Friday, 22 September 2017

नवरात्र पूजन

नवरात्र पूजन
शिरीष सप्रे

नवरात्र सृजन उत्सव सीखाता है। वर्षा ऋतु समाप्ति की ओर होती है। सृष्टि हरे रंग की अनेक छटाओं के दर्शन हमें कराती है। सारा वातावरण प्रसन्नता से भरा होता है ऐसे वातावरण में घटस्थापना होती है। बडे नगरों में अनेक स्थानों पर गरबा भी खेला जाता है। नवरात्र पूजन आदि शक्ति महामाया जगदम्बा की पूजा आराधना के लिए किया जाता है। नवरात्र शब्द में नव का अर्थ नौ की संख्या है। नवरात्र इन नवनामों के लिए विशेष रुप से प्रसिद्ध है- प्रथमंं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघंटेति कुष्मांडेति चतुर्थकम्‌।। पंचम स्कंदमातेति, षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।। संसार की सभी स्त्रिया दुर्गारुप है, परंतु कन्या अवस्था में उनमें भगवती निवास करती है। अतः नवरात्री में कुमारी पूजन का विधान है।

देवी पूजन का अर्थ है - शक्ति की पूजा करना। हमारे पूर्वज सदा से शक्ति के उपासक रहे हैं। सिंहवाहिनी महिषासुर मर्दिनी की रणचंडी के रुप में पूजा सर्वत्र होती रही है। युद्ध क्षेत्र में जाने के पूर्व अधिकांश राजा शक्ति की पूजा करके जाते थे। पौराणिक युग में देवी की उपासना ने धीरे-धीरे एक पृथक मत धारण कर लिया जिसे शाक्त मत कहा गया है। विष्णु और शिव के अलावा शक्ति की महिमा सर्वाधिक है। शाक्तों ने देवी के अनेक नाम रखे। शक्ति ही सृष्टि का सृजन एवं संचालन करती है, ईश्वर की उपासना में शक्ति की उपासना भी शामिल है। दुर्गा की 9 शक्तियां हैं - जया, विजया, भद्रा, भद्रकाली, सुमुखी, दुर्मखी, व्याघ्रमुखी, सिंहमुखी और दुर्गा। हिंदू शास्त्रों में मां दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। दुर्गा की उत्पत्ति धर्म की रक्षा करने एवं बुराई पर अच्छाई की विजय के लिए हुई है। शक्ति के विभिन्न रुपों के आधार पर उनकी उपासना श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। दुर्गा सप्तशती में जगतजननी भगवती मां दुर्गाजी के 108 नामों का उल्लेख किया गया है।

भगवान राम के हाथों रावण का वध हो इस उद्देश्य से देवर्षि नारद ने श्रीराम को नवरात्र व्रत रखने के लिए कहा था। भगवान राम ने वह किया अष्टमी की मध्यरात्री में देवी ने भगवान राम को दर्शन देकर 'तुम्हारे हाथों रावण का वध होगा" का आशीर्वाद दिया था। बाद में राम ने वह व्रत पूर्ण कर दशमी के दिन लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान किया और रावण का वध किया और तभी से असत्य, अधर्म पर सत्य और धर्म की जय का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा।

संस्कृतिकोश में नवरात्र की जानकारी दी गई है। कोश में दुर्गापूजा के विषय में जानकारी इस प्रकार से दी गई है - आश्विन शुद्ध प्रतिपदा से नवमीनौदिनों तक दुर्गा नवरात्र मानी जाती है। नवरात्र में नित्य दुर्गा पूजा करना होती है। उसकी विधि इस प्रकार से है - गृहस्थ प्रातः जल में सफेद तिल डालकर उस जल से स्नान करे। फिर सपत्नीक बैठकर देशकालोच्चपूर्वक पूजा का संकल्प करे। तत्पश्चात गणपति पूजन, स्वस्तिवाचन आदि कर मिट्टी की वेदी पर एक कलश की स्थापना करे। उसके आसपास वेदी पर अनाज के बीजों की बुआई कर दें। कलश पर पूर्णपात्र में दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर दें। उसके पश्चात षोडषोपचार पूजा करें .... देवी दूर्गा के पास अखंड दीप जलता रखें। फिर दुर्गास्त्रोत का पाठ करें। देवी दुर्गा पर ़फूलों की माला बांधें। अनेक स्थानों पर दुर्गोत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव भाद्रपद कृष्ण नवमी से आश्विन शुद्ध नवमी तक मनाएं, सप्तमी से तीन दिन मनाएं, अष्टमी से दो दिन अथवा नवमी को एक दिन तो भी मनाएं, इस प्रकार के विकल्प कालिका पुराण में बतलाए गए हैं।

बंगाल, बिहार, ओरिसा, असम, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में दुर्गोत्सव बडे पैमाने पर मनाया जाता है। इनमें से बंगाल में इसका प्रचार और लोकप्रियता विशिष्ट है। बंगाली लोगों का तो यह वर्ष का प्रमुख त्यौहार ही है। इस उत्सव के लिए दुर्गा की मिट्टी की दशभुजा मूर्ति बनाई जाती है। उसका रुप महिषासुरमर्दिनी का होता है। उसके अगल-बगल कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियां होती हैं। बंगाल में सर्वत्र व्यक्तिगत और सार्वजनिक ऐसी दोनो स्वरुप में देवी दुर्गा की मूर्तियों की स्थापना की जाती है।

कालिका पुराण के अनुसार महिषासुर ने इंद्र सहित सभी देवताओं को जीतकर स्वर्ग से निकाल बाहर किया था। महिषासुर से पीडित देवताओं ने ब्रह्माजी के साथ विष्णु और शिवजी को अपनी विपदा सुनाई। महिषासुर के अन्याय-अत्याचार से मुक्ति के लिए उन तीनों के तेज से आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को जगदम्बा मां दुर्गा प्रकट हुई। कात्यायन ऋषि ने सबसे पहले उनकी पूजा की इसलिए उन्हें कात्यायिनी भी कहा जाता है। जगदम्बा ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों को कात्यायन ऋषि द्वारा की गई पूजा-अर्चना को स्वीकारा और दशमी को उन्होंने चिक्षुर-चामर आदि पंद्रह सेनानियों सहित महिषासुर का वध किया और अन्तर्धान हो गई। बंगाल में इस नवरात्री में महिष (भैंसे) की बलि की परंपरा है। शाक्त परंपरा में जीव बलि दी जाती है। जबकि वैष्णव सम्प्रदायवाले नारियल की बलि को ही उत्तम मानते हैं।


देवी भागवत में यह प्रमाण मिलता है कि, भारत में सबसे पहले सुयज्ञ नामक राजा ने दुर्गा पूजा प्रारंभ की। जबकि मार्कंडेय पुराण के अनुसार सुरथ नामक राजा और समाधि नामक वैश्य ने। नारदजी द्वारा श्रीराम को नवरात्र में मां जगदम्बा की पूजा के बारे में पहले ही बतलाया जा चुका है। नवरात्र में मां जगदम्बा की महापूजा से मनुष् को असीम कृपा प्राप्त होती है।

Friday, 15 September 2017

बहुगुणी-बहुउपयोगी फिटकरी की खोज का इतिहास
शिरीष सप्रे

फिटकरी के संबंध में मानव को लगभग तीन से चार हजार वर्ष पूर्व से जानकारी है। भारतीयों को प्राचीनकाल से ज्ञात था कि फिटकरी का उपयोग वस्त्रों पर रंग पक्का बैठाने के लिए किया जाता है। वराहमिहीर ने अपने लेखन में फिटकरी का उपयोग रंगबधक के रुप में किए जाने का उल्लेख किया हुआ है। संस्कृत में फिटकरी के आलकी, काक्षी, तुवरिका, सुराष्ट्रज आदि नाम हैं। भारत में पहले फिटकरी चीन से आयात की जाती थी। वैसे ही सौराष्ट्र में भी तैयार की जाती थी। फिटकरी को तैयार करने का पूर्वइतिहास तो ज्ञात नहीं है। परंतु, एक रोमन विद्वान प्लिनी ने 'अल्यूमेन" (यह लेटिन शब्द है) अर्थात्‌ फिटकरी का उल्लेख अनेक लवणों का मिश्रण के रुप में अपने एक ग्रंथ (ई. स. 23-79) में कर रखा है।

फिटकरी की खोज की इतिहास में कई कथाएं सुनाई पडती हैं। एक कथा के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में उपयोग में लाई जानेवाली फिटकरी का अधिकांश भाग कुस्तुनतुनिया के आसपास की भूमि से निकाला जाता था। वहां पर इसकी बहुतसी खदानें थी। जब वहां तुर्कों ने अधिकार कर लिया तो उन्होंने बडी होशियारी से फिटकरी की सारी खदानों पर अधिकार जमा लिया और सारी दुनिया  में फिटकरी के निर्माता बन बैठे। इसके पूर्व वहां इटलीवासी जॉन डी कैस्ट्रो जो कपडों और रंगाई के साजो सामान का व्यापारी था उसे अपने व्यवसाय के सिलसिले में फिटकरी के बारे में कुछ ज्ञान हो गया था। परंतु, तुर्कों के कब्जे के बाद वह वहां से भागकर इटली लौट आया। इसीको इटली में फिटकरी का व्यवसाय आरंभ करने का श्रेय जाता है। इस संबंध में जानकारी बडी रोचक है -

