Tuesday, 15 May 2018

गजब खरबूजे की माया - शिरीष सप्रे

गजब खरबूजे की माया
शिरीष सप्रे

खरबूजे के संबंध में यह कहावत भले ही पुरानी हो परंतु आज भी सटीक बैठती है खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। दूसरी प्रसिद्ध कहावत है छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर कटेगा तो खरबूजा ही। यह कहावत इसकी मृदुता को लेकर है। यों तो ग्रीष्म ऋतु में अनेक फल बाजार में उपलब्ध रहते हैं, किंतु सभी फलों में खरबूजा अपना एक अलग ही स्थान रखता है। इसे गर्मियों का राजा भी कहा जा सकता है। यह गोलाकार या अंडाकार होता है। यह पौष्टिक स्वादिष्ट तो होता ही है साथ ही कई छोटी-मोटी बीमारियों को मिटाने के गुण भी इसमें होते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि खरबूजा ग्रीष्म ऋतु का अमृत फल है। इसको खाने से आप एक नई ताजगी  महसूस कर उठेंगे। बस इसे भूखे पेट मत खाइएगा अन्यथा लेने के देने पड जाएंगे।

इतिहास गवाह है कि खरबूजे ने दुनिया का इतिहास बदलने, आपसी फूट के बीज पनपाने, फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मई 1498 में वास्कोडिगामा ने जब कालीकट में अपने जहाज का लंगर डाला था तो भारतीय मीठे-मीठे महकते स्वादिष्ट खरबूजों की  सुगंध ने ही उनकी जीभ से लार टपका दी थी। वस्तुतः खरबूजे की महक पर फिदा होकर स्पेनवासियों और पुर्तगालियों को समुद्र के रास्ते भारत के लिए नया मार्ग तलाशना पडा था। मोहनजोदडों (3000 ई.पू.) की खुदाई में जो खास चीज मिली थी, वह चांदी में लिपटा एक कपडा था जिसमें खरबूजों के पूर्वज बीजों के अवशेष थे। निश्चय ही किसी भी पुरातत्वज्ञ को उन बीजों की कीमत सोने से कम नहीं लगी होगी।

वेस्टइंडीज में गन्ने की खेती करनेवाले अंगे्रजों की जीभ पर खरबूजे का स्वाद चढ़ गया होगा सो धीरे-धीरे खरबूजे की तारीफ ब्रिटेन के घर-घर में होने लगी तो रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जोसेफ बैक्स ने कैप्टेन ब्लिंग के नेतृत्व में वहां एक जहाज भेजने का निश्चय किया। 15 अक्टूबर, 1798 को 'बाउंटी" रवाना हुआ। लगभग 1 वर्ष बाद वे टिहरी पहुंचे और वहां खरबूजों की बहार में खो गए। कोई पांच महिने बाद उनके दिमाग से खरबूजे का भूत उतरा तो उन्होंने साथियों से लौटने का आग्रह किया। परंतु, साथियों में विद्रोह भडक उठा क्योंकि उन लोगों ने तो खरबूजे के लोभ में वहीं बस जाने का निश्चय कर लिया था। खरबूजे के दीवाने सैनिकों ने ब्लिंग साहब को एक नाव में बिठाकर समुद्र की लहरों में भाग्य भरोसे छोड दिया। ब्लिंग साहब बडी मुश्किल से यंत्रणाएं सहते हुए बडी ही दयनीय दशा में स्वदेश लौटे। लेकिन ब्लिंग साहब से फिर भी खरबूजे का मोह ना छूटा इसलिए उन्होंने फिर से एक बार टिहरी यात्रा का खतरा उठाया और बहुत सारे फल लेकर स्वदेश लौटे। जैसाकि अंगे्रजों का इतिहास रहा है उन्होंने भारतीय किसानों के खून-पसीने की मेहनत से पैदा किया खरबूजा यूरोप भेजकर यूरोपवासियों की जेबें खाली की और इधर किसानों का जमकर शोषण किया। 

खरबूजे की कई जातियां हैं। भारत में पाई जानेवाली जातियों में प्रमुख है - सफेदा और चिता, जो लखनऊ में मिलता है। पंजाब का चुनियारी और कलाची भी प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में मिलनेवाली जातियां हैं- बताशा, शरबत, शिरंजीत (जिसे जामखिरुल भी कहते हैं)।  आयुर्वेद के अनुसार यह मूत्रकारक, बलवर्द्धक, कोष्ठ शुद्ध करनेवाला, पचने में भारी, शीतल, स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक तथा वात-पित्त नाशक है। मौसम भर खरबूजे के सेवन से शरीर में तरावट रहती है और चित्त प्रसन्न रहता है। लगातार खाते रहने से खुश्की और कमजोरी मिटती है। दांत पर जमा मैल, मुंह की दुर्गंध, पीलिया, मूत्राशय की पथरी तथा सभी चर्मरोग नष्ट होते हैं। जिसको अम्लीयता की शिकायत हो वह आराम से इसे ले सकता है। पेचिश के लिए यह रामबाण दवा है। इसके बीज भी कुछ कम गुणों से भरपूर नहीं होते। बीजों से केवल ताजगी और ठंडाई ही नहीं पहुंचती है, बल्कि इससे दिमाग भी तेज होता है। इसके बीजों से खाने का तेल भी बनता है, जो काफी पोषक होता है। 

