Sunday, 18 November 2018

तुलसी विवाह और वनस्पति जगत का गौरव - शिरीष सप्रे


तुलसी विवाह और वनस्पति जगत का गौरव
शिरीष सप्रे

तुलसी विवाह से जुडी एक पौराणिक कथा से तुलसी विवाह की प्रथा कैसे निर्मित हुई यह ज्ञात होता है | बृज मंडल में वृंदा नामकी एक कृष्ण भक्त गोपी थी | एक निर्जन स्थान पर उसने भगवान् कृष्ण की तपश्चर्या प्रारम्भ की, गणेशजी को उसकी तपश्चर्या पर बड़ा आश्चर्य हुआ | वृंदा की माँ शिव भक्त थी और उसका गणेशजी पर पुत्रवत स्नेह था | वृंदा रोज कडकड़ाती धूप-ठंड़-हवा में कृष्ण की आराधना कर रही है यह देखकर गणपति ने उसके आसपास कुछ लकडीयां डाल दी | वर्षा हुई और उससे एक तण  की निर्मिती हुई इसके कारण वृंदा पर छाया का आच्छादन हो गया | उसे इसका बड़ा अचम्भा हुआ और उसने उस पेड़ से पूछा- तू इस तरह मुझ से प्यार क्यों दर्शा रहा है? तू कौन है? पेड़ ने उत्तर दिया ‘ ओमकार सृष्टि का आदिकंद है इसलिए उसने ब्रहमदेव से सृष्टि निर्मित करवा लेने के बाद स्वयं की चाह के लिए पेड़ निर्मित करवा लिया वही हूँ मैं | मुझे इक्षु दंड कहते हैं |’ 

वृंदा की चल रही कठोर तप साधना को देख भगवान् प्रसन्न हुए | तब वृंदा ने वर मांगा की अगले जन्म में आप मेरे स्वामी बनो | इस पर भगवान् ने कहा कि अगले जन्म में यह होगा, यह कहकर वे अंतर्धान हो गए|

आगे वृंदा ने कृष्ण- कृष्ण का जाप करते हुए इस जन्म की यात्रा समाप्त की और उसका पुनः जन्म हुआ |  नए जन्म में भी उसका नाम वृंदा ही था | वह अत्यंत सुन्दर थी | एक बार वन में कृष्ण की आराधना करते हुए जालंधर नामके राक्षस ने उसे देखा और उससे विवाह की याचना की | वृंदा ने उसे नकार दिया | तब वह उसे भगा ले गया और उससे राक्षस विवाह किया | अपने नसीब में यही लिखा था ऐसा मानकर वृंदा चुपचाप अपना वैवाहिक जीवन बिताने लगी | मगर जालंधर वृत्ती से दुष्ट था | वह साधू-संतों को कष्ट देने लगा |

इसके लिए उसने अपने परिवार में भूत-पिशाच, इनका समावेश कर लिया | उनके रहवास के लिए स्वतंत्र स्थान हो इसलिए जालंधर अपने शरीर पर के पसीने की बूंदे जमीन पर छिडकी | उसमें से आम्लिका नामका पेड़ तैयार हुआ | भूत वहां रहने लगे | परन्तु इस करण सज्जन लोगों ने उधर फटकना भी छोड़ दिया | इस कारण आम्लिका दुःखी रहने लगी और उसने अपनी मनोव्यथा वृंदा को बतलाई | वृंदा ने उससे कहा चिंता न कर  जहां नारायण का आगमन होता हैं वहाँ से भूत-पिशाच तत्काल पलायन कर जाते हैं | तू नारायण का चिंतन कर, तेरी चिंता समाप्त हो जाएगी | आम्लिका वृंदा की सलाह मानकर नारायण का चिंतन करने लगी |

एक बार नारद मूनी नारायण- नारायण का जाप करते हुए वहां से गुजरे | विश्राम के लिए वे आम्लिका के पेड़ तले रुके | उनकी वीणा से निकलने वाले नारायण- नारायण के स्वर वैकुण्ड में विष्णूजी के कानों में पड़े और अपने इस निस्सीम भक्त के लिए वे तत्काल दौड़ पड़े और आम्लिका के पेड़ तले आ पहुंचे | तात्कालिक निवास के लिए ही क्यों न हो परन्तु नारायण वहां आए हैं यह देखकर भूत-पिशाचों ने वहां से पलायन कर लिया | इस आम्लिका को आगे जाकर जो फल आए वे थे हरी इमली के | वृंदा को वह बहुत पसंद आई |

