Friday, 16 August 2019


भगवान् श्रीकृष्ण की आठ पत्नियां
शिरीष सप्रे

भगवान् श्रीकृष्ण एक आदर्श राजा थे और उनकी आठ पत्नियां थी | किसी भी राजा को नीति बन्धनों का पालन करना ही पड़ता है इस दृष्टि से श्रीकृष्ण ने स्वतः विवाहबद्ध होकर आठ पत्नियां की थी | श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों सम्बन्धी जानकारी आगे दी गई है –

विदर्भ देश के राजा भीष्मक की अत्यंत रूपवती कन्या रुक्मणी का स्वयंवर कुण्डिनपुर में होने वाला है की सूचना मथुरा पहुंची | भरतखंड के सभी क्षत्रिय राजाओं को स्वयंवर का निमंत्रण गया परन्तु, भीष्मक का पुत्र रुक्मी जरासंध का परम स्नेही होने के कारण उसने जरासंध आदि अनेक राजाओं को पराजित करनेवाले श्रीकृष्ण को जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया |

श्रीकृष्ण के पराक्रम की प्रसिद्धि रुक्मीणी ने भी सुनी थी | रूप-गुण; वीरता, संपत्ति आदि गुणों से संपन्न श्रीकृष्ण पर वह अनुरक्त होकर स्वयंवर के समय उसका ही वरण करने का निश्चय उसने किया होने की अंदरूनी जानकारी भीष्मक और रुक्मी को ज्ञात हुई थी | इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण राजा नहीं यह कारण बताकर निमंत्रितों की सूची से श्रीकृष्ण का नाम जानबूझकर हटा दिया था | उधर श्रीकृष्ण के कानों पर रुक्मणी की बुद्धि, औदार्य, सौंदर्य, आदि गुणों और अनेक शुभ लक्षणों से युक्त होने के वर्णन गए थे और वह अपनी भार्या होने के योग्य है, ऐसा उन्हें लगने लगा था | निमंत्रण नहीं होने पर भी स्वयंवर में एकत्रित सभी राजाओं के समक्ष उपवर कन्या का जबरदस्ती से हरण करने का क्षत्रियों को अधिकार है, यह मन में विचार श्रीकृष्णकर अपने अजिंक्य सुदर्शन पथक सहित कुण्डिनपुर में आ दाखिल हुए |

स्वयंवर में श्रीकृष्ण के होते रुक्मणी उनके सिवाय किसीका भी वरण नहीं करेगी और श्रीकृष्ण से युद्ध करने का सामर्थ्य स्वयंवर में उपस्थित किसी भी राजा में नहीं इसका विश्वास उन राजाओं को स्वयं था परन्तु, भीष्मक के सामने क्रोधित होने का दिखावा कर सारे राजा चलते बने | अर्थात स्वयंवर रद्द हो गया |

एक दिन एक तेजस्वी ब्राह्मण विदर्भ देश से श्रीकृष्ण से भेट के लिए द्वारका आया |  उसने रुक्मणी की पत्रिका श्रीकृष्ण को दी, उन्होंने खोलकर वह पढ़ी | रुक्मणी ने प्रारम्भ में स्वयंवर भंग होने के बाद से सारा वृतांत लिखा हुआ था | श्रीकृष्ण के भय से अब स्वयम्वर का आयोजन न करते उसके भाई रुक्मी ने जरासंध के आग्रह पर चेदी देश के शिशुपाल से उसका विवाह करना राजा भीष्मक की इच्छा के विरुद्ध तय किया है | इस प्रकार से श्रीकृष्ण को कहलाकर उसने आगे लिखा था – हे भुवन सुन्दर श्रीकृष्ण, तुम्हारे गुण, तुम्हारा अनुपम रूप-सौंदर्य का वर्णन सुनकर मेरा मन तुम पर आसक्त हो गया है | विवाह के एक दिन पहले हमारे कुलदेवता की बड़ी यात्रा होगी और उस समय वधू नगर के बाहर देवी पार्वती के दर्शनों के लिए जाती है | उस अवसर का लाभ उठाकर मौका देखकर तुम मेरा हरण कर लो |

विवाह के मुहूर्त में अब बहुत थोडा समय बचा था | विदर्भ देश के राज घराने के कुलाचार के अनुसार नववधू को देवी अम्बिका के दर्शनों के लिए ले जाने की तैयारी हो गई | नववधू द्वारा दर्शनों के लिए पैदल ले जाने की प्रथा थी | वयस्क ब्राह्मण सुवासिनी वस्त्र-अलंकारों से भूषित होकर वधू को लेकर देवी के मंदिर की ओर निकली |

वापसी के लिए वह देवी के मंदिर के बाहर आई तो अचानक गरुड़ चिन्हांकित रथ आकर वहां रुका और उसमें से मनमोहक श्यामसुंदर श्रीकृष्ण नीचे उतरे और स्मित हास्य करते रुक्मणी के सामने आकार खड़े हो गए | रुक्मणी ने उनके गले में अपने हाथ में का हार तत्काल पहना दिया | नारदजी और महामुनि गर्ग अचानक वहां प्रकट हो गए उन्होंने श्रीकृष्ण के हाथ में दिव्य पुष्पों का हार दिया उसे श्रीकृष्ण ने रुक्मणी के गले में पहना दिया | नारदजी और महामुनि गर्ग ने वरवधू पर मंगल अक्षता डालकर तालियां बजाई | मंगल वाद्यों की गर्जना के बीच श्रीकृष्ण रुक्मणी को लेकर रथ में बैठे और रथ चल पड़ा | इस रथ के पीछे-पीछे एक और रथ आया उसमे नारदजी और महामुनि गर्ग के बैठते ही वे रथ विद्युत गति से दौड़ पड़े | इस प्रकार रुक्मणी हरण हुआ |

श्रीकृष्ण स्यमन्तक मणि के शोधार्थ जब भटक रहे थे तब जंगल की एक गुफा में जाम्बवन्त नामक एक रीछ राजा रहता था वहां वह मणि मिली | राम भक्त जाम्बवान के कुल में जन्मे और राम को पूज्य माननेवाले उस रीछ  राजा ने श्रीकृष्ण का आदर-सत्कार किया | जाम्बवान को जाम्बवती नामकी एक सुन्दर कन्या थी | श्रीकृष्ण की पूजा करने के उपरांत उसने नम्रतापूर्वक श्रीकृष्ण से कहा, ‘हे कृष्ण, हमारे राम के समान ही तुम भी पराक्रमी और सर्वगुण संपन्न हो | साक्षात भगवान् राम ही हमारे घर तुम्हारे रूप में प्रगट हुए हैं, ऐसा मुझे लगता है | हे कृष्ण, मैंने तुम्हारे साथ युद्ध किया, यह मेरा अपराध क्षमा कर तुमने मेरी पूजा स्वीकार की | अब एक और प्रार्थना करनी है | मेरी सुन्दर कन्या तुम्हेँ अर्पण कर वरदक्षिणा के रूप में यह स्यमन्तक मणि तुम्हे सौपना चाहता हूं | यह मेरी इच्छा पूर्ण कर कृपया मुझे धन्य करें |’

इस कन्या का स्वीकार किया तो भविष्य में जाम्बवान की यह सेना अपने काम आएगी, गरुडेश्वर के समान ही जाम्बवान से घनिष्ठता निर्मित होने पर अन्य जंगली राजा भी अपने वश होंगे, इस प्रकार का गम्भीर और दूरदर्शी विचार कर कृष्ण ने जाम्बवान की विनती को मान्य किया | जांबवान ने बड़े ठाट से विवाह समारोह करना तय किया | दुसरे दिन उसने विधिपूर्वक कृष्ण को जाम्बवंती स्यमन्तक मणि सहित अर्पण की |

इस स्यमन्तक मणि की जो मूलतः द्वारका के पराक्रमी सूर्योपासक सत्राजीत की थी और भगवान् सूर्यनारायण ने प्रसन्न होकर यह उसे दी थी एवं इसकी चोरी का आरोप भगवान् कृष्ण पर लगा था और श्रीकृष्ण इसी मणि की तलाश में वन में गए थे | कथा के अधिक विस्तार में हम न जाते | श्रीकृष्ण ने द्वारका नगरी लौटते ही यह मणि सत्राजीत को सौंप दी | सत्राजीत ने प्रसन्न होकर अपनी सुन्दर और सुशील कन्या सत्यभामा से उनका विवाह कर दिया और यह स्यमन्तक मणि भी भेटस्वरुप दे दी |

यमुना किनारे घने जंगल में एक तपस्वी रहते थे और इस वन के जंगली उन्हें ईश्वर का अवतार समझते थे और उनकी आज्ञा का पालन बड़े आदरपूर्वक करते थे | उस तपस्वी की कालिंदी नामकी एक सुन्दर कन्या थी | इस कालिंदी को सभी लोग मनुष्य रूप धारण करनेवाली पवित्र यमुना नदी ही समझते थे | इस वन में कृष्ण मृगया के लिए गए थे | वहां उन्होंने कालिंदी को देखा और देखते ही वे उस पर मोहित हो गए | तपस्वी ने कालींदी का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया | यह विवाह कर श्रीकृष्ण ने उस क्षेत्र में रहनेवाले सभी लोगों का आदर सम्पादन किया |  

श्रीकृष्ण का पांचवा विवाह अवन्ती के राजा की कन्या ‘मित्रविंदा’ से हुआ था | मित्रविंदा श्रीकृष्ण की बुआ राजाधिदेवी की कन्या | राजाधिदेवी के पुत्र विंद और अनुविन्द दुर्योधन के स्नेही होने के कारण उसका मत था कि अपनी बहन श्रीकृष्ण ना वरे | अवन्ती के राजा ने जब अपनी कन्या का स्वयंवर रचा तब श्रीकृष्ण वहां गए थे उस समय मित्रविन्दा ने श्रीकृष्ण को ही वरमाला पहनाई | 

