Sunday, 22 April 2018

दक्षिणाकाश का तेजस्वी नक्षत्र भगवान अगस्त्य - भाग 1 शिरीष सप्रे

दक्षिणाकाश का तेजस्वी नक्षत्र भगवान अगस्त्य - भाग 1
शिरीष सप्रे

दीर्घदर्शी और समयज्ञ ऋषी अगस्त्य का उल्लेख सबसे पहले ऋगवेद के प्रथम मंडल में देखने को मिलता है। वे ऋचाओं और मंत्रों के द्रष्टा और स्रष्टा हैं। धर्मपत्नी लोपामुद्रा (विदर्भ नरेश मलयध्वज की पुत्री। इससे विवाह कर मुनिवर ने संभवतः प्रथम ही अंतरदेशीय विवाह की प्रथा का शुभारंभ किया। विदर्भ में अमरावती नगरी के निकट सालबर्डी नामक गांव में अगत्स्य ऋषि का आश्रम था और उनके दक्षिण की महान यात्रा की आरंभ स्थली यही है, इस प्रकार की जनश्रुति है।) के साथ भी उनका उल्लेख संयुक्त रुप से पढ़ने को मिलता है। सामवेद के पंचम और द्वादश अध्याय में भी उनका उल्लेख यहां-वहां हुआ है। परंतु, एकाकी ही लोपामुद्रा के साथ संयुक्त रुप से नहीं। इसके पश्चात आदिकाव्य वाल्मिकी रामायण के अरण्यकांड के द्वादश और त्र्योदश सर्ग तथा उत्तरकांड के 34वें और 35वें सर्ग में अगस्त्य तथा भगवान राम की भेंट वार्ता और दिव्यास्त्र प्रदान करने की गाथा पढ़ने को मिलती है। 

दक्षिण दिशा के निवास के दौरान राम का मन सारे ऋषिवृंद में यदि कहीं विशेष रुप से आकृष्ट हुआ था तो वह भारतीय संस्कृति का शुभ संदेश लेकर दक्षिण की ओर चल पडनेवाले महामुनि अगस्त्य की ओर ही। भगवान अगस्त्य से श्रीराम को दंडकारण्य का पूर्वइतिहास किस प्रकार से इक्ष्वाकु कुल से संबंधित था का पता चला। वैसे वंश परंपरा से यह उन्हें ज्ञात ही होगा। विंध्य और शैवल पर्वत के मध्य भाग में स्थित इस अरण्य प्रदेश में उन्ही के पूर्वज इक्ष्वाकु के पुत्र दंड ने अपने राज्य का निर्माण कर अनेक वर्षों तक राज्य किया था।

उस काल में आर्यावर्ती प्रदेश से दक्षिण देश की ओर जाना अत्यंत कठिन कार्य था। घोर अरण्यों से तथा वन्य पशुओं से यह मार्ग भरा हुआ था। यहां की जंगली जातियों का भी बहुत भय था। रामायण के लंका कांड में इन क्रूर राक्षसों की विकट लीलाओं का वर्णन मिलता है। इल्वल तथा वातापी नामके राक्षस संभवतः इसी प्रदेश के निवासियों के नेता थे। उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाले इस महान यात्री मुनि ने अपने निवास से दक्षिण देश की भूमि को पवित्र किया। अगस्त्य ने यहां के निवासियों के मन पर विजय प्राप्त की। इस समस्त भूप्रदेश को आवागमन के योग्य बनाने का प्रचंड कार्य करने में वे सफल हुए। इस बात का प्रशंसापूर्ण उल्लेख वाल्मिकी रामायण के अरण्यकांड में है। वास्तव में दुर्गम दक्षिण में सर्वप्रथम आनेवाले अगस्त्य ही भारतीय संस्कृति के अग्रदूत हैं। दक्षिण में यज्ञसंस्था का प्रारंभ करने का श्रेय इन्हीं को देना चाहिए। दक्षिण देश के राजाओं तथा सामंतों ने यज्ञ विधि को अपनाया।

अनैतिक धन, भोजन न स्वीकारना, लोकहित के मूल्य पर अपना व्यक्गित हित साधना से बढ़कर पाप नहीं। लोकरंजन, लोकमंगल के कार्य से रोकना या व्यवधान उत्पन्न करना उचित नहीं इन आर्य मूल्यों के विपरीत सुदुर दक्षिण में निविड अंधकार, अज्ञान का अंधकार, घनीभूत होकर आक्रांत कृण्वंतो विश्वम्‌ आर्यम्‌ का उद्‌घोष करनेवाली आर्य संस्कृति आचारहीन, विचारशून्य, कुरीतियों का पालन, घृणिंत परंपरा का प्रचलन, आध्यात्मिक ज्ञान का नितांत अभाव, भूत-प्रेत की आराधना, संस्कार संपन्नताविहीन, भडकीले वस्त्राभूषण, मदिरापान, वासनापूर्ति में लिप्त, शिष्टता-सभ्यता से दूर (किसीका भी वरण), त्याग-तपस्या-बलिदान से घृणा, पुनर्जन्म, परलोक में आस्था नहीं, सबल द्वारा निर्बल का शोषण, पशु-पक्षी तक सुरक्षित नहीं, गो भक्षण, नरभक्षी, ऋषियों का भक्षण, पिशाचता, पाश्विक वृत्तियों वाली रक्ष संस्कृति से पीडित थी। दक्षिणापथ एवं दंडकारण्य को मुक्त कराने, आर्यों को अत्याचार, भय और दुःख से मुक्त ना करा लूंगा उत्तरापथ नहीं लौटूंगा का प्रण लेकर दक्षिणापथ की ओर प्रयाण कर अगत्स्य ने दक्षिणापथ में सुरक्षित रहने की अविश्वनियता को समाप्त किया।

प्रत्येक पुराण में यत्किंचित ही क्यों ना हो अगस्त्य से संबंधित वृत या घटना का उल्लेख मिलता है। इतिहास एवं काव्य में भी अगस्त्य का आख्यान यहां-वहां मिलता है। राष्ट्रीय-अस्मिता तथा सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा की रक्षा के लिए जो आगे चलकर श्रीराम ने व्यापक स्तर पर किए उनका शुभारम्भ अगस्त्य ने ही किया था। यही नहीं अगस्त्य पहले आर्य ऋषि थे जिन्होंने आत्मकल्याण की तुलना में लोककल्याण की महत्ता प्रतिपादित की। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की दिशा में कुछ पग उठाए। शम्बर, इल्बल तथा कालकेयों का वध कर राष्ट्र को निरापद बनाने का स्तुत्य प्रयास किया। इस महान यात्री के संकल्प में पहली बाधा विंध्याद्रि ने उपस्थित की। आर्यावर्त की सीमा पर खडा रहकर मेरु पर्वत की उत्तुंगता के साथ प्रतिस्पर्धा करनेवाला विंध्याद्रि आर्यावर्त के यात्री का मार्ग रोकना चाहता था। परंतु, अपनी दिव्य तपस्या के बल पर अगस्त्य ने विंध्याद्रि पर विजय प्राप्त की, विंध्याद्रि को नम्र बनाया। 

उस काल में जन सामान्य यह मानने लगा था कि, विंध्य अनवरत ऊंचा उठ रहा है परंतु, सत्य क्या है? भूगर्भ में घट रही अकल्पनीय घटनाओं, परिवर्तनों के कारण ऐसा तो कभीकभार ही होता है फिर वास्तविकता क्या है? विंध्य हिमालय की भांति दुर्लघ्य तो नहीं परंतु, विंध्य के पगतल में विस्तृत क्षेत्र में रहने पर संस्कृति संकरता, संस्कार विलुप्तता तथा जीवन सुरक्षा की अनिश्चितता के भय से दुर्लघ्य प्रचारित हो गया था। अतः मेधावी व्यक्ति, तपस्वी दंडकारण्य तो क्या उससे दूर रहनेवाले ऋषियों ने भी स्वयं को सीमित कर लिया। परंतु, अगस्त्य ने दक्षिण में प्रवेश कर वैदिक संस्कृति को व्यापक आयाम देने का सबल प्रयास किया।

