Friday, 22 June 2018

मानवता का पाठ पढ़ाता है टूथब्रश - शिरीष सप्रे

मानवता का पाठ पढ़ाता है टूथब्रश
शिरीष सप्रे
सुबह उठकर दांत साफ करना हमको बचपन से ही सीखाया जाता है। दांत साफ करने के लिए पहले भले ही टूथब्रश सभी लोग उपयोग में न लाते हों परंतु आज ग्रामीण हो या शहरी सभी टूथब्रश का इस्तेमाल करते नजर आते हैं। टूथब्रश हमारे जीवन का इतना अभिन्न अंग बन गया है कि, यदि एक दिन सुबह हमें किसी कारणवश टूथब्रश से दांत साफ करने को ना मिले तो सारा दिन बेचैनी से गुजरता है। ऐसे इस टूथब्रश का भी अपना एक इतिहास है और इसके आविष्कार की कहानी भी बडी रोचक है। 

इंग्लैंड के वारविकशायर (शेक्सपियर का जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ था) में सन्‌ 1770 में दो समुदायों के बीच हुए जातीय धार्मिक दंगों जिनमें हजारों लोग मारे गए थे और यह धार्मिक विद्वेष लंबे समय तक चला। सरकार ने दंगों के जिम्मेदार एडिस को कैद कर उस पर मुकदमा चलाया और जेल भेज दिया। जेल जीवन के एकांत में इसे अपने किए पर प्रायश्चित होने लगा और उसने निश्चय किया कि वह अपने द्वारा फैलाए गए धार्मिक विद्वेष को समाप्त करने में ही अपना बचा हुआ समय लगाएगा। इसी सोच के दौरान उसके हाथ से टूथब्रश बन गया।

हुआ कुछ यूं कि उसने देखा कि प्रतिदिन कैदी सुबहसबेरे मुंह धोने के दौरान दांतों को मिट्टी, दातून आदि से रगडते हैं और इस दौरान उनके मसूडों से खून बहने लगता है एवं कई बार तो मसूडे भी फूल जाते हैं। एडिस सोचने लगा कि इस प्रकार से रक्त बहना भी तो एक प्रकार से रक्तपात ही है। अतः वह सोचने लगा कि क्यों ना कोई ऐसी युक्ति खोजी जाए जो कैदियों को इस समस्या से निजात दिला सके। बहुत सोच-विचार के बाद उसने लकडी की एक खपची ढूंढ़ी, रंगबिरंगे बाल एकत्रित किए तथा अपनी कल्पनाशक्ति से खपच्ची को छिलकर बढ़िया आकार दिया तथा अगले उसके अगले हिस्से पर महीन सुराख कर दिया। जहां-तहां से गोंद इकट्ठा कर उस सुराख में कांट-छांट कर बराबर किए महीन बालों को फिट कर गोंद द्वारा सुराख में जमा दिया। इस तरह उसने काले-उजले बालों का सम्मिलित कूचोंवाला साधारण अनाकर्षक दांत मांजने का ब्रश तैयार किया।

कैदियों द्वारा इसके सफल प्रयोग किए जाने के बाद से यह नित्य अपने इस ब्रश को तैयार करने में समय देने लगा। जेल से रिहा होने के बीच के दो वर्षों में उसने तमाम कैदियों को यह ब्रश उपहारस्वरुप देने और इसके निर्माण में लगाया। जेल से रिहा होने पर वह इस काले-उजले बालों की सम्मिलित कूंचीवाला ब्रश आम लोगों को वितरित करता हुआ वारविकशायर लौटा। वहां भी साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए उसने काले-सफेद बालों की कूंचीवाला ब्रश आमजन को भेंटकर इसी कूंची की तरह गूंथकर रहने की शिक्षा देने लगा। रंग, भाषा  और जातिगत भेद पाटने के कारण वह संत एडीसन के नाम से विख्यात हुआ। उसके द्वारा आविष्कृत यह ब्रश तमाम तब्दीलियों के बावजूद आज भी हर धर्म, भाषा और सम्प्रदाय के लोग बेहिचक स्वीकार कर रहे हैं। यही इसकी सफलता है कि, हर सुबह यह विभिन्न रंग के बालों वाला टूथब्रश मानवता का पाठ पढ़ाने के काम में बिना किसी भेदभाव के जुट कर पूरे विश्व को एकता का पाठ पढ़ाते हुए विभिन्नता को स्वीकारने का संदेश देता है। पूरा विश्व 26 जून को टूथब्रश डे रुप के मनाता है।

Friday, 15 June 2018

प्राचीनकालीन चोर और चौर्य कला - शिरीष सप्रे

प्राचीनकालीन चोर और चौर्य कला 
शिरीष सप्रे

प्राचीनकाल में चोरी करना भी एक कला, ऊंचे दर्जे की कला मानी जाती थी और चोर का स्थान आज की तरह हेय नहीं था। उस समय देश धन-धान्य से भरपूर था और लोग खा-पीकर सुखी थे इसलिए उस काल में आजकल जितनी चोरियां भी नहीं होती थी। जिस प्रकार से कामशास्त्र को धर्म का एक अविच्छिन्न भाग माना गया है उसी तरह से चौर्यकला भी धर्म का ही भाग मानी गई है। परंतु, कामशास्त्र की भांति इस विषय पर कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। किंतु, वांग्मय में प्राप्त विवरणों से पता चलता है कि, चोरों को उनके गुरुजन आदेश दिया करते थे कि वह धर्मपूर्वक चोरी करें, इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि अभावग्रस्त व्यक्तियों को चोरी करने का अधिकार होता था और उन पर यह बंधन होता था कि, वह दरिद्रजन के यहां चोरी ना करें वरन्‌ अपना कार्य धनाढ्य वर्ग के बीच ही संपन्न करें। चोरी को उन दिनों बाकायदा एक कला के रुप में ही विकसित किया गया था। इतना ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति को इस कला का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक माना जाता था। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि राजकुमारों को अन्य कलाओं की शिक्षा देने के साथ ही चौर्यकला भी भलीभांति सीखाई जाना चाहिए जिससे राजनय में आवश्यकता पडने पर वह समयानुसार उसका उपयोग कर सके।

महाकवि शूद्रक का मृच्छकटिकम्‌ इस दृष्टि से पठनीय है। मृच्छकटिकम्‌ इस चर्चित संस्कृत नाटक में चोर की स्थिति देखने के पूर्व यह जान लें कि, मृच्छकटिकम्‌ भारतीय नाट्‌य परंपरा का पहला वास्तववादी नाटक और शूद्रक पहला विद्रोही कहा जाना चाहिए। शूद्रक ने ही संस्कृत नाटक को पौराणिक कथा और राजा रानी की दुनिया से बाहर निकाला और गणिका, चोर, जुआरी, क्रांतिकारियों के उपेक्षित विश्व को सामने लाया। भ्रष्ट ब्राह्मण, अनाचारी बौद्ध भिक्षुओं का पर्दाफाश किया। इस नाटक की अनेक विशेषताओं में से एक विशिष्टता यह है कि, इसमें चौर्यकला के बारे में बहुत सी जानकारी अपने को मिलती है।