इस दरम्यान जालन्धर के कष्टों से बेजार होकर ऋषि-मुनियों ने भगवान् की आराधना प्रारम्भ कर दी | भगवान् ने उसे समझाने के बहुत प्रयत्न किए परन्तु वह बस में नहीं आया | अंततः भगवान् को उससे युद्ध आरम्भ करना पड़ा | घनघोर युद्ध शुरू हो गया | भगवान् को अंत में सुदर्शन चक्र छोड़ना पड़ा, बाणों की वर्षा करनी पड़ी, गदा प्रहार किए परन्तु उस पर किसी भी शस्त्र का असर न हुआ बल्कि वह और अधिक उन्मत्त हो जाएगा इसकी कल्पना नारदजी को आ जाने के कारण और जालन्धर की पत्नी वृंदा पतिव्रता होने के कारण उसकी पुण्याई के कारण जालंधर की मृत्यु नहीं हो रही | यह रहस्य नारदजी ने भगवान् को बतला दिया |

 भगवान् युद्ध छोड़कर चले गए और जालंधर का भेष धरकर वृंदा को धोखा दिया | यह रहस्य सामने आने पर वृंदा को बहुत दुःख हुआ | तब भगवान् ने पिछले जन्म में उसीके द्वारा मांगे गए वर का स्मरण करा और किसी भी कारण से जालन्धर उसकी दुष्ट प्रवृती के कारण जीवित रहने योग्य नहीं कहा | युद्ध भूमि पर लौट भगवान् ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा और वृंदा की पुण्याई समाप्त हो जाने के कारण जालंधर का तत्काल वध हो गया | वृंदा उसकी चिता में कूद गई | तब भगवान् विष्णु वहीँ चिता के पास बैठ गए ! पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने उन्हें यह हकीकत बतलाने वाले देवताओं को तीन बीज दिए | चिता शांत होने पर उसमें से तुलसी, धात्री याने आंवला और मालती ये तीन पेड़ उगे | फिर विष्णु ने कृष्ण रूप धारण किया | वहां एकत्रित देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने कृष्ण-तुलसी का विवाह रचाया |

इस विवाह के समय तुलसी की बहन आम्लिका सहेली के रूप में कुछ दिनों के लिए उसके ससुराल गई | इस विवाह समारोह के लिए हिमालय के बद्रीनाथ से कुछ ऋषि-मुनि आए थे | वे वहां से सुन्दर बेर लेकर आए थे वह उन्होंने कृष्ण और तुलसी को दिए | उनमें से कुछ बेर उन दोनों ने शोक से खाए | कृष्ण और वृंदा का बचपन का मित्र पेंद्या आया था जो एक हाथ और एक पांव से विकलांग था | वह आर्थिक रूप से निर्धन था | कृष्ण और तुलसी को उसने विवाह की भेंट के रूप में कपित्थ वृक्ष का फल दिया |

विवाह के अवसर पर उन्हें अनेक अमूल्य चीजें भेंट स्वरूप मिली थी | कृष्ण ने तुलसी को कहा ये सारी मूल्यवान वस्तुएं निर्धनों को दक्षिणा के रूप में बांट दो और देते समय तुलसी का एक पत्ता उस पर रख दो | पेंद्या द्वारा तुलसी पत्र रखने का कारण पूछने पर कृष्ण ने कहा ‘ दिए हुए दान की पुन्ह मन में अभिलाषा निर्मित न हो, इतना ही नहीं तो उसका उच्चार भी कभी न हो, इसलिए यह तुलसी पत्र उस पर रखा गया है | आगे से इन दो बातों का तुलसी पत्र प्रतीक रहेगा |’