  कोसल देश का नग्नजीत नामका एक राजा था | उसकी कन्या सत्या अथवा नाग्नजीती अत्यंत रूपवती थी | उस राजा ने उसके विवाह के लिए एक विलक्षण शर्त रखी थी | उसके पास मस्ती पर आए हुए ऐसे बड़े सात जंगली बैल थे | जिनके सामने जाने का साहस किसी भी मनुष्य में नहीं था | उस बैल के सामने अकेले जाकर जो कोई उसे नकेल डालकर अपने कब्जे में लेगा उस पराक्रमी पुरुष को मेरी कन्या वरमाला पहनाएगी ऐसी घोषणा राजा ने की थी | परन्तु यह शर्त जीतने का प्रयत्न बहुत से राजाओं ने करके देखा परन्तु सफलता किसी के हाथ न लगी |

गोकुल में छोटे से बड़े हुए श्रीकृष्ण ने जब यह शर्त सुनी तब जंगलों में गाय बैलों को काबू में करने की कला मालूम होने के कारण उसने वह शर्त जीतने का निश्चय किया | श्रीकृष्ण अपने यशस्वी पथक को लेकर कोसल देश की ओर चल पड़े |
उस मत्त पशु को काबू में करने का अपूर्व कौशल्य देखकर सभी लोग चकित रह गए | नग्नजीत ने अपनी कन्या सत्या श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नतापूर्वक विवाह समारोह आयोजित कर अर्पण की | नग्नजीत ने श्रीकृष्ण को एक हजार गाएं, एक हजार घोड़े और पांच सौ हाथी भेंट के रूप में दिए | इनके अलावा सोना, हीरे, मोती-माणिकवगैरा संपति भी प्रदान की |

केकय देश के राजा की पत्नी श्रुतकीर्ति भी श्रीकृष्ण की बुआ थी | उसकी लड़की ‘भद्रा’ भी विवाह योग्य होते ही केकय देश के राजा ने श्रीकृष्ण से उसका विवाह बड़े ठाठ से कर दिया |

मद्र देश के पराक्रमी राजा की कन्या लक्ष्मणा अत्यंत लावण्यवती और शुभ लक्षणों से युक्त थी | स्वयंवर में श्रीकृष्ण को उसने वरमाला पहनाई | विवाह समारोह में मद्र्देशाधिपति ने श्रीकृष्ण को हजारों श्रेष्ठजाति के घोड़े, महाबलाढय हाथी, सैकडों रथ और अपरंपार युद्ध साहित्य भेंट के रूप में अर्पित किया |

इस प्रकार श्रीकृष्ण के आठ विवाह हुए | श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों के नाम आगे दिए हुए श्लोक में ग्रथित हैं  - ‘भैष्मी जाम्बवती भामा सत्या-भद्राच लक्ष्मणा | कालिंदी मित्रविंदा चेत्यष्टो पट्ट महा स्त्रिय: |’                  
                                    

Wednesday, 17 July 2019

काशी जहां हर कंकर शंकर का प्रतिरूप है - शिरीष सप्रे


काशी जहां हर कंकर शंकर का प्रतिरूप है
शिरीष सप्रे

काशी विश्व का प्राचीनतम नगर होकर मंदिरों की नगरी है | भारतीय संस्कृति की धड़कन, अस्मिता का प्रतीक है काशी | हर घर शिवालय और हर चौराहा किसी देवी-देवता का देवरा या चौरा है | भूत भावन, भगवान् शंकर को दो स्थान काशी और कैलाश अत्यंत प्रिय हैं | काशी का इतिहास अत्यंत विराट है | प्राचीन नगरों दमिश्क, रोम, एथेन्स और ऑक्सफ़ोर्ड से भी अधिक प्राणवान है | काशी अनादिकाल से अक्षुण होकर काशी में ज्ञान का अपार भण्डार है | काशी यानी शिवपुरी | भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विख्यात है |

काशी उसे कहते हैं जो प्रकाश देता है, काशते प्रकाशते इति काशी | काशी को वाराणसी (बनारस) भी कहते हैं | असि एवं वरुणा दो नदियों के मध्य वाराणसी स्थित है | काशी का विनाश किसी भी युग के अंत में नहीं होता है | काशी भूतभावन शंकर के त्रिशूल पर अवस्थित है | यह पृथ्वी पर स्थित नहीं है, अपितु पृथ्वी के ऊपर अवस्थित है | ऐसा उपाख्यान पुराण में है | इसकी गणना सात पुरियों में भी है | परन्तु इन सभी से यह पुरी अनुपम एवं उच्च है | यहां शिव और माता अन्नपूर्ण का वास है |

काशी को स्वयं विश्वेश्वर ने निर्मित किया है | इसी आनंदकानन में वे निवास करते हैं | काशी का प्रत्येक कंकर शिवस्वरूप एवं शिवमय है | यहां साक्षात शिवजी गुरु हैं | शिवजी स्वयं यहां जीवों को उपदेश देते हैं और पुराण के अनुसार उन्हें तारक मन्त्र का उपदेश कानों में देते हैं | इस प्रकार जीव जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है | (काशी मरणांमुक्ति) काशी में जीव के मरने पर उसकी मुक्ति हो जाती है | काशी में मरना मोक्ष होता है |

तुलसीदासजी ने स्वरचित रामायण में लिखा है ज्ञानहि भक्तिहि नहीं कछु भेदा अर्थात ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिलती | यह ज्ञान ईश्वर के विषय में होता है | जीव माया को ठगिनी जानता है और ईश्वर के अंश को आत्मारूप में समझता है | ऐसा ज्ञान जब प्राणी को हो जाता है तभी वह ज्ञानी कहा जाता है | पुराणों से भी स्पष्ट है कि काशी अद्वितीय है और ज्ञान की राशि है | जिसे ज्ञान हो जाता है, वह भवबंधन का उच्छेद कर मोक्ष को प्राप्त करता है और पुनः उसका जन्म मरण नहीं होता है | आत्म ज्ञान ईश्वर ज्ञान है | काशी में जीवों को शिव महेश्वर की कृपा से यह सहज ही प्राप्त होता है |

यह काशी की महिमा का ही प्रभाव है कि पुरुषोत्तम मास में लोग सम्पूर्ण काशी खण्ड की परिक्रमा करते हैं | इसे ‘पंचक्रोशी’ यात्रा कहते हैं | यह यात्रा मणिकर्णिका से प्रारंभ होती है और यहीं समाप्त भी होती है | हिंदुओं की त्रिस्थली यात्राओं के तीर्थ काशी, गया और प्रयाग विशेष रूप से काशी अपने कब्जे में हो यह मराठों का प्रिय स्वप्न था परन्तु, वह कभी साकार न हो सका |  
    
 पुराविदों के अनुसार ईसा पूर्व आठ से भी पूर्व काशी का अस्तित्व था | प्राचीनकाल से काशी ज्ञान की पुरी रही है | गौतम बुद्ध आदि तीर्थंकर आदिनाथ, पार्श्वनाथ से लेकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानन्द, संत कबीर, महाप्रभु वल्लभाचार्य, संत तुलसीदास, संत रैदास, गुरुनानक आदि ने यहां साधना की और तत्वज्ञान प्राप्त किया | उन्नीसवी सदी के संत मनीषियों की परंपरा में तैलंग स्वामी, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, मां आनंदमयी और स्वामी करपात्री उल्लेखनीय हैं | गंगा तट पर बसा यह नगर हर-हर बम महादेव काशी विश्वनाथ गंगे और विश्व गंगे’ की वाणी और विश्वनाथ मंदिर का पट खुलने से जागता है |

अनादि काल से काशी सर्वविद्या की राजधानी रही है | सत्यार्थ प्रकाश के रचयिता स्वामी दयानंद सरस्वती भी काशी आए थे | यहां पर उन्होनें काशी के सनातनी पंडितों से शास्त्रार्थ किया था | कहा जाता है कि इस शास्त्रार्थ में पंडितों ने बुद्धि बल के साथ-साथ बाहुबल का भी प्रदर्शन भी किया था | दुर्गाकुंड के पूर्वी छोर पर इस शास्त्रार्थ का स्मारक बना हुआ है |

आधुनिक युग की विभूतियों में महात्मा गांधी और महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी काशी से जुड़े थे | महामना मालवीयजी ने भारत के कोने – कोने से चंदा एकत्रित करके समस्त विद्या की राजधानी काशी में अद्वितीय विश्वविद्यालय की स्थापना की |
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में काशी की उपलब्धि कम नहीं है | भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, देवकीनंदन खत्री , प्रेमचंद्र, रामचंद्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, आदि | हास्य कविता के क्षेत्र में बेधड़क बनारसी के नाम भुलाए नहीं जा सकते | उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचंद के बाद शिवप्रसाद का ही नाम आता है | रामकथा में नवीन शैली के प्रवर्तक रामकिंकर काशी की धरती की ही उपज हैं | काशी के संतों की जाज्वल्यमान परंपरा में करपात्रीजी महाराज और देवरहा बाबा भी दो स्तम्भ रहे हैं | 