मृच्छकटिकम्‌ इस नाटक में चोर की स्थिति देखिए इस पात्र का नाम शर्विलक है जो कभी दान न लेनेवाले व्युत्पन्न ब्राह्मण (चतुर्वेदी) का पुत्र है फिर भी एक चोर है। चोरी में और वह भी किसी घर में सेंध लगाने में वह माहिर है। वसंतसेना की दासी मदनिका से वह प्रेम करता है। लेकिन उससे विवाह करने के पूर्व उसे दासत्व से मुक्त कराना आवश्यक है और इसके लिए धन चाहिए। इसके लिए वह चारुदत्त के घर को चुनता है। चारुदत्त का घर विशाल भवन होने के बावजूद एक जमाने का धनाढ्य व्यापारी अब धनहीन ब्राह्मण है। जब शर्विलक को यह पता चलता है तो वह चोरी किए बिना वापिस लौटना चाहता है।

शर्विलक ने चौर्यकला की शिक्षा के पाठ योगाचार्य नामक गुरु से सीखे हैं। अन्य चोरों के समान ही शिवपुत्र स्कंद यानी कार्तिकेय शर्विलक की उपास्य देवता है। चौर्यकला के उपासक स्वयं को स्कंद के वंशज, शिष्य समझते हैं। चोरी करने के पूर्व वे अपनी गुरु परंपरा का स्मरण करते हैं। भगवान कनकशक्ति नामक किसी व्यक्ति ने इस संबंध में कोई ग्रंथ लिखा है यह भी प्रतीत होता है। शर्विलक के अनुसार भगवान कनकशक्ति ने सेंध लगाने के चार नियम बताए हैं। शर्विलक एक अंधेरी रात में चारुदत्त के घर चोरी करने के लिए सिद्ध होने पर पहले कार्तिकेय, कनकशक्ति, भास्करनंदी, योगाचार्य इन अपने गुरुओं को वंदन करता है। योगाचार्य के अपन आद्य शिष्य हैं इसका उसे सार्थ गर्व है। जब मनुष्य सोये हुए हों तब चोरी करना यह कोई पराक्रमी कार्य नहीं परंतु, चोरों की यह परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। अश्वत्थामा ने तो सोये हुए पांडवपुत्रों को ही मार डाला था इसका उदाहरण शर्विलक देता है। चोरी का समर्थन करते हुए वह यह भी कहता है कि चोर किस प्रकार से स्वयं का कार्य स्वयं की इच्छानुसार कर सकता है। किसी का गुलाम बनकर रहने की नौबत उस पर नहीं आती।

शर्विलक भले ही चोर हो परंतु, चोरी के इस अधम पेशे में भी कम से कम नीतिमत्ता का पालन तो भी करना चाहिए इसका भान उसे है। इसीलिए उसने किसके यहां चोरी करना, किसके यहां नहीं, क्या चुराना, क्या नहीं इसके कुछ संकेत उसने तय कर रखे हैं। मिला मौका कि कर चोरी इस प्रकार की उसकी वृत्ति नहीं। चोरी की हिम्मत जुटाए बगैर धन नहीं मिलता यह मदनिका को समझाते हुए वह कहता है उसने कभी भयभीत, सोये हुए व्यक्ति पर आक्रमण नहीं किया ना ही किसी के साथ बेवजह मारपीट की और ना ही करेगा। चोरी के लिए निकलने पर उसने किन घरों को छोडा उससे पता चलता है कि शर्विलक चोर होने पर भी सज्जन है।

शर्विलक अत्यंत चतुर, मंजा हुआ चोर है उसने चोरी की विधिवत शिक्षा अपने गुरु से हासिल की है। चौर्यकला के लिए आवश्यक सारे गुण उसमें हैं। वह चतुर है, समयानुकूल सूझ और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता उसमें है। साहस तो उसके रोम-रोम में मानो भिना हुआ है। उसका शरीर दृढ़ तथा लचीला है। स्वयं के इन गुणों का वर्णन उसने स्वयं बडे सुंदर शब्दों में किया है। वह स्वयं के बारे में कहता है- 'मैं बिल्ली जैसे दबे पांव भाग सकता हूं, समय आने पर हिरन जैसा चपल होकर वायुगति से दौड सकता हूं। किसी भी चीज को हाथो-हाथो उठाकर गायब करने की कला मैं बाज से सीखा हूं। कुत्ते के समान मनुष्य सोया हुआ है कि जाग रहा है इसका अंदाजा मुझे तत्काल लग जाता है। सांप के समान संकरी जगह से मैं निकल सकता हूं। रुप, भेष बदलने में मैं माहिर हूं, मानो साक्षात माया ही। भाषा परिवर्तन में मूर्तिमंत वाणी। रात में दिया, संकट में दोमुंहा सांप, जमीन पर घोडा और पानी में मै नौका बन जाता हूं।

   जिस समय चंद्रदेव अस्ताचल की ओर जाते हैं उस समय शर्विलक चारुदत्त के मकान में प्रवेश करता है। पहले वह उद्यान की चारदीवारी में सेंध लगाकर भीतर घुसता है। जो अपेक्षाकृत सरल है, फिर वह अंतःपुर की ओर उन्मुख होता है, वह भित्ति का ऐसा स्थल तलाश करता है जो निरंतर जलवर्षा को सहते-सहते शिथिल पड गया हो और जिस पर प्रहार करने से कोई आवाज ना निकले, साथ ही वह स्थान ऐसा भी होना चाहिए जहां वह छुप भी सके  तथा जहां स्त्रियों का आवागमन भी ना हो। अंततः वह ऐसे स्थान को पा ही लेता है जहां की मिट्टी निरंतर सूर्य को जल देते रहने के फलस्वरुप शिथिल पड गई हो, जहां चूहों ने धूल का ढ़ेर लगा रखा हो। शर्विलक इस सबको सफलता के लक्षण मानता है। अब वह भगवान कनकशक्ति द्वारा बताए गए सेंध के चार नियमों को दुहराता है, यह नियम हैं -

