Tuesday, 23 May 2017

अनिल माधव दवे - अनंत की ओर प्रस्थान

अनिल माधव दवे - अनंत की ओर प्रस्थान 

मुझे आज भी याद है सन 1990 के गुरुपूर्णिमा उत्सव का कार्यक्रम (रविशंकर शुक्ल नगर (आर.एस.एस नगर, इंदौर) जहां अनिलजी का बौद्धिक मैंने पहली बार सुना था। बौद्धिक (भाषण) के पश्चात मेरी उनसे कुछ देर तक चर्चा भी हुई थी। उनका वह बौद्धिक उस समय भी उसी प्रकार से प्रभावी था जिस प्रकार से बाद के काल में भी रहा और वे इसी कला के लिए प्रसिद्ध भी हुए। अंतर केवल इतना हुआ कि 1990 के दशक में वे युवा थे इस कारण उनके उद्‌बोधन जोश और उल्लास से भरे रहते थे जो बाद के काल में समय के साथ  गंभीर होते चले गए। तत्पश्चात हमारी निकटता और घनिष्ठता बढ़ती चली गई। इसके पीछे दो प्रमुख कारण थे - पहला, वे स्कूल-कालेज के समय से ही मेरे सीनियर थे और उनका इस प्रकार से संघ का प्रचारक बनने और हमारे क्षेत्र, नगर (संघ की दृष्टि से अंबेडकर नगर) में संघ कार्य के लिए आना मुझे अभिभूत कर गया था। क्योंकि, किसी भी स्वयंसेवक के लिए संघ का प्रचारक अत्यंत सम्माननीय व्यक्ति होता है और वे उन्हें भाईसाहब कह कर ही संबोधित करते हैं। 

दूसरा कारण बने स्व. बाबासाहेब नातू जो हमारे घर सन्‌ 1956 से प्रचारक के रुप में आते रहते थे। वे उन्हें लेकर हमारे घर आए थे और उनसे कहा था यह मेरा घर है यहां किसी भी तरह का संकोच न करना और बस यह भी उनसे घनिष्ठता बढ़ने का एक बडा कारण बना और हमारे संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। कुछ वर्षों तक इंदौर में कार्य करने के पश्चात वे संघ कार्य के लिए भोपाल चले गए और वहीं विभाग प्रचारक के रुप में कार्य करने लगे और मेरा उनसे संपर्क टूट सा गया परंतु, मेरा उनके घर-परिवार में आना-जाना बना रहा।

जब वे इंदौर में थे तब भी वे अत्यंत जिज्ञासू और अध्ययनशील प्रवृत्ति के थे। आगे जाकर उन्होंने कई पुस्तकें एवं लेख समय-समय पर लिखे। 'चरैवेती" के भोपाल में संपादक भी रहे। उनकी 'शिवाजी और सुराज" पुस्तक का विमोचन सरसंघचालक 'श्री मोहनरावजी भागवत" एवं तत्कालीन शिवसैनिक भू.पू. केंद्रिय मंत्री सुरेश प्रभु ने किया था। आमुख विश्व के सबसे बडे स्वयंसेवी संगठन के प्रमुख श्री मोहनरावजी भागवत तो, प्राक्कथन बाबासाहेब पुरंदरेजी और प्रस्तावना मोदीजी जो उस समय गुजराथ के मुख्यमंत्री थे ने लिखी थी। उनके जीवन एवं कार्यशैली पर छत्रपति शिवाजी का बहुत बडा प्रभाव था। सन्‌ 2003 में दिग्विजयसिंह की सरकार को हराकर भाजपा की सरकार बनाने के लिए उन्होंने जो चुनावी कार्यालय बनाया था उसका नाम 'जावली" ही रखा था। उनके द्वारा लिखी 'शिवाजी और सुराज" पुस्तक का यह अंश जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक है और जिस वन एवं पर्यावरण विभाग के वे केंद्रिय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे से संबंधित है दे रहा हूं - 

''स्वराज के जंगलों में आम व कटहल के पेड हैं, जो जलपोत निर्माण में काम आ सकते हैं, परंतु उन्हें हाथ न लगाया जाए, क्योंकि ये पेड ऐसे नहीं हैं जो साल-दो साल में बडे हो जाएं। जनता ने उन पेडों को लगाकर अपने बच्चों की तरह पाल-पोसकर बडा किया है।""

विभिन्न क्षेत्रों के बारे में जानने की उनकी प्रवृत्ति आरंभ से ही थी जो आजीवन बनी भी रही। वे विविध विषयों में रुची रखते थे और रस लेते भी थे। जब वे इंदौर में प्रचारक के रुप में कार्यरत थे तब पत्रकार, पत्रकारिता और उनके पेशे को जानने, समझने के लिए वे इस पेशे से संबंधित कुछ लोगों से मिलना चाहते थे और जब यह इच्छा उन्होंने मेरे सामने जाहिर की तो मैंने उन्हें 'साप्ताहिक स्पूतनिक" के संबंध में जानकारी दी और उनकी बैठक मेरे निवास पर श्याम भैया के साथ रखवा दी थी। जो ढ़ाई-तीन घंटे तक चली जिसमें विचारों का भरपूर आदान-प्रदान हुआ था। इस संबंध में बहुत पूर्व एक लेख में इसका उल्लेख पहले भी मैं कर चूका हूं। इसी प्रकार से वे दैनिक भास्कर के संपादक मिश्रजी (उनके नाम का कुछ विस्मरण सा मुझे हो रहा है) से जो इलाहबाद निवासी थे और दैनिक स्वदेश इंदौर के आरंभिक दिनों में यहां भी कार्य कर चुके थे से भी मिलवाया था। उनके साथ भी उनकी लंबी बैठक एवं चर्चा हुई थी। मिश्रजी का निवास मेरे शॉपिंग कॉम्पेलक्स, ए. बी. रोड वाले कार्यालय के ऊपर ही था।

जब वे इंदौर में प्रचारक थे उस समय भी उनका स्वास्थ्य कुछ नाजुक और नासाज ही रहा करता था और अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में अत्याधिक कार्य करनेे और भोजन की अनियमितता भी उनके स्वास्थ्य को हानि पहुंचा रही थी। ऐसे में ही उनका एक ऑपेरशन इंदौर के भंडारी हॉस्पिटल में हुआ था। इस कारण उन्हें पथ्यवाले भोजन की आवश्यकता की पूर्ति एवं उनकी देखरेख मैं और मेरा परिवार किया करता था। इस कारण भी हमारी घनिष्ठता बढ़ती चली गई जो अंत तक बनी रही। उनके भोपाल जाने के पश्चात और अन्य कारणों से मेरा उनसे संपर्क जो टूट सा गया था वह फिर से सन्‌ 2006 में तब पुनर्जीवित हो उठा जब वे मुझे स्वामी ऐश्वर्यानंदजी सरस्वती के निवास पर मिले जो दक्षिण भारत के पू. स्वामी दयानंदजी सरस्वती के शिष्य हैं और अनिलजी भी उन पर श्रद्धा रखते थे।

वे अत्यंत धार्मिक एवं अध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और साधु-संतों का साहचर्य उन्हें रास आता था। नर्मदा परिक्रमा जो उन्होंने जल-थल और वायु तीनो ही माध्यमों से की थी के दौरान वे आश्रमों में जाते, साधु-संतों से चर्चा किया करते थे। उनको यह संस्कार उनके माता-पिता से विरासत में मिले थे जिन पर उनकी अगाध श्रद्धा थी। उनके माता-पिता का चित्र कमरे में इस प्रकार से उन्होंने लगा रखा था कि प्रातः उठते से ही उनकी पहली दृष्टि उन्हीं पर पडती थी। इस बहुआयामी परंतु, अंतर्मुखी स्वभाव के चुनावी रणनीति में माहिर,व्यक्ति की कहानी साधारण से असाधारण बनने की है। यह सादगी पसंद पर्यावरण प्रेमी-संरक्षक, कर्मयोगी, अत्यंत प्रामाणिक, बुद्धिवादी, हितैषी प्रवृत्ति का चिंतक, ज्ञान का उपासक अचानक ही 18 मई को प्रातः नींद में ही ह्रदयाघात के कारण अनंत की ओर प्रस्थान कर गया। 

