Monday, 14 January 2019

मकर संक्रांति उत्सव - शिरीष सप्रे


मकर संक्रांति उत्सव
शिरीष सप्रे

जब एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं | इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं | मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं | वैदिक साहित्य में उत्तरायण के लिए उद्गयन, देवयान आदि शब्द देखने को मिलते हैं | उत्तरायण के काल को शुभ समझा जाता था | पितामह भीष्म तब तक शर शय्या पर लेटे रहे, जब तक उत्तरायण का आरम्भ नहीं हुआ |

 इस संक्रांति का विशेष महत्त्व है | इसे मोक्षकारक भी माना जाता है | कर्क राशि से सूर्य दक्षिणायन होते हैं | इस तरह मकर से मिथुन तक सूर्य उत्तरायण व कर्क से धनु राशि तक दक्षिणायन रहते हैं | प्रत्येक राशि का ग्रहों को प्रभारी बनाकर अधिपति बनाया है | सूर्य को सिंह, चन्द्रमा को कर्क, मंगल को मेष व वृश्चिक, बुध को कन्या व मिथुन गुरू को धनु व मीन, शुक्र को वृषभ व तुला तथा शनि को मकर व कुम्भ राशि का अधिपति बनाया है |
       
वस्तुतः पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है, पर हमें यही आभास होता है की आकाश मार्ग में सूर्य ही स्थिर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है | सूर्य के इस दिखाऊ आकाश मार्ग को क्रांतिवृत्त का नाम दिया गया है | इस क्रांतिवृत्त को १२ समान भागों में विभक्त करके इन्हें मेष, वृषभ, मिथुन, धनु, मकर, कुम्भ, आदि राशिनाम दिए गए हैं | सालभर में इन बारह राशियों में से सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं यानी बारह संक्रांतियां होती हैं | 

सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है | सूर्य का उत्तरायण प्रवेश अत्यंत शुभ माना जाता है | उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले की उर्ध्वगति होती है उसे गोलोक वास की प्राप्ति होती है | भारतीय संस्कृति में इस पर्व का विशेष महत्त्व है | संक्रांति काल को पुण्य काल माना जाता है | उस दिन समुद्र या प्रयाग  गंगासागर जैसे तीर्थों में स्नान किया जाता है और उस दिन इन स्थानों पर बड़े मेले लगते हैं | संक्रांति में तिल का काफी प्रयोग होता है, विशेषकर दक्षिण भारत में |

महाराष्ट्र में तिल-गुड बांटा जाता है और कहा जाता है – ‘तिल-गुड लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए’ | बंगाल में तिल मिलाकर ‘तिलुआ’ नामक एक पदार्थ बनाया जाता है, इसलिए मकर संक्रांति को तिलुआ-संक्रांति भी कहते हैं | उत्तर भारत में दाल और भात की खिचड़ी पकाते हैं और दान देते हैं, इसलिए संक्रांति को खिचड़ी- संक्रांति भी कहते हैं |

कालिका पुराण के अनुसार उत्तरायण में सदैव तिल्ली का हवन करना श्रेष्ठ बताया है | जिस व्यक्ति का जन्म उत्तरायण में हुआ हो उसे भगवान् के मंदिर में और ब्राह्मण को स्वर्ण सहित तिल्ली दान करने पर कभी दुःख और शोक नहीं होगा | तिल्ली को ग्रंथों में पापनाशक बताया है | इसी दिन पवित्र नदियों में स्नान की भी परंपरा है | संक्रांति से ही सूर्योपासना प्रारम्भ करना शुभ फलदायक है |

इसी समय दक्षिण भारत में तीन दिवस चलनेवाला ‘पोंगल’ नामक महोत्सव मनाया जाता है | दूसरे दिन का उत्सव ‘सूर्य पोंगल’ कहलाता है | इस दिन दूध और चावल की खीर पकाई जाती है | पोंगल शब्द का अर्थ ही है पकाना | अर्थात् पोंगल एक प्रकार का पाकोत्सव है |

आज मकर संक्रांति एक सामाजिक उत्सव में रूपांतरित हो गई है और इसके साथ कुछ धार्मिक अंधविश्वास भी जुड़ गए हैं | वैसे तो वैदिक कृषक समाज ने इस उत्सव को जन्म दिया था और प्राचीनकाल से एक आनन्दोत्सव के रूप में इसको मनाया जाता रहा है | 
         

Thursday, 10 January 2019

स्वामी विवेकानंद – जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय - शिरीष सप्रे


स्वामी विवेकानंद –
 जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय
शिरीष सप्रे

स्वामी विवेकानंद भारतीय परंपरा की ऊर्जावान धारा के सर्वाधिक प्रगतिशील संत, विचारक और पुरोधा रहे हैं | कबीर के बाद धर्मान्धों, कर्मकांडवादियों, जातिवाद, शोषण, अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय रचनात्मक अभियान चलानेवाले रहे हैं | भारत के नवनिर्माण के लिए स्वामीजी को देश के युवाओं से बड़ी अपेक्षाएं थी | वे भारतीय चिंतन, भारतीयता, हिन्दू धर्म पर जोर देते थे तो उसका अर्थ समूची मानव जाति के जीवन मूल्यों का अर्थ था | उन्होंने लिखा भी था कि ‘तुम हिन्दू कहलाने के अधिकारी हो, जब इस नाम को सुनते ही तुम्हारी रगों में शक्ति की विद्युत तरंग दौड़ जाए | लेकिन हिन्दू कहलाने के अधिकारी तब ही हो जब व्यक्ति का दुःख-दर्द तुम्हारे ह्रदय को इतना व्याकुल कर दे, मानो तुम्हारा अपना पुत्र संकट में हो |’

स्वामी विवेकानंद के पूरे जीवन दर्शन का प्रमुख वैचारिक बिंदु था कि, ‘भारतीय जीवन का मुख्य आधार धर्म है | हमारे देश का धर्म हिन्दू धर्म है | धर्म केवल वह धुरी मात्र नहीं है जिसके माध्यम से भारत में पुनर्जागरण हुआ है, बल्कि भारतीय ऋषियों ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया है वह वही परम लक्ष्य है, जिसे पुनर्जाग्रत भारत को प्राप्त करना है | यह वह अमूल्य मणि है जिसके प्रकाश से हमें विश्व को प्रकाशित करना है |’

नवयुवकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था – ‘ए वीर साहस का अवलंबन करो, गर्व से कहो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, तुम चिल्लाकर कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी सब मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियां मेरे ईश्वर हैं, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है |’  

स्वामी विवेकानंद ने १८९७ ई. कहा था – ‘’सुदीर्घ रजनी अब समाप्त हुई जान पड़ती है | महादुख का प्राय: अंत ही प्रतीत होता है | महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहा है | इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनान्धकार को भेद करने में अनुश्रुतियां भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है | ज्ञान, भक्ति और कर्म के अनंत हिमालय स्वरुप  हमारी मातृभूमि भारत की हर एक चोटी पर प्रतिध्विनित होकर यह आवाज मृदु, दृढ़ परन्तु अभ्रांत स्वर में हमारे पास तक आ रही है | जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और स्पष्ट तथा गंभीर होती जाती है और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है | जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है | जो अंधे हैं, वे देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं, वे ही समज नहीं सकते कि हमारी हमारी मातृभूमि अपनी निद्रा से जाग रही है | अब उसे कोई रोक नहीं सकता | अब यह फिर सो भी नहीं सकती | कोई बाह्यशक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती, क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है |’’