जिस भित्ति की ईंटें पक्की हों, उन्हें खींचना, जिसकी ईंटें कच्ची हों उन्हें काटना, जिसकी मिट्टी संपुटित हो उसे खींचना तथा जो भित्ति काठ की हो उसे चीरना। चारुदत्त के घर की भित्ति की ईंटें चूंकी पक्की हैं इसलिए वह उन्हें खींचता है। शर्विलक ऐसी कलात्मक सेंध लगाना चाहता है जिसे देखकर नगरवासी वाहवाह कर उठें। चौर्यशास्त्र के संकेतानुसार खिलता कमल, सूर्यबिंब, अर्धचंद्र, कुआ, स्वस्तिक और पूर्णकुंभ इन छः आकारों में से किसी एक आकृति में छेद बनाएं।

चारुदत्त का मकान पक्की ईंटों का है इसलिए शर्विलाक उसमें कुंभ के आकार की सेंध बनाता है परंतु, शीघ्रता के कारण वह नापने की रस्सी लाना भूल जाता है इसलिए वह गले के यज्ञोपवीत से काम चलाता है। चोरी के लिए यज्ञोपवीत का उपयोग करने की एक कृति से भ्रष्ट ब्राह्मण्य, कर्मकांड, दांभिकता पर शूद्रक ने जो प्रहार किया है उसका भारतीय साहित्य में जवाब नहीं। चोरी के अलावा उसमें अटकाई हुई चाभी से दरवाजा खोलने, बिच्छू अथवा सांप के काटे हुए स्थान पर बांधने के लिए यज्ञोपवीत का उपयोग किस प्रकार से होता है यह भी शूद्रक ने बतलाया है। संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार, महाकवि भास ने अपनी रचना चारुदत्त में 'दिन में ब्रह्मसूत्र के लिए और रात्रि में कर्मसूत्र के लिए" इस प्रकार के मार्मिक शब्दों में यज्ञोपवीत का चौर्यकला में महत्व बतलाया है।

सेंध काटते समय जब एक ईंट रह जाती है तब उसे एक सर्प काट लेता है। उसके पास इसकी भी औषधी है क्योंकि, ऐसे कामों में सांप का काटना बहुत मामूली बात है। अपना उपचार करके वह सेंध पूरी करता है। दीवार में प्रमाणबद्ध छेद हो जाने पर शर्विलक पहले अपने साथ लाए हुए लकडी के पुतले को अंदर सरकाकर देखता है कि, वह कहीं अटक तो नहीं रहा, इसका विश्वास हो जाने पर वह स्वयं अंदर प्रवेश करता है। घर में प्रवेश करने के पश्चात सबसे पहले वह मुख्य द्वार की कुंडियों को खोलता है जिससे अगर भागने की आवश्यकता हुई तो किसी तरह की कठिनाई का सामना ना करना पडे। कमरे में लगे दीये के प्रकाश में मृदंग, पखवाज, ढ़ोलकी, वीणा, सारंगी, ग्रंथ इस प्रकार से एक एक वस्तुएं स्पष्ट होती जाती हैं अपन ने एक कंगाल के घर में प्रवेश किया है यह उसके ध्यान में आ जाता है।

इसी कमरे में चारुदत्त और उसका विदूषक मित्र सोये हुए होते हैं। उन पर नजर पडते ही शर्विलक उनके पास जाकर वे सचमुच सोये हुए हैं ना यह देखता है। संयोग ऐसा कि विदूषक उसी समय दीवार में छेद कर चोर घर में घुस आया है का स्वप्न देख रहा होता है और नींद में ही वह अपने पास की वसंतसेना के दागिनों की गठरी 'चारुदत्त तू इसे संभाल" कहकर आगे आए हुए शर्विलक के हाथों मेंे सौंप देता है। दरिद्री चारुदत्त के घर में केवल भाग्य से शर्विलक के हाथों में बडा सुयोग आ जाता है। उसे बगल में दबा शर्विलक अपने पास के दीपक को बुझानेवाले कीडे को दीये पर छोडकर उसे बुझा देता है और स्वयं के ब्राह्मण कुल को कलंक लगाया और अब इस गरीब ब्राह्मण के जीवन में भी अंधेरा फैला दिया इस विचार से खिन्न होकर बाहर निकलता है।

शर्विलक भास्करनंदी का नाम लेकर ऐसी कोई साधना भी करता है जिससे कोई उसे देख ना सके और यदि कोई उसे मारने का प्रयत्न करे तो उसे किसी तरह का चोट ना लगने पाए। यह साधना कैसी होगी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। शर्विलक मानता है कि चोरी रुपी धूर्तता स्वतंत्र होने के कारण उत्तम है इसमें किसी का दास बनकर हाथ नहीं जोडने पडते।

प्राचीन भारत में चौर्यशास्त्र महत्वपूर्ण विद्या समझी जाती थी। उसे तस्कर मार्ग, स्तेय शास्त्र इस प्रकार के भी नाम थे। मूलदेव स्तेयशास्त्र का जनक माना गया है। मूलभद्र, मूलश्री, कलांकुर, कर्णिसुत, गोणिकपुत्र ये मूलदेव के अन्य नाम हैं। क्षेमेंद्र ने कलाविलास में उसका अत्यंत मायावी, अनेक कलाओं में पारंगत, धूर्तशिरोमणि इस प्रकार से वर्णन किया हुआ है। भोजदेव के श्रंगारमंजरी में भी मूलदेव उज्जयनी का रहवासी होकर वह अत्यंत लंपट, धूर्त होने का कहा गया है। प्राचीन भारत में शर्विलक जैसे गुणी चोर थे वैसे ही चोरों की गुणग्राहकता का कौतुक करनेवाले राजा भी थे। इस प्रकार चोर को भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

इस संबंध में यह कथा पढ़ें - एक बार राजा भोज के शयनमंदिर में एक चोर ने प्रवेश किया, अचानक नींद खुलने के पश्चात राजा के मन में अपने ऐश्वर्य के संबंध में विचार उठने लगेेे और वह स्वयं से बोला 'मुझे क्या कमी है? सुंदर रानियां हैं, दास-दासियां हैं, खजाना भरा हुआ है, जान की बाजी लगा देनेवाले मित्र हैं, एकनिष्ठ मंत्री हैं, भरपूर सेना है।" राजा का यह स्वगत सुन कोने में छिपा बैठा चोर बोल पडा, ' राजन, यह सब आंखें खुली हैं तभी तक, आंखें मुंदने पर इनमें से कुछ भी नहीं।" यह मार्मिक वचन सुन राजा ने चोर के अपराध को क्षमा तो किया साथ ही उसे भरपूर पुरस्कार भी दिया। 