एक बार जब वह टोल्फा शहर के निकट की पहाडियों पर घूम रहा था तभी उसकी दृष्टि वहां पर उगी उसी प्रकार की घास पर पडी जैसीकि उसने कुस्तुनतुनिया की फिटकरी की खदानोंवाले क्षेत्र में देखी थी। जिज्ञासावश उसने कुछ पत्थर उठाए और एक टुकडा मुंह में रख लिया, उसे उसका स्वाद वैसा ही लगा जैसाकि वहां के पत्थरों का था। उसने उनको गौर से देखा और उसके ध्यान में आ गया कि वास्तव में उसने फिटकरी की खदान ढूंढ़ निकाली है। वह अपनी खोज की जानकारी देने के लिए पोप के दरबार में पहुंचा। उसने निवेदन किया कि, हमें तुर्कों को फिटकरी के बदले नियमित रुप से सोना देना पडता है। परंतु, अब उन्हें यह देने की आवश्यकता नहीं होगी। क्योंकि, मैंने उन पहाडियों का पता लगा लिया है जहां इतनी फिटकरी है कि हम स्वयं ही सारी दुनिया को उसकी पूर्ति कर सकते हैं। वहां पानी भी प्रचुर भी मात्रा में है। निकट ही बंदरगाह भी है। जहां से जहाजों पर माल लादा जा सकेगा। यह खनिज हमें पर्याप्त मात्रा में धन भी दिलवा देगा और जो तुर्कों के विरुद्ध युद्ध में काम भी आएगा।

पोप ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया फिर भी कैस्ट्रो ने हार न मानी और वह निरंतर पोप से कहता रहा और अपनी बात पर डटा रहा। अंततः बडी ही अन्यमनस्कता से पोप ने उसकी बात मान ली। पोप ने कुछ ऐसे होशियार लोगों को उसके साथ निरीक्षण के लिए भेजा जो कभी कुस्तुनतुनिया की खदानों में काम कर चूके थे। खोजी दल ने पाया कि यह भूमि ठीक वैसीही है जैसीकि एशिया के उन पहाडियों की है जहां फिटकरी प्राप्त होती है। परमात्मा की दयालुता का गुणगान करने के पश्चात उन्होंने पत्थरों से ऐसी फिटकरी बनाई जो एशिया में प्राप्त फिटकरी से उच्च दर्जे की थी। सारी जानकारी मिलने के बाद पोप ने जरा भी देर ना की और फिटकरी निर्माण का कारखाना आरंभ कर दिया।

शीघ्र ही पोप को इस व्यवसाय से अच्छा खासा धन मिलने लगा। उसने गर्वपूर्वक यह घोषणा करवा दी कि इस उद्योग से प्राप्त धन  तुर्कों के खिलाफ युद्ध में किया जाएगा। इस घोषणा के पश्चात उसने फिटकरी निर्माण का स्वामित्व अपने कब्जे में ले लिया और घोषित कर दिया कि यदि कोई अन्य व्यक्ति फिटकरी बनाने का काम करेगा तो वह अपराधी माना जाकर दंड का भागी होगा। उसने तुर्कों से फिटकरी खरीदना भी अपराध घोषित कर दिया। इन घोषणाओं का उल्लंघन करनेवाले को चर्च के नियमों के मुताबिक बहिष्कृत कर दिया जाएगा। कैथोलिक पंथियों को तो इस विधान का भय था परंतु, प्रोटेस्टंटों ने परवाह नहीं की। एक कहानी बतलाती है कि, एक प्रकृति विज्ञानी अंग्रेज प्रोटेस्टंट सर थामस कैलोनर ने इस आदेश की परवाह नहीं कि और अपने यहां उसने फिटकरी निर्माण के लिए एक सयंत्र स्थापित कर लिया। उसकी कथा भी कुछ-कुछ ऊपर वर्णित कैस्ट्रो की कथा से मिलती-जुलती सी ही है।

गायसबरों (यार्कशायर) के आसपास टहलते हुए एक दिन पेडों की पत्तियों को देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि ये हरी पत्तियां कुछ असाधारण सी कांति लिए हुए थी। उसने ध्यान से देखा तो पाया कि, बलूत के पेड की जडें बडी चौडी थी और जमीन में काफी नीचे तक धंसी हुई थी। उन मजबूत जडों में रस भी था। आसपास की जमीन पर सफेद चिकनी मिट्टी जमकर भी कडी नहीं हुई थी और स्वच्छ रातों में यह शीशे की तरह चमकती प्रतीत होती थी।

तत्काल कैलोनर को याद हो आया कि, इटली के फिटकरी बहुल इलाके की जमीनें भी कुछ इसी प्रकार की थी। उसे संदेह हुआ कि कहीं यहां फिटकरी की खदाने तो मौजूद नहीं है। परीक्षण करने के पश्चात उसके ध्यान में आ गया कि, यहां की जमीन में फिटकरी के पत्थर मौजूद हैं। उसकी प्रसन्नता की सीमा ना रही उसने निश्चय कर लिया कि, वह यहां फिटकरी निर्माणशाला स्थापित करेगा। परंतु, समस्या यह थी कि, उसे फिटकरी निर्माण की तकनीकी जानकारी पूर्णतः नहीं थी। फिटकरी निर्माण की तकनीक प्राप्त करने के लिए यह जानते हुए भी कि पोप द्वारा स्थापित कारखानों की कडी घेराबंदी रहती है बिना पकडे जाने के डर के इटली जा पहुंचा।


वहां उसने दो तीन कारीगरों को उचित मूल्य चूकाने का वादा कर इंग्लैंड चलने के लिए राजी कर लिया। इन आदमियों को बडे-बडे बैरलों मेें छिपाकर बैठा दिया गया और बंदरगाह पर 'टू इंग्लैंड" का लेबल चस्पाकर जहाज में लाद दिया गया। इस तरह खतरा और जान की बाजी लगाकर कुशल कारीगर गायसबरों पहुंच गए। इन कारीगरों की सहायता से कैलोनर ने फिटकरी बनाने का कारखाना स्थापित कर लिया। स्थानीय लोगों को भी फिटकरी निर्माण की तकनीक सीखाई गई। जब यह समाचार पोप को पता चला तो क्रोधित हो उसने उन लोगों को शाप दिए और भला वह इससे अधिक कर भी क्या सकता था। कैलोनर का व्यवसाय चल पडा। राज्य की ओर से एकाधिकार भी प्राप्त हो गया। परंतु, अनहोनी को भला कौन टाल सकता है। जब राजा चार्ल्स को धन की आवश्यकता महसूस हुई तो उसने फिटकरी की खदानों पर अपना कब्जा जमा लिया। कैलोनर क्रोधित तो बहुत हुआ परंतु, कर ही क्या सकता था इसलिए चुप्पी साधकर बैठ गया।

Saturday, 2 September 2017

संत शिरोमणि नामदेव

संत शिरोमणि नामदेव
शिरीष सप्रे

ज्ञानदेव यानी संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव यह समकालीन संत होकर उनके कार्य परस्पर संबधित होकर पूरक भी थे। नामदेव की  भगवान विट्ठल के प्रति भक्ति देखकर ज्ञानदेव स्तिमित थे, तो ज्ञानेश्वर के ज्ञान के तेज से नामदेव चकित थे। परस्पर का प्रेम चारधाम की यात्रा के निमित्त वृद्धिंगत हो गया था। उत्तर भारत के तीर्थक्षेत्रों के दर्शन के पश्चात ज्ञानेश्वरादि अपने बंधुओं के साथ नामदेव महाराज पंढ़रपूर लौटने के तत्काल बाद ही ज्ञानेश्वर ने अपना अवतार कार्य समाप्त करने का निश्चय कर लिया। अपना जीवित कार्य समाप्त हो गया है इसका भान ज्ञानदेव को हो गया था और संजीवन समाधि लेने का निश्चय उन्होंने कर लिया। नामदेव के वर्णनानुसार ज्ञानेश्वर ने जीवन का प्रत्येक क्षण जगत्‌उद्धार के लिए खर्च किया। ज्ञान का भंडार ज्ञानेश्वरी के रुप में जनता को समर्पित किया। कार्तिक वद्यत्रयोदशी शक 1218 को असंख्य संतों और वारकरियों की उपस्थिति में ज्ञानेश्वर ने संजीवन समाधि ले ली। इस समय उनके बंधुओं समवेत नामदेव भी उपस्थित थे। इन्हीं के साथ अन्य संत मंडली के रुप में विसोबा खेचर, चांगदेव, चोखामेला, परिसा भागवत, सावता माली, नरहरि सोनार जैसे अनेक समकालीन संत भी इस समाधि उत्सव में उपस्थित थे।

नामदेवराय ज्ञानदेव की संगत के स्नेहल भक्त थे इसीलिए नामदेव ने स्वयं की आंखों से देखकर समाधि उत्सव का वर्णन जिन 250 अभंगों में किया है वही समाधि उत्सव के प्रसंग का मुख्य आधार है। ज्ञानेश्वर के प्रति नामदेव के मन में विलक्षण श्रद्धा की भावना थी इस कारण अपने इस महान संत मित्र के वियोग से नामदेव दुखी हो गए थे। एक भजन में वे कहते हैं - सूर्य के अस्त होने के पश्चात सब ओर अंधकार फैल जाता है। ज्ञानेश्वर द्वारा समाधि लेने के पश्चात मेरे सामने अंधकार फैल गया है। अब मार्ग दिखलाने का कार्य कौन करेगा? ज्ञानदेव आनंद का सागर, उसमें मैं मछली के समान निश्ंिचत था, परंतु ज्ञानेश्वर ने समाधि ले ली और यह सुख का सागर गायब हो गया है। पानी से निकली मछली जिस प्रकार पानी के बिना छटपटाती है वैसी ही अवस्था मेरी हो गई है। ज्ञानेश्वर के वियोग के कारण मेरा मन छटपटा रहा है।