Friday, 11 May 2018

ग्रीष्मकाल में वरदान हैं तरबूज - शिरीष सप्रे

ग्रीष्मकाल में वरदान हैं तरबूज 
शिरीष सप्रे

हमारा शरीर तंदरुस्त और शक्तिशाली बना रहे इसकी व्यवस्था प्रकृति ने स्वयं ही कर रखी है बस आवश्यकता है तो हमें इस संबंध में व्यवस्थित जानकारी रखने की। अब ग्रीष्मकाल में होनेवाली गर्मी के प्रकोप को ही लीजिए इससे बचाने के लिए प्रकृति ने हमें तरबूज और खरबूज जैसे फल दिए हैं। यह प्रकृति की अनुपम कृपा ही है कि बहुउपयोगी, बहुगुणी स्वादिष्ट ये फल हमें खाने को मिलते हैं। तरबूज  को ही लीजिए जहां यह गरीबों के लिए सस्ता फल है वहीं अमीरों के लिए विभिन्न प्रकार से खाया जानेवाला एक स्वादिष्ट फल है। वर्गीकरण की दृष्टि से यह कद्दूवर्गीय फल है। कच्चे तरबूज की लोग सब्जी, रायता आदि बनाते हैं। इसके बीज की गिरियों को विभिन्न प्रकार के मेवा मिष्ठानों में डालते हैं। बीजों से तेल भी निकलता है।
तरबूज ग्रीष्मकालीन फसल है। जितनी तेज गर्मी होगी उतनी ही इसकी पौध एवं फसल में वृद्धि होगी। तरबूज की खेती के लिए सबसे उपयुक्त नदी के किनारे की रेतीली जमीन होती है। प्रकृति की अनमोल देन तरबूज ग्रीष्मकालीन विशेष फल है। तरबूज का सर्वाधिक उत्पादन चीन में किया जाता है। जापान में चौकोन तरबूजों का उत्पादन किया जाता है। तरबूज या वाटर मेलन अफ्रीका से आकर सारी दुनिया में खाया जाने लगा। इसके सफेद हिस्से की सब्जी बनाकर खाई जाती है। ठंडक प्रदान करनेवाला यह फल अत्यंत शीत होकर बढ़िया टानिक है। आयुर्वेद के कई ग्रंथों में इसके गुणों की चर्चा है। आयुर्वेद के अनुसार यह ग्राही, आंख की रोशनी बढ़ानेवाला, शीतलता प्रदान करनेवाला, भारी तथा वात-कफनाशक और प्यास को शांत करनेवाला कहा गया है। गर्मी के दिनों में अधिक पसीना निकलने के कारण प्राकृतिक लवणों की कमी हो जाती है और प्यास अधिक लगती है। तरबूज खाने से प्यास शांत होती है और उपर्युक्त लवणों की पूर्ति होती है।

आधुनिक खोजों मेें इसे चर्म रोगों, पेचिश, कब्ज, आंतों की जलन, जी मिचलाना, उल्टी, पीलिया, लीवर-तिल्ली, उच्च रक्तचाप, पेशाब में जलन या पेशाब रुकने, आदि रोगों में उपयोगी पाया गया है। यह फेफडे के रोगों पर भी लाभप्रद पाया गया है। गर्मी के मौसम में तरबूज का शर्बत अत्यंत लाभप्रद है।

Thursday, 10 May 2018

प्राचीनत्व अंगूर (द्राक्ष) की बेल का - शिरीष सप्रे

प्राचीनत्व अंगूर (द्राक्ष) की बेल का 
शिरीष सप्रे

समुद्र मंथन की कथा से तो लगभग सभी लोग वाफिक होंगे ही जिसमें चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी। परंतु इसी समुद्र मंथन के दौरान एक सुंदर स्त्री जिसका देवताओं ने नामकरण द्राक्षा किया ऊपर आई और उसने तत्काल बेल का रुप धर लिया। देवताओं ने इस बेल का नामकरण द्राक्षा किया। इस पर से द्राक्षा का प्राचीनत्व सिद्ध होता है। यह द्राक्षा बेल अत्यंत गुणकारी एवं औषधीय गुणों से युक्त होती है। यदि इसके औषधीय गुणों पर गौर किया जाए तो ध्यान में आएगा कि यह अद्‌भुत फल है जिसका औषधीय उपयोग हजारों साल से होता चला आ रहा है।

इस द्राक्षा बेल का मूलस्थान कॅस्पियन और काला समुद्र के मध्य स्थित कॉकेशस पर्वत के आसपास है, ऐसा माना जाता है। आज भी वहां द्राक्ष की जंगली बेलें दिख पडती हैं। संभवतः आर्य इन द्राक्षों के बीज वहां से भारत लाए। कॅस्पियन समुद्र के उस पार अंगूर का प्रसार सर्वप्रथम एशिया मायनर, फिर यूनान और सिसली में हुआ। फोनिसियन व्यापारियों द्वारा 600 वर्ष ई. पू. इटली, स्पेन और फ्रांस में अंगूर की बेलें ले जाई गई। अंगूर के पत्ते व बीजों वाले अवशेष (फॉसिल्स) उत्तर अमेरिका और यूरोप में मिले हैं।

शायद बहुत प्राचीन काल से ही मनुष्य को अंगूर की बागबानी का ज्ञान हो। अंगूर की खेती और अंगूर से शराब बनाने का ज्ञान छः हजार वर्ष पूर्व से इजिप्त के लोगों को था। इजिप्त की पुरानी कब्रों में अंगूर के बीज मिले हैं और दीवारों पर अंगूर की खेती के चित्र भी मिले हैं। बायबल में भी नूह द्वारा अंगूर की खेती करने का उल्लेख मिलता है। पुराने हिब्रू, रोमन और यूनानी साहित्य में भी अंगूर और उसकी शराब के उल्लेख मिलते हैं। रोमन ज्ञानकोशकार प्लीनी ने अंगूर की 51 जातियों और पचास तरह की शराब की जानकारी दी है।

शराब का उद्‌गम कैसे हुआ इस संबंध में एक ईरानी कथा इस प्रकार से है - पुराने जमाने में जमशेद नामका एक राजा ईरान पर राज करता था। इस राजा को दुनिया की सर्वोत्तम वस्तुओं के साथ - साथ हर रोज अंगूर खाना भी बहुत प्रिय था। उसके गुलाम कॅस्पियन के जंगलों में से अंगूर एकत्रित कर राजमहल के तहखाने में रखा करते थे। राजमहल में काम करनेवाली अल्मा नामकी एक दासी थी जिसकी महत्वाकांक्षा राजा की रखैल बनने की थी। सतत प्रयत्नों के बाद भी उसे सफलता हासिल नहीं हो पाई वह राजा को आकर्षित नहीं कर पाई। 

वह प्रतिदिन तहखाने में राजा के लिए रखे हुए अंगूरों का सेवन अवश्य करती थी। एक दिन उसे एक घडे में कुचले हुए अंगूर नजर आए। उसने उस मटके में हाथ डाला और हाथ पर लगे लाल रस को चखकर देखा। उसे वह स्वाद कुछ पसंद नहीं आया, उसने उसे थूक दिया, उसे लगा शायद यह रस जहरीला हो गया है। कहीं राजा इसका सेवन ना कर ले इसलिए उसने इस मटके को अलग निकालकर रख दिया। एक दिन जब राजा प्रसन्न था तब उसने उसे बताया कि वह रोज तहखाने में रखे अंगूर खाती है। यह सुन राजा क्रोधित हो गया और उसने उसे दंडित कर दिया। जीवन से हताश हो उसने आत्महत्या करने की ठान तहखाने में रखे उन कुचले हुए अंगूरों के रस का सेवन करने का निश्चय किया और भरपूर मात्रा में उस रस का सेवन कर लिया। 