इसका अर्थ यह नहीं कि इसके पूर्व दक्षिण भारत में आर्य थे ही नहीं। क्योंकि, ऐसा मानने का अर्थ होगा कि दक्षिण भारत में केवल अनार्य जातियां थी और वहां वैदिक कर्मकांड नहीं होते थे और गुरुकुल भी नहीं थे न ही ऋषि आश्रम। पुराणों में उपलब्ध अंतर्साक्ष्य तथा तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश पर विचार करने पर इसकी पुष्टि नहीं होती। कहा जाता है कि वृत्तासुर के अत्याचारों से पीडित आर्यों व देवों की रक्षार्थ इंद्र ने इसी क्षेत्र में निवसित आर्यऋषि दधीचि की अस्थियां लेकर वज्र बनाया था तथा इसी वज्र से युद्ध कर वृत्रासुर का वध किया था और उसके सजातिय कालकेयों द्वारा पीडित आर्य व आर्य ऋषियों की रक्षा अगस्त्य ने की थी। यदि एक क्षण के लिए हम इन सबको अपनी दृष्टि से ओझल कर दें तो भी यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि वहां आर्य थे ही नहीं। यदि नहीं थे तो अत्याचार किन पर होता था? असुर जातियां किनके यज्ञों का ध्वंस करती थी? 'निशिचर निकर सकल मुनि खाए," तुलसी ने यह किनको दृष्टि में रखकर लिखा था? निष्कर्षतः समस्त प्रश्नों का उत्तर यही है कि, अगस्त्य के पहुंचने के पूर्व आर्य ही नहीं, आर्य ऋषि भी वहां रहते थे।

तो फिर अगस्त्य के संबंध में ऐसा क्यों कहा जाता है। ऐसा लगता है कि तत्कालीन दक्षिण भारत में जो वन्य जातियां रहती थी वे थी तो आर्य जाति से संबंधित परंतु, असंस्कारित थी और इसका कारण था दक्षिण भारत में जो गुरुकुल या आश्रम थे वे असुर जाति के प्राबल्य तथा वन्य जातियों के औदास्य भाव के कारण इन लोगों को वैदिक विचारधारा में दीक्षित करने का व्यापक स्तर पर सफल प्रयास कर नहीं पा रहे थे। करते भी कैसे? वे तो स्वंय ही अस्तित्व रक्षा के संघर्ष में उलझे हुए थे और उसमें भी सफलता प्राप्त हो लेने की स्थिति में नहीं थे। उनकी इस दुर्दशा पर उत्तर भारतीय दुखी एवं चिंतित तो थे ही, अपने आपको असहाय भी अनुभव करते थे। अतः उत्तर भारतीय आर्यों को दुर्दशा से बचाने के लिए यह प्रचारित कर दिया कि, विंध्य हिमालय की उच्चता से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। अतः दक्षिण भारत में जाना असंभव है।

किंतु अगस्त्य ने लोगों द्वारा प्रसारित इस भ्रांत धारणा का खंडन करते हुए दक्षिण भारत में जाने का साहसिक पग उठाया तथा वहां जाकर तत्द्देशीय आर्यों को सुरक्षित ही नहीं तो सुसंस्कारित करने का भी उल्लेखनीय कार्य किया। अतः लोगों ने उस समय तक मित्रावरुणी, महामुनि, और्वश्य तथा कुंभज आदि नामों से अभिहित साहिसिक ऋषि को 'अगं पर्वतं स्तम्भयति इति अगस्त्यः" के सिद्धांतानुसार अगत्स्य नाम से पुकारना प्रारंभ कर दिया और आगे आनेवाली पीढ़ियों ने उन्हें चिरस्मृत बनाए रखने के अभिप्राय से एक तारे को ही अगत्स्य संज्ञा से संबोधित करना प्रारंभ कर दिया। जो आज भी प्रचलित है और वर्तमान पीढ़ि को उस ऋषि के महत्व का स्मरण दिलाता है। .....

Friday, 9 March 2018

क्या कठपुतली कला नष्ट हो जाएगी? - शिरीष सप्रे

क्या कठपुतली कला नष्ट हो जाएगी?
शिरीष सप्रे

प्राचीन भारतीय संस्कृति के वैभवशाली इतिहास और परंपराओं के संबंध में बोलते समय हर भारतीय अपने प्राचीन देवालयों, जो विशिष्ट शैलियों में बने हैं, संगीत, नृत्य, चित्रकला, आदि के बारे में बिल्कूल सहज भाव से बोलता चला जाता है। किंबहुना, इन कलाओं से ही भारतीय संस्कृति का एक चित्र संपूर्ण विश्व के सामने आ जाता है। परंतु, इन कलाओं के साथ ही अथवा उनसे भी अधिक प्राचीन एक भारतीय कला जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी है। हमारे द्वारा बहुत दुर्लक्षित हुई है और इस कारण यह कला कहीं हमारे देश से ही अस्तंगत तो नहीं ना हो जाएगी की परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। यह कला है 'कठपुतली कला"। वर्तमान में हमें यह कला टी. व्ही. के कुछ कार्यक्रमों में शीर्षक दिखलाते समय सामने आनेवाली गुडियाओं के रुप में नजर आती है।

यदि इस कला का इतिहास देखें तो यह लोक कला जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ प्रचार-प्रसार का माध्यम भी है, भारत की ही विश्व को देन है परंतु, अब लुप्त होने की कगार पर है। ई.पू. चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी के नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है। कठपुतली शब्द संस्कृत के 'पुत्तलिका" या 'पुत्तिका" और लैटिन के 'प्युपा" से मिलकर बना है जिसका अर्थ है छोटी गुडिया। पुत्तलिका शब्द निःसंदेह अत्यंत प्राचीन है क्योंकि वेदों में भी इसका प्रयोग हुआ है। अथर्ववेद में शत्रु का पुतला बनाकर मंत्र द्वारा जलाने का उल्लेख है। सिंहासन बत्तीसी की पुतलियों की कहानी भी बहुत प्रसिद्ध है। 

भारत से तुर्कस्थान होते हुए युरोप में यह कला गई और वहां से अन्यत्र फैली। बौद्ध धर्म के साथ श्रीलंका, इंडोनेशिया, चीन, जापान इन स्थानों पर कला का प्रचार-प्रसार और विस्तार हुआ। कहा जाता है कि, राजाश्रय से जिस प्रकार अन्य कलाओं का विकास हमारे यहां हुआ उसी प्रकार से डोरियोंवाली पुतलियों की कला का विकास भी हुआ। नाट्यकला का उद्‌गम इन्हीं के रंगमंच से हुआ ऐसा भी कहते हैं। इन कठपुतली-नाट्य के लिए संहिता लगती है, नृत्य-गान, संवाद प्रेषण, नैपथ्य, वेशभूषा, रंगभूषा, दिग्दर्शन इन सब नाट्यांगों का ज्ञान कठपुतली कलाकारों को होना आवश्यक है। अन्य सभी कलाकारों के समान राजा की स्तुती, उसके मनोरंजन के साथ ही ईशस्तुती और रामायण-महाभारत इन महाकाव्यों के प्रसंग इस कला के माध्यम से प्रस्तुत किए जाते हैं।