ज्ञानेश्वर की समाधि के पश्चात आए हुए विदेशी आक्रमण के समय देवताओं, धर्म और देश के प्रति गर्व की भावना जगाकर हिंदूधर्म की अस्मिता टिकाए रखने का अलौकिक और महान कार्य संत नामदेव ने किया। नामदेव की गणना संत पंचायतन में की जाती है। संत पंचायतन में उन्हें ज्ञानदेव, एकनाथ, रामदास और तुकाराम के साथ परिगणित किया गया है। संत तुकाराम ने उन्हें अपना आध्यात्मिक आदर्श माना है। नामदेव की महिमा का बखान इस प्रकार किया जा सकता है कि, भागवत धर्म का आधार ज्ञानदेव ने रचा तो, उस धर्म का विस्तार नामदेव ने किया। ऐसे भयाकुल और कठिन कालखंड में जब विदेशी आक्रमकों के भयंकर हमलों से भारत खिलखिला हो रहा था, समाज अपनी सामाजिकता खो बैठा था। जातिभेद से निर्मित अमानवीयता पराकाष्ठा पर पहुंच चूकी थी तो, दूसरी ओर हिंदूधर्म के स्वघोषित धर्मरक्षक वर्ग धर्मरक्षा के नाम पर कर्मकांड का खुला पुरस्कार कर रहे थे। इस कारण समाज में अंधश्रद्धा चरम पर थी, सामान्य जनता की मति कुंठित हो गई थी। राजनैतिक अस्थिरता और निर्बलता के कारण उद्‌भुत आर्थिक संकट के गर्त में देश जा रहा था तब मराठी संतों ने कार्य कर भारत का एक प्रकार से पुनरुत्थान किया। भागवत धर्म के आंदोलन के माध्यम से किए हुए ऐतिहासिक कार्य में नामदेव का नाम अग्रणी है, सुवर्णाक्षरों से लिखा हुआ है। देवगिरी के यादव साम्राज्य के अंत के पश्चात भारत के सभी संतों ने नामदेव के कार्य का उत्तराधिकार आगे चलाया है।

गुजरात, राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश जैसे महत्वपूर्ण प्रदेशों में 'बीठल बिनु संसार नहीं।" इस प्रकार का विट्ठल राग अलापते भागवत धर्म का बीजारोपण किया। इस बीज के आधार से ही गुजरात में नरसी मेहता, राजस्थान में मीराबाई, पंजाब में गुरु नानक, उत्तरप्रदेश में कबीर, मलूकदास ने उसकी परवरिश, सेवा की, पल्लवित किया, बहार पर लाए। उनके कार्य का अनन्य साधारणत्व इस पर से ध्यान में आता है कि उनके मंदिर इन प्रदेशों में मिलते हैं। अनेक प्रदेशों के कार्यों में से उनका पंजाब में का कार्य सर्वाधिक वैशिष्ट्‌य पूर्ण है। वहां के लगभग 18 वर्षों के निवास में भागवत धर्म के आध्यात्मिक और नैतिक जीवन के विचारप्रणाली का प्रसार किया। समाज के जातिभेदों को छोड देने का उपदेश दिया।


नामदेव कहते हैं ः हरि नांव जाती, हरि नांव पाती। का करौ जाती, का करौ पाती।। उनकी इस सीख से ही उनको माननेवाला एक बडा वर्ग तैयार हुआ। इस पद पर से पता चलता है कि भक्तिसंप्रदाय की सीख लोगों के मनमस्तिष्क में उतारने के लिए उन्होंने हिंदीभाषा जानबूझकर सीखी थी। उनके हिंदी पदों को तत्कालीन समाज में मान्यता मिली इतनी कि आगे चलकर पंजाब में बने सिक्ख धर्म के गुरुग्रंथ साहिब में उनको स्थान मिला। नामदेव के हिंदी पदों की विशिष्टता यह है कि वे गेय स्वरुप में हैं। नामदेव का समग्र जीवन भक्ति से ओतप्रोत था। नामदेव ने नाम साधना को बडा महत्व दिया था। उस जमाने में जब आज के समान यातायात के साधन उपलब्ध नहीं थे उस समय उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में प्रवास कर भागवत धर्म की पताका पूरे हिंदुस्थान में फहराई। उस काल में आवश्यकता थी राष्ट्रीय एकता की, समाज के मानसिक धैर्य को बढ़ाने की इसी में से भारतीय संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन हुआ। नामदेव के इन्हीं कार्यों के कारण वे संत शिरोमणि कहलाए। 

Sunday, 27 August 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 2 - मंगल का प्रतीक स्वस्तिक

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 2 - 
मंगल का प्रतीक स्वस्तिक
शिरीष सप्रे

भारतीय दर्शन की तत्त्वता, विस्तृत चिंतन, कल्पना, संपूर्ण विश्व का सार, भारतीय संस्कृति की झलक उसके विभिन्न धर्मों में समान रुप से प्रयुक्त होनेवाले प्रतीक चिन्हों में निहित है। जिनकी रचना हमारे मंत्रसृष्टा ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों और भावों को व्यक्त करने के लिए की। परंतु, इनका भाव समझने के स्थान पर हमने उन्हें केवल कर्मकांड तक ही सीमित करके रख दिया फलस्वरुप मूल्यहीनता उत्पन्न हो गई है। जिन प्रतीक चिन्हों को अल्पाधिक रुप में संपूर्ण विश्व के धर्मों में स्थान मिला हुआ है, जो मनुष्य को जीवन की सर्वोत्कृष्टता की ओर प्रेरित करते हैं, उनके मर्म को हमने भूला दिया है। इसलिए हमारे सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में प्रयुक्त होनेवाले मंगलकारी स्वस्तिक का भावार्थ यहां प्रस्तुत है।

स्वस्तिक शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। 'स्वस्तिक" शब्द 'सु, अस, क" से बना है। 'सु" का अर्थ 'अच्छा", 'अस" यानी 'सत्ता" या 'अस्तित्व" और 'क" का अर्थ 'कर्ता" या करनेवाला। इस प्रकार 'स्वस्तिक" का अर्थ हुआ 'अच्छा" या 'मंगल" करनेवाला। यही स्वस्तिक की भावना है। 'अमरकोश" में भी 'स्वस्तिक" का अर्थ 'आशीर्वाद", मंगल या पुण्य करनेवाला लिखा है। 'अमरकोश" के शब्द हैं- 'स्वस्तिक सर्वतोऋद्ध" अर्थात्‌ 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो"। इस प्रकार 'स्वस्तिक शब्द में किसी व्यक्ति विशेष का नहीं अपितु सम्पूर्ण के कल्याण या 'वसुधैवकुटुम्बकम्‌" की भावना निहित है। 'स्वस्तिक" शब्द की निरुक्ति है - 'स्वस्तिक क्षेम कायति इति स्वस्तिकः" अर्थात्‌ कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही 'स्वस्तिक" है। स्वस्तिक में चार दिशाएं हैं, यानी स्वस्तिक का कार्य हुआ हर दिशा में व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देना।

स्वस्तिक का प्रारंभिक आकार एक खडी रेखा और उसके ऊपर दूसरी आडी रेखा के रुप में था। यह दो रेखाएं पुरुष और प्रकृति की प्रतीक हैं। इसमें खडी रेखा ज्योतिर्लिंग का प्रतीक है। वैदिक साहित्य में ज्योतिर्लिंग को विश्वोत्पत्ति का मूल कारण माना गया है। स्वस्तिक की खडी रेखा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है और आडी रेखा सृष्टि के विस्तार तथा विकास का द्योतक है। सृष्टि की रचना ईश्वर ने की और सभी देवताओं ने अपनी शक्ति देकर इसका विस्तार किया- यही स्वस्तिक का भाव है। स्वस्तिक का मध्य बिंदु विष्णु का नाभिकमल माना गया है और नाभिकमल से ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी का जन्म हुआ है। इसलिए स्वस्तिक को सृजन शक्ति का प्रतीक माना गया है। इसका आरंभिक आकार गणित के धन चिन्ह का है इसलिए स्वस्तिक जोड का, मिलन का प्रतीक है। धन चिंह की चारों भुजाओं के सिरों पर एक-एक रेखा जोडी दी जाए तो स्वस्तिक बन जाता है। 

स्वस्तिक महाप्रतीक है भारतीयता का, कर्मठता का, जागरुकता का। उसके पास तिरस्कार नहीं, ओछे लोगों के प्रति मात्र करुणा है। वह उनका संहार नहीं करता, वरन्‌ उनका सुधार करता है, जो अच्छे हैं वे आगे बढ़ें और बुरे हैं, वे सुधरें मगर वे भी आगे बढ़ें। इसीलिए स्वस्तिक जीवन, जागरण और कर्मयोग का महान संदेश वाहक है।

भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिन्ह को विष्णु, सूर्य, सृष्टि-चक्र तथा संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे गणेश का प्रतीक मानकर इसे भी गणेशजी के समान प्रथम वंदनीय माना है। पुराणों में इसे सुदर्शन चक्र का प्रतीक माना गया है। वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। यास्काचार्य ने इसे ब्रह्म ही का स्वरुप माना है। स्वस्तिक में बननेवाले चार समकोणो को चार देवताओं का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को हिंदुओं के चार वर्णों की एकता का प्रतीक मानते है। इन भुजाओं को ब्रह्मा के चार मुख, चार हाथ और वेदों के रुप में भी स्वीकार किया गया है। स्वस्तिक का धनात्मक चिन्ह अधिकता या सम्पन्नता का प्रतीक है। एक पारंपरिक मान्यता के अनुसार चतुर्मास में स्वस्तिक व्रत करने तथा मंदिर में अष्टदल से स्वस्तिक बनाकर उसका पूजन करने से महिलाओं में वैधव्य का भय नहीं रहता। पद्‌म पुराण में इससे संबंधित कथा भी है।  

अत्यंत प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल का प्रतीक मानकर कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ करने के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह को अंकित कर उसका पूजन किया जाता है। विद्वानों की धारणा है कि यह वेदों से भी प्राचीन है। स्वस्तिक में देवताओं की शक्ति और मनुष्य की शुभकामनाओं का सम्मिलित सामर्थ्य है। क्योंकि, वर्षा के मेघ, मेघों को गतिशील करनेवाली वायु, प्रकाश और उष्णता प्रदान करनेवाला सूर्य देवता, मनुष्य के शुभाशुभ कर्मों का ध्यान देनेवाले वरुण देवता, प्राणियों को धारण करनेवाली वसुंधरा पृथ्वी, सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा, पालनहार विष्णु, संहारक शिवजी, रिद्धी-सिद्धी के देवता गणेशजी सहित अनेक देवताओं की शक्ति का समावेश स्वस्तिक में है।

स्वस्तिक की आकृति आविष्कृत नहीं है। स्वस्तिक आकृति की उत्पत्ति 'ऊँ" प्रणव का ही एक रुप है, जो सर्वस्थ ब्रह्मांड में गूंजायमान है। अगर चार 'ऊॅँ" की आकृति को एक दूसरे की पीठ से जोड दिया जाए तो जो आकृति बनती है, वह स्वस्तिक की ही है। यह ऊँ का ही स्वरुप है, जो आज भी इस सृष्टि पर विद्यमान है। इस आकृति के निर्माण से दसों दिशा, नौ ग्रह, बारह राशि, तैंतीस करोड देवताओं का आवाहन बोध होता है। जैन, बौद्धधर्म के 24 तीर्थंकर, नवकार मंत्र का बोध कराता है। क्योंकि, स्वस्तिक की उत्पत्ति ऊँ से हुई है और हर भाषा में पहला अक्षर 'अ" विद्यमान है। सभी धर्मों में यह विद्यमान है। इसीलिए हर शुभ कार्य को करने के पूर्व स्वस्तिक की आकृति बनाई जाती है। इसे सर्वप्रथम इसलिए भी बनाया जाता है क्योंकि, इससे वास्तुदोष का निराकरण हो जाता है।

स्वस्तिक चिन्ह का प्रयोग मांगलिक कार्यों में वर्तमान में जितना व्यापक है उतना ही पहले भी था यह इतिहास सिद्ध है। सिंधुघाटी की सभ्यता में इसका उल्लेख पाया जाता है। उस समय पशुओं के शरीर पर यह चिन्ह अंकित किया जाता था। मोहनजोदडी की एक मुद्रा पर एक हाथी स्वस्तिक के आगे झुका हुआ दिखाया गया है। सिंधु घाटी से प्राप्त बर्तनों और मुद्राओं पर हमें स्वस्तिक की आकृतियां खुदी हुई मिली हैं जो इसकी प्राचीनता का ज्वलंत प्रमाण है। सिंधु 'पद्मपुराण" में वर्णित 16 चिन्हों में स्वस्तिक प्रमुख है। आज भी स्वस्तिक सनातनी हिंदु, जैन और बौद्ध धर्मों में समान रुप से अपनाया गया है। इसका प्रतीकार्थ भाव गहन है।

सनातनियों के समान ही जैन और बौद्धधर्म के अनुयायी भी स्वस्तिक को मंगलकारी, शांति और समृद्धि प्रदान करनेवाला प्रतीक चिन्ह मानते हैं। जैनधर्म में स्वीकृत चौबीस चिन्हों में स्वस्तिक एक प्रधान चिन्ह है। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रुप में स्वीकृत अष्ट मंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। स्वस्तिक चिन्ह की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल का प्रतीक माना जाता है। वे हैं - अरिहंत मंगल, सिद्ध मंगल, साहू मंगल और केवलिपण्णतों धम्मो मंगल। जैनधर्म जिस स्वस्तिक को पवित्र चिन्ह मानता है, उसकी आकृति में स्वस्तिक के ऊपर एक चंद्रबिंदु तथा चंद्रबिंदु के नीचे तीन बिंदु अंकित हैं। इसमें चंद्रबिंदु मुक्ति का प्रतीक है तथा अन्य तीन बिंदु ज्ञान, दर्शन और चरित्र के प्रतीक हैं। बौद्ध मान्यता के अनुसार पत्तों तथा पुष्पों यानी वनस्पति संपदा की उत्पत्ति का कारण स्वस्तिक ही है। बौद्ध मंदिरों में लगाए जानेवाले दीपकों पर भी स्वस्तिक चिन्ह अंकित किया जाता है। बौद्ध विहारों, स्तूपों, मंदिरों में स्वस्तिक चिन्ह मिलता है। बुद्ध की मूर्तियों पर उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिन्ह मिलते हैं। विदेशों में इस मंगल प्रतीक के प्रचार प्रसार में बौद्ध धर्म के प्रचारकों का बहुत योगदान रहा है।


कुल निष्कर्ष यह निकलता है कि स्वस्तिक मानव जीवन के अधिक निकट है और इसका प्रतीकार्थ भाव गहन है। स्वस्तिक की चार भुजाएं चारों दिशाओं की प्रतीक हैं। जो प्रेरित करती हैं कि हम चारों दिशाओं में बढ़ें। चार भुजाएं मानव जीवन का सार है, आधार हैं।  स्वस्तिक यह भी निर्देशित करता है कि, विभिन्न दिशाओं में हम अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए तेज, यश, सामर्थ्य को जुटाएं। स्वस्तिक की चार भुजाएं बीच में से पृथक-पृथक दिशा की ओर गमन करती हैं। जो इस बात की प्रतीक हैं कि आओ हम संगठित होकर  चारों दिशाओं में उद्यम के लिए गमन करें। समता, सहकार्य, एकता और संतुलन जैसे जीवन मुल्यों को स्थापित करें। 

Thursday, 17 August 2017

18 अगस्त पेशवा बाजीराव (प्रथम) जयंती
महान योद्धा अजेय बाजीराव पेशवा (प्रथम)
शिरीष सप्रे

विश्व का इतिहास कई महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन की दास्तां है, गवाह है। इतिहास गवाह है कि अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने हमेशा से ही दूसरों के आक्रमणों, प्रयत्नों को सहा है परंतु, कभी स्वयं होकर किसी सभ्यता या संस्कृति को समाप्त करने के लिए सीमोल्लंघन कर उन्हें नष्ट करने का प्रयास नहीं किया है। हालांकि हिंदू सभ्यता में भी एक से बढ़कर एक वीर उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने समय समय पर उठकर इस प्रकार के आक्रांताओं का मुकाबला कर अपनी मातृभूमि की रक्षा की है। भारत के इतिहास में ऐसे ही एक महान योद्धा, हिंदूधर्म संरक्षक के रुप में प्रख्यात नाम है 18 अगस्त 1700 में पैदा हुए बाजीराव पेशवा (प्रथम)। जिन्होंने अपने अद्‌भुत पराक्रम द्वारा एक नया गौरवशाली इतिहास रचा। बीस वर्ष के अपने कार्यकाल में उन्होंने अपने धुआंधार विविध अभियानों में लगभग पौने दो लाख कि.मी. की घुडदौड कर 'देवदत्त सेनानी" के रुप में लोकप्रियता हासिल की तथा मराठा साम्राज्य की धाक पूरे भारत में निर्मित कर दी।

बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक की सनकी नीतियों से त्रस्त हो उसके सरदारों ने विद्रोह कर दिया और अपने में से ही एक हसन खां को जफर खां की उपाधि दी। 3 अगस्त 1347 को अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार से दक्षिण भारत में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की नींव पडी। 1487 में बहमनी सल्तनत के सुल्तान मुहम्मदशाह तृतीय की मृत्यु के पश्चात उसके पांच प्रमुख सरदारों ने विद्रोह कर अपनी पांच सल्तनतें कायम कर ली। इनमें से एक थी बीजापुर की आदिलशाही (न्यायनिष्ठ)(1849) जिसका संस्थापक सुल्तान था सूबेदार युसूफ आदिलखां। वह स्वयं को आदिलशाह (न्यायनिष्ठ सुल्तान) कहलाता था। यूसुफ मूलतः तुर्किस्तान के शाही परिवार से था। अपने ही भाई द्वारा हत्या के डर से वह कुस्तुंतुनिया (इस्तंबूल) से भाग खडा हुआ और अपनी असलियत छुपाने के लिए गुलाम के रुप में बिक गया। गुलामों का व्यापारी अलाद्दीन उसे हिंदुस्तान ले आया और बहमनी राज्य के मंत्री महमूद गावान के हाथ बेच दिया। अपनी योग्यता के बल पर वह बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय की नजरों में चढ़ा और सरदार बन गया। बीजापूर सूबे का सूबेदार यही यूसुफखां था। इसने अपने विश्वासपात्रों के रुप मे अफ्रीका के गुलामों को अपने मातहत रखा। इस प्रकार पंद्रहवी सदी के अंतिम काल से दक्षिणी हिंदुस्तान में अफ्रीकी गुलाम मूलतः बहमनी सल्तनत में लाए गए और उसके विघटन के बाद दक्षिण की पांचों मुस्लिम सल्तनतों में बढ़ते चले गए। अबीसीनिया के यह हबशी ही 'जंजीरा" और उसके आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा जमानेवाले सिद्दी थे।

सबसे पहले हम 'जंजीरा" के अर्थ को समझ लें। 'जंजीरा" सागर के बीच में होनेवाले टापू या द्वीप को अरबी भाषा में 'जंजीर" कहा जाता है। दक्षिण भारत के पश्चिमी किनारे के उत्तरी हिस्से अर्थात्‌ कोंकण प्रदेश (महाराष्ट्र) के रायगढ़ जिले में 'मुरुड", 'राजापुरी खाडी" के मुंहाने पर अरब सागर पर बने हुए एक किले को 'जंजीरा" कहते हैं। पौने पांच सौ वर्ष इस किले को बनानेवाले सिद्दी बुरहानखां ने जब  इस किले को देखा तो उसके मुंह से निकल पडा 'जंजीरे माहरुब"। अर्थात्‌ उसको यह जलदुर्ग एक 'चंद्ररेखा" सा द्वीप लगा। सागर मध्य स्थित दुर्ग को संस्कृत में 'उद्‌धिमध्यस्त वरीदुर्ग" कहा जाता है। बुरहानखां द्वारा इसे बनाए जाने के पूर्व इसका स्वरुप कच्चा था। उसे उसके निर्माता कोली (जाति) के लोग स्थानीय बोली में मेढ़े कोट यानी लकडी के लठ्ठो को एक के ऊपर एक रखकर किया गया निर्माण कहते थे। संभव है संभ्रान्त उच्च कुलीन लोग उन दिनों 'जंजीरा" को 'उद्‌धिमध्यस्त वरीदुर्ग" कहते हों। किसी साहित्यकार, कवि ने अपनी रचना में उसका वर्णन इस प्रकार किया हो। वैसे दूर से यह किला एक विराट कछुए के आकार जैसा दिखाई देता है। अतः किसी ने इसे कच्छप दुर्ग भी कहा हो। जंजीरा के निर्माण की पृष्ठभूमि इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

बहमनी सल्तनत के विघटन के बाद बनी निजामशाही का संस्थापक था निजामुलमुल्क बहरी काबेरा मलिक अहमद। अरब सागर के किनारे का कोंकण इलाका अहमदनगर की इस निजामशाही के कब्जे में रहा। राजापुरी खाडी के मुहाने पर कोली नेता राम पाटिल ने निजामशाही से विधिवत अनुमति लेकर मेढ़े कोट यानी लकडी के लट्ठों से बना किला बनाया। राम पाटिल के बाद कोली नेता एतयार राव ने उस पर अधिकार जमाया और निजामशाही से स्वयं को स्वतंत्र समझने लगा। तब निजामशाही की ओर से सिद्दी पीरमखान को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा गया। आक्रमण में सारे कोली मार दिए गए और मेढ़े कोट निजामशाही के कब्जे में आ गया। पीरमखान के बाद आए बुरहान खान के दिमाग में मेढ़े कोट के स्थान पर पत्थरों का एक मजबूत किला बनाने का विचार आया। 1556 से 1571 तक सैंकडों कारीगरों-मजदूरों की दिन-रात की मेहनत से जंजीरा जैसा मजबूत सागर दुर्ग बनकर खडा हुआ।

जंजीरा दुर्ग इतना मजबूत और महत्वपूर्ण था कि, दक्षिण हिंदुस्तान पर अपनी धाक जमानेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने मई 1669, 1675 और फिर 1678 में दो बार जंजीरा को अपने अधिकार में करने के लिए सैनिकी अभियान चलाए पर सफल न हो सके। उनके पश्चात छत्रपति संभाजी भी सफलता न प्राप्त कर सके। 1633 में निजामशाही शाहजहां के शासनकाल में मुगलों के कब्जे में आ गई और सिद्दी मुगलों के ताबेदार हो गए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद सिद्दी घराने के वंशजों ने स्वतंत्र हो स्वयं की जंजीरा सल्तनत बना ली। जंजीरा जैसा दृढ़ दुर्ग कहीं मराठों के कब्जे में ना चला जाए इसलिए पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने समय समय पर सिद्दियों की मदत की जिसके कारण जंजीरा अजेय बना गया।

इसी सिद्दी सुल्तान के आतंक और अत्याचार से त्रस्त हो छत्रपति शाहू के पेशवा बालाजी विश्वनाथ कोंकण से पलायन कर सत्रहवीं सदी के अंत में देश (दक्खन का पठार) पर पहुंचे थे। उनके जैसे अनेकों को अपनी जान-माल की रक्षा के लिए अपनी जन्मभूमि से भागना पडा था। पेशवा भला इस इतिहास कैसे भूलते? 8 फरवरी 1727 को शिवरात्री पर सिद्दी की फौजों ने चिपलून के पास भगवान परशुराम के पवित्र मंदिर पर हमला कर उसका विध्वंस कर खूब लूटखसोट की थी। भगवान परशुराम का यह ख्यात पवित्र मंदिर छत्रपति, पेशवा और अनेक मराठा सरदारों के लिए श्रद्धेय ब्रह्मेंद्रस्वामी के अधिकार एवं व्यवस्था में था। अतः सिद्दी को सबक सीखाने की इच्छा सभी में तीव्रतर थी। अपनी शक्ति बढ़ी है इसलिए जंजीरा राज्य को निगलने की शाहू या बाजीराव की नवीन योजना नहीं थी तो, 1718 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ द्वारा दिल्ली में मुगल बादशाह के सामने जो लिखित मांगें पेश की गई थी, उनमें भी स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि, ''हबशियों के कब्जे में हमारे जो गढ़-किले हैं वे सब हमें दिए जाएं और जो मुल्क है वह भी दिया जाए। यदि वह देने को राजी ना हो तो बादशाही फौजों के द्वारा दबाव डालकर, ताकीद देकर वे हमें सौंप दिए जाएं।""

सिद्दी को सबक सीखाना भी अब आवश्यक हो चूका था अतः छत्रपति शाहू ने 'जंजीरा मुहिम" को हाथ में लेने का निश्चय किया। संयोग से सिद्दी रसूलखान की अकस्मात्‌ मृत्यु हो गई। उसके छः बेटों में से बडे अब्दुल्ला की ताजपोशी हो गई परंतु, सत्ता की राजनीति में उसकी हत्या हो गई। अब्दुल्ला का बेटा रहमान अपने पिता हश्र देखकर डर गया और भागकर मराठों की छावनी में जा पहुंचा। परिस्थितियों को अनुकूल देख बाजीराव ने छत्रपति के विश्वसनीय फत्तेसिंह भोंसले को साथ ले 26 अपैल 1733 को कूच कर दिया। सिद्दी की नौसेना के जहाजों पर कब्जा कर लिया और रायगढ़ को भी जीत लिया। परंतु, मरहठों की आपसी धडेबंदी से जंजीरा मुहिम ने अपनी गंभीरता खो दी। बाजीराव इससे व्यथित हो गए। आपसी फूट के चलते मराठों का जीतना असंभव सा हो गया था। अतः बाजीराव ने 1 दिसंबर 1733 को अंग्रेजों की मध्यस्थता से जंजीरा के सिद्दी से संधि कर ली। संधि के अनुसार मराठों की शरण में आए रहमान को गद्दी पर बैठाया गया। बैठे ठाले समय काटना बाजीराव के स्वभाव में नहीं था अतः जंजीरा से वापस आकर वे अप्रैल 1734 में खानदेश चल गए। इस समझौते की स्याही सूखने भी नहीं पाई थी कि सिद्दी रायगढ़ को पुनः हासिल करने के लिए आगे बढ़ा। छत्रपति के आदेश पर मराठा सेनाएं आगे बढ़ी। रायगढ़ में दोनो सेनाओं में जमकर लढ़ाई हुई, जिसमें एक प्रमुख सिद्दी सरदार अंबर अफवानी के मारे जाने पर सिद्दी फौजें आए रास्ते से भाग खडी हुई। अपने घर पहुंचे सिद्दी ने अंग्रेजों-पुर्तगालियों की सहायता एवं मार्गदर्शन प्राप्त कर लिया। अब बरसात का मौसम था अतः विवश हो मराठा सेनाओं को वापिस जाना पडा। 