परंतु, परिणाम उल्टा हो गया उसका निराश मन उत्तेजित हो गया और वह मदहोश हो नाचने लगी। गुलामों ने यह देख राजा को सूचित किया। गुलामों ने राजा को सूचित किया। राजा ने तलघर में आकर माजरा समझने की कोशिश में इस रस को चखकर देखा। नशे में उसे  आल्मा सुंदर दिखने लगी और उसने आल्मा को अपनी रानी के रुप में अपना लिया।  

द्राक्षा बेलवर्गीय जाति की होकर जाम, जेली और ज्यूस बनाने के काम आती है यह कई औषधीय गुणों से युक्त होकर इसकी कई जातियां है। जिसमें थामसन सीडलेस सबसे अधिक उत्कृष्ट, प्रसिद्ध होकर सर्वाधिक उपयोग में लाई जाती है। तुर्कस्थान में इसे 'सुलतानीना" कहते हैं। इस जाति की खेती सबसे अधिक ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका मेंं होती है। किसमिस और शराब बनाने के लिए इस जाति के अंगूरों का सर्वाधिक प्रयोग होता है। महाराष्ट्र के नासिक जिले में इसकी खेती सर्वाधिक होती है। यहां के अंगूरों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बहुत है।

प्रकृति के इस अनमोल मेवे के सेवन से शरीर में नवचैतन्य निर्मित होकर स्फूर्ति मिलती है। हरे और काले इस प्रकार दो तरह के अंगूर होते हैं। काले अंगूर अधिक औषधीय होते हैं। अंगूर मृदु विरेचक, दाहनाशक, तृप्तिदायक और श्रमहारक होते हैं। अशक्तता पचन शक्ति मंद होने पर इसका सेवन लाभकारी होता है। इसके फ्री न्यूट्रिएंट्‌स शरीर और ह्रदय के लिए बहुत लाभकारी होते हैं। साथ ही इसमें  लाभदायक तत्व के रुप में एंटीऑक्सीटडेंट्‌स होते हैं।  

Tuesday, 1 May 2018

उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाला महान यात्री मुनि अगत्स्य - भाग 2 शिरीष सप्रे

उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाला महान यात्री
 मुनि अगत्स्य - भाग 2   शिरीष सप्रे
तमिल बंधुओं के मन में अगत्स्य ऋषि के प्रति अतीव आदर की भावना पाई जाती है। तमिलनाड में अगत्स्य को शिवजी का सत्‌ शिष्य, मनीषि, महात्मा, वेदशास्त्र का प्रणेता एवं अलौकिक शक्ति संपन्न महर्षि मानते हैं। महामुनि अगत्स्य के अनेक मंदिर इस प्रदेश में आज भी विद्यमान हैं जो इस श्रद्धा और भक्तिभाव के प्रतीक हैं। चिदंबरम्‌ के मंदिर के पूर्व गोपुर पर अंकित अगत्स्य की मूर्ति प्रमाणित मानी जाती है। दक्षिण के अगत्स्य मंदिरों में पोर्दियमलै का मंदिर अत्यधिक प्रसिद्ध है। कहा जाता है, पंचवटी से प्रस्थान करने के बाद मुनि का प्रमुख आश्रम इसी स्थल पर निर्मित हुआ था और यही वह पुण्य स्थल है, जहां से मुनिराज ने समस्त दक्षिण भूमि में आर्य संस्कृति के श्रेष्ठ विचारों का प्रचार किया। दक्षिण में अगत्स्य से संबंधित क्षेत्रों की संख्या बहुत बडी है। कर्नाटक में बीजापुर के निकट वातापी (बदामी), कूर्ग प्रदेश में ब्रह्मगिरी, आंध्रप्रदेश द्राक्ष-रामम्‌, तंजौर जिले में अगत्स्यमपल्ली और तिरुनवेल्ली के समीप अगत्स्यवरम्‌ आदि तीर्थस्थल अगत्स्य के महान सांस्कृतिक कार्य की स्मृति सदैव जाग्रत करते आए हैं।

ऋषि अगत्स्य के तमिलनाड के प्राचीन राजवंशों के साथ संबंध थे और उनका उन पर बहुत प्रभाव भी था। पाण्ड्‌य राजाओं का कुलगुरु अगत्स्य ही को माना जाता है। दक्षिण प्रदेश में आने के उपरांत मुनि ने ही यहां के वनप्रदेश को मनुष्यों के रहवास योग्य बनाया। उनके द्वारा सघन वनों की कटाई अभूतपूर्व थी। वेलीर, अरुवालर, आदि द्रविड जनजातियों ने ऋषि अगत्स्य के इस अद्‌भुत साहसी सेवाकार्य में उनका साथ दिया था। तमिल भाषा के साथ भी मुनिवर का संबंध अतीव महत्वपूर्ण था। आर्य एवं द्रविड संस्कृति को एकात्मता के सुंदर सूत्र में जोडनेवाले इसी मनीषी महापुरुष ने तमिल के व्याकरण की रचना की, इस प्रकार का दृढ़ विश्वास तमिलों में आज भी विद्यमान है। तमिल भाषा के विकास के लिए अगत्स्य ने 'संघम्‌" की स्थापना की। उन्हीं के प्रेरक अस्तित्व के कारण तमिल और देववाणी संस्कृत का सहयोग संपन्न हुआ। तमिल के प्राचीन साहित्य का इतिहास अगत्स्य की कथाओं से भरापूरा है।... तमिल भाषा, व्याकरण एवं साहित्य की अभिवृद्धि करने में इस महर्षि का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रदेश के निवासियों में महर्षि अगत्स्य के प्रति बहुत श्रद्धा भावना है।

महाभारत के वन पर्व में एक कथा है ः कालकेय नामक दैत्य जाति समुद सागरीय क्षेत्र में निवास करती थी। मनुष्य जगत को सदैव पीडा पहुंचाने में इन दैत्यों को बडा आनंद आया करता था। समस्त विश्व इन दैत्यों के कारण भयभीत हो गया था। इस विचित्र संकट से  विश्व को बचाने के लिए तपस्वी अगत्स्य वहां पहुंचे। अपनी दिव्य तपशक्ति के बलबूते उन्होंने एक ही घूंट में सारे समुद्र के पानी का पान कर लिया और कालकेय दैत्यों को नष्ट कर दिया। यह रुपक अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। यह कथा कुछ गंभीर अर्थ रखती है। जिस प्रकार चुल्लूभर पानी को हम झट से पी सकते हैं वैसे ही अगत्स्य ने समुद्र पर विजय प्राप्त की एवं अत्यंत वीरता के साथ दैत्यों का संहार कर दिया समुद्र का भय दूर हुआ।