मूलतः कठपुतली का खेल दिखानेवाली विशिष्ट जमातें होती थी और उनके पास इन कलाओं को संजोए रखने की विरासत होती थी जो पीढ़ि दर पीढ़ि आगे बढ़ती रहती थी। उनके पास इस कला का उत्तराधिकार पीढ़ि दर पी़ढि सुरक्षित रहता था जो आगे की पीढ़ि को हस्तांतरित होता रहता था। उन्हें कठपुतलियां बनाना, उनके कपडे, पट-नैपथ्य-मंच व्यवस्था-रंगभूषा-केशभूषा-प्रस्तुती आदि कला कोशल और हुनर का काम तो होता ही था सिवाय इसके साथ संगीत, गायन, वादन, नृत्य, संवाद अदायगी, नाद-लय-स्वर, संभाषण कला, संवादों का उच्चारण, देहबोली, स्वर नियंत्रण आदि का ज्ञान भी आवश्यक होता था। इन नाटकों के कथानक भी परंपरागत पुराण कथाओं पर आधारित रहते थे। इस कारण एक जमात के लोग या परिवार के सदस्य मिलकर इन उपर्युक्त कला प्रकारों को उपयोग में लाकर प्रयोग करते रहते थे। भिन्न-भिन्न प्रदेशों की भाषा और उन प्रदेशों की कथाओं के अनुसार उनकी संहिता बनी रहती थी। वैसे ही कई स्थानों पर देवताओं और दानवों की कठपुतलियों के लिए कौनसे रंग और वस्त्र उपयोग में लाना तय रहता था। चमडा उपयोग में लाना हो तो कौनसे प्राणी का यह भी तय रहता था और उसीके अनुसार कठपुतलियां बनाई जाती थी।

भारत के राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडू, ओरिसा, बंगाल, हिमाचल प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों में यह परंपरा दिख पडती है। राजस्थान की कठपुतलियों की जानकारी तो यहां के लगभग सभी लोगों को है की कठपुतलियां लकडी की होती हैं। इनके संबंध में कथा है कि, सादी लकडी की कठपुतलियां बनाकर निर्वाह करनेवाला एक व्यक्ति था। हमेशा की तरह शंकर-पार्वती रात्री भ्रमण पर निकले थे तभी पार्वती की दृष्टि इन कठपुतलियों पर पडी और हमेशा की तरह उन्होंने हठ पकडा कि, 'हे कैलाशनाथ इन कठपुतलियों में प्रवेश कर अपन नृत्य करें"। और दुकान के अंदर की दो कठपुतलियां अचानक नाचने लगीं। दुकानदार जाग गया एवं भयभीत होकर ईश्वर की प्रार्थना करने लगा। नृत्य समाप्ति के पश्चात शंकर-पार्वती उसे दर्शन दे आशीर्वाद देते हुए बोले, 'वत्स, इन कठपुतलियों को  डोरियां बांध उनकी हलचलों के माध्यम से जिस प्रकार हमने नृत्य किया उसी तरह से तू लोगों को दिखला। तेरी कला अजराअमर हो जाएगी" और तभी से इस कला का जन्म हुआ।

राजस्थान में तो इस कला को दिखलानेवालों का एक समाज ही है और एक गांव का तो नाम ही 'कठपुतली" है। इन कठपुतलियों की विशिष्टता यह है कि, इनकी डोरियां कलाकारों के हाथों की उंगलियों से जुडी रहती हैं और कलाकार की उंगलियों की हरकतों पर ही उनके नृत्यों की विविधता अवलंबित रहती है। इन पुतलियों की एक और विशिष्टता यह है कि, इन्हें पांव नहीं होते। इनके कपडे इस प्रकार से बने होते है कि इस कारण उनके पांव हैं ऐसा लगे। केवल उंट या घुडसवार कठपुतलियों के ही पांव होते हैं।
यूरोप में इस प्रकार की डोरियोंवाली कठपुतलियों को 'मॅरिओनट्‌स" कहा जाता है। उनके हाथ-पांव और अन्य जोड मानवी जोडों के समान ही रखकर हरएक जोड की हलचल के लिए एक डोर अलग से होती है और इन सभी डोरों का दूसरा सिरा कलाकार के हाथ एक या अधिक लकडी पट्टियों से जुडा होता है विशिष्ट डोर खिंची की तयशुदा हलचल दिखती है। केवल कौनसी डोर किस हलचल के लिए है यह ज्ञात होना चाहिए। राजस्थानी कठपुतलियों की तुलना में इनको नचाना आसान होता है। 

कठपुतलियों का एक बिल्कूल ही भिन्न प्रकार छाया कठपुतलियां महाराष्ट्र की सावंतवाडी के निकट पिंगळी(ली) नामक स्थान पर देखने को मिलता है। जो चित्रकथी नाम से अधिक जाना जाता है। वैसे ही यहां उपयोग में लाई जानेवाली छोटी कठपुतलियां भी आंध्र, कर्नाटक की छाया कठपुलियों से समानता दर्शाती हैं। इन कठपुतलियों के कपडों की बनावट, डिजाईन आदि पर मुगल शैली का प्रभाव दिख पडता है। परंतु, इनके राजाओं और देवताओं के मुकुट भर पैठण शैली के चित्रों में नजर आते हैं उस प्रकार के हैं।

कर्नाटक में कठपुतलियों को 'सिक्की" कहते हैं। कर्नाटक के ये खेल जोशपूर्ण और जीवनस्पर्शी होते हैं। इनके भी विषय अधिकतर रामायण-महाभारत के ही होते हैं। आंध्र की कठपुतलियों को 'तोलू कम्मलय" कहते हैं। आंध्र की कठपुतलियां अन्य राज्यों की तुलना में बहुत बडी होती हैं। इनके भी कपडों और जवाहारातों पर मुगल शैली का प्रभाव दिख पडता है। केरल में कठपुतलियों को 'पवई कथू" कहते हैं। केरल और तमिलनाडू इन दोनो ही स्थानों पर मुगल शैली का ही प्रभाव दिख पडता है। ओरिसा और बिहार में इन्हें 'रावण छाया" कहते हैं। पश्चिम बंगाल की कुछ कठपुतलियां भी प्रसिद्ध हैं।

चित्र, शिल्प, नृत्य, संगीत आदि कलाओं में जिस प्रकार से अपने-अपने प्रदेशानुरुप विविधता होती है वैसीही परंपरागत कठपुतलियों  की कला में भी दिख पडती है। अपने ही उत्तराधिकारी को कला सीखाने की गुरु-शिष्य परंपरा इन कलाकारों ने बनाए रखी और इसी कारण से इन कलाकारों की संख्या हमेशा कम ही रही। मेलों, उत्सवों में डेरों में घूमनेवाले घूमंतू जमातों तक ही यह कला मर्यादित रहने के कारण अन्य कलाओं के समान इस कला को सम्मानीय स्थान नहीं मिल पाया। परिणामतः जैसा चाहिए वैसा इस कला का विकास हो नहीं पाया और इस कला का विकास रुक गया। जब अन्यत्र इस कला का मुक्त उपयोग हो रहा है वहीं इस कला के उत्तराधिकारी इस कला से विमुख हो अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर हो रहे हैं, इस कला को सीखने के प्रति उत्सुक भी नहीं।  

Tuesday, 13 February 2018

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य - शिरीष सप्रे

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य
शिरीष सप्रे
शिवजी की उपासना पूरे भारत में अनादिकाल से चली आ रही है। भगवान शिव शंकर की हर बात निराली और रहस्यमय है। उनका सारा क्रियाकलाप विरोधाभासों से भरा हुआ है। शिव की नगरी काशी में तो शिव का प्रतीक शव को मानकर लोग सिर पर हाथ रखकर प्रणाम करते हैं। शिवजी की उपासना दो प्रकार से करते हैं। शिवलिंग और शिवमूर्ति के रुप में। अधिकांश मंदिरों में शिवलिंग के रुप में ही पूजा होती है।