इस साहित्यकार द्वारा रचित एवं प्रकाशित साहित्य इस प्रकार से है ः - 1. सृजन से विसर्जन तक, 2. नर्मदा समग्र, 3. शताब्दी के पांच काले पन्ने(सन्‌ 1900 से सन्‌ 200), 4. सॅंभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से, 5. महानायक चंद्रशेखर आजाद, 6. रोटी और कमल की कहानी, 7. समग्र ग्रामविकास, 8. अमर कंटक से अमरकंटक तक,9. Beyond Copenhagen, 10. Yes I Can. So Can We.
e-mail : anilmdave@yahoo.com 

Friday, 12 May 2017

पुरातन संबंध है काशी का महाराष्ट्रीयों से

पुरातन संबंध है काशी का महाराष्ट्रीयों से

काशी नगरी अनादि काल से अक्षुण्ण होकर विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक होकर भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रुप में विख्यात है। काश्यां हि काशते काशी। काशी सर्वप्रकाशिका। इस प्रकार से आद्यशंकराचार्य ने काशी का वर्णन किया है। काशी उसे कहते हैं, जो प्रकाश देता है, प्रकाश का स्त्रोत है। चूंकि पुराकाल में काशी क्षेत्र से ज्ञान का प्रकाश फैला, सम्पूर्ण विश्व इस प्रकाश से ज्योतित हुआ, अतः इस क्षेत्र को काशी कहा जाने लगा। काश्य लोगों ने इस नगरी को बसाया ऐसा कहा जाता है। यहां ज्ञान का भंडार अपार है। यहीं शिवपुरी है। काशी को वाराणसी (बनारस) भी कहते हैं। असि एवं वरुणा दो नदियों के मध्य वाराणसी (इन दो नदियों का यहां संगम होता है इसलिए काशी को वाराणसी भी कहते हैं) स्थित होकर यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रुप में विख्यात है। 

यह पुरी सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग इन चारों युगों में अनादि काल से चली आ रही है। इसका वर्णन पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण में तो काशीखंड नामक एक बडे भाग में सविस्तार वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार काशी को दीवोदास ने पुनः बसाया था। काशी का एक नाम आनंदकानन भी है। लगता है काशी कभी अरण्य रहा होगा इसीलिए इसका यह नाम पडा होगा। गोस्वामी तुलसीदासजी के समय में यह नगर आनंदकानन के रुप में विख्यात था। इस नगर के कुछ अन्य नाम भी हैं, यथा केतुमती, पुष्पावती एवं रम्भा नगरी (रामनगर)। काशी के संंबंध में यह जनविश्वास है कि यह भूतभावन शंकर के त्रिशूल पर अवस्थित है। यह पृथ्वी पर स्थित नहीं है, अपितु पृथ्वी के ऊपर अवस्थित है। इसकी गणना सात पुरियों में की जाती है और सब में यह अनुपम एवं उच्च है। यहां शिव व माता अन्नपूर्णा का वास है। विश्वेश्वर द्वारा निर्मित इस काशी का प्रत्येक कंकड शिवस्वरुप तथा शिवमय हैयह लोकविश्वास है। काशी में गंगा उत्तरवाहिनी होती है। इस कारण से भी काशी को तीर्थस्थल माना जाता है। काशी बारा ज्योतिर्लिंग में से एक होकर यहां 84 घाट हैं।  

भारत का कोई भी मनीषी ऐसा न होगा जो कभी ना कभी काशी न आया हो पर यहां रहकर ज्ञानसाधना करनेवाले महापुरुषों की संख्या भी कम नहीं। महाराष्ट्र से निकलकर विभिन्न कारणों से काशी में स्थायी होनेवाले पंडितों की बडी संख्या है। इन मराठी पंडितों ने संस्कृत  विद्या के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा वर्षों से जतन कर रखी है। काशी की प्रसिद्धि में इन मराठी पंडितों का बडा योगदान रहा है। काशी के पंडितों का विषय निकला ही है तो सबसे पहले स्मरण हो आता है गागाभट्ट का। गागाभट्ट मूलतः पैठण के थे और वहां से स्थलांतरित होकर काशी आ गए थे। आज भी काशी में वसंतपूजा अथवा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में यदि इस भट्ट कुल का उपनयन हो चुका छोटा बच्चा भी उपस्थित हो तो सबसे पहले तिलक उसीको लगाया जाता है। इन्होंने ही महाराष्ट्र के मराठे क्षत्रिय हैं कि नहीं इस संबंध में जो संशय था उसका सप्रमाण खंडन कर छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक में वे अग्रणी हुए थे। पुराने ग्रंथों के आधार पर उन्होेंने 'राज्याभिषेक प्रयोगम" ग्रंथ लिखा था और तत्पश्चात भारत में हुए राज्याभिषेक इस ग्रंथ के आधार पर ही हुए। इन्हीं के साथ आए हुए दूसरे महाराष्ट्रीय विद्वान थे धर्माधिकारी। हिंदू कानूनों की मिताक्षर शाखा पर लिखे ग्रंथ आज भी प्रामाणिक माने जाते हैं।

विदर्भ से आकर काशी में स्थायी हुए नीलकंठ दैवज्ञ अकबर के दरबार के मुख्य पंडित थे। उन्होंने अरबी ज्योतिष का अध्ययन कर ताजिक नीलकष्टी या नीलकंठी ग्रंथ लिखा था। इस परिवार ने ज्योतिषशास्त्र के ज्ञान को और समृद्ध करने में अपना योगदान दिया था। जब मराठी शक्ति का ह्यस हो गया और काशी जीतने का स्वप्न मराठों का समाप्त हो गया तब बाजीराव पेशवा द्वितीय के साथ महाराष्ट्रीय पंडित भी यहां आ गए थे। 1791 में अंग्रेजों ने काशी में संस्कृत पाठशाला स्थापित की। आगे जाकर यह पाठशाला शासकीय संस्कृत महाविद्याल में रुपांतरित हो गई। और भी आगे जाकर यह 'सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय" में रुपांतरित हो गई। रानी विक्टोरिया की स्वर्ण जयंती के निमित्त सरकार ने संस्कृत के पंडितों को 'महामहोपाध्याय" की पदवी देना आरंभ किया। 19वी शताब्दी में प्रसिद्धी पाई वैद्यनाथशास्त्री पायगुंडे और उनके सुपुत्र बालशास्त्री पायगुंडे ने। इनके अलावा काशीनाथशास्त्री अष्टपुत्रे, जगन्नाथशास्त्री गाडगील, राजरामशास्त्री कार्लेकर पंडित भी प्रसिद्ध हुए थे। राजाराम शास्त्री तो आजमगढ़ के जिला न्यायाधीश भी रहे।

