Friday, 25 January 2019

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान - शिरीष सप्रे

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान
शिरीष सप्रे

भारत में स्वाधीनता की लड़ाई हिंसक और अहिंसक दोनों ही तरीकों से लड़ी गई और इतिहास साक्षी है कि, अवसर मिलने पर भारत की महिलाऐं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रही हैं और स्वाधीनता आन्दोलन कोई अपवाद नहीं | भारत के स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं ने पुरुषों के साथ महत्वपूर्ण भाग लिया है |

सन १७५७ में प्लासी की हार के बाद १७५७ से १८५७ तक पूरी एक शताब्दी का इतिहास इन विद्रोहों से भरा पड़ा है | इन सभी विद्रोहों में स्त्रियों की भी न केवल व्यापक भागीदारी रही, बल्कि कई बड़े विद्रोहों में उनका कुशल नेतृत्व रहा है | जैसे सन्यासी विद्रोहों का संचालन देवी चौधरानी ने, चुआड विद्रोह का रानी शिरोमणि ने, कित्तूर विद्रोह का रानी चेन्नमा ने किया |

१८५७ के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई तथा बेगम हजरत महल का नाम विशेष उल्लेखनीय है | यों रानी रामगढ, रानी तुलसीपुर, रानी तेज बाई, बेगम जमानी आदि अन्य कई रानियों, बेगमों ने अपने जौहर कम नहीं दिखाए थे | महारानी तपस्विनी का भूमिगत क्रांति संगठन तो गजब का था |


इन सभी विद्रोही, क्रांतियों के दौरान हजारों हजार स्त्रियां फांसी, गोली का शिकार हुई | कई घर बर्बाद हुए पर क्रूर दमन के बावजूद, विद्रोह दबे नहीं, यहां - वहां फूटते रहे, जिनमें निचले तबकों की गरीब स्त्रियों की भागीदारी भी कम नहीं रही | कुका आंदोलन प्रसिद्ध है इस आंदोलन में हुकमी और इंदकौर नामक औरतों ने सक्रिय भाग लिया | महारानी तपस्विनी को कुछ समय के लिए जेल में बंद रखा गया था, वह महारानी लक्ष्मीबाई की भतीजी लगती थी | लक्ष्मीबाई की दो दासियों मुंदरा और काशीबाई ने भी अंत तक युद्ध में साथ दिया और वीरगति प्राप्त की |

पर अभी तक के इन विद्रोहों का स्वरुप व महत्त्व प्रायः क्षेत्रीय या स्थानीय था | इसलिए आगे चलकर राष्ट्रिय मुक्ति संघर्ष के रूप में देश व देश के बाहर जो क्रांतिकारी संगठन बने तरुण भारत सभा, भारत मेला, अभिनव भारत समिति, मित्र मेला, युगांतर दल, अनुशीलन समिति, दीपाली संघ, श्री संघ, ग़दर पार्टी, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी, भारत नौजवान सभा, आदि | उनकी गुप्त कार्यवाहियों में बिखराव के बावजूद, उनका उददेश्य समान था और स्वरुप राष्ट्रिय |

इन संगठनों के संपर्क सूत्र न केवल पूरे भारत में फैले थे अपितु देश के बाहर ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान, इटली तक प्रवासी भारतीय क्रांतिकारी इनसे जुड़े थे | बहुत से लोग तो अहिंसक लड़ाई लड़नेवाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहकर भी कांग्रेस के भीतर गरम दल की गरम जोश गतिविधियों और कांग्रेस से बाहर गुप्त क्रांति गतिविधियों से एक साथ जुड़े थे |

महिलाएं भी इन गतिविधियों में न केवल शामिल थी कई जगह नेतृत्व भी संभाल रही थी | गरम दल की एक अग्रणी कार्यकर्ती डा. ऐनी बेसंट ने होम रूल लीग का गठन कर होम रूल आंदोलन का नेतृत्व किया | प्रवासी भारतीयों में भीकाजी कामा ने क्रांति का शंख फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई | सरफरोश प्रीतिलता ने एक्शन ग्रुप का नेतृत्व कर स्वयं आगे बठकर शहादत को गले लगाया | गवर्नर के बंगले में चालाकी से प्रवेश कर दो छोटी लडकियों शांती और सुनीति ने गवर्नर पर गोली चलाकर सारे देश में तहलका मचा दिया | पूरा क्रांति इतिहास अनेक किशोरियों और युवतियों के इस प्रकार के साहसी कारनामों से भरा पड़ा है | यहां तक कि क्रांतिकारियों को गुप्त सहायता करने के आरोप में भी पकड़ी जाकर उन्हें दो से आठ साल तक की लम्बी सजाएं हुई हैं |

रानी मां के रूप में जानी जाने वाली रानी गेडीनिल्यु ने १९२० और १९३० के दशक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और औपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष किया | उन्हें अक्टूबर १९३२ में गिरफ्तार किया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई | वे १४ साल जेल में रही | उनके भाई जदोनांग को १९३१ में फांसी पर लटका दिया  गया | रानी मां कट्टर गांधीवादी थी और उन्होंने कहा था
- ‘महात्मा गांधी एक बार गुवाहाटी आए थे | तब उन्हें माला पहनाने का सम्मान मुझे मिला था | तब से मैं अहिंसा और महात्मा गांधी के सभी संदेशों की अनुयायी बन गई |’ गेडीनिल्यु को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने १९३७ में उस समय रानी की उपाधि दी थी, जब उन्हें पूर्वोत्तर क्षेत्र के दौरे के समय इस साहसी महिला के बारे में पता चला था | 
                                     