काशी की भूमि ने राजनेता भी दिए हैं | लालबहादुर शास्त्री और डाक्टर संपूर्णानंद काशी की पवित्र भूमि में ही पले-बढे | पंडित कमलापति त्रिपाठी काशी के सपूत थे | आधुनिक चिंतको में आचार्य नरेन्द्र देव उल्लेखनीय हैं, प्रसिद्ध तत्वचिंतक जे. कृष्णमूर्ती और अचुत्यपटवर्धन का काशी से गहरा सम्बन्ध रहा | विख्यात विचारक डा. राधाकृष्णन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में वर्षों यहाँ रहे | कला के क्षेत्र में भी काशी किसी से पीछे नहीं रही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कत्थक नर्तक बिरजू महाराज और सिने कलाकार लीला मिश्र भी इसी माटी की उपज हैं | 
       
काशी में ही महर्षि वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में बाटा था और श्रीमद्भागवत् तथा अठारह पुराणों की रचना की थी | महर्षि अगस्त्य, महर्षि पातंजलि की तपोभूमि इस परंपरा को आज भी जीवित किए हुए है | जितने साधू-संत, तीर्थ, मठ, आश्रम, मंदिर काशी में हैं उतने देश के किसी भी धार्मिक नगरी में नहीं हैं | काशी में लघु भारत का सहज ही दर्शन होता है |        
                           

Sunday, 7 July 2019

व्यक्ति निर्माण के अनुपम शिल्पी - स्वामी विवेकानंद लेखक - शिरीष सप्रे


व्यक्ति निर्माण के अनुपम शिल्पी  -  स्वामी विवेकानंद
लेखक - शिरीष सप्रे

 स्वामी विवेकानंद का आरंभिक नाम नरेन या नरेन्द्रनाथ था | बचपन में वे बहुत नटखट थे | कभी-कभी उनकी शरारतों से तंग आकर उनकी मां कह उठती थी – “हे महादेव ! मैने प्रार्थना की थी कि मुझे आपके जैसा एक पुत्र चाहिए, लेकिन आपने अपना गण (भूत) दे दिया |”  

स्वामी विवेकानंद के संबध में एक बार कविवर्य रविन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था – ‘यदि भारत को जानना हो तो विवेकानंद को पढ़िए |’  
सभी क्रांतिकारियों और विचारकों के प्रेरणा सत्रोत क्रांतिकारी स्वामी विवेकानंद थे | यद्यपि स्वामीजी ने देश के क्रांतिकारियों को कहीं एकत्र कर पृथक रूप से कोई आंदोलन नहीं चलाया परन्तु फिर भी ऐसा कोई क्रांतिकारी नहीं है जिसने उनसे प्रेरणा प्राप्त न की हो | रोम्या रोलां ने लिखा है : “नरेन्द्र के प्रभुत्वशील प्रभाव से कुछ पक्ष उनके क्रांतिकारी बुद्धिवाद से विशेष आकृष्ट होते थे |” 

क्रांतिकारी लाला लाजपत राय ने स्वामीजी के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था – “स्वामी दयानंद के बाद स्वामी विवेकानंदजी ने समाज के लोगों को भलीभांति समझाया | हम नहीं कह सकते जब वे पहली बार भारत से बाहर गए थे, तब उनके विचार क्या थे ? परन्तु, इसमें कुछ भी संदेह कि अमेरिका और यूरोपीय देशों की यात्रा के बाद जब वे स्वदेश लौटकर आए तब उनके उपदेश हमारे राष्ट्र की वर्तमान सभी समस्याओं के निदान की औषधियों के रूप में सामने आने लगे | .... स्वामीजी वेदान्त मत के प्रचारक थे, परन्तु उन्होंने अपने वेदान्त के माध्यम से राष्ट्र के आंतरिक रोगों का निदान करने का प्रयत्न किया, जैसे ईर्ष्या, आलस्य, आडम्बर, साहसहीनता, आपसी कलह, स्वावलंबन आदि | .... ज्यों-ज्यों लोग उनके विचार सुनते गए, राष्ट्रीय  जागरण में देश के प्रति पग आगे बढ़ाने लगे |”

राष्ट्रीय आंदोलन के तीन प्रमुख कर्णधारों लाल, बाल और पाल (लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक और विपिनचंद्र पाल) में से एक थे लाला लाजपत राय | जो कहा करते थे कि, “मैं कोई बात आपको अपने मन से नहीं बताना चाहता | मैं कुछ ऐसी बातें जरुर दोहराना चाहता हूं, जो विवेकानंद ने कही हैं | विवेकानंद हमें प्रमुख रूप से पांच बातें बताते थे –

 प्रथम तो यह कि, यह हिन्दुस्तान हिंदुओं की मातृभूमि है और हम इसके पुत्र हैं | इसके सारे सुख-दुःख हमारें हैं | द्वितीय यह कि, गुलामी के संकट से मुक्त होने के लिए हमें अंग्रेजों से क्रांतिकारी ढ़ग से लड़ने की आवश्यकता भी है | हमें अपने स्वयं की पारस्परिक कलह, विभेद और फूट की बीमारी से लड़ना है | क्रांति करने के लिए हमे एक संगठन बनाना है | तीसरी बात वे कहा करते थे कि हमारे मन में जो भीरुता, कायरता, आत्मविस्मृति, आत्महीनता आ गई है, उससे हमें स्वयं ही मुक्त होना होगा | चौथी बात यह कि हमें जब भी जीवन में अंधेरा अनुभव हो हमें अपने अतीत की ओर देखना चाहिए और अपने त्याग, बैराग और उत्सर्गपूर्ण अतीत से प्रेरणा लेकर अपने आपको पूर्ण शक्तिपुंज बनाकर हमें  राष्ट्र की आत्ममुक्ति के लिए क्रांतिकारी ढ़ग से संघर्षरत हो जाना चाहिए | पांचवी और अंतिम बात वे कहा करते थे – कि हम हिंदुओं में संगठन का घोर अभाव है, जब तक हम राष्ट्र के समान लक्ष्य, समान हितों और समान आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के लिए सामूहिक रूप से उठकर एकत्रित नहीं होते तथा मन, कर्म और वचन से आत्ममुक्तिपूर्वक राष्ट्र के कष्टों का उन्मूलन करने के लिए सतत संघर्षरत नहीं होते, तब तक हम राष्ट्र को मुक्त नहीं करा सकते |”

स्वामीजी के दिवंगत होने के पश्चात एक महान राष्ट्रिय नेता श्री बाल गंगाधर तिलक ने उन्हें द्वितीय शंकराचार्य कहा था | उनसे स्वामीजी का परिचय अकस्मात् इस प्रकार हुआ था – 

सन १८९२ के सितम्बर माह में मुंबई से पुणे जानेवाली रेलगाड़ी के द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में वे बैठे थे | डिब्बे में तीन महाराष्ट्रीय युवक भी यात्रा कर रहे थे | उनमें जबरदस्त तर्क युद्ध छिड़ा हुआ था | तर्क का विषय था संन्यास | दो युवक रानडे आदि सुधारकों के स्वर में स्वर मिलाकर संन्यास की अकर्मण्यता तथा उसके दोषों का प्रदर्शन कर रहे थे, तीसरे व्यक्ति उनके मतों का खंडन कर भारत के प्राचीन संन्यास की महिमा का गुणगान कर रहे थे | यह युवक लोकमान्य तिलक ही थे |

पास बैठे हुए संन्यासी विवेकानंद इन तर्करत युवकों की युक्ति और उक्तियों को ध्यान से सुन रहे थे | अंत में तिलक का पक्ष लेकर वे भी तर्कयुद्ध में सम्मिलित हो गए | अंग्रेजी जाननेवाले इस संन्यासी की प्रखर प्रतिभा से वे युवकगण उनकी ओर विशेष रूप से आकृष्ट हुए | स्वामीजी ने धीर-गंभीर भाव से समझा दिया कि संन्यासियों ने ही भारत के विभिन्न प्रान्तों में भ्रमण करते हुए जातीय जीवन के उच्च आदर्शों का आज तक समस्त भारतवर्ष में प्रचार किया है | भारतीय सभ्यता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति यह संन्यासी ही हैं | जो शिष्य परंपरा द्वारा जातीय जीवन के आदर्शों की रक्षा नाना प्रकार की विघ्न-बाधाओं के बीच में से इतने दिनों तक करता आया है | हां, यह अवश्य सत्य है कि ढोंगी और स्वार्थी व्यक्तियों के हाथों बीच-बीच में संन्यास लांछित तथा विकृत हुआ है; परन्तु किसी विशेष व्यक्ति के ढोंग के लिए भारत के समस्त संन्यासी संप्रदाय को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं |

इस विद्वान संन्यासी की वाक्पटुता तथा गंभीर पांडित्य देखकर लोकमान्य तिलक बड़े मुग्ध हुए और पुणे स्टेशन पर उतरकर स्वामीजी को अपने घर ले गए | स्वामीजी भी तिलकजी की प्रखर प्रतिभा तथा उनका वेदादि शास्त्रों पर अधिकार देखकर आनंदित हुए और हर्ष के साथ उनके घर में रहने लगे | दोनों आपस में वेदों के गूढार्थ की चर्चा कर बड़े तृप्त होते थे |   
              
वीर सावरकर (१८८३-१९६६), विवेकानंद के क्रांतिकारी, प्रेरणादायक विचारों से बहुत प्रभावित थे | वास्तव में स्वामीजी का मूल मन्त्र ‘संगठन और शक्ति’ था | क्रांतिकारी वीर सावरकर तो स्वीकारते थे कि – “शुद्ध हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करनेवाला यह सन्यासी मातृभूमि की पूजा, राष्ट्रीय जागरण के प्रहरियों को राष्ट्रशक्ति से ओतप्रोत करके ही जीने में विश्वास रखता है |’ उनकी मान्यता थी कि स्वामीजी नवीन युग की ऐसी पहली कड़ी थे, जिन्होंने हमारी मानसिक दासता पर पूरी शक्ति से इतना कड़ा प्रहार किया है कि हमे अपना स्वरुप भी दिखने लगा है और हम अपने आपको अब अंग्रेजों से मुक्त कराने की क्षमता भी अनुभव करने लगे हैं |” स्वामीजी के विचारों से अनुप्राणित होकर वे कहते हैं – “यदि दो जन्म कारावास भोगने के बाद मैं एक दिन भी जीवित रहा तो अपनी मातृभूमि को आजाद करा लूंगा |