हे युवकों, सारे विश्व की दृष्टी आज भारत में लगी हुई है | तृतीय सहस्त्राताब्दी   में भारत को अपनी भूमिका निभानी है, विश्व को शांति, और अमृत्व के पथ पर नेतृत्व देना है | भारतीय संस्कृति और परम्पराओं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति की आज आवश्यकता है और वह भारत ही दे सकता है, क्योंकि आध्यात्मिकता भारत का मेरुदंड है, उसे तो जीने के लिए भी आध्यात्मिक होना ही पड़ेगा और ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ समस्त पृथ्वी के मानव को पथ दिखा कर अपना कर्तव्य निभाना होगा |

स्वामीजी कहते थे – ‘’अपने स्नायु बलवान बनाओ, आज हमें जिसकी आवश्यकता है, वह है, लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु | हम लोग बहुत दिन रो चुके | अब और रोने की आवश्यकता नहीं | अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और ‘मर्द’ बनो | हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें | हमें ऐसे सिद्धांतों की जरुरत है, जिससे हम मनुष्य हो सकें | हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके और यह रही सत्य की कसौटी, जो भी तुमको शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टी से दुर्बल बनाए उसे विष की तरह त्याग दो, उसमें जीवन शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता | सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रता है, वह ज्ञानस्वरूप है | सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो ह्रदय के अन्धकार को दूर कर दे, ह्रदय में स्फूर्ति भर दे | अपनेआप पर विश्वास रखो कि प्रत्येक की आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है | तभी तुम सारे भारतवर्ष को पुनर्जीवित कर सकोगे | फिर तो हम दुनिया के सभी देशों में खुले आम जाएंगे और आगामी १० वर्षों में हमारे भाव उन सब विभिन्न शक्तियों के एक अंशस्वरुप हो जाएंगे, जिनके द्वारा संसार का प्रत्येक राष्ट्र संगठित हो रहा है |”

स्वामी विवेकानंद ने हमें सीखाया है कि भारत का नवनिर्माण हम भारत के प्रति अगाध प्रेम रखकर ही कर सकते हैं | जिस किसीने स्वामीजी के अग्नि वचनों को सुना उसीमें राष्ट्रीयता की लहर आई है | भारत को यदि पुनर्जीवित करना है तो हमें अवश्य ही उसके लिए काम करना होगा |अनाथ, दरिद्र, निरक्षर और कृषक व श्रमिक ही हमारें लक्ष्य हैं, पहले उनके लिए काम करने के बाद अगर समय रहा तो कुलीन की बारी आएगी | विवेकानंद ने समाज की नब्ज पर हाथ रखा था | उनका तमाम चिंतन दरिद्र के झोपड़े से गुजरता था | शोषण के खात्मे से होकर अध्यात्म में जाता था |




Friday, 28 December 2018

मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी - शिरीष सप्रे


 मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी  
शिरीष सप्रे

संसार में आज अनेक प्रकार के कैलेंडर्स प्रचलित हैं | उनमें रोमन, भारतीय, यहूदी और इस्लामी कैलेंडर प्रमुख हैं | इनमें ३६५ दिन का रोमन कैलेंडर ही विश्व में अधिकाधिक उपयोग में लाया जाता है | कैलेंडर दो प्रकार के होते हैं - चान्द्र वर्ष और सौर वर्ष आधारित | भारत का हर परंपरागत किसान सौर वर्ष चन्द्र मास दोनों को जानता है |

सौर वर्ष ३६५ दिन से एक चौथाई अधिक का होता है | चन्द्र वर्ष ३५४ दिन का होता है | इसीलिए चन्द्र वर्ष गणना में तीन वर्षों में एक अधिक मास की व्यवस्था है | मुसमानों में वह नहीं है, तो इससे चन्द्र तिथि की उनकी गिनती तो ठीक ही रहती है | बस, धार्मिक पर्व भिन्न-भिन्न ऋतुओं एवं महीनों में पड़ते रहते हैं | जिसमें उन्हें कोई हर्ज नहीं दिखता | रमजान या मुहर्रम कभी गर्मी में होगा, कभी वर्षा, कभी शरद, कभी हेमंत, कभी शिशिर में |

ईसाइयों में चन्द्रमा से जुडा एक ही विशेष पर्व है – ईस्टर, जो कि २१ मार्च की पूर्णिमा या कि उसके बाद जब भी पहली पूर्णिमा पड़े, उसके बाद आने वाले पहले रविवार को पड़ता है और यह ईस्टर का त्यौहार सन १५८२ ईस्वी के पहले, जब जूलियन कैलेंडर बहुत दोषपूर्ण था तब तो भिन्न-भिन्न तारीखों में पड़ता ही था अब भी वह २२ मार्च से २५ अप्रैल के बीच भिन्न-भिन्न तारीखों में पड चूका है सुधारे हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर के बावजूद | भारत में तो अधिक मास की व्यवस्था ऋग्वेद काल से भी पहले से है | इसलिए यहां चान्द्र और सौर वर्ष में सामंजस्य रखा जाता रहा है |
 
सभी प्राचीन संस्कृतियों में ‘काल गणना’ प्रमुखता से चन्द्र भ्रमण पर आधारित थी | क्योंकि,  पूर्ण चन्द्र से पूर्ण चन्द्र यह काल निरीक्षण की दृष्टी से बहुत सुविधाजनक था | बेबोलियन संस्कृति में भी चन्द्र वर्ष से सम्बंधित कैलेंडर अस्तित्व में थे, इतना ही नहीं तो उस काल में चन्द्र वर्ष का सौर वर्ष से सम्बन्ध लगाने के लिए अधिक महिना रखने की परिपाटी थी इस प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं |

इजिप्शियन संस्कृति में भर व्याध तारे को केंद्रीभूत मानकर कैलेंडर बनाए जाते थे | क्योंकि पूर्व दिशा में सूर्योदय के पूर्व व्याध तारे के दर्शन होने लगने के बाद कुछ समय में ही नाईल नदी में बाढ़ आ जाती थी | इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि व्याध का उदय और नाईल नदी में बाढ़ इसको कैलेंडर की दृष्टी से महत्त्व प्राप्त हो गया | ‘व्याध का पूर्व दिशा में उदय’ से पुनः व्याध का पूर्व में उदय यह काल लगभग ३६५ दिन का था, इस कारण ईजिप्शियन कैलेंडर ३६५ दिन का था | वर्ष में ३६५ दिन यह ईजिप्शियन संस्कृति की एक देन ही है |