Sunday, 10 June 2018

टीक टीक टीक चलती जा रही हैं घडियां - शिरीष सप्रे

टीक टीक टीक चलती जा रही हैं घडियां
शिरीष सप्रे

घडी कालमापन के लिए उपयोग में लाया जानेवाला उपकरण है। अथर्ववेद में घडी को 'घटिका यंत्र" कहा गया है। प्राचीनकाल में मनुष्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के समय को एक दिन कहा। वैदिक काल में दिन को सूर्य की गति के आधार पर चार पहरों में बांटा जैसेकि सूर्य सिर पर पहुंचने के बाद दूसरा पहर या दोपहर। जब दिन के और अधिक बंटवारे की आवश्यकता हुई तो इसे पंद्रह भागों में बांटा गया और हर भाग को मुहूर्त कहा गया। उदा. भोर को ब्रह्म मुहूर्त कहा गया। दिन को चौबीस घंटों में बांटने की पहल इजिप्त में छह हजार साल सबसे पहले हुई और वहीं पहली धूप घडी भी बनाई गई। इस घडी के लिए जमीन में एक बांस या लकडी का लट्ठा गाडा जाता था तथा इसकी छाया को कदमों से नापकर समय का अंदाजा लगाया जाता था। परंतु, इसी काम के लिए यूनान में मैदान में खंभा गाडा जाता था व इसे 'नोमोन" कहा जाता था।

परंतु, ये घडियां ना तो बारहों महिने सही समय बता पाती थी ना ही रात में काम करती थी। इन्हीं कमियों की वजह से सूर्यघडी का एक सुधरा रुप सूर्यघडी या सनडायल भी असफल सिद्ध रहा। कमियों के बावजूद ये सूर्यघडियां कई सौ सालों तक प्रचलित रहीं। वर्तमान में सूर्यघडियां देश की कई प्राचीन वेधशालाओं में मौजूद हैं। म.प्र. के सीहोर जिले में कलेक्टर के बंगले में 1840 में संगमरमर से बनाई गई घडी स्थापित है और आज भी समय बता रही है। इनके पश्चात जलघडियों का जमाना आया। आज से हजारों साल पहले यह भारत, चीन, मिस्त्र आदि देशों में अस्तित्व में आई। जलघडी बेबीलोन में सबसे पहले बनाई गई। इसमें किसी बडे बर्तन में सूर्योदय होते ही पानी भर दिया जाता, जो नीचे के छिद्र से धीरे-धीरे बूंद बूंदकर टपकता रहता। बर्तन में पानी की सतह देखकर समय आंका जाता था। चीन में इसकी सुधारित आवृत्तिवाली जलघडी बनाई गई। जलघडी की कमियों को देखते हुए इन्हें दूर करने के लिए रेत घडी चलन में आई। यह रेत घडी प्राचीन रोम में बहुत प्रचलित थी। जापान के एक संग्रहालय में गिनीज ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड प्राप्त दुनिया की सबसे बडी रेत घडी मौजूद है। 

कल-पुर्जोे से चलनेवाली पहली घडी किसने बनाई यह तो नहीं बता सकते परंतु संभवतः तेरहवीं शताब्दी में किसी पादरी ने इस प्रकार की घडी बनाई यह घडी उसने प्रार्थना का समय जानने के लिए बनाई थी। इसमें एक वजन दांतेदार पहिये को घूमाता था और हर एक घंटे पर वजन एक घंटे से टकराकर ध्वनि उत्पन्न करता था। लगभग दोसौ वर्ष पूर्व तक इस प्रकार की घडियां टन-टन कर समय बताती रही परंतु इन घडियों को कहीं लाना ले जाना बडा कठिन कार्य था। इसलिए वजन के स्थान पर कुंडलीदार स्प्रिंग बनाई गई। संभवतः यह किसी लौहार के मस्तिष्क की उपज थी। आगे चलकर इन्हीं की वजह से टाइमपीस बनाना संभव हो सका। उस समय की ऐसी एक घडी लंदन के संग्रहालय में रखी हुई है। इसी प्रकार की एक घडी फ्रांस के सम्राट लुई ग्यारहवें के पास थी। इसे सम्राट के साथ घोडे पर लादकर ले जाया जाता था। परंतु, सही समय यह भी नहीं बता पाती थी।

उस जमाने के हिसाब से सही समय बतानेवाली घडी बनाने का श्रेय क्रिश्चियन ह्यूहेंस को है। उसने पेंडूलम वाली घडी बनाई परंतु, पेंडूलम से घडी बनाने का विचार सबसे पहले खगोलविज्ञानी गैलिलियों के मन में आया था। उन्होंने गिरजाघर में लैंप को समान गति से इधर-उधर झूलते देखकर बताया कि इसी आधार पर घडी बनाई जा सकती है। पेंडूलम का हर दोलन अंदर लगे कांटेदार पहियें को एक निश्चित गति से घूमाकर समय बताने का जरिया बनता है। ऐसी घडियों की मुख्य कमानी को चलाने के लिए समय-समय पर चाभी भरनी पडती थी। ह्यूगेंस की घडियों का पेंडूलम लगभग एक फुट लंबा होता था। ये घडियां दिन भर में पंद्रह मिनट तक की चूक हो सकती थी।

इस कमी को विलियम क्लीमेंट नामके अंग्रेज ने 1675 ई. में पेंडूलम की लंबाई तीन फुट तक सीमित कर दोलन का समय तय कर दिया एक सेकंड। इसी कारण से इसे सेकंड या रॉयल पेंडूलम कहा गया। यह घडिया दिन भर में केवल 20 सेकंड तक की चूक करती थी। पेंडूलम वाली घडियां बहुत बनी छोटी भी और बडी भी। अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त लंदन की बिगबेन घडी भी इसी प्रकार की है। तब से लेकर सन्‌ 1800 तक घडियों में बहुत से तकनीकी सुधार हुए पेंडूलम के स्थान पर फौलादी कमानी लगाई जाने लगी। जैसे जैसे कमानी खुलती है घडी के चक्रों को आगे घूमाती जाती हैं। हाथ घडियों में एक छोटा संतुलन चक्र लगा होता है जो लगातार दाएं-बाएं घूमकर सुइयों को गति देता है। संतुलन चक्र को दाएं-बाएं घुमाने के लिए कमानी लगाई जाती है। कमानीवाली सभी घडियों चाभी भरनी पडती है।

अठराहवीं शताब्दी के आरंभ में चक्रों को घूमाने के लिए ज्वेल लगाए जाने लगे जो प्रारंभ में पीतल के थे परंतु शीघ्र ही प्राकृतिक रुबी के लगाए जाने लगे। आगे चलकर ज्वेल नकली रुबी से बनाए जाने लगे। कलाई घडियों की मांग बढ़ती गई और सुविधानुसार इनके आकार भी बदलने लगे छोटी-छोटी सुविधाजनक घडियां बनने लगी। विश्वयुद्ध के बाद तकनीकी क्रांति के कारण ऑटोमेटिक घडियां बनने लगी। पिछली शताब्दी के छठे दशक में इन ऑटोमेटिक घडियों की लोकप्रियता को जबरदस्त झटका लगा। इनसे भी अधिक अच्छी एवं सस्ती इलेक्ट्रानिक घडियां बाजार में आ गई। छोटे से सेल से चलनेवाली। फिर क्वार्ट्‌ज घडियां घर-घर में पहुंच गई। 