समुद्र बंधन तोडकर उपनिवेश संस्थापन तथा भारतीय सभ्यता का प्रसार करने हेतु अगत्स्य ऋषि ने सुदूर देशों में भ्रमण किया। कम्बोडिया में इस बात के भरपूर साक्ष्य मिले हैं। यहां आकर मुनि अगत्स्य ने विशाल शिव मंदिरों का निर्माण किया था। यहां के किसी राजवंश की स्थापना का श्रेय भी इसी ऋषि को प्राप्त है। कम्बोडिया के अंकोरवाट में एक अति प्राचीन शिलालेख मिला है जिस पर अगत्स्य के यहां निवास करते हुए परमधाम जाने का उल्लेख किया हुआ है। इस टूटे-फूटे शिलालेख की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं - ब्राह्मण अगत्स्य आर्य देश के निवासी थे। वे शैवमतानुयायी थे। उनमें अलौकिक शक्ति थी। उसीके प्रभाव से वे इस देश तक पहुंच सके थे। यहां आकर उन्होंने भद्रेश्वर नामके शिवलिंग की पूजा-अर्चना बहुत समय तक की थी। यहीं से वे परमधाम को सिधारे थे।

सागर की सीमाओं को पार करनेवाला, महान भारतीय संस्कृति का यह पुजारी, भारतीय विचारों का प्रथम प्रतिनिधि है। वायुपुराण में इसकी बहिर्द्वीप (बोर्निओ), यवद्वीप (जावा), सुमात्रा, कुशद्वीप, वराह द्वीप एवं शांख्य द्वीप तक की सुदूर यात्राओं का उल्लेख मिलता है। ये द्वीप आज के इंडोनेशिया, मलाया और उनके निकटवर्ती प्रदेश हैं। इन प्रदेशों में आज भी अगत्स्य की स्मृति किसी ना किसी रुप में विद्यमान है। पूर्व बोर्नियो में कीबेग नामक गांव में प्राचीन गुफाएं और अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां शिव, गणेश, नंदी आदि भारतीय देवताओं के साथ अगत्स्य ऋषि की मूर्ति भी मिली है। जावा में भी अनेक स्थलों पर इस प्रकार की मूर्तियां मिलती हैं। श्रीलंका के साथ भी अगत्स्य का संबंध सर्वश्रुत है। उन्हें लंकावासी बताया गया है। यहां के निवासी उन्हें दक्षिण का स्वामी समझते हैं।

आर्यावर्त की संस्कृति का शुभ संदेश लेकर जो पहला मिशनरी दक्षिणापथ में आया वह था अगत्स्य, जिसने अपने सफल जीवन में उत्तर और दक्षिण की आर्य और द्रविड देश की संस्कृति का सुंदर समन्वय करने का सेवाव्रत सार्थ किया उसकी जीवनगाथा निश्चय ही प्रेरणादायी है। अगत्स्य नक्षत्र का उदय भाद्रपद महिने में होता है और इसके उदय के पश्चात वर्षाकाल में गंदला हुआ नदियों का पानी पुनः एक बार निर्मल हो जाता है। इसी प्रकार वर्तमान में हमारी संस्कृति पर जो आक्रमण हो रहे हैं वह चुनौतियां काल का प्रवाह है। हमारी एकात्मता चिरंजीवी है और महर्षि अगत्स्य की स्मृति हमें यही प्रेरणा देती है कि, हमारी एकात्मता चिरंजीवी है। 

Sunday, 22 April 2018

दक्षिणाकाश का तेजस्वी नक्षत्र भगवान अगस्त्य - भाग 1 शिरीष सप्रे

दक्षिणाकाश का तेजस्वी नक्षत्र भगवान अगस्त्य - भाग 1
शिरीष सप्रे

दीर्घदर्शी और समयज्ञ ऋषी अगस्त्य का उल्लेख सबसे पहले ऋगवेद के प्रथम मंडल में देखने को मिलता है। वे ऋचाओं और मंत्रों के द्रष्टा और स्रष्टा हैं। धर्मपत्नी लोपामुद्रा (विदर्भ नरेश मलयध्वज की पुत्री। इससे विवाह कर मुनिवर ने संभवतः प्रथम ही अंतरदेशीय विवाह की प्रथा का शुभारंभ किया। विदर्भ में अमरावती नगरी के निकट सालबर्डी नामक गांव में अगत्स्य ऋषि का आश्रम था और उनके दक्षिण की महान यात्रा की आरंभ स्थली यही है, इस प्रकार की जनश्रुति है।) के साथ भी उनका उल्लेख संयुक्त रुप से पढ़ने को मिलता है। सामवेद के पंचम और द्वादश अध्याय में भी उनका उल्लेख यहां-वहां हुआ है। परंतु, एकाकी ही लोपामुद्रा के साथ संयुक्त रुप से नहीं। इसके पश्चात आदिकाव्य वाल्मिकी रामायण के अरण्यकांड के द्वादश और त्र्योदश सर्ग तथा उत्तरकांड के 34वें और 35वें सर्ग में अगस्त्य तथा भगवान राम की भेंट वार्ता और दिव्यास्त्र प्रदान करने की गाथा पढ़ने को मिलती है। 

दक्षिण दिशा के निवास के दौरान राम का मन सारे ऋषिवृंद में यदि कहीं विशेष रुप से आकृष्ट हुआ था तो वह भारतीय संस्कृति का शुभ संदेश लेकर दक्षिण की ओर चल पडनेवाले महामुनि अगस्त्य की ओर ही। भगवान अगस्त्य से श्रीराम को दंडकारण्य का पूर्वइतिहास किस प्रकार से इक्ष्वाकु कुल से संबंधित था का पता चला। वैसे वंश परंपरा से यह उन्हें ज्ञात ही होगा। विंध्य और शैवल पर्वत के मध्य भाग में स्थित इस अरण्य प्रदेश में उन्ही के पूर्वज इक्ष्वाकु के पुत्र दंड ने अपने राज्य का निर्माण कर अनेक वर्षों तक राज्य किया था।