प्राचीनकाल में यहूदी खगोल शास्त्रीय अध्ययन में अधिक रूचि नहीं लेते थे | कहा जाता है कि उन्होंने अपने पड़ोसी देश बेबीलोनिया का कैलेंडर ही अपनाया | सप्ताह सर्वप्रथम यहूदियों द्वारा ही समय की ईकाई के रूप में चलन में आया | यूनान के निवासियों ने भी चान्द्र वर्ष पर आधारित कैलेंडर बनाया था | इस कैलेंडर में भी बाद में कई सुधार किए गए |

चीनी कैलेंडर का साल आमतौर पर बारह चन्द्र-मासों का होता था | सौर वर्ष से सामंजस्य बिठाने के लिए जिस वर्ष तेरहंवा महीना जोड़ा जाता, उसे पूर्ण वर्ष कहा जाता था |  
           
आज जिस कैलेंडर से हम तारीख और महीने का हिसाब लगाते हैं उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं | क्योंकि, पोप ग्रेगोरी तेरहवें ने इस कैलेंडर में कई क्रांतिकारी सुधार किए थे | अंग्रेजी ‘कैलेंडर’ यह शब्द कैलेंडर्स इस रोमन शब्द पर से आया है | इसका अर्थ होता है महीने का प्रथम दिन | वैसे कैलेंडरों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और रोचक इतिहास रोमन रिपब्लिकन कैलेंडर का है | जो एक अलग लेख का विषय है | इनका ‘कैलेंडर’ चान्द्र कैलेंडर है |

लैटिन भाषा के शब्द ‘कलेंडे’ से कैलेंडर शब्द आया है | हिन्दी में कैलेंडर का अर्थ पंचांग-पत्रा या तिथि-पत्रक होता है | किसी भी कैलेंडर को देखने से हमें यह पता चलता है कि साल के किस महीने में कौन सा दिन किस तारीख या तिथि को पड़ता है या कौन सी तिथि या तारीख किस दिन पड़ती है | अधिकतर कैलेंडरों से त्यौहारों, पर्वों, ऐतिहासिक महत्त्व के दिनों का भी पता चलता है |

वैसे यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ‘कैलेंडर’ शब्द भी पूर्णतः भारतीय है | वास्तव में कैलेंडर शब्द ‘कालांतर’ शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है | विश्व  की किसी भी अन्य भाषा में समय को काल या कैलेंडर से मिलते-जुलते नाम से संबोधित नहीं किया जाता है | कैलेंडर शब्द की रोमन उत्त्पत्ति की कथा अविश्वसनीय और अजीब है | रोम में साहूकार लोग ब्याज का हिसाब लगाने की जिस पद्धति का उपयोग करते थे, उसे कैलेंडियम कहा जाता था | जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता था, उस दिन पूरे नगर में ढोलक पीटकर, आवाजें लगाकर यह बताया जाता था कि नया वर्ष शुरू हो गया है |  
     
भारत में सृष्टि संवत्, विक्रम संवत्, कृत संवत्, मालव संवत्, शक संवत्, वर्धमान संवत्, बुद्ध निर्वाण संवत्, सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत्, परशुराम संवत्’, आदि कैलेंडर्स प्रचलित हैं | ई. स. पूर्व ५४५ वर्ष पहले बौद्ध धर्म का आरम्भ वैशाख पूर्णिमा को हुआ था | विक्रम संवत् का उपयोग विशेष कर उत्तर भारत, राजस्थान और गुजरात में किया जाता है |

विक्रम संवत् को सानंद विक्रम संवत्, संवत् विक्रम, श्रीनृप विक्रम संवत् और मालव संवत् के नाम से भी जाना जाता है | इस संवत् का प्रारम्भ ई. पू . ५७ व ५८ के मध्य राजा विक्रमादित्य के द्वारा किया गया | यह संवत् धार्मिक महत्त्व का है तथा भारतीय वर्ष की शुरुआत ‘गुढीपाडवा’ से मानते हैं |

भले ही विक्रम संवत् सारे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो भी वह सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार वर्ष के दिनों में हमेशा कम या अधिक होते रहने के कारण दिन और महीनों की ठीक से गिनती करना सर्वसाधारण लोगों के लिए संभव हो नहीं पाता | इसी कारण से सारे देश में एकरूपता लाने के लिए भारत सरकार ने शक, संवत् में योग्य प्रकार से संशोधन कर ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ (पंचांग) ई.स. १९५७ में २२ मार्च से शुरू किया | (उस दिन भी संवत् १८२७ की चैत्र शुद्ध प्रतिपदा ही थी)

शक संवत् शक राजाओं के काल में शुरू हुआ था | दक्षिण की ओर के ब्राहमण ज्योतिष की गणना करने के लिए अथवा जन्म पत्रिका बनाने के लिए इसको उपयोग में लाते हैं | ई.स. की अपेक्षा शक संवत् ७८ वर्षों से पीछे (कम) है |

आजकल प्रायः सभी देशों में व्यवहारिक रूप से ही सही ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है | धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम और कुछ अन्य धर्मावलम्बी धार्मिक पारिवारिक कार्यों के लिए अपने-अपने पंचांग या तिथि पत्रक उपयोग में लाते हैं | इसी तरह वित्त वर्ष पहली अप्रैल से ३१ मार्च तक बहुत से स्थानों पर माना जाता है |  
                           

Sunday, 23 December 2018

२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री - शिरीष सप्रे


२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री
शिरीष सप्रे

क्रिसमस का वृक्ष जर्मनी के संत निकोलस से सम्बद्ध माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष की ऐतिहासिकता के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं | तथापि, क्रिसमस वृक्ष की परंपरा का उद्गम जर्मनी से माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष का वर्णन सर्वप्रथम १६०५ में मिलता है | इसका प्रचलन सर्वप्रथम जर्मनी में हुआ जिसका शुभारम्भ मार्टिन लूथर ने किया | क्रिसमस वृक्ष को सजाने की परंपरा आठवीं सदी में जर्मन धर्म प्रचारक बोनिप्रेस ने शुरू की थी, जबकि बहुत से लोग इसका श्रेय मार्टिन लूथर को भी देते हैं |

क्रिसमस का त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में विश्व के समस्त केथोलिक एवं प्रोटेस्टंट ईसाई धूमधाम से मनाते हैं | ईसाइयों का यह लोकप्रिय उत्सव है | जितना यह व्यापक तौर पर मनाया जाता है उतना धनी उत्सव और कोई नहीं | क्रिसमस वृक्ष की पहचान संभवतः बर्फीले प्रदेशों में  उत्पन्न होनेवाले ‘पाइन ट्री’ से की गई है | इसकी विशेषता यह है कि ठंड में भी यह वृक्ष न तो कुम्हलाता है ना ही मुरझाता है | इस वृक्ष को सदाबहार मानकर जर्मनी के धार्मिक जगत में इसके प्रति श्रद्धा, भक्ति, और निष्ठा प्रदर्शित की जाती है | पहले यह वृक्ष परंपरा का द्योतक था किन्तु, बाद में इसे धार्मिक आस्था का चोला पहनाकर होली क्राइस्ट के साथ सम्बद्ध कर दिया गया |