प्रखर राष्ट्रवादी नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वामीजी के संबंध में कहा था – “स्वामीजी के विचारों, प्रवचनों और कार्यों ने मुझे क्रांतिकारी बना दिया |” उन्हींके विश्वास से अनुप्राणित होकर उन्होनें कहा था – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हेँ आजादी दूंगा |”                                        
वास्तव में स्वामीजी व्यक्ति निर्माण के अनुपम शिल्पी थे | वे कहा करते थे – “व्यक्ति निर्माण ही मेरा ध्येय और कार्य है |” उन्होंने अपनी सारी आध्यात्मिक शक्ति का सारा प्रवाह शुद्ध हिन्दू राष्ट्र के अंत:करण में जीवन के सभी सकारात्मक पक्षों को जगाने के साथ-साथ उसकी सोई हुई राष्ट्रीयता को भी आंदोलित करने में किया और वे अपने इस कार्य में इतने दृढ़ थे कि वे स्वयं कहते थे – “मुझे सफलता या असफलता की चिंता नहीं ..... मैं अपना आंदोलन शुद्ध रखूंगा, न रख सका तो छोड़ दूंगा |”

वे धार्मिक क्षेत्र में ऐसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों को क्रांतिकारी ढंग से प्रेरित किया करते थे जो किसी भी जागरण के आंदोलन से कम नहीं थे | इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर गांधीजी ने अछूतोद्धार आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोडो जैसे आंदोलन खड़े करके अहिंसात्मक, सात्विक, सृजनात्मक शक्ति का अंग्रेजों के विपरीत प्रदर्शन किया और उन्हें भारत से जाने के लिए विवश होने के सिवाय कोई मार्ग न रहा | गांधीजी के सारे राजनैतिक कार्यों के बाद भी वे जीवन की आंखरी सांस तक जो शुद्ध आध्यात्मिक बने रहे थे, स्वामीजी के चिंतन और आध्यात्मिक और राष्ट्रीय जीवन का ही अप्रत्यक्ष प्रभाव था | राष्ट्रीय आंदोलन में  में स्वामीजी का मूल्यांकन करते हुए सुचेता कृपलानी ने कहा था : “स्वामीजी भारतीय राष्ट्र निर्माताओं में से एक थे, उनकी रचनाओं एवं उपदेशों ने लोगों में अतीत के प्रति गौरव तथा भारत के भविष्य को उज्जवल बनाने की भावना का मन्त्र फूंका एवं उन लोगों में स्वतंत्रता प्राप्ति की तीव्र उत्कंठा उत्पन्न की, जिनके मस्तिष्क चिरकाल से निराशा, राजनैतिक दासता तथा अविकसित संस्कृति के कारण शक्तिहीन हो चुके थे |”

किसी देश के परतंत्र समाज को स्वतंत्र कराने के लिए किसी एक विशेष सामाजिक वर्ग, विशेष जातीय वर्ग, या धार्मिक वर्ग विशेष के उत्थान की ही मात्र आवश्यकता नहीं होती अपितु राष्ट्र जागरण का कार्य सभी वर्गों, सभी समाजों एवं सभी जातियों, सभी सम्प्रदायों के सामूहिक राष्ट्रीय जागृति की दिशा में विकास से ही हो सकता है | इसी कारण उन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा : “आओ सब दरिद्र, पद दलित, परित्यक्त जन आओ, हम सब एक हैं |”

अपन भारतवासी हैं इस पर गर्व करो और गर्व से कहो – “मैं भारतवासी हूं | प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है | अज्ञानी भारतवासी, दरिद्री और दलित भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी और अनुसूचित भारतवासी ये सारे मेरे भाई हैं |”

कमर पर लंगोट हो तो भी ऊंचे स्वर में घोषणा कर : “प्रत्येक भारतवासी मेरा बंधू है | भारतीयत्व ही मेरा जीवन, भारत के देवी-देवता मेरे भी देवी-देवता | यह विशाल भारतीय समाज यानी मेरे बचपन का झुला, योवन का नंदनवन और वृद्धावस्था की वाराणसी |”

ऊठ! बोल : “हिन्दुस्थान की धूली ही मेरा स्वर्ग | हिन्दुस्थान का सदभाग्य वही मेरा भी सदभाग्य !”

अरे भाई दिन-रात इसीका जयजयकार कर | यही प्रार्थना कर : हे गौरीपति ! हे जगज्जननी ! मुझे पुरुषार्थ प्रदान कर | हे शक्ति देवता ! मेरे दौर्बल्य का विलय कर, मेरी भीरुता समाप्त कर और मुझे पौरुष-संपन्न कर !”    
                    
स्वामीजी अक्सर कहा करते थे – “भारत ही मेरी आत्मा है, भारत ही मेरा प्राण है | भारत ही मेरा शरीर है, भारत ही मेरा श्वांस है | इतना ही नहीं भारत ही मेरा अतीत है, भारत ही मेरा वर्तमान है और मेरा भविष्य भी भारत ही है | जब मेरे राष्ट्र का वैभवशाली अतीत पुनः उज्जवल भविष्य का रूप धारण कर लेगा तभी मेरी आत्मा तृप्ति का अनुभव करेगी |”      

Friday, 21 June 2019

भगवान् श्रीकृष्ण की आठ पत्नियां - शिरीष सप्रे


भगवान् श्रीकृष्ण की आठ पत्नियां
शिरीष सप्रे

भगवान् श्रीकृष्ण एक आदर्श राजा थे और उनकी आठ पत्नियां थी | किसी भी राजा को नीति बन्धनों का पालन करना ही पड़ता है इस दृष्टि से श्रीकृष्ण ने स्वतः विवाहबद्ध होकर आठ पत्नियां की थी | श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों सम्बन्धी जानकारी आगे दी गई है –

विदर्भ देश के राजा भीष्मक की अत्यंत रूपवती कन्या रुक्मणी का स्वयंवर कुण्डिनपुर में होने वाला है की सूचना मथुरा पहुंची | भरतखंड के सभी क्षत्रिय राजाओं को स्वयंवर का निमंत्रण गया परन्तु, भीष्मक का पुत्र रुक्मी जरासंध का परम स्नेही होने के कारण उसने जरासंध आदि अनेक राजाओं को पराजित करनेवाले श्रीकृष्ण को जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया |

श्रीकृष्ण के पराक्रम की प्रसिद्धि रुक्मीणी ने भी सुनी थी | रूप-गुण; वीरता, संपत्ति आदि गुणों से संपन्न श्रीकृष्ण पर वह अनुरक्त होकर स्वयंवर के समय उसका ही वरण करने का निश्चय उसने किया होने की अंदरूनी जानकारी भीष्मक और रुक्मी को ज्ञात हुई थी | इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण राजा नहीं यह कारण बताकर निमंत्रितों की सूची से श्रीकृष्ण का नाम जानबूझकर हटा दिया था | 
उधर श्रीकृष्ण के कानों पर रुक्मणी की बुद्धि, औदार्य, सौंदर्य, आदि गुणों और अनेक शुभ लक्षणों से युक्त होने के वर्णन गए थे और वह अपनी भार्या होने के योग्य है, ऐसा उन्हें लगने लगा था | निमंत्रण नहीं होने पर भी स्वयंवर में एकत्रित सभी राजाओं के समक्ष उपवर कन्या का जबरदस्ती से हरण करने का क्षत्रियों को अधिकार है, यह मन में विचार श्रीकृष्णकर अपने अजिंक्य सुदर्शन पथक सहित कुण्डिनपुर में आ दाखिल हुए |

स्वयंवर में श्रीकृष्ण के होते रुक्मणी उनके सिवाय किसीका भी वरण नहीं करेगी और श्रीकृष्ण से युद्ध करने का सामर्थ्य स्वयंवर में उपस्थित किसी भी राजा में नहीं इसका विश्वास उन राजाओं को स्वयं था परन्तु, भीष्मक के सामने क्रोधित होने का दिखावा कर सारे राजा चलते बने | अर्थात स्वयंवर रद्द हो गया |

एक दिन एक तेजस्वी ब्राह्मण विदर्भ देश से श्रीकृष्ण से भेट के लिए द्वारका आया |  उसने रुक्मणी की पत्रिका श्रीकृष्ण को दी, उन्होंने खोलकर वह पढ़ी | रुक्मणी ने प्रारम्भ में स्वयंवर भंग होने के बाद से सारा वृतांत लिखा हुआ था | श्रीकृष्ण के भय से अब स्वयम्वर का आयोजन न करते उसके भाई रुक्मी ने जरासंध के आग्रह पर चेदी देश के शिशुपाल से उसका विवाह करना राजा भीष्मक की इच्छा के विरुद्ध तय किया है | इस प्रकार से श्रीकृष्ण को कहलाकर उसने आगे लिखा था – हे भुवन सुन्दर श्रीकृष्ण, तुम्हारे गुण, तुम्हारा अनुपम रूप-सौंदर्य का वर्णन सुनकर मेरा मन तुम पर आसक्त हो गया है | विवाह के एक दिन पहले हमारे कुलदेवता की बड़ी यात्रा होगी और उस समय वधू नगर के बाहर देवी पार्वती के दर्शनों के लिए जाती है | उस अवसर का लाभ उठाकर मौका देखकर तुम मेरा हरण कर लो |