इनके अलावा काशी के दो और  प्रसिद्ध व्यक्तित्व थे - महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री जो मूलतः कोंकण महाराष्ट्र वेलेणेश्वर के थे एवं बालसरस्वती बाळशास्त्री रानडे। बापू शास्त्रीजी उनके द्वारा शुरु किए गए 'दृक्सिद्ध पंचांग" के कारण प्रसिद्ध हुए। उन्होंने 16 पुस्तकें भी लिखी थी जिनमें अंगगणित व बीजगणित पर अंगे्रजी में लिखी पुस्तकें भी हैं। 1880 में बाळशास्त्री रानडे ने ज्योतिष्येम यज्ञ किया था। काशी के सभी बडे पंडितों ने यज्ञ में अध्वर्यू, ब्रह्म, आचार्य की जिम्मेदारियां सम्भाली थी। तत्पश्चात काल में काशी के प्रसिद्ध महाराष्ट्रीय पंडितों में दिवाकरशास्त्री भट्ट, नागरेश्वरशास्त्री धर्माधिकारी, रामचंद्रशास्त्री काळे, दामोदरशास्त्री भारद्वाज, तात्याशास्त्री पटवर्धन आदि हुए। बीसवीं शताब्दी में काशी के प्रवचनकार भाऊशास्त्री वझे का महाराष्ट्र में भी बडा नाम था। आयुर्वेद और फलज्योतिष के क्षेत्र में भी महाराष्ट्रीयों ने बडा नाम कमाया है। अमृशास्त्री चांदोरकर और उनके सुपुत्र ने, त्रिंबकशास्त्री धन्वंतरी का अवतार माने जाते थे।

जब मराठा शक्ति का उत्तर हिंदुस्थान में दबदबा था तब मराठा सरदारों ने काशी में घाट, मंदिर और वाडों का निर्माण कर काशी की शोभा बढ़ाई थी। औरंगजेब ने काशी विश्वेश्वर को गिराकर वहां मस्जिद बनाई थी उसके निकट ही रानी अहिल्याबाई होलकर ने नया विश्वेश्वर मंदिर का निर्माण किया था। उन्होेंने दशाश्वमेश घाट के निकट नया घाट बनाया था। औरंगजेब ने काशी में गिराए दूसरे प्रसिद्ध मंदिर बिंदुमाधव का नवनिर्माण और उसके निकट दो घाटों की निर्मिती की थी। नागपूर के भोसले और बडोदा के महाराज गायकवाड ने भी मंदिरों का निर्माण किया था। इसी प्रकार अन्य मराठा शासकों और सरदारों ने विशाल वाडों का निर्माण किया था। परंतु, राजेरजवाडों की टक्कर के सुंदर गंगामहल मंदिर का निर्माण एक मराठी कथावाचक जिसने बाद में सन्यास लेकर अपना नाम 'तारकाश्रम" रख लिया, किया था। उसने लगभग सौ सन्यासी रह सकें ऐसे 'तारकमठ" की निर्मिती भी की थी। गंगामहल और ग्वालियर के महाराज सिंधिया द्वारा बनाए गए बालाजी मंदिर में शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाखां शहनाई बजाया करते थे। उन्हें वहां साक्षात्कार भी हुआ था।

पेशवा, पंतप्रतिनिधि और महाराष्ट्र के राजघरानों की अनेक स्त्रियों ने अपने जीवन का अंतिम समय काशी में बिताया था। मराठों का एक सपना था कि काशी उनके कब्जे में हो परंतु, यह कभी साकार न हो सका। सैंकडों वर्षों तक महाराष्ट्र से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी आते रहे, मान्यता प्राप्त करते रहे और अपने मूलस्थानों पर जाकर विद्यादान करते रहे। पेशवाओं के प्रसिद्ध न्यायाधीश रामशास्त्री प्रभुणे ने काशी में ही शिक्षा प्राप्त की थी। आचार्य विनोबा भावे संस्कृत सीखने के लिए काशी में ही आ कर रहे थे।

Saturday, 6 May 2017

नृसिंह अवतार कथा

नृसिंह अवतार कथा 
शिरीष सप्रे

'नृसिंह" शब्द का 'नृ" जीववाची, 'सिं" बंधवाची और 'ह" विनाशवाची है। 'नृसिंह" शब्द का अर्थ हुआ जीवों के बंध विमोचन करनेवाला। नृसिंह देवता का उल्लेख वेदों में नहीं मिलता। परंतु, नृसिंहकोषकार का कहना है कि, ऋगवेद के प्रथमाष्टक के 7वें अध्याय दूसरे सर्ग में 'द्वै विरुपे चरतः" इस शब्द से आरंभ होनेवाला 11 ऋचाओं का सूक्त है। यह सूक्त श्रीनृसिंह को उद्देशित है। इसमें का वर्णन श्रीनृसिंह मंत्रराज पद से संबंधित होकर नीरा नरसिंहपूर (पुणे) और वहां के मंदिर को अनुलक्षित होने का श्रीकृष्णाचार्य दंडवते ने सप्रमाण सिद्ध किया हुआ है। इस क्षेत्र का आकार सिंह के नख जैसा होने के कारण नृसिंह देवता से संबंधित इस प्रकार का उचित स्थान है। नृसिंह का उल्लेख उपनिषदों में है। वेदों का अंतिम भाग यानी वेदान्तरुप उपनिषद।

नृसिंह अवतार की कथा प्रथम महाभारत में मिलती है और बाद में 18 पुराणों में आई हुई है। शुंग राजवंश के राजा पुष्यमित्र (इ. पू. 187-151) वैदिक यज्ञसंस्था और भागवत धर्म का समर्थक था। उसके काल में वैदिक धर्म और भक्तिपंथ का समन्वय करके  वह लोकप्रिय करने के लिए पुराणों की निर्मिती हुई। महाभारत के सभापर्व, आरण्यक पर्व और हरिवंश भाग 1 में हिरण्यकशिपू वध के लिए नृसिंहावतार कथा आई हुई है। इसी प्रकार से पुराणों और उपपुराणों में श्रीनृसिंह देवता का माहात्म्य, अवतारकथा और मूर्तिशास्त्र-मंदिर निर्माण आदि जानकारी मिलती है। पुराणों में भगवान नृसिंह अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। लिंग पुराण के 95वे अध्याय में नृसिंह ने हिरण्यकशिपू को किस प्रकार से मारा इसका वर्णन आया हुआ है। 96वे अध्याय में शंकरजी ने शरभ का रुप विक्राल रुप लेकर कौन-कौन से पराक्रम किए उनका वर्णन है। शरभोपनिषद / लिंगपुराण के अनुसार -
गर्व से उन्मत हुए हिरण्यकशिपू का वध करने के लिए भगवा विष्णु ने नृसिंह रुप धारण किया और अपने नखों से उसका ह्रदय विदीर्ण कर दिया फिर भी उनके क्रोध का शमन नहीं हुआ। उनकी दहाडों से सभी भयभीत हो गए। इंद्र आदि देवताओं ने उनका अनेक प्रकार से स्तवन किया। फिर भी भगवान नृसिंह शांत न हुए। ब्रह्मदेव सहित सभी देवताओं ने शंकरजी से विनती की तब शंकरजी ने शरभ का रुप धारण किया। वह कथा इस प्रकार से हैः 

भगवान नृसिंह का वीर्य दमन करने के लिए शंकरजी ने अपने भैरव स्वरुप वीरभद्र का स्मरण किया। वीरभद्र प्रकट हुए तब अनेक गण उत्पन्न हुए। वीरभद्र ने शंकरजी के कहने पर नृसिंह के क्रोध को शांत करने के लिए उन्हें बोध दिया। कर्तव्यपूर्ति हो चूकी इसलिए उग्र स्वरुप का त्याग करें कहा। परंतु, अहंकारयुक्त भाष्य कर नृसिंह ने नकार दिया। तब वीरभद्र ने शरभ का महा भयानक रुप धारण किया। शरीर पशू का, दो पंख, चार हाथ. चोंच और नख इस प्रकार का यह रुप था। उसने नृसिंह को पराजित कर उसका चमडा सिर निकाल लिया। यह सिर शिवजी ने धारण की हुई माला में डाल लिया और चमडा ओढ़न के लिए ले लिया। तत्पश्चात्‌ शिवजी ने सभी देवताओं से कहा कि, शिव और विष्णु एक ही है। नृसिंह अवतार समाप्ति के पश्चात विष्णू और शिव में एक रुपता आ गई। इसके बाद शिवजी ने कहा कि, यदि मेरे भक्तों को सिद्धी चाहिए हो तो वे नृसिंह पूजन करें। विष्णूधर्मोत्तरपुराण में  शिव और विष्णु इन देवताओं की एकात्मता नृसिंह रुप में आई हुई है यह कहा गया है।

