुप में। अधिकांश मंदिरों में शिवलिंग के रुप में ही पूजा होती है।

शिवजी के हाथ में डमरु विश्व प्रतीक के रुप में है और ऐसा माना जाता है कि नाद की उत्पत्ति शिवजी द्वारा डमरु बजाने से हुई है। डमरु विश्व का अद्वैत भाव भी दर्शाता है। डमरु ज्ञान का उत्पत्ति स्थान है। महर्षि पाणिनी को  व्याकरण के बीज मंत्र डमरु के ध्वनि में ही मिले थे। कहते हैं स्वयं शिवजी ने उनके कान के पास डमरु बजाकर यह ज्ञान उन्हें दिया था। त्रिशूल का आयुध शस्त्र होकर उसके अनेक प्रतीकात्मक अर्थ हैं। वह चेतना की तीन स्थितियों जागृत, स्वप्न और निद्रावस्था को दर्शाता है। वह मानव के तीन तापों आधिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक को हरता है। एक शस्त्र के रुप में अभद्र, अमंगल और बुरी बातों को नष्ट करने की क्षमता का प्रतीक है। 

शिवजी का वाहन वृषभ यानी बैल है जो हमेशा शिवजी के साथ ही रहता है। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति में लिखा है 'वृषो हि भगवान धर्मः।" वेद धर्म को चार पैरोंवाला प्राणी कहते हैं। उसके चार पैर यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं और शिव इसी वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो उनके अधीन हैं। (इन्हें ही चार पुरुषार्थ भी कहा गया है, हिंदू धर्मानुसार पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है अर्थात हमारा ध्येय शिव की प्राप्ति होना चाहिए।)

अथर्ववेद में वृषभ को पृथ्वी का धारक, पोषक, उत्पादक बतलाया गया है। वृषभ एक राशि का नाम भी है। वृषभ किसानों और कृषि के लिए भी उपयोगी है। वृष का अर्थ मेघ भी है। वृष से ही वर्षा, वृष्टि आदि शब्द बने हैं। शिव अंतरिक्ष के देवता हैं और उनका एक नाम व्योमकेश भी है। अतः आकाश उनकी जटा स्वरुप है एवं जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं तथा वायु आकाश में व्याप्त रहती है। शिव जटाभार ब्रह्मांड के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रतीक है। शिवजी जटाधारी हैं और इस बारे में पुराणों में अनेक कथाएं है। गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्र स्वरुप उग्र और संहार के देवता हैं और उनकी उग्रता उनके मस्तिष्क में निवास करती है इसलिए शांति की प्रतीक गंगा और अर्धचंद्र शिव के मस्तिष्क पर विराजमान होकर उनकी उग्र वृत्ति को शांत और शीतल रखते हैं।

समुद्र मंथन के समय प्राप्त हलाहल विष का पान कर सृष्टि को बचाने के कारण उत्पन्न जलन को गंगा और चंद्रमा से शांति मिलती है। शिव का चंद्रमा स्वच्छ एवं उज्जवल है उसमें मलिनता नहीं। वह अमृत वर्षा करता है। क्योंकि, स्वयं शिव का विवेक सदैव जागृत रहता है और मस्तिष्क में कभी अविवेकी विचार नहीं पनपते। चंद्रमा का एक नाम सोम है जो शांति का प्रतीक है इसी कारण से सोमवार को शिव पूजन, दर्शन और शिवोपासना का दिन माना गया है। शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ है। चंद्रमा ने अपने शाप के निवारणार्थ शिवोपासना शिवलिंग स्थापित कर की और शापमुक्त हुआ। इसलिए इस शिवलिंग को सोमनाथ कहते हैं। त्रिनेत्रधारी शिवजी का एक निवास त्र्यंबकेश्वर है। त्र्यंबक (तीन नेत्र) धारी ईश्वर यहां है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को त्र्यंबकेश्वर महादेव कहते हैं। इस तीसरे नेत्र से ही शिवजी ने कामदेव का दहन किया था।

तमोगुणी सर्प या नाग को उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है। नागेश्वर एक ज्योतिर्लिंग का नाम भी है। हलाहल विष के पान से जिसे उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है उन्हें नीलकंठ भी कहते हैं। भारत में नागपंचमी को नागपूजन की परंपरा है। विद्वानों के मतानुसार नागपूजन आर्येत्तर संस्कृति को दर्शाता है। परस्पर विरोधी मतों में सामंजस्य निर्मित करनेवाले शिवजी ने इस भयंकर क्रूर सर्प को अपने गले का हार बना रखा है। यह गले में लपेटा हुआ सर्प या नाग कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। 

शिवजी के गले में मुंड माला भी है जो यह भाव दर्शाती है कि उन्होंने मृत्यु को गले लगा रखा है और वे मृत्यु से भयभीत नहीं। शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनो को अपने अधीन कर रखा है इसके प्रतीक स्वरुप वे व्याघ्र चर्म और हस्ती चर्म को धारण करते हैं। इस प्रकार के देवता शिवजी की उपासना सगुण और निर्गुण दोनो रुपों में की जाती है।

Friday, 2 February 2018

दक्षिण भारत में विवाह की पद्धतियां - शिरीष सप्रे

दक्षिण भारत में विवाह की पद्धतियां
शिरीष सप्रे

तमिल भाषा में विवाह को कल्याणम्‌ कहते हैं। तमिलनाडु के अय्यर समाज में विवाह की रस्म तमिल और वैदिक रीति से पूरी की जाती है। कल्याणम्‌ की दृष्टि से सभी बाते निश्चित होने के पश्चात यानी जन्मपत्री मिलान, लडके द्वारा लडकी (लडके, लडकी दोनो के द्वारा ही) को पसंद करने के पश्चात और लेन-देन की बातें निश्चित होने के बाद पहली विधि 'निश्चयार्थम्‌" (निश्चयाताम्बूलम) अर्थात्‌ सगाई की रस्म पूरी की जाती है। यह विधि लडके के घर पर ही पूरी होती है। अय्यर लोग कांचीपुरम्‌ के शंकराचार्य को मानते हैं इस कारण पत्रिका की शुरुआत 'कांचीपुरम्‌ के शंकराचार्य के अनुग्रह से" इस आशय के मज्कूर से पूर्ण होती है। विवाह के दिन वर एक विशिष्ट धोती 'अंगवस्त्रम्‌" धारण करता है। वह काशी जाने का नाटक करता है। हाथ में छडी, छाता लेकर, नई कोरी चप्पल पहनकर काशी यात्रा ेके लिए निकलने का इशारा देता है। फिर लडकी के पिता उससे प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि, मैं मेरी कन्या तुझे देता हूं, तू सन्यास मत ले। अंततः लडका मान जाता है। यह प्रथा लगभग सभी दक्षिण भारतीय जातियों में आज भी प्रचलित है।