सन 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में देश की महिलाओं ने घुंघट और बुरका उतारकर आजादी की लड़ाई में बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया | १९४२ के भारत छोडो आंदोलन में भी महिलाओं ने बढ-चढ़ कर भाग लिया | इसी तरह स्वतंत्रता-आंदोलन में दक्षिण भारतीय महिलाओं की न तो भूमिका कम रही ना ही बलिदान |  

Saturday, 19 January 2019

धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर - शिरीष सप्रे


धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर
शिरीष सप्रे

 रामायण-महाभारत में इन्हें धन के देवता के रूप में वर्णित किया गया है | इस पृथ्वी पर जितना भी धन है उसका अधिपति इन्ही को बतलाया गया है | भूगर्भ में जितना भी धन है उसका स्वामी भी इन्हीं को बतलाया गया है | यह सारी संपती इन्हें ब्रह्माजी द्वारा प्राप्त हुई है | इनकी उत्पत्ति महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा और महर्षि भरद्वाज की पुत्री इलाविला के विवाह से हुई | कठोर तपश्चर्या से इन्होंने लोकपाल का पद प्राप्त किया |

श्वेत वर्ण, तुंदिल शरीर अष्ट दन्त गदाधारी कुबेर अपनी सत्तर योजन में फैली विस्तृत नगरी वैश्रवणी में विराजते हैं | इनके पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा नारदजी के शाप से मुक्त होने के पश्चात इन्हीं के समीप रहते हैं और अनुचर सदैव इनकी सेवा में रहते हैं | भगवान् कुबेर मनुष्य के अधिकार के अनुरूप कोष का प्रादुर्भाव या विरोभाव करते हैं | भगवान् शंकर ने कुबेर को अपना नित्य सखा माना है | प्रत्येक यज्ञ के अंत में इन वैश्रवण राजाधिराज को पुष्पांजलि दी जाती है | जो इस प्रकार है –
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने | नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ||

इस धन देवता कुबेर की नगरी का नाम अलकापुरी है | इनकी कृपा से ही भूगर्भ निधि प्राप्त होती है | निधि विद्या में निधि सजीव मानी गई है, जो स्वतः स्थानान्तरित होती है | योग्य और पुण्यात्मा शासक के समय में मणि - रत्नादी स्वतः प्रगट होते हैं | वर्तमान में जो स्वतः प्रगट रत्न विश्व में नहीं है इसका कारण अधिकांश मणि, रत्न लुप्त हो गए हैं क्योंकि, आज का मानव इन्हें उपभोग्य मानता है | यज्ञ दान के अवशेष का उपभोग हो यह वृति लुप्त हो गई है |

 एक बार देवी भगवती उमा पर इनकी कुदृष्टि गई तो इनका एक नेत्र जाता रहा और दूसरा पीला हो गया | अतः कुबेर एकाक्ष; एक आंखवाले पिंगली कहलाते हैं | इनका शरीर कुबडा होकर; अस्त्र गदा होकर वाहन पालकी है | कुबेर अपने पिता ऋषि विश्रवा को छोड़कर पितामह ब्रह्मा के पास चला गया और उनकी सेवा करने लगा | इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया साथ ही धन का स्वामी बनाकर लंका का अधिपति भी बना दिया और पुष्पक विमान प्रदान किया | इनकी पत्नी दानव मुरका की बेटी थी |

रावण इनका सौतेला भाई था उसने तपश्चर्या से ब्रह्मा को प्रसन्न कर मनचाहे रूप धारण करने एवं सिर कटने पर पुन्ह सिर उग आने का वरदान प्राप्त किया | वर पाकर वह लंका आया और कुबेर को लंका से निकाल बाहर किया | कुबेर निष्काषित होकर गंधमादन पर्वत पर आ गए |बौद्ध ग्रन्थ दीर्घ निकाय के अनुसार कुबेर पूर्व जन्म में ब्राह्मण होकर ईख के खेत के स्वामी थे और एक कोल्हू की आय दान कर देते थे | इस प्रकार २० हजार वर्षों तक वह दान करते रहे इसके फलस्वरूप इनका जन्म देवों के वंश में हुआ |

सतपथ ब्राह्मण में कुबेर को राक्षस बतलाया गया है और दुष्टों तथा चोरों का एवं यक्षों का नेता |  जैन, ब्राह्मण और वैदिक साहित्य में इनका उल्लेख कुबेर नाम से ही है | कुबेर उत्तर दिशा के दिगपाल हैं और इन्हें सोना निकालने की कला का जानकार भी बतलाया जाता है |

इनकी नगरी अलकापुरी कैलाश पर्वत पर होकर वहां उद्यान, झीलें एवं सुन्दर महल हैं | यहां से अलकनंदा निकली है | कौटिल्य ने लिखा है कुबेर की मूर्ती खजाने में स्थापित की जाना चाहिए | कुबेर का निवास वटवृक्ष कहा गया है | वराह पुराण के अनुसार कुबेर की पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को की जाती है, लेकिन आजकल दीपावली पर धन की पूजा की जाती है | इनको प्रसन्न करने के लिए महामृत्युन्जय के जप की कम से कम दस हजार आवृतियां जरुरी हैं | वैदिक साहित्य में इनका स्थान बहुत ऊँचा है | 

    
   


Monday, 14 January 2019

मकर संक्रांति उत्सव - शिरीष सप्रे


मकर संक्रांति उत्सव
शिरीष सप्रे

जब एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं | इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं | मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं | वैदिक साहित्य में उत्तरायण के लिए उद्गयन, देवयान आदि शब्द देखने को मिलते हैं | उत्तरायण के काल को शुभ समझा जाता था | पितामह भीष्म तब तक शर शय्या पर लेटे रहे, जब तक उत्तरायण का आरम्भ नहीं हुआ |