सभी पुराणों की कथाओं में मिलनेवाली समानता को दृष्टि में रखकर संक्षेप में नृसिंहावतार कथा इस प्रकार से है - पवित्र पुष्कर क्षेत्र में कश्यप ने अश्वमेध यज्ञ किया। अश्व छोडने के पश्चात विधिपूर्वक सुर्वणाच्छित पांच आसन रखे थे। मुख्य चार ऋत्विजों के लिए वे थे। सौत्य सोम सेवन वाले दिन दिती के गर्भ से निकला गर्भ आसन पर जा बैठा और अपने पिता महर्षि कश्यप के समान वह आख्यान देने लगा। उसे देखकर ऋषियों ने हिरण्यकशिपू कहकर उसका जयघोष किया। तब से उसका यही नामकरण हो गया। कश्यप और दिती को दो पुत्र हिरण्यकशिपू एवं हिरण्याक्ष तथा पुत्री सिंहिका थी। स्वर्ग स्थित देवताओं व पृथ्वी के मनुष्यों को कष्ट देनेवाले महाबलाढ्य दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को रसातल में पहुंचा दिया तब श्रीविष्णु ने हिरण्याक्ष से युद्ध कर उसे मार डाला और पृथ्वी को स्वस्थान पर स्थापित किया।

अपने भाई की मृत्यु से संतप्त हिरण्यकशिपू ने कठोर तपश्चर्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर दिया और वर मांगा कि ''देवता, असुर, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, मानव, पिशाच इनमें से कोई भी मुझे मार न सके। शस्त्र, वृक्ष, गिली अथवा सूखी वस्तु, ना जल से न अग्नि से, ना लकडी से ना कीटक द्वारा, न पत्थर न वायु, ना पशु न मातृगणों (दुर्गा आदि) द्वारा किसी से भी मुझे मृत्यु ना आ सके। मुझे घर में न बाहर, दिन में न रात में मृत्यु नहीं चाहिए। इसी प्रकार महानाम, सचेतन अथवा अचेतन वस्तुओं द्वारा मेरी मृत्यु न हो। मेरा युद्ध में कोई प्रतिपक्षी ना हो। सभी प्राणियों का मैं अकेला अधिपति होऊं। वैसे ही तप तथा योग से प्रभावशाली बने लोगों का जो अणिमादी ऐश्वर्य जिसका कभी नाश नहीं होता मुझे प्राप्त हो ऐसा वर मुझे दो।"" ब्रह्माजी ने कहा यह वर बडा विलक्षण और दुर्लभ है। परंतु, तेरी तपश्चर्या से संतुष्ट होकर मैं तुझे यह देता हूं।

ब्रह्मदेव से वर प्राप्त होते ही उसका कृष हो चूका शरीर तेजस्वी हो गया और उसने महापराक्रमी देवताओं को हराकर उन्हें स्वर्ग से निष्काशित कर दिया। उसने सभीको जीतकर अपने अधीन कर लिया और स्वर्ग में रहने लगा। उसने आदेश दिया कि, दान आदि सारे कर्म मुझे अर्पण कर केवल मेरी ही पूजा करें। परंतु, जितेंद्रिय न होने के कारण वह तृप्त न हो सका। त्रिभुवन में अधर्म फैल गया। सभी पापवृत्ति की ओर मुडने लगे। सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए सारी परिस्थितियों का वर्णन कर हिरण्यकशिपू के नाश का उपाय पूछने लगे। ब्रह्माजी ने कहा - 'उस महाअसुर का पुण्य भाग समाप्त होने जा रहा है। उसके नाश का उपाय पूछने के लिए तुम लोग विष्णुजी के पास जाओ वही उस दैत्य के नाश का उपाय बतलाएंगे।" सभी देवता विष्णुजी के पास गए और उनका स्तवन करने लगे। प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने कहा हिरण्यकशिपू को प्रल्हाद नामका बुद्धिमान विष्णु भक्त पुत्र होगा। वह उससे द्रोह करेगा तभी मैं उसका वध करुंगा। 

कुछ समय पश्चात हिरण्यकशिपू उपभोगों से तृप्त न होने के कारण विष्णु और अपने शत्रुओं का नाश करने के उद्देश्य से वन में तपश्चर्या करने के लिए गया। यह देखकर ब्रह्माजी चिंतित हो गए। तब तपश्चर्या में विघ्न डालने के लिए नारद पर्वत नामक एक मुनि को लेकर वहां पहुंचे। दोनो ने कलविंक (चिडिया) पक्षियों का रुप लेकर 'ऊं नमो नारायणाय" का उच्चारण तीन बार जोर से किया और उड गए। हिरण्यकशिपू क्रोधित हो गया और वापिस लौट आया। कुछ समय पश्चात वह फिर से तपश्चर्या करने के लिए मंदार पर्वत पर रहने लगा। तब इंद्र ने उसकी राजधानी पर आक्रमण कर दानवों का हरा दिया और उसकी पत्नी कयाधू को पकड लिया। नारद त्रिकालज्ञ होने के कारण यह जान की वह गर्भवती है उसे साथ ले अपने आश्रम कोटितीर्थ में ले आए। वह पसूत होने तक उसे 'ऊं नमो नारायण" का अष्टाक्षरी मंत्र देकर दिव्य ज्ञान का बारम्बार उपदेश दिया। इस कारण गर्भस्थ प्रह्लाद को गुह्य ज्ञान का अनुग्रह अपनेआप प्राप्त हो गया। प्रह्लाद ने अपनी बेजोड भक्ति से नारायण को प्रसन्न कर लिया।

प्रह्लाद जन्मतः वैष्णव था। स्व-परभेद से सहमत न होने के कारण वह असुर पुत्रों को विष्णुभक्ति का महत्व समझाया करता था। अपने शत्रु के बारे में प्रह्लाद का भक्तिभाव देखकर हिरण्यकशिपू ने उसे मारने के कई उपाय किए। परंतु, उसका बाल भी बांका न हुआ। प्रह्लाद ने अपने पिता को विष्णु माहामात्य विभिन्न प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया। उसने अपने पिता से कहा 'तात, मेरा नारायण सभी ओर है। उसका वास्तव्य कण-कण में है।" क्रोधित हो हिरण्यकशिपू ने कहा, 'वह हर स्थान पर है तो, इस खंबे में क्यों नहीं दिखता?" इतना कहकर उसने मुष्टिप्रहार उस स्तंभ पर किए। तभी एक अतिभयंकर ध्वनी हुई और ना मनुष्य और ना पशु ऐसा अद्‌भुत रुप धारण करनेवाले भगवान श्रीहरी-विष्णु उस स्तंभ से प्रकट हुए। उनका रुप भयंकर और रौद्र था। वह नरसिंह रुप था। स्तंभ से प्रकट होने के बाद उन्होंने हिरण्यकशिपू के सभा भवन को ध्वस्त कर क्षणार्ध में दैत्य सेना का संहार कर दिया।

क्रोधित हिरण्यकशिपू ने युद्ध आरंभ कर दिया। भगवान नरसिंह ने उसे अपने नखों से यमसदन भेज दिया। उसके शरीर के टुकडे-टुकडे कर दिए। नरसिंह के रौद्र रुप को देख सभी भयभीत हो गए। हिरण्यकशिपू के वध के पश्चात उनके क्रोध को शांत करने के लिए ब्रह्मादि देवताओं ने उन पर पुष्पवृष्टि की, उनकी स्तुति की - अहोवीर्यम्‌ अहोशौर्यम्‌ अहोबाहु पराक्रमम्‌। नृसिंह परमं दैवं अहोबलिम्‌ अहोबलम्‌।। फिर भी उनका क्रोध शांत न हुआ। श्रीलक्ष्मी माता ने भी उनका क्रोध शांत करने का प्रयत्न किया।  अंत में बाल प्रह्लाद ने बिना भयभीत हुए राजसिंहासन पर आसनस्थ नृसिंह को साष्टांग प्रणिपात किया। नृसिंह का क्रोध शांत हो उन्होंने उसे उठाकर अपनी जंघा पर बैठा लिया। देवता स्तुति करने लगे। प्रसन्न नरसिंह ने प्रह्लाद से वर मांगने को कहा। परंतु, नम्रतापूर्वक प्रह्लाद ने नकार दिया।