क्वार्ट्‌ज दरअसल एक तरह का क्रिस्टल है जिसमें स्थाई रुप से यांत्रिक एवं विद्युत गुण उपस्थित रहते हैं। वैज्ञानिक ऐसे पदार्थों को पीजोइलेक्ट्रिक कहते हैं। इलेक्ट्रानिक सर्किट में विद्युत धारा प्रवाहित होने से यह क्रिस्टल लगातार दोलन करता रहता है। एक विशेष प्रकार की क्वार्ट्‌ज घडी सेकंड के एक लाखवें हिस्से को माप सकती है। परंतु इसके क्रिस्टल के कंपन की आवृत्ति में अंतर पडने से इन पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। इनसे भी अधिक कुशल घडी या मानक का काम बेहद कुशल परमाणु घडियां करती हैं। इनमें कंपन की आवृत्ति के आधार पर समय रिकार्ड किया जाता है। क्वार्ट्‌ज घडियों के अतिरिक्त अनेक वैज्ञानिक कार्यों में भी इनकी सहायता ली जाती है। ये घडियां तीन हजार साल में एक सेकंड की चूक कर सकती हैं। घडियों की इस दास्तान में तो अभी भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है परंतु फिलहाल यहीं पर विराम।

Saturday, 2 June 2018

पर्यावरण दिवस 5 जून - बहुत खतरनाक है यह बढ़ता शोर - शिरीष सप्रे

पर्यावरण दिवस 5 जून
बहुत खतरनाक है यह बढ़ता शोर
शिरीष सप्रे 

चारों ओर बढ़ते शोर के चक्रव्यूह ने हमें बुरी तरह से घेर रखा है। शोर के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह एक चिडचिडाहट पैदा कर देनेवाली चीज है जो हमारे जीवन की गुणवत्ता तक को प्रभावित कर रही है। यह शोर हमारी एकाग्रता को भंग कर हमारे काम में व्यवधान उत्पन्न करता है इससे हमारी उत्पादकता में कमी आती है। यह न केवल हमारी श्रवण प्रणाली को प्रभावित करता है बल्कि हमारे मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव छोडता है। सामान्यतया कर्णकटु, अप्रिय, अनावश्यक ध्वनि को हम शोर कह सकते हैं। वास्तव में हमारे कान को कोई ध्वनि अप्रिय लगती है तो वही शोर या शोर प्रदूषण है। यह शोर मात्र एक मुसीबत ही नहीं तो हमारे स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत हानिकारक है। अत्यधिक शोर से न केवल आदमी के दिमाग में तनाव पैदा होता है बल्कि इस तनाव से कई बीमारियां भी शरीर में अपनी जडें जमा लेती हैं। वह दिन दूर नहीं जब यही शोर दुनिया में बीमारियों के सबसे बडे कारणों में से एक होगा। 

ध्वनि प्रदूषण से उत्पन्न होनेवाले खतरों से हमारे यहां ज्यादातर लोग अभी अपरिचित हैं परंतु तथ्य यह है कि दूसरे अनेक प्रदूषणों की भांति ध्वनि प्रदूषण जानलेवा हो सकता है। दर्जनों की संख्या में तेज आवाज में बजनेवाले लाउडस्पीकर, म्यूजिक सिस्टम हमारी श्रवण क्षमता की नाजुक सीमा 150 डेसीबल को पार कर जाते हैं। यह कोलाहल पूर्ण धूम-धडाका हमारे युवाओं की कभी पूरी ना होनेवाली हवस की उत्तेजना को भले ही तृप्त करती हो परंतु बाकी लोगों के लिए घातक साबित हो रही है। शोर और कोलाहल के रुप में  प्रारंभ हुआ यह ध्वनि प्रदूषण का विष महानगरों से लेकर गांव खेडों तक फैल गया है। अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण का मानवीय रक्त संचलन पर भी बुरा प्रभाव पडता है। स्पीकरों की तेज गति से पैदा होनेवाला संगीत पहले शोर फिर अत्यधिक शोर विष के रुप में परिवर्तित हो जाता है। जिसके परिणाम घातक होते हैं।

देश में बढ़ते वायु, जल और पृथ्वी में व्याप्त प्रदूषण के खतरों पर तो अक्सर शोर मचाया जाता है परंतु, ध्वनि प्रदूषण के विरुद्ध प्रायः शोर सुनाई नहीं पडता। यदाकदा कोई संगठन भर इस बाबत चेताता भी है तो उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह बनकर रह जाती है। आज वायु, जल, पृथ्वी में व्याप्त प्रदूषण की तरह शोर भी पर्यावरण प्रदूषण में शामिल हो गया है। शायद लोगों को इसके गंभीर परिणामों का अहसास ही नहीं। उन्हें पता ही नहीं कि ध्वनि प्रदूषण का यह खतरा दबेपांव आकर हमें दबोच रहा है। अनेक शोध अध्ययनों और रिपोर्टो के मुताबिक कान के पर्दों पर भारी आघात करनेवाले शोरगुल का यही हाल रहा तो शीघ्र ही देश के अनगिनत लोग न केवल बहरों की कतार में नजर आएंगे बल्कि अनेक घातक रोगों से ग्रस्त नजर आएंगे।

शोर अर्थात्‌ ध्वनि प्रदूषण यानी वह ध्वनि जो अरुचिकर लगे की तीव्रता को जिस ईकाई से नापा जाता है उस पैमाने को डेसीबल यानी डी.बी कहते हैं। यह इकाई शून्य से शुरु होती है, जहां से ध्वनि सुनाई देना शुरु हो जाती है। यह ध्वनि की तीव्रता का वह स्तर है जहां से कोई आवाज सुनाई देने लगती है। इस हिसाब से मनुष्य के लिए 45 से 50 डेसीबल तीव्रता की ध्वनि निरापद मानी जाती है। 70 से 75 डेसिबल तक की आवाजें सुनने में विशेष असुविधा महसूस नहीं होती। लेकिन खेद की बात है कि आज मनुष्य को अक्सर इससे अधिक तीव्र अश्रव्य ध्वनियों को न चाहते हुए भी सुनने पर विवश होना पड रहा है और यही सबसे अधिक चिंता की बात है। वैज्ञानिक निष्कर्षों के अनुसार 85 डेसीबल से अधिक तीव्रता की ध्वनि में अधिक समय तक रहने पर मनुष्य बहरा हो सकता है और 120 डेसीबल से अधिक तेज ध्वनि गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशुओं को तक को प्रभावित कर सकती हैं। 