 इस संक्रांति का विशेष महत्त्व है | इसे मोक्षकारक भी माना जाता है | कर्क राशि से सूर्य दक्षिणायन होते हैं | इस तरह मकर से मिथुन तक सूर्य उत्तरायण व कर्क से धनु राशि तक दक्षिणायन रहते हैं | प्रत्येक राशि का ग्रहों को प्रभारी बनाकर अधिपति बनाया है | सूर्य को सिंह, चन्द्रमा को कर्क, मंगल को मेष व वृश्चिक, बुध को कन्या व मिथुन गुरू को धनु व मीन, शुक्र को वृषभ व तुला तथा शनि को मकर व कुम्भ राशि का अधिपति बनाया है |
       
वस्तुतः पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है, पर हमें यही आभास होता है की आकाश मार्ग में सूर्य ही स्थिर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है | सूर्य के इस दिखाऊ आकाश मार्ग को क्रांतिवृत्त का नाम दिया गया है | इस क्रांतिवृत्त को १२ समान भागों में विभक्त करके इन्हें मेष, वृषभ, मिथुन, धनु, मकर, कुम्भ, आदि राशिनाम दिए गए हैं | सालभर में इन बारह राशियों में से सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं यानी बारह संक्रांतियां होती हैं | 

सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है | सूर्य का उत्तरायण प्रवेश अत्यंत शुभ माना जाता है | उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले की उर्ध्वगति होती है उसे गोलोक वास की प्राप्ति होती है | भारतीय संस्कृति में इस पर्व का विशेष महत्त्व है | संक्रांति काल को पुण्य काल माना जाता है | उस दिन समुद्र या प्रयाग  गंगासागर जैसे तीर्थों में स्नान किया जाता है और उस दिन इन स्थानों पर बड़े मेले लगते हैं | संक्रांति में तिल का काफी प्रयोग होता है, विशेषकर दक्षिण भारत में |

महाराष्ट्र में तिल-गुड बांटा जाता है और कहा जाता है – ‘तिल-गुड लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए’ | बंगाल में तिल मिलाकर ‘तिलुआ’ नामक एक पदार्थ बनाया जाता है, इसलिए मकर संक्रांति को तिलुआ-संक्रांति भी कहते हैं | उत्तर भारत में दाल और भात की खिचड़ी पकाते हैं और दान देते हैं, इसलिए संक्रांति को खिचड़ी- संक्रांति भी कहते हैं |

कालिका पुराण के अनुसार उत्तरायण में सदैव तिल्ली का हवन करना श्रेष्ठ बताया है | जिस व्यक्ति का जन्म उत्तरायण में हुआ हो उसे भगवान् के मंदिर में और ब्राह्मण को स्वर्ण सहित तिल्ली दान करने पर कभी दुःख और शोक नहीं होगा | तिल्ली को ग्रंथों में पापनाशक बताया है | इसी दिन पवित्र नदियों में स्नान की भी परंपरा है | संक्रांति से ही सूर्योपासना प्रारम्भ करना शुभ फलदायक है |

इसी समय दक्षिण भारत में तीन दिवस चलनेवाला ‘पोंगल’ नामक महोत्सव मनाया जाता है | दूसरे दिन का उत्सव ‘सूर्य पोंगल’ कहलाता है | इस दिन दूध और चावल की खीर पकाई जाती है | पोंगल शब्द का अर्थ ही है पकाना | अर्थात् पोंगल एक प्रकार का पाकोत्सव है |

आज मकर संक्रांति एक सामाजिक उत्सव में रूपांतरित हो गई है और इसके साथ कुछ धार्मिक अंधविश्वास भी जुड़ गए हैं | वैसे तो वैदिक कृषक समाज ने इस उत्सव को जन्म दिया था और प्राचीनकाल से एक आनन्दोत्सव के रूप में इसको मनाया जाता रहा है | 
         

Thursday, 10 January 2019

स्वामी विवेकानंद – जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय - शिरीष सप्रे


स्वामी विवेकानंद –
 जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय
शिरीष सप्रे

स्वामी विवेकानंद भारतीय परंपरा की ऊर्जावान धारा के सर्वाधिक प्रगतिशील संत, विचारक और पुरोधा रहे हैं | कबीर के बाद धर्मान्धों, कर्मकांडवादियों, जातिवाद, शोषण, अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय रचनात्मक अभियान चलानेवाले रहे हैं | भारत के नवनिर्माण के लिए स्वामीजी को देश के युवाओं से बड़ी अपेक्षाएं थी | वे भारतीय चिंतन, भारतीयता, हिन्दू धर्म पर जोर देते थे तो उसका अर्थ समूची मानव जाति के जीवन मूल्यों का अर्थ था | उन्होंने लिखा भी था कि ‘तुम हिन्दू कहलाने के अधिकारी हो, जब इस नाम को सुनते ही तुम्हारी रगों में शक्ति की विद्युत तरंग दौड़ जाए | लेकिन हिन्दू कहलाने के अधिकारी तब ही हो जब व्यक्ति का दुःख-दर्द तुम्हारे ह्रदय को इतना व्याकुल कर दे, मानो तुम्हारा अपना पुत्र संकट में हो |’