बाजीराव के पिताश्री पेशवा बालाजी विश्वनाथ और नौसेना प्रमुख सरखेल कान्होजी आंग्रे में घनिष्ठ मित्रता थी। उनकी अगली पीढ़ी में भी सौहार्द यथावत रहा। ऐसे में जनवरी 1735 में बाजीराव कुलाबा पहुंचे और आंगे्र बंधुओं के आपसी विवाद का समाधान करने हेतु पद और अधिकार क्षेत्र का बंटवारा किया। अगस्त में सतारा पहुंच बाजीराव ने शाहु से विचार-विमर्श किया और विजयादशमी पर उत्तर हिंदुस्थान की ओर कूच कर गए। बंटवारे से आंगे्र बंधुओं का विवाद समाप्त नहीं हुआ, अपितु संभाजी आंगे्र ने सिद्दी सात से मित्रता कर ली। आंगे्र भाइयों की आपसी फूट का लाभ उठाते हुए सिद्दी सात ने मानाजी पर हमला बोल दिया। इस संकटपूर्ण स्थिति में मानाजी आंगे्र के लिए एक ही आशा का केंद्र था - पेशवा बाजीराव। 

मानाजी ने बाजीराव को तत्काल सहायता हेतु पत्र लिखा। तब तक बाजीराव उत्तर हिंदुस्थान के लिए रवाना हो चूके थे। ऐसे में मानाजी की गुहार सुनकर पेशवा बाजीराव के अनुज चिमाजी अप्पा 13 अप्रैल 1736 को सतारा से दौड चले और कुलाबा होते हुए 18 अप्रैल को चरई के निकट श्रीगांव पहुंचे जहां दोनो सेनाएं आमने-सामने हुई। घनघोर लडाई में सिद्दी सात सरदार याकूब खान जब मारा गया तो मराठों का मनोबल ऊंचा उठा। शीघ्र ही मराठा वीर नानाजीराव सुर्वे से सीधी लढ़ाई में सिद्दी सात भी मारा गया। वैसे चरई की यह लडाई कोई बहुत बडी नहीं थी। फिर भी सिद्दी सात के मारे जाने से उसका बहुत बडा महत्व था। सिद्दी सात ने ही 1727 की शिवरात्रि पर चिपलुन के भगवान परशुराम मंदिर का विध्वंस किया था। इस जालिम की यह कुख्याति थी कि वह भयंकर अत्याचारी था। मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट करना, देवता प्रतिमा के अभिषेक पात्र को अपने पीकदान के रुप में इस्तेमाल कर हिंदू धर्म का अपमान करने में उसे गर्व था।  अपने हरम हेतु सुंदर हिंदू ललनाओं का विशेषतः उच्च वर्ण की नारियों का अपहरण करवाता, उन्हें दासी-लौंडी बनाकर रखता। हिंदुओं को अपमानित करने के मंतव्य से वह इन धर्मभ्रष्ट की गई ललनाओं को हिंदू वेशभूषा में रहने, बिंदी लगाने को प्रोत्साहित करता था। सिद्दी सात की दुष्ट प्रकृति के कारण ही उसे उन दिनों दैत्य की संज्ञा दी जाती थी और उसके मारे जाने पर उसे रावण वध बतलाया गया।

बाजीराव का लक्ष्य मात्र कोकण या महाराष्ट्र नहीं तो समूचे हिंदुस्थान को विदेशी-विधर्मियों से मुक्ति अर्थात्‌ वीर शिवाजी के हिंदवी स्वराज्य की हिंदुपदपादशाही के रुप में प्रस्थापित करने का था। इसलिए उनकी दृष्टि में जंजीरा मुहिम गौण थी और उनकी घुडदौड उत्तरी हिंदुस्थान की ओर दिल्ली की दिशा में रही। बाजीराव का रणघोष था - 'चलो दिल्ली - चलो दिल्ली।"
हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 1 -
असाधारण महत्व है तिलक का
शिरीष सप्रे

हिंदू परंपरा में मस्तक पर तिलक या टीका लगाना धार्मिक परंपरा के साथ जुडा हुआ है। पूजा और भक्ति का एक अभिन्न अंग है तिलक। प्रत्येक शुभ अवसर पर ऐसा करना प्रसन्नता, सात्विकता, यश का प्रतीक माना जाता है। भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना, कथा, यज्ञ-हवन, संस्कार विधि, मंगल कार्य, शुभ कार्यों के आरंभ में, यात्रा गमन, किसी महत्वपूर्ण कार्य पर जाने, विजय अभियान पर निकलने, आदि में रोली, हल्दी, चंदन या कुमकुम का तिलक किया जाता है। तिलक को अक्षत से भी विभूषित किया जाता है। तीर्थों में देवदर्शन हेतु उपस्थित होने पर वहां माथे पर तिलक लगाकर शुभकामना दी जाती है। पर्व-त्यौहारों में, अतिथियों के आगमन पर तिलक लगाकर स्वागत किया जाता है। यह सब दिखने में सामान्य एवं औपचारिकता जैसा भले ही लगता हो परंतु, इसका महत्व असाधारण है।

परंतु, आश्चर्य की बात यह है कि, कई लोग जो अधिकतर मंगलवार और शनिवार को माथे पर तिलक लगाए घूमते हुए मिल जाएंगे।  जब उनसे पूछा जाए कि यह टीका लगाने का उद्देश्य क्या है? तो, अधिकांश लोग आपको अनभिज्ञ मिलेंगे। कुछ लोग यह उत्तर देंगे कि, मंदिर में पूजा या चढ़ावा चढ़ाने के बाद पुजारी माथे पर तिलक लगा देता है। कुछ कहेंगे कि चरणामृत लेने की तरह ही तिलक लगवाना एक धार्मिक क्रिया है, प्रवृत्ति है। कुछ लोग कहेंगे हमने तो कभी इस विषय पर विचार ही नहीं किया। कुछ लोगों के अनुसार माता-पिता एवं अन्य वरिष्ठ लोगों को पूजा के बाद तिलक लगाते देखा है इसलिए हम भी पूजा के पश्चात तिलक लगाते हैं।

वस्तुतः यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि, ललाट पर टीका या तिलक जिस स्थान पर लगाया जाता है, वह स्थान दोनो भौंहों की बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर है। यह हमारे चिंतन-मनन का स्थान है। यह चेतन-अवचेतन अवस्था में भी जागृत एवं सक्रिय रहता है, इसे भ्रू-मध्य या आज्ञाचक्र कहते हैं। शरीर शास्त्र के अनुसार यह स्थान पीनियल ग्रंथी का है। प्रकाश से इसका गहरा संबंध होता है। प्रयोगों में जब किसी व्यक्ति की आंखों पर पट्टी बांधकर, सिर को ढ़ंककर उसकी पीनियल ग्रंथी को उद्दीप्त किया गया, तो उसे मस्तक के अंदर प्रकाश की अनुभूति हुई। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि, ध्यान-धारणा के माध्यम से साधक में जो  प्रकाश का अवतरण होता है, उसका का कोई ना कोई संबंध इस स्थूल अवयव से अवश्य है। 

आज्ञाचक्र या पीनियल ग्रंथी के इस स्थान को तिलक के लिए चुना गया है ताकि इसे उद्दीपन मिलता रहे और वहां से संबंद्ध स्थूल सूक्ष्म अवयव जागरण की प्रक्रिया से जुडे रहें। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि, दोनो भौंहों के बीच कुछ अतिरिक्त संवेदनशीलता होती है। यदि हम आंखें बंद करके बैठ जाएं और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उंगली ले जाए तो, हमें वहां कुछ विचित्र अनुभव होता है। यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इसलिए उस केंद्र पर जब तिलक लगाया जाता है तो, उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इस आज्ञचक्र के एक ओर अजिमा नाडी होती है तथा दूसरी ओर वर्णा नाडी। इन दोनो के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील, ऊर्जावान, जागृत रखने के साथ ही तनावमुक्त रहने हेतु ही तिलक लगाया जाता है। इस बिंदु पर सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से सात्विक एवं तेजपूर्ण होकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है, मन में निर्मलता, शांति एवं संयम में वृद्धि होती है।

तिलक महज परंपरावश नहीं लगाया जाता। पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग है तिलक। इसका प्रयोजन बहुत गहन होता है। यह मस्तक पर इष्ट के प्रतीक के रुप में होता है, जो इष्ट की स्मृति को बनाए रखता है। माथे पर तिलक लगाना यह हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण परंपरा है। साधू-संत लगभग 80 प्रकार के तिलक लगाते हैं। माथे पर लगा तिलक विभिन्न मत-मतांतरों का भी परिचायक होता है। सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं- शैव - संप्रदाय के साधू चंदन की आडी रेखा या त्रिपुंड लगाते हैं। अधिकतर शैव सन्यासी त्रिपुंड तिलक लगाते हैं क्योंकि, यह शिवजी के श्रृंगार का एक भाग है। शाक्त - सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है। वैष्णव - संप्रदाय में 64 प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं ः लालाश्री तिलक, विष्णुस्वामी तिलक, रामानंद तिलक, श्यामश्री तिलक। गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु-सन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं। 