शोर से शारीरिक एवं मानसिक रोग होते हैं, यह जानकारी कोई नई नहीं है। अपने देश में बरसों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं वैद्य शोर से होनेवाली क्षति और रोगों से अवगत थे और शोर से बचने की सलाह देते थे। आज दुनिया भर में कई संस्थाएं ध्वनि प्रदूषण से होनेवाले रोगों का अध्ययन कर रही हैं। पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में शोर-शराबा कई गुना बढ़ गया है। कान को तो शोर का सबसे अधिक अन्याय सहन करना पडता है। निरंतर शोर के बीच रहने से कान के भीतरी भाग की तंत्रिकाएं नष्ट हो जाती हैं और धीरे-धीरे मनुष्य पूरी तरह बहरा हो जाता है। भारत में जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक है कि ध्वनि प्रदूषण संबंधी चेतना बढ़ाने के लिए प्रचार माध्यमों के द्वारा अभियान चलाए जाएं। सत्य तो यह है कि हम भारतीय मूलतः शोर करनेवाले लोग हैं और इस मामले में असंवेदनशील भी हैं। आवश्यकता है कि शिक्षा के माध्यम से हममें शोर के प्रति संवेदनशीलता जगाने के प्रयास किए जाएं।

शोर या ध्वनि प्रदूषण से प्रभावित व्यक्ति अनिद्रा, कार्य में अरुचि, चिडचिडापन, क्रोध एवं मानसिक तनाव, घबराहट, जी मिचलाना, सिरदर्द, रक्तचाप में वृद्धि, पाचन क्षमता में क्षीणता और गुर्दों की खराबी आदि रोगों से ग्रस्त हो सकते हैं। बढ़ते हुए शोर को रोका जाना अत्यंत आवश्यक है। इस पर अंकुश लगाना हमारा नैतिक कर्तव्य है। ध्वनि प्रदूषण की समस्या का समाधान केवल कानून से ही संभव नहीं है अपितु इसमें स्वैच्छित सहयोग की अत्याधिक आवश्यकता है। इस दृष्टि से प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य हो जाता है कि वह कम से कम शोर उत्पन्न कर ध्वनि प्रदूषण को रोकने में सहयोग करे।  

Sunday, 27 May 2018

अमृत फल है बेल फल - शिरीष सप्रे

अमृत फल है बेल फल
शिरीष सप्रे

साधारणतया जिन वनस्पतियों के बारे में हमारी धार्मिक विधियों में विशेष रुप से कहा गया है उनकी जानकारी सर्वसाधारण को होती ही है। तुलसी भगवान विष्णु को अर्पित किए बगैर पूजा पूर्ण नहीं होती। गणपति पूजन दूर्वा के बगैर अधूरा ही है इसी प्रकार शिवशंकर की पूजा बिल्व पत्रों के बगैर पूर्ण नहीं होती। इस कारण औषधी पदार्थ के रुप में इन उपयुक्त वनस्पतियों की जानकारी प्रत्येक को रहना अत्यावश्यक सा है। बेल के वृक्ष को शिवजी से जुडा होने के कारण पवित्र माना जाता है। बेल वृक्ष के आसपास महादेव का लिंग होता ही है ऐसी प्रथा है। ऋषि-मुनियों ने इस वृक्ष को जितना शरीर के लिए उपयोगी पाया है उतना ही इसे पवित्र एवं महत्वपूर्ण पेड कहा भी है। बेल के वृक्ष की छाया को भी शीतल और आरोग्यकारी माना गया है। प्रायः यह पेड वनों में पाया जाता है। भारतीय धार्मिक साहित्य में इसे दिव्य वनस्पति बताया गया है। आयुर्वेद के विशेषज्ञों ने इसके भरपूर औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण इसे अमृत फल कहा है और प्राचीनकाल से ही इसे औषधियों के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। आयुर्वेद में बिल्व का बहुत विशद विवेचन मिलता है।

शिव शुद्ध कल्याण है। शिवजी शीघ्र प्रसन्न होनेवाले होने के कारण इनकी पूजा सभी आस्तिक अपनी लौकिक-परालौकिक कामनाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। भगवान आशुतोष के पूजन-अभिषेक में बिल्वपत्र को पहला स्थान प्राप्त है। बेल का वृक्ष संपूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल है। बेल के वृक्ष के नीचे जाप से फल में अनंत वृद्धि होकर सिद्धि भी शीघ्र प्राप्त होती है। बेल फल की समिधा से लक्ष्मी का आगमन होता है। वे ही बेलपत्र पूूजार्थ उपयोगी होते हैं जिनके तीन पत्र संलग्न हों। बिल्व पत्र कभी बासी या अशुद्ध नहीं होते। इन्हें एक बार प्रयोग करने के पश्चात दूसरी बार धोकर उपयोग में लाया जा सकता है। इसके पत्तों का धुआं कमरे में करने पर कीडे-मकोडे, मच्छर, मकडी आदि नष्ट हो जाते हैं और वातावरण शुद्ध होता है।

बेल के फूलों को बहुत सुगंध होती है। बेल के पत्ते, फूल, छाल, फल और जडें तक औषधी द्रव्य के रुप में अत्यंत उपयुक्त हैं। मनुष्य  के जीवन को आनंद देनेवाला यह वृक्ष है इस कारण आयुर्वेदाचार्यों ने इस वृक्ष का संपूर्ण संशोधन कर इसके गुणगान गाए हैं। इससे हवा शुद्ध होती है और मनुष्य आरोग्य संपन्न रहता है। रोगनाशक होने के कारण संस्कृत में इसे बिल्व तथा श्रीफल आदि, हिंदी, मराठी और बंगला में बेल और गुजराती में बिली, कन्नड में बेललू तथा तमिल में विल्वपक्षम नामों से जाना जाता है। बेल एक ऐसा वृक्ष है जिसके फल कच्ची अवस्था में अधिक औषधीय गुण रखते हैं। पकने पर इसके औषधीय गुण कम हो जाते हैं। इसके पत्ते मधुमेह रोगियों के लिए रामबाण हैं। बेल की जड में त्रिदोष नाशक गुण होता है।