विवाह के मुहूर्त में अब बहुत थोडा समय बचा था | विदर्भ देश के राज घराने के कुलाचार के अनुसार नववधू को देवी अम्बिका के दर्शनों के लिए ले जाने की तैयारी हो गई | नववधू द्वारा दर्शनों के लिए पैदल ले जाने की प्रथा थी | वयस्क ब्राह्मण सुवासिनी वस्त्र-अलंकारों से भूषित होकर वधू को लेकर देवी के मंदिर की ओर निकली |

वापसी के लिए वह देवी के मंदिर के बाहर आई तो अचानक गरुड़ चिन्हांकित रथ आकर वहां रुका और उसमें से मनमोहक श्यामसुंदर श्रीकृष्ण नीचे उतरे और स्मित हास्य करते रुक्मणी के सामने आकार खड़े हो गए | रुक्मणी ने उनके गले में अपने हाथ में का हार तत्काल पहना दिया | नारदजी और महामुनि गर्ग अचानक वहां प्रकट हो गए उन्होंने श्रीकृष्ण के हाथ में दिव्य पुष्पों का हार दिया उसे श्रीकृष्ण ने रुक्मणी के गले में पहना दिया | नारदजी और महामुनि गर्ग ने वरवधू पर मंगल अक्षता डालकर तालियां बजाई | मंगल वाद्यों की गर्जना के बीच श्रीकृष्ण रुक्मणी को लेकर रथ में बैठे और रथ चल पड़ा | इस रथ के पीछे-पीछे एक और रथ आया उसमे नारदजी और महामुनि गर्ग के बैठते ही वे रथ विद्युत गति से दौड़ पड़े | इस प्रकार रुक्मणी हरण हुआ |

श्रीकृष्ण स्यमन्तक मणि के शोधार्थ जब भटक रहे थे तब जंगल की एक गुफा में जाम्बवन्त नामक एक रीछ राजा रहता था वहां वह मणि मिली | राम भक्त जाम्बवान के कुल में जन्मे और राम को पूज्य माननेवाले उस रीछ  राजा ने श्रीकृष्ण का आदर-सत्कार किया | जाम्बवान को जाम्बवती नामकी एक सुन्दर कन्या थी | श्रीकृष्ण की पूजा करने के उपरांत उसने नम्रतापूर्वक श्रीकृष्ण से कहा, ‘हे कृष्ण, हमारे राम के समान ही तुम भी पराक्रमी और सर्वगुण संपन्न हो | साक्षात भगवान् राम ही हमारे घर तुम्हारे रूप में प्रगट हुए हैं, ऐसा मुझे लगता है | हे कृष्ण, मैंने तुम्हारे साथ युद्ध किया, यह मेरा अपराध क्षमा कर तुमने मेरी पूजा स्वीकार की | अब एक और प्रार्थना करनी है | मेरी सुन्दर कन्या तुम्हेँ अर्पण कर वरदक्षिणा के रूप में यह स्यमन्तक मणि तुम्हे सौपना चाहता हूं | यह मेरी इच्छा पूर्ण कर कृपया मुझे धन्य करें |’

इस कन्या का स्वीकार किया तो भविष्य में जाम्बवान की यह सेना अपने काम आएगी, गरुडेश्वर के समान ही जाम्बवान से घनिष्ठता निर्मित होने पर अन्य जंगली राजा भी अपने वश होंगे, इस प्रकार का गम्भीर और दूरदर्शी विचार कर कृष्ण ने जाम्बवान की विनती को मान्य किया | जांबवान ने बड़े ठाट से विवाह समारोह करना तय किया | दुसरे दिन उसने विधिपूर्वक कृष्ण को जाम्बवंती स्यमन्तक मणि सहित अर्पण की |

इस स्यमन्तक मणि की जो मूलतः द्वारका के पराक्रमी सूर्योपासक सत्राजीत की थी और भगवान् सूर्यनारायण ने प्रसन्न होकर यह उसे दी थी एवं इसकी चोरी का आरोप भगवान् कृष्ण पर लगा था और श्रीकृष्ण इसी मणि की तलाश में वन में गए थे | कथा के अधिक विस्तार में हम न जाते | श्रीकृष्ण ने द्वारका नगरी लौटते ही यह मणि सत्राजीत को सौंप दी | सत्राजीत ने प्रसन्न होकर अपनी सुन्दर और सुशील कन्या सत्यभामा से उनका विवाह कर दिया और यह स्यमन्तक मणि भी भेटस्वरुप दे दी |

यमुना किनारे घने जंगल में एक तपस्वी रहते थे और इस वन के जंगली उन्हें ईश्वर का अवतार समझते थे और उनकी आज्ञा का पालन बड़े आदरपूर्वक करते थे | उस तपस्वी की कालिंदी नामकी एक सुन्दर कन्या थी | इस कालिंदी को सभी लोग मनुष्य रूप धारण करनेवाली पवित्र यमुना नदी ही समझते थे | इस वन में कृष्ण मृगया के लिए गए थे | वहां उन्होंने कालिंदी को देखा और देखते ही वे उस पर मोहित हो गए | तपस्वी ने कालींदी का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया | यह विवाह कर श्रीकृष्ण ने उस क्षेत्र में रहनेवाले सभी लोगों का आदर सम्पादन किया |  

श्रीकृष्ण का पांचवा विवाह अवन्ती के राजा की कन्या ‘मित्रविंदा’ से हुआ था | मित्रविंदा श्रीकृष्ण की बुआ राजाधिदेवी की कन्या | राजाधिदेवी के पुत्र विंद और अनुविन्द दुर्योधन के स्नेही होने के कारण उसका मत था कि अपनी बहन श्रीकृष्ण ना वरे | अवन्ती के राजा ने जब अपनी कन्या का स्वयंवर रचा तब श्रीकृष्ण वहां गए थे उस समय मित्रविन्दा ने श्रीकृष्ण को ही वरमाला पहनाई | 

  कोसल देश का नग्नजीत नामका एक राजा था | उसकी कन्या सत्या अथवा नाग्नजीती अत्यंत रूपवती थी | उस राजा ने उसके विवाह के लिए एक विलक्षण शर्त रखी थी | उसके पास मस्ती पर आए हुए ऐसे बड़े सात जंगली बैल थे | जिनके सामने जाने का साहस किसी भी मनुष्य में नहीं था | उस बैल के सामने अकेले जाकर जो कोई उसे नकेल डालकर अपने कब्जे में लेगा उस पराक्रमी पुरुष को मेरी कन्या वरमाला पहनाएगी ऐसी घोषणा राजा ने की थी | परन्तु यह शर्त जीतने का प्रयत्न बहुत से राजाओं ने करके देखा परन्तु सफलता किसी के हाथ न लगी |

गोकुल में छोटे से बड़े हुए श्रीकृष्ण ने जब यह शर्त सुनी तब जंगलों में गाय बैलों को काबू में करने की कला मालूम होने के कारण उसने वह शर्त जीतने का निश्चय किया | श्रीकृष्ण अपने यशस्वी पथक को लेकर कोसल देश की ओर चल पड़े |

उस मत्त पशु को काबू में करने का अपूर्व कौशल्य देखकर सभी लोग चकित रह गए | नग्नजीत ने अपनी कन्या सत्या श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नतापूर्वक विवाह समारोह आयोजित कर अर्पण की | नग्नजीत ने श्रीकृष्ण को एक हजार गाएं, एक हजार घोड़े और पांच सौ हाथी भेंट के रूप में दिए | इनके अलावा सोना, हीरे, मोती-माणिकवगैरा संपति भी प्रदान की |

केकय देश के राजा की पत्नी श्रुतकीर्ति भी श्रीकृष्ण की बुआ थी | उसकी लड़की ‘भद्रा’ भी विवाह योग्य होते ही केकय देश के राजा ने श्रीकृष्ण से उसका विवाह बड़े ठाठ से कर दिया |

मद्र देश के पराक्रमी राजा की कन्या लक्ष्मणा अत्यंत लावण्यवती और शुभ लक्षणों से युक्त थी | स्वयंवर में श्रीकृष्ण को उसने वरमाला पहनाई | विवाह समारोह में मद्र्देशाधिपति ने श्रीकृष्ण को हजारों श्रेष्ठजाति के घोड़े, महाबलाढय हाथी, सैकडों रथ और अपरंपार युद्ध साहित्य भेंट के रूप में अर्पित किया |

इस प्रकार श्रीकृष्ण के आठ विवाह हुए | श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों के नाम आगे दिए हुए श्लोक में ग्रथित हैं  - ‘भैष्मी जाम्बवती भामा सत्या-भद्राच लक्ष्मणा | कालिंदी मित्रविंदा चेत्यष्टो पट्ट महा स्त्रिय: |’                  
                                    

Sunday, 5 May 2019

नई भूमि के निर्माता चिरंजीवी भगवान् परशुराम - शिरीष सप्रे


नई भूमि के निर्माता चिरंजीवी भगवान् परशुराम
शिरीष सप्रे


श्री परशुराम अवतार के सम्बन्ध में जनता में विलक्षण कुतूहल है | वैशाख शुक्ल तृतीया या आखातीज के दिन अदिति नक्षत्र पर परम ज्योति स्वरुप बालक ने ठीक सूर्यास्त के समय जन्म लिया | परशुराम का स्मरण होते ही कई बातों का स्मरण भी हो आता है | जैसे उनका चिरंजीवी होना – अश्वत्थामा बलिव्यार्सो हनुमांश्च विभीषण: | कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीवन: ||१||