उस काल में आर्यावर्ती प्रदेश से दक्षिण देश की ओर जाना अत्यंत कठिन कार्य था। घोर अरण्यों से तथा वन्य पशुओं से यह मार्ग भरा हुआ था। यहां की जंगली जातियों का भी बहुत भय था। रामायण के लंका कांड में इन क्रूर राक्षसों की विकट लीलाओं का वर्णन मिलता है। इल्वल तथा वातापी नामके राक्षस संभवतः इसी प्रदेश के निवासियों के नेता थे। उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाले इस महान यात्री मुनि ने अपने निवास से दक्षिण देश की भूमि को पवित्र किया। अगस्त्य ने यहां के निवासियों के मन पर विजय प्राप्त की। इस समस्त भूप्रदेश को आवागमन के योग्य बनाने का प्रचंड कार्य करने में वे सफल हुए। इस बात का प्रशंसापूर्ण उल्लेख वाल्मिकी रामायण के अरण्यकांड में है। वास्तव में दुर्गम दक्षिण में सर्वप्रथम आनेवाले अगस्त्य ही भारतीय संस्कृति के अग्रदूत हैं। दक्षिण में यज्ञसंस्था का प्रारंभ करने का श्रेय इन्हीं को देना चाहिए। दक्षिण देश के राजाओं तथा सामंतों ने यज्ञ विधि को अपनाया।

अनैतिक धन, भोजन न स्वीकारना, लोकहित के मूल्य पर अपना व्यक्गित हित साधना से बढ़कर पाप नहीं। लोकरंजन, लोकमंगल के कार्य से रोकना या व्यवधान उत्पन्न करना उचित नहीं इन आर्य मूल्यों के विपरीत सुदुर दक्षिण में निविड अंधकार, अज्ञान का अंधकार, घनीभूत होकर आक्रांत कृण्वंतो विश्वम्‌ आर्यम्‌ का उद्‌घोष करनेवाली आर्य संस्कृति आचारहीन, विचारशून्य, कुरीतियों का पालन, घृणिंत परंपरा का प्रचलन, आध्यात्मिक ज्ञान का नितांत अभाव, भूत-प्रेत की आराधना, संस्कार संपन्नताविहीन, भडकीले वस्त्राभूषण, मदिरापान, वासनापूर्ति में लिप्त, शिष्टता-सभ्यता से दूर (किसीका भी वरण), त्याग-तपस्या-बलिदान से घृणा, पुनर्जन्म, परलोक में आस्था नहीं, सबल द्वारा निर्बल का शोषण, पशु-पक्षी तक सुरक्षित नहीं, गो भक्षण, नरभक्षी, ऋषियों का भक्षण, पिशाचता, पाश्विक वृत्तियों वाली रक्ष संस्कृति से पीडित थी। दक्षिणापथ एवं दंडकारण्य को मुक्त कराने, आर्यों को अत्याचार, भय और दुःख से मुक्त ना करा लूंगा उत्तरापथ नहीं लौटूंगा का प्रण लेकर दक्षिणापथ की ओर प्रयाण कर अगत्स्य ने दक्षिणापथ में सुरक्षित रहने की अविश्वनियता को समाप्त किया।

प्रत्येक पुराण में यत्किंचित ही क्यों ना हो अगस्त्य से संबंधित वृत या घटना का उल्लेख मिलता है। इतिहास एवं काव्य में भी अगस्त्य का आख्यान यहां-वहां मिलता है। राष्ट्रीय-अस्मिता तथा सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा की रक्षा के लिए जो आगे चलकर श्रीराम ने व्यापक स्तर पर किए उनका शुभारम्भ अगस्त्य ने ही किया था। यही नहीं अगस्त्य पहले आर्य ऋषि थे जिन्होंने आत्मकल्याण की तुलना में लोककल्याण की महत्ता प्रतिपादित की। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की दिशा में कुछ पग उठाए। शम्बर, इल्बल तथा कालकेयों का वध कर राष्ट्र को निरापद बनाने का स्तुत्य प्रयास किया। इस महान यात्री के संकल्प में पहली बाधा विंध्याद्रि ने उपस्थित की। आर्यावर्त की सीमा पर खडा रहकर मेरु पर्वत की उत्तुंगता के साथ प्रतिस्पर्धा करनेवाला विंध्याद्रि आर्यावर्त के यात्री का मार्ग रोकना चाहता था। परंतु, अपनी दिव्य तपस्या के बल पर अगस्त्य ने विंध्याद्रि पर विजय प्राप्त की, विंध्याद्रि को नम्र बनाया। 

उस काल में जन सामान्य यह मानने लगा था कि, विंध्य अनवरत ऊंचा उठ रहा है परंतु, सत्य क्या है? भूगर्भ में घट रही अकल्पनीय घटनाओं, परिवर्तनों के कारण ऐसा तो कभीकभार ही होता है फिर वास्तविकता क्या है? विंध्य हिमालय की भांति दुर्लघ्य तो नहीं परंतु, विंध्य के पगतल में विस्तृत क्षेत्र में रहने पर संस्कृति संकरता, संस्कार विलुप्तता तथा जीवन सुरक्षा की अनिश्चितता के भय से दुर्लघ्य प्रचारित हो गया था। अतः मेधावी व्यक्ति, तपस्वी दंडकारण्य तो क्या उससे दूर रहनेवाले ऋषियों ने भी स्वयं को सीमित कर लिया। परंतु, अगस्त्य ने दक्षिण में प्रवेश कर वैदिक संस्कृति को व्यापक आयाम देने का सबल प्रयास किया।

इसका अर्थ यह नहीं कि इसके पूर्व दक्षिण भारत में आर्य थे ही नहीं। क्योंकि, ऐसा मानने का अर्थ होगा कि दक्षिण भारत में केवल अनार्य जातियां थी और वहां वैदिक कर्मकांड नहीं होते थे और गुरुकुल भी नहीं थे न ही ऋषि आश्रम। पुराणों में उपलब्ध अंतर्साक्ष्य तथा तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश पर विचार करने पर इसकी पुष्टि नहीं होती। कहा जाता है कि वृत्तासुर के अत्याचारों से पीडित आर्यों व देवों की रक्षार्थ इंद्र ने इसी क्षेत्र में निवसित आर्यऋषि दधीचि की अस्थियां लेकर वज्र बनाया था तथा इसी वज्र से युद्ध कर वृत्रासुर का वध किया था और उसके सजातिय कालकेयों द्वारा पीडित आर्य व आर्य ऋषियों की रक्षा अगस्त्य ने की थी। यदि एक क्षण के लिए हम इन सबको अपनी दृष्टि से ओझल कर दें तो भी यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि वहां आर्य थे ही नहीं। यदि नहीं थे तो अत्याचार किन पर होता था? असुर जातियां किनके यज्ञों का ध्वंस करती थी? 'निशिचर निकर सकल मुनि खाए," तुलसी ने यह किनको दृष्टि में रखकर लिखा था? निष्कर्षतः समस्त प्रश्नों का उत्तर यही है कि, अगस्त्य के पहुंचने के पूर्व आर्य ही नहीं, आर्य ऋषि भी वहां रहते थे।