स्वामी विवेकानंद के पूरे जीवन दर्शन का प्रमुख वैचारिक बिंदु था कि, ‘भारतीय जीवन का मुख्य आधार धर्म है | हमारे देश का धर्म हिन्दू धर्म है | धर्म केवल वह धुरी मात्र नहीं है जिसके माध्यम से भारत में पुनर्जागरण हुआ है, बल्कि भारतीय ऋषियों ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया है वह वही परम लक्ष्य है, जिसे पुनर्जाग्रत भारत को प्राप्त करना है | यह वह अमूल्य मणि है जिसके प्रकाश से हमें विश्व को प्रकाशित करना है |’

नवयुवकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था – ‘ए वीर साहस का अवलंबन करो, गर्व से कहो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, तुम चिल्लाकर कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी सब मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियां मेरे ईश्वर हैं, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है |’  

स्वामी विवेकानंद ने १८९७ ई. कहा था – ‘’सुदीर्घ रजनी अब समाप्त हुई जान पड़ती है | महादुख का प्राय: अंत ही प्रतीत होता है | महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहा है | इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनान्धकार को भेद करने में अनुश्रुतियां भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है | ज्ञान, भक्ति और कर्म के अनंत हिमालय स्वरुप  हमारी मातृभूमि भारत की हर एक चोटी पर प्रतिध्विनित होकर यह आवाज मृदु, दृढ़ परन्तु अभ्रांत स्वर में हमारे पास तक आ रही है | जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और स्पष्ट तथा गंभीर होती जाती है और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है | जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है | जो अंधे हैं, वे देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं, वे ही समज नहीं सकते कि हमारी हमारी मातृभूमि अपनी निद्रा से जाग रही है | अब उसे कोई रोक नहीं सकता | अब यह फिर सो भी नहीं सकती | कोई बाह्यशक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती, क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है |’’

हे युवकों, सारे विश्व की दृष्टी आज भारत में लगी हुई है | तृतीय सहस्त्राताब्दी   में भारत को अपनी भूमिका निभानी है, विश्व को शांति, और अमृत्व के पथ पर नेतृत्व देना है | भारतीय संस्कृति और परम्पराओं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति की आज आवश्यकता है और वह भारत ही दे सकता है, क्योंकि आध्यात्मिकता भारत का मेरुदंड है, उसे तो जीने के लिए भी आध्यात्मिक होना ही पड़ेगा और ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ समस्त पृथ्वी के मानव को पथ दिखा कर अपना कर्तव्य निभाना होगा |

स्वामीजी कहते थे – ‘’अपने स्नायु बलवान बनाओ, आज हमें जिसकी आवश्यकता है, वह है, लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु | हम लोग बहुत दिन रो चुके | अब और रोने की आवश्यकता नहीं | अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और ‘मर्द’ बनो | हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें | हमें ऐसे सिद्धांतों की जरुरत है, जिससे हम मनुष्य हो सकें | हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके और यह रही सत्य की कसौटी, जो भी तुमको शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टी से दुर्बल बनाए उसे विष की तरह त्याग दो, उसमें जीवन शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता | सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रता है, वह ज्ञानस्वरूप है | सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो ह्रदय के अन्धकार को दूर कर दे, ह्रदय में स्फूर्ति भर दे | अपनेआप पर विश्वास रखो कि प्रत्येक की आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है | तभी तुम सारे भारतवर्ष को पुनर्जीवित कर सकोगे | फिर तो हम दुनिया के सभी देशों में खुले आम जाएंगे और आगामी १० वर्षों में हमारे भाव उन सब विभिन्न शक्तियों के एक अंशस्वरुप हो जाएंगे, जिनके द्वारा संसार का प्रत्येक राष्ट्र संगठित हो रहा है |”

स्वामी विवेकानंद ने हमें सीखाया है कि भारत का नवनिर्माण हम भारत के प्रति अगाध प्रेम रखकर ही कर सकते हैं | जिस किसीने स्वामीजी के अग्नि वचनों को सुना उसीमें राष्ट्रीयता की लहर आई है | भारत को यदि पुनर्जीवित करना है तो हमें अवश्य ही उसके लिए काम करना होगा |अनाथ, दरिद्र, निरक्षर और कृषक व श्रमिक ही हमारें लक्ष्य हैं, पहले उनके लिए काम करने के बाद अगर समय रहा तो कुलीन की बारी आएगी | विवेकानंद ने समाज की नब्ज पर हाथ रखा था | उनका तमाम चिंतन दरिद्र के झोपड़े से गुजरता था | शोषण के खात्मे से होकर अध्यात्म में जाता था |




Friday, 28 December 2018

मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी - शिरीष सप्रे


 मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी  
शिरीष सप्रे

संसार में आज अनेक प्रकार के कैलेंडर्स प्रचलित हैं | उनमें रोमन, भारतीय, यहूदी और इस्लामी कैलेंडर प्रमुख हैं | इनमें ३६५ दिन का रोमन कैलेंडर ही विश्व में अधिकाधिक उपयोग में लाया जाता है | कैलेंडर दो प्रकार के होते हैं - चान्द्र वर्ष और सौर वर्ष आधारित | भारत का हर परंपरागत किसान सौर वर्ष चन्द्र मास दोनों को जानता है |

सौर वर्ष ३६५ दिन से एक चौथाई अधिक का होता है | चन्द्र वर्ष ३५४ दिन का होता है | इसीलिए चन्द्र वर्ष गणना में तीन वर्षों में एक अधिक मास की व्यवस्था है | मुसमानों में वह नहीं है, तो इससे चन्द्र तिथि की उनकी गिनती तो ठीक ही रहती है | बस, धार्मिक पर्व भिन्न-भिन्न ऋतुओं एवं महीनों में पड़ते रहते हैं | जिसमें उन्हें कोई हर्ज नहीं दिखता | रमजान या मुहर्रम कभी गर्मी में होगा, कभी वर्षा, कभी शरद, कभी हेमंत, कभी शिशिर में |