परशुराम अवतार हुए लगभग दस लाख वर्ष से अधिक का समय बीत चूका है | परशुराम त्रेता युग का दूसरा अवतार और उनके बाद श्रीराम हुए | आगे जाकर द्वापरयुग के अंत में भगवान् श्रीकृष्ण अवतार हुआ | उस समय कौरव-पांडव हुए | उनमें से द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण आदि ने धनुर्विद्या उनसे सीखने के वर्णन महाभारत में हैं | इसी प्रकार भीष्म और परशुराम  का युद्ध हुआ था इसका वर्णन महाभारत् में है | इसी प्रकार कर्ण ने चोरी से परशुराम से धनुर्विद्या सीखी इस कारण परशुराम ने उसे शाप दिया यह कथा भी महाभारत् में है | बाद में कौरव-पांडवों के बीच मध्यस्थता के लिए परशुरामजी गए थे का वर्णन महाभारत में आता है |


सहत्रब्दियों वर्ष पूर्व सतयुग अर्थात कृतयुग के अंत में भगवान् परशुरामजी ने उत्तर और पूर्व के राजाओं का एक महासंघ बनाकर आज के गुजरात के हैहय राजाओं के विरुद्ध एक महासंग्राम को विजयी नेतृत्व प्रदान किया था | यही कारण है कि परशुराम के नेतृत्व में हैहयों के विरुद्ध सतयुग के अंत में हुए इस महायुद्ध के विजेता महानायक परशुराम सर्व लोकख्यात हो गए और स्थिति यह हो गई कि वशिष्ठों और विश्वामित्रों की वंश परंपरा की भांति ही परशुराम जिस भार्गव वंश के थे उसकी भी एक पूरी वंश परंपरा बनी जिसके सभी महापुरुष स्वाभाविक रूप से भार्गव या परशुराम कहलाए |


कश्यप ऋषि को दान की हुई भूमि पर नहीं रहना यह निश्चय करके परशुराम सह्याद्री पर आए | वहां महाबलेश्वर पर जाकर पर्वत की तलहटी से दूर क्षितिज तक विस्तृत समुद्र उनके सामने था | उन्होनें समुद्र से अपने लिए भूमि मांगी | कई बार प्रार्थना करने पर भी जब समुद्र ने अनसुनी कर दी तब क्रोधित हो परशुराम ने समुद्र को सुखा देने का निश्चय कर एक बाण निकाला | तुरंत समुद्र शरणागत हुआ | उन्होंने चौदह बाण छोड़े प्रत्येक बाण समुद्र में आगे और आगे गिरता गया समुद्र पीछे और पीछे हटता चला गया इस प्रकार दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में भृगुकच्छ (वर्तमान भडोच) तक एक नई भूमि समुद्र से ऊपर आई | इसी पश्चिमी घाट को परशुराम भूमि कहा जाता है |


“बीसवीं सदी में हालैंड के कुल क्षेत्रफल का सातवां हिस्सा समुद्र को हटाकर उससे प्राप्त भूमि का है | हालांकि ऐसा करने में दो सौ साल लगे परन्तु हालैंड में यह कहावत प्रसिद्ध हो गई कि, ‘पूरी दुनिया ईश्वर ने बनाई लेकिन हालैंड को हालैंडवासियों ने बनाया |’” इसी तरह भगवान् परशुराम ने हजारों वर्ष पूर्व समुद्र से परशुराम क्षेत्र प्राप्त किया | (भगवान् परशुराम-जयंत पोतदार)


आज का सम्पूर्ण केरल, कर्नाटक का धारवाड़ प्रदेश, तमिलनाडु का कन्याकुमारी क्षेत्र, सम्पूर्ण कोंकण, गोवा, भडोच तथा पश्चिम सह्याद्री के तीनों शिखरों तक का भाग परशुराम निर्मित भूमि है | नवनिर्मित भूमि निर्जन , उजाड़ और बंजर थी | वृक्ष-वनस्पतियों से रहित | परशुराम ने उसे योगबल से श्स्यश्यामलाम बनाया | उन्होंने उस पवित्र भूमि में बसने के लिए अगस्त्य, बोधायन, दाल्भ्य, सत्याषढ, बाषकल आदि ऋषियोंको निमंत्रित कर उनके आश्रम स्थापित किए | शंकर, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय (स्कन्द) को सदैव के लिए निवास करने के लिए उन्होंने अपने इस नवनिर्मित क्षेत्र में आमंत्रित किया | आज भी इन्ही चारों की उपासना इस पुरे प्रदेश में सर्वाधिक प्रचलित है | इस खेत्र में परशुरामजी ने कई तीर्थ स्थापित किए | गोवा या गोमान्तक में इतने यज्ञ किए कि उन यग्नों की भस्म का एक पर्वत ही बन गया | भगवान् परशुराम द्वारा स्थापित तीर्थक्षेत्र  तो अनेक हैं | उनमे प्रमुख हैं – मुंबई का वालुकेश्वर, गोवा की शांता दुर्गा तथा कन्याकुमारी स्थान | इस पूरे परशुराम प्रदेश को  सप्तकोंकण या अपरांत कहते हैं |


अनेक स्थानों से जनसमूहों को लाकर नई बस्तियां बसाई | इस भूमि को आबाद करने के लिए उन्होंने मलयाली ब्राह्मणों को लाया, देवराष्ट्र से लाए हुए ब्राह्मणों के निर्वाह की व्यवस्था की | आवश्यकतानुसार वे ही ब्राह्मण चार वर्णों में बदल गए | कावेरी नदी की किनारे से वेद विद्या पारंगत ब्राह्मण परिवारों को लाकर उन्होंने वेदों के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की | सभी वर्णों को अग्नि उपासना एवं वेदाध्ययन के लिए प्रवृत किया | उन्होंने एक हजार कोलियों (मछुहारों) को शिक्षा देकर वेदों में पारंगत बना दिया |

वर्ण व्यवस्था का गुणकर्म के अनुसार वैदिक आदर्श स्थापित किया | आज भी यह परशुराम क्षेत्र शिक्षा-दीक्षा, विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान रखता है और भगवान् परशुराम के प्रति असाधारण पूज्य भाव इस प्रदेश के जन-जन में है | उन्हें आज भी इस पूरे प्रदेश का स्वामी माना जाता है |                       

Friday, 26 April 2019

श्रेष्ठ आदर्श भारतीय ईसाई महिला – कार्नेलिया सोराबजी शिरीष सप्रे


श्रेष्ठ आदर्श भारतीय ईसाई महिला – कार्नेलिया सोराबजी
शिरीष सप्रे

कार्नेलिया सोराबजी १९वी शताब्दी के उत्तरार्ध में महाराष्ट्र से शिक्षा ग्रहण करने के लिए समुद्र पार गई प्रसिद्ध पंडिता रमाबाई, डा. आनंदीबाई जोशी, जो पहली भारतीय डाक्टर थी जिनकी स्मृति में २६ फरवरी महिला आरोग्य दिवस मनाया जाता है, डा. रखमाबाई, अना उर्फ़ अनसूया तर्खड इनकी समकालीन थी | पंडिता रमाबाई, डा. आनंदीबाई जोशी इनकी जीवन यात्रा सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टीसे कठिनाई भरी थी उसमे डा रखमाबाई की तो सामाजिक दृष्टी से अपूर्व | रखमाबाई के सम्बन्ध में तो उसने आगे जाकर लिखा था “कितनी शांत महिला, दुनिया ने उसके विरुद्ध कितना शोर मचाया परन्तु कितनी शांति से वह अपने व्यवसाय में लीन रही | उसने विवाह नहीं किया परन्तु स्त्री स्वातंत्र्य का ढोल भी नहीं पीटा |” परन्तु अना तर्खड और कार्नेलिया दोनों ही सम्पन्न घरानों से ताल्लुकात रखनेवाली | अना आंग्ल संस्कृति से प्रभावित परिवार से थी | कार्नेलिया के पिता रेव्हरंड खुर्सेदजी सोराबजी नाशिक के एक खानदानी अमीर पारसी परिवार के होकर युवावस्था में धर्मान्तरित होकर ईसाई बने थे | उसकी मां नाशिक के निकट देवलालीके आर्मी कमांडर लार्ड फोर्ड और लेडी फोर्ड की दत्तक कन्या फ्रांसिस्का थी |

कार्नेलिया का जन्म १८६६ में हुआ था ६ भाई-बहनों में उसका क्रम छठा था | उसकी मां पुणे की विक्टोरिया स्कूल की संस्थापक होकर सतत मिशनरी कार्य में मग्न रहती थी | आज भले ही हमारे बच्चों को अंग्रेजी सीखाने के नाम पर हम कॉन्व्हेंट में भेजते हों उस ज़माने में मिशनरी भारतीय भाषा सीखा करते थे | कार्नेलिया के घर की आचार-पद्धति भारतीय थी | अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ पारसी और गुजराती सीखाने शिक्षक घर पर आया करते थे | पुणे के उदारमतवादी सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्ध रखनेवाला यह परिवार स्वयं को पूरी तरह भारतीय समझता था |


उनकी मां नारी शिक्षा की प्रबल पक्षधर थी | कार्नेलिया को बैरिस्टर बनाने में उनके पिता ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |  उनकी मां ने पुणे में लड़कियों और महिलाओं को सशक्त और शिक्षित करने के लिए अंग्रेजी के साथ-साथ मराठी और हिंदी स्कूल भी शुरू किए थे | पंडिता रमाबाई रानडे को विदेश भेजने में जो अग्रसर थी वे शिक्षिका हरफ़र्ड इन्हीं के स्कूल की थी |