हिरण्यकशिपू के वध से रिक्त राजगद्दी पर नृसिंह ने प्रह्लाद का राज्याभिषेक किया और उसे राजधर्म का ज्ञान दिया। राजव्यवहार का उपदेश दिया। तत्पश्चात भगवान नरसिंह ने दक्षिण प्रवास के लिए प्रयाण किया। किसी भी प्रकार का आतिथ्य न स्वीकारने के कारण प्रह्लाद फलादि लेकर विश्वकर्मासहित उनके पीछे-पीछे चल पडा। मार्ग में जहां-जहां भगवाननृसिंह ने विश्राम किया वहां-वहां उसने विश्वकर्मा से मंदिरों की निर्मिती करवाई। श्रीशैल पर्वत पर की गुफा में नृसिंह प्रविष्ट हुए और श्रीहरी का यह अद्‌भुत विलक्षण अवतार समाप्त हुआ।  

Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया या आखातीज का सनातन स्वरुप

अक्षय तृतीया या आखातीज का सनातन स्वरुप

साढ़े तीन शुभमुहुर्तों में से एक अक्षय तृतीया या आखातीज है। वर्तमान में यह तिथि जनव्यवहार में भले ही विवाहोत्सव का पर्याय बनकर रह गई है। इसके पीछे मान्यता यह है कि, इस दिन जिनका विवाह होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। वस्तुतः अक्षय तृतीया आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनो ही धरातलों पर पूजनीय मानी गई होकर भारतीय पंचाग की कुछ अतिमहत्वपूर्ण तिथियों में से एक है। इस दिन किए गए किसी भी शुभ कार्य का फल अक्षय होकर मिलनेवाला समझा जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस दिवस किए गए कर्म प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होते। इस दिन विष्णु पूजा अक्षय फल प्राप्ति के लिए की जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को स्वयंसिद्ध मुहुर्त माना गया है। यह भी मान्यता है कि, गणेशजी ने इसी दिन महाभारत लिखना प्रारंभ किया था।

इस तिथि को अक्षय तृतीया इसलिए भी कहते हैं क्योंकि, इस तिथि को सूर्यास्त के पश्चात पश्चिमी आकाश में एक अद्‌भुत दृश्य उपस्थित होता है। इस समय चंद्रमा और बुध एक साथ रोहिणी नक्षत्र में विद्यमान रहते हैं। रोहिणी चंद्र की सबसे प्रिय पत्नी और बुध उनका पुत्र। इन तीनो का यह विचित्र संयोग त्रेतायुग के आरंभ से लेकर आज तक प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अनवरत रुप से उपस्थित होता आ रहा है। तुलसीदासजी ने इस अनूठे संयोग की बडी सुंदर काव्यात्मक व्याख्या की है। यथा - 'उपमा बहुरि कहउँ जियॅं जोही, जनु बुध, विधु बिच रोहिनि सोही।" वैसे यह विस्मृत सा ही है।

भगवान विष्णु से संबंद्ध इस तिथि से जुडी कुछ मान्यताएं इसप्रकार से हैं - 
1. उत्तरखंड राज्य के बद्रीनारायण मंदिर के पट इसी दिन खुलते हैं और दीपावली के समय भाईदूज के दिन बंद होते हैं।
2. वृंदावन के श्री बांकेबिहारी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण दर्शन होते हैं।
3. पवित्र गंगा नदी इसी दिन पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। इस दिन गंगाजी में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं।
4. इस तिथि को मां अन्नपूर्णा का जन्मदिन मानकर उनका पूजन किया जाता है।
5. इसी दिन महाराज युधीष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी जिसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था।
6. चैत्र और वैशाख में सबसे अधिक पीया जानेवाला गन्ने का रस इस दिन सर्वाधिक पीया जाता है। 
7. महाराष्ट्र में इस मुहुर्त को बुआई का दिवस माना जाता है। आयुर्वेद में बताई हुई औषधी वनस्पतियां इस दिन बोई जाएं तो इन वनस्पतियो का कभी क्षय नहीं होता। एक मान्यता यह भी है कि, इसी कारण भारत में औषधी वनस्पतियों की कमी नहीं है। 
8. यदि इस दिन 1 ग्राम भी सोना खरीदा जाए तो वह सतत बढ़ता है इस मान्यता के कारण इस दिन सैंकडों किलो सोना खरीदा बेचा जाता है।
9. इसी दिन उडीसा में भगवान जगन्नाथजी की रथयात्रा निकाली जाती है।

भगवान विष्णु के तीन अवतार नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम अक्षय तृतीया से जुडे हुए हैं। पुराणों में नर नारायण की कथाएं कई प्रकार से कही गई हैं। हयग्रीव भगवान विष्णु के एक अवतार माने गए हैं और एक असुर का नाम भी हयग्रीव है। इसके बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती हैं। 
नर-नारायण महाभारत युग में अर्जुन और कृष्ण के रुप में प्रकट हुए थे। इनके संबंध में भगवान परशुराम ने एक कथा कौरव-पांडवों के बीच मध्यस्थता करते समय बोध लेने के लिए दृष्टांत के रुप में कौरवों से सभा में कही थी - दंभोदभव नामका एक सार्वभौम, बलवान और महारथी राजा बहुत प्राचीन काल में हुआ था। वह प्रतिदिन प्रातः ब्राह्मणों और क्षत्रियों को बुलाकर चतुर्वग में मुझसे कोई श्रेष्ठ योद्धा है क्या? पूछा करता था। कुछ निर्भय ब्राह्मण उसे सजग करने का प्रयत्न करते। परंतु, उसका यह प्रश्न नित्य का ही हो गया था। लेकिन एक आत्मसाक्षात्कारी तपस्वी ने भर राजा को उत्तर दिया - 'हे राजन, संग्राम में हजारों का एकदम सामना करनेवाले दो पुराणश्रेष्ठ हैं और उनके मुकाबले तुम कुछ भी नहीं हो। ये दो पुरुष नर-नारायण होकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। यदि तुममें शक्ति हो तो जाकर उनका सामना करो।

राजा के लिए यह वृत्त अह्य होकर वह अपनी सेना लेकर गंधमादन पर्वत पर जा पहुंचा और भिक्षा में युद्ध की मांग की। नर-नारायण ने उत्तर दिया - 'हे राजश्रेष्ठ! इस आश्रम में क्रोध और लोभ फटक भी नहीं सकता, फिर युद्ध किसलिए? और तुझसे प्रतिस्पर्धा करने के लिए शस्त्र और प्रतिस्पर्धी कहां से लाएं? इस प्रकार से उन्होंने सामोपाचार करने का प्रयत्न किया। परंतु, दंभोदभव के हट के आगे असहाय होकर नरसंज्ञक ऋषि ने हाथ में सरकंडे उठाकर दंभोदभव से कहा, चल युद्ध के लिए तैयार हो जा। बोरु तो एक निमित्त था। योगबल से राजा पराजित हो गया। दंभोदभव का निमित्त कर परशुरामजी ने केवल दुर्योधन ही नहीं तो सभी राजाओं को उपदेश दिया था।