ईसाइयों में चन्द्रमा से जुडा एक ही विशेष पर्व है – ईस्टर, जो कि २१ मार्च की पूर्णिमा या कि उसके बाद जब भी पहली पूर्णिमा पड़े, उसके बाद आने वाले पहले रविवार को पड़ता है और यह ईस्टर का त्यौहार सन १५८२ ईस्वी के पहले, जब जूलियन कैलेंडर बहुत दोषपूर्ण था तब तो भिन्न-भिन्न तारीखों में पड़ता ही था अब भी वह २२ मार्च से २५ अप्रैल के बीच भिन्न-भिन्न तारीखों में पड चूका है सुधारे हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर के बावजूद | भारत में तो अधिक मास की व्यवस्था ऋग्वेद काल से भी पहले से है | इसलिए यहां चान्द्र और सौर वर्ष में सामंजस्य रखा जाता रहा है |
 
सभी प्राचीन संस्कृतियों में ‘काल गणना’ प्रमुखता से चन्द्र भ्रमण पर आधारित थी | क्योंकि,  पूर्ण चन्द्र से पूर्ण चन्द्र यह काल निरीक्षण की दृष्टी से बहुत सुविधाजनक था | बेबोलियन संस्कृति में भी चन्द्र वर्ष से सम्बंधित कैलेंडर अस्तित्व में थे, इतना ही नहीं तो उस काल में चन्द्र वर्ष का सौर वर्ष से सम्बन्ध लगाने के लिए अधिक महिना रखने की परिपाटी थी इस प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं |

इजिप्शियन संस्कृति में भर व्याध तारे को केंद्रीभूत मानकर कैलेंडर बनाए जाते थे | क्योंकि पूर्व दिशा में सूर्योदय के पूर्व व्याध तारे के दर्शन होने लगने के बाद कुछ समय में ही नाईल नदी में बाढ़ आ जाती थी | इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि व्याध का उदय और नाईल नदी में बाढ़ इसको कैलेंडर की दृष्टी से महत्त्व प्राप्त हो गया | ‘व्याध का पूर्व दिशा में उदय’ से पुनः व्याध का पूर्व में उदय यह काल लगभग ३६५ दिन का था, इस कारण ईजिप्शियन कैलेंडर ३६५ दिन का था | वर्ष में ३६५ दिन यह ईजिप्शियन संस्कृति की एक देन ही है |

प्राचीनकाल में यहूदी खगोल शास्त्रीय अध्ययन में अधिक रूचि नहीं लेते थे | कहा जाता है कि उन्होंने अपने पड़ोसी देश बेबीलोनिया का कैलेंडर ही अपनाया | सप्ताह सर्वप्रथम यहूदियों द्वारा ही समय की ईकाई के रूप में चलन में आया | यूनान के निवासियों ने भी चान्द्र वर्ष पर आधारित कैलेंडर बनाया था | इस कैलेंडर में भी बाद में कई सुधार किए गए |

चीनी कैलेंडर का साल आमतौर पर बारह चन्द्र-मासों का होता था | सौर वर्ष से सामंजस्य बिठाने के लिए जिस वर्ष तेरहंवा महीना जोड़ा जाता, उसे पूर्ण वर्ष कहा जाता था |  
           
आज जिस कैलेंडर से हम तारीख और महीने का हिसाब लगाते हैं उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं | क्योंकि, पोप ग्रेगोरी तेरहवें ने इस कैलेंडर में कई क्रांतिकारी सुधार किए थे | अंग्रेजी ‘कैलेंडर’ यह शब्द कैलेंडर्स इस रोमन शब्द पर से आया है | इसका अर्थ होता है महीने का प्रथम दिन | वैसे कैलेंडरों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और रोचक इतिहास रोमन रिपब्लिकन कैलेंडर का है | जो एक अलग लेख का विषय है | इनका ‘कैलेंडर’ चान्द्र कैलेंडर है |

लैटिन भाषा के शब्द ‘कलेंडे’ से कैलेंडर शब्द आया है | हिन्दी में कैलेंडर का अर्थ पंचांग-पत्रा या तिथि-पत्रक होता है | किसी भी कैलेंडर को देखने से हमें यह पता चलता है कि साल के किस महीने में कौन सा दिन किस तारीख या तिथि को पड़ता है या कौन सी तिथि या तारीख किस दिन पड़ती है | अधिकतर कैलेंडरों से त्यौहारों, पर्वों, ऐतिहासिक महत्त्व के दिनों का भी पता चलता है |

वैसे यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ‘कैलेंडर’ शब्द भी पूर्णतः भारतीय है | वास्तव में कैलेंडर शब्द ‘कालांतर’ शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है | विश्व  की किसी भी अन्य भाषा में समय को काल या कैलेंडर से मिलते-जुलते नाम से संबोधित नहीं किया जाता है | कैलेंडर शब्द की रोमन उत्त्पत्ति की कथा अविश्वसनीय और अजीब है | रोम में साहूकार लोग ब्याज का हिसाब लगाने की जिस पद्धति का उपयोग करते थे, उसे कैलेंडियम कहा जाता था | जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता था, उस दिन पूरे नगर में ढोलक पीटकर, आवाजें लगाकर यह बताया जाता था कि नया वर्ष शुरू हो गया है |  
     
भारत में सृष्टि संवत्, विक्रम संवत्, कृत संवत्, मालव संवत्, शक संवत्, वर्धमान संवत्, बुद्ध निर्वाण संवत्, सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत्, परशुराम संवत्’, आदि कैलेंडर्स प्रचलित हैं | ई. स. पूर्व ५४५ वर्ष पहले बौद्ध धर्म का आरम्भ वैशाख पूर्णिमा को हुआ था | विक्रम संवत् का उपयोग विशेष कर उत्तर भारत, राजस्थान और गुजरात में किया जाता है |