शिवजी के हाथ में डमरु विश्व प्रतीक के रुप में है और ऐसा माना जाता है कि नाद की उत्पत्ति शिवजी द्वारा डमरु बजाने से हुई है। डमरु विश्व का अद्वैत भाव भी दर्शाता है। डमरु ज्ञान का उत्पत्ति स्थान है। महर्षि पाणिनी को  व्याकरण के बीज मंत्र डमरु के ध्वनि में ही मिले थे। कहते हैं स्वयं शिवजी ने उनके कान के पास डमरु बजाकर यह ज्ञान उन्हें दिया था। त्रिशूल का आयुध शस्त्र होकर उसके अनेक प्रतीकात्मक अर्थ हैं। वह चेतना की तीन स्थितियों जागृत, स्वप्न और निद्रावस्था को दर्शाता है। वह मानव के तीन तापों आधिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक को हरता है। एक शस्त्र के रुप में अभद्र, अमंगल और बुरी बातों को नष्ट करने की क्षमता का प्रतीक है। 

शिवजी का वाहन वृषभ यानी बैल है जो हमेशा शिवजी के साथ ही रहता है। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति में लिखा है 'वृषो हि भगवान धर्मः।" वेद धर्म को चार पैरोंवाला प्राणी कहते हैं। उसके चार पैर यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं और शिव इसी वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो उनके अधीन हैं। (इन्हें ही चार पुरुषार्थ भी कहा गया है, हिंदू धर्मानुसार पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है अर्थात हमारा ध्येय शिव की प्राप्ति होना चाहिए।)

अथर्ववेद में वृषभ को पृथ्वी का धारक, पोषक, उत्पादक बतलाया गया है। वृषभ एक राशि का नाम भी है। वृषभ किसानों और कृषि के लिए भी उपयोगी है। वृष का अर्थ मेघ भी है। वृष से ही वर्षा, वृष्टि आदि शब्द बने हैं। शिव अंतरिक्ष के देवता हैं और उनका एक नाम व्योमकेश भी है। अतः आकाश उनकी जटा स्वरुप है एवं जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं तथा वायु आकाश में व्याप्त रहती है। शिव जटाभार ब्रह्मांड के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रतीक है। शिवजी जटाधारी हैं और इस बारे में पुराणों में अनेक कथाएं है। गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्र स्वरुप उग्र और संहार के देवता हैं और उनकी उग्रता उनके मस्तिष्क में निवास करती है इसलिए शांति की प्रतीक गंगा और अर्धचंद्र शिव के मस्तिष्क पर विराजमान होकर उनकी उग्र वृत्ति को शांत और शीतल रखते हैं।

समुद्र मंथन के समय प्राप्त हलाहल विष का पान कर सृष्टि को बचाने के कारण उत्पन्न जलन को गंगा और चंद्रमा से शांति मिलती है। शिव का चंद्रमा स्वच्छ एवं उज्जवल है उसमें मलिनता नहीं। वह अमृत वर्षा करता है। क्योंकि, स्वयं शिव का विवेक सदैव जागृत रहता है और मस्तिष्क में कभी अविवेकी विचार नहीं पनपते। चंद्रमा का एक नाम सोम है जो शांति का प्रतीक है इसी कारण से सोमवार को शिव पूजन, दर्शन और शिवोपासना का दिन माना गया है। शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ है। चंद्रमा ने अपने शाप के निवारणार्थ शिवोपासना शिवलिंग स्थापित कर की और शापमुक्त हुआ। इसलिए इस शिवलिंग को सोमनाथ कहते हैं। त्रिनेत्रधारी शिवजी का एक निवास त्र्यंबकेश्वर है। त्र्यंबक (तीन नेत्र) धारी ईश्वर यहां है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को त्र्यंबकेश्वर महादेव कहते हैं। इस तीसरे नेत्र से ही शिवजी ने कामदेव का दहन किया था।

तमोगुणी सर्प या नाग को उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है। नागेश्वर एक ज्योतिर्लिंग का नाम भी है। हलाहल विष के पान से जिसे उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है उन्हें नीलकंठ भी कहते हैं। भारत में नागपंचमी को नागपूजन की परंपरा है। विद्वानों के मतानुसार नागपूजन आर्येत्तर संस्कृति को दर्शाता है। परस्पर विरोधी मतों में सामंजस्य निर्मित करनेवाले शिवजी ने इस भयंकर क्रूर सर्प को अपने गले का हार बना रखा है। यह गले में लपेटा हुआ सर्प या नाग कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। 

शिवजी के गले में मुंड माला भी है जो यह भाव दर्शाती है कि उन्होंने मृत्यु को गले लगा रखा है और वे मृत्यु से भयभीत नहीं। शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनो को अपने अधीन कर रखा है इसके प्रतीक स्वरुप वे व्याघ्र चर्म और हस्ती चर्म को धारण करते हैं। इस प्रकार के देवता शिवजी की उपासना सगुण और निर्गुण दोनो रुपों में की जाती है।

Friday, 2 February 2018

दक्षिण भारत में विवाह की पद्धतियां - शिरीष सप्रे

दक्षिण भारत में विवाह की पद्धतियां
शिरीष सप्रे

तमिल भाषा में विवाह को कल्याणम्‌ कहते हैं। तमिलनाडु के अय्यर समाज में विवाह की रस्म तमिल और वैदिक रीति से पूरी की जाती है। कल्याणम्‌ की दृष्टि से सभी बाते निश्चित होने के पश्चात यानी जन्मपत्री मिलान, लडके द्वारा लडकी (लडके, लडकी दोनो के द्वारा ही) को पसंद करने के पश्चात और लेन-देन की बातें निश्चित होने के बाद पहली विधि 'निश्चयार्थम्‌" (निश्चयाताम्बूलम) अर्थात्‌ सगाई की रस्म पूरी की जाती है। यह विधि लडके के घर पर ही पूरी होती है। अय्यर लोग कांचीपुरम्‌ के शंकराचार्य को मानते हैं इस कारण पत्रिका की शुरुआत 'कांचीपुरम्‌ के शंकराचार्य के अनुग्रह से" इस आशय के मज्कूर से पूर्ण होती है। विवाह के दिन वर एक विशिष्ट धोती 'अंगवस्त्रम्‌" धारण करता है। वह काशी जाने का नाटक करता है। हाथ में छडी, छाता लेकर, नई कोरी चप्पल पहनकर काशी यात्रा ेके लिए निकलने का इशारा देता है। फिर लडकी के पिता उससे प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि, मैं मेरी कन्या तुझे देता हूं, तू सन्यास मत ले। अंततः लडका मान जाता है। यह प्रथा लगभग सभी दक्षिण भारतीय जातियों में आज भी प्रचलित है।

विवाह संस्कार के समय पूरा श्रंगार कर दुल्हन को मंडप में लाया जाता है जहां वर-वधू एक दूसरे को माला पहनाते हैं। इस रस्म के पश्चात वर-वधू को झूले पर बैठाया जाता है इस विधि को 'ऊंजलपाट्ट" कहते हैं। 'ऊंजल" मतलब झूला। फिर नजर उतारी जाती है तत्पश्चात विवाह गीत गाए जाते हैं। इस विधि के पश्चात मुख्य मंडप में हिंदू विवाह पद्धति की सारी विधियां पूर्ण की जाती हैं। इसमें कन्या दान, मांगल्यधारणम्‌, लाजाहोम और सप्तपदी (सात फेरे) का समावेश होता है। लडका लडकी के गले में 'ताली" अर्थात्‌ मंगलसूत्र बांधता है। यह मंगलसूत्र हल्दी के धागे में बंधा होता है। इस धागे में चौकोर आकार की दो पेटियां गुंथी रहती हैं। एक पेटी लडकेवालों की होती है तो, दूसरी लडकीवालों की। इस पर तुलसी वृंदावन या शिवलिंग उकेरा हुआ होता है। 'ताली" की पहली गांठ वर बांधता है तो दूसरी गांठ वर की बहन बांधती है। लाजा होम और सप्त पदी के पश्चात 'आशीर्वादम्‌" विधि होती है। सारे उपस्थिजन आशीर्वादस्वरुप अक्षता उनके सिरों पर डालते हैं। अय्यर जाति की तरह ही अयंगारों में भी विवाह की विधि पूरी की जाती है। अंतर केवल इतना ही है कि अय्यर विवाह के समय ऋगवेद की ऋचाओं का उच्चारण करते हैं तो अयंगारों में यजुर्वेद की। पहले ताली (मंगलसूत्र) पहनाने की प्रथा अयंगारों में नहीं थी लेकिन आजकल यह प्रथा सामान्यसी हो गई है।