विवाह संस्कार के समय पूरा श्रंगार कर दुल्हन को मंडप में लाया जाता है जहां वर-वधू एक दूसरे को माला पहनाते हैं। इस रस्म के पश्चात वर-वधू को झूले पर बैठाया जाता है इस विधि को 'ऊंजलपाट्ट" कहते हैं। 'ऊंजल" मतलब झूला। फिर नजर उतारी जाती है तत्पश्चात विवाह गीत गाए जाते हैं। इस विधि के पश्चात मुख्य मंडप में हिंदू विवाह पद्धति की सारी विधियां पूर्ण की जाती हैं। इसमें कन्या दान, मांगल्यधारणम्‌, लाजाहोम और सप्तपदी (सात फेरे) का समावेश होता है। लडका लडकी के गले में 'ताली" अर्थात्‌ मंगलसूत्र बांधता है। यह मंगलसूत्र हल्दी के धागे में बंधा होता है। इस धागे में चौकोर आकार की दो पेटियां गुंथी रहती हैं। एक पेटी लडकेवालों की होती है तो, दूसरी लडकीवालों की। इस पर तुलसी वृंदावन या शिवलिंग उकेरा हुआ होता है। 'ताली" की पहली गांठ वर बांधता है तो दूसरी गांठ वर की बहन बांधती है। लाजा होम और सप्त पदी के पश्चात 'आशीर्वादम्‌" विधि होती है। सारे उपस्थिजन आशीर्वादस्वरुप अक्षता उनके सिरों पर डालते हैं। अय्यर जाति की तरह ही अयंगारों में भी विवाह की विधि पूरी की जाती है। अंतर केवल इतना ही है कि अय्यर विवाह के समय ऋगवेद की ऋचाओं का उच्चारण करते हैं तो अयंगारों में यजुर्वेद की। पहले ताली (मंगलसूत्र) पहनाने की प्रथा अयंगारों में नहीं थी लेकिन आजकल यह प्रथा सामान्यसी हो गई है।

कोयम्बटूर, मदुरै और सेलम जिलों में कोंगुवेल्लाला जाति के लोग मुख्यतः रहते हैं। इस जाति में समाज के अगुवों के आशीर्वाद से विवाह संपन्न किए जाते हैं। वे जोडे जो सफलतापूर्वक स्वेच्छा से एकसाथ जीवन गुजारते रहते हैं उन्हें चुनकर विवाह द्वारा पक्का जीवन साथी बना दिया जाता है। आजकल इस जाति में भी वैदिक रीति से ही विवाह संपन्न किए जाते हैं। साधारणतः इस जाति में दहेज लेना या देना आवश्यक नहीं है। कन्या के माता-पिता अपनी कन्या को स्वेच्छया जो कुछ भी उपहार स्वरुप देते हैं, वह कन्या का ही रहता है, पति का इन पर कोई अधिकार नहीं रहता। लेकिन अन्य समाज की देखादेखी इनमें भी दहेज की प्रवृत्ति विकसित हो रही है।

तमिल ईसाइयों में वधू हल्के पीले रंग की रेशमी साडी विवाह के समय पहनती है। आमतौर पर तमिल ईसाई पहले जिस जाति या समाज के रह चूके होते हैं, विवाह के समय उस समाज के नियमों का ही पालन करते हैं। अधिक शिक्षित वर्ग के लिए दहेज की मांग अधिक होती है। विवाह के साथ क्रॉस के आकार की ताली (मंगलसूत्र) सोने की चेन के साथ वधू को पहनाई जाती है।

केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण जाति में चार दिनों तक विवाह समारोह मनाया जाता है। दुल्हन के घर में ही एक भोज का आयोजन किया जाता है। वर अपने साथ वधू के लिए कपडे, होम के लिए घास (दर्पा) और पल्लव लाता है। वर के पहुंचने पर वधू का पिता उसका स्वागत करता है और अपनी पुत्री को स्वीकारने का आग्रह करता है। पिता अपनी कुलदेवी और देवताओं को पूजा के उपरांत मंगलसूत्र (ताली) अपनी बेटी को बांधता है और एक श्वेत साडी में बाहर लाता है। एक संस्कार 'उदका पुरवाक्कम" में वधू द्वारा वर की हथेली पर जल डाला जाता है। आमतौर पर इस रस्म को भी कन्या का पिता ही पुरी करता है। जल डालते समय सहधर्मचरिता मंत्र पढ़े जाते हैं। पाणिग्रहण के समय वर वधू का हाथ थाम कर मंत्र पढ़ता है जिसका आशय उपस्थिजनों की अनुमति से जिसमें देवताओं का भी समावेश होता है कि मैं तुम्हें अपने जीवन साथी के रुप में स्वीकारता हूं। वधू केवल वैवाहिक संस्कारो के लिए सुबह शाम कक्ष से बाहर आती है। चौथे दिन वधू की विदाई होती है।

नायर जाति के विवाह में ज्योतिषियों का बडा महत्व होता है। ज्योतिष द्वारा मान्यता मिलने पर पास-पडौस और संबंधियों को निमंत्रण (काराक्कर) भेजा जाता है। घर के सामने पंडाल सजाया जाता है। बीच में सुसज्जित तांबे का दीपदान रखकर जलाया जाता है। एक कलश पानी और चावल से भरकर रखा जाता है (तीरपाडा)।बारात के स्वागतार्थ कन्या पक्ष नादस्वरम्‌ बजाता है। बारात के आगमन पर पिता वर को हार पहनाते हैं और चंदन का लेप लगाते हैं। वधू पक्ष की स्त्रियां वर के समक्ष वधू के गुणों का वर्णन 'कुरवा" के रुप में करती हैं। वधू को मंडप तक चाची, मौसी या मामी पहुंचाती है। वर वधू का चेहरा पूर्व की ओर रहता है। मंगलसूत्र पहनाने की विधि के समय वाद्ययंत्रों की गति में तीव्रता आ जाती है। तत्पश्चात वर वधू मंडप की तीन बार परिक्रमा करते हैं।

आंध्र की रेड्डी जाति संपन्न और प्रभावशाली मानी जाती है। इनमें भी काशी जाने का नाटक वर द्वारा वधू के घर पर किया जाता है। विवाह के एक दिन पूर्व गणेशजी और वर की पूजा की जाती है तथा विभिन्न तरह के उपहार वर को दिए जाते हैं। उपहार में तांबे का एक कटोरा और कपडों का जोडा अवश्य रहता है। दूसरे दिन वर को स्नान कराकर माता-पिता के साथ पूजा करने के लिए ले जाया जाता है। विवाह के समय वर वधू को फूलों का हार और मांगल्यधारणम्‌ (मंगलसूत्र) पहनाता है। मांगल्यधारणम्‌ के उपरांत वधू के माता-पिता और संबंधी चांदी के कलश का गंगाजल वर की हथेली पर डालते हैं। हवन विवाह का एक मुख्य अंग होकर ताम्बूलम्‌ में कुमकुम, नारियल और फूल आदि रखकर अग्नि को समर्पित किए जाते हैं। वर वधू हवन कुंड की प्रज्जवलित अग्नि की तीन बार परिक्रमा करते हैं।

आंध्र की ब्राह्मण जातियों में विवाह के शुभारम्भ में गौरी पूजन या लक्ष्मी पूजन किया जाता है। वहां के एक रिवाज थट्टा के अनुसार लडकी का मामा वधू को एक टोकनी में बैठाकर विवाह मंडप जिसे कल्याण मंडप भी कहते हैं में लाता है। शुभ मुहूर्त से पहले लडकी के माथे पर खजूर और उसके बीज से बना एक लेप 'गुडजिरका" लगाया जाता है। इसके पीछे भाव यह रहता है कि कन्या अब किसीकी पत्नी बन गई है इसके पश्चात मांगल्यधारणम्‌ संस्कार होता है। इस दौरान दोनो के बीच एक पर्दा रहता है। वर वधू 33 करोड देवी-देवताओ की पूजा 33 बर्तनों के घेरे को 33 बार प्रदक्षिणा करके करते हैं। यह प्रथा आंध्र ब्राह्मणों में विशिष्ट मानी जाती है। रात को अरुंधती तारा विश्वास और पवित्रता के रुप में वर वधू को दिखाया जाता है।