विक्रम संवत् को सानंद विक्रम संवत्, संवत् विक्रम, श्रीनृप विक्रम संवत् और मालव संवत् के नाम से भी जाना जाता है | इस संवत् का प्रारम्भ ई. पू . ५७ व ५८ के मध्य राजा विक्रमादित्य के द्वारा किया गया | यह संवत् धार्मिक महत्त्व का है तथा भारतीय वर्ष की शुरुआत ‘गुढीपाडवा’ से मानते हैं |

भले ही विक्रम संवत् सारे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो भी वह सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार वर्ष के दिनों में हमेशा कम या अधिक होते रहने के कारण दिन और महीनों की ठीक से गिनती करना सर्वसाधारण लोगों के लिए संभव हो नहीं पाता | इसी कारण से सारे देश में एकरूपता लाने के लिए भारत सरकार ने शक, संवत् में योग्य प्रकार से संशोधन कर ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ (पंचांग) ई.स. १९५७ में २२ मार्च से शुरू किया | (उस दिन भी संवत् १८२७ की चैत्र शुद्ध प्रतिपदा ही थी)

शक संवत् शक राजाओं के काल में शुरू हुआ था | दक्षिण की ओर के ब्राहमण ज्योतिष की गणना करने के लिए अथवा जन्म पत्रिका बनाने के लिए इसको उपयोग में लाते हैं | ई.स. की अपेक्षा शक संवत् ७८ वर्षों से पीछे (कम) है |

आजकल प्रायः सभी देशों में व्यवहारिक रूप से ही सही ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है | धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम और कुछ अन्य धर्मावलम्बी धार्मिक पारिवारिक कार्यों के लिए अपने-अपने पंचांग या तिथि पत्रक उपयोग में लाते हैं | इसी तरह वित्त वर्ष पहली अप्रैल से ३१ मार्च तक बहुत से स्थानों पर माना जाता है |  
                           

Sunday, 23 December 2018

२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री - शिरीष सप्रे


२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री
शिरीष सप्रे

क्रिसमस का वृक्ष जर्मनी के संत निकोलस से सम्बद्ध माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष की ऐतिहासिकता के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं | तथापि, क्रिसमस वृक्ष की परंपरा का उद्गम जर्मनी से माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष का वर्णन सर्वप्रथम १६०५ में मिलता है | इसका प्रचलन सर्वप्रथम जर्मनी में हुआ जिसका शुभारम्भ मार्टिन लूथर ने किया | क्रिसमस वृक्ष को सजाने की परंपरा आठवीं सदी में जर्मन धर्म प्रचारक बोनिप्रेस ने शुरू की थी, जबकि बहुत से लोग इसका श्रेय मार्टिन लूथर को भी देते हैं |

क्रिसमस का त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में विश्व के समस्त केथोलिक एवं प्रोटेस्टंट ईसाई धूमधाम से मनाते हैं | ईसाइयों का यह लोकप्रिय उत्सव है | जितना यह व्यापक तौर पर मनाया जाता है उतना धनी उत्सव और कोई नहीं | क्रिसमस वृक्ष की पहचान संभवतः बर्फीले प्रदेशों में  उत्पन्न होनेवाले ‘पाइन ट्री’ से की गई है | इसकी विशेषता यह है कि ठंड में भी यह वृक्ष न तो कुम्हलाता है ना ही मुरझाता है | इस वृक्ष को सदाबहार मानकर जर्मनी के धार्मिक जगत में इसके प्रति श्रद्धा, भक्ति, और निष्ठा प्रदर्शित की जाती है | पहले यह वृक्ष परंपरा का द्योतक था किन्तु, बाद में इसे धार्मिक आस्था का चोला पहनाकर होली क्राइस्ट के साथ सम्बद्ध कर दिया गया |

वृक्ष की पूजा करना यूरोप के मूर्तीपूजकों में एक सामान्य बात थी | ईसाई धर्म ग्रहण करने के बाद भी यह प्रथा उन लोगों में प्रचलित थी | स्केन्डेनविया के लोग क्रिसमस के अवसर पर पक्षियों के वृक्ष लगाते थे | यह प्रथा काफी समय तक प्रचलित रही | इसके पीछे उनकी यह धारणा थी कि ऐसा करने से घर में बुरी आत्मा प्रवेश नहीं करती | जर्मन के लोगों में मध्यशीत के अवकाश में अपने घरों के प्रवेशद्वार पर थेल ट्री लगाने की प्रथा का प्रचलन था |

क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा का सबंध जर्मनी की सेक्सको बर्ग नामकी रियासत के राजकुमार अल्बर्ट (१८४०-१८६१) से भी जोड़ा जाता है | ई. १८४० में राजकुमार अल्बर्ट ने इंगलैंड की महारानी विक्टोरिया से विवाह किया था | राजकुमार अल्बर्ट ने ही सर्वप्रथम १८४१ में विन्डसर केसले में क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा को समारोहपूर्वक आरंभ किया था | राजकुमार अल्बर्ट द्वारा स्थापित इसी परंपरा को तदुपरांत अंग्रेज ईसाईयों ने अपना लिया | 