आयुर्वेद के मतानुसार बेल मधुर, लघुग्राही, वमन, शूल रोकनेवाला होकर मूत्रावरोध समाप्त करनेवाला है। बेल पत्तों के रस का मज्जातंतुओं पर विशेष परिणाम होता है। बेल की छाल अत्यंत प्रभावी औषधी है। चंदन के समान गुणों में श्रेष्ठ है। वात रोगों पर इन छिलकों का विशेष उपयोग होता है। ह्रदय विकार में अथवा छाती धडधडाने, अस्वस्थ महसूस करने, नींद नहीं आने इन विकारों पर वह योजनाबद्ध ढ़ंग से दी जाने पर अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में चरक, सुश्रुत आदि ने बेल के कच्चे फलों का ज्यादा गुणगान किया है। इनके मतानुसार कच्चा फल कफ, वायुनाशक, अग्निदीपक, पाचकग्राही, लघु स्निग्ध कहा गया है। जबकि पका फल मधुर और भारी अर्थात्‌ देर से पकनेवाला हो जाता है। पका फल पौष्टिक गुणों से युक्त हो जाता है। आधुनिक खोजों में बेल को उदरशोधक, खून के दस्त, आंव, अजीर्ण, विशेषरुप से मरोड (दर्द) युक्त पतले दस्त या खूनी पतले दस्तों में अत्यंत लाभकारी पाया है।

कच्चा और पका दोनों प्रकार के बेल ग्राही अर्थात्‌ ग्रहणी दोष को नष्ट करनेवाले कहे गए हैं। यह आंतों की शिथिलता दूर कर उनकी संकोच शक्ति को बढ़ाता है। जिससे मल निष्कासन की क्रिया में तीव्र सुधार होता है, आंव को बाहर कर यह आंतों को बलवान बनाता है। बेल का शर्बत पतला करके रात में या प्रातः पीना अत्यंत लाभप्रद है। पके हुए बेल का गूदा निकालकर पानी में भरपूर मसले फिर छान ले और इसमें इलायची के दाने, शक्कर डालकर शर्बत तयार करें। इसके कारण शरीर का दाह, अतिसार, पीला पेशाब होना समाप्त होता है और शरीर में स्फूर्ति निर्मित होती है। कहते हैं कि गर्मियों में बेल का शरबत नियमित रुप से पीने पर शरीर का कायाकल्प हो जाता है।

Friday, 25 May 2018

अनन्यसाधारण है कल्पवृक्ष आम - शिरीष सप्रे

अनन्यसाधारण है कल्पवृक्ष आम
शिरीष सप्रे

सभी फलों के राजा का सर्वत्र महत्व है और इसे पवित्र अमृत फल माना जाता है। आम देवताओं के बगीचे का फल है। लोकपरंपरा में जनभावनाओं में आम देवताओं का वृक्ष होने के कारण और इसकी पवित्रता के कारण किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत आम के पत्तों के तोरण से ही होती है। कोई सी भी पूजा हो द्वार पर आम के पत्तों का तोरण लगने के पश्चात ही त्यौहार या शुभ कार्य की शुरुआत होती है। फिर वह भगवान सत्यनारायण की पूजा ही क्यों ना हो? आम के पत्तों की माला दरवाजे पर टांगी नहीं कि मानो सारा मांगल्य द्वार पर अवतरित हो जाता है। शुभ कार्यों में जल से भरे कलश का महात्म्य और उसमें आम के पत्ते होना ही चाहिए। कलश पूजन भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है। पुराणों के अनुसार नारदमुनि शिवजी के विवाह के अवसर पर इस वृक्ष को स्वर्ग की वाटिका से लाए थे। बौद्ध और जैन मत में भी आम को शुभ वृक्ष मानते हैं। जातक कथाओं में भी आम का वर्णन मिलता है। 

दीर्घकाल तक प्रसन्नता से भरा हराकच्च रंग रखनेवाले आम के पत्ते सहज ही सुखद ठंडक दे जाते हैं। विवाह प्रसंग पर मंडप के द्वार पर आम के पत्तों के तोरण का कोई विकल्प नहीं। अमृत फल के रुप में प्रसिद्ध आम फिर वह कच्चा हो या पका हुआ का सर्वत्र कौतुक होता है। प्रत्येक को ही चाहिए ऐसा यह फल देवताओं का फल यानी आम ही है। शायद ही कोई हो जिसे यह फल पसंद ना हो। गर्मी के दिनों में इसका रस और कैरी का पना अतिथियों की आवाभगत कैसे करें की चिंता तत्काल दूर कर देता है। 

वैसे तो अक्षय तृतीया से बाजार में आम आना शुरु हो जाते हैं। भले ही महंगे क्यों ना हों परंतु घरों में आम आना शुरु हो ही जाते हैं। जेठ के महिने में वटसावित्री पूर्णिमा पर सुहागिनें अपने पति के जीवन के लिए मन ही मन वटवृक्ष की पूजा अवश्य करती हैं। इस पूजा में मान भले ही वटवृक्ष का हो परंतु आम के पत्तों के बिना काम नहीं चलता। 'गंगा दशहरा" के लिए देवताओं, गंगा और पंडितों को कम से कम 10 आम तो भी दान करने का महत्व है और वह किया भी जाता है। आम कभी निष्पर्ण नहीं होता। यह दीर्घायु वृक्ष है। वैवाहिक जीवन भी इसी तरह से फले फूले इस भावना से विवाह प्रसंग पर आम का महत्व है। आम संततीदायी है। पुत्रप्राप्ति के लिए वृक्ष की पूजा की जाती हैै। महान विभूति या सत्पुरुष पुत्र हो इसके लिए स्त्री के आंचल में आम प्रसाद के रुप में देते हैं। प्रजोत्पादक माने जाने के कारण विवाह  की विधियों के समय आम को पूजा में स्थान मिला है।

आम ऐसा फल है जो परंपरागत शत्रु भारत और पाकिस्तान दोनो का ही राष्ट्रीय फल है। बांग्लादेश का राष्ट्रीय वृक्ष तो फिलीपाइन्स का राष्ट्रचिंह है। वैसे तो इसका उद्‌गम अज्ञात है फिर भी यह फल है तो एशिया का ही, ऐसा माना जाता है। भारत ही नहीं तो दक्षिण एशिया की संस्कृति में भी आम को विशेष स्थान प्राप्त है। भारत में आम की अनेक प्रजातियां लगभग 200 हैं, हापुस, तोतापुरी, बादाम, लंगडा, दशहरी, केशर, पायरी, गोला, नीलम, आदि। आयुर्वेद में आम का बहुत महत्व है। आम्रमंजिरी कामदेव के पांच बाणों में से एक है। महाकवि कालीदास के साहित्य में अमराई और कोकिला के कुंजन के वर्णन हैं। आम को आनेवाली पहली आम्रमंजिरी पहिली शिवरात्रि को शिवजी को अर्पित करने की प्रथा है।