तंत्र शास्त्र के एक विशेषज्ञ के अनुसार टीका लगाने का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को किसी भी तांत्रिक की सम्मोहिनी शक्ति से बचाना है। किसी भी व्यक्ति को सम्मोहित करने के लिए उसकी आंखों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है, किंतु माथे पर टीका लगा होने के कारण ेकेवल दो आंखों पर ध्यान केंद्रित करना असंभव हो जाता है। यही वजह है कि जब बौद्ध धर्म की महायान तांत्रिक साधना चरम पर थी तब वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों ने तिलक लगाने की परंपरा आरंभ की थी। टीका लगाने के संबंध में शैव परंपरा के मतावलंबियों की दूसरी ही धारणा है। उनका कहना है कि, माथे पर लगा तिलक तृतीय नेत्र का प्रतीक है। तीसरी दृष्टि मानव की सहप्रकृति है किंतु, कालांतर में वह दृष्टि धूमिल पडते-पडते समाप्त हो गई। माथे पर टीका लगाकर इसी समाप्तप्राय दृष्टि को जागृत करने का प्रयास किया जाता है।

तिलक द्रव्य के रुप में विभिन्न प्रकार की सामग्रियों को प्रयोग में लाया जाता है। प्रायः तिलक चंदन का लगाया जाता है। चंदन शीतल प्रकृति का होता है और जब माथे पर लगाया जाता है तो भाव यह रहता है कि चिंतन का केंद्र मस्तिष्क शीतल रहे। श्वेत और रक्तचंदन भक्ति के प्रतीक हैं। इनका प्रयोग भजनानंदी लोग करते हैं। गोरोचन व केशर ज्ञान और वैराग्य के प्रतीक हैं। ज्ञानी, तत्वचिंतक और विरक्त ह्रदयी लोग इसको उपयोग में लाते हैं। कस्तूरी ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है। परम अवस्था प्राप्त योगियों द्वारा तिलक में इसका प्रयोग किया जाता है।

तिलक धारण में विभिन्न उद्देश्यों के लिए अलग-अलग उंगलियों के प्रयोग का विधान है। ज्ञान की उपलब्धि के लिए तर्जनी, ऐश्वर्य के लिए मध्यमा, धन-वैभव, सुख-शांति के लिए अनामिका उंगली निहित है। तर्जनी से लाल या श्वेत चंदन, मध्यमा से सिंदूर, अनामिका से केशर, कस्तूरी, गोरोचन का टीका लगाना चाहिए। इनके लिए क्रमशः पूर्व, उत्तर और पश्चिम दिशा निर्धारित है। इस ओर मुंह करके ही इनका तिलक धारण करना चाहिए। अंगूठे से भी तिलक करने की परंपरा है। ऐसा वे ही लोग करते हैं, जो सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं। इस प्रकार यदि हम गौर करें तो पाएंगे कि तिलक या टीका धार्मिक प्रतीक होने के साथ ही साथ इसके पीछे विज्ञान और दर्शन भी है।

Saturday, 29 July 2017

लोकमान्य तिलक के साथी

1 अगस्त लोकमान्य तिलक पुण्यतिथि निमित्त
लोकमान्य तिलक के साथी 
शिरीष सप्रे

सूर्य के आसपास ग्रह-नक्षत्र घूमते हैं उसी प्रकार से लोकमान्य (बाल (केशव) गंगाधर) तिलक (23 जुलाई 1856 से 1 अगस्त 1920) के साथी, मित्र सैंकडों छोटे-बडे कार्यकर्ताओं की माला उनके आसपास घूमती रहती थी और जब तक लोकमान्य की कीर्ति तथा उनके कर्तृत्व का स्मरण रहेगा तब तक उनके साथीदारों की प्रेरक स्मृतियां भी जीवित रहेंगी। लोकमान्य ने अपने विविध आंदोलनों में भिन्न-भिन्न जाति, धर्म, प्रवृत्ति के लोगों को जोडा, उनको कार्य प्रवृत्त किया और उनके बाद भी ये लोग कार्यरत रहे। लोकमान्य तिलक के साथियों का परिचय करवा देने के लिए महामहोपाध्याय दत्तो वामन पोतदार (हिंदी को महाराष्ट्र की सबसे बडी दूसरी भाषा बनाने का श्रेय इन्हीं को है) ने थोडे से शब्दों में स्वयं के संस्मरणों सहित तिलक के साथियों के शब्दचित्र आत्मियता से 'लोकमान्य टिळकांचे सांगाती" (लोकमान्य तिलक के साथी) इस पुस्तक में सजीव किए हैं। इस ग्रंथ में सुनीसुनाई की अपेक्षा पक्के तौर पर प्रत्यक्ष देखी हुई विश्वसनीय बातें ग्रथित की गई हैं। इस ग्रंथ में कुल 111 लोगों से संबंधित संस्मरण हैं उनमें से कुछ चुनिंदा साथियों का उल्लेख नीचे के आलेख में किया गया है  -

1. रामकृष्ण गोपाल भांडारकर (1837-1925)ः पुणे का भांडारकर इन्स्टिट्‌यूट इन्हीं के स्मरणार्थ निर्मित किया गया है। पद्मभूषण से सम्मानित डा. भांडारकर प्राच्यविद्या क्षेत्र के ऋषी थे। भारतीय पांडित्य का ध्वज उन्होंने पूरे विश्व में फैलाया था। यह प्रख्यात प्राच्यविद्या-पंडित लोकमान्य तिलक से आयु में बडे थे और उनको तिलक की विद्वता के प्रति बडा आदर था। दुर्लभ पुस्तकों अथवा चर्चा के लिए तिलक उनके पास जाया करते थे। ओरायन, आर्टिक होम यह ग्रंथ लिखते समय भांडारकर ग्रंथालय का उन्हें बडा लाभ मिला था। लोकमान्य तिलक मंडाले जेल से छूटकर आने के पश्चात जब डॉ. भांडारकर से मिलने गए तो उन्होंने कहा 'अरे, कितना दुबला हो गया!" एक बार एक स्वयंसेवक डॉ. भांडारक से चंदा मांगने गया परंतु, विन्मुख लौट आया। परंतु, जब वह तिलक के साथ गया तो उन्होंने तत्काल पांच रुपये दे दिए और तिलक ने उन्हें रसीद दे दी थी।

भांडारकर की उपनिषदों में रुचि थी। मुंबई में स्थापित किए गए प्रार्थना समाज के वे मार्गदर्शक गुरु थे। महान सत्यभक्त, देशभक्त, समाज-सुधारक, शीलवान, विद्वान सद्‌गृहस्थ होने के कारण उनके पांडित्य का तेज अलग ही झलकता था। भांडारकर जातिभेद को नहीं मानते थे। स्त्री शिक्षा के वे समर्थक थे। महर्षि कर्वे ने जब विद्यापीठ प्रारंभ किया था तो उन्होंने उसका पहला कुलगुरु उन्हें ही चुना था। अपनी लडकी का पुनर्विवाह कर भांडारकर ने अपन कृतिशूर सुधारक हैं यह सबको दिखला दिया था। अंगे्रजी विद्या से लोग नास्तिक बन रहे हैं इस पर उन्हें बडा दुख होता था। मूर्तिपूजा पाप नहीं, परंतु वैसी श्रद्धा न होते वह दर्शाना पाप है, यह उनका मानना था। 

2. डा. एनी बेसेंट (1847-1933)ः एनी बेेसेंट एक विख्यात राजनीतिज्ञ, विद्वान विदुषी थी। मूलतः इंग्लैंड की होकर वे 1893 में भारत आ गई और यहीं स्थाई हो गई। बनारस में रहते उन्होंने सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी। गीता का अंगे्रजी में भाषांतर किया था। 1907 में थिऑसॉफिकल सोसायटी की अध्यक्ष बनी। एनी बेसेंट 1895 में पहली बार पुणे आई। उनका तिलक से परिचय राजनीति के कारण हुआ जो आगे चलकर बढ़ता ही गया। उन दोनो में परस्पर आदर भाव था। परंतु, कुछ मामलों में मतभेद भी थे। होमरुल आंदोलन में वे तिलक के साथ अग्रणी थी। उन्होंने 'न्यू इंडिया" वर्तमान पत्र निकाला था जिसमें वे सरकार की आलोचना किया करती थी। वे बहुत रचनात्मक लेखिका एवं प्रभावशाली वक्ता थी। 1917 में वे कोलकाता कांग्रेस की अध्यक्षा थी। एक बार महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा था कि, उन्होंने गहरी नींद में सोए भारतीयों को जगाया है। 

1916 की वसंत व्याख्यान माला में तिलक अध्यक्ष और एनी बेसेंट व्याख्याता के रुप में आए थे। (इस वसंत व्याख्यानमाला का एक लंबा इतिहास है इसके संस्थापक न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे थे। इसमें नेहरुजी, सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर, अटलजी, शरद पवार, बाल ठाकरे, श्रीराम लागू, बलराज साहनी, डॉ. शंकरदयाल शर्मा आदि जैसी कई हस्तियों ने व्याख्यान दिए हैं।) इसमें एनी बेसेंट ने तिलक के प्रति आदर के उद्‌गार निकाले थे। उनका भाषण र्र्षीींीीश ेष ळपवळर (भारत का भविष्य) विषय पर था। इसमें गोरे लोग कालों पर किस प्रकार अन्याय कर रहे हैं यह बतलाकर भारत स्वाभिमानी बने का संदेश दिया था। भाषण समाप्त होते ही पर्जन्य वृष्टि होने लगी तब तिलक ने एक ही वाक्य में समारोप कर दिया कि, 'बिजली की गडगडाहट से परमेश्वर ने बेसेंट बाई के भाषण को सहमति दी होकर, वृष्टि रुप में वह तुम्हें आर्शीवाद दे रही है।"