कर्नाटक की वोक्कालिंगा जाति के लोगों में विवाह के अवसर पर उस कुएं के पानी का उपयोग किया जाता है जिसे पुजारी द्वारा पवित्र कर दिया गया हो। आभूषणों और पुष्पों से श्रंगारित वधू को हरे रंग की साडी-ब्लाउज पहनाया जाता है। वधू सुमंगला कहलाने के लिए हरे रंग की चूडियां पहनती है। वधू के सिर पर कृषि उपज की चीजों से भरा पात्र रखकर विवाह मंडप तक लाया जाता है। मंडप में वधू का पिता अपनी पुत्री वर को सौंपने की रस्म के समय वर वधू का हाथ एक नारियल के साथ पकडे रहता है और वधू का पिता उस पर पवित्र जल और दूध डालता है। यह विवाह समारोह तीन या पांच दिन तक चलता है। सूर्य दर्शन विवाह की एक रस्म है। अर्स जाति के लोगों में पत्रिका मिलान के पश्चात सगाई की रस्म (निश्चितारतम्‌) वधू के घर पर ही पूरी होती है। वर परिवार के लोग फल, पान, सुपारी आदि अपने साथ लेकर जाते हैं। सगाई के बाद लग्न पत्रिका बनाई जाती है तत्पश्चात्‌ पान सुपारी आदि बांटी जाती है। विवाह की रस्म वैदिक पद्धति से की जाती है। वर द्वारा काशी जाने की रस्म के पश्चात गणेश तथा नवग्रहों की पूजा की जाती है। विवाह की रस्म के समय वर वधू दोनो एक पत्थर पर पैर रखते हैं इस रस्म को अस्त्ररोहण कहा जाता है। अग्नि की पूजा में अक्षत छिडके जाते हैं और सप्तपदी की रस्म निभाई जाती है। रात में अरुंधती दर्शन किया जाता है। बारात की अगुवाई लंकाधीर जो हाथ में तलवार पकडे रहता है करता है। उसके पैर धरती पर ना पडें इसलिए कपडे बिछा दिए जाते हैं। वर भी तलवार या कटार पूरे विवाह समारोह में अपने साथ रखता है।
दुर्ग जाति के लोगों की विवाह रस्म निराली होती है। बाराती पारंपरिक पोशाक में आते हैं। विवाह के पहले दिन वधू के संबंधी विभिन्न व्यंजन बनाते हैं। शाम को सहभोज होता है। इनमें भी काशी जाने का नाटक होता है। विवाह के दिन वधू को तीन विवाहित स्त्रियां और उनके पति कन्या को दूध स्नान कराते हैं तत्पश्चात कन्या लाल रंग की सोने-चांदी की जरीवाली बनारसी रेशमी साडी पहनती है। इस साडी से पहले धोबी द्वारा लाई गई सफेद साडी पवित्रता के प्रतीक रुप में पहनती है। दो लडकिया दीपदान सिर पर रखकर वधू के आगे चलते हुए मंडप तक पहुंचती हैं। वधू तीन बार मंडप में जाती है और तीन पांववाले स्टूल पर बैठती है। विवाह की रस्म के पश्चात सभी लोग जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं। शाम को जब बारात वधू के घर पहुंचती है तो वर के घर में प्रवेश के पूर्व शक्ति प्रदर्शन स्वरुप वर पक्ष का कोई व्यक्ति 6 पेडों के पौधों को तलवार से काटने की विधि करता है। लडकी को शक्ति से जीतने की खुशी में एक युद्ध नृत्य का आयोजन भी होता है। वधू को वर के घर की सदस्यता प्राप्त करने के लिए स्वयं पानी लाकर गंगा पूजन करना पडता है। रात को वर वधू को नया नाम देता है।
इस लेख को पढ़ने के उपरांत पाठकों के ध्यान में यह आ ही गया होगा कि, दक्षिण भारत के इन चारों प्रदेशों पर एक दूसरे का प्रभाव है जो इन चारों राज्यों की एकमेवता को प्रमाणित करता है। इन उपर्युक्त जातियों में विवाह की प्रथा लगभग एक सी ही है। दक्षिण भारत की कुछ जातियों की विवाह प्रथा का सम्यक स्वरुप उद्‌घाटित करना ही इस लेख का मूल उद्देश्य है। विस्तारभयावश कुछ बातों, प्रथाओं का उल्लेख नहीं हो पाया है आशा है पाठक इस मजबूरी को समझेंगे।

Saturday, 27 January 2018

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान - शिरीष सप्रे

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान  - 
 शिरीष सप्रे

गांधीजी ने पत्रकारिता को मिशन के रुप में अपनाया था। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारतवर्ष तक उनके कार्यों में पत्रकारिता का विशेष सहयोग रहा। फिर वह दक्षिण अफ्रीका का 'इंडियन ओपीनियन" रहा हो या भारत के 'यंग इंडिया", 'नवजीवन", 'हरिजन" और 'हरिजन सेवक" जैसे पत्र जिनका संपादन उन्होंने किया। भले ही 'इंडियन ओपीनियन" के संपादक गांधीजी ही थे पर उनका नाम प्रिंट लाइन में नहीं छपता था। उन्होंने अपना लेखन और सम्पादन कर्म पत्रकारिता के ध्येय से नहीं वरन्‌ अपने विचारों को लिखने और दूसरों तक पहुंचान के उद्देश्य से ही किया। गांधीजी का पत्रकार रुप मुख्यतः 'इंडियन ओपीनियन" के माध्यम से ही सामने आता है जिसे इस उद्देश्य से निकाला था कि दक्षिण अफ्रीका के गोरे, ब्रिटेन के निवासी और भारत के लोग भी दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों और गुजराती व्यापारियों की कठिनाइयों के विषय में जान सकें। 

दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक जहां भी गांधीजी ने सार्वजनिक कार्य किया, उनकी कार्यप्रणाली में पत्रकारिता का विशेष सहाय्य रहा। महात्मा गांधी पत्रकारिता को भी मानवता की सेवा का माध्यम मानते थे। उनकी नजरों में पत्रकारिता लोकहित और लोकसेवा का व्रत  था। इस विषय में उनके कुछ आदर्श थे। गांधीजी वाणी की स्वतंत्रता के पूरे पक्षपाती थे, लेकिन आत्मसंयम पर उनका बहुत जोर था। इसलिए उन्होंने पत्रकारों को इस माध्यम के दुरुपयोग न करने, सनसनीखेज समाचारों से बचने और अपना उत्तरदायित्व ठीक तरीके से निभाने के लिए आगाह किया था। इस व्यवसाय को लाभ कमाने का साधन न बनाने की बार बार अपील की। उनकी मान्यता थी कि,पत्र-पत्रिकाएं देश के शासन से भी अधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए उन्हें अपनी शक्ति का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए। जो कुछ कहें, सोच-समझ कर कहें। ऐसा कुछ भी ना कहें, जो विवेकहीन माना जाए।