 जर्मनवासी २४ दिसंबर को आदम और ईव्ह (हव्वा) के भोज के उपलक्ष्य में स्वर्ग के पेड़ (पैराडाईज ट्री) को सजाते थे |  जिस पर वेफर लटके रहते थे | यह मेजबानी के प्रतीक और ईसाइयों के उद्धार का संकेत था | बाद में विविध प्रकार की कूकीज ने वेफर का स्थान ले लिया | क्राइस्टके प्रतीक के रुप में मोमबतियां सजाई जाती थी |

हरियाली सदा खुशहाल जीवन का प्रतीक क्रिसमस ट्री सभी के लिए खुशी की मंगल कामना का धोतक है | क्रिसमस ट्री के बारे में यह कथा प्रचलित है कि एक लकड़हारा जंगल में अपने परिवार के साथ रहता था | जाड़े की एक रात में वह आग ताप रहा था की तभी किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया | उसने दरवाजा खोला तो उसे बर्फ में खड़ा एक लड़का दिखाई दिया | वह उसे घर के भीतर ले आया | उसने उस लडके को भोजन कराया और फिर सब सो गए |

आधी रात को सारा जंगल नाच गाने से गूंज उठा | लकड़हारे के घर के सब लोग जाग गए | उन्होंने देखा कि वही लड़का नाच गा रहा है तथा परियां और देवदूत भी उसका साथ दे रहे हैं | लकड़हारा समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है | वे स्वयं प्रभु थे | जाते समय वही बालक लकड़हारे के घर के आगे एक पेड़ लगा गया, जो लकड़हारे की हर इच्छा पूरी करने लगा | यही बाद में क्रिसमस ट्री के नाम से मशहूर हो गया और बाद में हर क्रिसमस पर उस दिन की स्मृति में क्रिसमस ट्री घर के आगे लगाने की प्रथा चलन में आई |

क्रिसमस वृक्ष को अपनाएं जाने की यह परंपरा धीरे धीरे योरोपीय राष्ट्रों में पनपने लगी | कुछ समय पश्चात् डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे के उत्तरी भागों में रहनेवालों लोगों ने इस वृक्ष को प्रतिष्ठा दी | चूंकि डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे में पर्याप्त और घने जंगल थे अतः वहां के लोगों ने इन जंगलों से क्रिसमस वृक्षों के छोटे-छोटे पौधों को अपने आवासों में स्थान दिया | साथ ही आवासों में इस वृक्ष को सजाने-संवारने की प्रथा आरंभ की | चीन और जापान में इसका प्रचलन १८वीं और १९वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ | यहां क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी कागजों की सुन्दर डिज़ाइन द्वारा सजाया जाता है |

अमेरिका में सत्रहवीं शताब्दी में इस प्रथा का शुभारम्भ जर्मनवासियों के अमेरिका में बसने से हुआ | इस संबंध में यह भी कहा जाता है कि सम्राट जार्ज तृतीय के समय जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी ने क्रिसमस की रात क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया | इसके बाद वहां के लोग इसका अनुसरण करने लगे | जिससे यह परंपरा एक प्रथा बन गई |

इंगलैंड के केल्ट जाति के पुरोहितों ने क्रिसमस वृक्ष की परंपरा को धार्मिक उत्सव के रूप में जीवित किया और इन्हीं से संसार के ईसाई जगत को इस क्रिसमस वृक्ष की धार्मिक परंपरा विरासत में प्राप्त हुई | कैथलिक पादरियों के अनुसार यह वृक्ष पूजनीय एवं वन्दनीय होकर आशा, शांति और ज्ञान का प्रतीक है |          

     


          

Sunday, 9 December 2018


प्राणी जगत का एक विलक्षण प्राणी है – मकड़ी – भाग ३

शिरीष सप्रे 




मकड़ियों के बुने हुए कलात्मक जाले इन्हें एक दक्ष इंजिनियर प्रमाणित करते हैं | शिल्पकार के रूप में मकड़ी कीट जगत का एक अद्भुत प्राणी है | दुनिया के लगभग हर हिस्से में मकड़ियां पाई जाती हैं | सबसे छोटी मकड़ी का आकार आलपिन के ऊपरी सिरे जितना बड़ा होता है, जबकि  दक्षिण अमेरिका में पाई जानेवाली माइगेल नामक मकड़ी सात  से. मी. लम्बी होती है | इसकी टांगे करीब अठराह  से. मी. लम्बी होती है | यह विशालकाय मकड़ी छिपकली और छोटी चिड़ियाओं तक को खा जाती हैं |

मरुस्थलीय क्षेत्रों, दलदली जंगलों तक बर्फीले प्रदेशों में भयानक किस्म की जहरीली मकड़ियां पाई जाती हैं | उनमें से एक है मैक्सिकन टोरनटुला | यह छोटे-छोटे चूहों तक को खा जाती है और इसके घातक विष से मनुष्य की मृत्यु तक हो सकती है | इसी प्रकार अमेरिका में पाई जानेवाली ब्लैक विडो (काली विधवा) नामक मकड़ी इतनी जहरीली होती है कि यदि यह एक बार किसी को काट ले तो उसका बचना लगभग असंभव होता है | ब्लैक विडो के शरीर में विष बहुत कम मात्रा में बनता है |

मकडी की प्रणय क्रिया बहुत रोचक होती है | आकार में नर, मादा की अपेक्षा छोटा होता है | मादा को आकर्षित करने के लिए नर बहुत्त समय तक नृत्य करता है इसके पश्चात् नर और मादा क्रमशः जाले के एक-एक तार को एक के एक बाद खींचते जाते हैं | यह क्रम कार्य समाप्ति तक चलता रहता है फिर मादा अक्सर नर को खा जाती है | मकड़ियां दो से लेकर तीन हजार तक अंडे देती हैं | अंडों से बच्चे निकलने के बाद भूख के कारण यह एक दुसरे को खाने लगते हैं |