कोयम्बटूर, मदुरै और सेलम जिलों में कोंगुवेल्लाला जाति के लोग मुख्यतः रहते हैं। इस जाति में समाज के अगुवों के आशीर्वाद से विवाह संपन्न किए जाते हैं। वे जोडे जो सफलतापूर्वक स्वेच्छा से एकसाथ जीवन गुजारते रहते हैं उन्हें चुनकर विवाह द्वारा पक्का जीवन साथी बना दिया जाता है। आजकल इस जाति में भी वैदिक रीति से ही विवाह संपन्न किए जाते हैं। साधारणतः इस जाति में दहेज लेना या देना आवश्यक नहीं है। कन्या के माता-पिता अपनी कन्या को स्वेच्छया जो कुछ भी उपहार स्वरुप देते हैं, वह कन्या का ही रहता है, पति का इन पर कोई अधिकार नहीं रहता। लेकिन अन्य समाज की देखादेखी इनमें भी दहेज की प्रवृत्ति विकसित हो रही है।

तमिल ईसाइयों में वधू हल्के पीले रंग की रेशमी साडी विवाह के समय पहनती है। आमतौर पर तमिल ईसाई पहले जिस जाति या समाज के रह चूके होते हैं, विवाह के समय उस समाज के नियमों का ही पालन करते हैं। अधिक शिक्षित वर्ग के लिए दहेज की मांग अधिक होती है। विवाह के साथ क्रॉस के आकार की ताली (मंगलसूत्र) सोने की चेन के साथ वधू को पहनाई जाती है।

केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण जाति में चार दिनों तक विवाह समारोह मनाया जाता है। दुल्हन के घर में ही एक भोज का आयोजन किया जाता है। वर अपने साथ वधू के लिए कपडे, होम के लिए घास (दर्पा) और पल्लव लाता है। वर के पहुंचने पर वधू का पिता उसका स्वागत करता है और अपनी पुत्री को स्वीकारने का आग्रह करता है। पिता अपनी कुलदेवी और देवताओं को पूजा के उपरांत मंगलसूत्र (ताली) अपनी बेटी को बांधता है और एक श्वेत साडी में बाहर लाता है। एक संस्कार 'उदका पुरवाक्कम" में वधू द्वारा वर की हथेली पर जल डाला जाता है। आमतौर पर इस रस्म को भी कन्या का पिता ही पुरी करता है। जल डालते समय सहधर्मचरिता मंत्र पढ़े जाते हैं। पाणिग्रहण के समय वर वधू का हाथ थाम कर मंत्र पढ़ता है जिसका आशय उपस्थिजनों की अनुमति से जिसमें देवताओं का भी समावेश होता है कि मैं तुम्हें अपने जीवन साथी के रुप में स्वीकारता हूं। वधू केवल वैवाहिक संस्कारो के लिए सुबह शाम कक्ष से बाहर आती है। चौथे दिन वधू की विदाई होती है।

नायर जाति के विवाह में ज्योतिषियों का बडा महत्व होता है। ज्योतिष द्वारा मान्यता मिलने पर पास-पडौस और संबंधियों को निमंत्रण (काराक्कर) भेजा जाता है। घर के सामने पंडाल सजाया जाता है। बीच में सुसज्जित तांबे का दीपदान रखकर जलाया जाता है। एक कलश पानी और चावल से भरकर रखा जाता है (तीरपाडा)।बारात के स्वागतार्थ कन्या पक्ष नादस्वरम्‌ बजाता है। बारात के आगमन पर पिता वर को हार पहनाते हैं और चंदन का लेप लगाते हैं। वधू पक्ष की स्त्रियां वर के समक्ष वधू के गुणों का वर्णन 'कुरवा" के रुप में करती हैं। वधू को मंडप तक चाची, मौसी या मामी पहुंचाती है। वर वधू का चेहरा पूर्व की ओर रहता है। मंगलसूत्र पहनाने की विधि के समय वाद्ययंत्रों की गति में तीव्रता आ जाती है। तत्पश्चात वर वधू मंडप की तीन बार परिक्रमा करते हैं।

आंध्र की रेड्डी जाति संपन्न और प्रभावशाली मानी जाती है। इनमें भी काशी जाने का नाटक वर द्वारा वधू के घर पर किया जाता है। विवाह के एक दिन पूर्व गणेशजी और वर की पूजा की जाती है तथा विभिन्न तरह के उपहार वर को दिए जाते हैं। उपहार में तांबे का एक कटोरा और कपडों का जोडा अवश्य रहता है। दूसरे दिन वर को स्नान कराकर माता-पिता के साथ पूजा करने के लिए ले जाया जाता है। विवाह के समय वर वधू को फूलों का हार और मांगल्यधारणम्‌ (मंगलसूत्र) पहनाता है। मांगल्यधारणम्‌ के उपरांत वधू के माता-पिता और संबंधी चांदी के कलश का गंगाजल वर की हथेली पर डालते हैं। हवन विवाह का एक मुख्य अंग होकर ताम्बूलम्‌ में कुमकुम, नारियल और फूल आदि रखकर अग्नि को समर्पित किए जाते हैं। वर वधू हवन कुंड की प्रज्जवलित अग्नि की तीन बार परिक्रमा करते हैं।

आंध्र की ब्राह्मण जातियों में विवाह के शुभारम्भ में गौरी पूजन या लक्ष्मी पूजन किया जाता है। वहां के एक रिवाज थट्टा के अनुसार लडकी का मामा वधू को एक टोकनी में बैठाकर विवाह मंडप जिसे कल्याण मंडप भी कहते हैं में लाता है। शुभ मुहूर्त से पहले लडकी के माथे पर खजूर और उसके बीज से बना एक लेप 'गुडजिरका" लगाया जाता है। इसके पीछे भाव यह रहता है कि कन्या अब किसीकी पत्नी बन गई है इसके पश्चात मांगल्यधारणम्‌ संस्कार होता है। इस दौरान दोनो के बीच एक पर्दा रहता है। वर वधू 33 करोड देवी-देवताओ की पूजा 33 बर्तनों के घेरे को 33 बार प्रदक्षिणा करके करते हैं। यह प्रथा आंध्र ब्राह्मणों में विशिष्ट मानी जाती है। रात को अरुंधती तारा विश्वास और पवित्रता के रुप में वर वधू को दिखाया जाता है।