तुलसी को रिक्त हाथ घर नहीं ले जाना इसलिए कृष्ण ने सुन्दर केशरिया रंग के गेंदे के फूल उठा लिए | त्याग के प्रतीक के रूप में भगवा रंग धारण किए हुए गेंदे के फूलों को कृष्ण ने अपनाया यह सब लोगों के ध्यान में आ गया | पेंद्या ने दिया हुआ कपित्थ वृक्ष का फल भी कृष्ण ने उठा लिया | आंवला, इमली और बेर लेने का इशारा उन्होंने तुलसी से किया | कृष्ण ने अपने एक हाथ में गन्ना लिया और दुसरे हाथ में तुलसी का हाथ लेकर स्वर्ग की ओर चल पड़े | देवी-देवता उनकी राह देखते स्वर्ग में रुके हुए थे | कृष्ण तुलसी को लेकर आ रहे हैं यह देखकर उन्होंने उन पर फूलों की वर्षा की शहनाई-चौघडा के स्वरों का निनाद गूंजने लगा और सर्वत्र आनंद ही आनंद फैल गया |

तुलसी विवाह की यह प्रदीर्घ पौराणिक कथा वनस्पति जगत के गौरव से सजी हुई है | वनस्पति जगत के सम्बन्ध में मानव जगत में आदर सदैव बना रहे इसके लिए इसके लिए उनका मेल अपने कुलधर्म और कुलाचार से बैठाया गया है | तुलसी विवाह में तुलसी, गन्ना, आंवला, इमली, बेर, कपित्थ और गेंदा इन वनस्पतियों को प्रधानता दी गई है वह उन-उन वनस्पतियों के विशिष्ट गुणधर्मों के कारण ही |

 तुलसी वनस्पतिशास्त्रानुसार लबिएटी कुल की होकर उसके पत्ते कफहारक, चर्मरोगों पर उपयुक्त होकर उसकी मंजिरी मुत्रविकारों पर गुणकारी है | उसका तेल जंतुनाशक है | भारत में यह वनस्पति सर्वत्र उपलब्ध है | गन्ना ग्रमिनि कुल का होकर उससे शकर-गुड तैयार होती है | उसका रस सारक है | आंवला श्वांस नलिका के दाह, दमा में, अतिसार, रक्तस्त्राव पर उपयुक्त है | गेंदे का रस आँखे आने, जखम, रक्तशुद्धि और बवासीर में गेंदे के फूलों का रस गुणकारी है |

आयुर्वेद जो मनुष्य के दीर्घायु होने के संबंध में सोचता है उसकी बहुतसी औषधियां वनस्पति आधारित ही हैं | इस कारण छोटा सा दिखने वाला पौधा हो अथवा बड़ा वृक्ष, सभी का संवर्धन करो, पालन-पोषण करो और मानवी जीवन को समृद्ध करने की दृष्टी से संशोधन करो यह तुलसी विवाह के लिए आवश्यक गन्ना, आंवला, इमली, बेर, कपित्थ और गेंदा इन वनश्रियों का भावार्थ है |       
         

                 

Saturday, 3 November 2018

दीपोत्सव विदेशों में शिरीष सप्रे


दीपोत्सव विदेशों में
शिरीष सप्रे

यह प्रकाश पर्व न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि अन्य कई देशों में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है | हां यह बात जरुर है कि पर्व मनाने का तरीका निश्चय ही हमसे कुछ भिन्न है | लेकिन वहां के यह त्यौहार भी हमारी  दीवाली की भांति ही हैं | श्रीलंका जैसा छोटा सा द्वीप दीवाली को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाता है इस त्यौहार की रात्रि को प्रत्येक घर छोटे-छोटे दीपों से सजाया जाता है और लोग पटाखे छोड़ते हैं | श्रीलंका में इस अवसर पर खांड से बनी मिठाइयां विभिन्न पशु-पक्षियों और मानव आकृतियों में बनाई जाती हैं | यहां यह दिन राष्ट्रीय अवकाश का होता है |

थाइलैंड और मलेशिया में भी दीपावली मनाई जाती है | थाइलैंड में यह क्राथोग के नाम से मनाया जाता है | इस दिन यहां के निवासी केले के पत्तों को छोटे-छोटे खंड बनाकर जल में प्रवाहित करते हैं | केले के पत्तो के इन खण्डों को ‘क्राथोग’ नाम से पुकारा जाता है, प्रत्येक खंड एक जलती हुई बत्ती एक मुद्रा और ‘धूप’ होती है| इसके अतिरिक्त वे लोग अपने घरों को रोशनी से भी सजाते हैं | मलेशिया में ज्योति पर्व राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है | वहां के लोग इस पर्व को बिलकुल भारत जैसे तौर-तरीकों से बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं | इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है | यहां के निवासी इस दिन आतिशबाजी का आनंद उठाते हैं |