साधारण घरेलू मकडी को जैव वैज्ञानिक भाषा में थेरीडियोम कहा जाता है |  मकड़ियों का मुख्य भोजन कीट-पतंगे और कीडे-मकोडे है | जाला बनाकर शिकार को फसाने की कला में माहिर होने के कारण मकड़ियां आसानी से अपना पेट भर लेती हैं | कई मकड़ियां बिना खाए पिए साल डेढ़ साल तक जिन्दा रह सकती हैं | कुछ मकड़ियां घुमंतु अथवा पर्यटनप्रिय होती हैं | ये घोर आंधी में भी सहज भाव से सैंकड़ों-हजारों मील की उडान भरकर अपनी यात्रा बिना रुके तय कर लेती हैं | एक मकड़ी तो ऐसी भी होती है जो आकार में चींटी जैसी होती है और दीखती भी चींटी जैसी ही अधिकांश पक्षी मांस भक्षी पक्षियों को चींटी का मांस पसंद नहीं होता अतः इसका लाभ इसे मिल जाता है और चींटी बच जाती है | ट्रेपडोर मकड़ी के जाल में एक द्वार ऐसा होता है जिसमें से कीट, पतंगा, मक्खी, आदि अन्दर तो आ सकते हैं पर बाहर नहीं आ सकते |

मकड़ियों के जाल के तार इतने महीन होते हैं कि सैंकड़ों तारों को मिलाकर भी बाल जैसी मोटाई तैयार नहीं हो पाती | लेकिन महीन होने के बावजूद यह काफी मजबूत होते हैं | दरअसल यह जाल रहस्यों से भरे किसी पिटारे से कम आश्चर्यजनक नहीं, जिसका अस्तित्व लगभग २० करोड़ वर्षों से धरती पर बना हुआ है | इतने सालों में मकड़ी ने अपने जाले की बुनावट में जो सुधार किए हैं, उसकी कल्पनाशीलता को देखकर वैज्ञानिक तक आश्चर्य में पड गए हैं | मकड़ियों द्वारा तैयार की गई कुछ संरचनाएं ऐसी हैं कि मनुष्य के द्वारा अभियांत्रिकी के क्षेत्र में की जा रही खोजों को फीका साबित करने लायक सिद्ध हुई हैं |

 मकड़ी जाले के धागों में एक खास प्रकार का चिप-चिपा लगाती हैं, जिसके कारण जाल में फसा शिकार लाख कोशिशे करे छुट नहीं पाता, बल्कि और अधिक फसता चला जाता है | दरअसल मकड़ी का जाला एक किस्म की रेशम से  बना होता है | यह मकड़ी रेशम दुनिया में पाए जानेवाले सबसे मजबूत प्राकृतिक पदार्थों में से एक है | मकड़ी का जाल दुनिया की सबसे मजबूत चीजों में से एक है | अमेरिकी सेना इन मकड़ियों के रेशों से बुलेटप्रूफ जैकेट बनाती है | यह रेशा मनुष्य की जानकारी में आया दुनिया का अब तक का सबसे मजबूत पदार्थ है, यह स्टील से भी अधिक मजबूत और टिकाऊ है |

 यदि मकड़ी रेशे को कार्बन रेशे के साथ मिश्रित कर दिया जाए तो एक बहुत मजबूत पदार्थ बनता है, जो बहुत मुलायम भी रहता है | इस रेशे के कई उपयोग हैं | जैसे एक उपयोग तो यह है कि हड्डीयों को आपस में से जोड़ने वाले तंतु टूट जाने पर इस रेशे को वहां लगाया जा सकता है | मकड़ी का रेशा हमारे तंतुओं से २० गुना ज्यादा मजबूत है |

दरअसल अलग-अलग मकड़ियों के जालों की ताकत अलग-अलग होती है | दक्षिण अमेरिका में पाई जानेवाली एक मकड़ी ‘ब्लैक विडो’ (लैक्ट्रोडैक्स मेक्टन्स) सबसे मजबूत रेशम बनाती है | ब्लैक विडो का बनाया रेशम इतना मजबूत होता है कि इसे इसकी मूल लम्बाई से २७ प्रतिशत और खींचा जा सकता है और यह टूटता नहीं | कल्पना कीजिए कि मकड़ी के इस रेशम की मोटाई कितनी होगी | शायद ०.१ मि. मी. से भी कम, इतने पतले स्टील के तार को भी आप खींच कर सवा गुना नहीं कर पाएंगे | बाकी मकड़ियों के रेशम की ताकत इससे आधी ही होती है |

 बात इतनी ही नहीं दरअसल ब्लैक विडो दो किस्म के रेशम बनाती है | दूसरे किस्म का रेशम तो और भी असाधारण होता है | यह खींचतातो उतना नहीं है, मगर इसे तोड़ने के लिए काफी ताकत लगानी पड़ती है | हाल के अनुसंधान से पता चला है कि इसे तोड़ने के लिए जितनी ताकत लगती है, वह बुलेट प्रूफ जैकेट में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ केवलार से भी अधिक है |

तात्पर्य यह है कि घरों में बेमतलब दिख पड़ने वाला और गन्दगी का प्रतीक मानकर साफ कर दिए जानेवाला मकडी का जाला शोधकर्ताओं के लिए रहस्य का केंद्र बिंदु बना हुआ है | नए-नए शोधों से अभी न जाने कितने रहस्यों का प्रकटीकरण होगा, किन्तु एक बात निश्चित है कि अब तक जो कुछ भी जानकारी सामने आई है वह अभियांत्रिकी के क्षेत्र में एक नई दिशा साबित हो सकती है |