कर्नाटक की वोक्कालिंगा जाति के लोगों में विवाह के अवसर पर उस कुएं के पानी का उपयोग किया जाता है जिसे पुजारी द्वारा पवित्र कर दिया गया हो। आभूषणों और पुष्पों से श्रंगारित वधू को हरे रंग की साडी-ब्लाउज पहनाया जाता है। वधू सुमंगला कहलाने के लिए हरे रंग की चूडियां पहनती है। वधू के सिर पर कृषि उपज की चीजों से भरा पात्र रखकर विवाह मंडप तक लाया जाता है। मंडप में वधू का पिता अपनी पुत्री वर को सौंपने की रस्म के समय वर वधू का हाथ एक नारियल के साथ पकडे रहता है और वधू का पिता उस पर पवित्र जल और दूध डालता है। यह विवाह समारोह तीन या पांच दिन तक चलता है। सूर्य दर्शन विवाह की एक रस्म है। अर्स जाति के लोगों में पत्रिका मिलान के पश्चात सगाई की रस्म (निश्चितारतम्‌) वधू के घर पर ही पूरी होती है। वर परिवार के लोग फल, पान, सुपारी आदि अपने साथ लेकर जाते हैं। सगाई के बाद लग्न पत्रिका बनाई जाती है तत्पश्चात्‌ पान सुपारी आदि बांटी जाती है। विवाह की रस्म वैदिक पद्धति से की जाती है। वर द्वारा काशी जाने की रस्म के पश्चात गणेश तथा नवग्रहों की पूजा की जाती है। विवाह की रस्म के समय वर वधू दोनो एक पत्थर पर पैर रखते हैं इस रस्म को अस्त्ररोहण कहा जाता है। अग्नि की पूजा में अक्षत छिडके जाते हैं और सप्तपदी की रस्म निभाई जाती है। रात में अरुंधती दर्शन किया जाता है। बारात की अगुवाई लंकाधीर जो हाथ में तलवार पकडे रहता है करता है। उसके पैर धरती पर ना पडें इसलिए कपडे बिछा दिए जाते हैं। वर भी तलवार या कटार पूरे विवाह समारोह में अपने साथ रखता है।
दुर्ग जाति के लोगों की विवाह रस्म निराली होती है। बाराती पारंपरिक पोशाक में आते हैं। विवाह के पहले दिन वधू के संबंधी विभिन्न व्यंजन बनाते हैं। शाम को सहभोज होता है। इनमें भी काशी जाने का नाटक होता है। विवाह के दिन वधू को तीन विवाहित स्त्रियां और उनके पति कन्या को दूध स्नान कराते हैं तत्पश्चात कन्या लाल रंग की सोने-चांदी की जरीवाली बनारसी रेशमी साडी पहनती है। इस साडी से पहले धोबी द्वारा लाई गई सफेद साडी पवित्रता के प्रतीक रुप में पहनती है। दो लडकिया दीपदान सिर पर रखकर वधू के आगे चलते हुए मंडप तक पहुंचती हैं। वधू तीन बार मंडप में जाती है और तीन पांववाले स्टूल पर बैठती है। विवाह की रस्म के पश्चात सभी लोग जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं। शाम को जब बारात वधू के घर पहुंचती है तो वर के घर में प्रवेश के पूर्व शक्ति प्रदर्शन स्वरुप वर पक्ष का कोई व्यक्ति 6 पेडों के पौधों को तलवार से काटने की विधि करता है। लडकी को शक्ति से जीतने की खुशी में एक युद्ध नृत्य का आयोजन भी होता है। वधू को वर के घर की सदस्यता प्राप्त करने के लिए स्वयं पानी लाकर गंगा पूजन करना पडता है। रात को वर वधू को नया नाम देता है।
इस लेख को पढ़ने के उपरांत पाठकों के ध्यान में यह आ ही गया होगा कि, दक्षिण भारत के इन चारों प्रदेशों पर एक दूसरे का प्रभाव है जो इन चारों राज्यों की एकमेवता को प्रमाणित करता है। इन उपर्युक्त जातियों में विवाह की प्रथा लगभग एक सी ही है। दक्षिण भारत की कुछ जातियों की विवाह प्रथा का सम्यक स्वरुप उद्‌घाटित करना ही इस लेख का मूल उद्देश्य है। विस्तारभयावश कुछ बातों, प्रथाओं का उल्लेख नहीं हो पाया है आशा है पाठक इस मजबूरी को समझेंगे।

Saturday, 27 January 2018

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान - शिरीष सप्रे

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान  - 
 शिरीष सप्रे

गांधीजी ने पत्रकारिता को मिशन के रुप में अपनाया था। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारतवर्ष तक उनके कार्यों में पत्रकारिता का विशेष सहयोग रहा। फिर वह दक्षिण अफ्रीका का 'इंडियन ओपीनियन" रहा हो या भारत के 'यंग इंडिया", 'नवजीवन", 'हरिजन" और 'हरिजन सेवक" जैसे पत्र जिनका संपादन उन्होंने किया। भले ही 'इंडियन ओपीनियन" के संपादक गांधीजी ही थे पर उनका नाम प्रिंट लाइन में नहीं छपता था। उन्होंने अपना लेखन और सम्पादन कर्म पत्रकारिता के ध्येय से नहीं वरन्‌ अपने विचारों को लिखने और दूसरों तक पहुंचान के उद्देश्य से ही किया। गांधीजी का पत्रकार रुप मुख्यतः 'इंडियन ओपीनियन" के माध्यम से ही सामने आता है जिसे इस उद्देश्य से निकाला था कि दक्षिण अफ्रीका के गोरे, ब्रिटेन के निवासी और भारत के लोग भी दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों और गुजराती व्यापारियों की कठिनाइयों के विषय में जान सकें। 

दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक जहां भी गांधीजी ने सार्वजनिक कार्य किया, उनकी कार्यप्रणाली में पत्रकारिता का विशेष सहाय्य रहा। महात्मा गांधी पत्रकारिता को भी मानवता की सेवा का माध्यम मानते थे। उनकी नजरों में पत्रकारिता लोकहित और लोकसेवा का व्रत  था। इस विषय में उनके कुछ आदर्श थे। गांधीजी वाणी की स्वतंत्रता के पूरे पक्षपाती थे, लेकिन आत्मसंयम पर उनका बहुत जोर था। इसलिए उन्होंने पत्रकारों को इस माध्यम के दुरुपयोग न करने, सनसनीखेज समाचारों से बचने और अपना उत्तरदायित्व ठीक तरीके से निभाने के लिए आगाह किया था। इस व्यवसाय को लाभ कमाने का साधन न बनाने की बार बार अपील की। उनकी मान्यता थी कि,पत्र-पत्रिकाएं देश के शासन से भी अधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए उन्हें अपनी शक्ति का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए। जो कुछ कहें, सोच-समझ कर कहें। ऐसा कुछ भी ना कहें, जो विवेकहीन माना जाए।

खोजी पत्रकारिता, इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब तो डिजीटल मीडिया भी आ गया है के चमक-दमक भरे दिखावटी युग में जिसमें उद्‌घोषकों की आक्रमता भी शामिल है गांधीजी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। एक दृष्टि अब उन पर भी - 'प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता सकता है। उसके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं है लेकिन उस शक्ति का दुरुपयोग करना एक अपराध है। मैं स्वयं एक पत्रकार हूं और अपने साथी पत्रकारों से अपील करता हूं कि, वे अपने उत्तरदायित्व को समझें और अपना काम करते समय केवल इस विचार को प्रश्रय दें कि, सच्चाई को सामने लाना है और उसीका पक्ष लेना है।" ('हरिजन" 23 अप्रैल 1947)

'आधुनिक पत्रकारिता में जिस तरह सतहीपन, पक्षपात यथार्थता और यहां तक कि बेईमानी भी घुस आई है। वह उन ईमानदार लोगों को भी बराबर गलत रास्ते पर ले जाते हैं जो केवल यह चाहते हैं कि न्याय की विजय हो।" (यंग इंडिया 28 मई, 1931) 

उन्होंने 18 अक्टूबर 1947 को 'हरिजन" में लिखा ः 'अखबारों का बडा जबरदस्त असर होता है। संपादकों का यह कर्तव्य है कि,  वे यह सुनिश्चित करें कि, उनके अखबार में कोई झूठी रिपोर्ट प्रकाशित न हो और न कोई ऐसी जिससे जनता के भडकने की आशंका हो। संपादकों और उनके सहायकों को खबरों और उनके देने के ढ़ंग के बारे में विशेष सावधान रहना चाहिए।"