तत्‌पश्चात धृतराष्ट्र की ओर मुडकर परशुराम ने उसे समझाते हुए कहा कि, नारायण मुनि का सामर्थ्य तो इससे भी बढ़कर है।   वर्तमान के नर-नारायण और कोई न होकर पार्थ-केशव हैं। 'हे राजन्‌, अर्जुन अजेय है। चराचर का निर्माता, सभी का सत्ताधीश नारायण उसका मित्र है। वज्रदेही हनुमान उसके रथ पर विराजमान है। असंख्य गुणी कुंतीपुत्र को विशिष्ट गुणी जनार्दन का साथ है। यह तुने पहचान लिया हो तो युद्ध का विचार छोड दे। पांडवों का स्नेह संपादन कर। तेरा कल्याण होगा, यह मेरा तुझे आशीर्वाद है।

जरासंध के वध से भारतीय युद्ध का आरंभ होगा यह भावी घटना परशुराम ने भगवान कृष्ण को बतलाई थी। फिर भी युद्ध को टालने की दृष्टि से प्रयत्न आवश्यक थे। विजयश्री किसी को भी मिले उभय पक्षों को हानि होगी ही। अपने शस्त्रों और बाहुबल पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए परंतु, दंभ सर्वनाश का कारण बनेगा यही परशुराम को सभा में कहना था। 

Friday, 21 April 2017

सत्ताधीशों का काल विषकन्या

सत्ताधीशों का काल विषकन्या

अपने शत्रु को नष्ट करने के लिए वेदकाल से ही विषकन्याओं का उपयोग सत्ताधारियों द्वारा समय-समय पर भारत ही नहीं तो भारत के बाहर भी किया गया है। इन विषकन्याओं को तैयार करने के लिए जो कि सुंदर हुआ करती थी को बाल्यकाल से ही अल्प मात्रा में थोडा-थोडा विष देकर बडा किया जाता था साथ ही विषैले वृक्ष एवं प्राणियों के संपर्क में रहने का उन्हें अभ्यस्त किया जाता था। उन्हें संगीत एवं नृत्य की शिक्षा के साथ ही छल विद्या की सीख भी दी जाती थी। इनकी सांसे, स्पर्श और पसीना तक विषमय व भयानक परिणामवाला होता था। भारत के बाहर भी मेसोपोटेमिया, इजिप्त, अरब देश और चीन में भी विषकन्याओं का उपयोग अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए किया गया है। भारत एवं बाहर के देशों की लोकथाओं में विषकन्याओं का उल्लेख मिलता है। 

भारत बिहार के संथाल क्षेत्र के आदिवासियों में अस्थाई विषकन्या की नागपंचमी के दिन पूजा करने की प्रथा का पालन किया जाकर उसकी पूजा की जाती है। विष संकट से अभय मांगा जाता है। प्राचीन एवं अर्वाचीन भारत में विषकन्याओं संबंधी उदाहरण आज उपलब्ध हैं। कंस की बहिन पुतना विषकन्या थी। कंस ने उसे वैद्यों के माध्यम से विष का रोज सेवन करवाकर उसका दूध विषयुक्त हो जाए ऐसा किया था। विशाखादत्त के ऐतिहासिक 'मुद्राराक्षस" नाटक में विषकन्या का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस नाटक के केंद्रबिंदू चाणक्य और चंद्रगुप्त होकर अन्य मुख्य पात्र हैं नंदवंश का मुख्य अमात्य राक्षस और पर्वतक राजा का पुत्र मलयकेतु। सूत्रधार ने नाटक के प्रारंभ में नाटक का सारांश स्पष्ट किया है।

चाणक्य का दांव राक्षस को चंद्रगुप्त का मुख्य अमात्य बनाने का है। परंतु, राक्षस चाणक्य द्वारा नंदवंश के नाश के कारण चाणक्य-चंद्रगुप्त के विरुद्ध होता है और पर्वतक राजा की सहायता कर उनके राज्य का नाश चाहता है और इधर चाणक्य अपने गुप्तचर भागुरायण के माध्यम से उसकी काट करता है। नाटक में चाणक्य और राक्षस के बीच खेले गए दांव-प्रतिदांव गुप्तचरों के माध्यम से खेले गए हैं। राक्षस चंद्रगुप्त को मारने के लिए विष शरीरी विषकन्या को बडी तिकडम से भेजता है। परंतु, चाणक्य उस विषकन्या को पहचान जाता है और बडी चालाकी से उसी विषकन्या को राक्षस के समर्थक पर्वतक के पास भेजकर उसी विषकन्या द्वारा उसको मरवा देता है। सत्ता के लिए चलनेवाले दांवपेंच मुद्राराक्षस में अंत तक चलते रहते हैं। अंततः इस राजनैतिक दांवपेंच में चाणक्य विजयी होता है और राक्षस चंद्रगुप्त का अमात्य होना मान्य करता है।

चाणक्य के कौटिल्य अर्थशास्त्र में गुप्तचरों के संबंध में बडी बारिकी से जानकारी दी गई है। इन जानकारियों पर से हम उस काल में राजनैतिक गुप्तचरी का तंत्र क्या था यह जान सकते हैं। इसमें गुप्तचरों के प्रकारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। इनमें से एक प्रकार 'रसद" गुप्तचरी का है। ये गुप्तचर अत्याचारी स्वभाव के होकर विषप्रयोग में माहिर होते थे। विषकन्या 'रसद" गुप्तचर मानी जाती थी। इस प्रकार की स्त्री गुप्तचरों को चुनने के लिए उनके सौंदर्य, उनकी बुद्धिमत्ता और बेपरवाही वाली वृत्ति को ध्यान में रखकर ही उन्हें चुना जाता था। विभिन्न प्रकार के गुप्तचरों में विष प्रयोग करनेवाले गुप्तचर, विषकन्या इनकी भरमार होती थी।

विषों की शास्त्रीय जानकारी जिस प्रकार से चाणक्य को थी उसी प्रकार से नंदवंश के तेजतर्राट अमात्य राक्षस को भी थी। वह गुप्तचरों से किस प्रकार कार्य करवाया जाए इस संबंध में विशेषज्ञ था। उसीने चंद्रगुप्त को मारने के लिए विषकन्या भेजी थी। उस काल के राजनीतिज्ञों को विषों का ज्ञान हुआ करता था। सिंहगुप्त के पुत्र वाग्भट के अष्टांग ह्रदय यानी सार्थ वाग्भट वैद्यशास्त्र का ग्रंथराज है। इस ग्रंथ में विषों के संबंध में जानकारी है। चालुक्य वंश का तीसरा सोमेश्वर धुरंधर राज्यकर्ता-विद्वान पंडित था। उसके लिखे मानसोल्लास ग्रंथ में विष प्रयोग का राजनैतिक उद्देश्य से प्रतिपादन किया हुआ है। उसने अपने इस ग्रंथ में विष के तीन प्रकार बतलाते हुए शत्रु को नष्ट करने के लिए विष प्रयोग करना चाहिए यह स्पष्ट कहा है। यह शत्रु जब असावधान हो, गायन, वादन में मग्न हो या जुआ खेल रहा हो तब करना चाहिए। जब वह किसी उत्सव में शामिल हो रहा हो, रानी महल में क्रीडामग्न हो ऐसे समय उसे मोह हो ऐसा वर्तन कर विष प्रयोग कर उसे मार डालना चाहिए। आर्य चाणक्य के काल में जिस प्रकार के गुप्तचर थे वैसे ही सोमेश्वर के काल (11वीं, 12वीं शताब्दी में) में भी थे। 
चाणक्य के अर्थशास्त्र से स्पष्ट होता है कि ये गुप्तचर प्राणों की परवाह न करनेवाले, विभिन्न कलाओं में सिद्ध होकर उन्हें कई भाषाएं भी आती थी। उनमें से कुछ स्त्रियां भी होती थी। पुरुष गुप्तचर भी विष प्रयोग में माहिर होते थे। कौटिल्य के चौथी शताब्दी में रचित अर्थशास्त्र में राजसत्ता, समाजसत्ता, समाज व्यवस्था आदि अनेक विषय आए हुए हैं फिर भी 'विषशास्त्र" में गुप्तचरों के संबंध में उनका उपयोग कैसे करें और राजसत्ता किस प्रकार टिकाए रखें पर भरपूर जानकारी आई हुई है साथ ही विष किस प्रकार से तैयार करें इस पर चर्चा की गई है। रसद गुप्तचरों में महत्वपूर्ण कार्य विषकन्याओं पर सौंपा जाता था। इन विषकन्याओं को बडी विशेषज्ञता के साथ नियुक्त किया जाता था। ये विषकन्याएं अपना काम चुपचाप बडी खूबी के साथ किया करती थी। 