 परन्तु ऐसे परिवार की होने के बावजूद उनका स्त्री होना उनके आड़े आया | कारण एक ही था उनका स्त्री होने के बावजूद परिधि के बाहर कदम रखना | परन्तु १८८३ में डेक्कन कॉलेज से सभी लड़कों को पीछे छोड़ पदवी परीक्षा में कार्नेलिया सर्वप्रथम आई | उस समय उसकी आयु थी केवल सत्रह | उस समय सर्वप्रथम आनेवाले छात्र को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लेंड जाने के लिए छात्रवृती  मिलती थी | परन्तु स्त्री होने के कारण उसे नकार दिया गया | उसका आन्गल-पारसी परिवार से होना या ईसाई मजहब का होना कुछ काम न आया | केवल उसका स्त्री होना ही महत्वपूर्ण तय हुआ |

फिर भी अठरह वर्ष की आयु में उनकी नियुक्ति व्याख्याता के रूप में गुजरात कॉलेज में सभी पुरुष विद्यार्थियों की कक्षा पर हो गई | वह वहां किसी भी द्रष्टि से कमतर साबित नहीं हुई परन्तु, यह नियुक्ति तात्कालिक स्वरुप की होने के कारण यह न मालूम हो सका कि यह व्यवस्था दीर्घकालीन होती तो पुरुषप्रधान समाज इसे कितना हजम कर पाता |

यह नौकरी समाप्त होने के पश्चात् कार्नेलिया स्वयं के खर्च से आक्सफोर्ड गई | इंडिया आफिस ने संभालकर रखी हुई उसकी डायरी में यह दर्ज है कि किस प्रकार उसने यात्रा की, आक्सफोर्ड में किए हुए प्रयास, संपर्क में आए हुए मित्रों के साथ की हुई समाज विषयक उसकी चर्चा | कार्नेलिया आधी अंग्रेज थी, अमीर थी, ईसाई थी फिर भी आक्सफोर्ड जैसी विश्व - प्रसिद्ध संस्था पवित्र थी, वहां स्त्रियों को प्रवेश नहीं था | कार्नेलिया ने इन दरवाजों को खटखटाना शुरू किया |

अपने प्रयासों, परिचितों, मिशनरी लोगों की सहायता से उसने समरविल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त कर ही लिया | पाश्चात्य संस्कृति की विशिष्टता यह की वहां मिशनरी लोगों का प्रभाव था और इधर बायबल पाठ के लिए तो सार्वत्रिक शिक्षा की आवश्यकता निर्मित हो गई थी | कार्नेलिया के प्रवेश के बाद तो समाज जाग गया, यह अपकृत्य कैसे घटित हो गया, किसने किया इस सम्बन्ध में सवाल खड़े किए गए | पार्लियामेंट के लार्ड्स की सभा में इसका मिला हुआ उत्तर बड़ा ही मार्मिक है – कार्नेलिया सोराबजी को दिया हुआ प्रवेश एक योग्य व्यक्ति को दिया हुआ प्रवेश है | यहां स्त्री शब्द के प्रयोग को टाला गया है मानो यह किया गया तो उस रास्ते से स्त्रीयों के झुंड के झुंड प्रवेश कर जाएंगे !

सामरविल कॉलेज से पहली डिग्री मिलने के बाद कार्नेलिया को अब कानून की उपाधि प्राप्त करनी थी | इसके पीछे एक विचार दिल की गहराइयों में कहीं सुप्त अवस्था में पड़ा था | जब वह छोटी थी तब उसकी मां के पास एक औरत रोते आई और अपनी दुखभरी कहानी सुनाने लगी | उसने अपनी मां से उस सम्बन्ध में पूछताछ की तब उसकी मां ने कहा कि वह जो सहायता चाहती है वह उसके लिए नामुमकिन है; हां जब वह बड़ी हो जाएगी तब यदि वह ऐसी महिलाओं को कानूनी सलाह देकर उनके दुःख दूर कर सके तो बड़ा भला होगा | वास्तव में वह महिलाओं के लिए किसी देवदूत से कम साबित नहीं हुई |

परन्तु अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था ने उसके मार्ग में बाधा खड़ी कर दी | कार्नेलिया ने समझोता करना स्वीकार कर “उपाधि ना तो ना सही परन्तु कम से कम उसे पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति तो भी प्रदान की जाए |” यह उसका चंचु प्रवेश था | आय. सी. एस के विद्यार्थियों के साथ वह कक्षा में बैठने लगी | अभ्यासक्रम पूरा होने पर एक कदम आगे की ओर अब कार्नेलिया ने परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी | बड़ी मुश्किल से मिली वह भी सशर्त ! स्त्री के रूप में मेट्रन की देखरेख में अलग कक्षा बैठना | ऊपर से मल्लिनाथी यह की ‘इस पर तो तुम्हे कोई एतराज नहीं होगा’? क्यों नहीं होना चाहिए? वह यूनिवर्सिटी की परीक्षा लगेगी ही नहीं और बाद में जब कभी लडकियों को इस परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलेगी तब मेरी यह उपाधि कम दर्जे की अवश्य कहलाएगी | 
कितनी यह दूरदृष्टि? यह आत्मनिष्ठा से पैदा हुई थी | 

एक बार फिर से गव्हर्निंग बोर्ड की बैठक हुई और उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति प्रदान की गई | उसे शानदार सफलता मिली और १८८५ में प्रतिष्ठित शिष्यवृत्तियां भी मिली | १८८८ में अंग्रेजी भाषा में वह सर्वप्रथम आई छः  विद्यार्थियों में वह एकमेव स्त्री थी |

अब उपाधि तो मिल गई पर सनद नहीं मिली | बड़े प्रयासों के बाद ली एंड पेबर्टन में काम तो मिल गया पर इस सर्टिफिकेट के लिए उसे फीस भरना पड़ी | काम करते करते एक टायटल डीड में हुई गलती उसने मेनेजर की नज़रों में ला दी | इससे कंपनी को बहुत लाभ हुआ, कंपनी के पैसे बचे | उन्होंने उदार होकर सर्टिफिकेट के लिए लगनेवाली फीस माफ़ कर दी | कितना यह औदार्य ! सर्टिफिकेट मिला वह भी केवल काम का | सनद का तो प्रश्न ही नहीं उठता |

लंदन में उसका उठना-बैठना बड़े लोगों में था जो उसके ऊंचे बौदधिक स्तर के कारण था | उनमें लार्ड मैक्समुलर, लेडी कार्लाइल, बर्नाडशा जैसे अनेक नाम थे | रानी विक्टोरिया की गार्डन पार्टी का आमंत्रण आया तो उसने भारतीय पोशाक का आग्रह किया और नौकरशाही से विवाद कर कर अंत में गुलाबी रंग की साडी पहनी जिसकी रानी ने भी बड़ी प्रशंसा की |

१८९४ में भारत लौटी तो उसे पहली नौकरी दी बड़ोदा महाराज ने | बडोदा में उसी समय सख्ती से सार्वत्रिक शिक्षा आरंभ हुई थी | उस प्रयोग की सफलता आजमाने के लिए कार्नेलिया की नियुक्ति हुई थी | महाराज को कार्नेलिया से बोटिंग सीखना था साथ ही उससे अंग्रेजी आचार पद्धति भी जानना थी | कार्नेलिया ने रिपोर्ट देते समय जरा कुछ अधिक साफगोई अपनाते हुए यह लिखा की किसान चिढ़े हुए हैं, उनके बच्चों को कपास निकालने के लिए समय नहीं मिलता | उनका कहना है कि व्यापारियों के बच्चों को शिक्षा दो हमें क्यों ? कार्नेलिया की नौकरी समाप्त हो गई |

उसे स्त्रियों के उत्तराधिकार, भूमि मालिकाना अधिकारों के मामलों में काम करना था | सिविल मुकदमों के काम करना हो तो सनद चाहिए | कार्नेलिया भारत में फिर से एल. एल. बी. की परीक्षा में बैठी और पास हुई फिर भी उसे सनद प्रदान नहीं की गई |

ब्रिटिश सरकार ने उसकी पर्दानशीन स्त्रियों की समस्याओं के लिए नियुक्ति की यह उसका पसंदीदा काम था | स्त्रियों के लिए काम कर उनके अधिकार उन्हें दिलवाना | परदानशीन औरते खुलकर पुरुष वकीलों से बात नहीं कर सकती इस कारण उनके अधिकारों का हनन होता है यह बात वह जानती थी | मालमत्ता, जीविका, उत्तराधिकार, स्त्रीधन इन विषयों में अपने ज्ञान का लाभ वह इन स्त्रियों को दे सकी | उसने ६०० से अधिक महिलाओं और अनाथ बच्चों को कानूनी लड़ाई लड़ने में सहायता की | इन विषयों पर उसने अनेक पुस्तकें लिखी |

बाद में वह कोलकाता में काम करने लगीं | १९०४ में कोर्ट ऑफ़ वर्ड्स के रूप में उसकी नियुक्ति कोलकाता में हुई | दायभाग पद्धति के कारण बंगाल में उत्तराधिकार प्रश्नों का बहुत महत्व था | १९०७ में बंग-भंग आंदोलन के बाद उनकी कोलकाता की नियुक्ति रद्द हो गई |

कार्नेलिया का भाई परदेश से सनद लेकर लौटा और अहमदाबाद में वकालत करने लगा | कार्नेलिया को भी सनद मिले इसके लिए वह प्रयत्न करने लगा | हाईकोर्ट ने फिर से विचार किया और अंत में उत्तर दिया “जब तक इंगलैंड में स्त्री वकील नहीं तब तक भारत में वैसी प्रथा शुरू करना इंगलैंड का अपमान करने जैसा होगा |”