वृक्ष की पूजा करना यूरोप के मूर्तीपूजकों में एक सामान्य बात थी | ईसाई धर्म ग्रहण करने के बाद भी यह प्रथा उन लोगों में प्रचलित थी | स्केन्डेनविया के लोग क्रिसमस के अवसर पर पक्षियों के वृक्ष लगाते थे | यह प्रथा काफी समय तक प्रचलित रही | इसके पीछे उनकी यह धारणा थी कि ऐसा करने से घर में बुरी आत्मा प्रवेश नहीं करती | जर्मन के लोगों में मध्यशीत के अवकाश में अपने घरों के प्रवेशद्वार पर थेल ट्री लगाने की प्रथा का प्रचलन था |

क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा का सबंध जर्मनी की सेक्सको बर्ग नामकी रियासत के राजकुमार अल्बर्ट (१८४०-१८६१) से भी जोड़ा जाता है | ई. १८४० में राजकुमार अल्बर्ट ने इंगलैंड की महारानी विक्टोरिया से विवाह किया था | राजकुमार अल्बर्ट ने ही सर्वप्रथम १८४१ में विन्डसर केसले में क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा को समारोहपूर्वक आरंभ किया था | राजकुमार अल्बर्ट द्वारा स्थापित इसी परंपरा को तदुपरांत अंग्रेज ईसाईयों ने अपना लिया | 

 जर्मनवासी २४ दिसंबर को आदम और ईव्ह (हव्वा) के भोज के उपलक्ष्य में स्वर्ग के पेड़ (पैराडाईज ट्री) को सजाते थे |  जिस पर वेफर लटके रहते थे | यह मेजबानी के प्रतीक और ईसाइयों के उद्धार का संकेत था | बाद में विविध प्रकार की कूकीज ने वेफर का स्थान ले लिया | क्राइस्टके प्रतीक के रुप में मोमबतियां सजाई जाती थी |

हरियाली सदा खुशहाल जीवन का प्रतीक क्रिसमस ट्री सभी के लिए खुशी की मंगल कामना का धोतक है | क्रिसमस ट्री के बारे में यह कथा प्रचलित है कि एक लकड़हारा जंगल में अपने परिवार के साथ रहता था | जाड़े की एक रात में वह आग ताप रहा था की तभी किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया | उसने दरवाजा खोला तो उसे बर्फ में खड़ा एक लड़का दिखाई दिया | वह उसे घर के भीतर ले आया | उसने उस लडके को भोजन कराया और फिर सब सो गए |

आधी रात को सारा जंगल नाच गाने से गूंज उठा | लकड़हारे के घर के सब लोग जाग गए | उन्होंने देखा कि वही लड़का नाच गा रहा है तथा परियां और देवदूत भी उसका साथ दे रहे हैं | लकड़हारा समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है | वे स्वयं प्रभु थे | जाते समय वही बालक लकड़हारे के घर के आगे एक पेड़ लगा गया, जो लकड़हारे की हर इच्छा पूरी करने लगा | यही बाद में क्रिसमस ट्री के नाम से मशहूर हो गया और बाद में हर क्रिसमस पर उस दिन की स्मृति में क्रिसमस ट्री घर के आगे लगाने की प्रथा चलन में आई |

क्रिसमस वृक्ष को अपनाएं जाने की यह परंपरा धीरे धीरे योरोपीय राष्ट्रों में पनपने लगी | कुछ समय पश्चात् डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे के उत्तरी भागों में रहनेवालों लोगों ने इस वृक्ष को प्रतिष्ठा दी | चूंकि डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे में पर्याप्त और घने जंगल थे अतः वहां के लोगों ने इन जंगलों से क्रिसमस वृक्षों के छोटे-छोटे पौधों को अपने आवासों में स्थान दिया | साथ ही आवासों में इस वृक्ष को सजाने-संवारने की प्रथा आरंभ की | चीन और जापान में इसका प्रचलन १८वीं और १९वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ | यहां क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी कागजों की सुन्दर डिज़ाइन द्वारा सजाया जाता है |

अमेरिका में सत्रहवीं शताब्दी में इस प्रथा का शुभारम्भ जर्मनवासियों के अमेरिका में बसने से हुआ | इस संबंध में यह भी कहा जाता है कि सम्राट जार्ज तृतीय के समय जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी ने क्रिसमस की रात क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया | इसके बाद वहां के लोग इसका अनुसरण करने लगे | जिससे यह परंपरा एक प्रथा बन गई |

इंगलैंड के केल्ट जाति के पुरोहितों ने क्रिसमस वृक्ष की परंपरा को धार्मिक उत्सव के रूप में जीवित किया और इन्हीं से संसार के ईसाई जगत को इस क्रिसमस वृक्ष की धार्मिक परंपरा विरासत में प्राप्त हुई | कैथलिक पादरियों के अनुसार यह वृक्ष पूजनीय एवं वन्दनीय होकर आशा, शांति और ज्ञान का प्रतीक है |          

     


          

Sunday, 9 December 2018


प्राणी जगत का एक विलक्षण प्राणी है – मकड़ी – भाग ३

शिरीष सप्रे 




मकड़ियों के बुने हुए कलात्मक जाले इन्हें एक दक्ष इंजिनियर प्रमाणित करते हैं | शिल्पकार के रूप में मकड़ी कीट जगत का एक अद्भुत प्राणी है | दुनिया के लगभग हर हिस्से में मकड़ियां पाई जाती हैं | सबसे छोटी मकड़ी का आकार आलपिन के ऊपरी सिरे जितना बड़ा होता है, जबकि  दक्षिण अमेरिका में पाई जानेवाली माइगेल नामक मकड़ी सात  से. मी. लम्बी होती है | इसकी टांगे करीब अठराह  से. मी. लम्बी होती है | यह विशालकाय मकड़ी छिपकली और छोटी चिड़ियाओं तक को खा जाती हैं |

मरुस्थलीय क्षेत्रों, दलदली जंगलों तक बर्फीले प्रदेशों में भयानक किस्म की जहरीली मकड़ियां पाई जाती हैं | उनमें से एक है मैक्सिकन टोरनटुला | यह छोटे-छोटे चूहों तक को खा जाती है और इसके घातक विष से मनुष्य की मृत्यु तक हो सकती है | इसी प्रकार अमेरिका में पाई जानेवाली ब्लैक विडो (काली विधवा) नामक मकड़ी इतनी जहरीली होती है कि यदि यह एक बार किसी को काट ले तो उसका बचना लगभग असंभव होता है | ब्लैक विडो के शरीर में विष बहुत कम मात्रा में बनता है |

मकडी की प्रणय क्रिया बहुत रोचक होती है | आकार में नर, मादा की अपेक्षा छोटा होता है | मादा को आकर्षित करने के लिए नर बहुत्त समय तक नृत्य करता है इसके पश्चात् नर और मादा क्रमशः जाले के एक-एक तार को एक के एक बाद खींचते जाते हैं | यह क्रम कार्य समाप्ति तक चलता रहता है फिर मादा अक्सर नर को खा जाती है | मकड़ियां दो से लेकर तीन हजार तक अंडे देती हैं | अंडों से बच्चे निकलने के बाद भूख के कारण यह एक दुसरे को खाने लगते हैं |