खोजी पत्रकारिता, इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब तो डिजीटल मीडिया भी आ गया है के चमक-दमक भरे दिखावटी युग में जिसमें उद्‌घोषकों की आक्रमता भी शामिल है गांधीजी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। एक दृष्टि अब उन पर भी - 'प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता सकता है। उसके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं है लेकिन उस शक्ति का दुरुपयोग करना एक अपराध है। मैं स्वयं एक पत्रकार हूं और अपने साथी पत्रकारों से अपील करता हूं कि, वे अपने उत्तरदायित्व को समझें और अपना काम करते समय केवल इस विचार को प्रश्रय दें कि, सच्चाई को सामने लाना है और उसीका पक्ष लेना है।" ('हरिजन" 23 अप्रैल 1947)

'आधुनिक पत्रकारिता में जिस तरह सतहीपन, पक्षपात यथार्थता और यहां तक कि बेईमानी भी घुस आई है। वह उन ईमानदार लोगों को भी बराबर गलत रास्ते पर ले जाते हैं जो केवल यह चाहते हैं कि न्याय की विजय हो।" (यंग इंडिया 28 मई, 1931) 

उन्होंने 18 अक्टूबर 1947 को 'हरिजन" में लिखा ः 'अखबारों का बडा जबरदस्त असर होता है। संपादकों का यह कर्तव्य है कि,  वे यह सुनिश्चित करें कि, उनके अखबार में कोई झूठी रिपोर्ट प्रकाशित न हो और न कोई ऐसी जिससे जनता के भडकने की आशंका हो। संपादकों और उनके सहायकों को खबरों और उनके देने के ढ़ंग के बारे में विशेष सावधान रहना चाहिए।"

विज्ञापन जो वर्तमान में समाचार जगत की सबसे बडी ताकत बनती जा रही है के संबंध में गांधीजी पत्रिकाओं की स्वतंत्रता को बहुत दूर तक ले गए थे। वे विज्ञापनदाताओं की आर्थिक शक्ति को समझते थे। इसलिए उनके दबाव से मुक्त रहने के लिए विज्ञापन न लेने की नीति ही बना ली थी। इसका कारण उनके विचार से कुछ विज्ञापन ऐसे भी होते हैं (वर्तमान में तो इस प्रकार के विज्ञापनों की बाढ़ सी आ गई है) जिनसे जनता का कुछ लाभ नहीं होता, उल्टे जनता धोखे में आ सकती है, मार्गभ्रष्टता, अनैतिकता, कामुकता, चरित्रहीनता की ओर अग्रसर हो सकती है। इसलिए भी वे ऐसे विज्ञापन छापना अनैतिक समझते थे। मुख्य रुप से विज्ञापन से आए पैसे के लोभ से बचने और विज्ञापनदाता के आर्थिक दबाव से स्वयं को मुक्त रखने के लिए पत्रों में विज्ञापन नहीं लेते थे। नैतिक दृष्टि से वे शुद्ध स्वावलंबन के पक्षधर थे।

दरअसल गांधीजी पत्रकारिता को जन कल्याण का काम मानते थे। विज्ञापनों को प्रकाशित करने के बारे में गांधीजी की राय बहुत सख्त थी। उन्होंने यंग इंडिया में 25 मार्च 1928 को लिखा था - 'मेरी धारणा है कि, अनैतिक विज्ञापनों के बल पर अखबार चलाना गलत है। मेरा विश्वास है कि यदि विज्ञापन लिया ही जाए तो अखबारों के मालिकों और स्वयं संपादकों को पहले उनकी कडी छानबीन करनी चाहिए और केवल तटस्थ विज्ञापन ही स्वीकार किए जाने चाहिए। आज बडे से बडे प्रतिष्ठित अखबार और पत्रिकाएं भी अनैतिक विज्ञापनों की बुराई का शिकार हैं। इसका सामना अखबारों के मालिकों और संपादकों के विवेक का परिष्कार करके ही किया जा सकता है।"

गांधीजी समझते थे कि पत्रकारिता एक महान सामाजिक उत्तरदायित्व और जनसेवा है। इसीलिए वे कहते थे कि, पत्रकार जो कहते हैं, खुल्लमखुल्ला कहें, यह उनका अधिकार तथा कर्तव्य है, किंतु उन्हें यह न भूलना चाहिए कि, उन्हें यह कार्य शिष्टता तथा संयम की मर्यादाओं के भीतर रहकर करना है। गांधीजी कहते थे 'मेरा जीवन ही संदेश है"। अब हम स्वयं ही विचार करके देखें कि कितना हम उनका अनुगमन कर रहे हैं।

Monday, 22 January 2018

विद्यादायिनी देवी सरस्वती के अन्य रुप - शिरीष सप्रे

वसंत पंचमी विशेष
विद्यादायिनी देवी सरस्वती के अन्य रुप
शिरीष सप्रे

ज्ञान और विद्या की अधीष्ठातृ देवी सरस्वती के प्रति करोडों भारतीयों के मन-मस्तिष्क में अपरिमित श्रद्धा और भक्तिभाव है। वसंत पंचमी पर्व को मनाने का एक कारण वसंत पंचमी को ही सरस्वती जयंती का होना भी है। इसी दिन देवी सरस्वती ब्रह्मा के मानस से अवतीर्ण हुई थी। वसंत पंचमी को जगह-जगह पर मॉं शारदा की पूजा अर्चना की जाती है। सरस्वती को 'विद्या की देवी", 'वीणा-पाणी" या 'बुद्धिदायिनी" के रुप में जाना जाता है एवं इन्हीं रुपों में उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। मां सरस्वती की कृपा से प्राप्त ज्ञान एवं कला के समावेश से मनुष्य जीवन में सुख एवं सौभाग्य प्राप्त होता है। माघ शुक्ल पंचमी को सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन किया था, तभी से देवी सरस्वती की पूजा वसंत पंचमी को करने की परंपरा चली आ रही है।

देवी भागवत पुराण में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के पूजन का स्पष्ट उल्लेख है। इसी कारण वसंत पंचमी का एक नाम श्री पंचमी भी है। वसंत पंचमी के दिन ही सरसों के फूलों और नवांकुरों से अपनी आराध्य श्रीदेवी (लक्ष्मी या सरस्वती) की पूजा की जाती है। इसी दिन पीले कपडे भी पहनने की प्रथा है। वसंत पंचमी के दिन मदन (कामदेव) का उत्सव मनाने का विधान है। धर्मशास्त्र के प्रामाणिक ग्रंथ धर्मसिंधु के अनुसार इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रतिदेवी का पूजन तथा उत्सव करना चाहिए। कामदेव का मित्र वसंत ऋृतु को कहा जाता है। अतः संभव है कि कामदेव के मित्र के नाम पर वसंत पंचमी पडा हो।

देवी सरस्वती एक अन्य रुप है जन गण के हित और कल्याण हेतु सदैव तत्पर रहनेवाली माता सरस्वती का 'शत्रुविनाशिनी" रुप। जिसको जाननेवालों की संख्या जरा कम ही है। वस्तुतः सरस्वती का यह आदि स्वरुप भी है तथा वैदिक युग के एक शुभ लग्न में उनका यह रुप ऋषि-मुनियों के समक्ष मुखरित हो उठा था - 