तो फिर अगस्त्य के संबंध में ऐसा क्यों कहा जाता है। ऐसा लगता है कि तत्कालीन दक्षिण भारत में जो वन्य जातियां रहती थी वे थी तो आर्य जाति से संबंधित परंतु, असंस्कारित थी और इसका कारण था दक्षिण भारत में जो गुरुकुल या आश्रम थे वे असुर जाति के प्राबल्य तथा वन्य जातियों के औदास्य भाव के कारण इन लोगों को वैदिक विचारधारा में दीक्षित करने का व्यापक स्तर पर सफल प्रयास कर नहीं पा रहे थे। करते भी कैसे? वे तो स्वंय ही अस्तित्व रक्षा के संघर्ष में उलझे हुए थे और उसमें भी सफलता प्राप्त हो लेने की स्थिति में नहीं थे। उनकी इस दुर्दशा पर उत्तर भारतीय दुखी एवं चिंतित तो थे ही, अपने आपको असहाय भी अनुभव करते थे। अतः उत्तर भारतीय आर्यों को दुर्दशा से बचाने के लिए यह प्रचारित कर दिया कि, विंध्य हिमालय की उच्चता से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। अतः दक्षिण भारत में जाना असंभव है।

किंतु अगस्त्य ने लोगों द्वारा प्रसारित इस भ्रांत धारणा का खंडन करते हुए दक्षिण भारत में जाने का साहसिक पग उठाया तथा वहां जाकर तत्द्देशीय आर्यों को सुरक्षित ही नहीं तो सुसंस्कारित करने का भी उल्लेखनीय कार्य किया। अतः लोगों ने उस समय तक मित्रावरुणी, महामुनि, और्वश्य तथा कुंभज आदि नामों से अभिहित साहिसिक ऋषि को 'अगं पर्वतं स्तम्भयति इति अगस्त्यः" के सिद्धांतानुसार अगत्स्य नाम से पुकारना प्रारंभ कर दिया और आगे आनेवाली पीढ़ियों ने उन्हें चिरस्मृत बनाए रखने के अभिप्राय से एक तारे को ही अगत्स्य संज्ञा से संबोधित करना प्रारंभ कर दिया। जो आज भी प्रचलित है और वर्तमान पीढ़ि को उस ऋषि के महत्व का स्मरण दिलाता है। .....

Friday, 9 March 2018

क्या कठपुतली कला नष्ट हो जाएगी? - शिरीष सप्रे

क्या कठपुतली कला नष्ट हो जाएगी?
शिरीष सप्रे

प्राचीन भारतीय संस्कृति के वैभवशाली इतिहास और परंपराओं के संबंध में बोलते समय हर भारतीय अपने प्राचीन देवालयों, जो विशिष्ट शैलियों में बने हैं, संगीत, नृत्य, चित्रकला, आदि के बारे में बिल्कूल सहज भाव से बोलता चला जाता है। किंबहुना, इन कलाओं से ही भारतीय संस्कृति का एक चित्र संपूर्ण विश्व के सामने आ जाता है। परंतु, इन कलाओं के साथ ही अथवा उनसे भी अधिक प्राचीन एक भारतीय कला जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी है। हमारे द्वारा बहुत दुर्लक्षित हुई है और इस कारण यह कला कहीं हमारे देश से ही अस्तंगत तो नहीं ना हो जाएगी की परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। यह कला है 'कठपुतली कला"। वर्तमान में हमें यह कला टी. व्ही. के कुछ कार्यक्रमों में शीर्षक दिखलाते समय सामने आनेवाली गुडियाओं के रुप में नजर आती है।

यदि इस कला का इतिहास देखें तो यह लोक कला जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ प्रचार-प्रसार का माध्यम भी है, भारत की ही विश्व को देन है परंतु, अब लुप्त होने की कगार पर है। ई.पू. चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी के नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है। कठपुतली शब्द संस्कृत के 'पुत्तलिका" या 'पुत्तिका" और लैटिन के 'प्युपा" से मिलकर बना है जिसका अर्थ है छोटी गुडिया। पुत्तलिका शब्द निःसंदेह अत्यंत प्राचीन है क्योंकि वेदों में भी इसका प्रयोग हुआ है। अथर्ववेद में शत्रु का पुतला बनाकर मंत्र द्वारा जलाने का उल्लेख है। सिंहासन बत्तीसी की पुतलियों की कहानी भी बहुत प्रसिद्ध है। 

भारत से तुर्कस्थान होते हुए युरोप में यह कला गई और वहां से अन्यत्र फैली। बौद्ध धर्म के साथ श्रीलंका, इंडोनेशिया, चीन, जापान इन स्थानों पर कला का प्रचार-प्रसार और विस्तार हुआ। कहा जाता है कि, राजाश्रय से जिस प्रकार अन्य कलाओं का विकास हमारे यहां हुआ उसी प्रकार से डोरियोंवाली पुतलियों की कला का विकास भी हुआ। नाट्यकला का उद्‌गम इन्हीं के रंगमंच से हुआ ऐसा भी कहते हैं। इन कठपुतली-नाट्य के लिए संहिता लगती है, नृत्य-गान, संवाद प्रेषण, नैपथ्य, वेशभूषा, रंगभूषा, दिग्दर्शन इन सब नाट्यांगों का ज्ञान कठपुतली कलाकारों को होना आवश्यक है। अन्य सभी कलाकारों के समान राजा की स्तुती, उसके मनोरंजन के साथ ही ईशस्तुती और रामायण-महाभारत इन महाकाव्यों के प्रसंग इस कला के माध्यम से प्रस्तुत किए जाते हैं।