साधारण घरेलू मकडी को जैव वैज्ञानिक भाषा में थेरीडियोम कहा जाता है |  मकड़ियों का मुख्य भोजन कीट-पतंगे और कीडे-मकोडे है | जाला बनाकर शिकार को फसाने की कला में माहिर होने के कारण मकड़ियां आसानी से अपना पेट भर लेती हैं | कई मकड़ियां बिना खाए पिए साल डेढ़ साल तक जिन्दा रह सकती हैं | कुछ मकड़ियां घुमंतु अथवा पर्यटनप्रिय होती हैं | ये घोर आंधी में भी सहज भाव से सैंकड़ों-हजारों मील की उडान भरकर अपनी यात्रा बिना रुके तय कर लेती हैं | एक मकड़ी तो ऐसी भी होती है जो आकार में चींटी जैसी होती है और दीखती भी चींटी जैसी ही अधिकांश पक्षी मांस भक्षी पक्षियों को चींटी का मांस पसंद नहीं होता अतः इसका लाभ इसे मिल जाता है और चींटी बच जाती है | ट्रेपडोर मकड़ी के जाल में एक द्वार ऐसा होता है जिसमें से कीट, पतंगा, मक्खी, आदि अन्दर तो आ सकते हैं पर बाहर नहीं आ सकते |

मकड़ियों के जाल के तार इतने महीन होते हैं कि सैंकड़ों तारों को मिलाकर भी बाल जैसी मोटाई तैयार नहीं हो पाती | लेकिन महीन होने के बावजूद यह काफी मजबूत होते हैं | दरअसल यह जाल रहस्यों से भरे किसी पिटारे से कम आश्चर्यजनक नहीं, जिसका अस्तित्व लगभग २० करोड़ वर्षों से धरती पर बना हुआ है | इतने सालों में मकड़ी ने अपने जाले की बुनावट में जो सुधार किए हैं, उसकी कल्पनाशीलता को देखकर वैज्ञानिक तक आश्चर्य में पड गए हैं | मकड़ियों द्वारा तैयार की गई कुछ संरचनाएं ऐसी हैं कि मनुष्य के द्वारा अभियांत्रिकी के क्षेत्र में की जा रही खोजों को फीका साबित करने लायक सिद्ध हुई हैं |

 मकड़ी जाले के धागों में एक खास प्रकार का चिप-चिपा लगाती हैं, जिसके कारण जाल में फसा शिकार लाख कोशिशे करे छुट नहीं पाता, बल्कि और अधिक फसता चला जाता है | दरअसल मकड़ी का जाला एक किस्म की रेशम से  बना होता है | यह मकड़ी रेशम दुनिया में पाए जानेवाले सबसे मजबूत प्राकृतिक पदार्थों में से एक है | मकड़ी का जाल दुनिया की सबसे मजबूत चीजों में से एक है | अमेरिकी सेना इन मकड़ियों के रेशों से बुलेटप्रूफ जैकेट बनाती है | यह रेशा मनुष्य की जानकारी में आया दुनिया का अब तक का सबसे मजबूत पदार्थ है, यह स्टील से भी अधिक मजबूत और टिकाऊ है |

 यदि मकड़ी रेशे को कार्बन रेशे के साथ मिश्रित कर दिया जाए तो एक बहुत मजबूत पदार्थ बनता है, जो बहुत मुलायम भी रहता है | इस रेशे के कई उपयोग हैं | जैसे एक उपयोग तो यह है कि हड्डीयों को आपस में से जोड़ने वाले तंतु टूट जाने पर इस रेशे को वहां लगाया जा सकता है | मकड़ी का रेशा हमारे तंतुओं से २० गुना ज्यादा मजबूत है |

दरअसल अलग-अलग मकड़ियों के जालों की ताकत अलग-अलग होती है | दक्षिण अमेरिका में पाई जानेवाली एक मकड़ी ‘ब्लैक विडो’ (लैक्ट्रोडैक्स मेक्टन्स) सबसे मजबूत रेशम बनाती है | ब्लैक विडो का बनाया रेशम इतना मजबूत होता है कि इसे इसकी मूल लम्बाई से २७ प्रतिशत और खींचा जा सकता है और यह टूटता नहीं | कल्पना कीजिए कि मकड़ी के इस रेशम की मोटाई कितनी होगी | शायद ०.१ मि. मी. से भी कम, इतने पतले स्टील के तार को भी आप खींच कर सवा गुना नहीं कर पाएंगे | बाकी मकड़ियों के रेशम की ताकत इससे आधी ही होती है |

 बात इतनी ही नहीं दरअसल ब्लैक विडो दो किस्म के रेशम बनाती है | दूसरे किस्म का रेशम तो और भी असाधारण होता है | यह खींचतातो उतना नहीं है, मगर इसे तोड़ने के लिए काफी ताकत लगानी पड़ती है | हाल के अनुसंधान से पता चला है कि इसे तोड़ने के लिए जितनी ताकत लगती है, वह बुलेट प्रूफ जैकेट में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ केवलार से भी अधिक है |

तात्पर्य यह है कि घरों में बेमतलब दिख पड़ने वाला और गन्दगी का प्रतीक मानकर साफ कर दिए जानेवाला मकडी का जाला शोधकर्ताओं के लिए रहस्य का केंद्र बिंदु बना हुआ है | नए-नए शोधों से अभी न जाने कितने रहस्यों का प्रकटीकरण होगा, किन्तु एक बात निश्चित है कि अब तक जो कुछ भी जानकारी सामने आई है वह अभियांत्रिकी के क्षेत्र में एक नई दिशा साबित हो सकती है |        
               


Friday, 7 December 2018

मकड़ी का रहस्यमय जाला - भाग २ शिरीष सप्रे

मकड़ी का रहस्यमय जाला - भाग २
शिरीष सप्रे

 धरती पर सभी जीव-जन्तुओ और कीट-पतंगों के समान मकड़ी भी प्रकृति की अदभुत देन है | जो घर के कोने में जाला बुनते हुए देखी जा सकती है | उसका यह जाला रहस्यों से भरे किसी पिटारे से कम नहीं | मकड़ी के जिन जालों को आप यदाकदा झाड़ू से साफ़ कर देते हैं, वे वास्तव में असाधारण रूप से मजबूत होते हैं |
  
 एक दिलचस्प बात यह है कि मकड़ी के जाले में बुलेटप्रूफ जैकेट की तरह मजबूती होती है इसलिए कुछ विशेष जाति की मकड़ी के जाले चूहे या चिड़िया को भी पकड़ लेते हैं |

मकडी अंडे रखने के लिए कागज की तरह पतली सफेद तह बनाती है | चीनी वैद्यों के अनुसार इस तह को निकालकर गुड के साथ गोली बनाकर देने से किसी भी प्रकार का ज्वर उतरने के साथ आंखों से निकलनेवाला पानी भी बंद हो जाता है | 
  