यानी लोक कल्याण के लिए शत्रुओं के विरुद्ध संग्राम करती हूं मैं। मां वागेश्वरी की यह पवित्र वाणी ऋषि-मुनियों की हटतंत्री में गुंजायमान हो उठी। इसमें संशय नहीं कि इष्ट शक्ति अनिष्टकारी और देहध्वंसकारी शत्रु को पराजित करके प्राण की रक्षा हर क्षण करती है एवं इस प्रक्रिया के मूल में इष्ट शक्ति का खेल ही वास्तव में वाग्देवी की लीला है। एक भयंकर युद्ध चलता है मन के आसमान पर। इस युद्ध में सुप्रवत्ति (देवता) एवं कुप्रवृत्ति (असुर) के मध्य द्वंदयुद्ध चलता है और सुप्रवृत्ति -चैतन्यमयी मां वागेश्वरी कुप्रवृत्ति के नाश के लिए सक्रिय हो उठती है।

प्रकृति पट पर भी उषा के उज्जवल प्रकाश में तमिस्त्र-शत्रु का विनाश पर्व परिलक्षित होने लगा। उषा मध्य वाग्देवी शक्ति का आविर्भाव स्पष्ट हो उठा। उषा का प्रकाश प्रभावी सूर्य की आशा है। सूर्य के 'सास्वान" नाम के साथ जोडा गया है 'उषा" को क्योंकि, शुभ तेजस्विनी माता सरस्वती का आत्म प्रकाश वैदिक उषा के सहयोग से ही हुआ है। अतएव प्रकृति-राज्य व अंतर-राज्य में सरस्वती अद्वितीय शत्रुविनाशिनी के रुप में प्रतिष्ठित हुई। यद्यपि पूर्व में सरस्वती ज्योति-उपासना में सीमाबद्ध थी परंतु, तांत्रिक-पौराणिक-बौद्धयुग में उन्होंने मूर्तियों में रुप पाया। जैसे 'वीणावादिनी", 'ज्ञानदात्री", 'असुर संहारिणी" तथा 'प्रकाश की देवी" आदि। सरस्वती का वर्ण शुभ और गुण अशुभ-विनाश अन्य देवी-देवताओं के आकार में भी प्रकट हुआ।
उत्तर भारत के कई प्रदेशों के कई स्थानों पर महिषमर्दिनी दुर्गा की पूजा अश्विनी शुक्ल सप्तमी-अष्टमी-नवमी को तो कई स्थानों पर शुंभ-निशुंभ काली पूजा के समय दीवाली के त्यौहार पर होती है। रणदेवियां सरस्वती के साथ एक योगसूत्र में बंध गई। अतः उस इंगित का वहन करके एक मंत्र सरस्वती पूजा में भी चलने लगा- 'भद्र काल्यै...सरस्वत्यै...।" शत्रुनाशिनी देवी सरस्वती देश-विदेश की समर देवियों के साथ एकाकार हो गई थी और बौद्ध तांत्रिकयुग में वह निदर्शन बहुनामी देवियों के भाव-कर्म में मिलता है। चतुर्भुज सिंहवाहिनी सरस्वती के दो हाथों में परशु और गदा एवं अन्य दो हाथों से वह दानव की जीभ उखाड रही है।

श्रीपंचमी को महाशक्ति सरस्वती के चरणों में श्रद्धापूर्वक, भक्तिपूर्ण चित्त से जाकर ह्रदय का आकुल अनुनय व्यक्त करना होगा द्विषो जहि। यानी सकल शत्रुओं का नाश करो देवी। श्रीचरणों में अपनी-अपनी अंजली देकर ज्ञान का वरदान ग्रहण करना होगा, ताकि मन और देश की भूमि पर शांति और आनंद का साम्राज्य स्थापित हो सके। देवी के चरणों में जानेवाले निश्चित ही अतुल शक्ति के स्वामी होंगे और देवी की कृपा और आशीर्वाद से विश्व में उनकी सुकीर्ति फैलेगी तथा समग्र वसुंधरा सुगंधित हो उठेगी।

Tuesday, 16 January 2018

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य शिरीष सप्रे

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले 
महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य
शिरीष सप्रे

चाणक्य चंद्रगुप्त का महामात्य प्रसिद्ध है। नन्द पतन और मौर्य-उत्थान के मुख्य नायक चाणक्य ही माने जाते हैं। श्रुति परम्परा के अनुसार चाणक्य दीर्घजीवी थे। उन्होंने सम्राट अशोक तक का मौर्य वंश शासन देखा था। आचार्य तत्ववेता, मंत्रद्रष्टा ऋषि परम्परा की असाधारण विभूति थे। वसिष्ठ, वाल्मिकी एवं व्यास की भांति युग के महान राष्ट्रचिंतक थे। उनके ज्ञानगौरव से अनभिज्ञ लोग उन्हें केवल कूटनीतिक समझ कर उनकी तुलना मध्यकालीन विचारक मैकियाविली से करते हैं जो नितांत भ्रामक है। मैकियाविली की कूटनीति भारतीय चरित्रादर्श से कतई भिन्न, अशोभनीय एवं अमांगलिक कुचक्रों का इंद्रजाल है। वास्तविक तौर पर देखा जाए तो इटली के मैकियाविली अपने प्रिंस को आदर्श शासक तथा महान साम्राज्य निर्माता नहीं बना पाए थे। इसके विपरीत कौटिल्य की कूटनीति राष्ट्र निर्माण, प्रजारंजन एवं देशोद्धार के उदात्त उद्देश्यों को मूर्त करनेवाली सर्वजनहिताय राजनीति है। 'अर्थशास्त्र" इसका ज्वलंत प्रमाण है। मैकियाविली को आधुनिक कौटिल्य भले ही कहा जा सकता है परंतु कौटिल्य की मैकियाविली से तुलना कौटिल्य का अपमान होगा। इसी तरह यदि कौटिल्य के पूर्वकालिक ग्रीक के महान दार्शनिक और राजनीतिक विचारक अरस्तु से तुलना की जाए तो वह भी अपने विचारों के अनुरुप व्यवहारिक प्रयोग में असफल रहने के कारण कौटिल्य से उन्नीस ही माना जाएगा। वस्तुतः दोनो ही अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, लेकिन दोनो की परस्पर कोई तुलना नहीं। 

कौटिल्य के व्यक्तित्व की लोकह्रदय पर सदैव गहरी छाप रही है। संस्कृत गं्रथों के अतिरिक्त कई जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में चाणक्य के विरल उल्लेख मिलते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य के सातसौ वर्षों बाद विशाखादत्त ने चाणक्य के महान राजनीतिक कृतत्व को चित्रांकित करते हुए 'मुद्राराक्षस" लिखा था, जो आज भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में गिना जाता है। इस नाटक में चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का सम्राट बनाने के बाद नंद वंश के प्रख्यात अमात्य राक्षस को चंद्रगुप्त के पक्ष में करने में कौटिल्य कैसे यशस्वी हुए, इसकी बडी रोचक कथा है। राक्षस को मौर्य साम्राज्य का स्वामीभक्त मंत्री बनाने के बाद कौटिल्य निश्ंिचत होकर वापस तक्षशिला चले जाते हैं। संन्यस्त, निष्काम जीवन के ऐसे कितने उदाहरण विश्व साहित्य में मिलेंगे।