मूलतः कठपुतली का खेल दिखानेवाली विशिष्ट जमातें होती थी और उनके पास इन कलाओं को संजोए रखने की विरासत होती थी जो पीढ़ि दर पीढ़ि आगे बढ़ती रहती थी। उनके पास इस कला का उत्तराधिकार पीढ़ि दर पी़ढि सुरक्षित रहता था जो आगे की पीढ़ि को हस्तांतरित होता रहता था। उन्हें कठपुतलियां बनाना, उनके कपडे, पट-नैपथ्य-मंच व्यवस्था-रंगभूषा-केशभूषा-प्रस्तुती आदि कला कोशल और हुनर का काम तो होता ही था सिवाय इसके साथ संगीत, गायन, वादन, नृत्य, संवाद अदायगी, नाद-लय-स्वर, संभाषण कला, संवादों का उच्चारण, देहबोली, स्वर नियंत्रण आदि का ज्ञान भी आवश्यक होता था। इन नाटकों के कथानक भी परंपरागत पुराण कथाओं पर आधारित रहते थे। इस कारण एक जमात के लोग या परिवार के सदस्य मिलकर इन उपर्युक्त कला प्रकारों को उपयोग में लाकर प्रयोग करते रहते थे। भिन्न-भिन्न प्रदेशों की भाषा और उन प्रदेशों की कथाओं के अनुसार उनकी संहिता बनी रहती थी। वैसे ही कई स्थानों पर देवताओं और दानवों की कठपुतलियों के लिए कौनसे रंग और वस्त्र उपयोग में लाना तय रहता था। चमडा उपयोग में लाना हो तो कौनसे प्राणी का यह भी तय रहता था और उसीके अनुसार कठपुतलियां बनाई जाती थी।

भारत के राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडू, ओरिसा, बंगाल, हिमाचल प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों में यह परंपरा दिख पडती है। राजस्थान की कठपुतलियों की जानकारी तो यहां के लगभग सभी लोगों को है की कठपुतलियां लकडी की होती हैं। इनके संबंध में कथा है कि, सादी लकडी की कठपुतलियां बनाकर निर्वाह करनेवाला एक व्यक्ति था। हमेशा की तरह शंकर-पार्वती रात्री भ्रमण पर निकले थे तभी पार्वती की दृष्टि इन कठपुतलियों पर पडी और हमेशा की तरह उन्होंने हठ पकडा कि, 'हे कैलाशनाथ इन कठपुतलियों में प्रवेश कर अपन नृत्य करें"। और दुकान के अंदर की दो कठपुतलियां अचानक नाचने लगीं। दुकानदार जाग गया एवं भयभीत होकर ईश्वर की प्रार्थना करने लगा। नृत्य समाप्ति के पश्चात शंकर-पार्वती उसे दर्शन दे आशीर्वाद देते हुए बोले, 'वत्स, इन कठपुतलियों को  डोरियां बांध उनकी हलचलों के माध्यम से जिस प्रकार हमने नृत्य किया उसी तरह से तू लोगों को दिखला। तेरी कला अजराअमर हो जाएगी" और तभी से इस कला का जन्म हुआ।

राजस्थान में तो इस कला को दिखलानेवालों का एक समाज ही है और एक गांव का तो नाम ही 'कठपुतली" है। इन कठपुतलियों की विशिष्टता यह है कि, इनकी डोरियां कलाकारों के हाथों की उंगलियों से जुडी रहती हैं और कलाकार की उंगलियों की हरकतों पर ही उनके नृत्यों की विविधता अवलंबित रहती है। इन पुतलियों की एक और विशिष्टता यह है कि, इन्हें पांव नहीं होते। इनके कपडे इस प्रकार से बने होते है कि इस कारण उनके पांव हैं ऐसा लगे। केवल उंट या घुडसवार कठपुतलियों के ही पांव होते हैं।
यूरोप में इस प्रकार की डोरियोंवाली कठपुतलियों को 'मॅरिओनट्‌स" कहा जाता है। उनके हाथ-पांव और अन्य जोड मानवी जोडों के समान ही रखकर हरएक जोड की हलचल के लिए एक डोर अलग से होती है और इन सभी डोरों का दूसरा सिरा कलाकार के हाथ एक या अधिक लकडी पट्टियों से जुडा होता है विशिष्ट डोर खिंची की तयशुदा हलचल दिखती है। केवल कौनसी डोर किस हलचल के लिए है यह ज्ञात होना चाहिए। राजस्थानी कठपुतलियों की तुलना में इनको नचाना आसान होता है। 

कठपुतलियों का एक बिल्कूल ही भिन्न प्रकार छाया कठपुतलियां महाराष्ट्र की सावंतवाडी के निकट पिंगळी(ली) नामक स्थान पर देखने को मिलता है। जो चित्रकथी नाम से अधिक जाना जाता है। वैसे ही यहां उपयोग में लाई जानेवाली छोटी कठपुतलियां भी आंध्र, कर्नाटक की छाया कठपुलियों से समानता दर्शाती हैं। इन कठपुतलियों के कपडों की बनावट, डिजाईन आदि पर मुगल शैली का प्रभाव दिख पडता है। परंतु, इनके राजाओं और देवताओं के मुकुट भर पैठण शैली के चित्रों में नजर आते हैं उस प्रकार के हैं।

कर्नाटक में कठपुतलियों को 'सिक्की" कहते हैं। कर्नाटक के ये खेल जोशपूर्ण और जीवनस्पर्शी होते हैं। इनके भी विषय अधिकतर रामायण-महाभारत के ही होते हैं। आंध्र की कठपुतलियों को 'तोलू कम्मलय" कहते हैं। आंध्र की कठपुतलियां अन्य राज्यों की तुलना में बहुत बडी होती हैं। इनके भी कपडों और जवाहारातों पर मुगल शैली का प्रभाव दिख पडता है। केरल में कठपुतलियों को 'पवई कथू" कहते हैं। केरल और तमिलनाडू इन दोनो ही स्थानों पर मुगल शैली का ही प्रभाव दिख पडता है। ओरिसा और बिहार में इन्हें 'रावण छाया" कहते हैं। पश्चिम बंगाल की कुछ कठपुतलियां भी प्रसिद्ध हैं।