सुमात्रा एवं जावा  द्वीपों में यह प्रकाश पर्व भारत के समान अक्टूबर या नवम्बर में मनाया जाता है | मलाया में भी दीपावली का पर्व मनाया जाता है | वहां ‘फानो पर्वत’ पर एक भग्न मंदिर विद्यमान है | जिसमें भगवान विष्णु और लक्ष्मी की प्रतिमाएं हैं | १९७६ में गुयाना ने दीपावली पर चार डाक टिकिट की एक श्रंखला जारी की थी जिसमें दीपक व लक्ष्मी के चित्र अंकित थे | वहां पर भी दीपोत्सव पर लक्ष्मी की पूजा प्राचीन काल से विद्यमान थी वहां पर लक्ष्मी पूजा का विधान है |

म्यांमार (बर्मा) में वहां के लोग इस पर्व को ( वैगिजू) नाम से नवम्बर महीने में मनाते हैं | म्यांमारवासियों में यह मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने ज्ञान का प्रकाश पाने के बाद इसी भूमि पर अवतरण किया था | हर एक मकान को इस दिन रोशनी से सजाया जाता है और हर द्वार पर तोरण वन्दनवार लगाए जाते हैं | म्यांमार  के लोग इस दिन नए वस्त्र पहनना शुभ मानते हैं | 
 
जापानी लोग दिवाली जैसा ही पूर्व (तौरोनगाशी) नाम से मानते हैं | यहां के लोगों का अटूट विश्वास है कि इस शुभ दिन उनके पूर्वज उन्हें आशीर्वाद देने उनके घर आते हैं | अतएव पूर्वजों के आगमन की खुशी में सारे घर के लोग प्रकाश करते हैं | वहां इस पर्व का त्रिदिवसीय आयोजन किया जाता है |

चीनी लोग प्रकाश पर्व को ‘नई महुआ’ नाम से जानते हैं | चीन में इस दिन की तैयारी के लिए बहुत पहले से मकान साफ़ कर लिए जाते हैं | इस दिन विभिन्न रंगों के कागजों से मकानों को सजाया जाता है | चीनी व्यापारी भारत की तरह ही इसी दिन नए बही खाता शुरू करते हैं | ‘नई महुआ’ नामक इस पर्व के दिन चीन में राष्ट्रीय अवकाश रहता है |
  
इस तरह हम देखते हैं कि दीपावली पर्व हर देश में ख़ुशी से मनाया जाता है और उन देशों में भी दीप जलाने की परम्परा वर्षों से चली आ रही है|
    
     

Friday, 2 November 2018

पुखराज – रत्नों का रत्न है - शिरीष सप्रे


पुखराज – रत्नों का रत्न है
शिरीष सप्रे

‘पुखराज’, ‘पुष्पराग’, ‘सैफायर’ का महत्व भारतीय ज्योतिष में बहुत अधिक है ,क्योंकि यह बृहस्पति या गुरु का प्रतिनिधित्व करता है | एक साल में एक राशि की परिक्रमा पूरी करनेवाला यह पीले रंग का ग्रह ब्रह्माण्ड में सबसे बड़े ग्रह शनि के बाद दूसरा बड़ा ग्रह माना गया है | फूल में जितने रंग होते हैं वह सब इस में भी होते हैं | रत्नों की ओर खिचाव या आकर्षण मनुष्य को बहुत पहले से है | उसमें पुखराज का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि, इसकी उपलब्धि अल्प मात्रा में है | अंग्रेजी में इसे टोपाज कहते हैं |