आधुनिक युग में तो आचार्य चाणक्य को इतिहास के नूतन मूल्यांकन के पश्चात देश-विदेश के इतिहासकारों द्वारा जहां उन्हें राजनीति शास्त्र का युग प्रवर्त्तक मनीषी प्रमाणित किया गया है, वहीं साहित्यकारों ने उन्हें राष्ट्रनिर्माता के रुप में चित्रित कर व्यापक लोकमानस का चरितनायक बना दिया है। बृहत्काय 'कौटलीय अर्थशास्त्र" के अतिरिक्त आचार्य कौटिल्य ने ज्ञानकणों के कोष के रुप में एक सूत्रग्रंथ की भी रचना की है, जो चाणक्य-सूत्र के नाम से प्रसिद्ध है। एक छोटे से वाक्य में सार्थक व्यवहारिक जीवन में उपयोगी, ये नीति-उपदेश संस्कृत के सूत्र-साहित्य की अनमोल निधि हैं। 

कौटिल्य का अर्थशास्त्र राष्ट्र की सर्वांगीण राज्य व्यवस्था का सांगोपांग आचरण शास्त्र है। देश की विदेश नीति से लेकर चुंगी प्रणाली के साथ-साथ, ब्रह्म की सत्ता से लेकर पुजारियों और भिक्षुओं के भरण-पोषण के नियमों का भी उसमें विस्तार से विधान है। कौटिल्य से पहले शुक्र, विदुर आदि अनेक राजनीतिशास्त्र के प्रणेता हुए हैं, किंतु कौटिल्य के अर्थशास्त्र की तुलना में उनकी कृतियां बौनी ही प्रतीत होती हैं। क्योंकि, एक तो कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में उनकी सारी आचार-संहिताओं का परिशोधित रुप में उल्लेख किया है और दूसरे, कौटिल्य ने उसमें अतिरिक्त जो कुछ लिखा है, वह स्वानुभव की तुला पर तौल कर लिखा है। 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का वैदिशिक भाषाओं में अनुवाद होने से पहले पाश्चात्य विद्वानों की यह भ्रामक धारणा थी कि, भारतीय शास्त्रकारों के चिंतन का ध्येय अध्यात्म तक ही सीमित रहा है, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र की समस्याओं से उन्हें को सरोकार नहीं रहा है। किंतु, 'कौटिलीय अर्थशास्त्र" के अवलोकन मनन के बाद उनकी यह भ्रांति निर्मूल सिद्ध हो गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने कौटिल्य को ही संसार का शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ प्रचारित कर दिया, उनके स्वदेश भारत को भी यह गौरव प्रदान कर दिया है कि, अन्य विद्याओं की तरह राजतंत्र और समाज व्यवस्था की आचार संहिताएं भी यूनानियों के द्वारा भारत से पश्चिम को गई हैं। 

     

Friday, 12 January 2018

गाथा दीपक की ः भाग - 2 - शिरीष सप्रे

गाथा दीपक की ः भाग - 2
शिरीष सप्रे

क्या आपने कभी सोचा है कि, दीपक का जन्म कैसे हुआ? दीपक के आकार और रुप में क्या कोई परिवर्तन आया ही नहीं? जब मानव ने पत्थर से आग जलाना सीखा तभी वह रात्रि में प्रकाश की आशा करने लगा होगा। इस अग्नि का मानव के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। अग्नि की खोज के पूर्व ऊष्मा एवं प्रकाश का एकमात्र स्त्रोत व साधन सूर्य को ही समझा जाता था और उस पर कोई नियंत्रण न होने की वजह से आदिम मानव को शीत ऋतु और अंधकार में अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करना पडता था। आग की खोज आज से कोई एक लाख वर्ष पूर्व हुई। जब मानव ने पत्थर से आग जलाना सीखा होगा। तभी से वह रात्रि में प्रकाश की आशा करने लगा होगा। कुछ समय पश्चात मानव को अनुभूति हुई कि कुछ वस्तुएं अन्य की अपेक्षा बेहतर जलती हैं।

संभवतः आदिम मानव ने भोजन के वास्ते मांस भूनते समय चर्बी को पिघलकर आग में गिरते समय आग को धधक कर जलते देखा होगा। धीरे-धीरे ऐसे पदार्थों का चयन होने लगा जो जलने पर बेहतर रोशनी देते थे। कुछ विशेष तरह की खपच्चियों को दीवारों में खोंस दिया जाता था जो आहिस्ता-आहिस्ता जलकर मद्धम रोशनी देती थी। फिर मशाले अस्तित्व में आईं। पत्थर के कटोरीनुमा दीयों में चर्बी डालकर किसी पेड की पतली छाल अथवा वनस्पति आदि को बटकर बाती बनाकर जलाना पडता था। वास्तव में यही आरंभिक ऑइल लैम्प थे। आग के लिए दो पत्थर रगडने पडते थे।

कहा जाता है कि इसी पर से आदिमानव ने दीपक के स्वरुप की कल्पना कर मिट्टी के दीपक बनाने का विचार किया। यही क्रम चलता रहा और एक दिन ऐसा भी आया कि इसके लिए उसने हाथों से दीपक का निर्माण कर लिया और जब लोग दीपक को जलाने के लिए तेल और घी का प्रयोग करने लगे। मोमबत्ती की रचना का इतिहास भी कुछ इसी प्रकार का है। जानवरों की चर्बी पिघलाकर उन्हें बांस के खोखले सांचे में भरकर पहले-पहले मोमबत्ती तैयार की गई। वनस्पति के सूखे रेशों को आपस में गूंथकर सांचे के बीचोबीच लटका दिया जाता था ताकि जमने पर सम्पूर्ण मोमबत्ती प्राप्त हो। इस प्रकार ईसा से काफी समय पूर्व मोमबत्ती की रचना हो चूकी थी।

दीपक से जुडी हुई कई लोककथाएं विदेशों में भी प्रचलन में है। एक सीरियाई लोककथा के अनुसार- प्राचीनकाल में एक ऐसा वृक्ष था, जिसके फलों का आकार दीयों जैसा था। ये फल शाम घिरने पर अपनेआप जगमगाने लगते थे। एक दिन एक जबरदस्त आंधी आने से वह पेड उखड गया तो जंगल में घोर तिमिर यानी अंधकार रहने लगा। इससे आदिमानव को बडी दिक्कतों का सामना करना पडता था। फिर आदिमानव ने इसी प्रकार के एक फल की खोज की और उसे सूखाकर उसमें मृत जानवरों का गोश्त भरा। एक पेड की छोटी सी टहनी काटकर गोश्त में मजबूती से घुसैडकर जला दिया। यह अनोखा दीपक दो सप्ताह तक लगातार जलता रहा।