चित्र, शिल्प, नृत्य, संगीत आदि कलाओं में जिस प्रकार से अपने-अपने प्रदेशानुरुप विविधता होती है वैसीही परंपरागत कठपुतलियों  की कला में भी दिख पडती है। अपने ही उत्तराधिकारी को कला सीखाने की गुरु-शिष्य परंपरा इन कलाकारों ने बनाए रखी और इसी कारण से इन कलाकारों की संख्या हमेशा कम ही रही। मेलों, उत्सवों में डेरों में घूमनेवाले घूमंतू जमातों तक ही यह कला मर्यादित रहने के कारण अन्य कलाओं के समान इस कला को सम्मानीय स्थान नहीं मिल पाया। परिणामतः जैसा चाहिए वैसा इस कला का विकास हो नहीं पाया और इस कला का विकास रुक गया। जब अन्यत्र इस कला का मुक्त उपयोग हो रहा है वहीं इस कला के उत्तराधिकारी इस कला से विमुख हो अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर हो रहे हैं, इस कला को सीखने के प्रति उत्सुक भी नहीं।  

Tuesday, 13 February 2018

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य - शिरीष सप्रे

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य
शिरीष सप्रे
शिवजी की उपासना पूरे भारत में अनादिकाल से चली आ रही है। भगवान शिव शंकर की हर बात निराली और रहस्यमय है। उनका सारा क्रियाकलाप विरोधाभासों से भरा हुआ है। शिव की नगरी काशी में तो शिव का प्रतीक शव को मानकर लोग सिर पर हाथ रखकर प्रणाम करते हैं। शिवजी की उपासना दो प्रकार से करते हैं। शिवलिंग और शिवमूर्ति के रुप में। अधिकांश मंदिरों में शिवलिंग के रुप में ही पूजा होती है।

शिवजी के हाथ में डमरु विश्व प्रतीक के रुप में है और ऐसा माना जाता है कि नाद की उत्पत्ति शिवजी द्वारा डमरु बजाने से हुई है। डमरु विश्व का अद्वैत भाव भी दर्शाता है। डमरु ज्ञान का उत्पत्ति स्थान है। महर्षि पाणिनी को  व्याकरण के बीज मंत्र डमरु के ध्वनि में ही मिले थे। कहते हैं स्वयं शिवजी ने उनके कान के पास डमरु बजाकर यह ज्ञान उन्हें दिया था। त्रिशूल का आयुध शस्त्र होकर उसके अनेक प्रतीकात्मक अर्थ हैं। वह चेतना की तीन स्थितियों जागृत, स्वप्न और निद्रावस्था को दर्शाता है। वह मानव के तीन तापों आधिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक को हरता है। एक शस्त्र के रुप में अभद्र, अमंगल और बुरी बातों को नष्ट करने की क्षमता का प्रतीक है। 

शिवजी का वाहन वृषभ यानी बैल है जो हमेशा शिवजी के साथ ही रहता है। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति में लिखा है 'वृषो हि भगवान धर्मः।" वेद धर्म को चार पैरोंवाला प्राणी कहते हैं। उसके चार पैर यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं और शिव इसी वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो उनके अधीन हैं। (इन्हें ही चार पुरुषार्थ भी कहा गया है, हिंदू धर्मानुसार पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है अर्थात हमारा ध्येय शिव की प्राप्ति होना चाहिए।)

अथर्ववेद में वृषभ को पृथ्वी का धारक, पोषक, उत्पादक बतलाया गया है। वृषभ एक राशि का नाम भी है। वृषभ किसानों और कृषि के लिए भी उपयोगी है। वृष का अर्थ मेघ भी है। वृष से ही वर्षा, वृष्टि आदि शब्द बने हैं। शिव अंतरिक्ष के देवता हैं और उनका एक नाम व्योमकेश भी है। अतः आकाश उनकी जटा स्वरुप है एवं जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं तथा वायु आकाश में व्याप्त रहती है। शिव जटाभार ब्रह्मांड के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रतीक है। शिवजी जटाधारी हैं और इस बारे में पुराणों में अनेक कथाएं है। गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्र स्वरुप उग्र और संहार के देवता हैं और उनकी उग्रता उनके मस्तिष्क में निवास करती है इसलिए शांति की प्रतीक गंगा और अर्धचंद्र शिव के मस्तिष्क पर विराजमान होकर उनकी उग्र वृत्ति को शांत और शीतल रखते हैं।

समुद्र मंथन के समय प्राप्त हलाहल विष का पान कर सृष्टि को बचाने के कारण उत्पन्न जलन को गंगा और चंद्रमा से शांति मिलती है। शिव का चंद्रमा स्वच्छ एवं उज्जवल है उसमें मलिनता नहीं। वह अमृत वर्षा करता है। क्योंकि, स्वयं शिव का विवेक सदैव जागृत रहता है और मस्तिष्क में कभी अविवेकी विचार नहीं पनपते। चंद्रमा का एक नाम सोम है जो शांति का प्रतीक है इसी कारण से सोमवार को शिव पूजन, दर्शन और शिवोपासना का दिन माना गया है। शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ है। चंद्रमा ने अपने शाप के निवारणार्थ शिवोपासना शिवलिंग स्थापित कर की और शापमुक्त हुआ। इसलिए इस शिवलिंग को सोमनाथ कहते हैं। त्रिनेत्रधारी शिवजी का एक निवास त्र्यंबकेश्वर है। त्र्यंबक (तीन नेत्र) धारी ईश्वर यहां है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को त्र्यंबकेश्वर महादेव कहते हैं। इस तीसरे नेत्र से ही शिवजी ने कामदेव का दहन किया था।

तमोगुणी सर्प या नाग को उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है। नागेश्वर एक ज्योतिर्लिंग का नाम भी है। हलाहल विष के पान से जिसे उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है उन्हें नीलकंठ भी कहते हैं। भारत में नागपंचमी को नागपूजन की परंपरा है। विद्वानों के मतानुसार नागपूजन आर्येत्तर संस्कृति को दर्शाता है। परस्पर विरोधी मतों में सामंजस्य निर्मित करनेवाले शिवजी ने इस भयंकर क्रूर सर्प को अपने गले का हार बना रखा है। यह गले में लपेटा हुआ सर्प या नाग कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। 

शिवजी के गले में मुंड माला भी है जो यह भाव दर्शाती है कि उन्होंने मृत्यु को गले लगा रखा है और वे मृत्यु से भयभीत नहीं। शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनो को अपने अधीन कर रखा है इसके प्रतीक स्वरुप वे व्याघ्र चर्म और हस्ती चर्म को धारण करते हैं। इस प्रकार के देवता शिवजी की उपासना सगुण और निर्गुण दोनो रुपों में की जाती है।