हमारे जीवन से सम्बंधित प्राणी जगत से जुडी कई बातें मुहावरों-कहावतों और लोकोक्तियों के रूप में मान्यताएं प्रचलित हैं तथा मकड़ी भी इससे बच नहीं सकी है – विश्व के कुछ देशों में मकड़ी स्वस्थता एवं सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है | अगर आपके पर्स से मकड़ी निकलती है तो निकट भविष्य में धन प्राप्त होगा, अगर पहने जानेवाले कपड़ों से मकड़ी निकलती है तो आप निकट भविष्य नए कपडे खरीदेंगे, इस प्रकार की मान्यताएं यूरोप में प्रचलित हैं | एक लोकोक्ति के अनुसार ब्राजील की महारानी बानू ने ब्रिटेन की महारानी को स्वस्थता एवं दीर्घायु के लिए मकड़ी के जाले से बनी विशेष ड्रेस भेजी थी |

योरप की एक नर मकड़ी अपने रेशम जैसे जाल में मक्खी को पकड़ कर अपनी पसंद की मादा को उपहार में देती है | लेकिन यह भेंट उसके जीवन की अंतिम भेंट होती है | क्योंकि, सहवास के बाद मादा नर को खा जाती है | ब्लैक विडो मकड़ी का उल्लेख पहले भी आ चूका है इसमें मादा सहवास के बाद नर को खा जाती है |

नेफिला प्रजाति की ‘वन सुंदरी’ (जंगल ब्यूटी) नाम से पुकारे जानेवाली मकड़ी सबसे मजबूत धागा निकालती है | इसका जाला करीब पांच फीट से अधिक व्यास का होता है | कांगो के जंगलों में मिलनेवाली कुछ प्रजातियां हवा में उड़ाते हुए भी जाला बन सकती हैं | मकड़ी एक बार में दो से लेकर तीन हजार तक अंडे देती है व अंडों को धागे से अच्छी तरह लपेट कर एक गुच्छे का रूप दे देती है | कुछ मकड़ियां अपने अंडे रेशम के कोकून में देती है | रेक्ट और आरजीरोनेटा प्रजाति की मकड़ियां पानी में रहती हैं | ये मकड़ियां पत्ते पर तैरती रहती हैं और जैसे ही कोई कीड़ा नजर आता है उसका शिकार कर लेती हैं | हिप्सा प्रजाति की मकड़ी घास के बीच जाला बनाकर रहती है |

मकडी के बच्चे शुरू से ही अपने माता-पिता जैसे दिखते हैं और तीन से लेकर बारह निर्मोचनो के बाद वयस्क बन जाते हैं | टरेनटुला नामक मकडी को पूर्ण वयस्क होने में ९-१० वर्ष लग जाते हैं | इस मकडी की आयु २५-३० वर्ष तक होती है | साधारणतया मकड़ी की आयु एक वर्ष से अधिक नहीं होती | टांगे टूट जाने पर इनकी दूसरी टांगें निकल आती हैं | इनकी एक से चार जोड़ी तक आंखें होती हैं |

विश्व में तीस हजार से भी अधिक प्रकार की मकड़ियां पाई जाती हैं | अंग्रेजी में इनमें से कई एक के नाम बड़े मनोरंजक रखे गए हैं – यथा ग्रीन स्पाइडर (हरी मकड़ी), ब्लैक विडो (काली विधवा), होम स्पाइडर (घरेलु मकड़ी), गार्डन स्पाइडर (कानन मकड़ी), वाटर स्पाइडर (जल मकड़ी), वुल्फ स्पाइडर ( भेडिया मकड़ी) और क्रैब स्पाइडर (केकड़ा मकड़ी) |

क्रैब स्पाइडर (केकड़ा मकड़ी) यह गिरगिट की तरह रंग बदलती है | सामान्यतया यह पीले रंग की होती है लेकिन परिस्थितियों के अनुसार अपना रंग बदल लेने की अद्भुत क्षमता इनमे होती है | यह आम तौर पर फूलों में छुपकर अपने शिकार की प्रतीक्षा करती हैं | यह मकड़ी जिस रंग के फूल पर बैठती है , उसका शरीर भी उस रंग का हो जाता है |

केथरीन क्रेग इस महिला संशोधिका ने मकड़ी के जालों का विशेषतौर पर अध्ययन किया है | सभी मकड़ियां धागे निर्मित करती हैं परन्तु , इन धागों में प्रथिनों के विविध प्रकार होते हैं | धागों की रचना विभिन्न प्रकार की और भिन्न कामों के लिए होती है | उदा. टरेंटूला जाति की मकड़ी रेशम का जो धागा तैयार करती है वह दो भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रथिनो से बना हुआ होता है | यह धागे घरों को अन्दर से अस्तर के रूप में लग जाते हैं | अंडों के आस-पास कोश तैयार करते हैं |

मकड़ी की एक जाति तो विशाल आकार के गोलाकार जाले निर्मित करती है | इन धागों की विशेषता यह है कि ये प्रकाश का परावर्तन विविध प्रकार से करते हैं | इस कारण ये जाल कुछ विशिष्ट परिस्थितियों के लिए और विशिष्ट कीटकों के लिए होना संभव है |
दक्षिण ब्राज़ील में नेफिला क्ले व्हिपेस जाति की मकड़ी विविध प्रकार के स्थानों पर बड़े गोलाकार जाल निर्मित करता है | यह संसार में सबसे बड़ा जाला बुननेवाली मकड़ी है | इस मकड़ी द्वारा बुना गया जाला, आदमी के कद के बराबर होता है | यह एक बड़े पहिये की शक्ल में होता है | नेफिला दिन-रात निरंतर जाले की निर्मिती ख़त्म होने तक भिड़ी रहती है | इसका जाल  वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना होता है और अत्यंत मजबूत भी होता है |       
यह मकड़ी धागों पर पीले रंग का द्रव्य डालती है | इस कारण यह जाले पीले रंग के नजर आते हैं और इस कारण कुछ लोग इन्हें सुनहरे जाले बुननेवाली मकड़ी कहते हैं | ये मकड़ियां पीले रंग के जाले क्यों निर्मित करती हैं इसका शोध करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार की मधु मक्खी पर प्रयोग किया गया | तब यह पाया गया कि पीले जालों में सबसे अधिक मक्खियां फसी हुई मिली | दूसरी बात यह की जालों के धागों का पीला रंग विभिन्न स्थानों पर कम ज्यादा होता है और मधु मक्खियों को जाल का पता लगने नहीं देता |
  
 मधु मक्खियां फूलों के रंगों को पहचान लेती है | विशेष रूप से उनकी आंखें अति नीले रंग की किरणों के लिए संवेदनक्षम होने के कारण ये मक्खियां पंखुड़ियों की विविध पत्तियों की रचना को पहचान लेती हैं | मकड़ियों को मधुमक्खियों का यह गुण संभवतः मालूम है | कारण अर्जिओप नाम की मकड़ी स्वच्छ प्रकाश में अपना पारदर्शक जाल बनाती है | उस जाल का एक भाग टेढ़े मेढ़े धागों से बांधकर अलग किया हुआ होता है | सच कहें तो वह भाग एक फन्दा होता है |  क्योंकि,  उसकी रचना के कारण धागे सूर्य प्रकाश की अति नील किरणें परावर्तित करता है | यह फन्दा साधारणतया जाल के मध्य भाग में अधिक चिन्ह के समान तैयार किया हुआ होता है | स्वाभाविक ही है कि मधु मक्खियां धोखा जाती हैं और जाल में फस जाती हैं |

कुछ होशियार मक्खियां जाल को टाल सकती हैं | उन्हें पकड़ने के लिए यह मकड़ी प्रति दिन नए – नए फंदे तैयार करती है और इन्हें पकड़ती है | सिवाय इन जालों की अतिनील किरणें परावर्तित करने की क्षमता भी बदली जा सकती है जो मधुमक्खियां घास के फूलों का शोध अतिनील किरणों की सहायता से लेती हैं, वे मक्खियां इन मकड़ियों के जालों में विशेष रूप से फसती हैं | मानलो वे मक्खियां अतिनील किरणों को परावर्तित करनेवाली वस्तुओं को टालने लगी तो, उन्हें भोजन ही नहीं मिलेगा | प्रकृति में एकदूसरे को मात देने की कोशिशें चलती ही रहती हैं | मकड़ियों का जाल भी उन्हीं का एक भाग है | ......
        