यूनानी लोककथा के अनुसार यूनान में प्राचीनकाल में सूरज सालभर में लगातार एक माह तक नहीं उगता था। जिसके कारण लोगों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडता था। इस अंधेरे में एक दिन एक बुढ़िया हांडी में घी तपा रही थी, तभी आसमान से एक चूहे की कटी पूंछ आ गिरी। पूंछ कुछ ऐसे गिरी कि उसका नुकिला भाग तो हंडिया के बाहर था और शेष भाग हंडिया के अंदर। इस बात से बेखबर बुढ़िया चूल्हे में लगातार लकडियां डाले जा रही थी। इस कारण चूल्हा बाहर लौ फेंकने लगा और किसी तरह चूहे की पूंछ का नुकिला सिरा दीपक की तरह जलने लगा। जब बुढ़िया ने अचानक प्रकाश देखा तो दंग रह गई। बुद्धि से काम लेते हुए बुढ़िया ने मिट्टी से कुछ दीपक बनाए और उसमें घी, चूहे की पूछें डालकर जला दिया। अपने द्वारा किए गए आविष्कार पर बुढ़िया बहुत खुश हुई। बुढ़िया की देखादेखी बाकी लोग भी इस प्रकार के दीपक जलाने लगे। इस प्रकार यूनान में दीपक का उद्‌भव हुआ।

जापान की लोककथानुसार प्राचीनकाल में वहां एक अत्यंत सुंदर युवती रहती थी जिसे अंधेरे में बहुत डर लगता था। एक दोपहर वह जंगल से लकडियां लेकर आ रही थी कि रास्ते में ही एक आंधी आ गई। वह डर गई और जोर-जोर से रोने लगी उसके रोने की आवाज सुनकर वनदेवी उसके समक्ष दीपक लेकर आई। युवती ने दीपक उठाया और अपनी झोपडी तक आ पहुंची। इस दीपक को देखकर उसने मिट्टी से कई दीपक बनाए उसमें गिली लकडियों का रस भरकर युवती पेड की छाल से बनी बाती रख देती थी व उन्हे प्रज्जवलित कर देती थी। इस प्रकार जापान में दीपकों का जन्म हुआ। धीरे-धीरे प्रगति के साथ-साथ मानव कलात्मक सीपियों को भी उनमें चर्बी भरकर उपयोग में लाने लगा।

मोहनजोदडो और हडप्पा की खुदाई में प्राप्त दीपों के अतिरिक्त तक्षशीला, उज्जैन, पाटिलपुत्र, मथुरा और कौशाम्बी आदि स्थानों पर भी प्राचीन दीपों की प्राप्ति हुई है। देवालयों के दीप और भी मनोहारी लगते हैं। इनसे प्राप्त दीपक एक मुखी, तीन मुखी, पांच मुखी और सप्त मुखी तक हैं। खुदाई से प्राप्त दीप में लक्ष्मी मूर्ति के आगे एक व्यक्ति हाथ जोडकर बैठा हुआ है जिससे लक्ष्मी पूजा का प्रमाण मिलता है। इस काल के ऐसे दीप भी मिले हैं जो नगर के मुख्य मार्गों पर रखे जाते थे, यह प्राप्त मूर्तियों को देखने से ज्ञात होता है। कुछ अन्य दीप ऐसे भी मिले हैं जो हाथी, घोडे, सिंह, मयूर और गौरैया आदि से संबंधित हैं। कहीं गज की सूंड या मस्तक पर दीपक है तो कहीं बाघों के मस्तक या पीठ पर। कहीं जंजीर से लटके  दीपक भी मिले हैं।

प्राचीन काल से ही राजाओं ने अपने राज्य में दीपों को बहुत महत्व दिया है। उन्होंने द्वार दीप, वृन्दावन दीप, नंदा दीप, प्रांगण दीप,  उद्यान दीप आदि दीपों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार स्तंभ और गुंबदों पर भी कलात्मक दीप रखने की प्रथा का प्रचलन हुआ। दीपों की संस्कृति निराली ही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक दीपों का प्रयोग होता है मांगलिक कार्यों में दीप प्रज्जवलित करने की स्वस्थ परंपरा अब तक चली आ रही है। हमारे यहां ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के सभी धर्मों में कहीं ना कहीं दीपों का वर्णन मिलता है। क्योंकि, दीप विजय का, शक्ति का, अंधकार दूर करने का व जनकल्याण का प्रतीक है। अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के हाथ में एक मशाल है। यह भी दीपक की महत्ता को देखकर बनाई गई है। ओलम्पिक खेलों में दीपों को प्रज्जवलित करने की परम्परा अब तक चली आ रही है।


चीन में तेंग पिन्ह त्यौहार पर सौ फुट ऊंचा चक्र बनाकर उसमें हजारों दीप जलाए जाते हैं। जापान में तोरों नागासी त्यौहार पर पानी में दीप जलाकर छोडने की प्रथा है। इसी प्रकार शहीद सैनिकों की स्मृति में विभिन्न देशों में ज्योति जलाई जाती है। भारत में किसी भवन के शिलान्यास पर दीप जलाने की प्रथा है। इटली में मकबरों में दीपों को जलाना शुभकार्य समझा जाता है। बृहस्पती वार को लोग मजारों पर दीप जलाते हैं। यहूदी भी अपनी अपनी पूजा के कार्यक्रमों में दीप जलाते हैं। सारनाथ में बौद्ध मंदिर में बराबर दीप जलता है। जलते-जलते अचानक दीपक का बुझ जाना अशुभ माना जाता है। दीपक को फूंक मारकर या हाथ से बुझाना वर्जित है। दीप का गिरना अंधकारमय भविष्य का द्योतक है। इस प्रकार आदिम युग से लेकर इस परमाणु युग तक आदिवासी-वनवासी समाज से लेकर सभ्य समाज तक सभी दीप संस्कृति से जुडे हुए हैं। 

Friday, 5 January 2018

महत्ता दीपक की भाग 1

महत्ता दीपक की भाग 1
शिरीष सप्रे

दीपक की गाथा बडी ही रोचक और बडा इतिहास समेटे हुए है। दीपक अग्नि का प्रतीक भी है। जिसका आवाहन तीन रुपों में मिलता है। पहला, पृथ्वी का यज्ञ संबंधी, दूसरा अंतरिक्ष का विद्युत रुप, तीसरा आकाश का सूर्य रुप अग्नि। दीप या दीपक संस्कृत के दीपन्‌ से उद्‌भुत है। हमारे यहां दीप प्रज्जवलन से सभी शुभ कार्यों का आरंभ होता है। शुभविवाह के समय अग्नि को ही साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं। अग्नि मनुष्यों और देवताओं का मध्यस्थ है। यज्ञ-पूजा-आराधना उसका माध्यम है। दीपक प्रकाश के लिए ही प्रयुक्त नहीं होता बल्कि इसका कलात्मक एवं भावनात्म पक्ष भी है। दीपक ने भारतीय संस्कृति के सभी पहलुओं को छूआ है यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। 'सूर्यांश संभव दीपः अर्थात्‌ दीपक अग्नि का लघु रुप तथा सूर्य का एकमात्र विकल्प है।

वैदिक साहित्य में दीपक की महत्ता का उल्लेख मिलता है। स्कंध पुराण के अनुसार - अग्नि ज्योति रवि ज्योति चंद्र ज्योतिस्तथैव च उत्तम सर्व ज्योतिषां दीपो यम्‌। अर्थात्‌ अग्निज्योति, सूर्य की ज्योति और चंद्रमा की ज्योति में दीपक की ज्योति सर्वोत्तम है। वाल्मिकी रामायण में रावण के अंतःपुर में सुंगधित तेलयुक्त स्वर्ण दीपों का वर्णन है। वाल्मिकी ने रामायण के सुंदर कांड में लंका का वर्णन करते हुए रत्नदीप का उल्लेख किया है। रामायण के पांचवे सर्ग में लंका के मंद ज्योति में जलनेवाले दीपकों की तुलना हारे हुए जुआरी से की गई है। तुलसीकृत रामचरित्‌ मानस के बालकांड में भी दीपक का उल्लेख मिलता है। महाभारत में दुर्योधन ने स्वयं के प्रयाण के पूर्व दीपशिखा लेने का आदेश दिया था। महाभारत में दीपकों की रोशनी में हुए छलकपट व रोमांचकारी युद्ध का वर्णन है। हाथी एवं घोडों पर  रखे हुए दीपकों का भी उल्लेख है।