एकाध सुंदर युवती अथवा कुंवारी कन्या को अल्पायु में ढूंढ़कर उसे वैद्य की सलाह से थोडा-थोडा विष इस प्रकार से दिया जाता था कि उसे उसकी आदत लगकर वह उसे पचा सके। इस प्रकार से वह विष उसके पूरे शरीर में भिद जाता था और वह धीरे-धीरे विषकन्या बन जाती थी। चाणक्य ने विषकन्याओं के प्रकार भी बतलाए हुए हैं। विषों के संबंध में जानकारी वेदकालीन आर्यों को भी थी और उस काल में भी विषकन्याओं की निर्मिती, उनका उपयोग सत्ता अपने हाथों में बनाए रखने के लिए किया जाता था यह अथर्ववेद से पता चलता है।

कथासरितसागर ग्रंथ में भी विषकन्याओं का उल्लेख कुछ कथाओं में आया हुआ है। अलेक्जेंडर-सिकंदर के आक्रमण के समय ऍरिस्टॉटल ने उसे विषकन्याओं से सावधानी बरतने की सलाह दी थी। किसी भी अनजान सुंदर सुंदरी से दूरी बनाए रखने और उससे संसर्ग टालने के लिए कहा था। भारत में जीतने के पश्चात एकाद्य राजा किसी सुंदरी को भेंट में दे सकता है। यह सुंदरी विषकन्या हो सकती है और उसके पसीने मात्र से तेरी मृत्यु हो सकती है। विषवैद्यों को उस काल में बडा सम्मान प्राप्त था। 

 कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि, विषकन्याओं का उस जमाने में बडा सम्मान था। विषकन्या को किस प्रकार से पहचाने इस संबंध में इन वैद्यों ने अनेक युक्तियों की योजना अपने सत्ताधारियों के संरक्षण के लिए कर रखी थी। इसके लिए राजमहल के दालानों में शुक, सारिका, भारद्वाज, कोकिला, चकोर आदि पक्षियों को पाला जाता था। जैसे ही विषकन्याओं का इन दालानों में प्रवेश होता शुक, भारद्वाज और सारिका ये प्राणी चिल्लाना आरंभ कर देते। चकोर की आंखों का रंग बदल जाता।

विषकन्या का प्रवेश राजा की भोजन व्यवस्थावाले नौकरवर्ग या अधिकारियों में हो गया तो वे भोजन या पेय पदार्थों के माध्यम से विष देने का काम चुपचाप कर देती थी। परंतु, ऐसे समय में राजा की पाकशाला विष वैद्यों के मार्फत अगर देखरेख रख रहे हों तो विषयुक्त भोजन पहचान लिए जाते थे। उदाहरणार्थ विषयुक्त खाद्य पदार्थ अग्नि में डाले गए तो आवाज निकलता, अग्नि की ज्वाला में नीला धुंआ दिखता। घी या तेल में विष हो तो उसमें नीली रेखा दिखाई देती। विषयुक्त पदार्थ अगर पशु-पक्षी खालें तो वे मर जाते।  फल सूख जाते। कपडों में विष हो तो वे काले पड जाते, उनके धागे गलने लगते।

इन विष कन्याओं का उपयोग न केवल प्राचीन एवं मध्यकाल में किया जाता था वरन्‌ आज भी सत्ता स्पर्धा की दौड में हुकुम की रानी जैसा उपयोग इन विषकन्याओं का किया जाता है और ये भी अपने कार्य के प्रति ईमान बरकरार रखे हुए हैं। आज भी व्यक्तिगत कारणों से विष प्रयोग के समाचार पढ़ने में आते ही हैं। राजनीति में भी विषकन्याओं का उपयोग संसार के सभी देश करते हैं परंतु, इस संबंधी समाचार सर्वसामान्य जनता को मालूम नहीं होते। गुप्तचरी सभी देश करते हैं। जिस प्रकार से ये आधुनिक युग के सामर्थ्य को उपयोग में लाते हैं उसी प्रकार से सौंदर्य संपन्न, प्रशिक्षित विषकन्याओं का उपयोग इन कामों के लिए अधिकांश राष्ट्र करते आए हैं और कर भी रहे हैं। सत्ता बनाए रखने के लिए उनकी शरीरमत्ता, बुद्धिमत्ता, सौंदर्य का उपयोग बडी विशेषज्ञता के साथ किया जा रहा है।

आधुनिक विषकन्याएं प्राचीन परंपरा की विषकन्याओं जैसी भले ही ना हों परंतु, आज भी उनकी कृतियां कुछ अधिक भिन्न नहीं होती। गायन, वादन, नृत्य आदि कला क्षेत्र इनके लिए वर्जित नहीं हैं। आजकल अपना कार्य साधने के लिए ये विषकन्याएं अचूक सत्ता केंद्र के आसपास केंद्रित रहती हैं। कोई स्टेनो, तो कोई व्यक्तिगत सहायक बनकर यहां तक कि सत्ताधारी की पत्नी तक बनकर, तो कहीं किसी महत्वपूर्ण विभाग में जिम्मेदार पद पर विराजमान व्यक्ति के इर्दगिर्द या स्वयं ही किसी पद पर नजर आ जाती हैं। इस प्रकार से चाणक्यकालीन ये विषकन्याएं आज भी सत्ताकार्य में महापूरक बनी हुई हैं यह निर्विवादित तथ्य है बस उनके रुप और स्थान कालानुसार बदल गए हैं।

Friday, 14 April 2017

शारदा एक्ट के जनक आर्यसमाजी हरविलास शारदा

 शारदा एक्ट के जनक आर्यसमाजी हरविलास शारदा

भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुए 70 वर्ष होने जाने रहे हैं परंतु, आज भी भारत बालविवाह की कुप्रथा से मुक्त हो नहीं पा रहा है। नगरों में भले ही बालविवाह को कुरीति माना जाता हो और नगरीय संस्कृति में जीनेवाले इसे एक अभिशाप मानते हों फिर भी राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, आदि के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी धडल्ले से बालविवाह हो रहे हैं। वर्तमान में नगरीय संस्कृति के संपर्क में आ चूके कुछ ग्रामीण समुदाय इस कुरीति से पीछा छुडाने के प्रति जागरुक होते जा रहे हैं फिर भी हालात यह हैं कि, कइयों के लिए तो बालविवाह पीढ़ी दर पीढ़ी चलनेवाला संस्कार है। इस कारण आज भी बालविवाह एक बडी चिंताजनक समस्या बनी हुई है।

  बालविवाह निरोधक अधिनियम 1929 के जन्मदाता समाज सुधारक, शिक्षाविद्‌, न्यायधीश, राजनेता हरविलास शारदा का जन्म अजमेर राजस्थान में 8 जून 1867 को एक आर्यसमाजी परिवार में हुआ था। स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों की उन पर पूरी छाप थी। उन्होंने ही अजमेर में डीएवी स्कूल की स्थापना की थी। वे 1924, 1927 और 1930 में अजमेर मारवाड से केंद्रीय विधान सभा के लिए सदस्य चुने गए थे। उन्होंने ग्यारह वर्षों तक केंद्र में अजमेर का प्रतिनिधित्व किया था। 