Sunday, 25 November 2018

कीट जगत का एक अजूबा - मकड़ी भाग १ शिरीष सप्रे


कीट जगत का  एक अजूबा - मकड़ी भाग १
शिरीष सप्रे

अपन जिस स्थान पर रहते हैं वहां केवल मनुष्यों का ही रहवास नहीं होता चूहे, झींगुर, चीटिंयां जैसे अन्य प्राणी भी रहते हैं | उन्हीं में से एक मकड़ी भी है | कीट जगत में मकड़ी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है | इसे जो स्थान योग्य लगता है वहीँ यह अपना जाला बना लेती है और भक्ष्य की राह देखने लगती है | 

मकड़ी ही एक ऐसा जीव है जो अन्य कीड़ों के शरीर का रस चूसकर जिन्दा रहती है | किसी भी कीट विज्ञानी ने आज तक किसी मकड़ी को भोजन चबाते या टुकडे निगलते नहीं देखा | पक्षियों से लेकर चूहों तक का शिकार करनेवाली मरुस्थलीय प्रदेशों, गर्म दलदली जंगलों व बर्फीले स्थानों पर मिलनेवाली टेरेंतुला मकड़ी भी अपने मुंह से शक्तिशाली पाचक रस निकालकर अपने शिकार के शरीर को गला डालती है | इसके पश्चात् इसे रस की तरह चूस डालती है | 

यदि हम घर साफ़ करने निकलें तो हमें अनेक जालें दिख पड़ेंगे | वैसे हमें कष्ट न देने वाली होने के कारण हम इसकी उपेक्षा करते हैं और इसी कारण हमें इसकी कोई विशेष जानकारी भी नहीं होती | परन्तु मकड़ी की दुनिया और जीवन बहुरंगी है इसलिए उसकी अपरिचित कहानी निश्चय ही रोचक एवं मनोरंजक लगेगी इसमें कोई शक नहीं |

शायद ही संसार में कोई ऐसा स्थान हो जहां मकड़ी ना पाई जाती हो | सागर से लेकर सागरमाथा, जंगलो, चरागाहों, दलदल, रेगिस्तानों, भूमिगत गुफाओं आदि सभी स्थानों पर मकड़ी पाई जाती है | मकड़ी की ४०,००० से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं | कुछ समुद्री मकड़ियां समुद्री पानी के किनारें स्थित चट्टानों से बनी कंदराओं में भी रहती हैं | जहाँ वे समुद्र में तैरने वाले नन्हें कीड़ों आदि को खाकर अपना जीवन निर्वाह करती हैं |

हाल ही में ईरान के तेहरान विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं नें मकड़ी की एक नई प्रजाति की खोज की है इसका नाम ‘लायकोसा अर्गोगी’ रखा गया है, जो कि जेके रोलिंग की किताब पर बनी विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म हैरी पाटर के बोलते मकडे के नाम पर रखा गया है |  पैर को छोड़कर इस मकड़ी का शरीर एक इंच लम्बा है | मकड़ी के शरीर के उपरी हिस्से में दो काले और तीन सफेद बालों की धारियां हैं | यह मकड़ी दक्षिणी - पूर्वी ईरान के केरमान प्रान्त के पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है |

चालीस करोड़ वर्ष पूर्व कीटकों ने इस पृथ्वी पर पदार्पण किया उसके कुछ समय बाद मकड़ी, बिच्छु इस वर्ग के प्राणी अवतीर्ण हुए | इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य से भी अनेक वर्षों पूर्व यह संसार में आई | कीटकों को छः पांव होने के कारण इस वर्ग को षटपाद कहते हैं | परन्तु बिच्छु को आठ पांव होने के कारण इसे अष्टपाद प्राणियों में गिनेंगे | मकड़ियों के चलने का ढंग काफी विचित्र होता है | चलते वक्त अगर बाई तरफ की पहली और तीसरी टांग उठाती है तो दाएं तरफ की दूसरी तथा चौथी | इसके बाद अगले कदम के लिए बाएँ तरफ की दूसरी व चौथी टांग के साथ दाएं तरफ की पहली और तीसरी उठाती है |

मकड़ियों का विकास कीटकों के साथ ही हुआ | कुछ कीटक ही रेशम जैसे धागे बना सकते हैं और वह भी केवल ये धागे स्वयं के आस-पास कोश बनाने के लिए | परन्तु सभी मकड़ियां धागे बनाती हैं | प्रत्येक मकड़ी के उदर पर रेशम ग्रंथियां होती हैं और तंतुओं की सहायता से वे धागे वातावरण में छोड़ती रहती  हैं | इसके अलावा इन धागों को बुनकर या व्यवस्थित रचना कर उनसे विविध आकार के छोटे-मोटे जालें ये बनाती हैं | मकड़ी की जाति के अनुसार अनेक प्रकार की रेशम बनती है | पानी के अन्दर बनाए गए जाले के अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के जाले मकड़ियां बुनती हैं |

मकड़ियों के शरीर की बढ़ोत्री केंचुली छोड़कर होती है | ऐसे समय में वे अपने जाल के आश्रय में चली जाती हैं | कुछ मकड़ियां फलित अंडे के आस-पास कोश बनाती हैं और कोश से बच्चा बाहर निकलता है तब पहला धागा निकालकर उसके आधार पर हवा में तैरनेवाले जीव का दुनिया में पदार्पण होता है | नर मकड़ी अपना जाल मादा मकड़ी को सन्देश देने के लिए उपयोग में लाती है | इसके लिए वह धागे को विशिष्ट पद्धति से हिलाती है | 

मकड़ी के विकास में और भी कुछ घटक हैं | उदा. उसकी भक्ष्य पकड़ने की पद्धति | अधिकांश मकड़ियां अपने भक्ष्य को विष चुभोती हैं | इसके अलावा दुसरे प्रकार भी मनोरंजक हैं | एक छोटे आकार की मकड़ी अपने भक्ष्य के आस-पास धागों का कड़ा आवरण बहुत तेजी से बनाकर भक्ष्य को एक ही स्थान पर जाम कर देती है | दीमक खानेवाली मकड़ी के सबसे अगले पांवों की जोड़ी पर विषग्रंथि होती हैं | कुछ मकड़ियां भक्ष्य को स्थिर करने के लिए भक्ष्य के शरीर पर गोंद जैसा चिप-चिपा द्रव्य फेंकती हैं | संकट आने पर शत्रु से दूर भागने के लिए कुछ जातियां अपने को गोल बना लेती हैं और तेजी से लुढकते हुए दूर चली जाती हैं |