अनादिकाल से दीपक तिल-तिल जलकर निरंतर प्रकाश देता है। चौरासी सिद्धों में सिद्ध माने जाने वाले सरहपा, गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ आदि ने अपनी प्रतिभा और पांडित्य के सहारे दीपक की महिमा और गरिमा को वर्णित किया है। महात्मा बुद्ध ने 'अप्प दीपो भव" अर्थात्‌ अपने दीपक आप बनो की बात कही है। क्योंकि, अपने प्रकाश से प्रकाशित एक दीप, असंख्य दीप प्रज्वलित कर सकता है। इसकी लौ में निशाचरी कीट, पतंगों को भस्म करने की शक्ति होती है। दीपक के महत्व बतलाते हुए रहीम ने कहा है, 'जो गति रहीम दीप की, कुल कपूत की सोय। बारै उजियारे लगै, बढ़े अंधियारो होय।"

कालिदास रचित संस्कृत काव्य रघुवंश में दीपक का उल्लेख कई बार आया है। मेघदूत में यक्षों द्वारा अलकानगरी के शयनकक्षों में दीपक के उपयोग का उल्लेख मिलता है जिन्हें रत्नदीप कहा गया है। हिंदी साहित्य की पहेलियों में दीपकों का वर्णन मिलता है। अमीर खुसरो की यह पहेली देखिए, एक नार ने अचरज किया, सांप मार पिंजरे में दिया। ज्यों ज्यों सांप ताल को खाए, सूखे ताल सांप मर जाए अर्थात्‌ दीया-बाती। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध आदि कवियों ने दीपक में अनेक वृत्तियों को अनेकानेक ढ़ंग से प्रज्जवलित कराया है। कहीं एक मुखी, कहीं पंचमुखी तथा कहीं सप्तमुखी दीपकों का वर्णन कर दीपोत्सव के प्रति स्वयं के भाव व्यक्त किए हैं। स्तंभों पर दीप टांगकर भटके हुए जहाजों को, व्यक्तियों को दिशाज्ञान कराया जाता है।

साहित्य और वेदों में ही दीपक का उल्लेख किया गया हो ऐसा नहीं है, बल्कि संगीत शास्त्र में भी दीपक का वर्णन मिलता है। शास्त्रीय संगीत में दीपक राग बहुत ही प्रसिद्ध है। शास्त्रीय संगीत दीपक राग से संबंधित कई किवदंतियों से भरा पडा है। ऐसा कहा जाता है कि, यदि इस राग को सही एवं कलात्मक ढ़ंग से गाया जाए तो यह श्रोताओं के ह्रदय में ज्योति प्रज्जवलित कर देता है। राग दीपक से संबंधित एक किवदंति बहुत प्रसिद्ध है कि जब संगीत सम्राट तानसेन ने दीपक राग को गाया था तो अकबर के सभाकक्ष के दीपक जल उठे थे।

संगीत शास्त्र ही नहीं भारतीय चित्रकला भी दीपक से अछूती नहीं रही है। 17वीं एवं 18वीं शताब्दी की मुगलकालीन, राजस्थानी, कांगडा एवं मराठा शैली के चित्रों में स्तंभ दीपक, लटकनेवाले दीपकों तथा सभा कक्षों में प्रयुक्त होनेवाले बहुत ही सुंदर कई प्रकार के दीपक देखने को मिलते हैं। शिल्प कला में भी दीपक प्रिय विषय रहा है। प्राचीन अमरावती एवं ईसा की दूसरी शताब्दी के बोरबुदर की मूर्तिकला में कई दीपक तराशे हुए देखने को मिलते हैं।

साहित्य की ही भांति संस्कृति का अभिन्न अंग है 'दीपक" भी। जन्म से लेकर मृत्यु तक की अंतिम यात्रा के पश्चात भी मानव का साथ दीपक ही तो निभाता है। आत्मा 'अन्‌" धातु से निष्पन्न होने से उसका अर्थ है प्राण या श्वास/ उर्जा। आज अग्नि/दीप उसका द्योतक है। प्राण निकलने पर, तभी तो कहते हैं दीप बुझ गया। इसी रुप में मृत्यु पश्चात दीप शाश्वत सत्य प्रज्वलन की परंपरा है। जन्म लेने पर भी कुलदीपक की संज्ञा प्रयुक्त की जाती है। जहां मृत व्यक्ति का शरीर लिटाया गया था वहां दसवें दिन तक उस स्थान पर दीपक जलाकर रख दिया जाता है।

जब किसी लोकमंगलकारी कार्य हेतु कोई व्यक्ति घर से प्रस्थान करता है तो विजय की कामना हेतु आरती उतारकर तिलक लगाया जाता है। हुतात्माओं की पावन स्मृति में आज भी हुतात्मा स्थल पर दीपक जलाकर आस्थांजलि समर्पित करने की परंपरा है। प्रवाहित जल में दीपदान करके मानव अपनी साधना और आराधना को व्यक्त करता है। हमारी संस्कृति में दीपक को फूंक मारकर बुझाना अपशगुन माना जाता है। किसी भी मंगल कार्य में कलश में जल भरकर पंचपल्लवों के ऊपर दीपक रखा जाता है। दीपक कैसा भी हो, उसका अस्तित्व हर काल तथा युग में सुखद एवं मंगलकारी होता आया है। 

दीपक की महिमा अपरंपारी है। उसकी लगन और विश्वसनीयता ने तो उसे देवों का सिरमौर बना दिया है। स्वयं सूर्य उसका ऋणी है। उपनिषद में इस आर्य सत्य को एक लघु कथा द्वारा व्यक्त किया गया है, जिसका सारांश कुछ इस प्रकार है -


एक बार सूर्य को अहं उपजा कि सृष्टि के आरंभ से वह अविरत, अविकल कार्यरत है, विश्व को आलोकित किए हुए है। इसलिए कुछ  समय के लिए अवकाश पर चले जाना चाहिए। वे अपनी जिम्मेदारी अन्य देवताओं को सौंपने की दृष्टि से सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए और उन्हें उत्तरदायित्व सौंपकर अवकाश पर चले जाने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन उन्होंने अपनी व्यस्तता बतलाकर इंकार कर दिया। सूर्यदेवता अन्य देवताओं के पास भी गए। परंतु, सभी देवताओं ने कुछ ना कुछ बहाना बनाकर टाल दिया। यह सब एक लघु दीपक देख रहा था अंत में सूर्यदेव को निराश देखकर बोला, हे देव- आप चाहें तो आपका उत्तरदायित्व मैं निभाहने का प्रयत्न कर सकता हूं। इस प्रकार सूर्यदेव अवकाश पा गए। तभी से माटी दीप अविकल-अविरत इस विश्व को अपनी ज्योति से आलोकित किए हुए है। यह लघुता की महिमा है।