1927 में उन्होंने बालविवाह रोकने के लिए केंद्रीय असेम्बली में एक बिल पेश किया था। इसका उद्देश्य बतलाते हुए उन्होंने कहा था यह बाल विधवाओं के अंधकार को दूर करेगा। इस बिल को प्रस्तुत करते समय उन्होंने कहा था बालविवाह से लडके-लडकियों का स्वाभाविक विकास हो नहीं पाता और उनसे उत्पन्न संतानें भी विकारग्रस्त होती हैं। बालविवाह से स्वस्थ संतानोत्पत्ति में बाधा आती है। देश को सुदृढ़ और विकास के पथ पर ले जाने के लिए बालविवाह जैसी कुरीतियों को छोडना अनिवार्य होना चाहिए। यह शारदा बिल सितंबर 1929 को शिमला में पास हुआ और 1 अप्रैल 1930 को पूरे भारत में लागू हो गया।

इसके पूर्व राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, महादेव गोविंद रानडे और स्वामी दयानंद सरस्वती के अथक प्रयासों से लडकी का बालविवाह दस वर्ष की आयु के पूर्व हो नहीं सकता का कानून बना दिया गया। इसके पूर्व तो नवजात बच्चों तक के विवाह तय कर दिए जाते थे। 1890 में हुए फूलमणि केस के कारण दूसरा बिल पारित कर आयु बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी गई। देवदासी प्रथा का उन्मूलन करनेवाला बिल 1929 में तत्कालीन मद्रास विधानसभा में पास करवानेवाली मुत्तुलक्ष्मी ने 27 मार्च 1928 को ही बालविवाह निषेध का बिल प्रस्तुत किया था परंतु, केंद्रीय सभा में इस संबंध में एक बिल लाया जा रहा है की सूचना देकर उन्हें प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया। 19 अप्रैल 1928 को हरविलास शारदाजी ने एक पत्र लिखकर उनसे समर्थन भी मांगा था।

हरविलास शारदा प्रसिद्ध लेखक होने के साथ ही इतिहासकार एवं साहित्यकार भी थे। उनका एक अत्यंत प्रसिद्ध ग्रंथ 1906 में लिखित 'हिंदू सुपरियारिटी" भी है। इस ग्रंथ में उन्होंने सप्रमाण सिद्ध किया था कि, प्राचीनकाल में हिंदू सभ्यता विश्व में सबसे  आगे थी। उनकी कुछ साहित्य रचनाएं इस प्रकार से हैं। 1915 में 'महाराणा कुंभा", 1918 में 'महाराणा सांगा",1921 में 'हम्मीर ऑफ रणथंभौर", 1936 में 'स्पीचेज एंड रायटिंग ऑफ हरविलास शारदा", 1944 में 'शंकराचार्या और दयानंद", लाइफ ऑफ स्वामी विरजानंद सरस्वती, 1945 में 'परोपकारिणी सभा और सत्यार्थ प्रकाश"।

हरविलास शारदा का देहावसान 20 जनवरी 1952 को हो गया। उनके संबंध में भारत कोकिला कही जानेवाली सरोजिनी नायडू ने कहा था कि, सभी भारतीय विशेषकर भारतीय स्त्रियां प्रोफेसर हरविलास शारदा की हमेशा ऋणी रहेंगी जिन्होंने साहस और बहुत परिश्रम से बालविवाह निरोधक कानून को मान्यता दिलाकर अविस्मरणी कार्य किया है।

Thursday, 6 April 2017

"मैकल नेचुरल फाउंडेशन" - भोपाल

मैकल नेचुरल फाउंडेशन एक नॉन-प्रोफिट ऑर्गेनाइजेशन है| यह फाउंडेशन किसानों को रसायन मुक्त खेती करने हेतु प्रोत्साहित करता है व रासायनिक खेती के दुष्परिणामो से अवगत कराता हैऐसे किसान जो कि रसायन मुक्त खेती करते हैं, उनसे मैकल नेचुरल फाउंडेशन खाद्य पदार्थ  क्रय करता हैयह हमारी ओर से उन्हें बढ़ावा है, व उन्हें प्रोत्साहन देता है|
रासायनिक खेती में अनेक प्रकार के रसायनों जैसे यूरिया, NPK - एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश), कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, यह भूमि एवं पूरे पर्यावरण के लिए हानिकारक है| आज अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जी, दूध, फल, पानी सभी पर जहरीले रसायनों का साया है| रसायन युक्त भोजन जब हम ग्रहण करते हैं उस समय जहरीले कीटनाशक व अनेक प्रकार के रसायन हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और हमारे शरीर को हानि पहुंचाते हैं, अनेकों प्रकार के रोग हो जाते हैं व रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है, घट भी गई है| कैंसर का मुख्य कारण भी कीटनाशकों का उपयोग है| कीटनाशकों का जहर पानी में घुलकर जमीन में उतर जाता है और जमीन से होते हुए धीरे-धीरे भूजल में जा मिलता है| इस से भूजल भी जहरीला हो गया है| अत्यधिक रसायन के उपयोग के कारण अब ऐसा समय आ गया है कि कीड़े व इल्लियाँ नहीं मरती, क्यूंकि कीटों व इल्लियों में दवाइयों को पचाने की क्षमता (इम्युनिटी) तैयार हो गई है | हमारी खाद्य श्रंखला में धीरे-धीरे विषैले रसायनों का प्रवेश हो गया है |  
प्राकृतिक खेती :
फसलों को बढ़ने के लिए जो संसाधन चाहिए वह उनकी जड़ों के पास भूमि में और पत्तों के पास के वातावरण में मौजूद होता है| ऊपर से कुछ भी देने की जरुरत नहीं पड़ती| प्राकृतिक खेती में केवल गाय के गोबर व गौमूत्र से ही पूरी खेती की जाती है| किसी भी प्रकार के जहरीले रसायनों एवं रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता| गाय के एक ग्राम गोबर में असंख्य सूक्ष्म जीव है, जो फ़सल के लिए जरुरी १६ तत्वों की पूर्ति करते है| रासायनिक खेती की जगह यदि हम प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देंगे तो यह न केवल मनुष्यजाति बल्कि पुरे पर्यावरण की दृष्टि से लाभदायी होगा | आप स्वस्थ व निरोगी रहेंगे |
मैकल नेचुरल फाउंडेशन का उद्देश्य:
1. किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रोत्साहित करना |
2. किसानों को रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से अवगत कराना |
3. जमीन कि उर्वरा शक्ति को बढ़ाना |
4. रासायनिक खाद/ कीटनाशकों के प्रयोग में कमी लाना |
5. माँ नर्मदा के जलग्रहण क्षेत्र को रसायन मुक्त कराना |
मैकल नेचुरल फाउंडेशन के खाद्य पदार्थों का मूल्य किसानों को हानि न हो यह ध्यान में रख कर तय किया जाता है | हमारे मूल्य अन्य आर्गेनिक(जैविक) कंपनियों की तुलना में काफी कम है
मैकल नेचुरल फाउंडेशन में उपलब्ध रसायन मुक्त खाद्य पदार्थ :
1. खड़ी मिर्च – ₹200 प्रति किलों
2. पिसी मिर्च – ₹250 प्रति किलों
3. पूसा बासमती चावल - ₹60 प्रति किलों
4. शरबती गेहूं - ₹35 प्रति किलों
5. छिलका मूंग दाल - ₹100 प्रति किलों
6. मूंगफली दाना - ₹120 प्रति किलों
आगामी पदार्थ :
1. पिसी हल्दी 
2. तुअर दाल 

नोट: खाद्य भण्डारण करते समय अन्न को नीम की पत्तियों सहित टंकियों में एयर टाइट पैक रखें, व टंकी को सीधे फर्श के संपर्क में न रखें |

 - अर्पिता
संपर्क हेतु मेल करें - maikalnatural@gmail.com 
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