विज्ञापन जो वर्तमान में समाचार जगत की सबसे बडी ताकत बनती जा रही है के संबंध में गांधीजी पत्रिकाओं की स्वतंत्रता को बहुत दूर तक ले गए थे। वे विज्ञापनदाताओं की आर्थिक शक्ति को समझते थे। इसलिए उनके दबाव से मुक्त रहने के लिए विज्ञापन न लेने की नीति ही बना ली थी। इसका कारण उनके विचार से कुछ विज्ञापन ऐसे भी होते हैं (वर्तमान में तो इस प्रकार के विज्ञापनों की बाढ़ सी आ गई है) जिनसे जनता का कुछ लाभ नहीं होता, उल्टे जनता धोखे में आ सकती है, मार्गभ्रष्टता, अनैतिकता, कामुकता, चरित्रहीनता की ओर अग्रसर हो सकती है। इसलिए भी वे ऐसे विज्ञापन छापना अनैतिक समझते थे। मुख्य रुप से विज्ञापन से आए पैसे के लोभ से बचने और विज्ञापनदाता के आर्थिक दबाव से स्वयं को मुक्त रखने के लिए पत्रों में विज्ञापन नहीं लेते थे। नैतिक दृष्टि से वे शुद्ध स्वावलंबन के पक्षधर थे।

दरअसल गांधीजी पत्रकारिता को जन कल्याण का काम मानते थे। विज्ञापनों को प्रकाशित करने के बारे में गांधीजी की राय बहुत सख्त थी। उन्होंने यंग इंडिया में 25 मार्च 1928 को लिखा था - 'मेरी धारणा है कि, अनैतिक विज्ञापनों के बल पर अखबार चलाना गलत है। मेरा विश्वास है कि यदि विज्ञापन लिया ही जाए तो अखबारों के मालिकों और स्वयं संपादकों को पहले उनकी कडी छानबीन करनी चाहिए और केवल तटस्थ विज्ञापन ही स्वीकार किए जाने चाहिए। आज बडे से बडे प्रतिष्ठित अखबार और पत्रिकाएं भी अनैतिक विज्ञापनों की बुराई का शिकार हैं। इसका सामना अखबारों के मालिकों और संपादकों के विवेक का परिष्कार करके ही किया जा सकता है।"

गांधीजी समझते थे कि पत्रकारिता एक महान सामाजिक उत्तरदायित्व और जनसेवा है। इसीलिए वे कहते थे कि, पत्रकार जो कहते हैं, खुल्लमखुल्ला कहें, यह उनका अधिकार तथा कर्तव्य है, किंतु उन्हें यह न भूलना चाहिए कि, उन्हें यह कार्य शिष्टता तथा संयम की मर्यादाओं के भीतर रहकर करना है। गांधीजी कहते थे 'मेरा जीवन ही संदेश है"। अब हम स्वयं ही विचार करके देखें कि कितना हम उनका अनुगमन कर रहे हैं।

Monday, 22 January 2018

विद्यादायिनी देवी सरस्वती के अन्य रुप - शिरीष सप्रे

वसंत पंचमी विशेष
विद्यादायिनी देवी सरस्वती के अन्य रुप
शिरीष सप्रे

ज्ञान और विद्या की अधीष्ठातृ देवी सरस्वती के प्रति करोडों भारतीयों के मन-मस्तिष्क में अपरिमित श्रद्धा और भक्तिभाव है। वसंत पंचमी पर्व को मनाने का एक कारण वसंत पंचमी को ही सरस्वती जयंती का होना भी है। इसी दिन देवी सरस्वती ब्रह्मा के मानस से अवतीर्ण हुई थी। वसंत पंचमी को जगह-जगह पर मॉं शारदा की पूजा अर्चना की जाती है। सरस्वती को 'विद्या की देवी", 'वीणा-पाणी" या 'बुद्धिदायिनी" के रुप में जाना जाता है एवं इन्हीं रुपों में उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। मां सरस्वती की कृपा से प्राप्त ज्ञान एवं कला के समावेश से मनुष्य जीवन में सुख एवं सौभाग्य प्राप्त होता है। माघ शुक्ल पंचमी को सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन किया था, तभी से देवी सरस्वती की पूजा वसंत पंचमी को करने की परंपरा चली आ रही है।

देवी भागवत पुराण में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के पूजन का स्पष्ट उल्लेख है। इसी कारण वसंत पंचमी का एक नाम श्री पंचमी भी है। वसंत पंचमी के दिन ही सरसों के फूलों और नवांकुरों से अपनी आराध्य श्रीदेवी (लक्ष्मी या सरस्वती) की पूजा की जाती है। इसी दिन पीले कपडे भी पहनने की प्रथा है। वसंत पंचमी के दिन मदन (कामदेव) का उत्सव मनाने का विधान है। धर्मशास्त्र के प्रामाणिक ग्रंथ धर्मसिंधु के अनुसार इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रतिदेवी का पूजन तथा उत्सव करना चाहिए। कामदेव का मित्र वसंत ऋृतु को कहा जाता है। अतः संभव है कि कामदेव के मित्र के नाम पर वसंत पंचमी पडा हो।

देवी सरस्वती एक अन्य रुप है जन गण के हित और कल्याण हेतु सदैव तत्पर रहनेवाली माता सरस्वती का 'शत्रुविनाशिनी" रुप। जिसको जाननेवालों की संख्या जरा कम ही है। वस्तुतः सरस्वती का यह आदि स्वरुप भी है तथा वैदिक युग के एक शुभ लग्न में उनका यह रुप ऋषि-मुनियों के समक्ष मुखरित हो उठा था - 

यानी लोक कल्याण के लिए शत्रुओं के विरुद्ध संग्राम करती हूं मैं। मां वागेश्वरी की यह पवित्र वाणी ऋषि-मुनियों की हटतंत्री में गुंजायमान हो उठी। इसमें संशय नहीं कि इष्ट शक्ति अनिष्टकारी और देहध्वंसकारी शत्रु को पराजित करके प्राण की रक्षा हर क्षण करती है एवं इस प्रक्रिया के मूल में इष्ट शक्ति का खेल ही वास्तव में वाग्देवी की लीला है। एक भयंकर युद्ध चलता है मन के आसमान पर। इस युद्ध में सुप्रवत्ति (देवता) एवं कुप्रवृत्ति (असुर) के मध्य द्वंदयुद्ध चलता है और सुप्रवृत्ति -चैतन्यमयी मां वागेश्वरी कुप्रवृत्ति के नाश के लिए सक्रिय हो उठती है।

प्रकृति पट पर भी उषा के उज्जवल प्रकाश में तमिस्त्र-शत्रु का विनाश पर्व परिलक्षित होने लगा। उषा मध्य वाग्देवी शक्ति का आविर्भाव स्पष्ट हो उठा। उषा का प्रकाश प्रभावी सूर्य की आशा है। सूर्य के 'सास्वान" नाम के साथ जोडा गया है 'उषा" को क्योंकि, शुभ तेजस्विनी माता सरस्वती का आत्म प्रकाश वैदिक उषा के सहयोग से ही हुआ है। अतएव प्रकृति-राज्य व अंतर-राज्य में सरस्वती अद्वितीय शत्रुविनाशिनी के रुप में प्रतिष्ठित हुई। यद्यपि पूर्व में सरस्वती ज्योति-उपासना में सीमाबद्ध थी परंतु, तांत्रिक-पौराणिक-बौद्धयुग में उन्होंने मूर्तियों में रुप पाया। जैसे 'वीणावादिनी", 'ज्ञानदात्री", 'असुर संहारिणी" तथा 'प्रकाश की देवी" आदि। सरस्वती का वर्ण शुभ और गुण अशुभ-विनाश अन्य देवी-देवताओं के आकार में भी प्रकट हुआ।
उत्तर भारत के कई प्रदेशों के कई स्थानों पर महिषमर्दिनी दुर्गा की पूजा अश्विनी शुक्ल सप्तमी-अष्टमी-नवमी को तो कई स्थानों पर शुंभ-निशुंभ काली पूजा के समय दीवाली के त्यौहार पर होती है। रणदेवियां सरस्वती के साथ एक योगसूत्र में बंध गई। अतः उस इंगित का वहन करके एक मंत्र सरस्वती पूजा में भी चलने लगा- 'भद्र काल्यै...सरस्वत्यै...।" शत्रुनाशिनी देवी सरस्वती देश-विदेश की समर देवियों के साथ एकाकार हो गई थी और बौद्ध तांत्रिकयुग में वह निदर्शन बहुनामी देवियों के भाव-कर्म में मिलता है। चतुर्भुज सिंहवाहिनी सरस्वती के दो हाथों में परशु और गदा एवं अन्य दो हाथों से वह दानव की जीभ उखाड रही है।