सामान्य धारणा के विपरीत शुद्ध पुखराज रंगहीन रत्न है| अज्ञात अशुद्धियों के कारण ही इसके रवे रंगीन होते हैं | इन रंगों में कम गहरे पर अधिक चमकीले पीले, भूरे, सलेटी, हल्के नीले, हरे, बैंगनी, रंग प्रमुख हैं | इनमें से पीले रंग के पारदर्शक, चमकीले एवं उच्चकोटि के स्फटीकों की गणना रत्नों में की जाती है | कभी-कभी गुलाबी रंग का पुखराज भी मिल जाता है | लेकिन अमलतास के फूलों के रंग वाला पुखराज वाला पुखराज श्रेष्ठ होता है | पीलिया, प्लेग, गले के रोग, सिरदर्द आदि रोगों में पुखराज धारण करना बेहतर होता है | जिस कन्या के विवाह में व्यवधान अथवा विलम्ब हो उसे पीला पुखराज धारण करना चाहिए | चमत्कारिक अनुभव कुछ ही दिन में आपके सामने आएगा | 
    
उत्तम कोटि का पुखराज भारी, स्वछ, चिकना, कोमल और कन्ठपम्पा के पुष्प के समान होता है | ऐसे पुखराज में चीट, सुन्न, दुधक, दुरंग, टहेरू, जाला, छींटा, गड्ढ़ा, और रेशा नहीं होना चाहिए | पीले स्फटिक और पुखराज में भेद करना कठिन हो जाता है | दोनों समान आकार, स्वच्छ और चमक वाले भी मिल जाते हैं ,यद्यपि पुखराज का रंग अधिक सुकुमार होता है | बोमोफार्म या मैथिलीन आयोडैड में डालने पर पुखराज डूब जाएगा पर स्फटिक तैरने लगेगा |

जडे हुए रत्न की जांच फिरेक्टोमीटर से की जाती है, जिससे इसका वर्तनांक  ज्ञात हो जाता है | स्फटिक के अतिरिक्त पीले रंग के नीलम, शोभामणी, बैरुज, गोमेद, हई हैमवैदुर्य मणी,पुखराज जैसे होते हैं | अत: पुखराज मान लेने से पूर्व रत्न की पूरी जांच की जाना चाहिए |

फेरन कृत ‘रत्न परीक्षा’ में लिखा है कि, पुखराज कनक वर्ण अत्यंत पीला, स्निग्ध होता है | इसको जो धारण करता है  उससे बृहस्पति अत्यन्त प्रसन्न होते हैं |  रत्नों के अतिरिक्त पुखराज का उपयोग औषधियों के निर्माण में भी किया जाता है | गुलाब जल या केवडा जल में २५ दिन तक छोटे हुए काजल समान बारीक पुखराजपुख को धूप में सुखाकर उसका उपयोग आयुर्वेदिक विज्ञान के अनुसार पीलिया, आमवात, कफ, खांसी, श्वांस, नकसीर, आदि रोगों के उपचार में किया जाता है | हीरे सी चमक-दमक और टिकाउपन होने के कारण पुखराज का पर्याप्त प्रचलन है |

उत्तम कोटि के पुखराज की दुर्लभता के कारण आजकल इमिटेशन पुखराज भी बनाए जाते हैं | ऐसे पुखराज में रुक्षता होती है और चमक कांच जैसी होती है | इसमें दुधक नहीं होता | कृत्रिम पुखराज अंग में नरम होता है | इसमें आभा भी अधिक नहीं होती |
पुखराज श्रीलंका, ब्राजील, रूस, साइबेरिया, उत्तर नाइजेरिया, अमेरिका, मेक्सिकों आदि देशों में मिलता है | नीले रंग के पुखराज स्काटलैंड में मिलते हैं | श्रीलंका में मिलने वाले पुखराज पीले, हलके हरे, तथा रंगहीन होते हैं |   
    
                      

Sunday, 28 October 2018

जुआ जो पूरी दुनिया में किसीका ना हुआ - शिरीष सप्रे


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जुआ जो पूरी दुनिया में किसीका ना हुआ - शिरीष सप्रे 
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Friday, 19 October 2018

बहु उपयोगी, बहु रंगी फूल - गेंदा

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पर्यावरण की दृष्टी से एक सार्थक पहल - मिट्टी के गणेश जी


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Wednesday, 10 October 2018

रामोपासना

रामरक्षा हे स्तोत्र आणि "श्रीराम जयराम जयजय राम". ह्या मंत्राशिवाय रामोपासना पूर्ण होऊ शकत नाही. ही एक अतिशय प्रभावी साधना आहे.