कार्नेलिया अब ऊब चुकी थी | जो उसे पसंद था, आता था, करना चाहती थी जिसके लिए अनथक प्रयास किए वह कर नहीं पा रही थी | अब बदलते ज़माने के साथ मिशनरी काम की ओर देखने की जनता की वृत्ति भी बदल गई थी | उसके माता-पिता भी नहीं रहे | खाली बैठी कार्नेलिया अपना मन दुनिया घुमने में लगाने लगी साथ ही लेखन द्वारा उसने अपने अनुभव लोगों के सामने रखे इसके द्वारा उसने अपने माता–पिता और अपनी बहन के कार्यों की प्रशंसा की | तत्कालीन सामाजिक जीवन से वे एकरूप हो गए थे | विषेशतः न्यायमूर्ती रानडे, रमाबाई रानडे, पंडिता रमाबाई इनके साथ उनका बहुत सम्बन्ध आया | उनकी अंग्रेजी पाठशाला में राजघरानो के बच्चे पढने आते थे | वहां अंग्रेजी संस्कृति, इतिहास आचार-विचार इस पर जोर रहता था | परन्तु इसी के साथ बराबरी से चल रहे गरीब हिन्दू और मुस्लिम लडके-लडकियों की स्कूलों में  भारतीय भाषाओँ में शिक्षा दी जाती थी | स्वच्छता, आरोग्य और आसपास के क्षेत्र का इतिहास-भूगोल वहां प्रमुखता से सीखाया जाता था |  
    
कार्नेलिया ने डा. रखमाबाई का अनुसरण किया उसने सारे दरवाजे खटखटाए परन्तु उसे न्याय नहीं मिला तो नहीं मिला ! उसने भी पुरुषों की पर्वाह नहीं की परन्तु, कटुता भी नहीं रखी | उसे जो यश मिला था उसका अहंकार न रख आनंदीबाई, रखमाबाई, काशीबाई कानिटकर, पंडिता रमाबाई की तरह शांत बनी रही |

स्त्रियों के बारे में लिखे गए कार्नेलिया के लेखों का बहुत महत्त्व है | परदे के पीछे रहनेवाली इन स्त्रियों के दुःख उसने समाज के सामने लाए | वे स्त्रियां हैं इसलिए परिवार, समाज और राज्यकर्ताओं ने उन पर हमेशा अन्याय ही किए थे | स्त्रियों के बारे में लिखे गए उसके लेखों का बड़ा महत्त्व है | परदे के पीछे रहनेवाली इन स्त्रियों के दुःख वह समाज के सामने लाई | इस सम्बन्ध में उसकी भूमिका किसी समाज सुधारक से कम नहीं रही | स्त्रियों के रूप में परिवार ने, समाज ने और राज्यकर्ताओं ने उन पर हमेशा जुल्म ही ढाए |
 जनाना डवेल्लर्स, बिटवीन द ट्वीलाइटस, इंडिया कालिंग इन तीन पुस्तकों में उसने इन अन्यायों की दास्ताँ बयां की है | अंग्रेजों ने उसके इन कार्यों की हमेशा प्रशंसा की है | भारतीय और आंग्ल दोनों ही संस्कृतियों द्वारा पुरुषी वर्चस्ववाले क्षेत्रों में स्त्रियों को प्रवेश नहीं करने देने की प्रवृतियों के विरुद्ध उसने सतत संघर्ष किया आवाज उठाती रही | अंत में यह जुनूनी भारत की पहली महिला वकील लन्दन में बस गई और ६ जुलाई १९५४ को उनका निधन हो गया |



Friday, 25 January 2019

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान - शिरीष सप्रे

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान
शिरीष सप्रे

भारत में स्वाधीनता की लड़ाई हिंसक और अहिंसक दोनों ही तरीकों से लड़ी गई और इतिहास साक्षी है कि, अवसर मिलने पर भारत की महिलाऐं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रही हैं और स्वाधीनता आन्दोलन कोई अपवाद नहीं | भारत के स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं ने पुरुषों के साथ महत्वपूर्ण भाग लिया है |

सन १७५७ में प्लासी की हार के बाद १७५७ से १८५७ तक पूरी एक शताब्दी का इतिहास इन विद्रोहों से भरा पड़ा है | इन सभी विद्रोहों में स्त्रियों की भी न केवल व्यापक भागीदारी रही, बल्कि कई बड़े विद्रोहों में उनका कुशल नेतृत्व रहा है | जैसे सन्यासी विद्रोहों का संचालन देवी चौधरानी ने, चुआड विद्रोह का रानी शिरोमणि ने, कित्तूर विद्रोह का रानी चेन्नमा ने किया |

१८५७ के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई तथा बेगम हजरत महल का नाम विशेष उल्लेखनीय है | यों रानी रामगढ, रानी तुलसीपुर, रानी तेज बाई, बेगम जमानी आदि अन्य कई रानियों, बेगमों ने अपने जौहर कम नहीं दिखाए थे | महारानी तपस्विनी का भूमिगत क्रांति संगठन तो गजब का था |


इन सभी विद्रोही, क्रांतियों के दौरान हजारों हजार स्त्रियां फांसी, गोली का शिकार हुई | कई घर बर्बाद हुए पर क्रूर दमन के बावजूद, विद्रोह दबे नहीं, यहां - वहां फूटते रहे, जिनमें निचले तबकों की गरीब स्त्रियों की भागीदारी भी कम नहीं रही | कुका आंदोलन प्रसिद्ध है इस आंदोलन में हुकमी और इंदकौर नामक औरतों ने सक्रिय भाग लिया | महारानी तपस्विनी को कुछ समय के लिए जेल में बंद रखा गया था, वह महारानी लक्ष्मीबाई की भतीजी लगती थी | लक्ष्मीबाई की दो दासियों मुंदरा और काशीबाई ने भी अंत तक युद्ध में साथ दिया और वीरगति प्राप्त की |

पर अभी तक के इन विद्रोहों का स्वरुप व महत्त्व प्रायः क्षेत्रीय या स्थानीय था | इसलिए आगे चलकर राष्ट्रिय मुक्ति संघर्ष के रूप में देश व देश के बाहर जो क्रांतिकारी संगठन बने तरुण भारत सभा, भारत मेला, अभिनव भारत समिति, मित्र मेला, युगांतर दल, अनुशीलन समिति, दीपाली संघ, श्री संघ, ग़दर पार्टी, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी, भारत नौजवान सभा, आदि | उनकी गुप्त कार्यवाहियों में बिखराव के बावजूद, उनका उददेश्य समान था और स्वरुप राष्ट्रिय |

इन संगठनों के संपर्क सूत्र न केवल पूरे भारत में फैले थे अपितु देश के बाहर ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान, इटली तक प्रवासी भारतीय क्रांतिकारी इनसे जुड़े थे | बहुत से लोग तो अहिंसक लड़ाई लड़नेवाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहकर भी कांग्रेस के भीतर गरम दल की गरम जोश गतिविधियों और कांग्रेस से बाहर गुप्त क्रांति गतिविधियों से एक साथ जुड़े थे |

महिलाएं भी इन गतिविधियों में न केवल शामिल थी कई जगह नेतृत्व भी संभाल रही थी | गरम दल की एक अग्रणी कार्यकर्ती डा. ऐनी बेसंट ने होम रूल लीग का गठन कर होम रूल आंदोलन का नेतृत्व किया | प्रवासी भारतीयों में भीकाजी कामा ने क्रांति का शंख फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई | सरफरोश प्रीतिलता ने एक्शन ग्रुप का नेतृत्व कर स्वयं आगे बठकर शहादत को गले लगाया | गवर्नर के बंगले में चालाकी से प्रवेश कर दो छोटी लडकियों शांती और सुनीति ने गवर्नर पर गोली चलाकर सारे देश में तहलका मचा दिया | पूरा क्रांति इतिहास अनेक किशोरियों और युवतियों के इस प्रकार के साहसी कारनामों से भरा पड़ा है | यहां तक कि क्रांतिकारियों को गुप्त सहायता करने के आरोप में भी पकड़ी जाकर उन्हें दो से आठ साल तक की लम्बी सजाएं हुई हैं |

रानी मां के रूप में जानी जाने वाली रानी गेडीनिल्यु ने १९२० और १९३० के दशक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और औपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष किया | उन्हें अक्टूबर १९३२ में गिरफ्तार किया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई | वे १४ साल जेल में रही | उनके भाई जदोनांग को १९३१ में फांसी पर लटका दिया  गया | रानी मां कट्टर गांधीवादी थी और उन्होंने कहा था
- ‘महात्मा गांधी एक बार गुवाहाटी आए थे | तब उन्हें माला पहनाने का सम्मान मुझे मिला था | तब से मैं अहिंसा और महात्मा गांधी के सभी संदेशों की अनुयायी बन गई |’ गेडीनिल्यु को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने १९३७ में उस समय रानी की उपाधि दी थी, जब उन्हें पूर्वोत्तर क्षेत्र के दौरे के समय इस साहसी महिला के बारे में पता चला था | 
                                     

सन 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में देश की महिलाओं ने घुंघट और बुरका उतारकर आजादी की लड़ाई में बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया | १९४२ के भारत छोडो आंदोलन में भी महिलाओं ने बढ-चढ़ कर भाग लिया | इसी तरह स्वतंत्रता-आंदोलन में दक्षिण भारतीय महिलाओं की न तो भूमिका कम रही ना ही बलिदान |