फलों का राजा अपने खट्टे-मीठे और रसदार गुणधर्म के कारण बच्चों से लेकर बुढ़ों तक में लोकप्रिय है। यह अपने कई औषधीय गुणों के कारण भी जाना जाता है। कच्चा हो या पका आम अनेक औषधीय गुणों से भरपूर है। कच्चा आम केरी आम्लधर्मी स्तंभक होकर इसका छिलका कषायात्मक और उत्तेजक होता है। पका हुआ आम मधुर, स्निग्ध, सुखदायक, बलदायक पचने में थोडा भारी, वायुहारक, शरीर की कांति और जठाराग्नि को बढ़ानेवाला होता है। यह कैल्शियम, लोहा, फॉस्फोरस, विटामीन के, फायबर, प्रोटीन आदि से युक्त होता है। आम का सेवन वजन बढ़ाने में सहायक होता है। इसके सेवन से बुद्धि एवं दृष्टि तीव्र होती है। एनिमिया या रक्ताल्पता से बचाव होता है। क्योंकि, इसमें तांबा की मात्रा भी भरपूर होती है। तांबा शरीर में लाल रक्तपेशियां बढ़ाने में सहायता प्रदान करता है। ब्लडप्रेशर और डायबिटीज नियंत्रित करने में आम के पत्ते उपयोगी होते हैं। बालों के लिए आम की गुठली के तेल को उपयोग में लाते हैं। आम की गुठली में विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं। अंत में आम के संबंध में यह जो कहावत है कि आम तो आम गुठलियों के दाम निश्चय ही बडी सटीक बैठती है। 

Tuesday, 15 May 2018

गजब खरबूजे की माया - शिरीष सप्रे

गजब खरबूजे की माया
शिरीष सप्रे

खरबूजे के संबंध में यह कहावत भले ही पुरानी हो परंतु आज भी सटीक बैठती है खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। दूसरी प्रसिद्ध कहावत है छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर कटेगा तो खरबूजा ही। यह कहावत इसकी मृदुता को लेकर है। यों तो ग्रीष्म ऋतु में अनेक फल बाजार में उपलब्ध रहते हैं, किंतु सभी फलों में खरबूजा अपना एक अलग ही स्थान रखता है। इसे गर्मियों का राजा भी कहा जा सकता है। यह गोलाकार या अंडाकार होता है। यह पौष्टिक स्वादिष्ट तो होता ही है साथ ही कई छोटी-मोटी बीमारियों को मिटाने के गुण भी इसमें होते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि खरबूजा ग्रीष्म ऋतु का अमृत फल है। इसको खाने से आप एक नई ताजगी  महसूस कर उठेंगे। बस इसे भूखे पेट मत खाइएगा अन्यथा लेने के देने पड जाएंगे।

इतिहास गवाह है कि खरबूजे ने दुनिया का इतिहास बदलने, आपसी फूट के बीज पनपाने, फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मई 1498 में वास्कोडिगामा ने जब कालीकट में अपने जहाज का लंगर डाला था तो भारतीय मीठे-मीठे महकते स्वादिष्ट खरबूजों की  सुगंध ने ही उनकी जीभ से लार टपका दी थी। वस्तुतः खरबूजे की महक पर फिदा होकर स्पेनवासियों और पुर्तगालियों को समुद्र के रास्ते भारत के लिए नया मार्ग तलाशना पडा था। मोहनजोदडों (3000 ई.पू.) की खुदाई में जो खास चीज मिली थी, वह चांदी में लिपटा एक कपडा था जिसमें खरबूजों के पूर्वज बीजों के अवशेष थे। निश्चय ही किसी भी पुरातत्वज्ञ को उन बीजों की कीमत सोने से कम नहीं लगी होगी।

वेस्टइंडीज में गन्ने की खेती करनेवाले अंगे्रजों की जीभ पर खरबूजे का स्वाद चढ़ गया होगा सो धीरे-धीरे खरबूजे की तारीफ ब्रिटेन के घर-घर में होने लगी तो रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जोसेफ बैक्स ने कैप्टेन ब्लिंग के नेतृत्व में वहां एक जहाज भेजने का निश्चय किया। 15 अक्टूबर, 1798 को 'बाउंटी" रवाना हुआ। लगभग 1 वर्ष बाद वे टिहरी पहुंचे और वहां खरबूजों की बहार में खो गए। कोई पांच महिने बाद उनके दिमाग से खरबूजे का भूत उतरा तो उन्होंने साथियों से लौटने का आग्रह किया। परंतु, साथियों में विद्रोह भडक उठा क्योंकि उन लोगों ने तो खरबूजे के लोभ में वहीं बस जाने का निश्चय कर लिया था। खरबूजे के दीवाने सैनिकों ने ब्लिंग साहब को एक नाव में बिठाकर समुद्र की लहरों में भाग्य भरोसे छोड दिया। ब्लिंग साहब बडी मुश्किल से यंत्रणाएं सहते हुए बडी ही दयनीय दशा में स्वदेश लौटे। लेकिन ब्लिंग साहब से फिर भी खरबूजे का मोह ना छूटा इसलिए उन्होंने फिर से एक बार टिहरी यात्रा का खतरा उठाया और बहुत सारे फल लेकर स्वदेश लौटे। जैसाकि अंगे्रजों का इतिहास रहा है उन्होंने भारतीय किसानों के खून-पसीने की मेहनत से पैदा किया खरबूजा यूरोप भेजकर यूरोपवासियों की जेबें खाली की और इधर किसानों का जमकर शोषण किया। 

खरबूजे की कई जातियां हैं। भारत में पाई जानेवाली जातियों में प्रमुख है - सफेदा और चिता, जो लखनऊ में मिलता है। पंजाब का चुनियारी और कलाची भी प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में मिलनेवाली जातियां हैं- बताशा, शरबत, शिरंजीत (जिसे जामखिरुल भी कहते हैं)।  आयुर्वेद के अनुसार यह मूत्रकारक, बलवर्द्धक, कोष्ठ शुद्ध करनेवाला, पचने में भारी, शीतल, स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक तथा वात-पित्त नाशक है। मौसम भर खरबूजे के सेवन से शरीर में तरावट रहती है और चित्त प्रसन्न रहता है। लगातार खाते रहने से खुश्की और कमजोरी मिटती है। दांत पर जमा मैल, मुंह की दुर्गंध, पीलिया, मूत्राशय की पथरी तथा सभी चर्मरोग नष्ट होते हैं। जिसको अम्लीयता की शिकायत हो वह आराम से इसे ले सकता है। पेचिश के लिए यह रामबाण दवा है। इसके बीज भी कुछ कम गुणों से भरपूर नहीं होते। बीजों से केवल ताजगी और ठंडाई ही नहीं पहुंचती है, बल्कि इससे दिमाग भी तेज होता है। इसके बीजों से खाने का तेल भी बनता है, जो काफी पोषक होता है।