आजकाल वाढत्या लोकसंख्येमुळे आपण घर गावाच्या वेशीबाहेर घेतो.त्या जागा कधी कधी बाधित असतात. नवीन घरात गेल्यावर लोकांना समाधान मिळण्याऐवजी सतत मनात हुरहुर वाटणे, घरात सुखसोयी असूनही त्यांत मन न रमणे किंवा सतत घराबाहेर राहावे लागणे.अशा तर्हेचे त्रास चालू होतात.काही लोकांना हे त्रास तीव्रतेने जाणवतात. पूर्वी गाव वेस असायची, ग्रामदेवता असायच्या पण आता ह्या संकल्पना आपण आज बाळगू शकत नाही. हे मान्य करावे आणि रामोपासना निरंतर चालू ठेवावी.

घरात देवासमोर रोज "श्रीराम" असे लिहून त्याला पाढंरे फूल वाहावे. संध्याकाळी 108 वेळा वरील जप करावा आणि रामरक्षा सुध्दा म्हणावी. ज्यांचे पैशासाठी घराचे काम अर्धवट राहिले आहे अशांनी...
आपदामपहरतारम् दातारं सर्व संपदाम्
लोकाभिरामम् श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ||

सर्व आपत्तींना दूर पळवुन लावण्यार्या, सर्व संपत्ती देणार्या आणि आनंद देणार्या श्रीरामाला मी पुन्हा पुन्हा नमस्कार करतो हा मंत्र रोज उदबत्ती लावून म्हणावा.

रामरक्षेवर फार छान माहिती

रामरक्षेच्या एका श्लोकाबद्दल- कदाचित माहिती असेलही सगळ्यांना....

रामो राजमणिः सदा विजयते
रामं रामेशं भजे ।
रामेणाभिहतो निशाचरचमू
रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं
रामस्य दासोसम्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे
भो राम मामुद्धर ।।

या श्लोकात राम या नामाच्या सगळ्या विभक्ती आल्या आहेत. रामो=रामः(प्रथमा) रामं(द्वितीया),
रामेण(तृतीया), रामाय(चतुर्थी),
रामान्नास्ति रामात् (पंचमी)
रामस्य(षष्ठी), रामे(सप्तमी),
भो राम(संबोधन).
ह्या श्लोकात रकाराची पुनरावृत्ती असल्याने गर्भारपणात हा श्लोक म्हणल्याने जन्माला येणारे बाळ बोबडे (किंवा जीभ जड असलेले) होत नाही.

◆ रामरक्षा आरोग्यरक्षक कवच

 एक वेगळा पैलू तुमच्यासमोर मांडत आहे. श्रीरामरक्षा स्तोत्र हे आजही कित्येक घरांमध्ये तिन्ही सांजेला आवर्जून म्हटले जाते. आजारी व्यक्ती वा शस्त्रक्रिया झाल्यानंतर त्या रुग्णाला रामरक्षा ऐकवली जाते. रामरक्षाच का? असे काय रहस्य या मंत्रात दडले आहे?

रामनामकवच

शिरो मे राघवः पातु
भालं दशरथात्मजः ॥
कौसल्येयो दृशौ पातु
विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता
मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु
कण्ठं भरतवंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु
भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥
करौ सीतापतिः पातु
हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यंपातु खरध्वंसी नाभिं
जाम्बवदाश्रयः ॥
सुग्रीवेशः कटी पातु
सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरू रघूत्तमः पातु
रक्षःकुलविनाशकृत्‌ ॥
जानुनी सेतुकृत्पातु
जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः
पातु रामोऽखिलं वपुः ||

असे कवच या स्तोत्रात आलेले आहे. कवच म्हणजे आपल्या प्रत्येक अवयवाचे रक्षण करण्यासाठी मंत्र धारण करणे!! थोडक्यात; आपले संपूर्ण शरीरच रामनामाने अभिमंत्रित करणे. या कवचाची फलश्रुती नीट पहा....

पातालभूतलव्योम
चारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते
रक्षितं रामनामभिः ॥

म्हणजे, पाताळ, भूमी आणि आकाश या तिन्ही लोकांत संचार करणारे, छद्मचारिणः म्हणजे खोटे सोंग घेणारे असे (राक्षस) रामनामाने रक्षिलेल्या लोकांकडे नजर वर उचलून पण पाहू शकत नाहीत!!

◆◆◆◆ !! श्रीराम !! ◆◆◆◆