श्रीपंचमी को महाशक्ति सरस्वती के चरणों में श्रद्धापूर्वक, भक्तिपूर्ण चित्त से जाकर ह्रदय का आकुल अनुनय व्यक्त करना होगा द्विषो जहि। यानी सकल शत्रुओं का नाश करो देवी। श्रीचरणों में अपनी-अपनी अंजली देकर ज्ञान का वरदान ग्रहण करना होगा, ताकि मन और देश की भूमि पर शांति और आनंद का साम्राज्य स्थापित हो सके। देवी के चरणों में जानेवाले निश्चित ही अतुल शक्ति के स्वामी होंगे और देवी की कृपा और आशीर्वाद से विश्व में उनकी सुकीर्ति फैलेगी तथा समग्र वसुंधरा सुगंधित हो उठेगी।

Tuesday, 16 January 2018

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य शिरीष सप्रे

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले 
महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य
शिरीष सप्रे

चाणक्य चंद्रगुप्त का महामात्य प्रसिद्ध है। नन्द पतन और मौर्य-उत्थान के मुख्य नायक चाणक्य ही माने जाते हैं। श्रुति परम्परा के अनुसार चाणक्य दीर्घजीवी थे। उन्होंने सम्राट अशोक तक का मौर्य वंश शासन देखा था। आचार्य तत्ववेता, मंत्रद्रष्टा ऋषि परम्परा की असाधारण विभूति थे। वसिष्ठ, वाल्मिकी एवं व्यास की भांति युग के महान राष्ट्रचिंतक थे। उनके ज्ञानगौरव से अनभिज्ञ लोग उन्हें केवल कूटनीतिक समझ कर उनकी तुलना मध्यकालीन विचारक मैकियाविली से करते हैं जो नितांत भ्रामक है। मैकियाविली की कूटनीति भारतीय चरित्रादर्श से कतई भिन्न, अशोभनीय एवं अमांगलिक कुचक्रों का इंद्रजाल है। वास्तविक तौर पर देखा जाए तो इटली के मैकियाविली अपने प्रिंस को आदर्श शासक तथा महान साम्राज्य निर्माता नहीं बना पाए थे। इसके विपरीत कौटिल्य की कूटनीति राष्ट्र निर्माण, प्रजारंजन एवं देशोद्धार के उदात्त उद्देश्यों को मूर्त करनेवाली सर्वजनहिताय राजनीति है। 'अर्थशास्त्र" इसका ज्वलंत प्रमाण है। मैकियाविली को आधुनिक कौटिल्य भले ही कहा जा सकता है परंतु कौटिल्य की मैकियाविली से तुलना कौटिल्य का अपमान होगा। इसी तरह यदि कौटिल्य के पूर्वकालिक ग्रीक के महान दार्शनिक और राजनीतिक विचारक अरस्तु से तुलना की जाए तो वह भी अपने विचारों के अनुरुप व्यवहारिक प्रयोग में असफल रहने के कारण कौटिल्य से उन्नीस ही माना जाएगा। वस्तुतः दोनो ही अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, लेकिन दोनो की परस्पर कोई तुलना नहीं। 

कौटिल्य के व्यक्तित्व की लोकह्रदय पर सदैव गहरी छाप रही है। संस्कृत गं्रथों के अतिरिक्त कई जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में चाणक्य के विरल उल्लेख मिलते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य के सातसौ वर्षों बाद विशाखादत्त ने चाणक्य के महान राजनीतिक कृतत्व को चित्रांकित करते हुए 'मुद्राराक्षस" लिखा था, जो आज भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में गिना जाता है। इस नाटक में चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का सम्राट बनाने के बाद नंद वंश के प्रख्यात अमात्य राक्षस को चंद्रगुप्त के पक्ष में करने में कौटिल्य कैसे यशस्वी हुए, इसकी बडी रोचक कथा है। राक्षस को मौर्य साम्राज्य का स्वामीभक्त मंत्री बनाने के बाद कौटिल्य निश्ंिचत होकर वापस तक्षशिला चले जाते हैं। संन्यस्त, निष्काम जीवन के ऐसे कितने उदाहरण विश्व साहित्य में मिलेंगे।

आधुनिक युग में तो आचार्य चाणक्य को इतिहास के नूतन मूल्यांकन के पश्चात देश-विदेश के इतिहासकारों द्वारा जहां उन्हें राजनीति शास्त्र का युग प्रवर्त्तक मनीषी प्रमाणित किया गया है, वहीं साहित्यकारों ने उन्हें राष्ट्रनिर्माता के रुप में चित्रित कर व्यापक लोकमानस का चरितनायक बना दिया है। बृहत्काय 'कौटलीय अर्थशास्त्र" के अतिरिक्त आचार्य कौटिल्य ने ज्ञानकणों के कोष के रुप में एक सूत्रग्रंथ की भी रचना की है, जो चाणक्य-सूत्र के नाम से प्रसिद्ध है। एक छोटे से वाक्य में सार्थक व्यवहारिक जीवन में उपयोगी, ये नीति-उपदेश संस्कृत के सूत्र-साहित्य की अनमोल निधि हैं। 

कौटिल्य का अर्थशास्त्र राष्ट्र की सर्वांगीण राज्य व्यवस्था का सांगोपांग आचरण शास्त्र है। देश की विदेश नीति से लेकर चुंगी प्रणाली के साथ-साथ, ब्रह्म की सत्ता से लेकर पुजारियों और भिक्षुओं के भरण-पोषण के नियमों का भी उसमें विस्तार से विधान है। कौटिल्य से पहले शुक्र, विदुर आदि अनेक राजनीतिशास्त्र के प्रणेता हुए हैं, किंतु कौटिल्य के अर्थशास्त्र की तुलना में उनकी कृतियां बौनी ही प्रतीत होती हैं। क्योंकि, एक तो कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में उनकी सारी आचार-संहिताओं का परिशोधित रुप में उल्लेख किया है और दूसरे, कौटिल्य ने उसमें अतिरिक्त जो कुछ लिखा है, वह स्वानुभव की तुला पर तौल कर लिखा है। 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का वैदिशिक भाषाओं में अनुवाद होने से पहले पाश्चात्य विद्वानों की यह भ्रामक धारणा थी कि, भारतीय शास्त्रकारों के चिंतन का ध्येय अध्यात्म तक ही सीमित रहा है, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र की समस्याओं से उन्हें को सरोकार नहीं रहा है। किंतु, 'कौटिलीय अर्थशास्त्र" के अवलोकन मनन के बाद उनकी यह भ्रांति निर्मूल सिद्ध हो गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने कौटिल्य को ही संसार का शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ प्रचारित कर दिया, उनके स्वदेश भारत को भी यह गौरव प्रदान कर दिया है कि, अन्य विद्याओं की तरह राजतंत्र और समाज व्यवस्था की आचार संहिताएं भी यूनानियों के द्वारा भारत से पश्चिम को गई हैं।