कुछ मकड़ियां जहरीली होती हैं इसलिए लोग इनसे डरते हैं | केवल दो जातियों को छोड़कर सभी मकड़ियों में विष-ग्रंथियां होती हैं | ये ग्रंथियां नियंत्रित होती हैं तथा विशेष मौकों पर ही मकड़ी इनका प्रयोग करती है | जो मकड़ी जाले बनाती है वह अपने शिकार को पकड़ने के लिए इस विष ग्रंथी का प्रयोग नहीं करती | जो फूलों में छिपकर कीड़ों-मकोड़ों को उनके पंखों से पकड़ती हैं वे अपने शिकार को विष से मार देती हैं | मकड़ियां घिर जाने पर इस विष को अंतिम अस्त्र के रूप में आत्म रक्षा के लिए प्रयोग में लाती हैं |

मकड़ी के काटने से तेज दर्द होता है, आदमी बीमार भी पद सकता है | इस प्रकार की मकड़ियां आस्ट्रेलिया में पाई जाती हैं | बड़े आकार की घातक समझी जानेवाली कभी भी मनुष्य को नहीं मारती | हां, हाथ-पांव पर कहीं काटती है तो सूजन हो जाती है तथा कुछ दिनों तक दर्द रहता है | अधिकांश मकड़ियां बर्रों के मुकाबले कम हानिकारक होती हैं | कुछ मकड़ियां तो हाथ से पकडे जाने पर भी नहीं काटती |

ज्यादातर मकड़ियों का विष मनुष्य या बड़े जानवरों को हानि नहीं पहुंचाता परन्तु अमेरिका में पाई जाने वाली मकड़ी ‘ब्लैक विडो’ का विष मनुष्य को आसानी से मार सकता है | यह सबसे मजबूत रेशम बनाने के लिए भी मशहूर है | ‘क्रेव स्पाइडर’ नामकी मकड़ी में अपने शरीर का रंग बदलने की क्षमता होती है जिससे वह शिकार को आसानी से मार सकती है | जम्पिंग या कूदनेवाली मकड़ी की आँखें बहुत तेज होती हैं तथा तेजी से भाग रहे शिकार को कूदकर झट पकड़ लेती हैं | अमेरिका के रेड इंडियन व अमेजन जंगलों में रहनेवाले कई आदिवासी इन मकड़ियों को देवी मानते हैं व इनकी पूजा करते हैं | एक अंग्रेजी कविता की यह पंक्तियां मकड़ियों पर ही केन्द्रित है- अगर आपको सुखी एवं समपन्न जीवन जीना है तो मकड़ी को शांतिपूर्वक जीने दो, क्योंकि मक्खी, मच्छर, चींटी, आदि जीव मकड़ी के प्रिय भोज्य पदार्थ हैं | इसलिए घर में होने वाले इन जीवों से बचाने में मकड़ी हमारी सहायता करती है | थाईलैंड के आदिवासी मकड़ियों से स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ भी तैयार करते हैं | 

 साधारणतया मकड़ी की दृष्टि तीव्र नहीं होती | परन्तु इसके भी अपवाद हैं | छलांग मारनेवाली मकड़ी उड़नेवाले कीट को लक्ष्य बनाकर पकड़ लेती है |  मकड़ियां बहरी व सूंघने में असमर्थ होती हैं | परन्तु, पूरे शरीर पर पाए जानेवाले महीन कांटों जैसे रोम या बालों की संवेदनशीलता की सहायता से यह अपने शिकार शत्रुओं व मौसम के बढ़ते घटते ताप को झट पहचान जाती है |
कीट जगत में मकड़ी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है | इंगलैंड के प्रसिद्ध जंतु विज्ञानी डा. विलियम ब्रिस्तोव के अनुसार एक एकड़ खेत की जमीन में छोटी-बड़ी २० लाख मकड़ियां होती हैं और उसमें भी चारे वाली जमीन तो यह सख्यां न्यूनतम समझी जाती है |

 इस प्रतिभासंपन्न कीट को कीट जगत का इंजिनियर ही नहीं तो वास्तुविद, अप्रतिम कतनिया और श्रेष्ठ बुनकर भी कह सकते हैं | झूलनेवाला पुल बनाने वाला प्रथम जीवंत प्राणी होने का श्रेय मकड़ी को ही जाता है | मनुष्य को पूल बनाने की प्रेरणा एवं आत्मविश्वास भी निश्चय ही मकड़ी ही से मिला होगा | इस पर यह प्रेरणादायक किस्सा प्रस्तुत है – चौदवीं सदी में एक मकड़ी एक गुफा की अंदरूनी छत पर जाला बुनने में छह बार असफल रही, पर उसने हिम्मत नहीं हारी और अंत में सातवें प्रयास में उसे सफलता मिल ही गई | उस गुफा में स्काटलैंड का पराजित राजा राबर्ट ब्रूस यह सब देख रहा था | अपनी घोर निराशा के इस दौर में उसे इस मकड़ी के इन प्रयासों से बड़ी प्रेरणा मिली | उसने अपने शत्रुओं से एक बार फिर लोहा लिया और उन्हें परास्त कर दिया |

अपन कहते हैं कि चक्र का शोध मनुष्य ने लगाया परन्तु कई करोड़ वर्ष पूर्व मकड़ी की एक जाति ने यह शोध इसके भी पूर्व लगा लिया था | रेगिस्तान जैसे प्रदेशों में बालू के टीले बन जाते हैं इन टीलों पर विलक्षण उतार बन जाते हैं |  इन पर कारपराक्वेन आरिओ फ्लावा इस जाति की मकड़ी अपने शरीर को लपेटकर एकाध चक्के के समान फिसलती है और शत्रु से अपना बचाव करती  है व इस चक्र का अक्ष नहीं होता | एकाध मुक्त किए हुए चक्के के समान लुढकते चले जाती है | गुरुत्वाकर्षण की सहायता से प्रति सेकंड ३० से १५० से.मी. की गति से यह यात्रा करती है |

 यह मकड़ी सुनहरे पीले रंग की होती है | दिन में धूप से कष्ट न हो इसलिए रेत के बिल में रहती है और रात को अपने भोजन को पकड़ती है | चक्राकार गति से एक नुकसान यह होता है कि इस गति के लिए बड़ी मात्र में उर्जा लगती है | और थकने के कारण आराम के समय शत्रु उस पर हमला कर सकता है | इस मकड़ी का शत्रु है ततैया उड़ने के कारण वह भक्ष्य का पिछा कर उसे पकड़ सकता है | यदि उतार अच्छा हो तो यह मकड़ी दौड़कर अपना बचाव कर सकती है |

जनन काल में दो नरों में लड़ाई होती है | एक विशिष्ट जाति की मकड़ीयों में नर को तलवार जैसे उपांग होते हैं जिनका उपयोग दुसरे नर को हटाने के लिए होता है |......  ....