3. रानडे महादेव गोविंद (1842-1901)ः इनके जितना विद्वान, विवेकी, हरफन मौला, कर्ताधर्ता पुरुष ढूंढ़े से भी अर्वाचीन महाराष्ट्र में नहीं मिलेगा। वे आजादशत्रु थे। विद्यापीठ के सभी पुरस्कार उन्होंने प्राप्त किए और 'प्रिन्स ऑफ गेज्यूएट" यह पदवी सार्थ की थी। उनका अधिकाशं समय पुणे-मुंबई में बीता। इस काल में विभिन्न सार्वजनिक आंदोलन उन्होंने खडे किए। वक्तृत्वोत्तेजक मंडली, सार्वजनिक सभा, सामाजिक परिषद, फीमेल हायस्कूल आदि संस्थाएं उन्हीं के कर्तृत्व के कारण समृद्ध हुई। प्रार्थना समाज के वे एक अध्वर्यु थे। कांग्रेस से तो उनका संबंध आरंभ से ही था। राजनीति में नरमपंथी और सुधारक इस प्रकार से उनका वर्णन किया जा सकता है। उनकी श्रद्धा थी कि अंग्रेजी राज ईश्वरी इच्छा  या कृपा के कारण आया है। परंतु, उनकी अंदरुनी प्रेरणा छत्रपति शिवाजी के चरित्र में दिख पडती है। इसका मूल उन्होेंने विद्यार्थी दशा में इतिहास पर लिखे निबंध में दिख पडता है। उनकी व्यापक विचारसरणी थी कि, पुराने में से अच्छा रखकर समाज का सर्वांगीण सुधार होना चाहिए।

देश के आर्थिक और कृषि संबंधी प्रश्नों पर वे अपनी पैनी दृष्टि रखते थे। उनके लेख और व्याख्यान इतने अभ्यासपूर्ण एवं संयमित होते थे कि, अंग्रेज राज्यकर्ताओं से लेकर हिंदुस्थान के तमाम विद्वतजन उनका अध्ययन करते थे। तिलक और रानडे के बीच राजनैतिक और सामाजिक मामलों में तीव्र मतभेद थे, तथापि वे झुकते थे तो सिर्फ रानडे के सामने। तिलक ने उनके संबंध में एक अद्वितीय मृत्युलेख लिखा था, आगे वे उनके दसवें पर भी मुंबई में उपस्थित रहे थे।

4. जोसेफ बॅप्टिस्टा (1864-1930)ः तिलक के साथीदार सभी जाति-धर्मों के लोग थे। उनमें अग्रणी थे प्रभावी वक्ता बॅरिस्टर बॅप्टिस्टा। ये ईसाई होने के बावजूद वे कहते थे ईसाइयों के लिए अलग मतदाता संघ नहीं होना चाहिए। उनके पूर्वज मराठा थे और इसका उन्हें गर्व था। एक बार उन्होंने तिलक के साथ पंगत में बैठकर अन्य लोगों के समान माथे पर तिलक लगवाकर भोजन भी किया था। इस प्रकार की घटना उस जमाने के हिसाब से दुर्लभ ही थी। 1898 में जब तिलक को कारावास हुआ था तो केंब्रिज यूनियन में उन्होंने इसके विरोध में आवाज उठाई थी। 1908 में एक मुकदमे के सिलसिले में वे तिलक के संपर्क में आए और फिर उनके संबंध अंत तक बने रहे। हाईकोर्ट की फीस कारागार से जब तिलक ने उन्हें भिजवाई तो उन्होंने वह उनके परिजनों को लौटा दी थी। होमरुल आंदोलन के प्रचार के लिए तिलक ने उन्हें विलायत भी भेजा था। वे मुंबई के मेयर भी रहे थे।

5. सर फिरोजशाह मेथा (1845-1915)ः दादाभाई नौरोजी के बाद मुंबई का नेतृत्व बॅरिस्टर मेथा के पास गया था। उनकी भव्य दाढ़ी-मूंछें और कलमदार चेहरा देखकर और बुलंद आवाज सुनकर लोग उन्हें मुंबई का सिंह कहते थे और यह पदवी उनके लिए सार्थ भी थी। तिलक और मेथा के बीच कभी बनी नहीं। तिलक की अपेक्षा वे गोखले को अधिक पसंद करते थे। कोलकोता कांग्रेस में जब बहिष्कार का प्रस्ताव आया तब तिलक और मेथा में जमकर वाक्‌युद्ध हुआ था। इतना होने पर भी तिलक मेथा के प्रति आदर रखते थे। तिलक द्वारा उन पर लिखा मृत्युलेख इस दृष्टि से पढ़ने योग्य है। जब मेथा बीमार थे तब तिलक उनसे मिलने गए भी थे। उस समय मेथा ने उद्‌गार निकाले थे 'तिलक और मैं यदि पांच मिनिट साथ बैठ जाएं तो हम एक हो जाएंगे।" परंतु, यह हो न सका। 

इस प्रकार से और भी अनेक लोग उनके निकट संपर्क में आए उनके साथी भी बने उनमें कुछ उनसे वैचारिक सहमति रखते थे तो कुछ मतभेद भी रखते थे। लेख की सीमा होने के कारण इस प्रकार के अनेक होने के कारण सभी के बारें में लिखना, बताना तो संभव नहीं फिर भी संक्षेप में कुछ इस प्रकार थे -  कर्मवीर विट्ठलराव शिंदे (1873-1944) इनको तिलक पर गर्व था। इतना ही नहीं कभी वे तिलक के पंज प्यारों में से एक थे। वे डिप्रेस्ड क्लास मिशन और अस्पृश्योद्धार कार्य के लिए जाने जाते थे। उन्हें मराठों के इतिहास पर बडा गर्व था। परंतु, एक बार उन्होंने दत्तो वामन पोतदार से कहा था, 'मराठा समाज ने मेरी कोई कदर नहीं की।" 1901 में जब वे युनिटेरियन शिष्यवृत्ति प्राप्त कर तौलनिक धर्मो के अध्ययन के लिए ऑक्सफोर्ड गए थे तो, जाने के पूर्व तिलक से मिलने गए थे और तिलक ने उन्हें प्रोत्साहन दिया था। अस्पृश्यता के प्रश्न पर तिलक और शिंदे में कुछ खास बनी नहीं। इतना होने पर भी तिलक के प्रति उनके मन में आदर था। यह प्रसिद्ध है कि, एक बार तिलक ने उद्‌गार निकाले थे कि, 'यदि अस्पृश्यता ईश्वर को मान्य है तो, मैं ईश्वर को भी नहीं मानूंगा।" फिर भी विट्ठलराव द्वारा आयोजित सहभोजन में शामिल होने के लिए वे तैयार हो गए थे। जब किर्लोस्कर थियेटर में सख्ती से शिक्षा के निमित्त सभा आयोजित की गई तो उन पर अंडे फेंके गए तब भी विट्ठलराव उनके बगल में मंच पर बैठे रहे थे।

गांधीवादी और खादीधारी पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (1867-1968) तिलक के चाहनेवाले में से एक थे। तथापि वेदअध्ययन और उनका प्रचार यही उनका कार्य था और इस क्षेत्र में उनका कार्य महर्षि पद को शोभायमान हो ऐसा था। सदाशिवशास्त्री गोपाल (गीतावाचस्पति) भिडे (1876-1939) जो स्वयं भी गीता पर प्रभावी प्रवचन देते थे और वेदोपनिषद का उन्हें गाढ़ा अभ्यास था उन्हें 'गीता रहस्य" के कुछ विचार मान्य नहीं थे फिर भी तिलक लिखित 'गीता-रहस्य" के कर्मयोग का उन्होंने आजीवन प्रचार किया। जब से 'केसरी" निकाल गया तब से उनके साथी चिंतामण गंगाधर भानु तिलक थे। उन्होंने गीता रहस्य की निर्भीक आलोचना की क्योंकि, उन्हें तिलक का कर्मपर अर्थ मान्य नहीं था जो स्वयं भी उत्तम वक्ता थे। इसी प्रकार के तिलक के एक और साथी थे विष्णुबुवा जोग (1867-1920) जो तिलक के जीवन में आए कुछ सत्पुरुषों में से एक थे और कीर्तनकार थे, तिलक को वे चलता-फिरता विठोबा यानी भगवान विट्ठल कहते थे और उन्हें भी तिलक के गीता रहस्य पर बडा गर्व था तथापि उन्हें इस ग्रंथ के सभी मत मान्य नही ंथे। उनका कहना था, 'तिलक ने कम से कम 'ज्ञानेश्वरी" तो भी ढ़ंग से पढ़ना चाहिए थी।" अंत में काशीनाथ ठकुजी जाधव जो मराठा समाजांतर्गत तिलक के जो पक्के अनुयायी थे उनमें से एक थे और जब तिलक विदेश से वापिस आए तब उनका जाहिर सम्मान समारोह आयोजित किया गया था उसके प्रमुख थे। जब कुछ लोगों ने विरोध दर्शाया तो उन विरोधकों को मुंहतोड जवाब देकर उस आयोजन को सफल कर दिखलाया था।